fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar
fix bar

हिन्दी कविता में घर

रचना सिंह
घर में था क्या कि तेरा गम उसे गारत करता
वो जो रखते थे हम इक हसरते-तामीर सो है
गालिब का यह शेर, हिंदी कविता में आए घर संबंधी भावबोध की एक बानगी प्रस्तुत करता है । इस शेर में जहाँ एक ओर कवि अपने विनष्ट घर पर अपना दुःख प्रकट करता है , वहीं दूसरी ओर एक चुनौती भरे स्वर में यह भी कहता है कि सारे घर के नष्ट हो जाने के बाद भी उसमे एक हसरते-तामीर अर्थात एक नए घर को बनाने की इच्छा अब भी मौजूद है । मध्यकाल की टूटती हुई सामन्ती व्यवस्था के बीच एक भविष्य-चेता आधुनिक कवि की यह घोषणा है और यह असंदिग्ध रूप से कहा जा सकता है कि इस अभिव्यक्ति के द्वारा कवि ने घर शब्द को एक नई व्यापकता प्रदान करने की चेष्टा की है। वस्तुतः गालिब की कविता घर सम्बन्धी अनेक छायास्तरों की कविता है ।
हिंदी कविता में भी घर किसी न किसी रूप में आरंभ से आता रहा है। हिंदी में शायद ही कोई ऐसा कवि होगा जिसने घर पर कविता न लिखी हो लेकिन घर सम्बन्धी भावबोध की यह जटिलता पहली बार निराला के यहाँ दिखाई पडती है। निराला की कविता में घर से जुडी हुई लगभग सारी संवेदनाएँ किसी न किसी रूप में मिल जाएँगी. परिमल में अधिवास शीर्षक कविता में वे प्रश्न करते हैं - कहाँ मेरा अधिवास कहाँ? यहाँ कवि घर को एक दार्शनिक अर्थ देता हुआ प्रतीत होता है। और महत्त्वपूर्ण यह है कि कवि की यह दार्शनिक जिज्ञासा उसे किसी परधाम या अलौकिक घर की ओर नहीं ले जाती, बल्कि वह सारी अलौकिकता का प्रत्याख्यान करते हुए इसी लोक को मान्यता देता है और इसे ही अपने मूल निवास या घर के रूप में स्वीकार करता है । घर की यह दार्शनिक संवेदना निराला की एक अन्य कविता में कुछ दूसरे ही ढंग से व्यक्त होती है । वे कहते हैं-
मैं रहूँगा न गृह के भीतर
जीवन में रे मृत्यु के विवर
यहाँ पूरे मानव-जीवन की कल्पना एक गृह के रूप में की गई है, एक ऐसा गृह जिसमे मृत्यु-रुपी अनेक छिद्र हैं । आगे चल कर निराला का घर सम्बन्धी भावबोध एक और नया आयाम प्राप्त करता है, जहाँ एक विलक्षण ढंग की आत्मनिर्वासन की स्थिति दिखाई पडती है । यह आत्मनिर्वासन, जिसे अंग्रेजी में alienation कहा जाता है, निराला के यहाँ कई बार अन्य कविताओं में भी दिखाई पडता है, परन्तु निम्नलिखित दो पंक्तियों में वह शायद सबसे अधिक तीव्रता से व्यक्त हुआ है -
बाहर मैं कर दिया गया हूँ
भीतर, पर भर दिया गया हूँ
अपने ही घर से निर्वासित होने की यह चेतना तत्कालीन भारतीय मानस का एक सीधा प्रतिबिम्ब है जो विदेशी सत्ता से टकराते हुए उसके भीतर पैदा हुआ था. निराला के अतिरिक्त दूसरे छायावादी कवियों के यहाँ घर सम्बन्धी अनुभव मिल अवश्य जाएँगे पर उसमे वह जटिलता नहीं है जो निराला के यहाँ दिखाई पडती है ।
समकालीन हिंदी कविता के केंद्र में जहाँ बहुत कुछ छीजते जाने की पीडा है, वहीं कुछ बचा ले जाने की मूलभूत इच्छा की वह जमीन भी मौजूद है, जहाँ से ये कवि अपनी रचनात्मक उर्जा प्राप्त करते हैं । समाज की सबसे मूर्त इकाई होने के कारण घर हमेशा से रचनाशील मन को आकृष्ट करता रहा है । घर की अनेक अर्थच्छवियाँ समकालीन कविता में मिलती हैं- मूर्त और अमूर्त दोनों अर्थों में। भाव और वस्तु दोनों का घर में संश्लेष है । सुरक्षा की भावना के साथ मूलतः जुडी हुई घर की यह अवधारणा आगे चल कर सर्वाश्लेषी हो जाती है , जो कई चीजों को अपने भीतर समेटती है । एक व्यापक स्तर पर जा कर घर का क्या अर्थ हो सकता है, यह विनोद कुमार शुक्ल की इस कविता से स्पष्ट हो जाता है, जिसका एक राजनीतिक आयाम समाजवादी समाज की कल्पना भी है -
दूसरे देश से अपना देश
अंतरिक्ष से अपनी पृथ्वी
तब घर में बच्चे क्या करते होंगे की याद
पृथ्वी में बच्चे क्या करते होंगे की याद होगी
घर में अन्न-जल होगा की नहीं की चिंता
पृथ्वी में अन्न-जल की चिंता होगी
पृथ्वी में कोई भूखा
घर में भूखा जैसा होगा
और पृथ्वी की तरफ लौटना
घर की तरफ लौटने जैसा.
यह घर का व्यापक सन्दर्भ है, लेकिन समकालीन कविता द्वारा निर्मित घर के विभिन्न दरवाजों, कमरों और गलियों से गुजरने के बाद जो बात दिखाई पडती है, वह यह कि समकालीन कविता में जो घर आता है, वह उसकी इच्छा या सपने का घर अधिक है, घर का सामान्यतः जो अर्थ होता है , वैसा घर अपेक्षाकृत कम. घर को और घर के साथ-साथ और भी बहुत कुछ बचा लेने की इच्छा यहाँ अधिक महत्त्वपूर्ण है।
हाय पानी गिर रहा है
घर नजर में तिर रहा है
जेल में भवानीप्रसाद मिश्र घर को इस तरह से याद कर रहे हैं । घर सम्बन्धी भावुकता का धरातल कई प्रकार का हो सकता है, लेकिन उसका प्राथमिक धरातल है मूल ग्रामीण निवास छोड कर छोड कर शहरों में आ गए कवियों का द्वंद्व. इसका एक भावपूर्ण चित्र केदारनाथ सिंह की इस आरंभिक कविता में देखा जा सकता है र्
बहुत दिनों पर घर आया हूँ
खोज रहा हूँ घर
किस्सों के जंगल में
वह हर बार खो गया घर .
इसके अतिरिक्त एक स्थिति वह भी मिलती है, जब क्षेत्र विशेष के नैकट्य से ही कवि को घर की निकटता की अनुभूति होने लगती है । मूल ग्रामीण निवास छोड कर आये हुए व्यक्ति के लिए उसका अंचल विशेष ही उसे घर के बहुत समीप प्रतीत होता है । अपने क्षेत्र को देखने मात्र से ही वह पुलकित हो उठता है । त्रिलोचन की कविता घर वापसी में इसी स्थिति का चित्रण है .
घंटा गुजर गया, तब गाडी आगे सरकी
आने लगे बाग, हरियाले खेत, निराले ;
अपनी भूमि दिखाई दी पहचानी, घर की
याद उभर आई मन में, तन रहा संभाले
घर की याद की सर्वोत्तम कविताओं में एक कविता है श्रीकांत वर्मा की घर-धाम यह कविता कृति के आरंभिक अंकों में प्रकाशित हुई थी। यह कविता एक युवा मन की छटपटाहट और संघर्ष-गाथा है, जिसके केंद्र में कहीं न कहीं घर स्थित है । वह घर जिससे वह विच्छिन्न हो गया है। एक तरह से यह कविता समकालीन कविता में अपनी सम्पूर्ण ऊष्मा के साथ घर शब्द की वापसी है।
उन्नीसवीं शताब्दी में गालिब और उसके बाद निराला की कविता में घर एक तडप और बेचैनी के साथ आया है, जहाँ इतिहास की सारी उथल-पुथल के बावजूद घर और जंगल अलग थे। लेकिन श्रीकांत वर्मा की कविता में अनुभव का यह तर्कसंगत ढाँचा टूटता है और घर व जंगल का फर्क धीरे-धीरे मिटने लगता है -
मैं अब घर जाना चाहता हूँ
मैं जंगलों
पहाडों में
खो जाना चाहता हूँ
लेकिन आगे की कविता में कवि का मोहभंग एक अर्थहीन आक्रोश में नहीं बदलता, बल्कि कवि अपने अनुभव को संभालता और बचाता हुआ कविता को एक भासमान अर्थ देता है -
मैं जीना चाहता हूँ
और जीवन को भासमान करना चाहता हूँ
मैं कपास धुनना चाहता हूँ
या फावडा उठाना
चाहता हूँ
घर जाने की इच्छा इस कविता में जीने की इच्छा का पर्याय बन जाती है । परिवार घर का एक ज़रूरी घटक है। हिंदी कविता में परिवार (माँ, पिता, बहन, पत्नी, पुत्र, पुत्री) के अनेक चित्र हैं। लेकिन परिवार का टूटना यहाँ स्थाई भाव की तरह बार-बार आता है । आधुनिक सभ्यता के जो अनेक प्रभाव समाज पर पडे हैं उन्होंने पूरी सामाजिक संरचना को दूर तक प्रभावित किया है । इसके बहुत से सामाजिक आर्थिक कारण हैं, आधुनिक युग में आर्थिक विपन्नता घर के विघटन का एक महत्त्वपूर्ण कारण है । घर के साथ-साथ मनुष्य भी टूटता जा रहा है। धूमिल की कविता घर में वापसी इसी सत्य को अनावृत करती है । धूमिल यह महसूस करते हैं कि अब भाषा इतनी औपचारिक हो गई है कि वो घर की भाषा नहीं रह गई। रिश्तों में जो खुलापन होता है, उसे व्यक्त करने में अब यह भाषा सक्षम नहीं है। इन सबके मूल कारणों में कहीं न कहीं आर्थिक विपन्नता अपना आधिपत्य कायम किये हुए हैं। धूमिल लिखते हैं-
क्योंकि हम पेशेवर गरीब हैं
रिश्ते हैं
लेकिन खुलते नहीं हैं
और हम अपने खून में इतना लोहा भी
नहीं पाते
कि हम उनसे एक ताली बनाते
और भाषा के भुन्नासी ताले को खोलते।
धूमिल की यह घर में वापसी शीर्षक कविता वस्तुतः घर के टूटने की कविता है। घर में वापसी शीर्षक में एक व्यंग्य और विडंबना है और पूरी कविता उसी को खोलती है। परन्तु घर क्यों टूट रहा है इसके बारे में कवि का एक निश्चित मत है। वह मानता है की इसके मूल में निर्धनता है। और निर्धनता भी ऐसी जो मनुष्य के भीतर की मानवीय शक्ति (जिसे कवि ने लोहा कहा है) को ही समाप्त करती जाती है । यही कारण है कि मनुष्य जब दिन भर काम करने के बाद जब घर लौटता है तो उसे घर, घर नहीं, बल्कि सिर्फ दीवारों का घेरा जान पडता है। यह कविता संकेतित करती है कि केवल घर ही नहीं टूट रहा है , बल्कि घर के टूटने के साथ-साथ जो सबसे मूल्यवान वास्तु छीजती और टूटती जा रही है, वह स्वयं मनुष्य है। कवि इस स्थिति से उबरना चाहता है। वह घर को घर कहना चाहता है -
हम थोडा जोखिम उठाते
दीवारों पर हाथ रखते और कहते
यह मेरा घर है
इसी क्रम में रघुवीर सहाय की कविता दयाशंकर का भी उल्लेख करना चाहूँगी जो पारिवारिक जीवन और सीधे-सीधे कहें, तो पति-पत्नी के बीच का अद्भुत संघर्षमय चित्र प्रस्तुत करती है। यह कविता एक लोककथा की तरह चलती है। एक निम्नमध्यवर्गीय घर का चित्र खींचते हुए कवि कहता है -
उस रोज़ रात को बिस्तर पर कुछ शरमाकर
मुंशी की बीवी ने मुंशी से कहा सुनो
मेरा मन पूआ खाने को जब करता है
तब मुझको यह होना मुश्किल दीखता है
निम्नमध्यवर्गीय व्यक्ति के लिए पूआ खाने की कल्पना आकाश-पुष्प जैसी दुर्लभ चीज़ लगती है । कविता की विडंबना वहाँ और बढ जाती है जहाँ कवि यह दिखने की चेष्टा करता है कि घर में इतने पूए पकाने के लिए सामग्री मौजूद न थी कि पति-पत्नी और बच्चे सब साथ मिल कर खा सके । अंत में जब बच्चे सो जाते हैं, तो पत्नी चुफ-से उठती है और लोककथा के अभिप्राय के अनुसार (MOTIF) के अनुसार केवल चार पूए पकाती है, कविता में इसका वर्णन इस प्रकार है-
वह उठी अरे वह कितनी सुंदर लगती थी
दुबली कोई आवाज न होने दी उसने
ऐसे चुपचाप पकाए उसने चार पुए
जैसे पूआ ही मधुर मिलन कहलाता है
दोनों अपने-अपने हिस्से के पूए ले
जैसे थे जहाँ वहाँ पर बैठे खाते हैं
इतने में सब बच्चे एकदम से जगते हैं
उठ पडते हैं, मुस्काते हैं, सो जाते हैं
इस प्रकार यह कविता पारिवारिक जीवन में चरितार्थ होने वाले प्रेम के उस पक्ष का मार्मिक उद्घाटन करती है जिसमे उसका सारा संघर्ष, संघर्ष में निहित पीडा, विडंबना एक साथ समोई हुई है।
संभवतः समकालीन कविता में घर शब्द के बार-बार ले जाने का एक बडा कारण यह है कि घर को पाने का संघर्ष या घर तक पहुँचने का संघर्ष किसी भी युग की अपेक्षा आज बहुत अधिक बढ गया है । यही कारण है कि समकालीन कविता में घर के न होने की जो पीडा है वह घर के होने के सुख, शांति और सुरक्षा की तुलना में बहुत अधिक है। इससे यह स्पष्ट होता है समकालीन कवियों के लिए घर एक ऐसा मूल्य है जो अन्य मूल्यों की तरह विचार या भाव है। रचना में इस विचार या भाव के मूर्त ऐन्द्रिक भाव में बदल जाने के क्षण आते अवश्य हैं, परन्तु इनकी संख्या बहुत अधिक न होगी।
इससे दो प्रकार की पद्धतियों का जन्म हुआ । एक यह कि घर को लेकर कवि मन में जो भावात्मक द्वंद्व या संघर्ष है (जो कई बार एक गहरे वैचारिक द्वंद्व में बदलता दिखाई देता है) उसका वर्णन किया जाए । और दूसरा यह की घर नामक संस्था से जो अर्थ ध्वनित होता है, उसका भावात्मक उदात्तीकरण किया जाए। पहली प्रवृत्ति के कुछ उदाहरण पहले उद्धृत कविताओं में मिल जाएँगे। भवानीप्रसाद मिश्र की कविता घर की याद में दूसरी प्रवृत्ति का अच्छा उदाहरण मिल सकता है। वहाँ घर अपने भावुक संबंधों के साथ पूरी कविता में उभरता है और कविता के अंत तक जाते-जाते एक उदात्त मानवीय परिकल्पना में बदल जाता है । चूँकि इस परिकल्पना की बुनियाद एक उच्छ्वसित भावुकता पर टिकी हुई है, इसलिए उसका पर्यवसान भी इसी भावस्फीति के साथ होता है ।
इसके विपरीत शमशेर बहादुर सिंह की कविता ओ मेरे घर समकालीन कवि के घर संबंधी भावबोध का सबसे सच्चा, सटीक और प्रमाणिक उदाहरण प्रस्तुत करती है। यह कविता आरम्भ होती है घर के प्रति एक स्तवनमूलक स्वर में -
ओ मेरे घर /
ओ हे मेरी पृथ्वी
साँस के एवज तूने क्या दिया मुझे
ओ मेरी माँ ?
घर को पहले पृथ्वी और बाद में माँ कह कर कवि घर को एक अतिरिक्त गरिमा अवश्य प्रदान करता है परन्तु उसके प्रति एक हल्का-सा प्रश्नात्मकता का स्वर भी यहाँ है, जिसमे कवि की पीडा छिपी हुई है । आगे की पंक्तियों में वह अपनी इस पीडा को स्पष्ट करता है र्
तूने युद्ध ही मुझे दिया
प्रेम ही मुझे दिया क्रूरतम कटुतम
और क्या दिया
मुझे भगवान दिए कईं-कईं
मुझसे भी निरीह मुझसे भी निरीह
और अद्भुत शक्तिशाली मकानीकी प्रतिमाएँ
यहाँ घर के अर्थ को एक नया आयाम देता हुआ कवि उसे पूरे मानवीय संघर्ष के बीच में रख देता है। और इस प्रकार घर मानव की अस्मिता के लिए किए जाने वाले संघर्ष का प्रतीक बन अत है और यहाँ संघर्ष व्यक्तियों की सीमा का अतिक्रमण करता हुआ देशों और राष्ट्रों के बीच का युद्ध भी बन जाता है - प्रेम ही मुझे दिया क्रूरतम कटुतम कह कर कवि घर के साथ जो मेरापन उदा हुआ है, अर्थात घर जो एक व्यक्तिगत संपत्ति है, उसकी विडम्बनापूर्ण स्थिति को उद्घाटित करता है । कविता के अंतिम हिस्से में कवि इस विडंबना के एक और पक्ष को उजागर करता है :
फिर मुझे जागना दिया, यह कह कर की
लो और सोचो !
और तलवारें अँधेरे की
अंतिम लोरियों के बजे !
इन्सान के अंखौटे में डालकर मुझे
सब कुछ तो दे दिया -
जब मुझे मेरे कवि का बीज दिया कटु-तिक्त
फिर मुझे मेरे कवि का बीज दिया कटु-तिक्त
फिर एक ही जन्म में और क्या-क्या
चाहिए !
यहाँ चौथी पंक्ति में जो लोरियों शब्द का उल्लेख हुआ है, वह ध्यान देने योग्य है । घर के साथ लोरी शब्द का एक विशेष सम्बन्ध है और यह व्यक्ति के शैशव की ओर संकेत करता है, परंतु कवि के अनुसार आज का घर व्यक्ति-मन को लोरियों की बजाय अँधेरे की तलवारें देता है । लोरी और अँधेरे की तलवार के बीच जो सीधा विरोध है, वह इन पंक्तियों के सौन्दर्य को एक अद्भुत गहराई प्रदान करता है । फिर कविता के अंत तक जाते-जाते कवि यह स्पष्ट कर देता है की जो उसे कविता का कटु-तिक्त बीज मिला है, वह भी उसे घर ने प्रदान किया है अर्थात घर के लिए किये जाने वाले मानवीय संघर्ष ने ही वस्तुतः यही, भावना का कटु-तिक्त बीज एक आधुनिक संवदनशील व्यक्ति का घर है इसके द्वार पर ले जा कर यह कविता पाठक को छोड देती है । असल में शमशेर द्वारा निर्मित यह घर, समकालीन कविता द्वारा निर्मित एक ऐसा घर है, जो अपने समय की वास्तविकता को उसकी सारी जटिलता और तीव्रता के साथ प्रस्तुत करता है । वर्तमान समय में घर की अवधारणा और छवि में व्यापक परिवर्तन आया है और आज की कविता में इस परिवर्तन को आसानी से लक्षित किया जा सकता है। विष्णु नगर की एक कविता है -
बिलकुल सही है कि घर ईंट और सीमेंट से नहीं बनते
मगर ईंट और सीमेंट के बगैर भी तो नहीं बनते
बिलकुल सही है कि घर उनमें रहने वालों से बनते हैं
मगर जब रहने वाले ही ईंट और सीमेंट में बादल जाएँ
तो बताइए घर कैसे बनते हैं
ये कविता इसी समय में संभव हो सकती थी, जब घर से जुडी सारी रूमानी अवधारणाएँ खंडित होने लगी हैं। इस तरह की अनेक स्थितियाँ आज के कवियों के लिए कविता की ज़मीन भी तैयार करती हैं और उनकी कविता में अनेक स्तरों पर अभिव्यक्त भी होती हैं। इससे कविता में घर संबंधी भावबोध के तेवर भी बदले हैं और जटिलता भी बढी है। पर एक बात जो नहीं बदली, वह यह है कि जो समकालीन परिवेश है, उसमें घर के नाम पर घर को पा लेने से पहले और घर को पा लेने के बाद भी जो चीज़ बची रह जाती है, वह व्यक्ति का अपना संघर्ष है। यह संघर्ष हिन्दी कविता में घर संबंधी बोध की धुरी की तरह लक्षित किया जा सकता है।
सहायक-सूची
1) स. राजेश जोशी, वर्तमान साहित्य (कविता विशेषांक), अंक-7-8 अप्रैल मई संयुक्तांक 1992
2) स. विजयमोहन सिंह , इडरपरस्थ भारती, अंक 2, अप्रैल-मई 1991
3) स. अशोक वाजपेयी , पूर्वग्रह, अंक- 63-64
4) केदारनाथ सिंह , हिन्दी आधुनिकता का अर्थ (विशेषतः कविता के संदर्भ में )

***
सम्पर्क - 17, मंगला अपार्टमेन्ट,
कालकाजी, नई दिल्ली, 110019
मो. ९८९१०३३९०३