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लीलाधर मंडलोई की कविता

लीलाधर मंडलोई
कठिन वक्तों में

मुख्तसर-सी बात इतनी है
जो होना है
वश में कब किसी के है
यह ध्रुपद गायकी है कठिन
जो रूह-सी बरसना चाहे है
इबादत यह सूफियाना है
इसको पाना है या इक दिन
इसमें फना हो जाना है
***
नहीं सिखाता कोई नदी को बहना
फलों को पेड पर पकना
परिंदे को उडना
तारों को चमकना
और फूलों को महकना
बस ऐसा ही है इसका सुर
लग गया है, तो धडकता जाए है
***
तुम्हें पुकार रहा है जो
तुम्हारे जैसा है
ज़मीं सँभाले हुए
आसमान जैसा है
***
ये ज़ंदगी जैसी मिली, बेमकसद नहीं है
यह भी है
उतनी ही हमआगोश
लिपट गयी ऐसी कि दीन का कहाँ होश अब
बरकत है खुदा की
बरस रहा है इसका हुस्न,अपना अहद लिए दिल में
***
अब लम्हा-ब-लम्हा
फज़ा है, हवा और खुशबू
ख्वाब है,रंग और आसमां
खामुशी है, आवाज और पुकार
ये कैसी आशुफ्तागिरी
कि हर सम्त एक लौ है
***
थोडी-सी जगह मिली और विस्मय अनेक
बेमन से अधखिला मन कृष्ण-धवल
जितनी उजास थी अधखिली रही
अबूझ है इसकी माया
मर्म इसका अब अमूर्त साँवली फंतासी है
***
सूरज डूब जाता है रोज़
दूसरी सुबह के लिए
नदी पहाड से चली आती है
सूखते खेतों,पठारों के वास्ते
परिंदे आकाश से लौट आते हैं
कि घोसले आबाद रहें
हवा लौट आती है पल-छिन
कि साँस चलती रहे
चलो देर हुई कि कोई इंतज़ार में है
***
ओ! मेरी संपूर्ण
मैं थोडा-थोडा कम हूँ
मेरे कम-कम होने में
क्या तुममें संपूर्ण हो सकता हूँ
***
बडवाग्नि तुम
मैं नदी का शीतल जल
दोनों बिल्कुल विपरीत
एक के बिना दूसरा नहीं
इतने एक कि कोई जान न सके
***



जो रहे हैं अकेले
वे ही जानते हैं
साथ होने की कीमत
***
बरजो उन्हीं -उन्हीं यादों को
सुगंध घेर रही समूचा आस-पास
सीने में खिल रहा है दुर्लभ फूल
मत पूछो कैफियत
एक बार अनुभव करो
वो वसंत का सगुन लिए आया है
दरवाज़ा न सही बंद खिडकी को खोलो
और नेह की जोग लिखी पढ लो
***
कईं सौ दुनियाओं में
एक अकेले तुम
तुम्हारे लिए
खो चुका वो भीगा लम्हा
आखिर मैं पा सका
***
जो सबसे कठिन वक्तों में
और बिना किसी वजह से हमसाया हो
उसे खोने के पहले
ज़रा याद करो
उसकी आँखों की नमी
***
त्वचा
कोशिकाओं
जल और
अस्थियों में
सब जगह हो
खोलो अपनी आँखें मुझमें
कि दो हो जाएँ ढाई आखर
***
कुछ नहीं है मेरे पास
एक सपना है
आकाश में तुम्हारे उडने का
***
दिमाग में जो था
भूल गया
चट्टान के भीतर वह नदी है
मैं उसमें डूब गया
***
उन दो के बीच
एक ही भाषा है
जो कोई और नहीं समझता
आश्चर्य!
वे बोलते नहीं
समझ लेते हैं
***
मैं सबसे खराब समय में
सबसे अच्छे हाथों में हूँ
***
सफर सुंदर नहीं
न सही
टेढा-मेढा है
घायल होते हैं
मन दर्द में तस्वीर बनाता है
उसे देखता सब भूल जाता है
***
उसकी आँख से
गिरता है एक आँसू
आसमान में
कम हो जाते कई दमकते सितारे
***
तुम न जाने किस जहाँ में
अपने में हो बेसुध
वही और वही है तुम्हारी रेतघडी
इसमें मेरा कोई समय नहीं है
***
आज कच्ची हल्दी लपेटे
सजकर तुममें
अपने हिस्से के फेरों में
तुम्हारी धुरी पर अकेला घूम रहा हूँ
***
हम एक थे
यह कितनी शीरी याद है
अब हमारे बीच
पारे की एक नदी है
***
मैं इसे ज़ख्म नहीं मानता
मैं हर पल इसे छूता हूँ
और तुझे पा लेता हूँ
***
तुम्हारे साथ
एक लम्हा भी
ज़ंदगी से ज़यादा निकला
इस अहसास में
खुशी इतनी मिली
उम्र यह कम पड गयी
***
कोमल झमक की तरह आई
और बीत गयी सुरीली धुन
रहता हूँ एक दस्तक के इंतज़ार में
वह गुम है कहीं
भीतर याद की स्याह रिदा फैली है
***
अब तो बोल-चाल
इतनी खूबसूरत है
खामुशी बोले है
हम खूब सुने हैं
***
इस बंदे का हाल न पूछो
ऐसा अजब परिंदा है
छाँव इसे मिलती नहीं
धूप है और पर जलते हैं
***
जो कहना था
कह न पाया
सब छोडे जा रहा हूँ
रेत की इस टुक डायरी में
***
मैं तेरे पानियों में
सो गया हूँ
खुदा करे
अब सुब्ह न हो
***

सम्पर्क - आखर, बी 253, बी पॉकेट,
सरिता विहार, नई दिल्ली -76
मो. 93153 05643