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हजारीप्रसाद द्विवेदी : कालिदास और बाणभट्ट के युगपत्

पाण्डेय शशिभूषण शीतांशु
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की तीन पुस्तके मैंने स्नातकोत्तर कक्षा में प्रवेश लेते ही परी थीं। ये पुस्तके थीं- 1. नाथ सम्प्रदाय 2 हिन्दी साहित्य की भूमिका और 3. कबीर। बाद में बाणभट्ट की आत्मकथा उपन्यास भी पढा था। एम. ए. करने के पश्चात् 1964 चारुचन्द्र लेख पढा। इस तरह आरंभ में ही मैं उनके आलोचक और उपन्यासकार दोनों रूपों से परिचित हो सका। इनमें जिन पुस्तकों का मुझ पर अधिकाधिक प्रभाव पडा दे पुस्तकें थीं हिन्दी साहित्य की भूमिका और बाणभट्ट की आत्मकथा।
जब मैं एम.ए. प्रथम वर्ष में ही था, तब मेरे विभागाध्यक्ष प्रो. देवेन्द्रनाथ शर्मा ने एक दिन विभागीय व्याख्यान-माला में हजारीप्रसाद द्विवेदीजी का व्याख्यान करवाया। मैंने पहली बार द्विवेदीजी को देखा था। लम्बा भरा-पूरा शरीर, ढीला-ढाला कुर्ता पोती और चप्पल! यही उनका परिधान था। उनके व्याख्यान में धाराप्रवाहिता थीं, गजब का वैदुष्य था. साथ ही उसमें कथारस भी घुला-मिला था। तेजस्विता उनके मुखमण्डल से टपकती थी। वह मुक्त रूप में खुलकर हँसते थे। व्याख्यान के बाद गुझे शर्माजी ने घर आने को कहा था। वहाँ उनके ड्राइंग रूम में बैठे हुए मेरी उनसे बातचीत हुई थी। बाद में उनके लॉन में एक फोटोग्राफी भी हुई थी, जिसमें हजारीप्रसाद द्विवेदी, देवेन्द्रनाथ शर्मा, श्रीमती देवेन्द्रनाथ शर्मा, उनकी पुत्री दीप्ति शर्मा, मैं (शीतांशु) और मधुकर हम छह व्यक्ति सम्मिलित हुए थे। अपने व्याख्यान में द्विवेदीजी ने अपने श्रोताओं से, जो हम विद्यार्थी और शिक्षकगण थे. यह आग्रह किया था कि हमें कालिदास को अवश्य पढना चाहिए और उनकी रचनाओं में मेघदूत और अभिज्ञान शाकुन्तल अवश्य पढने चाहिए। संयोगवश पूर्व मेघदूत तो हमारे पाठ्यक्रम में ही था और उसको पढाने वाले हमारे आयापक थे- प्रो. देवेन्द्रनाथ शर्मा। उनके इस उद्बोधन के पश्चात् सारा पूर्व मेघदूत कंठस्थ भी हो गया था। अभिज्ञान शांकुतल मैंने बाद में पढा था, जब मैं स्नातकोत्तर के दूसरे वर्ष में आ गया था। कालिदास को पढने से जुडे उनके उद्बोधन ने मुझे इतना प्रभावित किया कि मैंने पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी द्वारा संपादित कालिदास ग्रंथावली अपने पुस्तकालय से निर्गमित कराकर आवास पर ले आया और उसमें मैंने चतुर्वेदीजी की भूमिका के अतिरिक्त कालिदास की बातुसंहार मालविकाग्निभित्र, जैसी अन्य पुस्तकें भी पढ डाली। वहीं मैंने कालिदास और शेक्सपियर के नाट्य-साहित्य की चतुर्वेदीजी द्वारा की गई तुलना भी पढी और उन दोनों के महत्त्व और वैशिष्टय में भी रमा।
उस दिन अपना व्याख्यान देते हुए द्विवेदीजी बार-बार अपने कुर्ते में हाथ डालते और कुछ अदर से निकालने की कोशिश करते। उनका व्याख्यान जहाँ निर्बाध गति से चल रहा था. वहीं कुर्ते के अंदर गले के पास हाथ डालने का क्रिया-व्यापार भी कुछ मिनटों तक लगातार जारी था। हम विद्यार्थी यह समझ नहीं पा रहे थे कि द्विवेदीजी ऐसा क्यों कर रहे हैं। कभी-कभी लगता शायद यह शरीर के उस भाग को खुजलाना चाह रहे हैं। पर यह स्पष्ट तौर पर ऐसा कुछ नहीं कर रहे थे। तभी अचानक वह खुलकर हँस पडे। व्याख्यान एक मिनट के लिए रुक गया और उन्होंने कहा कि एक कीडा मेरे कुर्ते के अंदर घुस आया है। मुझे भय है कि मेरे भारी-भरकम शरीर से यह दब न जाए। इसी लिए उसे बाहर निकालने की चेष्टा कर रहा हूँ। इतना कहने के बाद वह फिर हँसे। कीडा संभवतः उन्होंने निकाल लिया था। फिर ये व्याख्यान देने लगे। उनके इस प्रथम दर्शन और श्रवण से हम लोग बहुत प्रभावित हुए थे। उनके चले जाने के पश्चात हमने अपने विभागाध्यक्ष से मिलकर उनके प्रति कृतज्ञता भी ज्ञापित की थी कि उन्होंने एक यशस्वी, विद्वान साहित्यकार से हमें मिलाया और उन्हें सुनने का हमें अवसर प्रदान किया। यह थी उनसे मेरी पहली मुलाकात।
एम.ए. करने के पश्चात मैंने 1964 में हिन्दी के तीन शिक्षा केन्द्रों के विभागाध्यक्षों- पंजाब विश्वविद्यालय चण्डीगढ के आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. नगेन्द्र और विश्वभारती शांतिनिकेतन के प्रो. रामसिंह तोमर- से पत्र-संफ स्थापित किया था और उनके मार्ग-निर्देशन में उनके साथ पीएच.डी. शोध-कार्य करने की इच्छा व्यक्त की थी तब द्विवेदीजी का एक कार्ड मुझे मिला था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि चण्डीगढ आकर मिलो, तो बात की जा सकती है। नगेन्द्रजी ने एक साईक्लोस्टाइल किया हुआ पीएच.डी. के पहले एम.लिट, का पाठ्यक्रम भेज दिया था, जो वहाँ पीएचडी. से पहले अनिवार्यतः करना पडता था। केवल प्रो, रामसिंह तोमर ने मेरे पत्र का उत्तर विधिवत् मुझे पत्र लिखकर दिया था और मैं वहीं उनके मार्ग- निर्देशन में शोघ-कार्य के लिए पंजीयित हो गया था। अपने जिला शहर से चण्डीगढ के दूर होने के कारण विना उनसे आश्वस्त हुए कि वह मुझे अपने निर्देशन में ले लेंगे और मेरे पीएच.डी. का रजिस्ट्रेशन वहाँ हो जाएगा, मैं उन दिनों चण्डीगढ आने के विषय में सोच भी नहीं सकता था। अतः मैं तब चण्डीगढ नहीं जा पाया। संयोग से उसी वर्ष मुझे दो प्राप्तियाँ हुईं। एक तो विश्वभारती, शांतिनिकेतन में प्रो. रामसिंह तोमर के निर्देशन में मेरा पीएच.डी. पंजीयन हो गया और जब में वहाँ कार्यभार संभालने तथा अनुसंधान कार्य आरंभ करने जाने बाला था तभी भागलपुर विश्वविद्यालय में व्याख्याता पद के लिए मैं साक्षात्कार-समिति के द्वारा चुन लिया गया, जिसकी अध्यक्षता कुलपति रामधारी सिंह दिनकर कर रहे थे और अंत में हिन्दी का व्याख्याता बन गया। इसी विश्वविद्यालय की अंगीभूत इकाई आर.टी.एण्ड डी.जे. कॉलेज में पदस्थापित कर दिया गया। यहाँ मेरे प्राचार्य से कपिलदेव नारायण सिंह कपिल जो आचार्य कपिल के नाम से जाने जाते थे। संयोगवश अध्यापक होने के पूर्व वह विश्वभारती, शांतिनिकेतन में हजारीप्रसाद द्विवेदी के निर्देशन में पीएच.डी. के लिए शोध-कार्य कर रहे थे। उनका विषय था- कबीर के राम। पर बीच में ही नौकरी मिल जाने के कारण यह अपना शोध-कार्य छोड कर आ गए और हिन्दी के प्राध्यापक बन गए। मैं जब प्राध्यापक बना तब वे मेरे प्राचार्य थे। उन्होंने मुझे बताया था कि हजारीप्रसाद द्विवेदीजी बडे अदभुत ज्योतिषाचार्य थे। उनकी भविष्यवाणियों शत-प्रतिशत सच हुआ करती थीं। हमारे गुरुवर देवेन्द्रनाथ शर्मा को भी इस बात का मलाल था कि बहुश्रुत और बहुपठित होने के बावजूद उन्हें द्विवेदीजी की तरह ज्योतिष का ज्ञान नहीं था। संस्कृत में केवल यही शास्त्र था जिसमें उनका प्रवेश नहीं था पर द्विवेदीजी की ज्योतिष में अद्भुत गति थी। कपिलजी ने बताया था कि द्विवेदीजी ने उनकी हस्तरेखा देखी थी। उनकी जन्मकुंडली भी देखी थी और उन्हें कहा था कि तुम्हें सात पुत्रियाँ होंगी और उसके बाद तुम्हें निश्चय ही पुत्र की प्राप्ति होगी। अतः तुम तीन-चार पुत्रियों के बाद न तो अपना ऑपरेशन कराना और न ही अपनी धर्मपत्नी का ऑपरेशन कराना। कपिलजी बताते थे कि जिस समय द्विवेदीजी ने यह भविष्यवाणी की थी उस समय उन्हें एक पुत्री ही थी, पर उन्हें एक-एक कर सात पुत्रियों की प्राप्ति हुई। फिर भी उन्होंने द्विवेदीजी की भविष्यवाणी को स्मरण रखते हुए न अपना अथवा न ही अपनी पत्नी का ऑपरेशन होने दिया। अंततः उन्हें पुत्र-रत्न की प्राप्ति हुई। जिसका नाम उन्होंने प्रभातकुमार रखा। तब मुझे स्मरण आया कि द्विवेदीजी ज्योतिष की गलत बातें और स्थापनाएँ नहीं सह सकते थे जब बनारसीदास चतुर्वेदी के विशाल भारत में किसी विद्वान के ज्योतिष विषयक लेख प्रकाशित हुए और द्विवेदीजी को उनमें विसंगतियों दिखीं, तब उन्होंने अपने आलेखों में अपने तर्कों द्वारा उसका सप्रमाण खंडन किया। पर उनका यह आलेख छद्म नाम से प्रकाशित हुआ इस पर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने उन्हें यह कहा था कि अपना आलेख अपने नाम से प्रकाशित करवाओं। इतना आत्मबल और साहस तुम में होना चाहिए। यदि तुम सही हो, तो छद्म नाम का कोई औचित्य नहीं है।
द्विवेदीजी अनुसंधाता मनोवृत्ति के आचार्य थे। उनके व्यक्तित्व में अपार ज्ञान का संगम था। वे संकल्पनिष्ठ और चिंतक भी थे। अपने अनुसंधान के बल पर वे नई स्थापनाएँ करने लगे थे। उनके लेखन के पूर्वाद्ध में रचित उनकी पुस्तकें उनकी इस अनुसंघनात्मकता का परिणाम और प्रमाण हैं। कबीर भी उनकी ऐसी ही पुस्तक है संस्कृत वाङ्गमय पर उनका विशेष अधिकार था। वे मानते थे कि संस्कृत में जितना प्रभाव और गहन ज्ञान है उसे हिन्दी में लाने की अपेक्षा है। वे स्वयं इस दिशा में अग्रसर भी थे। उनकी कबीर पुस्तक की मान्यताओं और स्थापनाओं को लेकर अनेक विवाद रहे हैं। पहला विवाद इस विषय पर रहा कि उन्होंने आचार्य क्षितिमोहन द्वारा संचित सामग्री का उपयोग अपनी इस पुस्तक में किया। हिन्दी के एक आलोचक डॉ. शंभूनाथ सिंह ने हिन्दी साहित्य का बृहत इतिहास के बारहवे खंड में द्विवेदीजी पर यह आरोप लगाया है कि उनकी कबीर पुस्तक परागत जान का प्रतिफल है। उन्हें नकलची के रूप में भी निर्दिष्ट किया गया। उन्होंने इसे उनकी मौलिक कृति स्वीकार नहीं किया । दूसरी ओर डॉ. धर्मवीर ने इस पुस्तक को ब्राहमणवादी पूर्वग्रस्त धारणा से प्रेरित होकर लिखी गई पुस्तक माना है, जिससे उनकी दृष्टि में कबीर के साथ न्याय नहीं किया जा सका है। पर धर्मवीर की यह आपत्ति भी पूर्वग्रस्त धारणा का ही परिणाम है। उनके व्यक्तित्व पर एक विवाद बलराज साहनी ने भी खडा किया था। उन्होंने यह आरोप लगाया था कि जब वे विश्वभारती में नियुक्त हुए, तब द्विवेदीजी ने उन्हें जानबूझकर कक्षा में जो विषय पढाने के लिए दिया वह तुलसीदास का काव्य था। आधुनिक प्रकृति और आधुनिक ज्ञान के व्यक्ति को पढाने के लिए ऐसा विषय उन्होंने जानबूझ कर दिया था। पर ऐसा किन परिस्थितियों में हुआ था और कौन-कौन से विषय की कक्षाएँ खाली जा रही थीं. इसका उन्होंने कहीं उल्लेख नहीं किया।
जब मैं वाराणसी शिवप्रसादजी के यहाँ आने-जाने लगा तब दो-तीन बार उनके साथ में रवीन्द्रपुरी में द्विवेदीजी के घर भी उनसे मिलने गया। पहली बार जब मैं उनके आवास पर पहुँचा, तब मुझे ड्राईग-रूम में बिठाकर शिवप्रसादजी अंदर चले गए। फिर तुरंत ही लौट आए और मेरे साथ बैठ गए। थोडी देर में द्विवेदीजी आए और अपनी बैठक के तख्त पर बैठ गए। मैंने उनके चरण-स्पर्श किए और उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया। शिवप्रसादजी ने मेरा उनसे परिचय कराया । बैठने के साथ ही उन्होंने अपना पनबट्टा खोला, उससे अपने लिए पान निकाला, फिर उसका एक बीडा शिवप्रसादजी की ओर बढाया और एक मेरी ओर। तब मैंने दोनो हाथ जोडकर कहा था कि मैं पान नहीं लेता हूँ। इस पर उन्होंने कसकर ठहाका लगाया और पान की प्रशंसा में लिखित संस्कृत के उन श्लोकों को सुना दिया, जिसका उल्लेख उन्होंने चारुचन्द्रलेख में भी किया है तब शिवप्रसादजी ने मुझे संकेत से निर्देश दिया कि पान ले लो, और मैंने मुस्कराकर उनसे कहा कि फिर तो आप दे ही दें, क्योंकि मुझे साहित्य की सेवा करनी है। उन दिनों कल्पना उनकी नई उपन्यास-कृति पुनर्नवा का धारावाहिक प्रकाशन हो रहा था। मैंने उसका प्रसंग उठा दिया। फिर तो यह पुनर्नवा की व्याख्या करने लग गए। वर्षों बाद में उनके यहाँ आवास में मिल रहा था। मैंने उन्हें कहा भी कि पुनर्नवा पूरी होने पर मैं उस पर लिखूँगा। उन्होंने कहा- अवश्य लिखना मैंने तुम्हें पुनर्नवा की कुंजी भी दे दी है। मैंने देखा और पाया कि ज्ञान और वैदुष्य का वितरण करते हुए उन्हें प्रसन्नता होती थी उनका व्यक्तित्व कुंठा-रहित था, नियोज था, सरल और निश्छल था। वे अपने शिष्यों को बहुत मानते थे। साथ ही उनके गुणों की सराहना करने वालों में अग्रणी थे। शिवप्रसाद सिंह की कहानियों की पढकर उन्होंने लिखा था कि मेरा रोम-रोम पुलकाकुल है कि यह मेरा शिवप्रसाद लिख रहा है। शिष्य को संकट में पडा देखकर उसे संकट से मुक्त कराने के लिए निरापद स्थिति में लाने के लिए वह बेचैन हो उठते थे। नामवर सिंह को सागर में हिन्दी प्राध्यापक की नौकरी से निकाल दिए जाने पर उन्होंने नामवर सिंह की नई नौकरी के लिए अपने मित्रों को लम्बे पत्र लिखे। इनमें शिवमंगल सिंह सुमन को लिखा उनका पत्र प्रकाशित हो चुका है। शिष्यों में भी ठाकुर शिष्यों के साथ उनको विशेष अनुराग था। यह कहना कठिन है कि यह सभी छात्र तेजस्वी थे और स्वयं उनके निर्देशन में शोध-कार्य करने आए थे अथवा द्विवेदीजी जानबूझकर ब्राह्मण गाँधी के विरुद्ध अपनी लॉबी खडा करना चाहते थे, यदि ऐसा रहा भी हो, तो इन छात्रों में से किसी को भी विभागीय राजनीति में किसी अध्यापक के विरुद्ध खुलकर राजनीति करते हुए कभी देखा नहीं गया। मैंने एक बार रामदरशजी से पूछा था कि द्विवेदीजी ने शोध-कार्य के लिए अपने निर्देशन में आपको क्यों नहीं लिया और आपको जगन्नाथ प्रसाद शर्मा के शोध-निर्देशन में क्यों जाने को कहा। इसका उत्तर उन्होंने मुझे बडी सरलता और सादगी से दिया था कि तब द्विवेदीजी के पास पीएच. डी. कराने के लिए जगह खाली नहीं थी। अतः वह मुझे शोधकर्ता के रूप में अपने निर्देशन में नहीं ले सकते थे और यदि मैं एक वर्ष प्रतीक्षा करता, तो मुझे एक वर्ष खाली बैठना पडता और मुझे स्कॉलरशिप नहीं मिल पाती। इस दृष्टि से उन्होंने मुझे शर्माजी के पास जाने को कहा था जिससे मुझे स्कॉलरशिप मिलने लग जाए।
द्विवेदीजी इतिहासकार भी थे। उनका इतिहासकार एक ओर उनके अनुसंधाता व्यक्तित्व पर सता है, तो दूसरी ओर उनक भावप्रवण भावकीय प्रातिभ व्यक्तित्व की सतह पर भी बना है। उनके अनुसंधाता इतिहासकार का पता आदिकालीन साहित्य के इतिहास-लेखन में मिलता है। उनके दोनों व्यक्तित्वों का संगम भक्तिकाल और रीतिकाल के लेखन में देखने को मिलता है और उनके भावप्रवण प्रातिभ भावकीय व्यक्तित्व का प्रतिफलन आधुनिक साहित्य के इतिहास लेखन में प्राप्त होता है। वे प्रेमचंद को उत्तर भारत का मांइड घोषित करते है। उनको एक महान उपन्यासकार के रूप में निष्कर्षित करते हैं। अपने इसी व्यक्तित्व के आधार पर यह मध्यकाल के साहित्य को प्रेमापुमथों महान का काव्य कहते हैं। समस्त मध्यकाल के साहित्य का नाभिकेन्द्र यह प्रेम को मानते हैं और प्रेम को पाँचवा पुरुषार्थ तक कह देते हैं। ऐसा सूत्र-वाक्य या बीज-वाक्य देने में अन्य सारे इतिहासकार विफल रहे हैं। उन्होंने मध्यकालीन बोध पर एक स्वतंत्र पुस्तक भी लिखी है।
द्विवेदीजी संस्कृत माध्यम से आचार्य तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद काशी में रामकथा कहा करते थे। वे पंडित मदन मोहन मालवीय के संफ में थे और उन्हें मालवीयजी ने हिन्दी अध्यापक के रूप में रवीन्द्रनाथ टैगोर को सौंपा था। तब द्विवेदीजी का निर्माण काल था। वहाँ वह अध्येता भी थे, अध्यापक भी और अनुसंधाता भी। वहीं वह उपन्यास-लेखक और निबंध-लेखक भी बने। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के सहचर्य में उन्होंने बहुत-कुछ सीखा। उनके भय-विहीन आत्मबलयुक्त व्यक्तित्व का निर्माण विश्वभारती में ही हुआ। इन्दिरा गाँधी और शिवानी दोनों वहाँ उनकी छात्राएँ रह चुकी थीं। वह इन्दिरा गाँधी को बहुत मानते थे। अपने समाजवादी चिंतक शिष्यों से इस बिंदु पर उनकी टकराहट होती रहती थी। वस्तुतः यह द्विवेदीजी के जीवन का निर्माण-काल था।
शांतिनिकेतन के बाद द्विवेदीजी वाराणसी आए। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए। यहाँ उन्होंने अपने शिष्यों का निर्माण किया उनका यह कार्यकाल मूलतः उनके अध्यापन, शोध-निर्देशन और शिष्यों के निर्माण का कार्यकाल था। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से उन्हें आरोप लगाकर निकाला भी गया। यह उनका विकास काल था, पर इसमें उनका आत्मविकास कम, उनके ज्ञान-दान का विकास अधिक हुआ। वे व्यावहारिक दुनिया में आमने-सामने भी हुए। यहीं उन्होंने शिक्षा-जगत् की राजनीति का सामना किया और व्यावहारिक ज्ञान की दृष्टि से अपने को समृद्ध किया।
उनकी आजीविका का अगला पडाव शिवालिक की पहाडियों के पास बसा हुआ शहर चंडीगढ था। वह तत्कालीन कुलपति जोशीजी के द्वारा पंजाब विश्व-विद्यालय में आमंत्रित किए गए। जोशीजी ने उन्हें हिन्दी-विभाग के टेगौर चेयर पर परिसर के पद पर पुन प्रतिष्ठत किया। उस समय वही के हिन्दी-विभाग में कोई भी प्रोफेसर नहीं था। इन्द्रनाथ मदान रीडर थे। इस दृष्टि से शिवजीजी विभाग के अध्यक्षा भी थे। शांतिनिकान में वे हजारीप्रसाद जी थे, वाराणसी में पंडित जी थे चण्डीमढ में कह आचार्य जी बने। कहते हैं चंडीगढ शहर के मार्गों का नामकरण भी उनसे पूछ कर किया गया था। यहाँ उन्हें अनन्य प्रतिष्ठा प्राप्त हुई। यद्यपि वह विभाग के अध्यक्ष थे, पर उन्होंने अध्यक्षता का सारा कार्यभार मदानजी को सौंप रखा था। यहाँ उन्होंने पश्चिमी सौन्दर्यशास्त्र के समांतर लालित्य सर्जना विषयक अपना चिंतन प्रस्तुत किया। यहीं बह पश्चिमी साहित्यालोचन की हलचल से परिचित हुए। उनके शिष्य रमेशकुंतल मेघ सौन्दर्यशास्त्र पर लिख रहे थे। यहाँ भी द्विवेदीजी के अनेक शिष्य हुए गुरुमुखी लिपि में लिखित हिन्दी साहित्य से यहाँ वह परिचित हुए। इन सबके परिणाम स्वरूप उन्होंने सिख गुरुओं का पुण्य स्मरण नामक पुस्तक लिखी। कुटज नामक अपना महत्त्वपूर्ण लेख लिखा। पर जब मदान प्रोफेसर बन गए तब द्विवेदीजी को उन्होंने धीरे-धीरे दरकिनार कर दिया। संभवतः यह आधुनिकताबोध और मध्यकालीनबोध के बीच की आंतरिक टकराहट थी। द्विवेदीजी आधुनिकताबोध-विषयक ज्ञान से परिचित हो सकते थे, बल्कि हो चुके थे पर मदान जी में मध्यकालीन बोध के प्रति कोई झुकाव नहीं रह गया था। अंततः द्विवेदीजी को लौटने का निश्चय करना पडा। भरपूर यश-सम्मान अर्जित करने के बाद वह पुनः बनारस लौटे। पर जब वह चंडीगढ से प्रस्थान कर रहे थे, उनका सामान ट्रक में लोड किया जा रहा था, उस समय उनको विदा करने के लिए उनका अकेला शिष्य पुरुषोत्तम शर्मा ही उनके साथ और पास रहा। यद्यपि उनके सभी शिष्यों को इसकी जानकारी थी और विभागीय सदस्य तो यह जानते ही थे, पर उन्हें विदा करने के लिए कोई नहीं आया। उनके जाते समय उनसे मिलने की औपचारिक इच्छा भी किसी ने नहीं दिखाई। शायद अपना काम निकल जाने के बाद पुनः उस ओर देखने की, जाने की और अस्त होते सूर्य को नमस्कार करने की प्रथा यहाँ की मिट्टी में नहीं थी।
द्विवेदीजी पुनः बनारस लौटे। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में कुलपति के बाद का रेक्टर पद उन्हें दिया गया। यहाँ आकर उन्होंने एक महत्त्वपूर्ण कार्य अपने हाथ में लिया। उन्होने हिन्दी का व्याकरण लिखने और उसे मानक रूप में तैयार करने की अभिनव योजना बनाई। यह एक प्रकार का टीम-वर्क था। विभाग के सारे सदस्य इससे जुडे। भोलाशंकर व्यास-शिवप्रसाद सिंह प्रभृति सदस्यों ने इसमें अपना महत्त्वपूर्ण योगदान किया। यह परियोजना कई खण्डों में पूरी की गई। इसे टंकित कराकर विभाग में रख दिया गया। द्विवेदीजी के रेक्टर रहते हुए इसके प्रकाशन आदि की दृष्टि से पहले विचार नहीं किया जा सका था। तब तक किसी बडे प्रकाशक के साथ इसका अनुबंध ही नहीं हो पाया था, जिससे परियोजना पूरी होते ही यह ग्रंथ उसे प्रकाशनार्थ सौंप दिया जा सके। द्विवेदीजी इस ग्रंथ-परियोजना के प्रधान संपादक थे। दुर्भाग्यवश उनके संयोजकाल में तैयार किया कराया गया हिन्दी व्याकरण-विषयक यह ग्रंथ विभाग से इस तरह गायब हो गया जैसे गधे के सिर से सींग । फिर उसका कहीं अता-पता भी शेष नहीं रहा। निश्चय ही इस बहुखेती ग्रंथ को गायब कराने में किसी का पास पूर्ण दुस्साहस सक्रिय रहा होगा। पर वह कौन था इसके लिए कौन जिम्मेदार माना जाए किसके अध्यक्षीय कार्यकाल में ऐसा हुआ- इसे कोई जॉँच समिति भी उजागर नहीं कर सकी। निश्चय ही जिसने यह ग्रंथ गायब कराया होगा उसमें उसका निजी स्वार्थ न्यस्त रहा होगा कि अपने परक्ती जीवन-काल में वह उसे यत्किंचित रूपांतरण के साथ शनैः शनैः अपने नाम से प्रकाशित करावे।
अपने परवर्ती जीवन-काल में द्विवेदीजी ने अनामदास का पोथा (जिसे रक्वाख्यान भी कहा मया) नामक एक लघु उपन्यास लिखा। इसकी पीठिका दार्शनिक थी। इसका अधिकांश छांदोस्योपनिषद् की तत्त्व-चर्चा पर आधारित है। यह उनका सबसे लघुकाय उपन्यास है और उनके पुराने उपन्यासों से भिन्न भी है। इस उपन्यास के कुछ आरंभिक अंशों को मैंने कल्पना पत्रिका में ही पढ लिया था। बाद में मैंने इसके छपने पर इसे आद्योपांत पढा। यहाँ द्विवेदीजी ने अनामदास के विपय में एक महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की है कि अनामदास को यह विवेक नहीं था कि क्या नहीं बोलना चाहिए, कि क्या कुछ और कितना नहीं कहा जाना चाहिए। पर यह बात कई स्थलों पर स्वयं द्विवेदीजी के लेखन पर भी लागू होती है। उन्हें अपने लेखन में इसका भान नहीं रहता कि कहीं इसे समाप्त कर देना चाहिए और उसके बाद क्या नहीं लिखना चाहिए। पर वह अपने कथारस से पाठक को सिक्त किये चले जाते हैं। द्विवेदीजी हिन्दी साहित्य के एक महान् गद्यशैलीकार भी थे इस रूप में उन्हें शायद अब तक
महत्त्व नहीं दिया जा सका है। पर कहना होगा कि इस दृष्टि से वह अनन्वय और अद्वितीय है। बाणभट्ट की आत्मकथा में उनके वाक्य-विन्यासों को देखने से पता चलता है कि वहाँ एक प्रकार की वाक्य-संरचना की आवृत्ति 14-15 बार तक लगातार की गई है। वाक्य-संरचनागत शैली के निरूपण का इतना सटीक उदाहरण हिन्दी कथा-साहित्य में और किसी के यहाँ देखने को नहीं मिलता। यद्यपि वाक्य-संरचना की आवृत्ति का मोह एक ओर कथाकार प्रेमचंद को भी है, तो दूसरी ओर निबंधकार रामचन्द्र शुक्ल को भी है। पर इन दोनों का फलक द्विवेदीजी की अपेक्षा कहीं अधिक लघुतर है। द्विवेदीजी के यहाँ यह संरचनागत आवृत्ति कही तीन बार, कही पाँच बार, कहीं सात बार, कहीं आठ बार, कहीं दस बार और कही बारह बार तक प्राप्त होती है। वे वाक्य-संघट्ट की ऐसी संघटना में बेजोड हैं। वह हमें कादम्बरीकार का स्मरण करा देते हैं। कथाकार के रूप में उनकी एक और बडी विशेषता अंतः-पाठीयता (Inter-Te&tuality) है जिसकी सैद्धांतिक स्थापना पश्चिम में साठोत्तर, दशक में की गई उनके उपन्याना में-पाठीयता का यह शिल्य और कोशल बाणभट्ट की आत्मकथा में शमिल है। हिन्दी उपन्यास के विकास-क्रम में उनके पश्चात अतःपाठीय-कौशल का अज्ञेय के नदी के द्वीप में देखने को मिलता है हजारीप्रसादजी के यहाँ अनूदित की अंतरपाठीयता चारुचन्द लेख में भी प्राप्त होती है। अंतःपाठीयता की सार्थक रचना वह पुर्नवा और अनामदास का पोया में भी परिवर्तित रूप में कर जाते हैं। द्विवेदीजी का औपन्यासिक चिंतन भी बेजोड है। शंकराचार्य की मा भैः उक्ति के आधार पर ही बाणभट्ट की आत्मकथा में यह कहते है कि किसी से भी मत डरो, यहाँ तक कि अपने गुरु से भी नहीं। इसी तरह चारुचन्द्रलेख में यह बताते हैं कि यहाँ शुद्ध-विशुद्ध कुछ भी नहीं है। हर स्वर्ण में खाद मिला हुआ है चाहे पर्णगत शुद्धि का संदर्भ हो या भाषागत शुद्धि का। ये प्रमाणों से इसे सिद्ध भी कर देते हैं । इसी तरह पुनर्नवा में वह मूल्यों की बात करते हैं। उनकी दृष्टि में जीवनमूल्य की स्थाई रूप में बने नही रह सकते। समय और समाज के संदर्भ में उसे परिवर्तित होना पडता है। इन सभी चिंतन-सूत्रों की प्रकृति में अग्रोन्गुख और युगीन माँग के दर्शन किए जा सकते हैं। उनके द्वारा दिया गया निर्भयता का संदेश व्यक्ति से लेकर समाज और वर्ग तक पर लागू होता है, तो शुद्धता की अतिकाम्यता का निषेध हमें सारत्त्व से आँख मिलाने की शक्ति देता है और मूल्यगत परिवर्तन स्वीकारना तथा नये मूल्य के रूप में उसे मान लेना समाजशास्त्र की नई संरचना की घोषणा करता है। नामवर सिंह ने अपनी दूसरी परंपरा की खोज पुस्तक में यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि हिन्दी साहित्य में द्विवेदीजी दूसरी परंपरा के प्रतिष्ठापक, संस्थापक थे इस परंपरा को उन्होंने शुक्ल जी की आर्य परंपरा के समांतर द्विवेदीजी द्वारा अनुशंषित आर्येतर परंपरा के रूप में रेखांकित किया है। पर द्विवेदीजी के व्यक्तित्व और लेखन का निर्माण जिस पाठशाला में हुआ था, वह पाठशाला रवीन्द्रनाथ ठाकुर की विश्वभारती थी। यहीं उनके साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्कारों का निर्माण हुआ था और रवीन्द्रनाथ का यह सर्वसमावेशी गान द्विवेदीजी के मानस-पटल पर सदैव विद्यमान था कि हेथाय आर्य. हेथाय अनार्य / हेथाय द्रविड/ चीन/ शक, हूण, पाठन, मोगल/ ए. यह होलो तीन/पई भासोर महामानकर सागर और आए नाणे, राम मा. पहान मुगल सब भारतीय परंपरा में समाहित हो गए, तब यहाँ दूसरी परंपरा की बात सर्वथा गलत हो जाती है। ऐसा नही है कि शुक्ल जी ने जिस आए संस्कृति को लिया है उसका सर्वथा अभाव द्विवेदीजी के यहाँ है। शुक्ल जी में जिसे अपना प्रतिपाद्य नहीं बनाया, जिधर उनकी दृष्टि नहीं गई, द्विवेदीजी ने उसे भी अपना प्रतिपाद्य बनाया। उन्होंने समावेशी रूप में अपनी साहित्य-सर्जना की। वह अब मध्यकालीन बोध की बात करते हैं तब वहाँ शुक्लजी द्वारा प्रतिपादित तथाकथित आर्य साहित्य भी विद्यमान है और सबको कह एक ही सूत्र में बाँधते हैं- प्रेमा पुमर्थो महान। अतः द्विवेदीजी का साहित्य दूसरी परंपरा को प्रतिष्ठित करने वाला नहीं, बल्कि भारतीय परम्परा का समावेशी साहित्य है।
द्विवेदीजी को लिवर का रोग था। उपचार से एक-दो बार वह ठीक भी हुए थे। पर अंतिम बार जब रोग ने उन्हें ग्रसा, तो उसका निदान संभव नहीं हो पाया और उन्होंने इसी रोग में मृत्यु का वरण किया। द्विवेदीजी आस्तिक थे। आस्थावादी थे। कथा तो वह कभी तुलसीदास कृत रामचरितमानस की बाँचते थे, पर अपने जीवन में राधा-कृष्ण के उपासक थे। घर से बाहर निकलने के अंतद्वार के ऊपर उन्होंने श्रीकृष्ण का चित्र लगाया हुआ था। इन्हें देखकर और प्रायः नमन कर के ही वे बाहर जाया करते थे। उनके अपने जीवन-मूल्य थे. पर वे दूसरों के जीवन-मूल्यों से अभियोजन कर सकते थे वे स्वयं प्रगतिकामी थे। माक्र्सवाद के सिद्धांतों को उन्होंने नहीं पढा था। वे माक्र्सवादियों की तरह जड और कट्टर नहीं थे। पर अपने माक्र्सवादी शिष्यों से अभियोजन बनाए रख सकते थे।
उनके शिष्य प्रायः पंचमकार-प्रिय हो गए थे। एक बार द्विवेदीजी जब बीमार पडे थे, उपचार के बाद ज्वर तो जाता रहा, पर खाँसी जाने का नाम नहीं ले रही थी। इस पर एक दिन उनसे मिलने गए रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ने उन्हें कहा कि मेरे पास खाँसी की एक रूसी सिरप है, आप कहें तो मैं उसे आपको दूँ। उससे खाँसी बिल्कुल ठीक हो जाएगी। द्विवेदीजी खाँसी से इतने त्रस्त हो गए थे कि उन्होंने हामी भर दी और उनके कुछ शिष्यों के सामने ही श्रीवास्तव जी ने रूसी शराब वोल्गा को एक दवा की शीशी में रखा- और उसे उनके घर ले गए और छोटे चम्मच से उन्हें वह तथाकथित दवा पिला की गई। इससे उनकी खाँसी जडमूल से मिट गई। बाद में दिवाली से रवीन्द्रनाथजी उनसे मिलने गए। तुम्हारा सिरप बहुत अच्छा या उससे लाभ हुभा और मेरी साँसी जाती रही। सभी शिष्य परस्पर एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराते रहे। पर द्विवेदी की को यह किसी ने नहीं कहा कि उन्हे दवा के रूप में छोटी-छोटी खुराका में वोल्गा पिला दी गई थी।
दिवेदीजी का व्यक्तित्व डॉ. नगेन्द्र की तरह नहीं था। वह भी-वादी व्यक्तित्व स्वामी थे। यह भी उनके सर्वसमावेशी व्यक्तित्व का ही दृष्टांत था। अनेक निर्णयात्मक समितियों में विशेषज्ञ के रूप में बैठते हुए उन्होंने सही-गलत का बोध होने पर भी किसी को चुनने या पुरस्कार देने दिलाने के लिए कभी आग्रह नहीं किया, उस पर बल नहीं दिया। तर्कों से कभी खंडन नहीं किया और जो भी चुना जा रहा था या जिसे भी पुरस्कार मिल रहा था, उसे हो जाने दिया। कभी कोई वीटो नहीं दिया अथवा न ही अपनी बात मनवाने के लिए कोई तर्क-वितर्क प्रस्तुत किया। साहित्य अकेदमी में अलग-अलग वैतरणी और राग दरबारी ये दो उपन्यास-कृतियों उस वर्ष के पुरस्कार के लिए अवर समितियों से निकलकर अंतिम निर्णयात्मक-समिति में पहुँची थीं। तीन व्यक्तियों की उस समिति में अध्यक्ष के अतिरिक्त एक विशेषज्ञ हजारीप्रसाद द्विवेदी थे और दूसरे विशेषज्ञ कथि-उपन्यासकार भगवतीचरण वर्मा थे। भगवतीचरण वर्मा ने राग दरबारी के लिए न केवल अनुशंषा की, बल्कि हदें पार कर उसकी वकालत तक की। पर द्विवेदीजी ने अपने शिष्य शिवप्रसाद सिंह की कृति अलग-अलग वैतरणी के लिए वहाँ कोई संघर्ष नहीं किया। उस उपन्यास को पूरी तरह पढे रहने और उसका प्रशंसक होने के बावजूद उसका कोई भी सबल पक्ष समिति के सामने उभार कर नहीं रखा और न उसके जिन दुर्बल पक्षों की ओर भगवतीचरण वर्मा ने संकेत किया था, उसे खंडित ही किया। इस तरह श्रीलाल शुक्ल के रागदरबारी को पुरस्कृत हो जाने दिया। उनकी इस निष्क्रियता (द्बठ्ठड्डष्ह्लद्ब1द्बह्ल4) से उनके प्रिय शिष्य शिवप्रसाद सिंह बहुत दुखी थे मन-ही-मन क्षब्ध भी थे। एक बार जब मैं बनारस गया था और उनसे संध्या समय द्विवेदीजी के घर चलने का आग्रह किया था तब उन्होंने मुझे यह सारा प्रकरण सुनाया था और पहले उनके घर जाने से नकार दिया था, पर बाद में जब मैं उनसे विदा लेकर चलने लगा तब उन्होंने मुझे कहा तुम भी क्या कहोगे कि मैंने तुम्हारी एक बात भी नहीं मानी। चलो मैं पंडितजी के घर चलता हूँ। और मैं उनके साथ हो लिया था। मुझे प्रसन्नता इस बात की थी कि शिवप्रसादजी गुरु-गृह जाने को तैयार तो हुए।
एक प्रकरण और स्मरण आता है। 1966 में टाइम्स ऑफ इंडिया समूह के दैनिक समाचार-पत्र, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्रिकाओं में हिन्दी के पूर्णविराम (।) की जगह फुलस्टॉप (.) प्रयोग किया था। धर्मयुग के सम्पादक धर्मवीर भारती और दिनमान के संपादक सच्चिदानन्द वात्सयान को इसके विरोध पत्र भी लिखा गया था और इसे रोकने का आग्रह किया। पत्र-समूह की निर्णयात्मक नीति पर इसका कोई प्रभाव नहीं पडा । उन दिनों इस सन्दर्भ में से हिन्दी के विद्वानों और विश्वविद्यालयों के आचार्यों को पत्र लिखकर उनका मत जाना। एक पत्र आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी को भी लिखा था। उनका तत्काल उत्तर भी आया था। पर यह उत्तर भी वादी ही था। उन्होंने लिखा था कि जब हिन्दी के सारे विरामांकन (Punciation) अंग्रेजी से ले लिए गए हैं, तब पूर्णविराम को भी लेने में मेरी दृष्टि में कोई असंगति नहीं है। पर दूसरे और अन्य सभी आचार्यों ने इसे हिन्दी की प्रकृति के अनुकूल नहीं माना था।
द्विवेदीजी कालिदास और बाणभट्ट के युगपत् अद्वितीय सर्जक थे उनके सारे ज्ञानात्मक चिन्तन में कालिदास व्याप्त-परिव्याप्त हैं। उनका कृतित्व और उनकी मनीषा कालिदासमय है उनके अद्वितीय पांडित्य के मूल में कालिदास विद्यामान हैं। दूसरी ओर यदि बाणभट्ट का जीवन नियतिकृत नियमरहिताम् हजारीप्रसाद द्विवेदी के जीवन में भी कुछ भी सुनिर्धारित सुव्यवस्थित नहीं था। इसी अव्यवस्था के कारण एक स्थल पर द्विवेदीजी ने अपने को शूद्र जाति का लेखक बताया है। इस तरह द्विवेदीजी अपने कृतित्व में कालिदास और व्यक्तित्व में बाणभट्ट थे।
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