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एक जिंदा ध्वनि लोकतंत्र है यह

अनामिका
प्रायोजित रेडिमेड, क्विक टु सर्व, बोतलबंद अहसासों के इस तुरन्ता में कोई विलम्बित / धु*पद शैली में धीरे-धीरे जीवन-मर्म की परतें उधेडे और फिर भी उतना ही लोकप्रिय हो, जितने अपने केदारजी तो आखिर क्यों? क्या है उनकी कविता में और उनके पूरे काव्य व्यक्तित्व में जो इतना अकुंठ और आश्वासनकारी लगता है कि बबूल के नीचे लेटे छोटे-से छोटे बच्चे, टमाटर बेचने वाली बुढिया और इब्राहिम मियाँ, ऊँट वाले से लेकर चीनी कवि तू फू. कबीर, तॉल्सतॉय, कुम्भनदान, ज्याँ पॉल सार्त्र तक उनसे अपने दुख-सुध बतिया आते हैं? जीवित प्राणियों को तो छोड भी दें, ईश्वर, सूर्य पृथ्वी, धूप, मिट्टी, हवा, आकाश, पेड, घास, नदी, घोंसले, कबीर सूत मिल, तॉल्सतॉय की साइकिल, समुद्र, गमछा और तौलिया, बढई का रन्दा, फसल कुल्हाडी, मांझी का पुल, टूटे हुए ट्रक, पांडुलिपियों और अन्य बेजुबान चीजों के पक्ष सोचने का शऊर जिनकी कविता में सहज-सरल ढंग से पल्लवित होता चला गया है, समकालीन हिंदी की तीन पीढयिों के वे प्रिय कवि केदारनाथ सिंह ऐसे हैं, जैसे वे हैं शायद इसलिए भी हैं कि छह मातृहीन शिशुओं, अनेक पुरबिए विस्थापितों, छात्रों, नए कवियों, अभी-अभी जन्मे बिल्ली और कुत्ते के बच्चों को भी उन्होंने मां वाली ममता और पुरबिया किसान के बेटे वाले धीरज से सींचा है।
सरल होना कितना कठिन है, यह केदारजी जैसे लोग ही जानते हैं जिनकी सरलता जटिल अनुभवों से लबालब भरी हुई होकर भी कहीं कुटिल तिक्तता का शिकार नहीं हुई और धीरज से, संयम से बीनती - चुनती रही दुनिया की भाषा की लुप्तप्राय अनुगूँजें, अंर्तध्वनियाँ आहटें, मिट्टी की गंध और जातीय स्मृतियाँ! केदारजी की कविता की और शायद उनके व्यक्तित्व की भी सबसे बडी ताकत उनका प्रज्ञादीप्त संयम है और वह उदार अंतःपाठीयता जो भेद-भाव की सारी संरचनाएँ ढाह देती है और शास्त्र और लोक, आपबीती और जगबीती, इतिहास और मिथक, निज और निजेतर के बीच संदीप्त-सी आवाजाही सम्भव करती है। केदारजी चकिया से बनारस, बनारस से पडरौना, पडरौना से दिल्ली जो आए, तो लोकजीवन की सारी कश्मकश गठरी में बाँधे हुए, और बाद के वर्षों में भी उनका कालबोध हमेशा उनके स्थान-बोध से छनकर ही बाहर आता रहा - जैसे दुपहरिया की किरणें टाट से छनकर कमरे में आती हैं।
आदिम स्मृति की तरह परतदार हैं केदारजी की कविताएँ। खुद उनके शब्दों में, मेरी पहली घडी दुपहरिया के फूल थे। ठीक बारह बजे वे खिलते, और जब वे खिल जाते, पूरे खिल जाते तो पाठशाला में दोपहर के खाने की छुट्टी हो जाती। पं. हजारीप्रसाद द्विवेदी के पट्टशिष्य रहे और विश्व - कविता के गम्भीर अध्येता तो जाहिर है, इनका समकाल अनंत है, तू फू भी इनके इतने ही समकालीन हैं जितने रिल्के, लोर्का, नेरूदा और जिग्न्यू हर्बर्ट बोर्खेज की ही धुन में ये अपने समकाल की सरहद बढाते हुए जैसे हर कविता में कहते सुनाई देते हैं- समय वह नदी है जो तुम्हें बहा लेती है, पर नदी तुम्हीं हो। यह पंचतंत्र का वही बाघ है जो पाणिनि से व्याकरण सीखता है, बुढयिा की बटुली में समा जाता है, ट्रैक्टर को अनाज के लाल दाने की तरह देखता है, पर बाघ तुम ही हो। समय वह आग है जो तुम्हें भस्म कर सकती है, त्रिनिदाद के आदिम प्रवासी की बीडी की आग पर आग तुम ही हो, दुःखद है कि यह दुनिया सच्ची है, पर तुम्हीं हो यह दुनिया।
ज्ञानपीठ पुरस्कार के आईने में देखा जाए, तो समकालीन हिन्दी कविता का चेहरा लगातार कम रोबदार (और शायद इसलिए अधिक मानवीय) होता चला गया है। दिनकर, अज्ञेय, नरेश मेहता के रोबदार आश्वस्त चेहरों के बाद कुँवरजी और फिर केदारजी की (निर्मल वर्मा से मिलती-जुलती) सोचती हुई-सी प्रश्नबिद्ध आँखें एक अलग ही कहानी कहती हैं। आँखों में उतरकर कविता के शिल्प पर आएँ, तो यहाँ भी प्रश्न ही प्रश्न तैरते हैं ।
विराम चिह्नों को व्यंजक मानें, तो एक पंक्ति में समकालीन हिन्दी कविता का इतिहास बाँचा जा सकता है, कहा जा सकता है कि छायावादी कविता यदि विस्मयादिबोधकों की कविता थी, प्रगतिशील कविता विश्लेषणात्मक पूर्णविरामों की कविता प्रयोगवादी कविता डैशों और कोष्ठकों की कविता, तो पिछले कुछ दशकों की हिन्दी कविता प्रश्नचिह्नों और संवादी उद्धरण कोष्ठकों से भरी हुई अंतःपाठीय कविता है जो लच्छेदार भाषण नहीं करती, पर बडे-बडे बोल नहीं बोलती, न आदेश देती है, न संदेश, जीवन के कठिनतम पलों में चुफ से आपका हाथ थाम कर साथ खडी हो जाती है (सुकरात की तरह ) आफ ही गहनतम अंतःस्थल में तैर रहे सार्थक प्रश्नों से आपको रू-ब-रू करती हुई।
आफ भीतर ही तैर रहे अनगिनत प्रश्नों से आपकी राह केदारजी उसी मासूमियत से सहसा रोक लेते हैं जिससे रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता में वह उद्विग्न बेटी जो दरवाजे की ओट से अचानक प्रकट होती है और परदेस कमाने जा रहे पिता का रास्ता (दो नन्ही बाँहें दोनों ओर फैलाए हुए) रोक लेती है- जेते आमी देबो ना तोमार ।
केदारजी के व्यक्तित्व में होगी, पर उनकी कविताओं में (बावजूद इम प्रकट मासूमियत के) ब्लेक के सॉग्स ऑफ इनोसेंस वाली सरलता नहीं, एक संश्लिष्ट किस्म की प्रांजलता है, एक ऐमे प्रज्ञादीप्त इनोसेंस की अनुगूँज जो सॉग्स ऑफ एक्सपिरिएन्स के त्रिविध तापों से गुजरने के बाद प्रकट होती है।
बच्चों वाली स्निग्धता नहीं है न ही वहाँ परमहंस वाला भोला वैराग्य, वहाँ तो एक दूसरी तरह की सरलता है, कुछ-कुछ वैसी जो पिकासो के शून्य में थी। पिकासो मित्र के घर गये। मित्र न मिला, उसका हाउसकीपर मिला। उसने नाम पूछा तो पिकासो खाली कागज के टुकडे पर एक शून्य उकेरकर चल दिए।
हाउसकीपर भौंचक पर मित्र कागज देखते ही समझ गया- अच्छा पिकासो आया था। इतना सुडौल शून्य और कौन खींच सकता है! पिकासो का यही सुडौल शून्य केदारजी की कविता की सिग्नेचर ट्यूब है।
इस सुडौल शून्य में दूनिया के सारे दिव्य, दुविधाएँ और ध*ुवान्त गले मिलकर यों सोए हैं जैसे कि गले मिलकर सोए दो पिटे हुए बच्चे हमारा समय ही ऐसा है जहाँ सारे निष्कर्ष पिट चुके हैं, ढह गए सारे महाप्रमय और घुप्रमेय भी गली-गली फिरते, अनाथ, कामकाजी बच्चों की तरह जगह-जगह ठोकरें खाते, रोज अपने को बनाते-बिगाडते वे जिस शून्य में थककर सोए मिलेंगे - वह शून्य केदारजी जैसे कवियों का है जिनका काल-बोध उनके स्थान बोध के रंध्र से उनकी कविता में प्रवेश लेता है -
और अब ब्रह्माण्ड के धुर उत्तर में
यह आमी का वही तट है
जहाँ अनन्त को एक गठरी की तरह
पीठ पर लटकाए हुए
मैं फिर खडा हूँ (उत्तर- कबीर और अन्य कविताएँ) मैं, यानी कबीर, गलियों की ठोकर खाता आम आदमी कबीर सूत मिल और बगल में बहती आमी नदी -
जाना चाहता हूँ मगर कहाँ जानता कोई नहीं और
वैसे भी जो यह जानना है उसकी एक
गहरी साँठ-गाँठ है न जानने के साथ
और अन्त में मित्रों,
इतना ही कहता हूँ कि अन्त
महज एक मुहावरा है
जिसे शब्द अपने विस्फोट में
उडा देते हैं
और बच रहता है हर बार
वही एक कच्चा-सा
आदिम, मिट्टी जैसा आरम्भ
जहाँ से हर चीज
फिर से शुरू हो सकती है
फिर से खडिया,
ककहरा फिर से
फिर से गिनती सौ से शून्य की तरफ
सूर्यास्त से धूप घडी की तरफ
समय फिर से,
ये फिर से,
फिर से। (बाघ)
जानना न जानना आरम्भ अन्त, गिनती और शून्य सूर्यास्त और धूप-घडी-ये ही वे द्वित्य हैं जिन्हें मैंने गले मिल सोए पिटे हुए बच्चे कहाँ। पहले धर्म, फिर माक्र्ससवाद, फिर समाजवादी संकलपनाओं की अन्य संरचनाएँ, जो मनुष्य एकसूत्र में पिरोए रखती थीं, आज खुद मिट्टी के बाघ की तरह ध्वस्तप्राण बिखरी हैं, कौन चुनेगा इनके टुकडे? कौन उन्हें फिर से नयी मिट्टी में ढालेगा? जातीय स्मृतियाँ क्या नया साँचा बनेंगी? ये कुछ महाप्रश्न हैं जिनकी ओर केदारजी बार-बार लौटते हैं, और लगातार इनकी कविताओं में यह एहसास हावी रहता है कि -
एक सुई खो गई है
आफ भीतर ही तैर रहे
अनगिनत प्रश्नों से आपकी राह
केदारजी उसी मासूमियत से सहास रोक लेते हैं जिससे रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता में वह उद्विग्न बेटी जो दरवाजे की ओट से अचानक प्रकट होती है और परदेस कमाने जा रहे पिता का रास्ता (दो नन्ही बाँहें दोनों ओर फैलाए हुए) रोक लेती हैं जेते आमी देबो ना तोमर
पृथ्वी के दिल में
और दर्जी सुई की नोंक में खो गया है
एक मिट्टी के ढेले में
गुम गया है कुम्हार
और बढई लोप हो गया है
चिरती हुई लकडी की गंध में
कवि अपने शब्दों की फांक में
लापता है।
और स्वाद लौट गया है
फिर मे अपनी गुठली में! ( उत्तर कबीर )
प्राइवेट और पब्लिक ब्रेकडाउन के इस विकट समय में केदारजी की कविता हमें आदिम तत्त्वों और आर्केटाइप की ओर लौटने को कहती है। जैसे कि विश्वायन का मारा विस्थापित किसान बार-बार अलाव घेरकर बैठ जाता है, इनकी कविता घेरकर बैठ जाती है इन्हीं आदिम तत्वों और आर्केटाइम को (आग, पानी, पाण्डुलिपियाँ, घोंसले, प्राचीन कवि-कबीर, केशवदास, तू फू, लि पाई) ! या फिर अपनी गुदडी बिछा लेती है पुरानी इमारतों के पिछयाडे (कुशीनगर, पीठ टिकाने की जगह)। कभी-कभी यह पानी बेचनेवालों से दुःख-सुख बतिया आती है, कभी इब्राहिम मियाँ ऊँटवाले से और जिसे पर्यावरण वाले प्रकृति की पाठशाला कहते हैं, वहाँ से तो जैसे इनकी कविता रह-रहकर भर-भर साँस बटोर लाती हैं- लुखरी, पशु की कराह, बाघ, चींटियों की रूलाई और पूरी पृथ्वी। सूखे हुए, गिरते नीम के पत्तों को बाँहों को झुलाकर सुलाती हुई पूरी पृथ्वी इनका घर है गाँव में छोडा हुआ घर जो अब ये कबूतरों को दे आए हैं।
नेरूदा, पाज, वॉल्कॉट, हीनी और विश्व - कविता के दूसरे बडे कवियों की तरह केदारजी भी जातीय स्मृतियों की रोपनी दुबारा, एक नए जलासक्त जल में करते हैं, ऐसे जल में जिसमें अपने समय की सब आहटें सिमटी पडी हों। वैयक्तिक, अंतरवैयक्तिक और जातीय सन्दर्भों का उचकुन एक ऐसा अलाव रचती है कि मनुष्य और उसके परिवेश के बीच में सारे सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और मिथकीय अंतःसूत्र एकदम से उजागर हो जाएँ। तुमुल कोलाहल-कलह में हृदय की बात-सी सिहर उठने वाली यह कविता शब्दों के साथ वही करती है जो निःशब्द होकर एक प्रेमिल स्पर्श करता है- भीतर की सारी अंर्तध्वनियाँ जगाकर हमें मनुष्यतर बनाने का काम!
एक बार लगता है कि सब कुछ भूल गए, फिर लगता है, सब कुछ याद आ गया, प्रश्न जगे और तिरोहित हो गए, सब कुछ समझ आजार भी समझ में नहीं आया, जीवन के जीवन के सूत्र मिले और खो गए, रह गई तो एक धीमी जिजीविषा- सब क्रूरताओं के खिलाफ उर्ध्वबाहु खडी याद दिलाती हुई कि बावजूद सारी विषमता, विडम्बना के-
जीना होगा
रस्मी से झूलकर
वधस्थल से लौटकर
जीना होगा
समय
चाहे जितना कम हो
स्थान चाहे उससे भी कम
चाहे शहर में बची हो
बस इतनी-सी हवा
जितनी एक साइकल में होती है,
पर जीना होगा।
उनके सद्यः प्रकाशित संग्रह सृष्टि पर पहरा से यह बात समझने की कोशिश की जाए, तो कई पंक्तियाँ नवजात पक्षी-शावकों की तरह गर्दन उठाती नजर आएँगी जिनमें कवि की ही तरह सारा संसार घूमकर वापस अपने घोंसले, अपने उस (तिनकों की तरह काँपते) गहन एकान्त तक लौट - लौट आने की विनय है। स्वाभाविक है कि ऐसी कविता का रेंज (विस्तार) बडा हो- सूर्य, पृथ्वी, नदी, ज्याँ- पॉल सार्त*, निराला, त्रिलोचन, कुम्भनदाम, कबीर, तॉल्सतॉय और रोम में मिला बांग्लादेशी युवक इसके जितने सगे हैं, उतने ही सगे हैं कपास के फूल, हलन्त, भोजपुरी, कृतज्ञ कीचड, काली सबकी, जो चली जा रही है बिल्ली, हीरा हलवाहा बैलों का संगीत प्रेम, गमछा और तौलिया।
अपने समय की आहट इनमें अनहद की तरह बज गैर स्थितिगत और चरित्रगत विडम्बनाएँ लगातार प्रश्नांकित हुई जाती हैं। हर शहर में मिल जाता है- प्रेम के पहले प्रतिद्वंद्वी की तरह... आज वह ब्रह्माण्ड का सबसे संपन्न सौदागर है जो मेरी पृथ्वी के साथ तप और ऊर्जा की तिजारत करता है
ताकि उसका मोबाइल
होता रहे चार्ज
पूरे जगत के मंडी में बदल जाने की यह प्रक्रिया भाषाओं का, जल का, हरियाली का, बीजों का पूरे ही पर्यावरण का जो हाल कर गई है, उसके प्रति कई कविताएँ महीन इशारे करती हैं, लोकनाट्य की उसी भोली संवाद शैली का सहारा लेती हुई जिसका भिखारी ठाकुर भी व्यंजक इस्तेमाल करते थे-
आज घर में घुसा
तो वहाँ अजब दृश्य था
सुनिए, मेरे बिस्तर ने कहा -
यह रहा मेरा इस्तीफा
मैं अपने कपास के भीतर
वापस जाना चाहता हूँ...
उधर आलमारी में बन्द
किताबें चिल्ला रही थीं
खोल दो हमें खोल दो
हम जाना चाहती हैं
अपने बाँस के जंगल
और मिलना चाहती हैं।
अपने बिच्छुओं के डंक
और साँपों के चुम्बन से ! ( विद्रोह)
एनिमल फॉर्म, (जार्ज ऑरवेल) में निहित व्यंग्य से भी ज्यादा महीन यह कविता इस्तीफा जैसे कामकाजी शब्द का उतना ही व्यंजक करती जितना एफिडेविट शब्द का एमिली डिकिन्सन एबिस है देयर वॉज नो ऐफिडेविट ऑफ हेवेन ।
शब्द चयन और विश्व दृष्टि में निहायत देशज (लोकनाट्य वाले सहज छंद लिए आपसी संवाद) और कथन-भंगिमा की नफासत और कमसुखनी में निहायत नागर और शाइस्ता (अर्बेन)- केदारजी की कविता गहन अर्थो में द्वित्वों का समाहार है। भोजपुरी और हलन्त के अलावा एक कविता है जैसे दिया सिराया जाता है जिसमें अंगरेजी के महानद में हेराती लोक भाषाओं का संकट मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त होता है। सिराना शब्द ठेठ भोजपुरी का शब्द है, नदी में दीप प्रवाहित करने की क्रिया का अभिव्यंजक माँ का मृत शरीर दीए की तरह नदी में सिराते हुए इस कवि को बात की चिंता है कि कैसे
पूरे जगत् के मंडी में बदल
जाने की यह प्रक्रिया भाषाओं
का, जल का, हरियाली का,
बीजों का पूरे ही पर्यावरण
का जो हाल कर गई है, उसके
प्रति कई कविताएँ महीन

इशारे करती हैं, लोकनाट्य
की भोली संवाद - शैली का
सहारा लेती हुई ।
उस नए लोक में अकेले अपना काम चलाएगी माँ जिसे भोजपुरी के सिवा और कोई भाषा ही नहीं आती, सम्प्रेषण बहुल इस युग की भीतरी संवादहीनता पर इससे तीक्ष्ण प्रहार और क्या हो सकता है। फुलगेंदवा जैसे शब्द भी कैसे इतना मार्मिक प्रहार कर सकते हैं, यह केदारजी से सीखने लायक है -
जब वह बहती हुई
चली गई दूर तो ध्यान आया
हाय, ये मैंने क्या किया
उसके पास तो वीसा है न पासपोर्ट
जाने कितना गहरा अथाह जलमार्ग हो
जल के कस्टम के कितने पचडे
कुछ देर इस उम्मीद में
शायद कुछ दिख जाए
खडा-खडा देखता रहा
जल के भीतर की
यह गहरी अँधेरी जाम लगी सडक
और जब कुछ नहीं दिखा
तो मैंने भागीरथी मे कहाँ
माँ,
माँ का खयाल रखना
उसे सिर्फ भोजपुरी आती है।
इस भीड भरी दुनिया में सिर्फ भोजपुरी
जानने वाली बूढी औरत की लाचारी इससे
कम शब्दों में बयान हो पाना असम्भव है,
यही भोजपुरी जिसकी-
क्रियाएँ खेतों में आई थीं
महुए की टपक ने
इसे दी थीं अपनी ध्वनियाँ
शब्द मिल गये थे दानों की तरह
जडों में पडे हुए
खुरपी- कुदाल के युगल संगीत
इसे मिले थे छंद...
लोकतंत्र के जन्म के बहुत पहले का
एक जिंदा ध्वनि लोकतंत्र है यह
जिसके एक छोटे-से हम में
तुम सुन सकते हो करोडों
मैं की धडकन ।
केदारजी के भीतरी व्याकरण में जाना दुनिया की सबसे खौफनाक क्रिया है। पिता गए, माता गयीं, पत्नी गयीं और उनके साथ-साथ -
बारी बारी चले गये
बहुत से दिन
और ढेर सारे पक्षी
और जाने कितनी भाषाएँ
कितने जलस्रोत
चले गये दुनिया से
जब यह गयीं।
निज का निजेतर तक, सूक्ष्म का महत् तक यह उत्तरोत्तर प्रसार जिस सहज छन्द में केदारजी के यहाँ दर्ज है, वैसा कम कवियों में है। निजी जीवन की खला में ही रहने आ गये झुंड के झुंड शब्द, किताबों के रेवड, मंच, माइक और पुरस्कार। यहाँ येट्स सहज ही याद आते हैं: मॉड गॉन मिल जाती, प्रेम मिल जाता, तो आई उड हैव थ्रोन पुअर वर्ड्स अवे सारी सजर्नात्मकता है, तो क्षतिपूर्ति ही ऐसा कोई ना मिला जिन सौं रहिए लागी। यही अकेलापन, गेंडे के सींग-सा अकेला वजूद, ब्रह्म के विशाट अकेलेपन में प्रतिबिम्बित कहाँ जाता है एकोहं बहुस्याम् ।

सम्पर्क : डी-115, प्रज्ञापथ, सकेत
नई दिल्ली-17, मो. ९८१०७३७४६९