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विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं में विस्थापन

राकी गर्ग
विनोद कुमार शुक्ल हिन्दी के उन कवियों में से हैं जिन्होंने औपनिवेशिक भारत में अपनी आँखें खोलीं और स्वतंत्र भारत में किशोर से परिपक्व हुए। उन्होंने आज़ादी से लेकर अब तक देश में आए विभिन्न उतार -चढावों को देखा और उसे अपने लेखन में अभिव्यक्त किया। उसमें से एक स्वर विस्थापन का भी है। हालांकि उन्होंने विस्थापन पर अलग से कोई काव्य संग्रह नहीं लिखा है लेकिन कविता से लंबी कविता और कभी के बाद अभी में कई ऐसी कविताएँ हैं जिनके केंद्र में विस्थापन है। इसमें रायपुर से बिलासपुर संभाग कविता, मुझे बिहारियों से प्रेम हो गया है, बिलासपुर के पास अचानक मार का जंगल, लौट कर एक जन आया, अभी तक बारिश नहीं हुई, जो प्रकृति के सबसे निकट हैं उनको को विशेष रूप दर्ज किया जा सकता है।
विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं में विस्थापन का सिर्फ एक ही आयाम नहीं है। उसमें किसान है, मजदूर है, आदिवासी हैं और इसके साथ ही है मनुषयेतर प्राणियों का विस्थापन पक्षी जीव -जंतु आदि। इसके साथ वह देखते है सृष्टि में आए परिवर्तनों को खासकर उन परिवर्तनों को जिन्होंने इस पृथ्वी को थोडा कुरूप बनाया है। उसमें कहीं पीछे पाते हैं अतिरिक्त पाने की चाह, विलासिता तथाकथित विकास और घटिया राजनीति। दरअसल कवि को अपनी जन्मभूमि, अपने देश, अपने लोग, अपने पडोस, अपनी भाषा, इस धरती और प्रकृति से बेहद प्रेम है। यह प्रेम उनकी कविताओं में बार -बार दिखाई देता है। कवि के लिए जो कुछ अपरिचित है वही उसके लिए आत्मीय है। पहाड जंगल, पेड, वनस्पति, तितली, पक्षी, जीव- जन्तु, समुद्र और नक्षत्र सभी कवि के लिए आत्मीय है।1 इसी आत्मीयता के कारण वे विस्थापितों के कष्ट को समझ पाते हैं।
जब अपनी इस आत्मीय धरती पर मनुष्यों को उस जगह से विस्थापित पाते है जहाँ उनका बचा रहना जरूरी था, प्रकृति के लिए, धरती के लिए और स्वयं उसके लिए तब वह अपना प्रतिरोध व्यक्त करते हैं। वह उन विस्थापितों के साथ भी खडे होते हैं, जो दूसरे राज्यों में रह रहे हैं और जिन्हें प्रादेशिक राजनीति के नाम पर मारा जा रहा है। इसमें विशेष बात यह है कि यह प्रतिरोध कहीं भी सतही नहीं है न विचार के स्तर पर न भाषा के स्तर पर। उनका स्वर कहीं भी आक्रोश, अखबारी रिपोर्ट या नारेबाजी में नहीं बदलता। वे पूरी गंभीरता, गहनता और संलग्नता के साथ और किसी के प्रति बिना नफरत के वस्तुस्थिति को देखते है। यह देखना सामान्य देखना भी नहीं है इस देखने में प्रेम के साथ विचार भी है। अरविंद त्रिपाठी के शब्दों में कहें तो, उनके यहाँ काव्य की सबसे समर्थ क्रिया देखना है। 2 यह देखना एक संत का देखना भी है जिसमें संतन को कहा सीकरी सों काम वाला भाव है और एक समर्थ कवि का भी। एक संत की तरह शांत, मौन, विवेकवान पर एक कवि की तरह जहाँ जिनके साथ खडे होना है उसका साहस भी।
इस देखने में वे पाठक को उस कविता का पाठक ही बने रहने देते हैं, लेकिन स्वयं उसका किरदार हो जाते है। रायपुर बिलासपुर सम्भाग कविता का प्रारम्भ होता है, हाय! महाकौशल, छत्तीसगढ या भारतवर्ष/ इसी में नाँदगाँव मेरा घर/ कितना कम पहुँचता हूँ जहाँ/ इतना जिन्दा हूँ/ सोचकर खुश हो गया कि/ पहुँचूँगा बार-बार/ आखिरी बार बहुत बूढा होकर/ खूब घूमता जहाँ था/ फलाँगता छुटपन/ बचपन भर/ फलाँगता उतने वर्ष/ उतने वर्ष तक/ उम्र के इस हिस्से पर धीरे-धीरे/ छोटे-छोटे कदम रखते/ जिन्दगी की इतनी दूरी तक पैदल/ कि दूर उतना है नाँदगाँव कितना अपना। 3
फिर घटना नहीं बल्कि कवि और पाठक का वार्तालाप शुरू होता है। एक ऐसा संवाद जहाँ दो की उपस्थिति अनिवार्य नहीं-
स्टेशन पर भीड
गाडी खडी हुई
झुण्ड देहाती पच्चासों का रेला
आदमी औरत लडके लडकी
गन्दे सब नंगे ज्यादातर
***
कूडे-कर्कट की गृहस्थी का सामान लाद
मोटरा पोटली ढिबरी कन्दील
***
कुछ लोगों को छोड
बहुतों ने देखा होगा
पहली बार आज
रायपुर इतना बडा शहर
आज पहली बार रेलगाडी, रोड-रोलर , बिजली नल ।
छोड कर अपना गाँव
जाने को असम का चाय-बगान, आजमगढ
कलकत्ता, करनाल, चण्डीगढ
लगेगा कैसा उनको, कलकत्ता महानगर !!4
मजदूर वर्ग और उसकी पीडा बहुत आहिस्ता -आहिस्ता से आगे बढती है और सिर्फ रायपुर से चढने वालों मजदूरों की पीडा और मजबूरी उत्तर प्रदेश, बिहार आंध्रप्रदेश कर्नाटक सभी की पीडा में बदल जाती है जो रोजी -रोटी के लिए अपने गाँव अपनी जमीन को छोडकर दर -दर की ठोकरें खाने को विवश हैं। गाँव क्या सिर्फ नाम से होता है या प्रदेश से? जब वहाँ के निवासी कहीं और चले जाते हैं तो वह बेजान हो जाता है। क्या सच में कवि गाँव लौट सकता है? दूर हो जाएगी गँवई, याद आने की अधिकतम सीमा से भी/क्षितिज के घेरे से मजबूत और बडा/ कलकत्ते का है घेरा।/ कि अपनी ही मजबूरी की मजदूरी का/गरीबी अपने में एक बडा घेरा।/नहीं-नहीं, मैं नहीं पहुँच सकूँगा नाँदगाँव/मरकर भी न जिन्दा रह/टिकट कर दूँ वापस/चला जाऊँ तेज भागते/गिरते-पडते-हाँफते/देखूँ झोपडी एक-एक/कितनी खाली/क्या था पहले/ क्या है बाकी/।5 इसमें मजबूरी तो है पर बेचारगी नहीं है। कवि इन विस्थापित मजदूरों पर तरस नहीं खा रहा है। बल्कि उनके संघर्ष को आवाज़ दे रहा है। उनके विस्थापन में वह स्वयं को भी विस्थापित पाता है अपने जाने -पहचाने परिवेश से विस्थापित। जैसे -जैसे कविता आगे बढती है विस्थापन से जुडे बहुत से सवाल आते हैं और उनके जवाब आते हैं जैसे एक रील के बाद दूसरी रील ।
विस्थापन से ही जुडा एक सवाल आता है प्रकृति का पर्यावरण का भी है। दृश्य तालाब का/गड्ढे का दृश्य साफ है/।तालाब का पंजर /पपडाया हुआ/मन तालाब का भी तेरी/जिसमें सूखी हरी काई की परत/सूख गया हरा विचार तालाब का।6 विस्थापन पर्यावरणीय और सांस्कृतिक संकट को भी जन्म देता है। पर्यावरण का संकट उन आदिवासियों के विस्थापन के साथ भी शुरू होता है, जिनसे उनके जंगल छीने जा रहे हैं लेकिन क्या जंगल भी उनके बिना रह पाएँगे। मनुष्य का जीवन सह -अस्तित्व पर निर्भर है। आदिवासी अपने जंगलों की देखभाल करते हैं।वह नहीं रहते हैं जंगल नहीं रहता है। जंगल काट दिए जाते हैं आदिवासी नहीं रहते हैं। पशु -पक्षी गायब हो जाते हैं। इस तरह से विस्थापन सिर्फ एक व्यक्ति या एक समूह का नहीं होता है उसके साथ -साथ उन सभी का विस्थापन हो जाता है, जो उससे जुडी होती हैं।

बिलासपुर के पास अचानक मार का जंगल है
शहरी आदत से अचानक मार हो गया
जंगल में आदिवासी बैगा की
एक झोपडी दिखी
गाँव में केवल एक झोपडी
एक गाँव की एक झोपडी का गाँव
***
अचानक मार से
अचानक मर गया जंगल
और बिलासपुर शहर में रोजी-रोटी के लिए
बैगा लोगों का मुहल्ला बस गया।।
जंगल न रहने से कितने और तरह के संकट आ सकते हैं इसको रेखांकित करते हुए कहते हैं कि अभी तक बारिश नहीं हुई/ ओह! घर के सामने का पेड कट गया/कहीं यही कारण तो नहीं/ आगे इसी कविता में कहते हैं कि जुलाई हो गई/ पानी अभी तक नहीं गिरा/ पिछली जुलाई में/ जंगल जितने बचे थे/ अब उतने नहीं बचे/ यही कारण तो नहीं।8 वह थोडी देर के लिए पाठक को सोचने पर विवश कर देते हैं कि जो कुछ हो रहा है जिस तरह जलवायु परिवर्तन हो रहा है या ग्लोबल वार्मिंग हो रही है, उसके पीछे कौन से कारण है? थोडी जगह छोडते हैं पाठक के सोचने के लिए। अपने साथ बहा कर नहीं ले जाते। कवि, कविता और पाठक तीनों की उपस्थिति बराबर बनी रहती है, उनमें एकात्म है पर अपने -अपने अस्तित्व के साथ। वहाँ विलयन नहीं है। और जब वह यह कहते हैं कि आदिवासी! पेड तुम्हें छोड कर नहीं गये/और तुम भी जंगल छोड कर खुद नहीं गये/ शहर के फुटपाथों पर अधनंगे, बच्चे-परिवार/के साथ जाते दिखे... अपना जंगल नहीं इस साल/ कहीं यही कारण तो नहीं/।9 एक बडा यथार्थ वह एक कविता में व्यक्त कर देते हैं आदिवासी विस्थापन का एक बडा कारण। विनोद कुमार शुक्ल ऐसे कवि है जो दुख को बहुत ज्यादा ग्लोरीफाइड नहीं करते हैं। बहुत सपाट शब्दों में एक ऐसा सच कहते हैं जिसकी कई तहें हैं और वह जितना उघडा हुआ है उतना ही ढका हुआ भी। एक पैना यथार्थ जैसे, परंतु परिवार के झुण्ड में अबकी बार / छोटे-छोटे बच्चे नहीं दिखे/ कहीं यह आदिवासियों के अंत होने का/ सिलसिला तो नहीं/।10
लेकिन जब पक्षधरता की बात आती है, तब कोई सवाल नहीं है, कोई संवाद नहीं है, बल्कि पूरी दृढता के साथ विस्थापित आदिवासियों के साथ खडे हो जाते हैं। वह लगभग तय कर देते हैं कि जंगल पर जितना हक आदिवासियों का है उतना किसी और का नहीं। यहाँ पर कवि की पक्षधरता साफ दिखाई देती है कि वह किनके साथ है। छत्तीसगढ में बस्तर का इलाका आदिवासियों का है। वहाँ अनेक जनजातियाँ निवास करती हैं गोंड, बैगा, मुरिया हलबा आदि। वहाँ की खनिज सम्पदा को लेकर स्वार्थों ने इन आदिवासियों का जीना बेहाल किया। उनको जंगल छोडने को विवश किया गया तब वह अपनी नागरिक होने की जिम्मेदारी का कवि रूप में पूरी तरह से निर्वाह करते हैं वह भी बगैर राजनीतिज्ञ हुए
जो प्रकृति के सबसे निकट हैं
जंगल उनका है
आदिवासी जंगल के सबसे निकट हैं
इसलिए जंगल उनका है
अब उनके बेदखल होने का समय है
यह वही समय है
जब आकाश से पहले
एक तारा बेदखल होगा
जब पेड से
पक्षी बेदखल होगा
आकाश से चाँदनी बेदखल होगी
जब जंगल से आदिवासी बेदखल होंगे।11
इन आदिवासियों के बेदखल होने में कवि अपनी बेदखली भी देख पाता है हालांकि उसका स्वरूप दूसरा है। विनोद कुमार शुक्ल का जन्म छत्तीसगढ में हुआ। छतीसगढ पहले मध्यप्रदेश का हिस्सा हुआ करता था। 1 नवंबर 2020 को यह भारत का 26 वां राज्य बना। एक तरह से एक राज्य के दो हिस्से हुए। लेकिन यह अलगाव सहन करना कवि के लिए आसान नहीं। कविता में लिखते हैं, परन्तु 1 नवम्बर 2000 को/ जब 36 गढ राज्य बना/ तब मैं 63 वर्ष का छत्तीसगढी हुआ12 मध्यप्रदेश से भी उसे उतना ही अपना लगता है जितना कि छतीसगढ। गरज यह है कि जरूरी नहीं ज़मीन से बेदखल होने पर ही कोई विस्थापित होता है। निर्मल वर्मा भी मानते हैं कि मनुष्य का उन्मूलनबोध उसकी आत्म -अस्मिता को सबसे गहरी और मर्मान्तक ठेस पहुँचाता है।13 नया राज्य बनाए जाने के बाद यही उन्मूलन बोध कवि को होता है-
जहाँ रहते हुए पीढियाँ बीतीं
वह छत्तीसगढ मध्यप्रदेश का छत्तीसगढ था
नये बने छत्तीसगढ राज्य में
जैसे बाहरी हो गया
यहीं रहे आने का मेरा पुश्तैनी घर
कहाँ चला गया?
अपने घर का पता पूछने
पडोस के दरवाजे को खटखटाता हूँ।14
इसलिए वह प्रदेश को एक कैद मानते हैं। और सिर्फ वह छत्तीसगढ के साथ नहीं खडे है, बल्कि हर वह व्यक्ति के साथ है जो कमाने खाने के लिए कहीं गया है। जीविका के लिए तलाश में निकला आदमी किसे कहे अपना? जहाँ वह रहता आया था या जहाँ वह रह रहा है। उसके लिए दोनों का सापेक्षिक महत्त्व है। एक उसका अतीत है तो दूसरा वर्तमान है क्या वर्तमान को अतीत से अलग कर देखा जा सकता है? और बिना वर्तमान के अतीत सिर्फ एक किस्सा या कहानी होकर रह जाता है। इस प्रान्तीय राजनीति में सभी कुछ उसका खोकर रह जाता है अपनी पहचान, अपना घर, अपने लोग।
अन्त में क्या, बिहार
बिहार में बन्दी
उत्तरप्रदेश उत्तरप्रदेश में
प्रान्त नहीं कैद खाने हैं
तिस पर नया राज्य जब बनता
तो देश के स्वतंत्र होने जैसी खुशी
लोगों को वहाँ होती।
नागरिको, देशवसियो कह कर किसे पुकारूँ ।
वह कौन है और कहाँ रहता है।
इस कहीं नहीं रहने में मैं भी
कहीं नहीं रहने का न तो कोई मुहल्ला है
और न कोई पता
मेरा स्थायी पता मुझसे खो गया है
है पता कमाने-खाने के लिए भागते
लोगों के पीछे चला गया
जिनमें जमाने भर के छत्तीसगढिया भी शामिल हैं।15
विस्थापन की ये समस्याएँ तो तब से ही रही है जब से लोग -रोजी रोटी के लिए अपने पुश्तैनी घर -बार जाने लगे। वास्तव में इसका प्रारंभ अंग्रेजों के शासनकाल से हुआ। जब उन्होंने अपने स्वार्थों के लिए भारत के कुटीर उद्योगों को समाप्त किया। उनपर दुनिया भर के कर्ज लादे जिसको चुकाने के लिए उन्हें किसान से मजदूर बनना पडा। किसान से मजदूर बनने का प्रक्रिया का चित्रण प्रेमचंद के उपन्यास और कहानियों में मिलता है। गोदान उपन्यास और पूस की रात कहानी इसका एक प्रमुख उदाहरण है। लेकिन हाल के वर्षों में जिस तरह देश में प्रदेश के नाम पर राजनीति हुई या एक प्रदेश के लोग दूसरे प्रदेश के लोगों को सहन नहीं कर पा रहे हैं जैसा कि महाराष्ट्र में हुआ बिहार से आए हुए आंतरिक विस्थापितों के साथ, उसने हमारे देश में हमारी स्वतन्त्रता पर प्रश्न तो खडा किया ही है साथ ही लगभग यह भी तय किया है कि रोज़ी -रोटी के लिए कमाने निकले लोगों के साथ विशेषकर जिनकी जीविका दैनिक मजदूरी पर निर्भर करती है उनके साथ कोई नहीं है न सरकार न वह ही जिनके लिए यह काम कर रहे हैं। अभी करोना काल में जो हो रहा है मजदूरों के साथ उससे अच्छा उदाहरण इस बात का क्या हो सकता है।
इस महाराष्ट्रीय घटना का उल्लेख करते हुए कवि एक तरह से उनके पक्ष में गवाही देते हैं
एक बिहारी मुझे पूरा बिहार लगता
जब कोई पत्नी और बच्चे के साथ दिख जाता
तो खुशी से मैं उसे देशवासियों कह कर संबोधित करता
परन्तु यह महाराष्ट्रीय घटना है
कि कमाने खाने के लिए जहाँ बसे हैं
वहाँ से भगाये जाने पर
अपनी बोली भाषा को
गूँगे की तरह छुपाये
कि जान बचाना है
बचाओ किस भाषा में चिल्लाना है16
ऐसा नहीं सिर्फ महाराष्ट्र में ऐसा हो रहा है। देश के और प्रान्तों में भी ऐसा ही हो रहा है। लेकिन फिर भी वह घर छोड कर जाने को विवश है। वह कमाने जाता है, वापस आता है, फिर जाता है, फिर वापस आता है। इस घर छोड कर जाने की विवशता को बिना लाग लपेट के जिस तरह से कवि कहता है कि लौट कर एक जन आया, लगता है अभी तो किस्सा शुरू हुआ है लेकिन कविता जिस तरह से आकर ओह चल दिस पर आकर रुक जाती है, वह विस्थापितों के जीवन के अस्थायित्व को भली -भांति अभिव्यक्त करती है। साथ में उनकी असुरक्षा को भी।
लौट कर एक जन आया
इसे दुहराता हूँ-
लउटकर एक झन आइस
बिलासपुर से गे रिहिन
बाकी झन माई-पिला समेत
मार डाले गये
कमाने गये थे जम्मू-कश्मीर
और जो बच कर आया है वो
कमाने फिर जा रहा है वहीं।
वह चला गया
इसे दुहराता हूँ
ओह चल दिस।1।
जब से कृषि का आविष्कार हुआ तब से किसान विस्थापित होता रहा पहले नदियों के किनारे विस्थापित हुआ। तब से अभी तक यानि आधुनिक काल में जब गाँव शहर और राज्य जैसी सीमाएँ है तब अकाल, सूखा और बाढ किसानों के विस्थापन के बडे कारण हैं। भगौलिक रूप से ये किसान कहीं भी विस्थापित हों, लेकिन अपनी स्थानिकता को विस्मृत नहीं कर पाते हैं। उनके साथ उनकी भाषा उनकी संस्कृति भी साथ जाती है। भाषा सिर्फ विचार अभिव्यक्त करने का माध्यम नहीं है बल्कि उसकी अस्मिता की पहचान भी है। अपनी भाषा में बात करके अपने विस्थापन की पीडा को कम कर लेते हैं।
जब मध्यप्रदेश में रहा
तो केवल मध्यप्रदेश में नहीं
और जब छत्तीसगढ में
तो केवल छत्तीसगढ में नहीं
अभी अकाल के कारण
छत्तीसगढ छोड कर जा रहे
किसी भी किसान से पूछूँगा
भाई! बने-बने
तो बने-बने! ही उसका जवाब होगा .
अपने दुख की कथा को कहने-सुनने
और समाप्त करने का यही तरीका
केवल होगा।18
इसलिए वह हबीब तनवीर के बारे में कहते हैं कि (प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर भी छत्तीसगढ से थे) कि जब वह दिल्ली छोडकर भोपाल गए, तो छत्तीसगढ भी उनके पीछे भोपाल गया। स्वयं कवि का अपने बारे में यह कहना है कि, मुझसे कोई छतीसगढ की राजधानी पूछेगा तो मैं भोपाल मध्यप्रदेश बता दूँगा और अनुतीर्ण रहूँगा।19
दरअस्ल कवि की चिन्ता इस धरती को बचाने की, विलुप्त होते जंगलों को बचाने की आदिवासियों को बचाने की और उस आदमी को बचाने की जो आजीविका के फेर में प्रान्त -प्रान्त के खेल में कहीं का नहीं रह गया है न घर का न घाट का। इतनी सारी चिन्ताओं के बावजूद उसमें व्यंग्य और हताशा नहीं है। एक ऐसी आवाज़ है जो कोने में खडे होकर इन चिन्ताओं से रूबरू है, लेकिन वह किसी शहर किसी गाँव या किसी दश्त में खोती नहीं है, बल्कि वह देर तक जेहन में गूँजती है अपने मौन के साथ और एक ऐसे सन्नाटे के साथ जो परिस्थितिजन्य है। इसलिए उनकी कविताओं में पास -पडोस है, पेड-पौधे हैं, धान के फूल हैं, चंद्रमा है, पक्षी हैं, चाय की दुकान है, ढिबरी है। एक ऐसी दुनिया जो पूरी तरह से देशज है लेकिन उसके मानवीय सरोकार वैश्विक हैं। वह पूरी धरती को अपनी स्थानिकता के साथ सुंदर देखना चाहते हैं। वहाँ सहज और सरल जीवन है जिसमें संघर्ष नैसर्गिक है। इसमें कुछ भी अतिरिक्त नहीं है।

संदर्भ सूची
1. शुक्ल विनोद कुमार, कवि ने कहा, प्रथम पपेरबैक
संस्करण 2012 किताबघर प्रकाशन, 4855-56/
24,अंसारी रोड, दरियागंज, नयी दिल्ली, 110002, पृष्ठ
संख्या 11
2. त्रिपाठी अरविंद, कवियों की पृथ्वी, प्रथम संस्करण
2004, आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमटेड, एस.सी.एफ
26. सेक्टर 16, पंचकूला-134।13( हरियाणा) पृष्ठ
संख्या 14।
3. शुक्ल विनोद कुमार, कविता से लंबी कविता, संस्करण
2001 राजकमल प्रकाशन प्रा.लि.1 बी, नेताजी सुभाष
मार्ग, दरियागंज,नई दिल्ली 110002, पृष्ठ संख्या 11
4. वही, पृष्ठ संख्या 12
5. वही, पृष्ठ संख्या 14
6. वही, पृष्ठ संख्या 16
7. शुक्ल विनोद कुमार, कभी के बाद अभी, राजकमल
प्रकाशन प्रा.लि. 1बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज,नई
दिल्ली 110002, पृष्ठ संख्या 103

8. शुक्ल विनोद कुमार, कभी के बाद अभी, राजकमल
प्रकाशन प्रा.लि. 1 बी, नेताजी सुभाष मार्ग,
दरियागंज,नई दिल्ली 110002, पृष्ठ संख्या 24
9. वही पृष्ठ संख्या 24
10. वही पृष्ठ संख्या 25
11. वही पृष्ठ संख्या 23
12. वही पृष्ठ संख्या 55
13. वर्मा निर्मल, वर्मा निर्मल, दूसरे शब्दों में, भारतीय
ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई
दिल्ली। पृष्ठ संख्या 93
14. शुक्ल विनोद कुमार, कभी के बाद अभी, राजकमल
प्रकाशन प्रा.लि. 1 बी, नेताजी सुभाष मार्ग,
दरियागंज,नई दिल्ली 110002, पृष्ठ पृष्ठ संख्या 41
15. वही, पृष्ठ संख्या 40
16. वही, पृष्ठ संख्या 39
1।. वही, पृष्ठ संख्या 56
18. वही, पृष्ठ संख्या 48
19. वही, पृष्ठ संख्या 10।
***
संफ - 312 एक्सीलेन्स अपार्टमेंट,
सेक्टर 18ए, प्लॉट नंबर 4, द्वारका
नई दिल्ली 1100।8
मो. 8586943564