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जनपक्षधरता की वैचारिकी

अनिल मिश्र
ज्ञानरंजन हिंदी के उन चुनिंदा कथाकारों में हैं जिन्होंने कहानी के व्यापक संसार में एक जिंदादिल, अनोखे और तीक्ष्ण यथार्थ और भाषा का संधान किया है। पहल के ज़रिए उन्होंने समूचे भारत में एक ऐसा पाठक-समूह तैयार किया है जो वैज्ञानिक चेतना से सम्बन्ध होकर आज भी, खामोशी से, कमोबेश एक बेहतर दुनिया की रचना में लगा हुआ है। ज्ञानजी का गद्य जितना बेलौस है, वह उतना ही सार्वभौमिक और एक जरूरी हस्तक्षेप की तरह नमूदार होता है। उनका गद्य न सिर्फ मजबूत जनपक्षधरता की वैचारिकी के नए आयामों को उद्घाटित करता है, बल्कि मनुष्यता के संकट की पहचान करते हुए भीतर से बदलाव का आग्रह करता है। यह वैचारिकी उनकी गहन दृष्टि-संपन्नता, दुनिया भर में नए से नए रचनाकर्म से आत्मीय परिचय और एक सतत गतिशील आजाद खयाल के प्रति गहरी निष्ठा से निर्मित हुई है। सेतु प्रकाशन से उनकी हालिया प्रकाशित किताब उपस्थिति का अर्थ इन ख्यालों की बेहतर तस्दीक करती है।
उपस्थिति का अर्थ लेखक की एक लंबे अरसे के बाद प्रकाशित किताब है। इसके पहले गद्य की उनकी किताब कबाडखाना 2002 में आई थी जो पाठकों और लेखकों के बीच खूब सराही गई थी। उपस्थिति का अर्थ इस मायने में सत्य के एक नए पहलू का उद्घाटन करती है कि यह विभिन्न सम्मान समारोहों और उनके पीछे की राजनीतिक मंशाओं को एक आईना दिखाती है। इसमें भारत के समाज और समय के जो प्रतिबिंब दिखाए गए हैं, वे एक अराजक और आवारा पूँजी द्वारा किए जा रहे विभिन्न तरह के छल-बल और दुरभिसंधियों का पर्दाफाश करते हैं। ज्ञान अपने विश्लेषण में कहानियों के मिजाज, परिवेश और कहन के तरीकों में आ रहे बदलाव के बीच भारत जैसे देश में कहानी के बचे रहने के कारणों की सटीक पडताल करते हैं। उनकी यह प्रस्थापना भी बहस तलब है कि कथित विकसित देशों से परंपरागत कहानी गायब हो चुकी है या पदच्युत हो चुकी है।
प्रस्तुत किताब में अतीत के जो प्रतिबिंब हैं वे ज्ञानरंजन के एक लेखक बनने की प्रकिया की विस्तार से व्याख्या करते हैं। इस लिहाज से किताब में शामिल दूसरा व्याख्यान गौरतलब है जो कि भारतीय भाषा परिषद कोलकाता में दिया गया है। जिसमें वह अपने बनने की बारीकियों और कुछ चर्चित कहानियों जैसे पिता और अनुभव की रचना के कुछ सूत्रों की पडताल करते हुए उनका सजग विवरण देते हैं। साथ ही, आज़ादी के तत्काल बाद गाँधी की हत्या को सिर्फ एक हत्या नहीं मानते बल्कि इसे गाँधीवादी उसूलों से एक राष्ट्र के विचलन का निर्णायक कदम बताते हैं। उन्हीं के शब्दों में, भारतीय स्वतंत्रता के लगभग साथ ही साथ गाँधी की हत्या हुई। यह फासि*म की सुबह का परिचय था। शुरू में ही बताना चाहूँगा कि मैंने गाँधी की हत्या को सदा जीवित रखा, अस्त नहीं होने दिया उसके चित्र को। यह हत्या एक घटना तो थी, पर मात्र घटना नहीं थी। यह एक तयशुदा, सुविचारित अग्रिम सूचना थी भविष्य में गाँधी विचार के विरोध की। इसी श्रृंखला में बाबरी मस्जिद, गुजरात का नरसंहार पचार वर्षों में घटित हुआ।
रोज़-ब-रोज़ के बदलते परिवेश जरूरी नहीं कि वास्तव में किसी ठोस परिवर्तन का आधार बन रहे हों। नई सदी एक ही समय में कई सदियों के समय का गवाह बन रही है। एक तरफ क्रूरता, चमचमाती इमारतों और फ्लाईओवर्स से अटे शहर हैं, तो दूसरी तरफ धूल-धूसरित, लहूलुहान गाँव हैं जो विकास के खोखले दावों के असर के बीच इंसानियत के कत्लगाह बनकर उभर रहे हैं। उपस्थिति का अर्थ इस वृहद संदर्भों में एक सच्चे कलाकार की तडप का सबूत है, जिसने अपनी उम्र का एक अहम और अधिकांश हिस्सा एक बेहतर दुनिया रचने के संघर्ष को जिया है। आपातकाल के दौर से ही पहल पर सत्ता का आक्रमण और ज्ञान जी की सत्ता-संस्थानों से मुठभेड इस संघर्ष की एक मिसाल मात्र है। इन आक्रमणों का जिक्र उन्होंने अपने साक्षात्कार में विस्तार से किया है।
पिछले तीस सालों में वैश्वीकरण, समाज और बाजार के बदलते संबंधों की चर्चा के आलोक में हिंदी कहानी की एक केंद्रीय भूमिका है। हिंदी के साहित्यिक बाजार के बारे में ज्ञानरंजन का आकलन बदलते परिवेश की विशेषताओं से निर्मित हुआ है। वे आम जीवन में बाजार को अनिवार्य मानते हुए भी रचनाकार के लिए बाजार से एक खास तरह की निर्लिप्तता का आग्रह करते हैं। जनसंफ के आधार पर लिखी और प्रकाशित हो रही कहानियों पर वे सवाल पूछते हैं और रचनाकर के लिए समाज में धँसने की जरूरत पर जोर देते हैं।
लघु पत्रिकाओं पर उनका विश्लेषण व्यापक हिंदी समाज को बेचैन करने वाला है। वे हिंदी समाज की प्रगतिशील परंपरा को निखारते हुए उन सभी जडीभूत परंपराओं को कटघरे में खडा करते हैं जो मनुष्य और मनुष्य के बीच संवादहीनता, अलगाव और बिखराव पैदा करती हैं। हिंदी के बौद्धिक संसार में खुद एक अहम पत्रिका का संपादन करते हुए उनके विचार किसी के प्रति तिक्त नहीं हैं। बल्कि, वे आजादी के दिनों से हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं की ऐतिहासिक भूमिका का मूल्यांकन करते हुए आज के दौर में आत्ममंथन की अनिवार्यता पर बल देते हैं।
परसाई के रचनाकर्म पर बात करते हुए ज्ञानरंजन बालसुलभ उल्लास से भर जाते हैं। परसाई को वे साहित्य निर्माता के साथ साथ जीवन निर्माता का भी दर्जा देते हैं। परसाई की रचनाओं में आजाद भारत के बाद बने मिथकों को टूटने के जो विवरण और जो दृष्टियाँ हैं, वे उन्हें आधुनिक युग का महान लेखक बनाती हैं। खुद ज्ञानरंजन के शब्दों में, भारत और तीसरे मुल्कों में बीसवीं सदी की सर्वाधिक भयावह चुनौतियों, सांस्कृतिक आर्थिक साम्राज्यवाद, विस्थापन और सांप्रदायिकता तथा जातीय संघर्ष के बीच सबसे खतरनाक लडाई अपने अंतिम बिंदु पर पहुँच गई है। लडाई में लगभग समर्पण है, क्योंकि उसकी रणनीति अचूक नहीं है। इनमें से कम से कम दो मुद्दे ऐसे हैं जिनकी लडाई परसाई आजीवन लडते रहे हैं। इनमें परसाई की अंतहीन भागीदारी, कारगर भागीदारी थी। परसाई को याद करते हुए ज्ञानरंजन आबिद आलमी का एक शेर याद करते है, यह लम्हा तेरे साथ जो गुज़ारा है/यही वो वक्त का हिस्सा है जो हमारा है। इस शेर के संदर्भ से परसाई और ज्ञानरंजन के बीच के आत्मीयता के रसायन को समझा जा सकता है।
ज्ञानरंजन की कहानियों और पहल की सामाजिक राजनीतिक भूमिका की जितनी चर्चा होती है, उतनी ही उनके लेखन के बंद हो जाने की भी चर्चा होती है। यह अनायास नहीं है कि ज्ञानरंजन ने इस किताब में अपने कहानी लेखन के स्थगित या अवरुद्ध हो जाने की प्रक्रिया पर भी बात की है। उन्हीं के शब्दों में, जब आप सच्चाइयों को स्पष्ट और नंगा देख लेते हैं तो फिर लिखना अवरुद्ध हो सकता है। यथार्थ की यही सीमा है। बस स्मृतियों की बहार में जाइए और सुस्ताइए। यह लेखन नहीं है। मैंने लेखन छोडा। विस्थापन, हिंसा प्रकृति विनाश
े बाद नयी चुनौतियाँ सामने थीं। एक भयानक स्तब्धता, इंतजार और अवसाद था। एक अन्य संदर्भ में उनका यह भी कहना है कि कहानी में या कि जीवन में जानना और सूचित करना पर्याप्त नहीं है। लिखते जाना भी पर्याप्त नहीं है। छपते जाना भी पर्याप्त नहीं है। नए मुहावरे को जन्म देना, त्रासदी के मध्य डूबना-उतराना और लगभग अकेले पड जाना, आवेग, धीरज और श्रम की ताजगी और कम उम्र इसके लिए जरूरी है। और भी बहुतेरी चीजें ज़रूरी हैं। यह लेखक की नई पीढी के लेखकों से संवाद करने की मौलिक तकनीक है। ये दलीलें आने वाले लेखकों को परखने का एक मानक तय करती हैं।
इलाहाबाद जैसे शहर एक ज़माने में साहित्यिक संस्कारों की उर्वर जमीन थे। धीरे धीरे सब छीजता गया। ज्ञानरंजन इस छीजने की प्रक्रिया के विस्तार में जाते हैं और एक मोहब्बत भरी तडप के साथ खुद को निर्मित करने वाले शहर की हलचलों को याद करते हैं। यह याद करना कोई नॉस्टेलजिया नहीं, बल्कि उन संपादकों, लेखकों, कवियों और अन्य लोगों के प्रति एक अदबी सम्मान भी है जिन्होंने ज्ञानरंजन को, नौजवानी के दिनों से ही, एक बेहतरीन इंसान और लेखक के बतौर मुकम्मल तरीके से निखारा है।
उपस्थिति का अर्थ में शामिल व्याख्यान, संस्मरण, वार्ता और साक्षात्कार ज्ञानरंजन के रैडिकल मिज़ाज और समाज को बदलते की तडप को उद्घाटित करते हैं। वैचारिकी पर उनकी पकड का सारांश उनके वक्तव्य के इस शीर्षक में निहित है कि सच्चाई की कानाफूसी नहीं होती। यह किताब न सिर्फ हिंदी के लेखकों के लिए एक जरूरी किताब है, बल्कि वृहत्तर हिंदी समाज के लिए एक अनमोल धरोहर है।

किताब का नाम : उपस्थिति का अर्थ
लेखक : ज्ञानरंजन
प्रकाशक : सेतु प्रकाशन, दिल्ली
प्रकाशन वर्ष : 2020
मूल्य : 200 रुपये

सम्पर्क - सी-59, टैगोर पब्लिक स्कूल के पास, शास्त्री नगर, जयपुर-३०२०१६
मो. ९१६६७९९७००