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मधुमती के संपादकीय की बडी दुनिया

शर्मिला बोहरा जालान
मधुमती साहित्यिक पत्रिका की दुनिया बडी होती है उसके सुचिंतित संपादकीय से। वर्ष दो हजार उन्नीस के चौथे अंक से डॉ. ब्रजरतन जोशी ने जब से इसका कार्यभार संभाला है, संपादक की चिंताएँ कईं भूमियों पर विचरण करती हैं। जिनमें साहित्य के प्रसंग स्वाभाविक ढंग से चले आते हैं; कभी मौलिकता पर सोचने के निमित्त, कभी संसार और साहित्य पर विचार करते हुए, कभी सृजन और भाषा बोध पर बात करने के बहाने, तो कभी विधा और रचनाकार की चर्चा से।
अब तक लिखे संपादकीयों पर दृष्टि डाली जाए, संपादकीय का लेखा जोखा किया जाए तो उनके चिंतन के धरातल विविध होते हुए भी साहित्य पर, साहित्य की रचना प्रक्रिया पर ज्यादा केन्द्रित है। वृहत्तर सन्दर्भ भी आते ही हैं तब जब वे गाँधी और नेहरू का भाषा चिंतन् लिखते हैं, हिन्द स्वराजः विचार का व्यवहार पर बात करते हैं और साहित्य के अनन्य वैद्य : कृष्ण बलदेव वैद पर विस्तार से लिखते जाते हैं। हम उनके संवादोन्मुख लेखों को पढकर कर सोचने लगते हैं, संपादकीय में उनकी चिंता और चिंतन के सहभागी हो उठते हैं।
अपने सुचिंतित, लेखों द्वारा परंपरा, आधुनिकता और समकालीनता-प्रासंगिकता के सम्बन्ध में वे अपनी दृष्टि रखते हैं। सुसम्पादित स्तरीय पत्रिका में साहित्य सम्बन्धी लेखन के लिए वे एक ऐसा स्पेस रचते हैं जो संवाद का वैचारिक वातावरण भी बनाता है। वे इसके लिए प्रयत्नशील है कि सर्जनात्मक साहित्य को बढावा मिले। भाषा-साहित्य की अभिवृद्धि हो।
संवेदना वाली समीक्षा दृष्टि उनके अंकों के माध्यम से स्थान बनाती है, विकसित होती है। वे अपनी पत्रिका के माध्यम से युवा और युवतर पीढी को उत्सुक जागरूक बनाने और जोडने की कोशिश करते हैं।
कवि प्रदीप पर संपादकीय लिखते हुए जो संस्मरण लिखा है, जिस स्मृति संसार में डुबकी लगायी है उसमें हम भी तैरते चले जाते हैं।
मधुमती में प्रकाशित सामग्री और विभिन्न लेख, कविता, कहानियाँ पढकर समझ में आता है कि उनका वास्तविक मोल क्या है। इनमें प्रकाशित रचनाकारों से आशा की ऐसी किरण जागती है जो हिंदी में सर्जनात्मक परिदृश्य को वास्तव में बडा करने में अपने दायित्वों का निर्वाह करेंगे।
इस पत्रिका ने लेखक और कवियों के लिए रचनात्मक प्रदेश को उर्वर बनाया है। इसकी सामग्री नयी स्फूर्ति देती है। प्रस्तुतीकरण सुन्दर है। जिस लगन, निष्ठा सुरुचि और चिन्तनशील सम्पादकीय के साथ ब्रजरतन जोशी पत्रिका निकाल रहे हैं वे साधुवाद के पात्र हैं।