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उम्मीदों का उजास

वत्सला पाण्डे
ओमा शर्मा मूल रूप से कथाकार हैं। गद्य लेखन पर उनकी गहरी पकड है। वे साधारण से असाधारण की यात्रा करते हैं और अंत में पाठक को सोचने के लिए विवश करते हैं। एक लेखक अपने जीवन से प्राप्त अनुभवों के अधार पर अपनी कलम से माँजता है। ओमा शर्मा ऐसे ही लेखक हैं। वे यथार्थ के बियाबान अँधेरों में से अपनी उम्मीदों, आस्थाओं और मूल्यों को बचाने का हल ढूँढते प्रतीत होते हैं।
आज की कहानी अपने बाहरी और आंतरिक दोनों रूपों में समाज, देश और उनके संदर्भों से युक्त है। हिन्दी कहानी की परंपरा को एक सदी से भी अधिक का समय बीत चुकी है। हर युग की अपनी विचारधारा, समाजिक यथार्थ, संवेदनाएँ, सौन्दर्यबोध, रचनादृष्टि आदि रहे हैं। परंपराओं को तोडने की प्रक्रिया जारी है, क्योंकि आज का युग विज्ञान का युग है। मानवीय मूल्य, नैतिकता, अनैतिकता, वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति के मध्य यौन संबंध, अवसरवादिता, व्यक्तिगत स्वार्थ, ग्लानि, रिक्तता बोध आदि अनेक प्रश्नों के विविध आयामों पर दृष्टि डालता है, समझता है, और समाधान खोजने की कवायद करता है। आज का लेखक हर कसौटी पर खरा उतरना चाहता है।
दुश्मन मेमना की कहानियाँ भी ऐसी ही कसौटी पर स्वयं को कसती हैं। ओमा शर्मा भी परंपराओं के ढाँचे से मुक्त होकर अपनी कहानी रचते हैं या यूं कहें कि कहानी को नदी की भाँति प्रवहमान रखते हुए अनेक घुमावों, भँवर और ऊँचे-नीचे रास्तों से गुजरते हुए पाठक को अपने साथ डुबकियाँ लगवा ही लेते हैं। खरापन और खुरदरापन उनकी कहानियों की विशेषता है। वे भाषा के साथ वे किसी किस्म का खिलवाड नहीं करते। साधारण से लफ्जों में गहराई तक ले जाने का माद्दा उनमें है। वे भाषा की कलात्मकता को नहीं अपितु उसकी अबाध गति को महत्त्व देते हैं।
संग्रह में कुल छह कहानियाँ हैं। सभी कहानियाँ अपने भिन्न कलेवर के साथ हमारे समक्ष एक चित्र की भाँति चलती रहती हैं। कहानियाँ इतनी सहज नहीं हैं कि उन्हें एक बैठक में पढा जा सके। हर कहानी रुकने और सोचने को बाध्य करती है। कई देर तक उसकी फडफडाहट भीतर के सन्नाटों को तरंगित करती है।
एक समय की बात कहानी आज की कहानी है भिक्षावृत्ति में धोखे के समावेश की कहानी है। विश्वास में अविश्वास की कहानी है। किस पर भरोसा करें, किस पर नहीं, एक संशय बना रहता है। कैसे-कैसे तरीके ईजाद हैं, आम आदमी को लूटने के लिए। लेखक ने इंगित किया है -
हमारे आसपास, हमारी नाक के नीचे कितना और कैसा फर्जीवाडा उगता चला आ रहा है...बिना किसी आहट, सुगबुगाहट या चेतावनी के कोई जब चाहे आपको हलाक कर दे और आप सिर्फ समय और व्यवस्था पर रोते-तिलमिलाते रह जायें।
दंगे की आग में क्षत-विक्षत तन मन लिए सडक किनारे पडा युवा सोचता है -
कुछ देर पहले परीक्षा केन्द्र में भारतीय संविधान और उसकी लोकशाही पर सगर्वित टिप्पणी लिख रहा था और अब लग रहा है, कैसा नारकीय समाज है हमारा!
अपने विश्वास के चिथडे अपने हाथों में उठाए संकट में एक भरोसा तलाशता रहा। उस भरोसे के आधार पर ही वह मदद करता जाता है। क्या पता, कभी किसी सच्चे की सहायता हो जाए और वह एक कर्ज से मुक्त हो जाए। एक साधारण पान बीडी का खोखा चलाने वाले की टीन की कोठरी में घोर मानसिक और शारीरिक संकट में आश्रय प्राप्त हुआ था। उस रात का एक भरोसा, उसके जीवन में एक नन्हीं किरण के रूप में अमिट था।
साइकिल पर ही उसने स्टेशन पहुँचाया और दिल्ली तक का टिकट पकडया। दुनियादार हो गया हूँ, मगर उसका कर्ज आज भी महसूस करता हूँ।
दुश्मन मेमना कहानी आज की भयावह त्रासदियों में से एक है। इंटरनेट के इस युग ने बच्चों को उम्र से पहले ही कहीं बडा कर दिया। उम्र से पहले ही अवांछित जानकारियाँ उनके अवचेतन में गहरे पैठती जा रही हैं। देह से पहले ही दिमाग युवा हो गया। उसने क्या दिया? डिप्रेशन, एंग्जाइटी आदि के ब्लेक होल उनमें घर कर गए, जिनसे निकलने-निकालने में माता-पिता बेचारगी से भरे प्रतीत होते हैं।
आज की आधुनिक ज़न्दगी में माता-पिता बच्चों को केवल अच्छा खाना, महँगा और आधुनिक पहनावा, सुविधाएँ आदि देने को ही परवरिश मानते हैं, जबकि वह केवल उनका संग साथ और विश्वास अधिक चाहता है। अपनी आजादी भी उसे प्रिय है, पर भरपूर विश्वास उसे साझा करने का हक भी देता है। ऊहापोह से भरी दिनचर्या में बच्चे अपने अकेलेपन से जूझते नज़र आते हैं। बच्चों को स्वतंत्रता देने के आडम्बर में माँ-बाप अपनी स्वतंत्रता को महत्व अधिक देते प्रतीत होते हैं। वे बालपन और किशोर अवस्था की संधि पर खडे अपने बच्चे के मनोविज्ञान और शारीरिक विज्ञान को समझने की चेष्टा ही नहीं करते या उन्हें फुर्सत नहीं होती या वे तथाकथित समझदारी में ही डूबे रहना पसंद करते हैं। एक मनोवैज्ञानिक के खुलासे पर पिता सोचने को मजबूर हो जाता है।
उनके जाने के बाद मैंने गौर किया कि मेरे आसपास कितना अँधेरा मंडरा चुका था।
उस पल मैंने एक मुलायम छौने का यकायक बिल्ली हो जाना महसूस किया।
लेकिन.... बिल्ली को छौने की मुलायमियत कैसे लौटाई जा सकेगी?
एक परिवार का बिछुडा हुआ सदस्य जब मिलता है, तब तक परिस्थितियाँ काफी बदल चुकी होती हैं। खोए हुए भाई की अधिक उम्र के कारण उसकी स्मृति का खंड-खंड हो जाती है, लेकिन युवावस्था के उन प्रेम पलों में अटकी रह जाती है। शरणागत कहानी ऐसे ही लापता भाई का अर्द्धविक्षिप्त हालत में मिलना और छोटे भाई का उसे अपने घर में शरण देना और अतीत की स्मृतियों में अटकाव व भटकाव की कशमकश है।
कहानी आज के बच्चों के व्यवहार पर भी संकेत करती है। 12 वर्षीय बच्चे को उस विक्षिप्त बुजुर्ग से औपचारिक लगाव तक नहीं। वह समझ ही नहीं पाता है कि इस अवस्था में उसकी कोई अहमियत हो सकती है। उसका बचपन उस बूढे में कुछ स्पंदित कर सकता है। स्वतंत्रता शब्द ने आज के युग में स्वछंदता का रूप लेकर हर वर्ग को अपने पाश में ले लिया है। एक बच्चा भी अपनी भावनाओं से अधिक अपनी मनमानी इच्छाओं को महत्त्वपूर्ण मानता है। मूल्यों का तो उसे पता ही नहीं होता। आज बडों में भी कुछ लोक लिहाज के आवरण में वे बचे खुचे से नज़र आते हैं।
ऐसे बूढे लोगों का अभेद्य सूखापन अक्सर बच्चों के वात्सल्य पगे स्पर्शों और मासूम उत्सुकताओं से पिघल जाता है, मगर मोहन बबली के बारह वर्षीय अमोघ को न तो उनकी बोली बानी समझ आती थी और न कुछ पडी ही थी। उसे माणकचंद से नितांत असहनीय बदबू आती थी।
लेखक ने महानगरों पर एक ही पंक्ति में गहरा कटाक्ष किया है। किस प्रकार चकाचौंध से भरी इन विशाल अट्टालिकाओं के बीच कैक्टस उपज गए हैं। आपसी संबंध स्वार्थ पर आधारित हो गए हैं। संवेदना का स्रोत सूख-सा गया है। वास्तव में यह समयाभाव के साथ साथ हमारे भीतर के भुरभुरेपन को भी अभिव्यक्त करता है।
उनकी अक्सर कंबल ओढकर पडे रहने की आदत वैसे भी किसी को उत्साही उद्यमशील नहीं रहने देती थी। .......ये अहमदाबाद जैसे शहर का मिजाज है जो ऐसे किसी परिजन को अफोर्ड करने दे रहा था। मुंबई के लिए तो यह गुंजाइश नामुमकिन ही नहीं कल्पनातीत भी थी।
आज के समय में विवाहेतर संबंधों पर बहुत लिखा जा चुका है। स्त्री के द्वन्द्व कभी समाप्त नहीं हो पाते। वह केवल टुकडा-टुकडा सुख से ही मन को तृप्त कर पाती है। भार तोल कहानी कुछ अलग हटकर है। यहाँ स्त्री का स्वयं से टकराव अधिक है। विवाह संबंध क्षत-विक्षत अवस्था में एक पोटली बनाकर ढोने मात्र की यात्रा भर हो गया है। एक स्त्री जिस प्रेम और सम्मान के लिए एक जगह से दूसरी जगह रोपी जाती है, वही उसे प्राप्त न हो, तो वह पीडा के अतिरेक में संबंधों के धागे तोड फेंकने को आतुर हो उठती है। उसकी पीडा छलक उठती है।
.... वास्तव में जिसे हम प्यार कहते हैं, उसमें यदि सम्मान का बडा टुकडा शामिल न हो, तो वह बहुत आधा अधूरा या झूठा ही होता है। शायद वो लोग फरिश्ते होते होंगे जो इंसानी कुर्बानियों के रंग में प्यार की शिनाख्त कर सकते हैं। वो आठ बरस, आह! आठ बरस कितने होते हैं? मैंने कैसे काटे, ये मैं ही जानती हूँ।
प्रेम की चाह में वह पहले मन को तृप्त करना चाहती है। फिर देह उस प्रेम का साधन बनती है। मन खाली हो तो देह सुख भी अपरिचित और भयावह-सा रह जाता है। परंतु जब वह अपनी प्यास से लबालब ऐसे ही पुरुष का साथ पा लेती है, तब वह अपने बंध से मुक्त, उस अहसास की लहरों में डूबना उतरना पसंद करती है।
जब आप प्यार में होते हैं, तो अधिक से अधिक या अपना सब कुछ देने की फिराक में रहते हैं, यह मैंने पहली बार महसूस किया। लाख घरेलू पचडों और निजी कुंठाओं के बीच मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि मैं उम्र के दूसरे दौर में इस तरह के भँवर से गुजरूंगी। पहले मुझे अपराध बोध हुआ, फिर पाप बोध, शर्म भी आई, लेकिन उस सबकी आखिरी मंजिल मेरी भीतरी खुशी और संतोष ही थे।
प्रेम में डूबी वह स्त्री एक मोड पर हुए हादसे के कारण अपने बढते कदम यकायक पीछे खींच लेती है। एक प्रेमिका अपने भीतर की माँ से हार जाती है।
कोहरे के बीच कहानी में आज की भागमभाग की गफलतें और उन गफलतों के प्रभाव स्पष्ट होते हैं। हमारा देश न जाने किन अनजानी रिक्तयों के प्रभाव से चल रहा है। कैसे इसका विकास हो पा रहा है, बडा जटिल प्रश्न लगता है। जिसका जवाब किसी के पास हो संभव नहीं लगता। हर ऑफिस अपनी व्यवस्था से पूर्ण और थोथी स्वतंत्रता से लिप्त दिखाई देता है। इसी कारण कहानी के नायक का एफ.आई.आर. लिखवाने पर झगडा हो जाता है। दोनों ही पक्षों की खामियाँ हैं। ओमा शर्मा पूर्ण तटस्थता के साथ अपने हर चरित्र के साथ न्याय करते हैं। सिस्टम में खामियाँ हैं, तो आम आदमी भी दूध का धुला नहीं है।
दूसरा विश्वयुद्ध कहानी संवेदनाओं की परते उतारती अपने अंत तक पहुँचती है। एक वृद्ध जो ऐसे सदमें में अपनी जुबान खो बैठता है जो अंत तक उसके भीतर के ज़ख्मों को सूखने नहीं देता। कैसे उसकी बेजुबानी ही उसकी राजदार रही? कैसे वह उन पीडा के घूँट अकेले ही भरता रहा? अकथनीय है। फिर उसे मिलता है, अपने सामने के घर में रहने वाले लेखक का साथ। उम्र का अंतराल उनके बीच आडे नहीं आता। लेखक के पास अपने विचार हैं, भाषा है, कहने का एक तरीका है, पर उस अबोले वृद्ध के पास है अनुभवों का खजाना, किसी को कष्ट न पहुँचाने वाला, संवेदना और करुणा से भरा मन।
वृद्ध की नीली डायरी के पन्ने देर तक जेहन में फडफडाते रहते हैं। उसकी लाचारी देर तक झिंझोडती है। उसका अबोलापन टीसता है। पत्नी की हत्या का राज उस टीस के साथ पाठक को भी उतना ही कचोटता है। अपनी पुत्री का दर्द शावक की भाँति उसमें सिमटा रहता है। अपनी पुत्रवधू की संवेदनहीनता को वह दूसरे विश्वयुद्ध के फलक पर तलाशता है। वह बुराई के अनेक रूपों को इतनी नजदीकी से देख चुका है कि उसके स्रोत पर दृष्टि डालता है।
इस बुराई का स्रोत क्या है? ......जब करुणा मर जाती है...दूसरों के प्रति जब हमारे भीतर करुणा का भाव नहीं रह जाता है... तब बुराई पनपने लगती है, जो बाद में जघन्य रूप भी ले लेती है।
अपनी पत्नी की हत्या रूपी मृत्यु से आहत वह चारों ओर जब देखता है, तब उसे उसी विश्वयुद्ध का तांडव नज़र आता है। अंतिम समय में पत्र के माध्यम से वृद्ध मुखर होता है। अपनी सारी पीडा, अपने झूठ सच सब खाली कर देना चाहता है, भीतर से। प्रत्येक स्थिति से मुक्त होकर आगे की यात्रा करने के लिए। लेकिन पीडा पगे अंतिम वाक्य हमें सोचने को मजबूर करते हैं कि समाज की दिशा क्या है?
बूढे, कमजोर और निरुपायों के प्रति बेवजह क्रूरता और दुष्टता कहाँ कम हुई है? .......दूसरा विश्व युद्ध अभी खत्म कहाँ हुआ है? घर, समाज और पूरे मुल्क में उसका तांडव नयी नयी शक्लों में चलता तो चल रहा है।

लेखक की कहानियों की विशेषता यह है कि हर कहानी किसी बडे हादसे, बडी घटनाओं के उदाहरण लिए है। जिनसे उसके पात्र अपने जीवन में सीख लेते हैं, पर उनकी नकारात्मकता को जीवन में जगह नहीं देते। उनसे कुछ ऐसी सकारात्मक ऊर्जा लेते हैं कि पाठक उन इतिहास के स्याह धब्बों को भी सबक के रूप में देखने लगता है। उस भयावहता में अपने जीवन के ऐसे निर्णय लेता है जो मानवीय मूल्यों से ओतप्रेत होते हैं।
आने वाले समय में ओमा शर्मा की कहानी यात्रा में हमें और भी अधिक संवेदनशील कहानियाँ पढने को मिलेंगी।
पुस्तक का नाम : दुश्मन मेमना
लेखक : ओमा शर्मा
प्रकाशक : आधार प्रकाशन प्रा.लि.
प्रकाशन वर्ष : 2020
मूल्य : 180/-

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सम्पर्क - 1-सी-4, पवनपुरी,
बीकानेर 334003