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प्रेमचंद : समग्र रचनात्मकता और भारतीयता

कमलकिशोर गोयनका
बीसवीं शताब्दी के हिन्दी साहित्य के इतिहास में हमें तीन साहित्यकार - सम्राटों के दर्शन होते हैं। संयोग कुछ ऐसा है कि इन तीनों साहित्य-सम्राटों की कर्मस्थली वाराणासी ही रही है। ये तीन सम्राट हैं- काव्य-नाटक सम्राट जयशंकर प्रसाद, आलोचक-सम्राट आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और उपन्यास-कहानी सम्राट प्रेमचंद। आरम्भिक दो सम्राट संस्कृत वाङमय एवं भाषा में पारंगत रहे हैं, किन्तु तीसरे कथा-सम्राट प्रेमचंद उर्दू-फारसी के भाषा-संस्कार के साथ हिन्दी में लेखन आरम्भ करते हैं और जयशंकर प्रसाद तथा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की संस्कृत निष्ठ हिन्दी भाषा के विपरीत उर्दू-हिन्दी की मिश्रित भाषा का एक नया रूप प्रस्तुत करते हैं और उसे आगे चलकर हिन्दी का मानक रूप मान लिया जाता है। भाषा में ही नहीं, प्रेमचंद अपनी रचनात्मकता में भी इन दो सम्राटों की तुलना में अपना एक नया मार्ग चुनते हैं और कथा के विषय, पात्र-सृष्टि, उद्देश्य तथा सरोकार में क्रान्तिकारी परिवर्तन करके एक नये युग अर्थात् प्रेमचंद युग का आरम्भ करते हैं, जिसका कोई विकल्प अथवा किसी नये कथा-युग की सृष्टि करने में अभी तक हिन्दी का कोई कथाकार सफल नहीं हो पाया है। यही कारण है कि जैनेन्द्र, अज्ञेय, यशपाल, अमृतलाल नागर, अश्क, शिवप्रसाद सिंह, नरेश मेहता, कृष्णा सोबती, मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, नरेन्द्र कोहली, चित्रा मुद्गल, मन्नु भण्डारी आदि प्रतिष्ठित कथाकारों के होते हुए भी प्रेमचंद के सम्राटत्व को कोई चुनौती नहीं दे पाया है और वे आज भी अपने सिंहासन पर विराजमान हैं।
प्रेमचंद भारत के पहले ऐसे कथाकार हैं जिन्होंने अपने साहित्य में भारतीय जीवन की विराट सृष्टि की है। इस विराटता का अन्दाजा इससे लग सकता है कि इसमें लगभग तीन हजार पात्रों की दुनिया उनके सुख-दुःख, संघर्ष-समझौता, विद्रोह-निर्माण, उत्थान-पतन, सृजन-विध्वंस आदि सब कुछ समाया है और लेखक अधिकांशतः सभी प्रमुख धर्मों, अतियों वर्णों, वर्गों, व्यवसायों, आयु-वर्गों एवं शहरी और ग्रामीण, धनी-निर्धन, शिक्षित-अशिक्षित, पोषक-शोषित आदि पात्रों के जीवन की वास्तविक कहानियों की रचना करता है। प्रेमचंद विदेशी पात्रों, पशु-पक्षियों तथा नादिरशाह एवं तैमूर जैसे लुटेरों तथा इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हज़रत मुहम्मद जैसे धर्मनायकों के जीवन की घटनाओं को अंकित करते हैं और देशी इतिहास से आल्हा-उदल, सारूधा, राणा प्रताप, दुर्गादास, विक्रमादित्य, रणजीत सिंह आदि अनेक राष्ट्रनायकों को अपने साहित्यिक संसार का अंग बनाते है। इतने व्यापक मानवीय समाज को प्रेमचंद के अतिरिक्त अन्य कोई लेखक अपने साहित्य का केन्द्र नहीं बना सका है। प्रेमचन्द प्रत्येक मनुष्य के प्रति सम्वेदनशील हैं, सब के प्रति सदय हैं, और मनुष्य मात्र के कल्याण के प्रति अटूट निष्ठा ओर आस्था है। वे एक प्रकार से आस्थावान लेखक हैं। महादेवी वर्मा के अनुसार इस आस्था में साझापन, भाईचारा, एक-दूसरे का दर्द बाँटने की भावना, सतत संघर्ष, जीवन के प्रति गहरा लगाव, एवं जिजीविषा तथा मूल्यों ओर नैतिक मान्यताओं की सतत खोज है। इस आस्था के दो रूप हैं-ज्वाला और जल।1 प्रेमचंद मनुष्य के जीवन में जो भेदभाव, विषमता, विसंगति और शोषण है, उसे समूल नष्ट करके समाज के वंचितों, शोषितों, दुर्बलों और पीडितों की जो सामान्य जनता है, उसके उद्धार और उत्थान के लिए वे अपनी करूणा का विस्तार करते हैं। वे इसके लिए अपने साहित्य में एक युवा पीढी की सृष्टि करते हैं जो व्यक्ति, समाज और देश की अपने समय की अराष्ट्रीय, असामाजिक एवं अमानवीय परिस्थितियों, परम्पराओं, रूढियों तथा शासन-तंत्र से टकराती है, उसे चुनौती देती है और बेहतर जिन्दगी के व्यक्ति, समाज और देश का कायाकल्प करना चाहती है। प्रेमचंद-साहित्य में जो युवा पीढी है, उसमें युवक-युवतियाँ, शिक्षित-अशिक्षित, ग्रामीण-शहरी, धनी-निर्धन आदि सभी प्रकार के पात्र हैं। लेकिन दूसरे भिन्न-भिन्न प्रकृति के चरित्र हैं, परन्तु बहुत बडी संख्या उन पात्रों की है जो मनुष्य-मनुष्य के बीच के समबन्धों को मजबूत करते हैं, जो परिवार को जोडते हैं, जो समाज में सुधार की प्रवृत्ति को की प्रवृत्ति को प्रषस्त करते हैं तथा जो स्वराज्य के लिए अहिंसक सत्याग्रह करके जेल जाते हैं। उनमें कुछ युवा ऐसे हैं जो गाँव में जाते है, ग्रामीणों के बीच कामे करते है और गाँव को स्वाधीनता आन्दोलन से जोडते हैं। प्रेमचंद इन युवा पात्रों को आदर्श पात्र की कोटि में रखते हैं जो उपन्यास और कहानी दोनों में विद्यमान हैं। उपन्यासों में अमृतराय (प्रेमा), प्रताप (वरदान) प्रेमशंकर (प्रेमाश्रम, चक्रधर कायाकल्प) जालपा (गबन) अमरकान्त-सुखदा (कर्मभूमि) गोबर, महता, मालती (गोदान) आदि ऐसे पात्र ऐसे हैं जो परिवर्तन के लिए विभिन्न दिशाओं में संघर्ष करते हैं। कहानियों में ऐसे पात्रों की संख्या बहुत है जो देश और समाज तथा व्यक्ति के नये मार्ग पर तथा जीवन -मूल्यों, नैतिकता एवं आधुनिक जीवन के मिले-जुले मार्ग पर ले जाते हैं। यदि सौ के लगभग इन युवक-युवतियों के चरित्र उनके सरोकारों का अध्यनन किया जाता है, तो ज्ञात होगा कि यह युवा पीढी ही देश की जडता, दासता, हीनता को चुनौती देती है, उसका विरोध करती है और एक विकल्प देने की चेष्टा करती है। प्रेमचंद की यह युवा पीढी राजनीति, धर्म, समाज, परिवार, व्यक्ति सभी सें प्रश्न करती है, विद्रोह करती है और मनुष्य के जीवन को बेहतर बनाने के लिए संधर्ष करती है। प्रेमचंद उद्येश्य से अपने पात्रों को व्यक्तिशः तैयार करते हैं। उनका हद विश्वास है कि लोगों का चरित्र ही निर्णायक तत्त्व है, क्योंकि कोई समाज-व्यवस्था नहीं पनप सकती जब तक कि हम व्यक्तिशः उन्नत न हो।2 इसी कारण वे बार-बार साहित्य के प्रयोजन के रूप में परिष्कृति, ऊपर उठाना, आत्म-परिष्कार, देवत्व की जाग्रति, मन का संस्कार आदि चर्चा करते हैं। प्रेमचंद ने स्वंय 25 वर्ष की आयु में एक बाल विधवा से विवाह करके परिवर्तन का एक क्रांतिकारी मार्ग खोला था, तो वे अपने युवा औपन्यासिक पात्रों में ऐसे ही युवकों की आत्मा को खोजते हैं। मुक्तिबोध ने सही लिखा है कि प्रेमचंद हमारी आत्मा के शिल्पी हैं। तथा उनके विशिष्ट ऊँचे पात्र अपने उदात्त एवं नैतिकता तथा मानवीय गुणों से हमें समाजोन्मुख तथा आत्मोन्मुख करते है। और हमारी आत्म केन्द्रीयता के दुर्ग को तोडकर एक अच्छा मानव बनाने में लग जाते हैं। मुक्तिबोध यह भी कहते हैं कि ये पात्र भारतीय विवेक चेतना के प्रतीक हैं।3 प्रेमचंद इसी कारण अपने लोगों-भूमिकोओं में भारतीय आत्मा की रक्षा का संकल्प दुहराते चलते हैं। उनकी यह भारतीय आत्मा उनके कथानों तथा पात्रों की समग्रता में व्याप्त हैं। अतः उनके साहित्य को गाँधीवाद, माक्र्सवाद, समाजवाद, प्रगतिशीलवाद में टुकडों में बाँटने से उनकी यह भारतीय आत्मा ही खंड-खंड हो जाते हैं, क्योंकि उन वादों के अनुयायी उनके साहित्य के कुछ अंश को अपनाकर शेष को छोड देते हैं और उस पर अपने-अपने वाद को आरोपित करके उसे ही वास्तविक प्रेमचंद घोषित करते हैं। यदि हम यथार्थवाद के संबंध में आलोचकों का विवेचन देखते हैं, तो उन्होने प्रेमचंद के यर्थाथवाद को ही जनवादी यर्थाथवाद, क्रान्तिकारी जनवादी यर्थाथवाद, माक्र्सवादी यथार्थवाद, समाजवादी यर्थावाद, आलोचनात्मक यर्थाथवाद आदि अनेक रूपों में विभाजित कर दिया है और अपने-अपने यथार्थवाद में आने वाली कुछ रचनाओं में अपने वाले प्रेमचंद को असली प्रेमचंद माना है। इस प्रकार प्रेमचंद की आलोचना दो रूपों में बँट गयी हैं- एक सम्पूर्णता के आधार पर देखे जाने वाले प्रेमचंद और दूसरी, एक दो अथवा दस-पाँच रचनाओंं के आधार पर प्रेमचंद की मूर्ति गढना। प्रेमचंद की खंडित तथा अधूरी मूर्ति के सम्मुख अपनी स्वीकृति कों कैसे स्वीकार्य बना सकती है? प्रेमचंद को दो प्रेमचंद में बाँटना, एक पे*मचंद को दूसरे प्रेमचंद के विरूद्व खडा करना तथा तथा एक को उत्कृष्ट तथा दूसरे को निकृष्ट सिद्ध करना उनका अवमूल्यन तथा पाठक को भ्रम में रखना है तथा आलोचक की संकुचित एवं व्यापक पक्षधरता का प्रमाण हैं। प्रेमचंद को समग्रता में रखकर अर्थात उस समय की भारतीयता के परिपेक्ष्य में रखकर ही हम उन्हें सम्पूर्णता में प्राप्त करके उनका सही मूल्यांकन कर सकते हैं। प्रेमचंद के साहित्य में इन वादों, प्रतिबद्धताओं से असम्बद्ध तथा कुछ चुनी हुई रचनाओं के अतिरिक्त इतनी विपुल सामग्री है कि हम उसकी न तो उपेक्षा कर सकते हैं और न इस साहित्य के बिना निकाले गए निष्कर्षों को ही अंतिम एवं वैज्ञानिक निष्कर्ष मान सकते हैं।
इस विवाद के मूल में मुख्यतः प्रेमचंद का आदर्शोन्मुख यथार्थवाद का साहित्य-दर्शन तथा उसके अनुरूप रचे गए उनके साहित्य को लेकर है। प्रेमचंद के साहित्य में आदर्श और यथार्थ को लेकर दो विचार-समूह बन गये है और दोनों ही उन्हें अपना-अपना साहित्यकार घोषित करते हैं।
प्रेमचंद की प्रगतिशील लेखक संघ की अध्यक्षता तथा उनके देहान्त के बाद प्रगतिशील आलोचकों ने यथार्थवाद से माक्र्सवाद का अटूट रिशता बताते हुए यह स्थापित किया कि माक्र्सवाद का प्रेमचंद पर प्रभाव था और वे पूर्णतः यथार्थवादी थे और उनका आदर्शवाद उनकी भावुकता, मोहग्रस्तता तथा मनभ्रमता का परिणाम था। इन आलोचकों ने प्रेमचंद की इस सम्बन्ध में जो मान्यताएँ रही हैं, उन्हें तक उपेक्षित रहने दिया। प्रेमचंद सबसे पहले अपने लेख उपन्यास -(जनवरी, 1925) में आदर्शोंन्मुख यथार्थवाद के सिद्धान्त की स्थापना करते है। वे मानते हैं कि यथार्थवाद समाज की कुप्रथाओं, दुर्बलताओं, विषमताओं एवं क्रूरताओं का चित्रण तथा मनुष्य के छल-कपट, विरोध-शोषण एवं वैमनस्य जैसे मनोविकारों के दुष्परिणामों का दिखाकर हमारी आँखें खोलता है, परन्तु यथार्थवाद के नाम पर नग*ता, कामुकता आदि का कोई स्थान नहीं है तथा यथार्थवाद जीवन की हूबहू नकल भी नहीं है, क्योंकि कला का रहस्य भ्रांति और कृत्रिमता है जिस पर यथार्थ का आवरण रहता है। वे यथार्थवाद को अद्यम एवं प्रतित चरित्रों तथा व्यवहारों तक सीमित करने के पक्ष में नहीं है। उनका प्रश्न है कि सुन्दर, प्रकाशवान संसार एवं पवित्र धारणाएँ क्यों नहीं यथार्थवाद में आ सकती है? जो आलोचक प्रेमचंद को यथार्थवादी मानते हैं, उन्होंने प्रेमचंद की इस जिज्ञासा का कोई उत्तर नहीं दिया है। प्रेमचंद यथार्थवाद को अन्धकार तक सीमित नहीं करते हैं, क्योंकि अन्धकार में तो अन्धकार ही मिलेगा। अतः वे अन्धकार रूपी यथार्थवाद से प्रकाश रूपी आदर्शवाद की ओर चलते हैं, क्योंकि वह कुछ समय के लिए कुत्सित यथार्थ से दूर रखता है। साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं है, बल्कि दीपक भी है, जिसका काम अन्धकार क नष्ट करके प्रकाश फैलाना है। डाक्टर रामविलास शर्मा न किंचित दुखी होकर लिखा है कि आदर्श तो हमेशा यथार्थ की गर्दन पर सवार रहता है 4, परन्तु प्रेमचंद का आदर्शवाद न तो अव्यवहारिक है, न आरोपित है, वह तो उनकी व्यक्ति एवं समाज के प्रति उत्थान-पतन तथा सहज मानवीयता की उपज है, जो मनुष्य मात्र का मंगल व कल्याण चाहती हैं। उनके मन की मानवीय सदभावना एवं सदाशयता उन्हें जीवन के कठोर यथार्थ की ओर ले जाती है और यही सदिच्छा उन्हें इस यथार्थ से मुक्ति के लिए आदर्शां की ओर प्रवृत्त करती हैं। कायाकल्प में चक्रधर कहता है कि हम यथार्थ को ही आदर्श मान ले तो संसार नरक-तुल्य हो जाए। प्रेमचंद ने अपने देहान्त से लगभग तीन महीने पहले उर्दू पत्रिका इहमत के जुलाई, 1936 के अंक में लिखा है कि साहित्यकार आइडियलिस्ट बनने पर मजबूर है, क्योंकि वह वर्तमान समाज के वैषम्य से तभी उद्विग्न होगा, जब उसकी नजर में समाज का कोई अधिक सुन्दर रूप होगा तथा उसमें असन्तोष के लिए भी ऊँचे आइडियाज का दिमाग में रहना जरूरी हैं। वे प्रश्न करते हैं कि अगर किसी बेहतर जिन्दगी और ज्यादा खूबसूरत सोसाइटी की सूरत हमारे दिमाग में नहीं है, तो हम मौजूदा समाज को खींचकर सुधार के किस लक्ष्य की और ले जाएँगे?5 प्रेमचंद की दृष्टि है कि साहित्य में यथार्थ और आदर्श दोनों आवश्यक हैं, तथा दोनो का समन्वय करके उन्हें अतिवादी स्थितियों से बचाना भी आवश्यक है। यथार्थवाद लेखक की मानव की अनुभूतियों पर आघात करता है और उसकी न्याय-बुद्वि पर चोट करता है तथा वह नग्नता एवं अश्लीलता को भी अपने में समेटें रहता है और आदर्शवाद पात्रों को देवता एवं सिद्वान्तों की मूर्ति बना सकता हैं। अतः प्रेमचंद उसी उपन्यास को उच्चकोटि का मानते हैं जिसमें यथार्थ और आदर्श का समावेश होता है तथा उसे आदर्शोन्मुख यथार्थवाद कहा जा सकता हैं। प्रेमचंद के साहित्यकार का पूर्ण रूप यथार्थ और आदर्श के इसी संगम में ही हैं। उसे यथार्थ और आदर्श के दो टुकडों में बाँटने पर हम प्रेमचंद को टुकडों में ही जान सकते हैं और उसे ही उनकी पूर्ण मूर्ति मानने के भ्रम में जीते रह सकते हैं।
प्रेमचंद को समग्रता में देखने, पढने एवं आलोचना में उनके सम्पूर्ण कृतित्व को सामने रखने के पीछे तर्क यह है कि उनके कृतित्व के एक या दो पक्ष उनकी साहित्य एवं जीवन-दृष्टि तथा उनके सरोकारों की समग्र रूप में प्रस्तुत करने में समर्थ हैं। डाक्टर नामवर सिंह ने लिखा है कि उनकी जीवन-दृष्टि पूरी की पूरी न तो माक्र्सवाद में आती है और न गाँधीवाद में।6 प्रेमचंद-आलोचना में लगभग चार दशकों तक उन्हें माक्र्सवाद, समाजवाद, प्रगतिशीलवाद, सामन्तवाद एवं साम्राज्यवाद विरोधी लेखक के रूप में स्थापित किया जाता रहा। तथा कुछ आलोचकों ने उन्हें आर्यसमाजी, गाँधीवादी साहित्यकार के रूप में प्रस्तुत किया है, एवं कुछ विद्वानों ने उन्हें स्वाधीनता संग्राम के अनूठे महाकथाकार, कृषक जीवन के महाकथाकार, दलित जीवन के कथाकार आदि कहकर प्रेमचंद को गौरवान्वित किया है, लेकिन इनमें उनके साहित्यिक कृतित्व के केवल एक ही पक्ष की प्रशंसा है, जो यह प्रतिति करती है कि उनकी महत्ता एवं योगदान इन्हीं पक्षों तक सीमित है। अतः प्रेमचंद की जिन साहित्यिक प्रवृत्तियों का मूल्यांकन किया गया है, उनका समग्र एवं संश्लिष्ट रूप ही प्रेमचंद का प्रेमचंद बनाता है। प्रेमचंद के साहित्य में हम बीसवी शताब्दि के आरम्भिक के चार दशकों का भारतीय जीवन का व्यापक परिदृश्य पाते हैं, जिसमें देश के अतीत और भविष्य की भी छवियाँ है, तो हम उसका अन्दाजा लगा सकते हैं कि उसमें राजनीति, धर्म, समाज, अर्थ संस्कृति, भाषा आदि की जो भी उस काल में परिस्थितियाँ तथा समस्याएँ रहीं है, वे कितनी बडी मात्रा में जीवन्त कहानियाँ बनकर प्रकट हुई हैं। इस व्यापकता और विशालता को ध्यान में रखकर ही उनकी कुछ प्रमुख साहित्यक प्रवृत्तियों का विवेचन किया है, लेकिन उसके संश्लिष्ट एवं समन्वित रूप में ही प्रेमचंद को सही अर्थ में समझा जा सकता है। प्रेमचंद के साहित्य के कुछ ऐसे भी पक्ष हैं जिनकी स्थानाभाव के कारण यहाँ चर्चा नहीं की गयी है, परन्तु प्रेमचंद की मूर्ति के रूपाकार में उसके पूर्णत्व के लिए उन्हें स्थान देना आवश्यक हैं। प्रेमचंद के सम्बन्ध में गाँधीवाद एवं माक्र्सवाद का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक है, तथा यह भी कि वे अन्तिम वर्षों में माक्र्सवाद के अनुयायी हो गए थे, जैसा कि कुछ आलोचकों ने लिखा है। ये आलोचक महाजनी सभ्यता के लेख की चर्चा करते हैं, किन्तु हंस के उसी अंक में उनकी कहानी रहस्य छपी है जो उनकी आदर्शवादी दृष्टि का अनुमोदन करती है। इसके साथ उनकी तीन कहानियों -कैदी (1933),कातिल तथा कातिल की माँ (1935) को भी इस अध्ययन में सामने रखना जरूरी है जिनमें रूसी क्रान्ति का स्पष्ट विरोध है और ये उनके अन्तिम वर्षों की रचनाएँ हैं। रंगभूमि के वीरपालसिंह के प्रसंग के औचित्य को भी समझना आवश्यक है। प्रेमचंद ने लिखा है कि उनका मुख्य उद्येश्य स्वराज्य प्राप्ति है, लेकिन स्वराज्य की उनकी अवधारणा क्या है, इसकी विस्तत छानबीन जरूरी है। प्रेमचंद साहित्य में धन, धर्म एवं संस्कति के प्रश्न बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने एक बार कहा था कि मुख्य विषय धन से दुश्मनी है, लेकिन धन के अस्तित्व एवं सत्ता के सन्दर्भ में उसके पाप और पुण्य दोनों को देखना आवश्यक है। धर्म के सम्बन्ध में वे धर्म के पाखंड, छल-कपट, मिथ्या कर्मकांड, अंधविश्वास आदि के विरोधी हैं, किन्तु वे धर्म एवं नीति की महत्ता को स्वीकार करते हैं। प्रेमचंद के लिए धर्म एवं नीति मानवीयता के ही अंग है। वे हिन्दू, इस्लाम धर्म एवं संस्कृति पर विचार करते हैं और इनके सम्बन्ध में उनकी मान्यताएँ सामने आती हैं। वे हिन्दू संस्कृति पर गर्व करते हैं और मूल अध्यात्म, त्याग और मानवता में देखते हैं, किन्तु वे हिन्दू धर्म के सनातनी पाखंड और छूआछूत की भर्त्सना करते है और हिन्दू धर्म के वीभत्स लेख लिखते हैं, किन्तु जब ईसाई संस्कति एवं धर्म अर्थात पश्चिमी सभ्यता से पूर्वी संस्कति को अच्छा मानते हैं। रंगभूमि में सेवक परिवार, सोफिया आदि के माध्यम से ईसाई जीवन का चि खींचा गया है एवं ईसाई धर्मान्तरण के कुछ सन्दर्भ उनकी कहानियों में मिलते हैं। अंगेज्ज अधिकारियों का दमन तथा सत्ता-अहंकार तो कई रचनाओं में मिलता है। इस्लाम धर्म की वे प्रशंसा करते हैं। वे इस्लाम के भ्रमृत्व-भाव, न्याय-व्यवस्था आदि की तारीफ करते हैं और चाहते हैं कि हिन्दू-मुसलमान में एकता स्थापित होनी चाहिए। लेकिन मुस्लिम धर्मान्धता, कट्टरता और पाकिस्तान के निर्माण का विरोध करते हैं। हंस के मार्च 1930 के अंक में लिखत हैं कि मुसलमान होने से पहले हिन्दुस्तानी की तरह सोचना चाहिए। प्रेमचंद के इस संस्कृति-पक्ष पर विशेष गौर करने की आवश्यकता हैं। वे पश्चिमी संस्कति को बहुत चिन्तित हैं और वे पूर्व-पश्चिमी की संस्कति की परस्पर कशमकश को गहराई से देखते हैं और भारतीय शिक्षित वर्ग द्वारा पश्चिमी सभ्यता की नकल को घातक मानते हैं, क्योकि उसमें उन्हें भारतीयता के नष्ट होने का भय लगता है। वे अंगे*जी जीवन-शैली, रहन-सहन, आमोद-प्रमोद, वेशभूषा, खेलकूद, भाषा आदि सभी में भारतीय जीवन-पद्वति एवं भारतीय विवके के पतित होने का संकट दिखायी देता है। इसलिए वे उस विसंस्कृतिकरण के विरूद्ध हैं, परन्तु वे हिन्दू एवं इस्लाम की एकता में ऐसी कोई विपत्ति नहीं देखते हैं। वे हजरत मुहम्मद पर कहानी लिखते हैं और कविता पर नाटक कर रचना करते है, परन्तु वे हिन्दू और मुसलमान दोनों की कमियों पर सख्त टिपणियाँ करते हुए स्वराज्य के लिए दोनों की एकता चाहते हैं। प्रेमचंद के इतिहास-बोध की भी हम उपेक्षा नहीं कर सकते हैं। प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में इतिहास से कुछ कथानकों एवं पात्रों की कथाएँ हैं जो हमें आरम्भ से अन्त तक मिलती हैं। उन्होनें आरम्भ में राणा प्रताप, रणजित सिंह, राणा जंगबहादुर, अकबर, स्वामी विवेकानन्द, राजा मानसिंह, राजा टोडरमल, गोखले, गेरीबाल्डी, सर सैयद अहमद खाँ, दुर्गादास आदि देश-विदेश के राष्ट्र-नायकों पर जीवनीपरक लेख लिखे हैं, रूठी रानी हिन्दी उपन्यास का उर्दू में अनुवाद किया है तथा रानी सारन्धा, विक्रमादित्य का तेंगा, राजा हरदौल, आल्हा, राजहठ, मर्यादा की वेदी, विजय, वासना की कडियाँ, वफा का खंजर, परीक्षा, राज्य-भक्त, नबी का नीति निर्वाह, वज्रपात, क्षमा, शतरंज के खिलाडी, लैला, सती, दिल की रानी, आदि कहानियाँ ऐसी हैं जिनके कथा स्त्रोत व पात्र ऐतिहासिक हैं। प्रेमचंद की ये ऐतिहासिक कहानियाँ उनकी रचनात्मक का ही अंग हैं, लेकिन इसकी उपेक्षा इसलिए हुई हैं कि उन्होने जयशंकर प्रसाद के ऐतिहासिक नाटक स्कन्दगुप्त की समीक्षा में गडे मुर्दे उखाडने का आरोप लगाया था और इससे मान लिया गया कि प्रेमचंद इतिहास के विरोधी हैं। प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद यद्यपि इतिहास का उपयोग राष्ट्रोत्थान एवं अस्मिता-बोध के लिए कर रहे थे, किन्तु उनके रास्ते अलग-अलग हैं, इसलिए उनकी तुलना उचित नहीं हैं, फिर भी दोनों में संस्कति निष्ठ राष्ट्रीय धारा का प्राधान्य है।5 प्रेमचंद की एक उक्ति यहाँ दी जाती है जो उन्होंने देश के वीर राष्ट्र नायकों पर लिखी हैं। उनकी इतिहास-दृष्टि का एक रूप यह भी हैं। वे कर्बला शीर्षक लेख में लिखते हैं, हिन्दू जाति यदि अपने पुरूखाओं की किसी धर्म-संग्राम में आत्मोत्सर्ग करते हुए देखकर प्रसन्न न हो तो सिवाय इसके ओर क्या कहा जा सकता है कि हम में वीर-पूजा की भावना भी नहीं रही, जो किसी जाति के अधः पतन का अन्तिम लक्षण हैं। जब तक हत अर्जुन, प्रताप, शिवाजी आदि वीरों की पूजा और उनकी कीर्ति पर गर्व करते हैं, तब तक हमारे पुनरूद्वार की कुछ आशा हो सकती हैं। जिस दिन हम इतने जाति गौरव-शून्य ही जायेंगे कि अपने पूर्वजों की अमर कीर्ति पर आपति करनें लगें, उस दिन हमारे लिए कोई आशा नहीं रहेगीं। हम तो उस चित-वति की कल्पना करनें में भी असमर्थ हैं जो हमारे अतीत-गौरव की ओर इतनी उदासीन हो।8 प्रेमचंद के इन विचारों की उनकी रचनात्मकता में जो भूमिका रही हैं, क्या उसे उनके साहित्य के मूल्यांकन तथा वैचारिक संसार से बहिष्कृत किया जा सकता है, इसी प्रकार प्रेमचंद साहित्य में मध्यवर्ग और उच्चवर्ग के जीवन का जो स्थान हे तथा जो महत्त्व है, उसकी भी प्रायः अपेक्षा हुई हैं। उनके साहित्य में निम्न वर्ग अर्थात किसानों, दलितों, निर्बलों, शोषितों, श्रमिकों, आदि को जो महत्त्वपूर्ण स्थान मिला है तथा उन्होंने जो इनकी वकालत करने का व्रत लिया है, उसने मध्य एवं उच्च वर्ग के पात्रों को हेय तथा उनके कार्यों को उपेक्षणीय बना दिया है। प्रेमचंद के उपन्यासों एवं कहानियों में मध्य वर्ग तथा उच्च वर्ग के प्रसंगो, कथानकों, पात्रों आदि की मात्रा निम्न वर्ग से अधिक है, तब ऐसी स्थिति में इनके विवेचन और मूल्यांकन के बिना प्रेमचंद के साहित्यकार की मूर्ति कैसे पूरी हो सकती है? प्रेमचंद-साहित्य के ग्रामीण पात्रों में किसान हैं, पंडित हैं, श्रमिक हैं, पंच हैं, छोटे व्यापारी हैं, लेकिन शहरी पात्रों में राजा-महाराजा, कोंसिल के सदस्य, उच्च पदाधिकारी, प्रोफेसर, डाक्टर, क्लर्क, छात्र, वकील, मजिस्टेट, व्यापारी, समाज-सुधारक, नेता-गण आदि की भी बडी संख्या है, जो ग्रामीण पात्रों के साथ मिलकर तथा स्वतंत्र रूप से भी अपनी कथा का विकास करते हैं और प्रमुख कथा का अंग बनकर आते हैं। प्रेमचंद के सेवासदन, प्रेमाश्रम, कायाकल्प, निर्मला, प्रतिज्ञा, गबन, कर्मभूमि, तथा मंगलसूत्र के नायक मध्यम वर्ग के ही हैं और गो-दान में तो होरीराम की ग्रामीण कथा के साथ शहरी पात्रों की कहानी का अटूट सम्बन्ध हैं, जिसे कुछ आलोचकों ने स्वतंत्र कथा बताकर कथा-शिल्प को समझने में गलती की हैं। गोदानकार ने उपन्यास में कई स्थानों पर दोनों कथाओं को जोडा हैं, यहाँ तक कि मेहता-मालती भी गाँव की कथा से जुड जाते हैं। प्रेमचंद-साहित्य में नगर का शिक्षित मध्य वर्ग स्वराज्य आन्दोलन, समाज सुधार तथा सांस्कृतिक जागृति में नेतृत्व करता है तथा उनका जीवन, उनके तनाव और सरोकार भी कहानियों- उपन्यासों के केन्द्र में रहे हैं। वैसे भी, उच्च वर्ग, मध्य वर्ग तथा निम्न वर्ग मिलकर ही समाज का पूरा चित्र बनता हैं, अतः प्रेमचंद के मूल्यांकन में तीनों वर्ग महत्त्वपूर्ण हैं, और वे किसी सीमा तक परस्पर जुडे हुए भी हैं। प्रेमचंद की जिन कहानियों में शहरी पात्रों की कथा हैं, मध्य वर्ग एवं उच्चे वर्ग की कथा हैं, वे क्यों नहीं लेखक की रचनात्मक के अंग माने जाने चाहिए और क्यों नहीं उन्हें प्रेमचंद की समग्रता का अंग बनाना चाहिए? यह भी प्रेमचंद को समझने के लिए आवश्यक है कि उनके साहित्य में वर्ग-संघर्ष का स्वरूप क्या हैं, उसमें वर्ग-संघर्ष है या वर्ग-सामंजस्य है? प्रेमचंद की जीवन दष्टि को जानने के लिए वर्ग-संघर्ष का यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण हैं। प्रेमचंद के कुछ आलोचकों ने उनके कुछ पात्रों में वर्ग-संघर्ष की प्रवृत्ति देखी हैं, जिसके परिणाम स्वरूप रंगभूमि के सूरदास की अपेक्षा गोदान का होरी अधिक संघर्षशील नायक है और इसलिए वह सूरदास से महान है, जबकि सूरदास अंगे*जी सत्ता तथा अपने गाँव के साथियों के साथ निरन्तर संघर्ष करता हैं।
और संघर्ष करते-करते मर जाता है, जबकि होरी किसान के रूप में अपने अस्तित्व कर रक्षा एवं चार-पाँच बीघा जमीन को बचाने में निरन्तर घटता रहता है और मजदूरी करते हुए मर जाता है। सूरदास और होरी की तुलना में सूरदास अधिक संघर्षशील और लडाकू है, जबकि होरी में ये तत्त्व नहीं है। डाक्टर नामवर सिंह जैसे प्रगतिशील आलोचक भी यह मानते हैं कि सूरदास प्रेमचंद का सबसे लडाकू नायक है और कदाचित साहित्य में उसकी जोड का कोई दूसरा हीरो नहीं है।9 अतः यह आवश्यक है कि प्रेमचंद की वर्ग-संघर्ष की दृष्टि को तटस्थता के साथ देखें और उसका मूल्यांकन करें।
प्रेमचंद-साहित्य में एक लेखक के रूप में प्रेमचंद का कैसा तथा क्या व्यवहार हैं, उसकी क्या भूमिका है, वह किस प्रकार कथानक एवं पात्रों की रचना करता है, वह कैसे उपन्यास को इच्छित मोड देता है तथा वह किसी प्रकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में रचना में उपस्थित रहता है, ये सारे प्रश्न महत्त्वपूर्ण हैं और उनके कला-दर्शन के परिज्ञान के लिए आवश्यक है। ऐसी लेखक की निरंकुश उपस्थिति रचना की कलात्मकता तथा उसे शिल्प-कौशल को प्रभावित करती है। प्रेमचंद के औपन्यासिक शिल्प को जानना भी प्रेमचंद को जानना है। प्रेमचंद ने उपन्यास एवं कहानी के शिल्प में जो क्रांति की है, जो युगान्तर उपस्थित किया है, वह भी आलोचकों की उपेक्षा का शिकार होता रहा है। प्रेमचंद की प्रतिष्ठा एवं महत्ता के प्रतिपादन में उनके राष्ट्रवादी, सुधारवादी, मानवतावादी, गाँधीवादी, माक्र्सवादी आदि की बडी चर्चा हुई हैं, परन्तु उनकी शिल्प-चेतना की मौलिकता एवं उनकी कलात्मकता ने भी उन्हें प्रतिष्ठा एवं मौलिक उदभावना का श्रेय दिया है, इस ओर कम ही आलोचकों का ध्यान गया है। साहित्य में कथ्य और संरचना के सम्बन्धों को जानकर भी कथ्य की चर्चा और महता शिल्प से अधिक मिली है और प्रेमचंद के शैल्पिक योगदान को जैसे भुला दिया गया है। प्रेमचंद परम्परागत कथ्य एवं उसके शिल्प से विद्रोह करके नयी सम्वेदना तथा उसके अनुरूप नवीन शिल्प की उदभावना करते हैं। वे उपन्यास और कहानी को जीवन की सचाइयों का दर्पण कहते हैं और उपन्यास-कहानी को घटना, चमत्कार, तिलिस्म, अलौकिकता आदि से मुक्त करके चरित्र की मनोवैज्ञानिक गुत्थियों के दिग्दर्शन तथा कथा-विन्यास की यथार्थपूर्ण शैल्पिक पद्धतियों तक ले जाते हैं। वे हिन्दी के पहले कलाकार हैं जो उपन्यास और कहानी को एक मुहावरा प्रदान करते हैं। वे कथा और पात्र को महत्त्व देते हैं, कथा का सचेत संगठन करते हैं, चरित्र और घटना एवं मनोविज्ञान को परस्पर जोडते हैं, कार्य-कारण सम्बन्ध स्थापित करते हैं, व्यक्ति और समाज को समन्वित करते हैं तथा बराबर प्रयोग करते चलते हैं। प्रेमचंद के प्रयोगधर्मी कथाकार होने पर अभी तक सोचा नहीं गया हैं। सेवासदन में कथा एक पात्र सुमन से संग्रहित है, प्रेमाश्रम की कथा ज्ञानशंकर और प्रेमशंकर दो पात्रों से जुडी हैं। रंगभूमि में सूरदास की कथा मुख्य कथा है, परन्तु उसकी अनेक सहायक और प्रासंगिक कथाएँ हैं। कथा की इतनी व्यापक संरचना लेखक ने पहली बार की हैं। कायाकल्प में फिर एक नया प्रयोग है। इसमें चक्रधर और देवप्रिया की दो पूर्णतः स्वतनत्र कथाएँ नहीं हैं, बल्कि वे मानसिक कायाकल्प और शारीरिक कायाकल्प की कथाएँ हैं जो उपन्यास के प्रतिपाद्य से संगृहित हैं’। निर्मला में लेखक ने कथा का एक परिवार तथा मनोवैज्ञानिक ग्रंथियों तक सीमित करके पुनः एक नया प्रयोग किया है। कर्मभूमि में कथा पाँच भागों में विभक्त है जो कथा का नया विन्यास हैं। गोदान में कथा का चक्रवत विकास है। गाय की आकांक्षा से कथा आरम्भ होती है और गाय की आकांक्षा से ही होरी का देहान्त होता है और कथा का अन्त होता है। कथा की यह सृष्टि भी एकदम मौलिक है। कहानी में भी प्रेमचंद ने अनेक प्रयोग किये हैं। उन्होनें वर्णात्मक, सम्वादात्मक, पत्रात्मक, प्रथम पुरूष, तृतीय पुरूष, दृश्यात्मक, नाटकीय आदि विभिन्न शिल्प-रूपों में कहानियों की रचना की हैं। इस प्रकार प्रेमचंद नये युग के नये ज्ञान-विज्ञान के अनुरूप उपन्यास और कहानी में वैज्ञानिक शिल्पकारिता के जनक हैं। अज्ञेय ने सही लिखा है, एयारी, तिलिस्मी और मलिनों-मरियारिनों के किस्सों से, या पुराने आख्यानों के पुनः संस्करणों से सेवासदन तक कितनी बडी मंजिल है, इस पर थोडी देर विचार करने से प्रेमचंद की देन पर चकित रह जाना पडता है। 10 अतः कलाकार प्रेमचंद का महत्त्व व्यक्ति प्रेमचंद या सुधारक प्रेमचंद से कतई कम नही हैं।
प्रेमचंद की रचनात्मकता के केन्द्र में दो प्रमुख संकल्प हैं- स्वराज्य की प्राप्ति तथा भारतीय आत्मा की रक्षा ये दोनों परस्पर सम्बन्द्व हैं, स्वराज्य मिलेगा, तो भारतीय आत्मा की रक्षा हो सकती है। भारतीय आत्मा के जो शत्रु हैं, जो भारतीय आत्मा और भारतीयता को क्षत-विक्षत करना चाहते हैं, प्रेमचंद को उनकी बडी बारीक पहचान है। यह शत्रु देश के अन्दर और बाहर दोनों स्थानों पर हैं और एक लेखक के रूप में प्रेमचंद इन सभी को देश-हित में चुनौती देते हैं, टकराते-ललकारते हैं और अपने पात्रों को इनसे लडने के लिए कथा-कहानी के रंगमंच पर उतार देते हैं। यह शत्रु हैं- विदेशी शासन, देशी सामंत एवं जमींदार, विदेशी सभ्यता एवं औद्योगिकीकरण की नकल, समाज में विद्यमान मध्ययुगीनता, संस्कृति का विसंस्कृतीकरण एवं सांस्कृतिक प्रदुषण तथा अधःपतन, कृषि संस्कृति एवं ग्रामीण जीवन के लिए घातक युगीन प्रवृतियाँ, विषमता- दासता- शोषण की उद्भावना एवं लाभान्वित होने वाली शक्तियाँ, धन और धर्म के पाखंड, भेदभाव और साम्प्रदायिकता, मनुष्य की समता, एकता, बन्धुत्व, तथा स्वतंत्रता विरोधी शक्तियाँ, वर्ग-भेद से उपजी विषमताएँ एवं विसंगतियाँ, घर-परिवार एवं मानवीय सम्बन्धों को तोडने वाली शक्तियाँ, भाषिक साम्प्रदायिकता तथा वे सभी शक्तियाँ एवं प्रवृत्तियाँ जो देश को पतनोन्मुख करती हैं और जो उसके विकास में बाधक हैं। प्रेमचंद किसी एक पर नहीं, देश के सभी शत्रुओं के चेहरों से नकाब उठाते हैं, समाज को उनके चेहरे दिखाते हैं, और उनके पात्र व्यक्ति और समाज को घेरे मध्ययुगीनता-आधुनिकता, पुरातनता-नवीनता, भारतीयता-पाश्चात्यता, देशभक्ति-देशद्रोहिता, स्वराज्य-दासत, ग्रामीणता-नगरीयता, लोकतंत्र-साम्राज्यवाद, अहिंसा-हिंसा, मूल्यवता-मूल्यहीनता, नैतिकत-अनैतिकता, आस्था-अनास्था, न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, सेवा-स्वार्थ आदि के द्वन्द्व से निकलते हुए अपने विवके से एक नया मार्ग बनाते हैं और भारतीय आत्मा के विराट स्वरूप के अंग बन जाते हैं। यह अनेकता में एकता का सबसे सुन्दर उदाहरण हैं। देश और समाज की अनेक-रूपात्मक विराटता, भव्यता एवं असीमता प्रेमचंद साहित्य में भारतीय आत्मा में समा जाती हैं और इसी में हम उनकी भारतीय के दर्शन करते हैं। हिन्दी के कुछ आलोचकों ने इस भारतीयता को अपने-अपने तरीको से परिभाषित किया है। डाक्टर रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तक प्रेमचंद(1941) में लिखा है कि पे*मचंद ने साहित्य की किसी हद तक वही व्याख्या की है जिसे हम भारतीय कहने के आदि हैं। डाँ. शर्मा आगे कहते हैं कि प्रेमचंद का साहित्य में रस की सृष्टि तथा उसका ध्येय आनन्द मात्र मानना भी उनकी भारतीयता का प्रमाण है।11 अमृतराय ने तो प्रेमचंद की भारतीयता पर एक लेख लिखा है कि प्रेमचंद की भारतीय की खोज उनकी रचनाओं के सन्दर्भ में ही हों सकती है जिसमें जीवन के सुन्दर मूल्यों की स्थापना हैं, क्योंकि समस्त श्रेष्ठ साहित्य का यही सार-तत्त्व हैं। हमारी सांस्कृतिक परम्परा में इसको सूत्र रूप में सत्य, शिव और सुन्दर की या फिर सत, चित, और आनन्द की संज्ञा दी गयी है, लेकिन मूलतः सारे संसार में मूल्यों की यह खोज एक ही है। साथ ही, प्रेमचंद की भारतीयता का अन्वेषणा उनके मानवतावाद में ही करना होगा, क्योंकि मानवतावादी में महत जीवन-मूल्यों, सामाजिक आचरण के सम्येतर मानकों तथा सत्य एवं न्याय के दर्शन होते हैं। अमृतराय यह भी कहते हें कि देश में प्रादेशिक विभिन्नताओं तथा विभिन्न भाषिक अंचलों के बावजूद भारतीयता एक वास्तविकता है, क्योंकि आदि काल से देश में सांस्कृतिक एकसूत्रता विद्यमान है।12 डाँ. रमेशकुंतल मेघ र्प्रगतिशील आलोचक होने पर भी लिखते हैं कि प्रेमचंद शनैः शनैः भारतीयता तथा भारतीय उपन्यास का उद्घाटन करते हैं और उनके पात्रों, भाषिक बोलियों, कथा-चक्रों के सामाजार्थिक प्रतिवेदन तथा मूल्यों आदि में भारतीयता की अस्मिता अर्न्तनिहित है।13 मुक्तिबोध भी इसी का समर्थन करते हुए लिखते हैं कि प्रेमचंद हमारी आत्मा के शिल्पी है और उनके पात्र भारतीय विवके चेतना के प्रतीक हैं।14 प्रेमचंद-साहित्य में यह भारतीयता ही उनकी कुछ रचनाओं को महाकाव्यात्मक चेतना से सम्पन्न करती है। यह उन्हें कालजयी बनाती है, उन्हें वैसा ही अमरत्व देती है, जैसा वाल्मीकि,कालिदास और गोस्वामी तुलसीदास को दिया है। भारत का साहित्यकार प्रत्येक युग में ऐसी ही भारतीयता से अमरत्व प्राप्त कर सकता हैं, पर उसे अपनी भूमि से, भू-जीवन व भूमि-संस्कृति तथा भू-अस्मिता की रक्षा का ऐसी ही संकल्प लेकर रचना-संसार में उतरना होगा। देश की आने वाली पीढियाँ अवश्य ही इस प्रतीक्षा में रहेंगी कि देश की आत्मा और उसकी संस्कृति से प्रेम करने वाला तथा उसके शुभ एवं विकास का संकल्प लेने वाला साहित्यकार जन्म ले और उनके युग की भारतीयता को वाणी देकर उनका जीवन प्रशस्त और सार्थक करें। प्रेमचंद की विरासत को आगे बढाने का यही एक मात्र रास्ता है और यही मंगल भवन अमंगल हारी का महामंत्र हैं, और यही प्रेमचंद और उन जैसे साहित्यकारों के अमरत्व का आधार है।

संदर्भ -
1. प्रेमचंद आज, सम्पादक : प्रभाकर श्रोत्रिय, पृ. ५३
2. इन्द्रनाथ मदान को 26 दिसम्बर, 1934 को लिखे पत्र से, प्रेमचंद : पत्रकोवा, पृ. २५
3. प्रेमचंद : विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता, पृ. ६०३
4. प्रेमचंद, संस्करण १९९४, पृ. ४२
5. प्रेमचंद : विविध-प्रसंग, भाग-3, पृ.६१-६२
6. प्रेमचंद : विविध आयाम, सम्पा. डॉ. दिनेश प्रसाद सिह, इसमें संकलित प्रेमचंद का अन्तर्विरोध और
उनके सामाजिक आधार लेख से पृ. २०-२१
7. डॉ. सत्यपाल चुघ, प्रसाद : भारतीयता के प्रतिमान प्रकाशक : विद्या विहार, नयी दिल्ली, प्र.संस्करण
१९९०, पृ. १२८-५९
8. प्रेमचंद : विविध-प्रसंग, भाग-2, पृ. ३५८, माधुरी,१ जनवरी १९२५ से
9. प्रेमचंद : विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता, पृ. ५२
10. आधुनिक हिन्दी साहित्य : पृ. 91
11 प्रेमचंद, संस्करण, १९९६ पृ. ३९
12 प्रेमचंद की प्रासंगिकता, पृ.
13. प्रेमचंद : हमारे समकालीन : सम्पादक रमेश कुंतल, मेघ प्र. सं. १९८६, पृ.
14. प्रेमचंद : विगत महत्ता और वर्तमान अर्थवत्ता, पृ. ६०२-०३

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