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राजेश कुमार व्यास की कविताएँ

राजेश कुमार व्यास
पाषाण छन्द
गुफाओं में
बिखरे हैं-
पाषाण उकेरे छन्द यहीं
बहता है सोता
भीगता है मन
जड को करते जीवंत।
राग-रंग-रस
चकित मन
सुनता है यहाँ
पत्थरों का गान
पर्वत की तलहटी में-
बसा है
राग-रंग-रस।
अथ है
दीठ का
अथ है-
शिल्प का
मधुर भव
पत्थरों को देखते
उगते हैं पंख

पदचाप

पत्थर जगाते हैं प्यास
देखने की।
छैनी, हथौडे के नाद में
सुनाई पडती है-
बीते युग की पदचाप।

शिल्प धुन

खोह दर खोह
थकते नहीं पाँव
तलाशते हैं,
अपना ही गुम आपा।
सधी मूरतों की
परिचित-अपरिचित छवियाँ
सुनता हूँ शिल्प धुन
जाते हुए-
उस पथ,
जहाँ-
पुराण कथाओं, मिथकों में
जीवंत होते हैं बीते क्षण।




पत्थर-प्रीत

पर्वत के
आकार-प्रकार में
यहीं समाए हैं-
अनगिनत आकाश
सूनेपन में
पत्थर से कराता प्रीत


और देखने की चाह

घडी भर ठहर
उड जाएगा
दीठ का आँचल!
गुफा के भीतर
प्रगटता रूप का अचंभा
जहाँ तक जाती आँख -
उजली तरंगों पर बैठ
चली आती-
और देखने की चाह।


कैलाश धाम

मृत्यु से डर
वेदों में घुस
छंदाच्छादित हुए थे कभी देव।
पर-
मृत्यु का कहाँ कोई छोर!
और तब-
ऊँकार में प्रवेश कर
अमर हुए देव।
इसी को दोहराते
शिल्पियों ने कैलाश में
गाया पहला प्रणव गीत
और शिव होते सिरजा
पत्थरों का छंद।
नहीं मरते शिल्पी ं
वे अपने सिरजे में
अमर हो-
बसते हैं-
धरती के कैलाश धाम में

क्षणभंगुर समय

नहीं
कोई कथा नहीं
व्यथा भी नहीं
धूसरित ब्योरों में
पाषाण उकेरा शिल्प
रचता है-
क्षणभंगुर समय।

आँख भर उमंग

स्मृतियाँ संजोती है-
यादों का घर।
पर्वतों से बह चली आती नदी,
झूमते पेडों संग
हवाएँ सुनाए-
जंगल का राग,
धोरों की रेत में बरसता
चाँदनी का हेत।
पंख खोल उडता मन
सुने-
देखा-अदेखा
जीवन संगीत।
हर बार-
यात्रा ही देती है-
आँख भर उमंग।

भोर

भोर!
जैसे तेरी याद का
अटका हुआ कोई छोर
जब-जब
जागा नींद से
तब तब सुनी
पायल की झंकार
पाया-
एकाकी निर्वाण।

लहर-लहर

आँख से
झरा नहीं,
बहा जल
लहर-लहर
सागर-
तेरी याद।

हिलोर

शाम की चुप्पी में
गा उठता है
मन बसा जंगल
दबे पाँव
आगे बढती है
-थमी हुई नदी।
पक्षियों की सी चहचहाट में
उमगती है-
तेरी याद की हिलोर।

***

सम्पर्क - शंकर विहार-ई, 28-ए
सिद्धार्थ नगर, जयपुर -302017
मो. 9829102862