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अस्तित्व और व्यक्तित्व के अँधेरों की पडताल

रिज़वानुल हक
हिन्दी में सआदत हसन मण्टो, इस्मत चुगताई, राजेन्द्र सिंह बेदी, कृष्ण चन्दर वगैरा के अफसाने तकरीबन उसी तरह मकबूल हैं जैसे वह अपनी ज़ुबान उर्दू में मकबूल हैं, उसके बाद इन्तजार हुसैन, कुर्तुलऐन हैदर और शम्सुर्रहमान फारूकी से भी आम तौर पर हिन्दी साहित्य का पाठक अच्छी तरह से वाकिफ है। लेकिन अगर उनसे इक्कीसवीं सदी की उर्दू की बेहतरीन कहानियों के बारे में पूछा जाए, तो शायद वह न बता सकें कि आज उर्दू के बेहतरीन कहानीकार कौन हैं? हालांकि ये कहना हमेशा मुश्किल होता है कि समकालीन कहानीकारो में कौन-सा कहानीकार सबसे अच्छी कहानियाँ लिख रहा है? या एक नहीं तीन-चार कौन से ऐसे कहानीकार हैं जो आज की कहानी का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर कोशिश करके इस सवाल का जवाब दे भी दिया जाए, तो वह लेख विवादित भी हो जाता है। आपने एक या कुछ कहानीकारों को किस बुनियाद पर इतना उठा दिया, तो बाकी क्या घास छीलते हैं? इसलिए लोग अक्सर इस सवाल पर इधर-उधर कतरा के निकल जाते हैं। लेकिन मेरा ख्याल अगर आप गम्भीर आलोचना के पक्षधर हैं, तो इस सवाल से आपको गुजरना ही पडेगा और इसका जवाब देना जरूरी भी है। इसके बगैर आलोचना में बात बनती नहीं है। हर कोई आप से संतुष्ट हो जरूरी नहीं है, और दूसरे को भी यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने प्रतिमान खुद खडे करे।
यह बात सही है कि कैलेन्डर बदलने से साहित्य में भी कुछ ऐसा बदल जाए कि उस जमाने की अलग पहचान बन जाए जरूरी नहीं है, लेकिन अब इक्कीसवीं सदी शुरू हुए दो दहाइयाँ गुजर चुकी हैं और दो दहाइयों में आमतौर पर एक नस्ल भी बदल जाती है। इसलिए अब वह वक्त आ गया है, जब हमें मुड कर देखने की ज़रूरत होती है कि अभी कहानी में वही नाम गूँज रहे हैं या नयी नस्ल भी वजूद में आ चुकी है? और अब इस वक्त उर्दू के बेहतरीन कहानीकार कौन हैं? इक्कीसवीं सदी में या इससे थोडा पहले छपने वाले उर्दू के कुछ मुख्य कहानीकार और उनके कहानी संग्रह इस प्रकार हैं। सैय्द मोहम्मद अशरफ के दो कहानी संग्रह डार से बिछडे, (1994) और बादे सबा का इन्तज़ार, (2000) छप चुके हैं। नैयर मसूद के यूँ तो चार कहानी संग्रह हैं, लेकिन इक्कीसवीं सदी या उसके आस पास के समय में जो कहानी संग्रह छपे उनमें ताऊस चमन की मैना (1998) और गंजफा, (2008) महत्त्वपूर्ण हैं। शम्सुर्रहमान फारूकी का कहानी संग्रह सवार और दूसरी कहानियाँ, (2001) छपा, सिद्दीक आलम के तीन कहानी संग्रह लैम्प जलाने वाले, (2008) बैन’ (2012) और मरे हुए आदमी की लालटेन, (2019) वगैरा छपे। खालिद जावेद के तीन कहानी संग्रह बुरे मौसम में, आखिरी दावत (2007) और तीन कहानियाँ (2020) समकालीन उर्दू कहानी के महत्त्वपूर्ण कहानी संग्रह हैं। ज़ाहिर है इसके अलावा भी सैकडों कहानी संगह इन सालों में उर्दू में छपे हैं। लेकिन उनको मैं इन कहानी संग्रहों के मुकाबले में नहीं रख सकता। इन्तज़ार हुसैन और कुर्तल ऐन हैदर को मैं इस तुलना से इसलिए अलग रख रहा हूँ, हालांकि वह इक्कीसवीं सदी में भी काफी समय तक जीवित थे, लेकिन उनकी वह महत्त्वपूर्ण कहानियाँ जिनसे उनकी पहचान थी, इक्कीसवीं सदी से काफी पहले छप चुकी थीं।
पिछले लगभग बीस सालों से खालिद जावेद उर्दू कहानी के केन्द्र में बने हुए हैं। हिन्दी में बुरे मौसम में कहानी संग्रह पहले ही छप चुका है, इसके अलावा उनका उपन्यास मौत की किताब भी काफी पहले छप चुका है, अब उनकी कहानियों का एक और संग्रह आखिरी दावत और अन्य कहानियाँ हिन्दी में छपा है, यह संग्रह हिन्दी में फिक्शन की उनकी तीसरी किताब और दूसरा कहानी संग्रह है। लेकिन इस हिन्दी कहानी संग्रह में उनके तीनों उर्दू कहानी संग्रहों से चयनित कहानियाँ हैं। मेरा ख्याल है आखिरी दावत और अन्य कहानियाँ उर्दू में अब तक इक्कीसवीं सदी का सबसे अच्छा कहानी संग्रह है। इस समय उर्दू में जो दूसरे अच्छे कहानी संग्रह छपे हैं, मैं उन संग्रहों पर इसको अव्वलियत देता हूँ। इसकी वजह इन कहानियों का कथ्य भी है और अन्दाज़े बयाँ भी।
जैसा कि मैंने ऊपर कहा है आखिरी दावत और अन्य कहानियों को मैं अब तक का इक्कीसवी सदी का सबसे अच्छा कहानी संग्रह मानता हूँ। तो इसके कईं कारण हैं, जिसकी वजह से मैंने इसे इक्कीसवीं सदी का उर्दू का सबसे अच्छा कहानी संग्रह कहा है। अपनी इस बात को साबित करने के लिए मैं इस वक्त दूसरे प्रमुख कहानीकारों और उनके कहानी संग्रहों से इसका तुलनात्मक अध्ययन पेश करना चाहूँगा। फिर इसके बाद खालिद जावेद की कहानियों को थोडा और गहराई में जाकर समझने की कोशिश करूँगा।
नैयर मसूद (1936-2017) का एक कहानी संग्रह ताऊस चमन की मैना छपा था, जिस पर उन्हें साहित्य अकादमी और सरस्वती सम्मान दोनों मिले थे। यह कहानी संग्रह न सिर्फ उनका बेहतरीन कहानी संग्रह था, बल्कि उर्दू साहित्य की तारीख का एक यादगार कहानी संग्रह था। इसके रहते मैं आखिरी दावत और अन्य कहानियों को इक्कीसवीं सदी का बेहतरीन कहानी संग्रह नहीं कह सकता था। लेकिन यह कहानी संग्रह 1998 में ही छप चुका था, इसके कुछ समय बाद उनको फालिज का अटैक हुआ, जिसके बाद वह अंतिम साँस तक लगभग बेड पर ही रहे। ऐसा नहीं हैं कि फालिज अटैक के बाद उन्होंने लिखना-पढना बिलकुल बन्द कर दिया हो। इक्कीसवीं सदी में उनका एक कहानी संग्रह गंजफा छपा है, जिसकी *यादातर कहानियाँ फालिज अटैक के बाद की ही हैं। लेकिन गंजफा में नैयर मसूद का वह जादू न जग सका, जिसके लिए वह जाने जाते हैं। इस कहानी संग्रह में न वह धुँधलके और रहस्य हैं, न वह किरदार निगारी है, और न वह छोटी-छोटी और अनोखी डिटेलिंग है जो नैयर मसूद के पहले के संग्रहों में, खास तौर से ताऊस चमन की मैना में थी। ताऊस चमन की मैना की कहानियों की एक खास बात यह भी थी कि उसमें उन्होंने यूँ तो बजाहिर लखनऊ की संस्कृति को दिखाया था, लेकिन वह लखनऊ का साक्षात यथार्थ न था, उसमें उन्होंने अपनी कल्पनाशीलता के जरिए एक समानान्तर दुनिया भी रची थी। ऐसे में गंजफा नैयर मसूद का तुलनात्मक रूप से थोडा कमजोर कहानी संग्रह साबित हुआ हालांकि नैयर मसूद की कई विशेषताएँ इस संग्रह में भी मौजूद थीं। लेकिन गंजफा की कहानियाँ न ताऊस चमन की मैना तक पहुँच सकीं और न इक्कीसवीं सदी की खालिद जावेद की कहानियाँ से मुकाबला कर सकतीं हैं।
जहाँ तक सवाल शम्सुर्रहमान फारूकी (1935-2020) के कहानी संग्रह सवार और दूसरी कहानियाँ का सवाल है, तो यह कहानी संग्रह 2001 में छपा जरूर था, लेकिन इसकी सारी कहानियाँ मार्च 2000 (आखिरी कहानी आफताबे-ज़मीं) तक छप चुकी थीं। अगर इसे इक्कीसवीं सदी का कहानी संग्रह मान भी लिया जाए, तो भी इन सभी कहानियों का एक खास पसमन्जर और मकसद था, यह सारी कहानियाँ उर्दू की भूली हुई तहजीब, खास तौर से उर्दू शाइरी की तहज़ीब को एक बार फिर स्थापित करती हैं। अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं सदी की संस्कृति को पुर्नस्थापित करना इन कहानियों का मुख्य उद्देश्य था। साथ ही एक गैर मामूली और बहुत दिलचस्प बयानिया की रचना करना भी इनका बहुत बडा कारनामा है। यह बयानिया लगभग आविष्कार की हद तक नया है। ऐसा खूबसूरत बयानिया ज़ाहिर है कोई दूसरा न लिख सका। उनको पढ कर लगता है जैसे कोई अट्ठारवी या उन्नीसवीं सदी का लेखक यह कहानियाँ लिख रहा हो। इन तमाम खूबियों के बावजूद कहानी के अपने बुनियादी तकाजे होते हैं, अगर कहानी अपने समय से संवाद न स्थापित करे, इन्सानी अस्तित्व की गहराइयों में न झाँके, और इन्सान के अन्दरूनी खानों की हलचलों को आवाज न दे, तो कहीं न कहीं कहानियों की सार्थकता पर सवाल उठाए जा सकते हैं? इन तकाजों को ध्यान में रखकर अगर सवार और दूसरी कहानियाँ का जायज़ा लिया जाए, तो जी कडा करके कहना पडेगा कि खालिद जावेद की कहानियों की प्रासंगिकता कहीं *यादा है। इस कहानी संग्रह के बाद उनके दो उपन्यास छपे और उनकी बहुत तारीफ हुई, लेकिन लम्बे समय तक उन्होंने कोई कहानी न लिखी। 2020 में एक बार फिर शम्सुर्ररहमान फारूकी ने एक लम्बी कहानी फानी बाकी लिखी, इसमें शम्सुर्रहमान फारूकी का फन अपने उरूज पर था, लेकिन इससे पहले कि उनका कोई कहानी संग्रह इक्कीसवी सदी में छपता, जो शायद खालिद जावेद कहानियों से भी बेहतर हो सकता था, पर वह दिसम्बर 2020 में कोरोना से हार गए। कुदरत को शायद कुछ और ही मंज़ूर था।
सैय्द मोहम्मद अशरफ के दोनों कहानी संग्रह बीसवीं सदी के आखिर तक छप चुके थे और इक्कीसवीं सदी में अब तक उनका कोई कहानी संग्रह नहीं छपा है। इक्कीसवीं सदी में उनकी गिनी चुनी कहानियाँ छपी हैं, शायद अब तक सिर्फ तीन चार कहानियाँ ही उन्होंने लिखी हैं। और वह भी पहले की कहानियों से काफी कमज़ोर कहानियाँ हैं। बीसवीं सदी के आखिर तक उनकी जो कहाहिनयाँ छपी थीं, वह अगर इक्कीसवी सदी में छपी होतीं, तो उनके रहते मैं इतनी आसानी से खालिद जावेद की कहानियों को उनसे बेहतर न कह सकता। लेकिन इक्कीसवी सदी में उनका कोई कहानी संग्रह छपा ही नहीं। इसलिए इक्कीसवीं सदी में खालिद जावेद सैयद मोहम्मद अशरफ से बेहतर कहानीकार हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं होना चाहिए।
अगर उर्दू में इस वक्त कहानी लिखने वाले दो बेहतरीन कहानीकारों का चयन करना हो, तो मुझे इस चयन में कोई खास दिक्कत नहीं होगी। वह दो कहानीकार खालिद जावेद और सिद्दीक आलम ही होंगे। इस वक्त फिक्शन में जो सच पूछो, तो खालिद जावेद का अस्ली मुकबला सिद्दीक आलम से ही है। अजीब इत्तेफाक है कि दोनों ने लिखना भी लगभग एक साथ लिखना शुरू किया था, यानी 1990 की दहाई की शुरूआत में। जब इक्कीसवीं सदी का आगाज़ हुआ था, तक तक इन दोनों की कुछ कहानियों ने पूरी उर्दू दुनिया का ध्यान अपनी तरफ खींचा था। दोनों बुनियादी तौर पर एक ही तरह के कहानीकार हैं। खालिद जावेद का कहानी संग्रह आखिरी दावत 2007 में छप चुका था। इसके बाद उनकी दो कहानियाँ ताश के पत्तों का अजायब घर और नींद के खिलाफ एक बयानिया छपीं। इसके बाद 2011 में खालिद जावेद ने एक उपन्यास मौत की किताब लिखा, जिसके बाद पिछले दस सालों में उन्होंने सिर्फ एक कहानी ज़न्दों के लिए एक ताज़यतनामा लिखी है। इस तरह अगर देखा जाए तो इक्कीसवी सदी की पहली दहाई में खालिद जावेद सिद्दीक आलम से बेहतर कहानीकार नजर आते हैं। वहीं इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई में सिद्दीक आलम के दो कहानी संग्रह बैन और मरे हुए आदमी की लालटेन छप चुके हैं। जिनके मुकाबले में खालिद जावेद की सिर्फ एक कहानी है। ऐसे में सिद्दीक आलम इक्कीसवी सदी की दूसरी दहाई में खालिद जावेद से यकीनन बेहतर कहानीकार के तौर पर उभरे हैं। इधर खालिद जावेद ने अपना सारा ध्यान उपन्यासों पर केन्द्रित कर रखा है, 2011 से उनके तीन उपन्यास छप चुके हैं। लेकिन कुल मिला कर खालिद जावेद का कहानी संग्रह आखिरी दावत को मैं इक्कीसवीं सदी में अब तक उर्दू का बेहतरीन कहानी संग्रह मानता हूँ।
हिन्दी में खालिद जावेद का कहानी संग्रह आखिरी दावत और अन्य कहानियाँ अभी हाल ही में छपा है। जिसे उदयन वाजपेयी ने सम्पादित किया है। सिद्वीक आलम का कहानी संग्रह भी हिन्दी में रज़ा फाउन्डेशन से ही बहुत जल्द छपने वाला है। कई मामलों में दोनों एक ही तरह के लेखक हैं, लेकिन खालिद जावेद में कुछ ऐसी खूबियाँ हैं जो किसी भी दूसरे लेखक में नहीं हैं। खालिद जावेद की कहानियों की पहली खूबी जो उन्हें सिद्दीक आलम से अलग भी करती है और बडा भी बनाती है, वह इन कहानियों का रावी यानी किस्सा गो है। खालिद जावेद की कहानियों की एक बहुत बडी विशेषता उनका बयानिया यानी आख्यान भी है। इन कहानियों का रावी कई बार गैर इन्सानी अस्तित्व है। मिसाल के तौर पर तफरीह की एक दोपहर का रावी एक भूत है, जिसमें वह कहता है,
भूत दरअस्ल वह दिमाग है, जो दौरान ए मौत पागल हो गया है। मौत की तकलीफ को हर दिमाग बर्दाश्त नहीं कर सकता। मौत तफरीह से एक दम खाली है। एक किस्म की अन्तहीन हैरत है और उस वक्त क्या कहना कि जब मौत की सूरते हाल और उसके कारण भी शिद्दत से दिमाग को हैरत में डाल देने वाले हों। (पृष्ठ संख्या 6)
इसी तरह शोकगीत गाने वाला कहानी एक जूता सुनाता है।
मैं तो खैर एक ऐसा जूता हूँ, जो तारीखी एतबार से बहुत बाद की पैदावार है। उस जमाने की जब फैक्ट्रियों में मशीनों के जरिए बहुत तादाद में जूते तैयार किये जाने लगे थे। मगर फिर भी मुझे हमेशा इस बात का शिद्दत से एहसास रहा कि मेरा अस्ल खालिक तो मोची है। उसके हाथ में पहुँचते ही मैं एक रूहानी कैफियत से सरशार हो जाता हूँ। मैंने मोची के भद्दे और खुरदरे हाथों को उस वक्त भी चूमने की कोशिश की है जब वह मेरे तले म छोटी-छोटी कीलें ठोंकता है या मोटे सूये से मेरे अन्दर टाँके लगाता है। जब वह मुझ पर पालिश करता है तो उसके मेहनत भरे मगर महरूम हाथों के लम्स से मेरी जिल्द ही नहीं, रूह में भी उजाला फैल जाता है। (पृष्ठ संख्या 72)
खालिद जावेद अपने अनूठे बयानिया की वजह से बहुत दूर से पहचान लिए जाते हैं। उनकी संवेदन शीलता, चाहे वह जूता ही क्यों न बयान कर रहे हो, उसमे इतनी सघनता होती है और वह जिन्दगी के हर कोने खुदरे में पहुँच जाते हैं। चीज़ों को इससे पहले शायद ही कोई इस तरह से देख पाया हो। ताश के पत्तों का अजायबघर एक बुज़ुर्ग शख्स और मौत के दरम्यान डायलॉग पर आधारित है। जलते हुए जंगल की रोशनी में जिस्म के दाएं व बाएं हिस्से और इतिहास व भूगोल के संघर्ष पर आधारित है। अलग-अलग तरह के रावी का इस्तेमाल करके खालिद जावेद ने न सिर्फ नयी- नयी तकनीकों का इस्तेमाल किया है, बल्कि उन्होंने इन सबसे अस्ल काम यह लिया है कि जिन्दगी के उन कोनों खुदरों को भी दिखा दिया हैं, जिन्हें हम ज़ंदगी में आम तौर पर महरूम रह जाते हैं। और अगर नज़र भी आ जाएँ तो उन्हें तुच्छ समझ कर अक्सर नज़र अन्दाज़ कर देते हैं। लेकिन उनका हमारी जिन्दगी पर गहरा असर पडता हैं। ये नयी तरह के रावी जिन्दगी को देखने का बिलकुल नया कोण प्रदान करते हैं। और एक तरह के प्रति संसार की रचना करते हैं जो हमारी इस जानी पहचानी दुनिया से अलग भी नहीं है और उसकी नक्ल भी नहीं है। इन कहानियों में आबाद दुनिया बडी ही रचनात्मक हो जाती है।
खालिद जावेद ने अपने किस्सा गो के चयन से ही एक बिलकुल नए तरह का जादुई यथार्थ पैदा कर दिया है, यानी वह बुनियादी तौर पर तो मिलान कुन्डेरा की तरह के कहानीकार हैं, लेकिन वह लैटिन अमरीकी कहानी कारों की करिश्माती दुनिया भी रच देते हैं।
खालिद जावेद की कहानियों की दूसरी खूबी या पहली खूबी का इसे विस्तार भी कह सकते हैं वह उनका बयानिया है, जो न सिर्फ कहानी के पूरे इतिहास में सबसे अलग है, बल्कि इसके ज़रिए वह उन अँधेरों तक पहुँचते हैं जहाँ कहानी अब तक कभी नहीं गयी थी। वह ज़ुबान और बयानिया में ऐसी महारत रखते हैं कि वह उन अँधेरी दुनियाओं तक को बयान कर देते हैं, जो हमारी चेतना का हिस्सा नहीं होती, लेकिन अवचेतन से अपने होने का एहसास दिलाती रहती है। वह अक्सर ऐसी सूरते हाल में हम ले जाते हैं, जिसके बारे मे ंहम जानते होते हैं कि ऐसा भी हो सकता है, लेकिन हमने वह हालात कभी देखे या सुने नहीं होते हैं। वह कहानियों में वीभत्स रस की इस तरह रचना करते हैं कि कमजोर दिल वाले के लिए यह परिस्थितियाँ नाकाबिले बरदाश्त हो सकती हैं। खास बात ये होती है कि रावी इन हालात में भी बिलकुल तटस्थ बना रहता है और उसमें सतही ज*बातियत बिलकुल नज़र नहीं आती है। खालिद जावेद की भाषा बहुत सादी हैं, लेकिन उनका बयानिया बहुत पेचीदा है। यह पेचीदा एक सीधी रेखा में नहीं चलता, बल्कि केकडे की तरह दाएँ बाएँ और किसी हद तक ऊपर नीचे तक देखते और बयान करते हुए चलता है।
वह रिवायती किस्सा गोई के तमाम टूल्स का इस्तेमाल करते हुए कहानी को दिलचस्प बनाए रखने में तो कामयाब हैं ही, लेकिन अस्तित्व और व्यक्तित्व के उन अँधेरों तक भी ले जाते हैं, जिनसे हम अक्सर अपरिचित ही रह जाते है। वह अस्तित्तव की सच्चाइयों और इन्सान के उस कमीनेपन को भी दिखा देते हैं, जो हम सबके अवचेतन में भरा है। लेकिन सामने नहीं आता है। संवेदना की यह एक नई सतह है, उस स्थिति में वह तमाम इन्सानियत से संवाद करते नजर आते हैं।
खालिद जावेद दर्शनशास्त्र के स्कालर भी रहे हैं, और इस तथ्य को वह बहुत अच्छे से जानते हैं कि दर्शन का कहानी में कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है? इसलिए दर्शन की एक बारीक पर्त उनकी अक्सर कहानियों में छुपी रहती है। साथ ही यह बात भी वह बहुत अच्छे से जानते हैं कि दर्शन की यह पर्त अगर सतह पर आ गयी या कहानी पर हावी हो गयी, तो कहानी तबाह भी हो सकती है। यह दर्शन उनकी कहानियों में उसी तरह होता है जैसे इन्सान के जिस्म में हड्डियाँ, जो ऊपर से नजर तो नहीं आती हैं, लेकिन जिस्म को आकार वही प्रदान करती हैं। यही हाल इनकी कहानियों में दर्शन का होता है। इन कहानियों में छिपे दर्शन को आप न भी समझें, तो भी कहानी की ऊपरी सतह अपनी तमाम किस्सागोई के साथ नज़र आती है। यह एक बहुत महीन रेखा होती है, जहाँ से थोडा बाएँ जाने पर दर्शन हावी हो सकता है और कहानी की कला अपना सौन्दर्य खो सकती है। और अगर उसके विपरीत कहानी उस महीन रेखा से थोडा दाहिने चली जाए, तो उसका सतही पन नजर आने लगता है। खालिद जावेद पिछले लगभग पच्चीस सालों से ये संतुलन बनाए हुए हैं, यह वह कला है जिसमें उनका कोई सानी नहीं है और वह अपने तमाम समकालीनों से अलग नज़र आते हैं।
खालिद जावेद के अक्सर किरदार निचले या दरमियानी तबके के हैं, और इस वर्ग के किरदार अपनी तमामतर रंगा रंगी, अपने तीखे तेवर और हिंसा के साथ जीते और संघर्ष करते नजर आते हैं। यह कहानियाँ हमारे समय की हैं और हमारे समय से संवाद भी करती हैं, लेकिन वह समय से परे भी जाती हैं, आगे पीछे भी देखती हैं, और सबसे बडी बात यह है कि इनमें जिन्दगी का कार्टून भी नजर आता है, यानी वह सिर्फ अपने समय को ही रेखांकित नहीं करती हैं, बल्कि यह समय जिन मूल्यों पर आधारित है उनको चैलेन्ज भी करती हैं।
अगर इन कहानियों को संजीदगी से पढा जाए, तो यह कहानियाँ मन्टो, बेदी से लेकर इन्तजार हुसैन और शम्सुर्रहमान फारूकी की परम्परा में उनसे किसी भी तरह कमजोर नहीं हैं, बल्कि उन कहानियों को विस्तार देती नजर आती हैं। यह कहानियाँ बहुत संजीदगी से लिखी गयी हैं और उसी संजीदगी से पढने का तकाजा करती हैं। इन्हें आप रास्ते में या चलते फिरते में नहीं पढ सकते हैं, बल्कि एक एक वाक्य पर ठहर कर इन्हें पढना पडेगा। आखिरी दावत और अन्य कहानियाँ की यह नौ कहानियाँ आज की उर्दू कहानी की भर पूर नुमाइन्दगी करती हैं, इनमें से एक भी कहानी ऐसी नहीं है कि जिसे पढ कर आफ तजुर्बे और चेतना में इज़ाफा न हो।
पुस्तक का नाम : आखिरी दावत और अन्य कहानियाँ
लेखक का नाम : खालिद जावेद
प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर
प्रकाशन वर्ष : 2021
मूल्य : 300/-

सम्पर्क - बी-1/14 द्वितीय तल,
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