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नरेन्द्र पुण्डरीक की कविताएँ

नरेन्द्र पुण्डरीक
दाँत पहले उगते हैं और पहले
गिर कर हमारी
सूरत को खराब कर देते हैं
दाढ बाद में निकलती हैं और
मरने के बाद तक टिकी रहती हैं,

दाँत केवल काटतें भर हैं, लेकिन
दाढ को हमारे कौर को
पचाने की चिन्ता रहती है
दाँत आप से आप
सामनें आ खडे होते हैं और
दाँढे बहुत कोशिश के बाद सामनें आती हैं
दाँत किट किटाते हैं
दाँढे चुप रह कर इन्तजार करती हैं
अपने नीचे आने का ,

दाँतों की इस मजबूत चौखट के भीतर तो
और भी अजब -गजब है
बाहर से रंगा पुता सत्यवादी मन
कमाल का चोर होता है जो
कभी बाहर हँसता है
भीतर बिलखता है और
कभी बाहर बिलखता है
भीतर हँसता है,


टूटे हुए दाँतों के लिए
चुहिया का बिल
सुन कर हँसी आती है
पिता अपने दाँतों को
चुहिया के बिल में न डाल कर
एक काली डिबिया में
बडे सुभीते से रखते थे
लम्बे काले
कत्थे चूने से सन
पक्के रंग के,

पिता मरे तो माँ को
उनके दाँतों की चिन्ता हुई कि
पिता चले गए और
उनके दाँत अभी धरे हैं ,

बुध्द के दाँत लंका में हैं
जापान में है या चीन में
या सारनाथ में धरे हैं
मुझ नहीं मालूम ,

माँ को मालूम था कि मैं
पिता के दाँतों से बहुत डरता था
चूंकि वह पीसने का काम दाढों से नहीं
दाँतों से करते थ सो
माँ ने मुझे बुला कर कहा
काली डिबिया में रखे
पिता के दाँत, तुम्हें मालूम हैं

मैं चुप रहा चूंकि मैं
इधर कुछ दिनों से
पिता के दबंग मन से
प्यार करने लगा था और
लगा था कि
दुनिया के हर पिता को
मेरे पिता जैसा होना चाहिए।


2. किसान खाली हाथ घर नहीं लौटते

किसान घर नहीं लौट रहे हैं
घर नहीं लौट रहे हैं किसान
खाली हाथ
नहीं लौटते किसान,

घर लौटते हुए उनकी
दाईं - बाईं जेब में
पडा होता है कुछ न कुछ
कभी झरबेरी के बेर
कभी सरपतें और
घर लौटतें हुए
हाथों में होता है
कुछ न कुछ साग- पात
किसान खाली हाथ
घर नहीं लौटते ,

खाली हाथ
आँखें नहीं मिलाती
आँखों से आँख,
खाली हाथ
हाथ जैसे
नहीं लगते हाथ,

खाली हाथ
पाँव जैसे नहीं लगते पाँव और
नहीं उठतें पाँव
पाँव जैसे,

किसान खाली हाथ
घर नहीं लौटते
अभी हल्क
ताप रहा है आग और
जबरा भौंक रहा है
सडकों में दौडता हुआ
किसान अभी
घर नहीं लौट रहें हैं ।

***

सम्पर्क - सचिव, केदार स्मृति न्यास, डी.एम. कॉलोनी (पहली गली के अंत में) सिविल लाईन्स, बांदा-२१०००१ (यू.पी) मो. 9450169568