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रामराज्य और स्वराज्य

श्रीभगवान सिंह
रावण-राज्य को मिटा कर रामराज्य की स्थापना कर सकेंगे। यह रामराज्य ही स्वराज्य है।
-महात्मा गाँधी
पराधीन भारत के संदर्भ में स्वराज्य की बात करने वाले गाँधीजी पहले व्यक्ति नहीं थे। उन्नीसवीं सदी के उतरार्द्ध से, विशेषकर 1857 के स्वाधीनता संग्राम के पश्चात् भारत के चिंतन-व्योम में स्वराज्य के मंत्र गूँजने लगे थे। आधुनिक हिन्दी के युग-प्रर्वतक साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने 1868 ई. में ही अपनी प्रकाशित पत्रिका कविवचन सुधा में अपधर्म छूटे, स्वत्व निज भारत गहै, कर दुख बहै के सिद्धान्त-वाक्य के रूप में एक तरह से स्वराज के मंत्र का उद्घोष कर दिया था। वर्ष 1908 में राजद्रोह के तथाकथित अपराध में छह वर्षों की कारवास की सजा पा चुके लोकमान्य तिलक का स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और उसे हम लेकर रहेंगे उद्घोष भारत के बौद्धिकों तथा राजनीतिक वातावरण में अनुगूँजित होने लगा था। किन्तु इस स्वराज का कैसा स्वरुप होगा, यह लोगों के सामने स्पष्ट नहीं था। स्वराज की इसी पृष्ठभूमि में गाँधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए वर्ष 1909 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिन्द स्वराज की रचना की थी जिसमें स्वराज को सूत्ररुप में परिभाषित करते हुए कहा था- अपने मन का राज स्वराज है, उसकी कुंजी सत्याग्रह, आत्मबल या करुणा बल है ; उस बल को आजमाने के लिए स्वदेशी को पूरी तरह अपनाने की जरुरत है।
इतने स्पष्टीकरण के बावजूद यह स्पष्ट होना बाकी था कि यह स्वराज किस प्रकार की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था लानेवाला होगा। स्वराज के अर्थ को और अधिक मूर्त करना शुरु किया महात्मा गाँधी ने 1920 से जब उन्होंने पूरे देश में ब्रिटिश शासन के खिलाफ असहयोग आंदोलन का सूत्रपात किया। स्वराज का मतलब समझाने के लिए उन्होंने जिस एक शब्द का प्रयोग करना शुरु किया वह था रामराज्य। उदाहरणार्थ नवम्बर 1920 को नासिक में दिए गए उनके भाषण का यह अंश देखा जा सकता है- आजकल जो हुकूमत हम पर शासन कर रही है, वह केवल राक्षसी है। मैं उसे रावण-राज्य कहता हूँ। ऐसी राक्षसी हुकूमत में रहने वाली रैयत क्या करे; तुलसीदास ने कहा है कि जो असंत हैं, जो बुरे हैं, उनकी असंगति की जाए, उनका संग छोडा जाए, उनकी मुहब्बत तोड दी जाए, उनसे असहयोग किया जाए, उन्हें मदद देना बंद कर दिएा जाए। यह एक यज्ञ है, उसमें जब हम अपना बलिदान देंगे, तभी खुद शुद्ध होंगे और रावणराज्य को मिटा कर रामराज्य की स्थापना कर सकेंगे। यह रामराज्य ही स्वराज्य है। स्वराज्य स्थापित किये बिना हम इस राक्षसी राज्य से छूट नहीं सकते।1
उल्लेखनीय है कि 1909 में लिखी पुस्तक हिन्द स्वराज में गाँधीजी ने थोरो, कारपेन्टर, रस्किन, टॉल्सटॉय जैसे पश्चिमी विचारकों के प्रभाव का उल्लेख किया है। अपनी आत्मकथा (सत्य के प्रयोग) में भी उन्होंने रस्किन की पुस्तक अनटू द लास्ट के अपने ऊपर पडे अमिट प्रभाव की चर्चा की है जिसे वे 1904 में ही दक्षिण अफ्रीका में रहते पढ चुके थे और सर्वोदय नाम से उसका भाषा-रुपान्तर भी प्रस्तुत किया था। जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि हिन्द स्वराज में उन्होंने स्वराज का अर्थ मन का राज बताया था, लेकिन 1920 में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध शुरु किए गए असहयोग आंदोलन का उद्देष्य-स्वराज्य के रूप में सर्वोदय नहीं बल्कि रामराज्य की स्थापना करना बतलाया। यह बात भी ध्यान में रखने लायक है कि असहयोग आंदोलन को सफल बनाने के लिए गाँधीजी को तत्कालीन अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के दबाव में भले ही मुसलमानों का समर्थन प्राप्त करने के लिए खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने को विवश होना पडा, लेकिन अपने आंदोलन का उद्देश्य उन्होंने भारत में खिलाफत हुकूमत कायम करना नहीं, बल्कि स्वराज्य के रूप में रामराज्य लाना ही बतलाया। गाँधीजी के सचिव महादेव भाई देसाई की डायरी (गाँधीजी के साथ पच्चीस वर्ष) जो दस खंडों में है, पढने पर मालूम होता है कि गाँधीजी देश के विभिन्न प्रदेशों में भ्रमण करते हुए जनता को यही बताते रहे कि स्वराज्य लाने का मतलब है रामराज्य लाना।
उस समय के राजनीतिक माहौल को देखते हुए गाँधीजी द्वारा रामराज्य लाने की बात करना विचित्र लगता है। उल्लेखनीय है कि 1917 में रूस में बोल्शेविक क्रांति हो चुकी थी और वहाँ पर समाजवादी समाज बनाने का काम तेजी से चल रहा था। उस समय भारत के अधिकांश पढे-लिखे बुजुर्ग एवं युवक रूसी क्रांति से प्रभावित होकर भारत में भी समाजवाद लाने के लिए मचलने लगे थे। लोकमान्य तिलक, लाला लाजपतराय जैसे बुजुर्ग राष्ट्रवादी नेता, रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसे साहित्यकार भी रूसी क्रांति के प्रशंसक थे। लोकमान्य तिलक और लाजपतराय तो अपने साम्राज्यवाद विरोधी तेवर के कारण ब्रिटिश शासन द्वारा बोल्शेविक एजेन्ट तक समझे जाते थे। रूसी क्रांति के प्रभावान्तर्गत भारत में साम्यवाद लाने की मंशा से 1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हो चुकी थी। गाँधीजी के परम शिष्य समझे जानेवाले जवाहरलाल नेहरु भी रूसी क्रांति से प्रभावित होकर भारत के संदर्भ में वैज्ञानिक समाजवाद पर जोर देने लगे थे और 1934 में कॉग्रेस के अंदर ही आचार्य नरेन्द्रदेव, जयप्रकाश नारायण, मीनू मसानी, राममनोहर लोहिया जैसे युवकों ने समाजवाद की दिशा में आगे बढने के लिए काँग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना कर डाली थी। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेषन के क्रांतिकारी युवक भी रूसी क्रांति से प्रेरित हो, भारत में समाजवाद का सपना संजोए हुए थे। लेकिन महात्मा गाँधी एक मात्र ऐसी शख्सियत थे जो इन सबसे अप्रभावित रह कर स्वराज का मतलब रामराज्य जैसी राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था कायम करना बतलाते रहे। अतएव यह विचारणीय हो जाता है कि समाजवाद या साम्यवाद जैसी अत्याधुनिक वैचारिकी को ओट देकर क्यों गाँधीजी रामराज्य जसी पुरातन अवधारणा को देश के सामने आगे करते रहे।
यों तो रामकथा को लेकर वाल्मीकि से लेकर मध्यकाल तक अनेक काव्य-ग्रंथ लिखे जा चुके थे, लेकिन रामराज्य के रूप में एक आदर्श राजनीतिक व्यवस्था या राजकीय शासन प्रणाली के रूप में एक सुचिंतित परिकल्पना प्रतिपादित करने का कार्य किया। मध्यकाल में गोस्वामी तुलसीदास ने अपने महाकाव्य रामचरितमानस में। रामराज्य तुलसीदास की निजी सृष्टि है- परिकल्पना ह। गाँधीजी ने तुलसी और रामचरितमानस को खूब पढा था और उनसे काफी प्रभावित भी थे जिसका सविस्तार प्रामाणिक विवेचन मैंने अपनी पुस्तक तुलसी और गाँधी में किया है। किन्तु यहाँ पर यह देखना अभीष्ट है कि गाँधीजी क्यों स्वराज्य को परिभाषित करने के लिए हमेशा तुलसी प्रणीत रामराज्य का सहारा लेते रहे। इसके लिए आवश्यक है कि पहले हम तुलसी परिकल्पित रामराज्य की विशेषताओं पर दृष्टिपात कर लें।
रामचरितमानस के पाठकों को ज्ञात है कि मानस के छह सोपानों यानी कांडों के बाद उत्तरकांड में तुलसीदास रामराज्य का चित्र अंकित करते हैं जो संभाव्य चेतना के रूप में एक परिकल्पित चित्र है। इसके पूर्व उनके काव्य नायक रामचंद्र पृथ्वी को पीडित, दमित, दलित करनेवाले समस्त असुरों का सफाया कर भय, अभाव, दोहन, दमन, दलन दैत्य से मुक्त करते हैं तब वे ऐसे राज्य के संस्थापक बनते हैं जहाँ-
राम राज बैठे त्रैलोका।
हरषित भय गए सब सोका।।
बयरू न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप विषमता खोई।।
बरनाश्रम निज निज धरम,
निरत वेद पथ लोग।
चलहिं सदा पावाहिं सुखहि,
नहि भय सोक न रोग।।
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
रामराज नहिं काहुहि व्यापा।।
सब नर करहिं परस्पर प्रीति।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।
अल्पमृत्यु नहि कवनिउ पीरा।
सब सुंदर सब बिरूज सरीरा।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना।
नहि कोउ अब्रध न लच्छन हीना।।
सब निर्दम धर्मरत पुनी।
नर अरूनारिचतुर सब गनी।।
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी।
सब कृतज्ञ नहि कपट सयानी।।
एक नारिब्रत रत सब झारी।
ते मन बचन क्रम पति हितकारी।।
दंड जतिन्ह कर भेद जहँ, नर्तक नृत्य समाज।
जीतहु मनहि सुनिअ अस, रामचंद्र के राज।।
यह है तुलसी के राम द्वारा स्थापित राज में राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक जीवन का एक परिकल्पित चित्र। इस शासन व्यवस्था में राम के प्रताप यानी कृतित्व से विषमता समूल नष्ट हो गई है, सभी नागरिक दैहिक, दैविक, भौतिक कष्टों से मुक्त होकर सौहार्दपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। भले ही इस राज्य में बडे-बडे कारखानें और अस्पताल नहीं है लेकिन सभी नर-नारी अपने-अपने रोजगार धंधे से जीविका अर्जन करते हुए धर्म एवं नीति का पालन करते है। सब सुंदर और स्वस्थ देहधारी हैं, क्योंकि न कोई दरिद्र है न मूर्ख। सब उत्तम लक्षणों से परिपूर्ण ज्ञानी एवं पंडित हैं। न कोई दलित है, न दमित, न शोषित। यहाँ पर कोई प्रतिस्पर्धा नहीं, जीतने के लिए कोई बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि अपना मन ह। यहाँ शासन का दंड-भय नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के स्वैच्छिक आचरण को नियंत्रित करनेवाले धर्म और नीति की प्रधानता है। यहाँ पर वर्ग, वर्ण, लिंग, सम्प्रदाय के आधार पर कोई भेद नहीं, अछूतपन का कोई वजूद नहीं, न किसी औरत के लिए जिस्मफरोशी की मजबूरी है। पश्चिमी चिंतन की एक धारा ने उस शासन को उत्तम माना है जो व्यक्तियों पर कम-से-कम शासन करता है और जहाँ व्यक्ति-स्वांतत्र्य का उपयोग हरेक व्यक्ति आत्मानुशासन, संयम तथा मर्यादा पालन के लिए करता है। यही स्थिति तो रामराज्य में दिखाई पडती है।
रामराज्य की इन्हीं राजनीतिक, सामजिक, आर्थिक, धार्मिक, शैक्षिक खूबियों को ध्यान में रखते हुए गाँधीजी 1920 में शुरू हुए असहयोग आंदोलन से लेकर 1922 में उसके स्थगित करने के बाद भी अपने रचनात्मक कार्यों के प्रचार में देश के विभिन्न प्रांतों में घूमते हुए बार-बार स्वराज्य के लिए रामराज्य का रुपक जनता के सामने रखते रहे। इस संदर्भ में द्रष्टव्य हैं उनके कुछ कथन।
दिसम्बर 1924 में बेलगाँव में काँग्रेस का वार्षिक अधिवेषन हुआ था। अधिवेशन समापन के बाद शाहपुर नगर पालिका में अभिनंदन पत्र दिए जाने के अवसर पर गाँधीजी ने अपने भाषण में कहा-स्त्रियों से मैं कहता हूँ कि स्वराज्य अच्छी बात है। परन्तु मैं तो स्वराज्य का अर्थ रामराज्य समझता हूँ। यह रामराज्य वहाँ है, जहाँ स्त्री अति स्वच्छ, पवित्र गुणवान हों। सीता, दमयन्ती जैसी प्रातः स्मरणीय स्त्रियाँ हिन्दुस्तान में हो तो उद्धार है।2
दो जनवरी 1925 को दोहद में स्त्रियों की सभा में गाँधीजी ने कहा - आपने रामराज्य के बारे में सुना होगा। स्वराज्य शब्द सुना होगा। जिसने रामराज्य का स्वाद चखा है, उसे स्वराज्य का स्वाद चखने की जरूरत नहीं। इस राज्य का अर्थ क्या है? रामराज्य में सारी प्रजा सुखी थी। सबको दो वक्त खाना मिलता था। स्त्री-पुरुष सच बोलते थे। व्यापारियों में एक-दूसरे का विश्वास था। पुरुषों की नजर साफ और पवित्र थी। रामराज्य में जैसे हर घर में चूल्हा होता था, उसी तरह प्रत्येक घर चरखा था। सब स्त्रियाँ इसे धर्म समझ कर काततीं थीं। राजा और रंक सबके घरों में चरखा चलता था, इसलिए सबके यहाँ बरक्कत थी।3
गौरतलब है स्वराज्य को रामराज्य के समरूप बताते हुए गाँधीजी ने जिन विशेषताओं को बताया, वे तुलसी प्रणीत रामराज्य में मौजूद हैं। याद करें उनकी चौपाई- नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना।। अर्थात सभी सुखी थे, आत्मनिर्भर थे। हाँ, तुलसीदास ने चरखे का जिक्र नहीं किया है, गाँधीजी ने चरखे का समावेश करके प्रकारान्तर से आर्थिक स्वावलम्बन का वह संदेश दिएा जो तुलसी ने बरनाश्रम निज निज धरम निरत वेद पथ लोग। चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहीं भय सोक न रोग जैसे कथन से दिएा था। यानी सभी वर्ण के लोग अपना-अपना रोजगार धंधा सत्य और ईमानदारी का पालन करते हुए करते थे। दरअसल गाँधीजी समस्त देशवासियों की आर्थिक विपन्नता को दूर करने का एक अचूक अस्त्र चरखे को मानते थे। इसलिए आर्थिक स्वावलम्बन पर जोर देने के लिए रामराज्य में एक और नया आयाम दे देते हैं। जब किसी ने गाँधीजी से पूछा कि लोकमान्य तिलक के स्वराज्य में चरखे का जिक्र नहीं है, तो गाँधीजी ने उत्तर दिएा था कि स्वराज्य में चरखे को शामिल कर मैं उसे और अधिक विस्तार देना चाहता हूँ। ठीक वैसे ही रामराज्य के संदर्भ में भी चरखे का जिक्र कर उसे गाँधी और ज्यादा विस्तार देते हैं। ऐसा ही रामराज्य लाने की गुहार वे जगह-जगह पर लगाते रहे। मसलन, आठ जनवरी 1925 को काठियावाड राजकीय परिषद् के भाव-नगर अधिवेषन में राजकोट के ठाकुर साहब को मानपत्र देते हुए गाँधीजी ने कहा - यह मानपत्र कृपा करके पढिएगा और मेरे भाषण का मनन कीजिएगा और मेरा रेखांकित रामराज्य राजकोट को दीजिएगा, यह मेरी नम्र प्रार्थना है।4
स्त्रियों की गर्हित अवस्था से उद्धार भी गाँधीजी स्वराज्य का एक महत्त्वपूर्ण विषय मानते थे और इसके लिए भी वे रामराज्य का ही उदाहरण सामने रखते थे। पन्द्रह जनवरी 1925 को सोजिगा में किसान-सम्मेलन के बाद महिला परिषद् में बोलते हुए गाँधीजी ने कहा - बहनों के सामने मैं रामराज्य की बातें करता हूँ। रामराज्य स्वराज्य से भी बडा है। इसलिए रामराज्य वहीं हो सकता है, जहाँ सीता की उत्पत्ति संभव हो। हम कुछ हिन्दू श्लोक पढते हैं, उनमें से एक श्लोक स्त्रियों के बारे में है। उसमें प्रातः स्मरणीय स्त्रियों का उल्लेख है। इन सती स्त्रियों में सीता का नाम तो होगा ही 5 रामराज्य को साकार करने में स्त्रियों की भूमिका को महत्त्वपूर्ण मानते हुए उन्होंने अठारह जनवरी 1925 को भुवासण में स्त्रियों को संबोधित करते हुए कहा - बहनों, मैं यह चाहूँगा कि आप विदेशी वस्त्र को हरगिज स्थान न दें। आप हाथ से काते हुए सूत को बनवा कर पहनें तो कितना अच्छा हो। आफ द्वारा ही रामराज्य की आकांक्षा पूरी होगी। आप सीता जैसी हो जाएँ, तो कितना अच्छा हो।6
देशी रियासतों के राजाओं से भी गाँधीजी अपने राज्य को रामराज्य जैसा बनाने की गुहार लगाते रहे। मसलन, पन्द्रह फरवरी 1925 को राजकोट में मान-पत्र दिए जाने के बाद गाँधीजी राजकोट के ठाकुर साहब को लक्ष्य करके बोले- मैं ठाकुर साहब के सामने अवश्य शिकायत रखूँगा, रो कर राज्य लूँगा। इसलिए उनसे कहूँगा कि आप जो स्नेह दृष्टि प्रजा के अन्य वर्गों पर रखते हैं, वही स्नेह -दृष्टि अन्त्यजों पर भी रखना तभी यह राज्य छोटा-सा होने पर भी सारी पृथ्वी पर सुषोभित होगा और रामराज्य बनेगा। वाल्मीकि ने कहा है कि श्री रामचंद्र ने कुत्ते को भी न्याय प्रदान किया और तुलसीदास ने कहा कि जो चांडाल कहलाता है, उससे राम ने दोस्ती की। भरत निषादराज के पीछे पागल होकर गए थे।7 गाँधीजी जहाँ भी स्वराज्य की बात कहते वहाँ वे स्वराज्य का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए रामराज्य का उल्लेख अवश्य करते थे। 19 फरवरी 1925 को अपने जन्मस्थान पोरबंदर में बोलते हुए उन्होंने कहा -हम स्वराज्य चाहते हों, रामराज्य चाहते हों, तो हम सबको स्नेह की गाँठ बँधवानी होगी। यह स्नेह की गाँठ है हाथ कते सूत की गाँठ। यह सूत विदेशी हो तो वह लोहे की बेडी बन जाए।8
रामराज्य गाँधी के चिंतन में इतना रच बस गया था कि वे विभिन्न प्रसंगों में इसक जिक्र किए बिना मानो उन्हें संतोष नहीं होता था। दिसम्बर 1926 में वर्धा में मान-पत्र दिए जाने के अवसर पर उनका यह कथन गौरबतलब है-मनुष्य से जितना विचार हो सकता है, उतना मैं ने अपनी शान्ति के समय में कर लिया है। यदि यह सब हो जाए, तो आज ही रामराज्य मिल सकता है। इसके लिए बडे राज्य प्रकरण की आवश्यकता नहीं है।9 रामराज्य देखनी की तीव्र इच्छा से गाँधी का मानस सदैव परिचालित होता रहता था और स्त्री, मजदूर, किसान जिस की भी सभा हो, वहाँ उसे वे प्रकट किए बिना नहीं रहते थे। 11 फरवरी 1927 को अमलनेर में मजदूरों के बीच बोलते हुए उन्होंने कहा-मजदूर मुझे रुपये की सहायता देते हैं, इसका कारण है कि मैं मजदूर हूँ। धर्म-पालन और धर्म की समझ दोनों अलग-अलग चीजें हैं। यदि धर्म की समझ के साथ धर्म-पालन आ जाए, तो तुरंत रामराज्य आ जाए।10
गाँधीजी दक्षिण भारत हो या दक्षिण में सुदूर श्रीलंका हो, वहाँ के शासकों एवं जनता के बीच भी रामराज्य का आदर्श प्रस्तुत करने से परहेज नहीं करते थे। मैसूर में अगस्त 1927, अस्पृश्यता, बाल-विधवाओं आदि का जिक्र करते हुए गाँधीजी ने मैसूर राज्य को रामराज्य जैसे आदर्श राज्य पर चलने की अपील की - मैसूर सच्चा आदर्श राज्य बने और रामराज्य नाम के योग्य हो, इसके लिए जितना करने की जरूरत मुझे महसूस होती है, उसकी ओर मैं ने आपका ध्यान खींचा है।11 फिर नवम्बर 1927 श्रीलंका के कोलम्बो शहर में मदिरापान, माँसाहार (गोमांस) आदि के विरुद्ध वहाँ के लोगों को झकझोरते हुए से कहा - आप भारतवर्ष के साथ के संबंध का दावा करते हैं और रामायण की कथा के साथ अपने संबंध का समर्थन करते हैं, इसलिए आपको तो रामराज्य के बिना संतोष मानना ही नहीं चाहिए। इसी में स्वराज्य आ जाता है।12
गाँधी साहित्य का अध्ययन करने से पता चलता है कि गाँधीजी जिस स्वराज्य को हिन्दुस्तान की धरती पर मूर्त होते देखना चाहते थे, उसका पूरा चरित्र उन्हें रामराज्य में दिखाई पडता था। इसलिए वे हमेशा स्वराज्य की बात करते हुए उसके साथ रामराज्य को सम्बद्ध कर देते थे। 24 जनवरी 1928 को मोरवी में खादी, जाति प्रथा, अस्पृश्यता आदि को लेकर उन्होंने जो भाषण दिए, उसका यह अंश गौरतलब है - मेरी अपनी दृष्टि से स्वराज्य और रामराज्य एक ही हैं, यद्यपि लोगों के आगे मैं रामराज्य शब्द बहुत बार इस्तेमाल नहीं करता, क्योंकि बुद्धि के इस युग में स्त्रियों के आगे चरखे की बातें, बुद्धिवादी युवकों के आगे रामराज्य की बातें बकवास जैसी लगती हैं। इन्हें तो रामराज्य नहीं स्वराज्य चाहिए और ये स्वराज्य की चमत्कारी व्याख्याएँ करते हैं। मेरी दृष्टि में वे धूल के समान हैं। ......स्वराज्य की कल्पना सामान्य नहीं, पर वह रामराज्य है। वह रामराज्य कैसे आयेगा, कब आयेगा? जब राजा, प्रजा दोनों सीधे हों, जब राजा और प्रजा दोनों के हृदय पवित्र हों, जब दोनों त्याग की तरफ झुके हुए हों, भोग भोगने में भी संकोच और संयम रखते हों, जब दोनों के बीच पिता-पुत्र जैसा सुंदर व्यवहार हो, तब उस राज्य को हम रामराज्य कहेंगे। फिर इसी भाषण में इन्होंने डेमोक्रेसी तथा रामराज्य में अन्तर बताते हुए कहा - यह हम भूल गए, इसलिए डेमोक्रेशी (लोकतंत्र) की बातें करते हैं। आज डेमोक्रेशी का युग चल रहा है। मुझे इसके अर्थ की जानकारी नहीं। लेकिन कहा जाता है कि जहाँ प्रजा की आवाज सुनी जाती है, प्रजा के प्रेम की प्रधानता है, वहाँ डेमोक्रेशी है। किन्तु मेरे रामराज्य में सिर अथवा हाथ गिन कर प्रजा के मत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। इस ढंग से मत लिया जाए तो उसे मैं पंचों का मत नहीं मानूँगा। ऋषि-मुनियों ने तपश्चर्या करके देखा कि मनुष्य तपश्चर्या करते हों, प्रजाहित की भावना वाले हों और वे मत दें ,तो वह प्रजामत (जनमत) कहलायेगा। इसी का नाम सच्ची डेमोक्रेशी है। मेरे जैसा एक-आध भाषण देकर आपका मत चुरा ले जाए तो उस मत में प्रकट होनेवाली वस्तु डेमोक्रेशी नहीं है।1३
तुलसी प्रणीत रामराज्य की पूर्वोक्त विशेषताओं तथा गाँधीजी के उपरोक्त वक्तव्यों को ध्यान में रखने पर साफ-साफ दृष्टिगोचर होता है कि स्वराज्य के लिए गाँधी रामराज्य को ही रोल मॉडल मानते थे। इसीलिए वे बार-बार स्वराज्य कैसा होगा, कैसे आएगा, उसके लिए साम्यवाद या लोकतांत्रिक समाजवाद जैसे पश्चिमी चिंतन के शब्दों के बजाय अपनी देशज चिंतन-भूमि से उपजे रामराज्य शब्द का प्रयोग करते रहे। वस्तुतः गाँधीजी के सामने ही सोवियत संघ की वह तस्वीर साफ-साफ नजर आने लगी थी कि वहाँ पर सर्वहारा की तानाशाही (Dictatorship of the proletariat) के नाम पर हिंसात्मक दंड-विधान पर आधारित पार्टी नेतृत्व का वर्चस्व था और व्यक्ति स्वातंत्र्य पर राज्य का अत्यधिक अंकुश था। कटु, लेकिन वस्तु सत्य यह है कि समाजवादी समाज बनाने की ओट में स्तालिनकालीन सोवियत संघ में लाखों व्यक्तियों की स्वतंत्रता का अपहरण कर साइबेरिया के कन्सट्रेशन में कैम्प में भेज कर उन्हें मार दिएा गया। गाँधी का मानना था कि सोवियत व्यवस्था हिंसा पर टिकी हुई है, इसलिए वह टिकाऊ नहीं होगी। व्यक्ति पर समाज का नियंत्रण के बजाय धर्म एवं नीति के नियंत्रण को श्रेयस्कर माननेवाले गाँधी के लिए इसलिए रामराज्य अधिक उपयुक्त प्रतीत होता था जिसमें राज्य का नियंत्रण कम है नीति और धर्म का प्रभाव अधिक है।
दूसरी बात कि जिस तरह रामराज्य में किसी एक वर्ग, एक वर्ण, एक सम्प्रदाय, एक लिंग की नहीं, बल्कि इन विभेदों से परे सबकी उन्नति खुशहाली की स्थिति है, वैसी ही स्थिति गाँधी भी अपने देश में देखना चाहते थे जब यहाँ के हरेक व्यक्ति अपने निजी धंधों से खुशहाल रहे, जहाँ न स्त्री-पुरुष का भेदभाव रहे, न छूत-अछूत का भाव, न जिस्मफरोशी के लिए बाध्यता। वस्तुतः गाँधी जिस स्वराज्य के लिए प्रयत्नशील थे वह सबके उत्कर्ष, भौतिक-आध्यात्मिक उन्नति के लिए था। लेकिन दुर्भाग्यवश गाँधी को समग्रता में देखने-समझने के बजाय माक्र्सवादी-वामपंथी बुद्धिजीवी कुछ बातों को लेकर उन्हें पूँजीपतियों-सामंतों का समर्थक और जन-विरोधी सिद्ध करते रहे हैं। परन्तु सौ खंडों में प्रकाशित गाँधी वाङ्गमय से गुजरने पर पता चलता है कि गाँधीजी हमेशा कहते रहे कि स्वराज्य मुट्ठीभर लोगों के लिए नहीं, बल्कि किसानों, मजदूरों, गरीबों के लिए है, अस्पृष्यता मिटाने के लिए है, जिस्मफरोशी का धंधा करने को मजबूर पतिताओं’ के उद्धार के लिए है। गाँधीजी को ये सारी विशेषताएँ रामराज्य की परिकल्पना में दिखाई पडती थी। इसलिए वे बार-बार स्वराज्य की रूपरेखा स्पष्ट करने के लिए रामराज्य की बात किया करते थे।
दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह कि जिस तरह तुलसी परिकल्पित रामराज्य अतिशय उत्पादन, हिंसात्मक प्रतिस्पर्धा, विस्तारवाद, बाजारवाद, भोगवाद से मुक्त व्यक्ति के शारीरिक-श्रम पर आधारित रोजगार से सम्पन्न तथा मन एवं इन्द्रियों के वश में रखने, उन्हें जीतने की भावना से अनुप्राणित है, उसी तरह गाँधी भी मनुष्य को मशीनों का गुलााम बनाकर उनका खून चूसनेवाली मशीनी-उत्पादन-पद्धति के बजाय चरखे जैसे कुटीर उद्योग पर आधारित उत्पादन-पद्धति से हरेक स्त्री-पुरूष को आत्मनिर्भर होते देखना चाहते थे, वे मन को भटकानेवाले नाना आविष्कृत सामानों के बजाय मन को वश में करनेवाली व्यवस्था को पसंद करते थे। तुलसी के रामराज्य में जीतहु मनहिसुनिए अस रामचंद्र के राज तो गाँधी भी हिन्द स्वराज में सभ्यता को परिभाषित करते हुए कहते हैं-सभ्यता वह आचरण है जिससे आदमी अपना फर्ज अदा करता है। फर्ज अदा करने के मानी है नीति का पालन करना। नीति के पालन का मतलब है अपने मन और इंद्रियों को बस में रखना। ऐसा करते हुए हम अपने को पहचानते हैं। यही सभ्यता है। इससे जो उलटा है वह बिगाड करनेवाला है।
कितना साम्य है तुलसी भी रामराज्य में मन को जीतने को प्रमुखता देते हैं और गाँधी भी मन को वश में रखना सभ्यता की अपरिहार्य शर्त मानते हैं जिसका पश्चिम के राजनीतिक चिंतन में नितान्त अभाव है। मन और इन्द्रिय को यानी भोगवादी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने की बात न प्राचीन काल के दार्शनिक प्लेटो के आदर्श राज्य (Ideal state) में है न आधुनिक युग में प्रतिपादित कल्याणकारी राज्य (Welfare state) में है, न माक्र्सवाद या साम्यवाद के वर्गविहीन समाज या सर्वहारा का अधिनायकत्व (Dictatorship of the proletariat) में है। मन और इंद्रियों को वश में न रख सकने के कारण ही समाजवादी सोवियत संघ पूँजीवादी अमेरिका की राह पर चल पडा और अन्ततः विघटित हो गया। इसी के अभाव में आज कम्युनिस्ट चीन अमेरिका से भी अधिक साम्राज्यवादी, विस्तारवादी बनता जा रहा है। मन एवं इंद्रियों को वश में करके अध्यात्मोन्मुख होने की भारतीय विचार-सरणि को रामराज्य जैसी राजनीतिक व्यवस्था के साँचे में ढाला, तुलसी ने तो भौतिक से आगे बढकर मनुष्य के आध्यात्मिक उत्कर्ष पर बल देनेवाले गाँधी को रामराज्य की इस विशेषता ने भी प्रभावित किया, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता।
इन सबके अतिरिक्त रामराज्य में केवल मनुष्य-जाति का ही नहीं बल्कि मनुष्येतर प्राणियों-पषु, पक्षी, सारिता, कानन आदि के भी संरक्षण, सहअस्तित्व को प्रमुखता दी गई है। द्रष्टव्य है इस संबंध में रामराज्य का यह चित्र-
फूलहिं फरहिं सदा तरू कानन।
रहहि एक संग गज पंचानन।।
खग मृग सहज बयरू बिसराई।
सबन्हि परस्पर प्रीति बढाई।।
कूजहिं खग मृग नाना वृंदा।
अभय चरहिं बन करहिं अनंदा।।
प्रगटी गिरिन्ह बिबिध मनि खानी।
जगदातमा भूप जग जानी।।
सरिता सकल बहहिं बर बारी।
सीतल अमल स्वाद सुखकारी।।
सागर निज मरजादाँ रहहीं।
डारहिं रत्न तरन्हि पर लहहीं।।
सरसिज संकुल सकल ताडागा।
अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा।।
गौरतलब है कि रामराज्य में न सिर्फ मनुष्य बल्कि पशु-पक्षी, शेर, हाथी भी निर्भय होकर प्रेमपूर्वक जीवन जीने वाले हैं। यहाँ पर विकास के नाम पर न पशु-पक्षियों के आवासों को उन्मूलित होने का खतरा है, न पेड-वनों को अंधाधुंध काटे जाने, पहाडों को तोडे जाने तथा नदिएों-सरिताओं को बाँधे जाने का संकट है। रामराज्य के दायरे में मनुष्यों और मनुष्येतर-समस्त प्राणियों के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की जो सुरक्षा है, वही गाँधी के सभ्यता या स्वराज्य संबंधी चिंतन का मुख्य सरोकार था। उदाहरणार्थ 20.10.1927 के यंग इंडिया में उनके छपे लेख का यह अंश देखा जा सकता है-अहिंसा सब धर्मों में समान है, परन्तु हिन्दू धर्म में वह सर्वोच्च रूप म प्रगट हुई है और उसका प्रयोग भी हुआ है। (मैं जैन धर्म या बौद्ध धर्म को हिन्दू धर्म से अलग नहीं मानता) हिन्दू धर्म न केवल मनुष्य मात्र की, बल्कि प्राणिमात्र की एकता में विश्वास रखता है। मेरी राय में गाय की पूजा करके उसने दयाधर्म के विकास में अद्भुत सहायता की है। यह प्राणिमात्र की एकता में और इसलिए पवित्रता में विश्वास रखने का व्यावहारिक प्रयोग है। इसी प्रकार वनस्पतियों के संरक्षण को महत्त्वपूर्ण मानते हुए गाँधीजी ने 26.09.1929 के यंग इंडिया में लिखा-जब हम किसी पुस्तक को पवित्र समझ कर उसका आदर करते हैं, तो हम मूर्ति पूजा ही करते हैं। पवित्रता या पूजा के भाव से मंदिरों या मसजिदों में जाने का भी वही अर्थ है, लेकिन इन सब बातों में मुझे कोई हानि नहीं दिखाई देती। उलटे मनुष्य की बुद्धि सीमित है, इसलिए वह और कुछ कर ही नहीं सकता। ऐसी हालत में वृक्षपूजा में कोई मौलिक बुराई या हानि दिखाई देने के बजाय मुझे तो इसमें एक गहरी भावना और काव्यमय सौंदर्य ही दिखाई देता है। वह समस्त वनस्पति जगत के लिए सच्चे पूजा भाव का प्रतीक है। वनस्पति जगत तो सुंदर रूपों और आकृतियों का अनन्त भंडार है, उनके द्वारा वह मानो असंख्य जिह्यओं से ईष्वर की महनता और गौरव की घोषणा करता है। वनस्पति के बिना इस पृथ्वी पर जीवधारी एक क्षण के लिए नहीं रह सकते।
ध्यान में रखने की बात यह है कि गाँधी जिस प्राणि मात्र की एकता और वनस्पति जगत के लिए पूजा भाव को अपने जीवन-दर्शन में महत्त्व देते हैं, वह तनिक भी समाजवादी दर्शन में नहीं है, वह है तो तुलसी के रामराज्य में। वस्तुतः यूरोपीय चिंतन से उपजा समाजवाद मूलतः और प्रमुखतः एक मनुष्य केन्द्रित विचारधारा है जिसमें अन्य जीवों की कीमत पर मनुष्य की समता एवं खुशहाली की अधिरचना खडी की गई है। चूँकि एक राजकीय शासन प्रणाली के रूप में रामराज्य मानव जाति के साथ-साथ अन्य जीवों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध की वांछनीयता को स्वीकार करता है, इसलिए भी गाँधी को समाजवाद की तुलना में रामराज्य जैसी राजनीतिक व्यवस्था अधिक पसंद आती रही।
वस्तुतः जिस तरह तुलसी का रामचरितमानस पूरे उत्तरी भारत में लोकप्रिय रहा, उसने आम जनता को रामराज्य जैसी राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था का अभिलाषी बना रखा था। याद है बचपन में अपने गाँव के बूढे-बुजूर्गों को कहते सुनता था कि रामराज्य में बाघ और बकरी एक घाट पर पानी पीते थे। यानी रहहि एक संग गज पंचानन और खग मृग सहज बयरू बिसराई वाली बातें आम आदमी के दिलोदिमाग में बाघ और बकरी एक घाट पर पानी पीने के ख्याल के रूप में रची-बसी थीं। यह आम आदमी नहीं जानता था कि समाजवाद क्या होता है और सर्वहारा की तानाशाही क्या होती है। वह जानता था उस रावण राज्य को जो अत्याचारी, दमनकारी, शोषणकारी था और जानता था उस रामराज्य को जिसमें हरेक व्यक्ति दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों से मुक्त था, सुखी-सम्पन्न था, किसी को किसी से भय नहीं, कोई विभेद नहीं और जहाँ बाघ-बकरी भी एक घाट पर पानी पी सकने वाले भयमुक्त परिवेश में रहते थे। गाँधीजी ने जनता के हृदय में बसी इस चाहत को पहचाना और उसका प्रयोग वे अपने राजनीतिक आंदोलन के उद्देश्य तथा स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए करने लगे जिसका परिणाम हुआ कि शहर हो या गाँव, हर जगह से हजारों लाखों की संख्या में मर्द-औरत रामराज्य पाने की अभिलाषा में गाँधी के राष्ट्रीय आंदोलन में सहभागी बनते चले गए। वामपंथी, साम्यवादी भले ही झूठला दें, लेकिन सच्चाई यही है कि गाँधी रामराज्य का सपना दिखा कर जिस बडे पैमाने पर भारतीय जनता को स्वाधीनता आंदोलन में सहभागी बना सके, उसका दसवाँ हिस्सा भी जवाहरलाल नेहरू का वैज्ञानिक समाजवाद या भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सर्वहारा की तानाशाही का कोलाहल नहीं कर सका। बावशूद इसके गाँधी को रामराज्य जैसे शब्द का प्रयोग करने के लिए लांछित किया जाता रहा है।
रामराज्य को लेकर पहला आक्षेप तो यह है कि यह वर्णाश्रम-व्यवस्था पर आधारित है, इसलिए प्रकारान्तर से गाँधी रामराज्य के बहाने वर्ण-व्यवस्था को कायम रखना चाहते थे। ये आरोपकर्ता झट से बरनाश्रम निज निज धरम निरत वेद पथ लोग जैसी पंक्ति को आगे कर देते हैं बगैर रामराज्य के समग्र स्वरूप को समझते हुए। किन्तु ये महोदय यह देखने का धीरज नहीं रखते कि तुलसी प्रणीत रामराज्य में जन्मना वर्णाश्रम की बात नहीं है, वह तो कार्य-विभाजन, श्रम-विभाजन कर्मणा सिद्धान्त पर आधारित है। ठीक है कि तुलसी के समय तक यह वर्ण व्यवस्था ऊँच-नीच, छुत-अछूत जैसे अमानवीय कचडों से खदबदा रही थी लेकिन उनके समय में आधुनिक युग में उपजी प्रजातांत्रिक समाजवादी व्यवस्थाओं का भी अस्तित्व नहीं था। अतएव राज्य एवं समाज के संचालन के लिए जिस आधारभूत संरचना की जरूरत थी, वह वर्णाश्रम के रूप में ही उपलब्ध थी और उसे जिस हद तक समतामूलक, विभेदरहित, उदार बनाया जा सकता था, वह तुलसी ने किया। समाज संचालन का काम तो हाथ में लुकाठी लेकर घर जलाने का आह्वान करने से हो नहीं हो सकता था, अतएव तुलसी ने उस पुरानी वर्ण-व्यवस्था का कायान्तरण, नवनीकरण किया समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सूत्रों में गूँथ कर। रामराज्य में हर आदमी अपने ऊपर दिये गए दायित्व का पालन करता है, किन्तु किसी का काम ऊँच या नीच नहीं समझा जाता। रामराज्य में बरनाश्रम निज निज धरम में निरत लोगों के बीच किसी प्रकार का भेद है ही नहीं। जो वहाँ भेद देखते हैं, उन्हें इस विशेषता पर भी ध्यान देना चाहिए- दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज- यानी दंड केवल यति-सन्यासियों के पास देखा जाता है, और भेद केवल नर्तक-नृत्य समाज में राग-रागिनियों, सुर-ताल को लेकर है। यही नहीं, चारों वर्ण के लोगों को सरयू नदी के राजघाट पर समान रूप से स्नान के अवसर उपलब्ध ह-राजघाट सबविधि सुंदर बर, मज्जहिं जहाँ बरन चारिउ नर।
तुलसी वर्णित रामराज्य का समग्र चित्र इस बात का प्रमाण है कि उसमें श्रम या कर्म के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं है, सबके श्रम की समान रूप से प्रतिष्ठा है, सब गुनग्य पंडित सयानी है। इस राज्य में वेद का पाठ कर लेने पर शूद्र की जीभ काट लेने तथा वेद-पाठ सुन लेने पर उसके कान में शीशा पिघला कर डालने वाली जैसी अमानुषिक, बर्बर स्थिति नहीं है न कोई अछूत है जिसे गर्दन में मिट्टी का पात्र तथा पीठ पीछे झाङू लटका कर चलने की बाध्यता है। इस रामराज्य में तपस्या करने के कारण शूद्र की हत्या करने का भी प्रावधान नहीं है। यहाँ सभी सुखी, संतुष्ट मित्रवत व्यवहार के हकदार हैं, न समलैंगिकता या लेस्बेयनिज्म जैसे अप्राकृतिक कृत्यों की छूट है, न वेश्याओं की उपस्थिति है। ऐसा ही स्वराज्य तो गाँधी अपने सपनों के भारत में देखना चाहते थे।
दरअसल आधुनिक प्रगतिशीलता के झंडाबरदारों ने वर्णाश्रम के समग्र चरित्र को समझे बिना उससे जुडी हर बात का विरोध करना प्रगतिशीलता का अनिवार्य लक्षण बना दिएा। वस्तुतः वर्ण-व्यवस्था कतिपय सकारात्मक मूल्यों के साथ समाज के नियमन एवं संचालन की एक प्रकार की प्लानिंग ही रही है। इसकी बडी ही अच्छी व्याख्या गाँधीजी के एक सच्चे अनुयायी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद (प्रथम राष्ट्रपति) ने की है जिस पर ध्यान देना चाहिए। वे लिखते हैं - आज भारत और उसकी भिन्न-भिन्न सरकारें इस दुविधा में हैं कि कहाँ तक शासन से काम लेवें और स्वशासन की मर्यादा कहाँ पर रखें। इसके कुछ उदाहरण लेकर हम इस विशय को स्पष्ट कर सकते हैं। जैसे प्लानिंग की बात बहुत चलती है। इसका अर्थ ऐसी योजना बनाना है जिसके अनुसार समाज और समाज का प्रत्येक व्यक्ति काम करे और उससे प्रत्येक काम ले। यदि यह सारा काम स्वेच्छा से होता तो इसमें न तो कोई बुराई है और न कोई हानि। जो मनुष्य जैसी योग्यता रखता है, उसके अनुसार सेवा भाव से काम करे, तो इससे समाज को अधिक लाभ पहुँचाने वाली दूसरी योजना नहीं हो सकती। वर्णाश्रम प्रथा में उस समय की आवश्यकताओं के अनुसार व्यवस्था की गई थी, जिसको आज की भाषा में प्लानिंग का नाम दे सकते हैं। समाज में तीन-चार प्रकार के मनुष्यों की आवश्यकता हुआ करती है, अथवा चार प्रकार के काम हुआ करते हैं। यानी मस्तिष्क और बुद्धि तथा अपनी तपस्या की आवश्यकता हुआ करती है। दूसरे समाज को सुरक्षित रखने का काम, तीसरे उसके भरण-पोषण का काम और चौथे अन्य प्रकार की सेवाएँ। वर्ण-व्यवस्था यही थी। मालूम नहीं आरम्भ में जन्म निर्धारित होता था या नहीं, पर आगे चलकर तो उसका रूप जाति-भेद का हो गया और जन्म से ही वर्ण निर्धारित हो गया। इसके कारण उसमें जितनी बुराइयाँ आ गईं हों, पर इसमें संदेह नहीं कि जहाँ तक जनसमूह की प्लानिंग हो सकती है, वह इसी रीति और ढंग पर हो सकती है और यदि जन्म से वर्ण का नियम हटा दिएा जाए और ऊँच-नीच और छोट-बडे का भेद मिटा दिएा जाए तो वही व्यवस्था आज के लिए भी सबसे अच्छी होगी। आज की प्लानिंग में नियंत्रण की मात्रा बहुत होती है। व्यक्ति की स्वतंत्रता बहुत कम हो जाती है और इसलिए प्लानिंग का आधार व्यक्ति की स्वतंत्रता न होकर व्यक्ति पर समाज का शासन ही उसका आधार हो जाता है। इसलिए जो हम करना चाहते हैं, वह स्वेच्छा से नहीं करते, पर समाज के दबाव से। वर्ण-व्यवस्था में एक और विशेषता यही थी कि उसमें भौतिक पदार्थों को सर्वोपरि न मानकर मनुष्य के चरित्र और आत्मा को ही जिसका दूसरा नाम स्वेच्छा है प्रधानता दी जाती है। अगर आज की परिवर्तित परिस्थिति में उसका दूसरा रूप हो जाए और दूसरे प्रकार के उसके विभाग बन जाएँ और जन्म सिद्ध नहीं करके वह कर्मपरायण बना दिएा जाए तथा समाज के अनुशासन के बदले स्वशासन अर्थात् स्वेच्छा ही उसकी चलानेवाली शक्ति हो, तो जिसे प्राचीन भाषा में वर्णाश्रम कहा जाता था, वह आज की भाषा और आज की परिस्थिति में प्लानिंग कहा जा सकता है।14
उल्लेखनीय है डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने वर्णाश्रम-प्रथा के संबंध में ये विचार उस वक्त व्यक्त किए थे जब वे भारतीय गणतंत्र के सर्वोच्च पद-राष्ट्रपति पर विराजमान थे। वे उस समय नेहरू सरकार द्वारा चलाई गई प्लानिंग से बेहतर प्लानिंग के रूप में वर्णाश्रम -प्रथा को देख रहे थे, बशर्ते कि उससे जन्म से वर्ण का नियम हटा दिए। जाए और ऊँच-नीच, छोटे-बडे का भेद मिटा दिएा जाए तो वह व्यक्ति की स्वतंत्रता या स्वेच्छा पर समाज के नियंत्रण से दबाब बनानेवाली प्लानिंग से अधिक उत्तम ठहरेगी। साथ ही भौतिक पदार्थों को सर्वोपरि न मान कर मनुष्य के चरित्र और आत्मा को प्रधानता देने वाली वर्णाश्रम-प्रथा केवल भौतिक समृद्धि को प्रमुख मानने वाली आधुनिक प्लानिंग से श्रेयस्कर होगी। ध्यान दें तो हम पाएँगे कि तुलसीदास ने रामराज्य के अर्न्तगत ऐसे ही वर्णाश्रम-धर्म को प्रधानता दी है जिसमें न जन्म के आधार पर वर्ण-भेद है न ऊँच-नीच, छोटे-बडे का भेद है, न मनुष्य की स्वतंत्रता पर राज्य या समाज का दंड-भय का दबाब है, न भौतिक पदार्थों को हस्तगत करने की दुर्दमनीय चाह है। गाँधी भी इसी लिहाज से एक हद तक वर्णाश्रम का समर्थन करते थे। यहाँ पाँच जनवरी 1921 के यंग इंडिया में उनके छपे लेख का यह अंश गौरतलब है- इतिहास की दृष्टि से जातिप्रथा को भारतीय समाज की प्रयोगशाला में किया गया मनुष्य का ऐसा प्रयोग कहा जा सकता है जिसका उद्देश्य समाज के विविध वर्गों का पारस्परिक अनुकूलन और संयोजन करना था। यदि हम उसे सफल बना सकें, तो दुनिया में आजकल लोभ के कारण जो क्रूर प्रतिस्पर्धा और सामाजिक विघटन होता दिखाई देता है, उसके उत्तम इलाज के रूप में उसे दुनिया को भेंट दिएा जा सकता है। सच कहा जाए, तो गाँधी जिस तरह की वर्ण-व्यवस्था को दुनिया को भेंट देने लायक समझते हैं, वही तो तुलसी ने रामराज्य के अर्न्तगत वर्णाश्रम-धर्म के रूप में दिएा है। प्रसिद्ध निबंधकार कुबेरनाथ राय के शब्दों को उधार लेकर यही कहा जा सकता है कि तुलसी और गाँधी दोनों ही वर्ण-जाति विहीन आस्तिक मानववाद को वर्णाश्रम धर्म की अन्तर्वस्तु के रूप में स्वीकार करनेवाले हैं।
रामराज्य को लेकर दूसरी आपत्ति यह की जाती है कि यह हिन्दू धर्म से जुडी अवधारणा है जो मुसलिम, ईसाई जैसे गैर हिन्दू मतावलम्बियों को ग्राह्य नहीं हो सकती क्योंकि वे सब इसके दायरे में नहीं आ पाते। यह कहने में तनिक संकोच नहीं कि रामराज्य के रूप में तुलसी जरूर एक धर्मराज्य की स्थापना करते हैं, लेकिन यह धर्म रिलीजन या मजहब से नितान्त भिन्न स्वरूप का है क्योंकि भारतीय जीवन-दर्शन में किसी व्यक्ति-प्रवर्त्तक विशेष या मतवाद विशेष के अर्थ में धर्म का व्यवहार हुआ ही नहीं है। यहाँ पर धर्म का सदैव स्वभाव और कर्तव्य के अर्थ में प्रयोग होता आया है। तुलसीदास ने रामराज्य के अर्न्तगत ही जिन चार स्थलों पर धर्म शब्द का व्यवहार किया है, वे देखने लायक हैं- बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग, चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति, चारिउ चरन धर्म जग माहीं, पूरि रहा सपनेहुँ अद्य नाहीं, सब निरदम्भ धर्मरत पुनी, नर अरू नारि चतुर सब गुनी। इन चारों स्थलों पर धर्म का तात्पर्य अपने-अपने नियत कार्यों, कर्तव्यों का पालन ही ठहरता है, न कि किसी देवी-देवता की पूजा करना, प्रेयर या इबादत करना धर्म है।
मतलब कि रामराज्य इसलिए धर्मराज्य है कि राजा या शासक का धर्म यानी कर्तव्य है कि वह सब को अभाव, ताप, शोक, दरिद्रता, दमन, अज्ञान, रोग आदि मुक्ति दिलाने का काम करे और प्रजा का कर्तव्य है कि वह अपने-अपने दायित्वों, कार्यों का नीतिपूर्वक पालन करे। इस रामराज्य में धर्म का फलक तब अत्यन्त व्यापक हो जाता है जब रामचंद्र अनुज भरत को धर्म का सार-संक्षेप इन शब्दों में समझाते हैं - परहित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीडा सम नहिं अधमाई। यानी रामराज्य ऐसा धर्मराज्य है जहाँ वेद, गीता या कुरान बाइबिल जैसे ग्रंथों का पाठ करना धर्म नहीं है, बल्कि हरेक व्यक्ति का नीति के मार्ग पर चलते हुए अपना कर्तव्य-निर्वहन करना और परहित में संलग्न रहना धर्म है।
यह भी ध्यान में रखने की बात है कि तुलसी कहीं भी हिन्दू या विप्र हित की बात नहीं करते, न हीं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय की बात करते हैं, वे तो बगैर लाग-लपेट के कहते हैं -नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना, सब निरदम्भ धर्मरत पुनी, नरू अरू नारि चतुर सब गुनी, सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी, सब कृतज्ञ नाहिं कपट सयानी। ध्यातव्य है कि गोस्वामी जी ने सब का प्रयोग कर स्त्री, पुरूष, हिन्दू-मुसलमान या ईसाई आदि सबके लिए रामराज्य का दरवाजा खोल दिएा है। ऐसा कौन मर्द या औरत, मुसलमान या ईसाई होगा जो दरिद्रता से मुक्त होना न चाहेगा, जो ज्ञानी चतुर (बुद्धिमान) कृतज्ञ होना नहीं चाहेगा? इसलिए यह कहना कि रामराज्य हिन्दू हितों या भावनाओं का पोषक है रामराज्य के संबंध में अज्ञान प्रकट करना है। धर्मराज के अर्थ में तुलसी का रामराज्य न हिन्दू राज्य है, न मुसलिम या क्रिश्चियन राज्य है। इस रामराज्य में भयमुक्त सुखी जीवन यापन करने के अधिकारी सब हैं- यही सर्वोदय है और यही गाँधी के स्वराज्य का मतलब था।
वस्तुतः गाँधीजी ने बहुत सोच समझ कर स्वराज्य के पर्याय के रूप में रामराज्य शब्द का प्रयोग किया था क्योंकि वे राम और कृष्ण को सभी भारतवासियों, चाहे हिन्दू हों या मुसलमान का पूर्वज या बुजुर्ग मानते थे। उन्हीं का कहा हुआ है - संस्कृत सीखना प्रत्येक भारतीय का फर्ज है -हिन्दुओं का तो है ही, परन्तु मुसलमानों का भी है, क्योंकि आखिर तो उनके बुजुर्ग भी राम और कृष्ण थे और उन्हें जानने के लिए संस्कृत जानना चाहिए।15 बाद में गाँधीजी के इसी सूत्र का पल्लवन करते हुए समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा -राम भारत की उत्तर से दक्षिण की एकता के प्रतीक हैं और कृष्ण पश्चिम से पूरब की एकता के प्रतीक है। वस्तुतः राम और कृष्ण भारतवर्ष के सांस्कृतिक व्यक्तित्व की काव्यात्मक अभिव्यक्ति रहे हैं और इसे इस देश के हिन्दू के साथ-साथ मुसलमान, ईसाई को भी अपनी सांस्कृतिक विरासत समझना चाहिए। ईसा मसीह और बाइबिल पैगम्बर मोहम्मद साहब और कुरान को हम भी पाक पुरुष और ग्रंथ मानते हैं, उनका आदर करते हैं, किन्तु इस देश के मुसलमान एवं ईसाई भी यह नहीं कह सकते कि ईसा या पैगम्बर भारतवर्ष की उत्तर-दक्षिण, पश्चिम-पूरब की एकता के प्रतीक हैं तथा बाइबिल, कुरान जैसे ग्रंथों की रचना भारतवर्ष में हुई। प्राचीन काल से लेकर अब तक के भारतवर्ष के सांस्कृतिक रिक्थ को बतलाने के लिए हमें वेद, उपनिषद, महाभारत, रामायण के साथ-साथ राम, कृष्ण, बुद्ध जैसे व्यक्तियों का ही उल्लेख करना होगा-केवल गंगा-जमुनी तहजीब के रूप में कुतुबमीनार, लाल किला, ताजमहल, तानसेन का उल्लेख करने से यह काम नहीं हो सकेगा।
कुल मिला कर देखा जाए, तो एक आदर्श राजनीतिक व्यवस्था के रूप में रामराज्य से अधिक सर्वागपूर्ण व्यवस्था का प्रतिपादन किसी ने किया ही नहीं चाहे वह प्लेटो का आदर्श राज्य हो या रूसो का सामान्य इच्छा वाला राज्य हो, चाहे कल्याणकारी राज्य हो या फिर माक्र्स का सर्वहारा की तानाशाही वाला राज्य हो, इनमें कोई भी तुलसी परिकल्पित रामराज्य के समकक्ष नहीं है, क्योंकि यह सर्वांगपूर्ण है, मनुष्य-मनुष्येतर को समान महत्त्व देने के कारण, पंथ, सम्प्रदाय, जाति, लिंग, वर्ग, वर्ण आदि विभेदों से मुक्त होने के कारण, पूरी तरह से समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की भावना से अनुप्राणित होने के कारण, अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष के सम्यक संतुलन के कारण। जाहिर है- रामराज्य की परिकल्पना में अन्तर्निहित इन सर्वहितकारी, सर्वमंगलकारी, लोक कल्याणकारी विशेषताओं को ही गाँधीजी स्वराज्य या अपने सपनों के भारत में मूर्त होते देखने के अभिलाषी थे। किन्तु अत्यन्त खेद के साथ कहना पडता है कि आजादी मिलने के सात दशकों के बाद भी हम गाँधीजी द्वारा स्वराज्य के रूप में रामराज्य या सर्वोदय के देखे गए सपनों को साकार करने से उत्तरोत्तर दूर होते गए हैं। सच तो यह है कि जिस संविधान सभा को स्वतंत्र भारत का संविधान बनाने का दायित्व सौंपा गया था, वही गाँधी के रामराज्य से किनाराकसी करने लगी थी। इस सच्चाई को मई 1969 में जयप्रकाश नारायण द्वारा दिए गए भाषण के इस अंश में देखा जा सकता है - गाँधीजी संविधान सभा पर कम ध्यान देते थे। किसी व्यक्ति ने उन्हें पत्र में लिखा कि यद्यपि भारत का संविधान लिखा जा रहा है, परन्तु उसमें रामराज्य का कहीं उल्लेख नहीं है जिसे वे हमेशा स्वराज का आधार बताते थे। अपनी हत्या से केवल चालीस दिन पहले उन्होंने हरिजन में लिखा कि यदि ऐसा है तो वह खेद जनक है।16
स्पष्ट है कि रामराज्य को स्वराज्य का आधार बनाने की गाँधी की अभिलाषा पर सन्निपात करने की जो प्रक्रिया संविधान सभा द्वारा शुरू हुई, वह गाँधी के सत्तारूढ राजनीतिक उत्तराधिकारियों द्वारा उत्तरोत्तर बढती ही गई। आज जिस मुकाम पर हम खडे हैं, वहाँ अयोध्या में राम की जन्म भूमि पर भव्य राम मंदिर बनाने का कार्य जोर-शोर से शुरु हो चुका है, लेकिन क्या सिर्फ राममंदिर बनाकर हम रामराज्य को साकार कर सकेंगे, गाँधी की चिर संचित अभिलाषा को मूर्त कर सकेंगे, यह विचारणीय है।
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संदर्भ -
1. सम्पूर्ण गाँधी वांङ्गमय , खंड 18, पृ. 456
2. गाँधीजी के साथ पच्चीस वर्ष (महादेव भाई की डायरी) खंड 4, पृ. 155, प्र. सर्वसेवा संघ, वाराणसी।
3. उप. पृ. 163
4. उप. पृ. 230
5. उप. पृ. 235
6. उप. पृ. 252
7. उप. पृ. 308
8. उप. पृ. 319
9. उप. खंड 7, पृ. 231
10. उप. खंड 8, पृ. 88
11. उप. खंड 9, पृ. 105
12. उप. पृ. 306
13. उप. खंड 10, पृ. 30-31
14. असमंजस लेखक डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, प्रभात प्रकाषन, नई दिल्ली, पृ. 91-92
15. गाँधीजी के साथ पच्चीस वर्ष (महादेव भाई की डायरी) खंड 8, पृ. 181
16. भारत के महान भाषण, सं. रूद्रांशु मुखछाील, पृ. 260, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली

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