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सैयद हैदर रज़ा

जयप्रकाश चौहान
भारत की स्वतंत्रता से पूर्व और बाद में भी चित्रकला में अनेक प्रयोग हुए। उस समय के सर्वाधिक प्रयोगधर्मी चित्रकारों में सैयद हैदर रज़ा की गणना आधुनिक चित्रकला के शीर्षस्थ चित्रकारों में होती है। उनकी सृजनात्मकता में शुद्ध रूप से भारत की संस्कृति के ही तत्त्व मौजूद थे जिन्हें उन्होंने एकीकृत करना शुरू किया था। उनकी बचपन की यादों में मध्यप्रदेश के घने जंगल, वहाँ का वातावरण, जो कि उनकी स्मृतियों में कौंध रहा था। रज़ा अपने परिदृश्य चित्रों में बखूबी इन रंगों को पहचान रहे थे। विशेष रूप से काले रंग को, जिससे दूसरे रंग बने। इस अवधि की पेंटिंग का अधिकांश हिस्सा अंधेरे और मस्तिष्क में बन रहे ज्ञात-अज्ञात समीकरणों से उभर रहा था। उन्होंने किसी अनुकरण करने के बजाय अपने परिदृश्य में भी अमूर्त पहलुओं देखना शुरू किया। यह भौतिकता से अलग उनके चित्रकला में बदलाव के क्षणों की अनुभूति के साथ, रंग और प्रकाश के तालमेल में भावानात्मक रूप में फलक पर केंद्रित हुआ।
वर्षों तक रज़ा ने चित्रकला के तत्त्वों को गहराई से समझा, रंगों को, रेखाओं को उभरते देखा और इनके महत्त्व को जाना। फिर भी वे अपने किये कलाकार्यों से संतुष्ट नहीं थे। देश की संस्कृति को जानने की जिज्ञासा ने उन्हें भारत की, अपनी माटी की ओर पुनः खींचा। उनकी भारत की यात्रा और भारतीय शिल्प, और कला-संस्कृति के दर्शन के अध्ययन से उनके अमूर्तन रूपाकारों में नवीन शक्तियों, नये विचारों का प्रवेश हुआ। उनके मन में एक यह भी प्रश्न उठा कि इन्हें वो किस प्रकार अपने चित्रों में लाएँ जिसे वे फ्रांस में रहकर लाए भी। चित्रों को देखने का दृष्टिकोण व उनमें रंगों के प्रति उनका संवेदनशील होना तथा प्रतीकों की रचना में भारतीय संस्कृति और गहरे स्मृतियों के बिम्ब, उनके हर एक चित्रों से बयां होते हैं। रज़ा ने भारतीय आधुनिक चित्रकला में अपने अनुभवों से नए आयाम गढे। चित्रों में रंगों-रेखाओं के भावों को रज़ा ने अपने अन्तःकरण की दृष्टि से भी स्पष्टरूप से देखा व समझा। देश-दुनिया के भ्रमण से उन्होंने खुद को कला में एक खोजी, जिज्ञासु चित्रकार के रूप में देखा। उनके ज्यामिति रूपाकारों का संयोजन रंगों का वैभव, आधुनिक समय मे भी पूर्णतया भारतीयता और उसकी प्राचीन सभ्यता के साथ लोक कला संस्कृति के गहरे अध्ययन के साथ अभिव्यक्त हुआ, जिससे रज़ा के चित्रों में बिंदु से लेकर सौराष्ट्र जैसी कलाकृतियों का जन्म हुआ। उनकी कला में अस्सी के दशक में जो बदलाव हुए उसमें ज्ञात से अज्ञात की ओर रंग के स्वभाव में नवीन धारा का प्रस्फुटन होने लगा था। उन रंगों की ध्वनि एक बिंदु के साथ अब पहले से भी अधिक ओजस्वी और ऊर्जावान थी जिन्हें रज़ा ने आध्यात्मिक सूत्रों से समझा। वे कहते हैं-
बिंदु ऊर्जा का एक स्त्रोत है, जीवन का एक स्त्रोत है। जीवन यहाँ शुरू होता है, यहाँ अनंतता प्राप्त करता है।
रज़ा फ्रांस से जब भी भारत आते, तो युवा चित्रकार उन्हें अपने चित्र दिखाने की इच्छा रखते और वे भी प्रत्येक के कामों को देखते और उनपर चर्चा भी करते। रज़ा साहब से मिलना, चित्र दिखाना, बातें करना हर एक को ऊर्जा से भर देता था।
सृष्टि का सौन्दर्य प्रकृति और प्रकृति का सौन्दर्य मानव, मानव जीवन की श्रेष्ठ कृति, इस ब्रह्मांड और इस संसार की सर्वोत्तम रचना नारी। इस तरह चित्रों में रंगों-रेखाओं का सौन्दर्य, उसका संयोजन महत्त्वपूर्ण है। रज़ा ऐसी कई बातें बताते थे। उनके चित्रों में बिंदु, प्रकृति-पुरुष और नारी, सबका एक सशक्त प्रतीकात्मक रूप-सौन्दर्य दिखता है। रज़ा के अमूर्त चित्रों से समझ सकते हैं कि किस तरह जिसे हम अमूर्त देखतें हैं असल में उसे हम सृष्टि के सौन्दर्य, प्रकृति से प्रेम के सामंजस्य के साथ भावपूर्ण, रंगों-आकारों की प्रतीकात्मक गहराई में उन्मुक्तता के साथ सिमटे हुए पाते हैं।
यहाँ उनके चित्र मूर्त-अमूर्त का चुनाव करने की तरह से भी नहीं है जो किसी शैली को विकसित करने की और दिखे। उनके अमूर्त का संवेग कला में इन विचारों से भी कहीं अधिक महसूस होता है, जो बहुत सरल व सहजता की अनुभूति कराते हैं। रज़ा अपने आरंभिक परिदृश्य चित्रों के बाद प्रयोगात्मक पहलुओं के साथ नज़र आते हैं जिनमें सृजनात्मकता के साथ काव्यात्मकता का भी समावेश होता है और रंगों का वैभव उस चित्र में, किसी स्थान की गरिमा के साथ चिंतनधारा में बहते हुए आनन्दित करता जाता है। बिंदु से पूर्णता की ओर सृष्टि की सुंदरता तथा काले रंग के बिंदु में भी तेजस्वी सूर्य की उपस्थिति और नीले का The Blue Moon, बिंदु में पंचतत्त्व का अन्तः स्पर्श, रज़ा साहब ने अपने बिंदु श्रृंखला चित्रों में किया। उनके चित्रों में 1980 के समय बिंदु का उदय हुआ जिससे उनके अमूर्त चित्रों को और अधिक गहराई मिली। बिंदु का भी यूँ आ जाना, रज़ा के बचपन की यादों से निकलकर आता है जिसमें एक शिक्षक का अपने विद्यार्थी को एकाग्र करने के लिए ब्लैक बोर्ड पर बिंदु अंकित करना है, जिसे रज़ा ने सहर्ष स्वीकारतें हुए अपने चित्रों में अपनी स्मृतियों से सम्पूर्ण ब्रह्मांड और उसकी दिव्यता तथा भारत की संस्कृति और वैभव का दर्शन अंकित कर दिया।
फ्रांस के प्रसिद्ध आलोचक पॉल गॉथिये रज़ा की एक प्रदर्शनी पर लिखते हैं-
संसार का मूल, समस्त चेतन जीवों का आधार बिंदु शक्ति का, ऊर्जा का आदि स्रोत है, और इस बिंदु में ही पाँच महातत्त्वों का समावेश हुआ है. क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर. इन पाँच महातत्त्वों के अनुरूप ही ज्योति के वे पाँच स्रोत हैं जो सूर्य किरणों में मूल रंग बनकर घुल-मिल गए हैं -कृष्ण (काला), पद्म (पीत), नील (नीला), तेजस (लाल), शुक्ल (श्वेत) जाहिर है रज़ा ने इन मूल परिकल्पनाओं को लेकर ही कला के क्षेत्र में पदार्पण नहीं किया, बल्कि वे अपनी कला के माध्यम से इन तक पहुँचे हैं।1
अपने बिंदु और बीज श्रृंखला से जुडे चित्रों में, शून्यता उसकी अनन्त गहराई और जीवन के प्रवाह को रज़ा महसूस कराते हैं। वे चित्रों को समझने के लिए शब्दों का भार नहीं डालते, क्योंकि स्वयं एक चित्र ही बोलने के लिए काफी होता है। रज़ा कहते हैं- कभी-कभी चित्रों का मौन होना भी उनमें अन्तरज्योति को महसूस करना है। चित्रकला एक खोज की तरह हो, जिसमें निरंतरता हो, अपनी एक दृष्टि हो जो बहुत महत्त्वपूर्ण है।
यह उनकी खोज का ही अनुभव था जिसको वे हर उन कलाकारों में बाँटते, जिनमें चित्रकला को समझने की इच्छा प्रबल रूप से दिखाई देती थी।
फ्रांस में रहते हुए भी रज़ा भारतीय संस्कृति के समीप थे। उन्होंने भारत की लोक चित्रकला परम्परा, उसकी प्रवृत्ति और विकास-क्रम का भी गहराई से चिंतन किया। भीमबैठका, अजंता, एलोरा की गुफाओं की यात्रा और बनारस, गुजरात व राजस्थान की यात्राओं में अपनी संस्कृति की जडों को और मूल स्त्रोतों को महसूस किया। इससे प्रेरित होने के बाद उनके अमूर्त चित्रों में जो आयाम जुडते गए। उससे उन्होंने अपने कला सृजन को और अधिक विस्तारित किया। चित्रों में प्रतीकों का प्रभाव, बिंदु रूप में ऊर्जा के साथ-साथ, त्रिकोणों पर केंद्रित होकर, सौराष्ट्र जैसे चित्र और उसकी सीरीज में रंग-आकारों के सौन्दर्य के साथ अनवरत चलता रहा। उनके अमूर्त चित्रों के प्रयोग में जहाँ बिंदु शक्ति व ऊर्जा से परिपूर्ण स्त्रोत है और बिंदु उस बीज का प्रतीक भी है जिसमें सम्पूर्ण जीवन की संभावनाएँ विद्यमान हैं उसी तरह त्रिकोणीय आकृतियों में नर-नारी जैसे भारतीय लोक कला संस्कृति की वरली के तत्त्व तथा पंचतत्त्वों में पाँच रंगों के सर्कल्स जिसमें काला, नीला, सफेद, लाल, पीला है को लेकर काम करने की रज़ा की जिज्ञासा तीव्र हुई। उन्होंने कहा हमें अपनी आँखों द्वारा दृश्यों को देखने के साथ ही मन की अंतर्दृष्टि से भी देखना है, तभी चित्रकला में हम उस दृश्य के भावों को सही अर्थों में समझेंगे।
उनके सौराष्ट्र सीरीज के चित्रों का नज़रिया भी अलहदा था जिसमें उन्होंने राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश की विविधता के रंगों का समावेश किया। उनका यह कार्य जो सात×सात फिट केनवास पर बना। वह भी अन्य चित्रों की तरह भारतीय दर्शन, परम्परा, परिवेश और उसके विभिन्न तत्त्वों के साथ निर्मित हुआ। ऐसे ही राजस्थान नामक चित्र भी बनाया। बहरहाल इन अमूर्त चित्रों में उनमें रची विशिष्ट आकृतियों के साथ रंगों का एक प्रभावशाली, शक्तिशाली गुण दिखाई देता है जो कि रज़ा के सभी अमूर्त चित्रों में दिखता है, उसी तरह यह भी उनका प्रकृति के प्रति संवेदनशील और ज्यामिति आकारों में आध्यात्मिक भावों के साथ अभिव्यक्ति का संगम है। 2010 में विश्व-पटल पर सौराष्ट्र का नीलाम होना रज़ा के लिए आश्चर्य की बात भी नहीं थी क्योंकि रज़ा के लिए उनके सभी चित्र प्रिय रहे। उनके लिए सौराष्ट्र भी अपने देश की संस्कृति को देखने और उनमें रंगों-रूपाकारों के साथ असीम आनंद का एक हिस्सा ही है। रज़ा अपने जीवन में सृजन की निरंतरता में कहीं भी ठहराव नहीं देखते। यहाँ ठहराव की कोई अवस्था भी नहीं है। क्योंकि रंग रज़ा के चित्रों में एक भव्य आकर्षण है और इस तरह रज़ा के चित्रों में उन रंगों का संवाद बेझिझक बना रहता है।
एक बार एक प्रश्न पर प्रसिद्ध चित्रकार प्रभाकर कोल्ते जी ने कहा है-
कभी-कभी ताज़ में रज़ा के चित्रों का दर्शन किया करता था। वे चित्र देखने के बाद मेरे शरीर की पेशियाँ अनुशासन सहित प्रवाहित होती हैं। मुझे लगता है कि मेरे सिर पर कोई बोझ नहीं है। मुझे कोई चिंता नहीं है। मैं एकदम सहजावस्था में पहुँच जाता हूँ और मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मैं ही प्रकृति हूँ। जो चित्र इस प्रकार की कोई प्रतीति कराते हैं, वे अच्छे चित्र!2
रज़ा के चित्रों में उन्मुक्त होते रंगों के साथ ही अंतर्दृष्टि की गहराई और सौम्यता तथा उनके विचारों का भी दर्शन है जो रज़ा की यात्राओं से निकलकर आता है। जिसमें वे दर्शक को उनके अमूर्तन के सौन्दर्य से अनन्ता की अनुभूति कराते हैं। सौराष्ट्र के साथ ही अन्य श्रृंखला चित्रों में राजस्थान की लघु चित्र शैली का आभास होता है जिसमें चमकते रंगों को एक स्पेक्ट्रम में भरा गया हो, जैसे गेरू पीला, केसरिया, क्रिमसन लाल, ब्रन्ट साइना, पीला और काला। उनके इस चित्र में केनवास के निचले हिस्से में अधिक नियंत्रित और छोटे ब्रश स्ट्रोक्स हैं जिसने त्रिकोण आकृतियों को जोडे रखा है जबकि ऊपर के आधे हिस्से में brunt syna और हरे रंगों के व्यापक और मोटे स्ट्रोक्स हैं। राजस्थान चित्र श्रृंखला में भी रज़ा का ऐसा चित्र है जिसमें राजस्थानी परिवेश में वस्त्रों के चटख रंग उतने नहीं है जितने उनके जीवन के धूसर रंग उसमें समाई लोक संस्कृति। रज़ा की सौराष्ट्र और राजस्थान पेंटिंग्स गाँव या शहर दिखाना नहीं है वह उनकी यात्राओं में उस संस्कृति के तत्त्वों का प्रतीकात्मक संयोजन है। रज़ा के ये चित्र सौराष्ट्र और राजस्थान दोनों ही लगभग एक समान अवधि में निर्मित हुए। इस कलासृजन में रज़ा के काम अमूर्तन के साथ ही चिंतनशील भी है। इनमें प्राकृतिक रूप से और सांस्कृतिक रूप से, गुजराती, राजस्थानी कल्चर दोनों की विशेषता झलकती है। रज़ा के केनवास पर रंगों के साथ ज्यामिति आकारों में, जिसमें उनका पुनरागमन का हर्ष, अभिव्यक्ति का संगम, भावपूर्ण कलात्मक रूप से महसूस होता है। इसी प्रकार एक चित्र अर्थ को देखें, तो यह भी बहुत महत्त्वपूर्ण है जिसमें महसूस होता है कि धरती के अंदर भी बहुत कुछ है। ऊपर आती होरिजेण्टल लाइन्स के साथ ज्यॉमिस्ट्रिकल फॉर्म्स को कम्पोज़ करते हुए रज़ा ने सृष्टि में प्रकृति-पुरुष के महत्त्व को भी देखा है। उनके अनुसार वे हर जगह मौजूद है, उन्हें चित्रों में किस प्रकार लाया जा सकता है, इस विचार से रज़ा ने उन्हें चित्रों में त्रिभुजाकार रूप में रखा। इस पर वे कहते हैं- ए ट्राइंगल विद ए प्वाइंट ब्लो इज द फीमेल एंटिडी एण्ड एट ए प्वाइंट अप इज द मेल एंटिटी. हो सकता है कि एक चित्र ऐसा बनाया जाए जिसमें कि बीच में महायोनि और आसपास वहीं त्रिभुज आएँ जो सारी सृष्टि को एक प्रकार से एक्सप्रेस कर सकें।
इस प्रकार रज़ा के चित्र में प्रकृति-पुरुष की धारणा अंत तक बनी रही। बाद के चित्रों के विषयों में कुण्डलिनी, नाग, पाँच तत्त्व, सूर्य नमस्कार आदि रज़ा के अनेक कला कार्य उनके गहन अध्ययन से निर्मित हुए ।
प्रसिद्ध चित्रकार अखिलेश के अनुसार रज़ा की यात्रा का उन्माद भी रज़ा की प्रकृति का अंग है। तांत्रिक कला के सम्पर्क में आकर रज़ा ने अपनी मिट्टी की महक को जानना शुरू किया। अजीत मुखर्जी की एक पुस्तक में छपे चित्रों से हुआ परिचय रज़ा के लिए नया संसार खोल चुका था। इसमें दर्शन का बडा हिस्सा रज़ा की एकान्तिक प्रकृति से मेल खा रहा था। रज़ा के लिए यह सब सहज और सम्भाव्य था कि वे प्रकृति-पुरुष को चित्रों में जगह दें। रज़ा के चित्रों से फ्रांसीसी दृश्य अब बाहर जा चुके थे। उनकी जगह ज्यामिति रूपाकारों से निर्मित राजस्थान, सतपुडा, विंध्यांचल, अरावली, सौराष्ट्र नामक कलाकृतियाँ जन्म ले रही थीं। तांत्रिक संरचना ने रज़ा के चित्रों पर अधिकार जमा लिया और उसमें रंगों का विस्मयकारी तत्त्व उभरकर सामने आने लगा।
संदर्भ -
1. समालोचन रज़ा जैसा मैंने देखा भाग 3 : अखिलेश
2. कला समय में नीलिमा फाडे से हुइ बात-चीत का
एक अंश

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