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मोहन आलोक : रेगिस्तान पर उगी अपनत्व की शीतल छाँव

जीवणै रा ज्यूं जतन कर्या
बियूं ईं
बार-बार मर’र, जियां
- मोहन आलोक
कहीं भी, कभी भी राजस्थानी कविता पर जब बात होगी, तो कईं ख्यातिप्राप्त कवियों के साथ-साथ जो एक कवि आफ ज़ेहन अपनी जोरदार उपस्थिति दर्ज कराएँगे, वे हैं मोहन आलोक। गत दिनों राजस्थानी रचनाकार मोहन आलोक का लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया। मोहन आलोक ग-गीत पुस्तक के लिए केंद्रीय साहित्य अकादमी से पुरस्कृत थे। अब तक उनकी लगभग 15 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
मध्यम वर्ग और गरीब तबके की वेदनाओं को सरल शब्दों से राजस्थानी पद्य में व्यक्त करने वाले मोहन आलोक ने अंग्रेजी साहित्य की विद्या लिमरिक का राजस्थानी में डांखळा और पंजाबी में डक्के नाम से पुनर्सृजन किया। वे अपने इस विशिष्ट कार्य के लिए साहित्य रसिकों के मानस पर अमिट छाप छोड गए हैं। इतना ही नहीं, वे रबड की मोहरों से छपने वाली दुनिया की पहली पुस्तक संभावित हम के तीन कवियों में अग्रणी कवि भी थे।

राजस्थानी भाषा में सोनेट और रुबाई लाने का श्रेय भी आलोक को ही जाता है। उन्होंने उमर खय्याम की रुबाईयाँ, धम्मपद, चेखव री कहानियाँ का राजस्थानी में अनुवाद किया। इसके अलवा उन्होंने गुरु गोविंद सिंह और औरंगजेब के ऐतिहासिक लम्बे फारसी पत्र जफरनामा का भी हिंदी में तर्जुमा किया था।
राजस्थानी भाषा को अपने रचनाकर्म से समृद्ध करने वाले मोहन आलोक ने आम आदमी की पीडा को सहज ही अपनी कविताओं में ढाला है, उनकी रचनाओं से ऐसा लगता है जैसे वे आदमी के आर-पार जाकर उसकी अंदरूनी पीडा को पढ लेने में माहिर थे। उनकी ही एक कविता-
घर सूं दफ्तर
अर
दफ्तर सूं घर, जिया
म्हे जिया तौ
फकत औ सफर जिया।
....
खोड खोखरी लियां
कियां-ईं
भूख रै पगां पसर
जिया।
इतनी बारीकी से पीडा का विश्लेषण और इतना ही अपनत्व का अहसास मानो जैसे तपते हुए रेगिस्तान पर स्नेह की बूँदे उग आयी हो। मोहन आलोक रिक्त कर गए है जो स्थान, वह कभी भर भी पाएगा, इसी कामना के साथ मरूभूमि के लाडले कवि को नमन।
- किशनकुमार व्यास
९४६०१०३१००