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शिक्षा पाठ्यक्रम, साहित्य और समाज

-ब्रजरतन जोशी
आज के हमारे शिक्षातंत्र की जडें औपनिवेशिक तंत्र की मानसिक गिरफ्त में है। हमने स्वीकार बोध और स्वीकृतज्ञान में फर्क करना लगभग बन्द दिया है। शिक्षातंत्र से पूछा जाना चाहिए कि क्या शिक्षा केवल कुछेक सूचनाओं का संग्रह भर है? हमारी अपनी शिक्षा पद्धति में विचार के संस्कार की प्रक्रिया क्या है? हमारी अविचारित को स्वीकार करने की तेजी से बदली प्रवृत्ति ने हमें स्वीकृत ज्ञान के तले दबा दिया है।
हम एक ऐसे समाज के रूप में आगे बढ रहे हैं जो अपनी विचार की प्रक्रिया में सामाजिक और सांस्कृतिक संरचनाओं की प्रक्रिया, प्रविधि और स्थितियों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रहा है। परिणाम स्वरूप शिक्षार्थी की उम्र, बदली परिस्थितियों में उसे मिल रहे ज्ञान व कौशल के निर्धारण की योजनाएँ कागज पर तो भारी भरकम रूप से उतरती हैं, पर व्यवहार में खोखली साबित हो रही है। हमें सदैव ही इस तथ्य को अपने जहन में रखना होगा कि शिक्षा केवल प्रतिभाशालियों के लिए नहीं है वरन् समस्त मनुष्य प्रजाति के लिए है। हमारे विशेषज्ञ प्रायः आजकल मनोविज्ञान और शिक्षण प्रणालियों के ज्ञान पर ज्यादा आग्रही हो रहे हैं। दरअस्ल कोई भी शास्त्र हमें यह समझा या बता नहीं सकता कि हमें अपनी भावी पीढी को क्या शिक्षा देनी है। वह हमारी यह तो मदद कर सकता है कि हमारे उपलब्ध ज्ञान को हम कैसे व कब इस्तेमाल करें, पर वह यह नहीं बता सकता कि उसे क्या शिक्षण सामग्री उपलब्ध करवाई जाए। शिक्षण सामग्री के चयन हेतु हमें अपने सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश से रागात्मक रिश्ता रखते हुए इस राह पर आगे बढना होगा। साथ ही हमारे शिक्षक एवं पाठ्यक्रम से जुडे लोगों को शिक्षार्थी की आयुवर्ग के अनुसार सोच-विचार को आगे बढाना और नवनीकृत करना होगा। हमें यह मूल विचार सदैव ही अपने ध्यान के परिसर में रखना होगा कि शिक्षा सामाजिक वातावरण का सूक्ष्म पर्यवेक्षण भी है। एक बडी विडम्बना यह भी है कि शिक्षा पर अपने समय के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दबाव भी अपना असर डालते हैं। आज जिस व्यवस्था में हम हैं, उसमें इनके असर से बचना असंभव तो नहीं, पर बहुत ही कठिन है।
यानी विद्यालय या विश्वविद्यालय स्तर पर पाठ्यक्रम के निर्माण में हमें यह तथ्य ध्यान में रखकर ही आगे बढना होगा कि केवल मौजूदा ज्ञान के कुछ रूप महत्त्वपूर्ण नहीं है। अतः ज्ञान संरचनाओं के भी कईं स्वरूप उपलब्ध है। समाज कईं वर्गों एवं संस्कृतियों का एक संगम है। इसलिए किसी भी सभ्य समाज में ज्ञान संरचनाओं के निर्माण में सर्वसमावेशिता, सहचर्य और सद्भाव हमारे विचार के केन्द्र में होने चाहिए।
हमारी मुख्य कमजोरी यह भी है कि विकास की लम्बी उडान के बाद आज भी हमारी आबादी के एक निश्चित हिस्से तक ही शिक्षा का प्रसार है। ऐसे में पाठ्यक्रमों के निर्माण में भी बहुत-सी महत्त्वपूर्ण चीज़ें छूट जातीं हैं।
यथा हमारे पाठ्यक्रम निर्माणकर्ता पाठ्यसामग्री के चयन के साथ उसकी शिक्षण शैली पर प्रायः मौन ही रहते हैं। जबकि शिक्षण प्रक्रिया या कह लें शैलियों का तो समाज के सांस्कृतिक स्वरूप और मूल्यप्रणाली से गहरा सम्बन्ध होता है, पर व्यवहार में हम देखते हैं कि शिक्षातंत्र में इसे लेकर कोई संवेदनशीलता नहीं है। हमने पाठ्यक्रम को एक नैतिकता प्रशिक्षण केन्द्र के रूप में सीमित कर दिया है। हम यह भी भूल जाते हैं कि इसी पाठ्यक्रम को पढकर ही समाज को दिशा देने वाले वैज्ञानिक, दार्शनिक, कवि, आलोचक मिलने हैं। अक्सर हम यह तो महसूस करते ही हैं कि हमारे पास उच्च कोटि के वैज्ञानिक, दार्शनिक या कलाकार नहीं है। हमारा शिक्षक या इस प्रक्रिया से जुडे लोग ज्ञान के संदर्भ में यह कहावत को भूल बैठे हैं कि रोज कुँआ खोदो और अपनी प्यास बुझाओ यानी हमें अपने उपलब्ध ज्ञान का पुनः पुनः परीक्षण करते हुए इसका पुनर्गठन करते रहना है। पर हम तो पहले से ही अपने पूर्वाग्रहों, धारणाओं और सीमित दृष्टिबोध से फँसे हैं। अतः यह कार्य दुष्कर प्रतीत होता है। अगर आप यदा-कदा ही शैक्षिक समाज में इन मुद्दों को उठाएँगे, तो आपको आदर्शवादी, अव्यावहारिक और उन्मादी घोषित किए जाने का खतरा निरन्तर बना रहता है।
साहित्य के विशेष संदर्भ में इस विचार को देखें, तो अधिकांश पाठ्यक्रम अपनी व्यक्तिगत इच्छा या अपनों को उफत करने की क्षमता का प्रदर्शन भर है। साहित्य का पाठ्यक्रम बनाते समय विधाओं के क्रमिक विकास, ऐतिहासिक महत्त्व और रूपगत परिवर्तनों को विशेष ध्यान में रखा जाना चाहिए। पाठ्यक्रम निर्माताओं को अपने व्यक्तिगत रागद्वेष से ऊपर उठकर समाज के हक में, ज्ञान संरचनाओं के हक में भली प्रकार से सोचना-विचारना चाहिए।
हमारे पाठ्यक्रम के मौजूदा विषय जहाँ ज्ञान क्षेत्र में हमारे सूचनाज्ञान को बढाते हैं, वहीं साहित्य हमें अपने अनन्य अनुभवों की एक विराट श्रृंखला से जोडता और हमारे आत्मपरिष्कार की प्रक्रिया को गति देता है। इसलिए भाषा और साहित्य के पाठ्यक्रम निर्माण के कार्य को महज चलताऊ किस्म का कार्य समझकर निपटाने की प्रवृत्ति पर हमें लगाम लगानी होगी।
आजकल पाठ्यक्रम निर्माताओं की दृष्टि में प्रतियोगी परीक्षाओं की प्राथमिकता है। अतः एक विचार यह भी उभर कर आ रहा है कि हमें ऐसे पाठ्यक्रम बनाने हैं जिससे हमारा विद्यार्थी आगामी जीवन में इन प्रतियोगी परीक्षाओं में अपना शानदार प्रदर्शन दे सके। हम भूल जाते हैं कि शिक्षा प्रतियोगी परीक्षाओं की रणनीति का रोडमेप नहीं है। शिक्षा अस्तित्त्व के साथ सहभाव विकसित करने की ज्ञान विधि है। जिसे हमने प्रतियोगी परीक्षा पास करने के जीवन के एक छोटे-से हिस्से तक सीमित कर दिया है। परिणामस्वरूप छात्र परिवेश के प्रति संवेदनशील होने की बजाय संवेदनहीन हो रहे हैं। अपने व्यक्तिगत अनुभव से कह सकता हूँ कि उम्र के एक स्तर तक परीक्षा उत्तीर्ण करने के दबाव के चलते स्वयं मुझे अपने आस-पास के सांस्कृतिक परिवेश, भौगोलिक परिवेश के बारे में आवश्यक ज्ञान व जानकारी नहीं थी।
आज भी हमारे जीवन में एक खास तरह का अलगाव गहरता जा रहा है। अतः हमें अपने आगे बढने की प्रक्रिया में शिक्षा संरचनाओं के केन्द्र बदलने होंगे। स्थानीय भूगोल और उत्पादन प्रणालियों के महत्त्व को समझना होगा। अपनी बुनियादी शिक्षा के विचार में भी बापू विद्यालय संस्कृति को स्थानीय उत्पादन प्रकिया एवं कौशल से जोडने पर जोर दे रहे थे। वस्तुतः वे विद्यालयों को एक ज्ञान उत्पादक केन्द्र के रूप में देखते थे। बापू तो यहाँ तक कहते हैं कि यदि स्कूल अपनी जरूरत की चीजें स्वयं उत्पादित नहीं कर सकता, तो हमारे जैसे समाज के लिए वह ज्यादा उपयोगी साबित नहीं हो सकता।
अतः जरूरत है कि हम जागें और विचार के साहित्य की शिक्षा के माध्यम से संवेदनाओं और संप्रेषण की अपार संभावनाओं को साधें। साहित्य की शिक्षा का असर यह होता है कि धीरे-धीरे वह समाज, देश, काल और मानवीय वृत्तियों के बन्धन ढीले कर उन्हें नवीन संस्कारों और अनुभवों से भरने की अचूक कोशिश करता है। हमें यह तथ्य भलीभाँति समझना होगा कि साहित्य मानव जीवन से उत्पन्न होकर उसी की आलोचना करते हुए हमें आत्मपूरित करने की राह पर आगे बढता है। शिक्षा इसी के नैरन्तर्य और विस्तार बोध को पुष्ट करती है। भारत एक बहुभाषी समाज है। भारत के पास अनेक संस्कृतियों के विपुल अनुभव का अनूठा ज्ञान है। इन अर्थों में शिक्षा, साहित्य और समाज एक-दूसरे के पूरक हैं।
हमें अपनी देशज परम्परा के उन आधारभूत सूत्रों को ध्यान में रखना होगा कि जिसमें कहा गया है कि ज्ञान मनुष्य का तीसरा नेत्र है। जो उसे तत्त्वदर्शी होने की क्षमता देता है। हमारी परम्परा में समस्त विद्याएँ मातृ-पितृ भाव से युक्त हैं। वे माँ के समान सुरक्षा व संरक्षण देती हैं और पिता के समान हितकारी भी हैं। शिक्षा केवल पुस्तकीय या शास्त्रीय ज्ञान भर नहीं है वरन् मनुष्य के सर्वाङ्गीण विकास का साधन है। इसे हमें अपने शिक्षातंत्र के चरित्र, व्यवहार में लाना होगा।
आज हमें एक ऐसे शिक्षातंत्र की जरूरत है जो हमारी पीढी में आत्म-सम्मान, आत्मगौरव, विवेक, न्याय जैसे मूल्यों के उदय एवं व्यवहार का मार्ग प्रशस्त कर सके। नागरिक ऐसा हो जिसे केवल रटे-रटाए पुस्तकीय ज्ञान का भार ही ढोना न पडे, वरन् वह स्वयं को एक उत्कृष्ट मनुष्य के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर सके। शिक्षा केवल बौद्धिक विकासभर नहीं है वरन् वह तो संस्कृति की प्राण-प्रतिष्ठा की अहम प्रक्रिया भी है। यही भाव शिक्षा, साहित्य और समाज का सत्त्व है।
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मधुमती के हर अंक की सामग्री आफ लिए रूचिकर हो, इसके लिए हम प्रयत्नरत रहते हैं। यह अंक इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि इस माह में हमारे साहित्य परिवार के चार प्रमुख अभिभावकों का जन्मदिन आता है। इस माह में कथासम्राट प्रेमचन्द, कला मर्मज्ञ चित्रकार सैयद हैदर रज़ा, हिन्दी के सर्वाधिक प्रयोगधर्मी लेखक कृष्णबलदेव बैद और हमारे समय के मूर्धन्य कवि-आलोचक केदारनाथ सिंह का जन्मदिन है। संयोग से इस अंक में इन चारों पर विशेष सामग्री है। प्रेमचन्द पर कमलकिशोर गोयनका, रजा पर जय प्रकाश चौहान, कृष्ण बलदेव वैद पर तेजी ग्रोवर को उनको लिखा ऐतिहासिक पत्र और केदारनाथ सिंह के कवि व्यक्तित्व को विश्लेषित करता सुविख्यात कवयित्री अनामिका का लेख पढने को मिलेंगे। हिन्दी की चिर्चित लेखिका गीतांजलीश्री के अप्रकाशित उपन्यास सह-सा के अंश भी इस अंक की सरस और सजल करने वाली सामग्री है। अध्येता हितेन्द्र पटेल का लेख लालबहादुर वर्मा होने के मर्म को उद्घाटित करता है।
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कोरोना की तीसरी लहर के बारे में वैज्ञानिक एवं विश्व स्वास्थ्य संगठन बार-बार हमें चेता रहे हैं। अतः सुखद एवं स्वस्थ जीवन के लिए हमें समय-समय पर राज्य सरकार एवं केन्द्र सरकार की ओर से जारी दिशा-निर्देशों की पालना करते हुए प्रगति के पथ पर पथारूढ होना है।
मंगलकामनओं के संग -
-ब्रजरतन जोशी