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ध्रुव तारा

नितीन यादव
शहर के फतेह मैदान में आज राजनीतिक पारा फिर चढा हुआ था । पिछले दस दिन में आज दूसरी बडी राजनीतिक रैली इस मैदान में हो रही थी। चुनावी मौसम में इस मैदान की धडकन बढ जाती है। सालों से फतेह मैदान, रैली में आई भीड के अपने ही रिकॉर्ड तोडता रहा है। यह मैदान बडे धीरज से सभी राजनीतिक दलों की बात ,उनके जुमले और एक-दूसरे पर छींटाकशी को कभी उबासी लेते हुए, तो कभी विस्फारित नेत्रों से सुनता रहा है। फतेह मैदान के एक कोने में गाँव से आई बसों और जीपों से उतर कर लोग भीड में गुम होते जा रहे थे। राजेश के जीप से उतरते ही पडोस के गाँव के उसके दोस्त अशोक ने हँसते हुए पूछा भाई व्हाट्सएप पर तो तू दूसरी पार्टी के पोस्ट डालता है ,आज यहाँ इस रैली में कैसे? राजेश हँसते हुए बोला भाई बेटे का बारहवीं बोर्ड का रिजल्ट आने वाला है। उसके लिए मेडिकल की कोचिंग देखने आया हूँ। इसीलिए रामकरण मास्टरजी को भी साथ लाया हूँ। भला हो तुम्हारी पार्टी का । आने जाने का किराया बच गया और पाँच सौ रुपए नगद मिल जाएँगे, रैली में आने के। तभी राजेश की निगाह बस से उतरते उसके गाँव के रामअवतार काका पर पडी। उसने पूछा काका इतनी गर्मी में इस उम्र में कहाँ पाँच सौ रुपए के लालच में बस में धक्के खा रहे हो? काका ने तौलिए से पसीना पौंछते हुए कहा भाई कईं दिनों से डॉक्टर को आँख दिखानी थी। कईं बार पोतों को कहा। आजकल के छोरे वैसे मोटरसाइकिल पर शहर हांड आएँगे, लेकिन हॉस्पिटल के नाम पर एक से एक बहाने बनाएँगे। काका तू तो कई बार इन रैलियों में आया होगा ? तेरे टाइम क्या रेट था? रामकरण मास्टर ने रामअवतार से पूछा। भाई यह चोंचले तो तुम्हारे बखत शुरू हुए हैं। म्हारे बखत तो कहाँ गाडी घोडे थे? जनता पैदल ही या फिर ऊँट गाडी में आती थी। मैं तो एक बार ही आया था इमरजेंसी के बाद वाले चुनाव में। रामअवतार ने जवाब दिया। तो काका फ्री में ही आते थे तुम लोग? राजेश ने आश्चर्य से पूछा हाँ भाई, फ्री में ही आते थे। जब बडे नेताओं को देखने का चाव रहता था। अब तो टीवी मोबाइल में रोज उनके दर्शन तुम लोग करते हो, उस समय तो किसी रैली में दूर से देख लो वही बहुत था। रामअवतार ने आसपास देखते हुए कहा। तभी आसमान में गडगडाता हुआ हेलीकॉप्टर मँडराने लगा। भीड भी मंच की ओर बढने लगी।
शाम को जीप में आते हुए राजेश ने रामकरण मास्टर से पूछा गुरुजी कौन- सी कोचिंग आपको बढिया लगी? कोचिंग तो भाई सारी एक से बढकर एक हैं। किसी का नाम है तो किसी के पास दूसरे तामझाम हैं। मेन तो भाई लडके पर ही डिपेंड करता है। सलेक्शन तो हर छोटी बडी कोचिंग से हो ही रहे हैं। रामकरण मास्टर ने सधा हुआ जवाब दिया। जीप चलाते हुए ड्राइवर ने कहा गुरुजी ये कोचिंग वाले पैसा बहुत माँगते हैं। मैं भी मेरी भांजी का एडमिशन कराने गया था एक बार। फलानी फीस ढिकडी फीस कर के मेरे बेटे, जीरो जोडने में मिनट नहीं लगाते। सुंदर-सुंदर लडकियाँ और बिठा रखी है ! अब कोई मना भी करें, तो कैसे करें उनको? ड्राइवर की बात पर हँसते हुए रामकरण मास्टर ने कहा भाई दिखावा नहीं करें, तो वहाँ कबूतर उडे। राजेश, मैं तो कहूँगा उसी कोचिंग में छोरे को डाल, जिसका सबसे ज्यादा नाम है। नाम बनाने में सालों लग जाते हैं। ड्राइवर फिर बातचीत में कूदा गुरुजी नाम के पीछे सभी भागते हैं। नाम वाली कोचिंग में इतनी भीड है कि बालक पर कोई ध्यान नहीं देता। दूसरा मेरी भतीजी बता रही थी कि कोचिंग में मास्टर एक से दूसरी कोचिंग में भागते रहते हैं। जहाँ दो रुपए फालतू मिले वहीं चिडिया फुर्र।
गर्मियों में राजेश खुले चौक में ही खाट डाल कर सोता था। आज सोते-सोते हिसाब लगा रहा था पिछले साल और इस साल की सरसों बेचकर बेटे की कोचिंग की फीस का इंतजाम हो जाएगा। कुछ पैसे इसकी माँ ने भी दूध बेचकर बचा रखें हैं । एक साल का इंतजाम तो है, लेकिन यदि एक साल में सलेक्शन नहीं हुआ, तो अगली साल वापिस से फीस और रहने -खाने का खर्चा ....
एक आध दिन में रिजल्ट भी आने वाला है, कहीं दसवीं की तरह इस बार भी.....। इलाके के सबसे अच्छे स्कूल में ग्यारहवीं में साइंस में लडके के एडमिशन के लिए कहाँ-कहाँ चक्कर नहीं काटे थे राजेश ने। अपने मामा के लडके तहसीलदार से भी फोन कराया था, लेकिन हवासिंह नहीं माना। हवासिंह आज स्कूल का मालिक है। विधायक बनने के सपने देखता है, लेकिन यही हवासिंह एक समय टैक्सी चलाता था। उसी के गाँव के मोहर सिंह ने हवासिंह को उस पंजाबन के यहाँ ड्राइवर लगवाया था जिसका हाईवे पर होटल था। पंजाबन विधवा थी। इतनी मेहनत से उसने उस होटल को खडा किया था। इलाके के लोग कहते हैं हवासिंह ने उस पंजाबन पर कुछ जादू टोना कर दिया था। लेकिन हवासिंह का जादू टोना होटल पर नहीं चला। कितनी बार उसने होटल का नाम बदला। आखिर में उसने होटल बेच दिया और ना जाने किसके कहने पर स्कूल खोल लिया। सुना है स्कूल में उसके दो और पार्टनर हैं एक कोई अधिकारी और दूसरा उसके इलाके का पूर्व विधायक। राजेश पानी पीने उठा, तो कमरे के कोने से रोशनी दिखाई दी। राजेश अपने लडके पर चिल्लाया अब तो सो जा ! दिन-रात मोबाइल। वापस खटिया पर लेटते हुए राजेश बडबडाया साहबजादे को मोबाइल और खेलने के अलावा कुछ दिखता ही नहीं है। इकलौता लडका है , हमारी तरह इसके भी तीन-चार भाई होते, तो सब अक्ल ठिकाने आ जाती।
सुबह चाय पीने के बाद राजेश कल की रैली का वीडियो मोबाइल में देख रहा था, तभी उसकी पत्नी शकुंतला ने दूध की बाल्टी उसके सामने रखी। जाकर डेयरी वाले को दूध दे आओ । बाप बेटे दोनों मोबाइल में लगे रहते हो। पत्नी ने ताना दिया। उधर राजेश की बेटी जिसने दसवीं का इम्तिहान दिया था चाय के बर्तन धोते हुए बोली मम्मी आज भाई का रिजल्ट आने वाला है। आज के अखबार में खबर आई है। शकुंतला बडबडाई देखो लाड साहब क्या गुल खिलाते हैं इस बार, पिछली से पिछली साल तो दसवीं में हमारी छाती ठंडी कर ही दी थी।
आटे में पानी डालते हुए उसे याद आई वह शाम जब विनय का दसवीं का रिजल्ट आया था । शाम को राजेश ने कितना पीटा था विनय को । बडी मुश्किल से उसने राजेश से विनय को छुडाया था । विनय ने दो दिन खाना नहीं खाया और राजेश ने कई दिन विनय से बात नहीं की । अब भी विनय और राजेश की कहाँ बात होती है ? देखो आज की शाम क्या रंग लेकर आती है? शकुंतला के अंदर एक आशंका सुलगने लगी । शकुंतला ने अपनी लडकी से पूछा भाई कहाँ है? होगा कहाँ ? अपने कमरे में सो रहा है। रात भर मोबाइल चलाता है।
विनय को कल शाम ही पता चल गया था कि अगले दिन रिजल्ट आने वाला है । उसके बाद उसने खुद को कमरे में बंद कर लिया था । इसी तरह एक उदास शाम को दो साल पहले उसका रिजल्ट आया था जिसके बाद धीरे-धीरे उससे सब कुछ बिछड गया था उसे जीवन में पहली बार पता लगा की जीवन अंको का खेल है । अंक जो उससे दूर भागते हैं , अंक कितने ताकतवर हैं जिन्होंने उससे उसके यार दोस्त अध्यापक और घर परिवार सबसे दूर कर दिया था ग्यारहवीं कक्षा में सब कुछ बदल गया नया स्कूल और उसके बाद ट्यूशन के लिए एक मास्टर से दूसरे मास्टर के घर तक साइकिल से जाना उसने कितनी बार कहा मोटरसाइकिल दिला दो पर मोटरसाइकिल के बदले में मिली दुत्कार । क्रिकेट खेलना भी धीरे-धीरे उससे छूट गया। ग्यारहवीं की मार्कशीट को उसने कितने दिन अपनी कॉपी में छुपाए रखा था। परंतु उसका कुछ भी कहाँ छुपता है ? उसके ही मोहल्ले का संजीव जो दसवीं तक उसके साथ पढता था अब उससे भी वह कितना दूर हो गया है । 10वीं की बोर्ड परीक्षा में संजीव और उसके बीच पच्चीस प्रतिशत अंकों का फासला था । इन पच्चीस प्रतिशत में सब कुछ समाया था। संजीव का जिस स्कूल में एडमिशन हुआ उसमें उसके लिए जगह नहीं थी। स्कूल बदलते ही संजीव से बातचीत बहुत कम हो गई थी । संजीव गाँव का लाडला था । वह कितनी बार सपनों में संजीव से ज्यादा नंबर लाया था। लेकिन नींद टूटते ही सब कुछ वही पहले जैसा.....। दसवीं के रिजल्ट के बाद संजीव की फोटो और उसके नंबर कितनी बार उसके स्कूल ने विज्ञापन देकर अखबारों के स्थानीय संस्करण में छपवाए थे । सब कहते देख, संजीव को क्या देखे, वह संजीव को क्रिकेट से लेकर लूडो तक हर चीज में संजीव उससे पीछे, हाँ बस मार्कशीट में.....।
बाहर आजा, चाय पी ले । भाई साहब तो ऐसे मौज मार रहे हैं, जैसे फौजी छुट्टी आया हो । कभी अपनी किताबों को भी देख लिया कर। राजेश की आवाज गूँजी।
पाँच बजने में पाँच मिनट कम थे । विनय टकटकी लगाए मोबाइल को ताक रहा था । वैसे खुद के रिजल्ट का उसे अनुमान था । खुद के रिजल्ट से ज्यादा उसे संजीव के रिजल्ट में दिलचस्पी थी । बात ही बातों में एक दिन उसने संजीव से उसके रोल नंबर पूछ लिए थे । उसके मन में हुलस उठी ,कैसा हो यदि संजीव के उससे भी कम नंबर आ जाए ? कैसा लगे उनका सब का चेहरा जो सारे दिन संजीव- संजीव करते रहते हैं ? फिर उसे अपने मामूली नंबर भी कितने अच्छे लगें । रिजल्ट आ चुका था । उसने धडकते दिल से अपने रोल नंबर और जन्मतिथि डाली । सामने लगभग उतने ही प्रतिशत थे, जितने उसके दसवीं में आए थे । तीन प्रतिशत की मामूली वृद्धि जरूर हुई थी। अब उसने संजीव से रोल नंबर डाले। उसमें और संजीव में सत्ताईस प्रतिशत अंकों की दूरी थी । इसके बाद उसने अपने साथ के कईं लडकों का रिजल्ट देखा, लेकिन उसके दिमाग में सत्ताईस प्रतिशत रेंगता रहा ।
उससे पूछ क्या रहा ? राजेश ने अपनी पत्नी से कहा । पत्नी ने चिंतित होते हुए कहा कमरे का दरवाजा नहीं खोल रहा और ना ही कोई जवाब दे रहा है । राजेश ने गुस्से में कहा तेरा बेटा और कर भी क्या सकता है । दसवीं वाला ही रिजल्ट आया होगा । कितना पैसे खर्च कर लो, कितने ट्यूशन पढा लो, लेकिन वही ढाक के तीन पात। उसने अपनी बेटी से कहा जाकर भाई के रोल नंबर लेकर आ बेटी ने खिडकी से पूछा भाई तेरे रोल नंबर? विनय ने रोते हुए कहा सात लाख पंद्रह हजार .... राजेश ने अपनी पत्नी की और मोबाइल करते हुए कहा यह है तेरे बेटे की दो साल की मेहनत ! तू जीवन भर दूध बेचती रह और मैं खेतों में हाड गलाता रहूँ। शकुंतला हमारी किस्मत में यही लिखा है । तभी मोहल्ले के एक आदमी ने आकर कहा भाई हरदयाल के छोरे संजीव ने तो इस बार जुलम ही कर दिया। मेरिट में आया है। जबर ही पढा भाई वो तो। राजेश ने बुझे हुए शब्दों में कहा किस्मत वाला है हरदयाल।
विनय के मोबाइल के व्हाट्सएप में दनादन मैसेज आ रहे थे गाँव के लडकों के व्हाट्सएप ग्रुप में सभी संजीव को बधाई दे रहे थे । जो लडके उसके सामने संजीव को किताबी कीडा, नामर्द और न जाने क्या क्या कहते थे । वे सब संजीव के साथ अपनी फोटो लगा रहे थे । कुछ विनय से उसका रिजल्ट पूछ रहे थे । उसे पता था हरामखोरों ने उसका रिजल्ट देख लिया है, लेकिन मजे लेने का मौका थोडी ना जाने देंगे यह लोग। कुछ दिलजले बार-बार उसके पास फोन कर रहे थे। उसने मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया । बाहर उसके पिताजी को कोई कह रहा था, गाँव का कोई एकाध बच्चा इस दलदल से निकल जाता है। दो-चार की किस्मत साथ देती है तो फौज पुलिस या मास्टर बन जाते हैं । बाकी खेती का तो तुझे पता ही है राजेश । इन नई औलादों से तो खेती भी नहीं होनी । खेत में जाने के लिए भी इन्हें मोटरसाइकिल चाहिए। सही कह रहे हो गुरुजी। सोच रहा हूँ विनय का एडमिशन पडोस के कस्बे के कॉलेज में करा कर फौज- पुलिस की भर्ती के लिए किसी एकेडमी में भेज दूं। राजेश ने कहा राजेश जब से हरदयाल के घर से आया था। उसका गुस्सा भडका हुआ था। आज हरदयाल के घर विधायक, प्रधान, सरपंच, हवासिंह सब आए हुए थे। संजीव का सम्मान करने के लिए। गाँव के लोगों की भीड भी वहाँ इकट्ठा थी। सब एक ही बात कह रहे थे। हरदयाल की तो किस्मत ही फिर गई। राजेश ने अखबार के स्थानीय संस्करण को, जिसमें हवासिंह ने संजीव को बधाई के लिए एक पन्ने का विज्ञापन दिया था, एक तरफ फेंकते हुए अपनी पत्नी से कहा कहाँ है तेरा लाडला? राजेश की बेटी ने कहा पापा यदि मेरे दसवीं में नब्बे परसेंट नंबर आ जाएँगे, तो आप मुझे साईकिल दिला दोगे ना? राजेश ने गौर से उसके चेहरे की ओर देखा और धीरे से कहा हाँ बेटी। सुबह संजीव की माँ मिठाई देने आई थी, जिसे राजेश की बेटी के अलावा किसी ने हाथ नहीं लगाया ।
विनय सुबह ही बिना कुछ खाए पिए खेतों की ओर निकल गया था । गाँव के लडकों के व्हाट्सएप ग्रुप में लडके संजीव के घर आए एमएलए, प्रधान के साथ सेल्फी डाल रहे थे। एक पेड के नीचे बैठे विनय ने सोचा आज ये सब संजीव के पीछे दीवाने हो रहे हैं। इसी संजीव को बचपन में मैंने कितनी कुश्तियों में हराया है। कितनी बार स्कूल से आते हुए इसका हाथ मरोडा है, कितनी बार बचपन में मारदडी में कपडे की गेंद से इसकी रेल बनाई है। और आज इस संजीव के अलावा किसी को कुछ दिखता नहीं । काश! यह संजीव ना होता, तो उसका जीवन कितना अच्छा होता । और अगर संजीव नहीं रहे तो..... कितना कुछ इस संजीव ने घेर रखा है । इसके जीवन की छाया कितनी लंबी है.. जिसमें उसके सिवा किसी को कुछ दिखाई ही नहीं देता । न रह कर भी संजीव उसके घर में कितना रहता है ? इस गाँव को हर घर में एक संजीव चाहिए । सब टीचरों को क्लास में संजीव चाहिए । विनय आखिर कहाँ जाए ? अंक कितने शक्तिशाली होते हैं । पुराना जमाना ही ठीक था अखबार में रिजल्ट देखो और फिर दस -बीस दिन बाद चुपचाप से स्कूल जाकर मार्कशीट ले आओ पर अब ? रिजल्ट आया नहीं , उससे पहले व्हाट्सएप ग्रुप में स्क्रीनशॉट हाजिर । कुछ अंक आपकी झोली में आ गए उसे सब झाँक कर देख रहे हैं। उसने निश्चय कर लिया । उसे इस दयनीय मार्कशीट के साथ नहीं जीना। उसका फोन बजा। मामा का फोन था, उसने काट दिया। मुझे पता था मामा क्या कहेंगे। सबके पास अपनी शिकायत हैं। फोन को स्विच ऑफ कर वह कुएँ के पास पहुँच गया उसने सोचा कुएँ में एक छलांग और उसकी मार्कशीट कुए के अँधेरे में गुम हो जाएगी। तभी उसे रिश्ते के चाचा की आवाज आयी यहाँ क्या कर रहा है? चल घर चल।
शाम को उसने संजीव को व्हाट्सएप मैसेज किया बधाई हो, कुछ समय बाद जवाब में एक स्माइली आई। साला अपने आप को समझता क्या है। जवाब में कुछ लिखने में भी इसकी शान घटती है। रात को उसने बाहर चौक में ही खाट डाल ली। पास की खाट पर सोये राजेश ने उसे देखकर करवट बदल ली। विनय ने तारों की ओर देखते हुए सोचा यह टिमटिमाते नन्हे तारे ध्रुव तारे को देखकर क्या सोचते होंगे ? इन तारों का तो कोई नाम भी नहीं जानता । इन असंख्य बेनाम तारों को देख कर ध्रुव तारा कैसे मुस्कुराता होगा? काश! उसके पास संजीव की मार्कशीट होती । अमीर मार्कशीट कितना बडा पुल होती है जिससे कितने जाने-अनजाने रिश्ते और व्यक्ति अपना सफर तय करते हैं । एक उसकी मार्कशीट है जिसने उसे नितांत अकेला कर दिया है । गली में घूमता कुत्ता, जो अक्सर उसके घर के बाहर बैठा रहता था ,जिसे वह प्यार से रोटियाँ डालता था, भोंक रहा था। उसे लगा यह कुत्ता भी मुझ पर ही भोंक रहा है।
सुबह अखबार में संजीव की फोटो देखकर उसे ख्याल आया, कल यदि वह कुएँ में समा जाता, तो क्या आज उसकी फोटो आती? माँ फोन पर बात कर रही थी जिसके कुछ टुकडे उस तक पहुँच रहे थे माँ कह रही थी पढाई में दिमाग नहीं चलता इसका बेचारा क्या करें जोर तो खूब लगाया था सबकी किस्मत में पढाई कहाँ होती है ? विमला और उसका पति हरदयाल दोनों अनपढ हैं, लेकिन छोरे के हाथ में विद्या की रेखा है, आज उनके छोरे संजीव का फिर अखबार में फोटो आया है।
पास बैठी बहन ने कहा भाई मेरा दसवीं का रिजल्ट आने दे । तेरे से कम से कम बीस परसेंट नंबर ज्यादा लाऊँगी। संजीव भाई से पूछ कर मैंने ग्यारहवीं की पढाई भी शुरू कर दी है। उसके क्लास टीचर का तीसरी बार फोन आया दो बार उसने उठाया नहीं था। टीचर ने बधाई देने के लिए संजीव का नंबर माँगा । उसने चुपचाप संजीव का नंबर टीचर को मैसेज कर दिया। फेसबुक खोला, तो वहाँ उसे टैग करके अनेक लोगों ने संजीव को बधाई दे रखी थी ।
शाम होते ही विनय संजीव के घर की ओर चल पडा। संजीव बैठा कुछ पढ रहा था । विनय ने मन ही मन सोचा इस साले को किताबों के अलावा किसी चीज से कोई मतलब नहीं है । वह संजीव के गले लगा और बधाई दी। संजीव की माँ ने उसे मिठाई खिलाई । मिठाई खाकर पानी पीते हुए विनय ने संजीव से कहा आजा बाहर खेतों की ओर चलते हैं। क्या दिन भर घर में बैठा रहता है। कभी बाहर ताजी हवा में भी निकला कर। संजीव की माँ ने दोनों को एक चुटकी नमक देते हुए कहा हाँ, भाई दोनों बाहर घूम आओ।
खेतों की ओर चलते हुए संजीव उसे बता रहा था , कई कोचिंग वालों के फोन आए हैं उसके पापा के पास, उसकी फीस भी नहीं लगेगी और स्कॉलरशिप मिलेगी वह अलग । एक-दो दिन में वह पापा के साथ शहर जाएगा कोचिंग देखने और बता आगे तेरा क्या इरादा है ? संजीव ने उससे पूछा। इरादा वह अपने इरादे के बारे में सोच कर एकाएक काँप गया । कुछ नहीं, पास के कस्बे में कॉलेज में फार्म डालूँगा और... देखो घरवालों की इच्छा। उसने सामान्य होते हुए जवाब दिया । चलते-चलते वे उसी पेड के पास पहुँच गए थे जहाँ कल विनय अकेला बैठा था। विनय ने गौर से संजीव के चेहरे की तरफ देखा उसे उसकी आँखों में गाँव, स्कूल, अखबार, अपने माता पिता और न जाने क्या-क्या दिखा। शाम के धुँधलके में जैसे ही संजीव ने दूसरी ओर देखा, विनय ने एक बडा पत्थर उठाकर उसके सर पर दे मारा। विनय के गिरते ही उसने पत्थर फिर से उठाकर विनय के सर पर मारा । खुन से सने पत्थर को एक तरफ फेंक पर संजीव को घसीटते हुए पास के कुँए तक ले गया और कुएँ की और उसका शरीर धकेल दिया। उसने आसपास देखा। नीरव सन्नाटे में उसे खुद से ही डर लगा। कुएँ में उसने झाँका। कुएँ में फैले अँधेरे में उसने अटकते हुए, भर्राये हुए गले से आवाज दी संजीव.. कुएँ से गूँजती हुई वापस लौटती आवाज आई संजीव..। लौटते हुए रास्ते में पानी पीने के लिए विनय हैंड पंप के पास रुका। पानी पीते हुए उसे याद आया बचपन में स्कूल से लौटते हुए वह और संजीव इसी हैंड पंप पर पानी पीते थे। याद आया स्कूल का वह दिन, जब होमवर्क पूरा नहीं करने पर उसने कहा था सर,मेरी कॉपी घर पर रह गई । अविश्वास से देखते मास्टरजी ने जैसे ही छडी आगे बढाई , संजीव ने तपाक से कह दिया सर, इसकी कॉपी मेरे पास थी। मेरी गलती से वह मेरे घर रह गई। सुनकर मास्टरजी की छडी पीछे हट गई। याद आई भूतों की वे कहानियाँ जो उन्होंने बडों से सुनी थी, जिसके कारण हवेली के सामने से गुजरते हुए दोनों एक-दूसरे का हाथ थाम लेते थे । याद आई वे निमोलियाँ जो नीम के पेड के नीचे वे इकट्ठा करते थे । याद आया संजीव की हथेली का वह स्पर्श जो विनय के कंधे पर देर तक रहा था, जब दसवीं का रिजल्ट आया था और भी न जाने क्या-क्या विनय को याद आ रहा था। विनय हैंडपंप पकड कर रोने लगा। याद आई उसे संजीव की माँ जो बचपन में सिलाई मशीन से उसके स्कूल का बस्ता सीलती थी । याद आया उसे संजीव का पिता हरदयाल जिसने कभी क्रिकेट में ट्राॅफी जीतने पर उसे कंधों पर बिठा लिया था। विनय लडखडा कर वहीं बैठ गया ।
अगले दिन सुबह अखबार के स्थानीय संस्करण में स्कूल और कोचिंगों के विज्ञापनों के बीच एक हत्या की खबर छपी थी, जिसमें संजीव का फोटो था। विनय का फोटो आज भी नहीं छपा था।
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सम्पर्क : जी-7, आनंदा अपार्टमेन्ट,
कैलास सरोवर कॉलोनी, पत्रकार कॉलोनी, मानसरोवर एक्सटेशन, जयपुर - ३०२०२०,
मो. ९४६२२३१५१६