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पीयूष दईया : जैसे शब्द में शंख बज रहा हो

ओम निश्चल
(पीयूष दईया के काव्य संसार पर एकाग्र)
पीयूष दईया को लिखते हुए काफी बरस हुए। उनका पहला संग्रह चिह्न लगभग इकतालीस बरस उम्र में आया। उसके छह बरस बाद दो संग्रह लगभग एक साथ। मार्ग मदरजाद और त(लाश)। पीयूष दईया ऊपर से जितना संयमित मितभाषी और शालीन दिखते हैं, उतना ही अपनी कविताओं के एकांत में शब्दों के लिबास में खुलते हैं। उनके भीतर का चिंतक लगातार परिपक्व होता गया है। वे कविता में सहजमार्गी नहीं हैं, वे जटिल शिल्प की तलाश करने के लिए और अपने अनभिव्यक्त को अभिव्यक्त करने के लिए कविता के नए अन्वेषियों की तरह अभिव्यक्ति के अब तक न बरते गए रास्ते अखितयार करते हैं और उसके लिए वे विवरणहीनता की सीमा तक ब्यौरे के भीतर उतरते हैं और चंद पंक्तियों में अपनी बात को लक्षित गंतव्य तक पहुँचा देने के अभ्यस्त लगते हैं। कविता में या तो लोग बहुत बोलते हैं या फिर बहुत कम। पीयूष बहुत कम बोलने वालों में हैं। लिहाजा उनकी गंभीरता का निर्वचन तो है ही, एक अधूरापन भी अपने साथ लिए चलती है, जैसे कि कवि का सोचना अनवरत चलता रहता हो।
हर कवि कविता के महासमर में उतरता है, तो अपने साँचे के साथ। प्रारंभ मे उसके शिल्प और कथ्य व अंदाजेबयाँ में समकालीनों की छाया दीखती है । फिर वह अपना अलग रास्ता तैयार करता है। जिस तरह सृष्टि की हर जीवित इकाई एक-दूसरे की हमशक्ल-सी होकर भी अपने मिजाज, अपनी मनोभूमि व जैविक संरचनाओं में भिन्न होती है, कवि भी एक दूसरे से भिन्न होता है । वह हूबहू किसी की अनुकृति नहीं होता। पर्याप्त वयस्कता व संपादन अनुभवों के बाद पीयूष दइया अपने व्यक्तित्व के अनुरूप कविता की संरचनाओं में प्रवेश करते हैं और उस शब्द संयम का रास्ता वरण करते हैं जिसके लिए अज्ञेय ने कहा था, कम लिखो। जब तक अनिवार्य न हो, मत लिखो। अज्ञेय के ये वाक्य गद्य के लिए चाहे कम, लेकिन कविता के लिए पूरी तौर पर लागू होते हैं। कविता तो संपुट है विचारों के विपुल अवबोध का। वह जितनी है उससे कम न की जा सके और जितनी ज्यादा है उससे ज्यादा न खींची जा सके। यही तो कविता है। ब्रेबिटी इज द सोल आफ विट कभी शेक्सपियर ने कहा था। कविता भी अपनी मितभाषिता में ही शोभित होती है। जितनी संक्षिप्त और सुगठित उतनी ही ताकतवर जैसे वैदिक मंत्र। सूक्तबद्ध। सूक्तिबद्ध। पीयूष दईया ने इस ब्रेविटी को कविता के आत्मतत्व की तरह अपनाया हे। चिह्न में वे अपना होना दर्ज करते हैं। यह कविता में उनकी सलामी बल्लेबाजी है। कैसे तो वे इस अबूझ दृश्य को कविता में रखते हैं-
तुम्हारी हथेली में
पिघल जाएँगी तमाम बूँदें
फैल जाएगा कुछ क्षणों में
आकाश भी
एक चिडिया के लिए
जबकि तुम मोमबत्ती जला रहे होगे।
(चिह्न; पृष्ठ 28)
एक दूसरा बिम्ब देखें --
फुनगी तक जो
चली आती
छलाँग भर
होता आकाश
और तुम होती
बसेरे में। (चिह्न, पृष्ठ 30 )
यहीं एक कविता नाभि में व्यतीत के क्षोभ को कैसे मलिनता से प्रस्तुत करती है -
सच है मुझे जिस्म की तलाश कभी नहीं रही
सब मिलतीं चली गयीं
मैं भोगता रहा .....प्यार
काश। धूल झोंकता समय
अपना पता
छूट गया जो
जिस्म की नाभि में।
अमर है (वही, पृष्ठ 34)
पीयूष कभी-कभी तथागत की तरह लगते दिखते है। निर्विकार। अबोध। एक शिशु-सी सरलता लिए। फिर वह क्या है जो उनकी कविता में व्यक्त होता है.... उनकी सरलता शिशुता या दुर्बोधता कि जिसमें आलोचक की अहमन्यता भी समा जाए। निरसितत्व हो जाए-सरीखी संवदेना से मंडित कविताओं की यहाँ भरमार है, जहाँ न ठीक-ठीक पहुँचा जा सकता है न उसे महसूस किया जा सकता है। वहाँ ठीक ठीक कवि ही ले जा सकता है, यदि वह हृदय का हाथ पकड कर हमें वहाँ तक पहुँचा दे। उनके कवि की यह कैसी इच्छा है जो किसी कवि से मेल नहीं खाती। लोग तो भरे हुए सभागार और तालियों के बीच कविता पढना चाहते हैं। कम से कम रघुवीर सहाय की तरह तो चाहते ही होंगे कि सन्नाटा छा जाए जब मैं कविता सुनाकर उठूँ । पर पीयूष यह क्या कह रहे हैं -

देखना
जब मैं कविताएँ पढूँ
तब सभागृह में कोई न हो
जैसे भाषा या जीवन में
पढने वाला
तो कतई नहीं
और सुनने वाला कल्पना तक से बाहर
और दर्शक भी
न रहे

आत्मा
जब मैं कविताएँ पढूँ
लिखता हुआ मिलूँ
(चिह्न; देखना-गीत चतुर्वेदी के लिए)
इस संग्रह की दो कविताएँ विलक्षण हैं- अपने रचाव में, अपनी अर्थसंभावना में, अपनी दीपित में। बहुत कुछ झिलमिल झिलमिल के बीच। फलितआपा व तामसी । फलितआपा अशोक वाजपेयी के लिए है और तामसी दिवंगता के लिए। यह ऐसा कृतज्ञता ज्ञापन है जिसे कवि सरलीकृत रूप में प्रस्तुत नहीं करता। मैं इसकी दो पंक्तियाँ उठाता हूँ और अर्थ पा जाता हूँ -
ऐसा एक स्वाधीन संबंध जो
एकांत और सर्जना का निर्ब्याज आलोक देता है
**
सबसे सुंदर यह रहा कि वे मेरी जिन्दगी के
दाखिलकार नहीं बने
अध्यात्म अभिधाधारी भी हो सकता है यह इसी नाते जाना। (चिह्न, पृष्ठ 55)
चिह्न की कविताओं में वे जैसे अपनी कविताओं की अलग-सी स्वरलिपि रचते हैं। अपने गुणी पिता पूनम दईया को याद करते हुए पीठ कोरे पिता जैसी सीरीजबद्ध कविताओं में वे रेशा-रेशा पिता की अनुपस्थिति के आयामों को खोलते हैं। वे लिखते हैं :
अनुभूति माया है
हम गल्प
जो नहीं है वह
जीने के लिए एक जगह बन जाती है जहाँ
वाणी शब्द नहीं देती

कलपती
हर साँस में
हमें (चिह्न, पृष्ठ 72)
वे पिता पर कोई भावाविष्ट नैरेटिव नहीं रचते। सब कुछ टुकडे टुकडे में व्यक्त होता चलता है। कथ्य जो दर्ज होकर भी अनभिहित-सा नजर आता है। पिता कितने रूपों में हमारे सामने होते हैं। हमारे विश्वास, हमारी ताकत, हमारी ढाल बने, हमारी प्रकृति, हमारे असितत्व और हमारे चैतन्य में समाए हुए। उन्हें अग्नि को समर्पित कर एक तरह से अनस्तित्व कर लौट आने के बाद की स्मृतियाँ एक ऐसा सन्नाटा रचती हैं-बाहर और अंतश्चेतना में कि उससे उबरना मुश्किल होता है। वे उस पिता को याद करते हैं जिसने कभी अपने दुखों का एक शब्द भी नहीं कहा। न माँ ने। और अब उनकी लाश है अकेला छोड देती हुई। पर क्या पिता जाकर भी कहीं न कहीं उपसिथत रहते हैं। क्या यह विदा औपचारिक है। अनुपस्थितियों में व्यक्ति ज्यादा उपस्थित होता है। कुँवरनारायणजी की ऐसी ही एक कविता यही बताती है। पीयूष अनुपस्थिति के चिह्न की बात करते हैं। कुछ ऐसे कि जैसे पेड से झड गए पत्ते की अनुपस्थिति का दाग। कभी अनुपस्थिति का आकार मात्र । चिह्न उपस्थित रहा। यानी पिता जैसी शख्सियत कहो तो अहसासों में जीवित रहता है। यहाँ तक कि अनुपस्थिति के अहसासों में जीवित रहता है। पूरी सीरीज ऐसी ही लघुकविता सीरीज का समूहन है। संकेतों में बतियाती हुई कविता। यतीन्द्र मिश्र अपनी भूमिका में इस कविता सीरीज को शोक गीत की परिपाटी से चिह्नित करते हैं। वे रिल्के से लेकर हिंदी कवि निराला तक की कविताओं में शोकगीतों की उपसिथति की परंपरा से इस कविता की संवदेना को जोड कर देखते हैं। इस कविता को शोकांतिका से तुलनीय मानते हुए यतीन्द्र मिश्र कहते हैं कि पूरी कविता श्रृंखला जैसे टुकडों-टुकडों में निहायत मर्मभेदी सूक्तियों में और पीयूष के पुत्र होने के दुख में बूँद-बूँद घटती है। पिता के साथ अपने संबंधों के अनेक अमूर्त क्षणों को कविता के कोलाज में चित्रित करने में उन्होंने जैसे आधुनिकता की कलाकूची का इस्तेमाल किया है। कहीं कहीं असहज कर देने वाले वाक्य भी यहाँ हैं, उदारणतः मेरा कोई पूर्वज नहीं, मैं निर्वंश हूँ। अकेला एक लाश जैसा। तीन में न तेरह में सुतली की गिरह में।
***
त(लाश) उनकी कविता यात्रा का दूसरा पडाव है।
उनकी नई कविता पुस्तक त(लाश) पढते हुए चमत्कृत हूँ कि यह कवि कहीं पुराने नकेनवादियों की याद दिला रहा है या फिर प्रयोगवादियों की तरह नई राहों का अन्वेषी है। पीयूष ऊपर से जितना सहज, सरल और मृदु मुस्कानों के प्रणेता दिखते हैं, उतना अपनी कविताओं में नहीं दिखते। वे शब्द संयम की सीख बरतने वाले कवि जरूर हैं, पर पाठक के संयम का भी इम्तहान लेने में पटु। इसलिए उनकी कविताओं की मुँह देखी तारीफ करते हुए भीतर संशय बना रहता है कि क्या यह सच कह रहा हूँ। मार्ग मादरजाद से अभी उबरा भी न था, जिसमें मेरी अभी तक मेरी कोई सहज गति नहीं बन पाई थी कि यह नई काव्यकृति।
संस्कृत कवियों में कविता के ऐसे कितने प्रयोग हुए हैं, पर हिंदी में यह अपनी तरह का अनूठा कवि है जो कविता को गतानुगतिकता की पटरी से उतार कर एक नई परिपाटी गढ रहा है। वह प्रचलन की पायदान पर कितना चलती है, नहीं चलती है यह दीगर बात है। पर पीयूष की नई पुस्तक त(लाश), मार्ग मादरजाद की अपेक्षा कुछ सहनीय, साध्य और अपने उलझे शब्द प्रमेयों के बीच कहीं-कहीं कविता में प्रवेश करने की राह सुझाती है। एक तो ब्रेकेट और स्वगत और अदृश्य व अलक्षित का यह जो ताना-बाना है, वह बहुत ही अमूर्त किस्म का सौंदर्यविधान रचता है। तब यह प्रश्न उठता है यह कवि किस समाज या समाजों का कवि है। क्या वह जो अभी काव्यास्वाद के धरातल पर उतरा ही नहीं या जिसकी वैसी दीक्षा ही नहीं हुई है। वह तो रिहेटारिकों में, आवेगधर्मी कविताओं पर लहालोट होता रहा है, या फिर कला के झीने पट से सजी-सँवरी कविता का अभ्यस्त रहा है। कविता के तमाम तिलिस्म भेदते हुए पीयूष को देख कर लगता है कि यह कवि कविता की रूढियों से ऊब चला है और कविता को नए आभरण में देखना चाहता है। वह कविता के ड्राइंगरूम का विन्यास बदलना चाहता है।
उनको पढते हुए मुझे कुछ साध्य पंक्तियाँ मिलती हैं, जिनके उकेरे नक्शे पर बढ कर इस कवि की साइके से रुबरू हुआ जा सकता है। वह कहता हैः
वह ऐसे है जैसे शब्द में शंख बज रहा हो
वह ऐसे है जैसे दृश्य में अदृश्य उजागर हो
...वह कल्पना का वरदान है।
स्थूलता का यह दृश्य नीली नितंबनार का है जिसके सौंदर्य के अभिमुख होते ही वह स्वर्गीय हो जाने के लिए आश्वस्त है। (तलाश, पृष्ठ 105)
गार्हस्थ्य सौंदर्य में उलझा यह कवि ऐसे प्रयोगों में श्लथ नहीं दिखता, बल्कि अनुरत दिखता है :
तुम्हारे हरेक बाल को सफेद होते हुए देखना मेरा राग है
यह चाँदी-सी केशराशि से रचा पूर्णिमा का घर है।
भविष्य का मार्ग यहीं से फूटता है
यहाँ स्वर्णमृग नहीं, गृहस्थी का सुफल है
करनी का एक होना
सरस साथ के सुरीले स्वरों में
यही रात-कथा है : हमारी (तलाश, पृष्ठ 117)
-यह महादेवी की नहीं, पीयूष कीयामा है, उसका अहरह गान है जिसके लिए वह कहता है :
अंधेरी आँख में वह रचती है मार्ग
अपना पहला अक्षर ...निःशब्द
भीतर है यामा। (तलाश, पृष्ठ 120)
प्रारंभ में तो लगता है यह शाब्दिक संचनाओं का खेल भर है। क्या होगा इनमें अर्थवान जहाँ वाक्य ही इतने अस्फुट हों। पर धीरे-धीरे राह खुलती है, लीक बनती है। कविता खुलती है। जैसे कोई स्त्री। अपरिचय को परिचय में बदलते हुए।
पीयूष के भीतर कोई अनथक सौंदर्य साधक विराजता है। कभी प्रसन्नवदन कभी गैरिकवसन, कभी बौद्धों की तरह आत्मा में उजास भरता। तभी तो वह कह पाता है :
कोई दिल में ज्यों
धडक रहा

कम होते गए
क्यारी में फूल

और सुवास भी
बहती हुई

फूल में रही (तलाश, पृष्ठ 34)
पीयूष की शब्द संरचनाओं में कभी कभी कुछ अनगढ-सा दीख पडता है। पर यहाँ अदीख की चिति है, अदृश्य का विस्तार है। कभी-कभी उसका कहा जैसे किसी गहन मौन की अभिव्यंजना में गुम लगता है फिर कैसे कोई सुनिश्चित अर्थ लगाए -
क्षमा व्योम की दिवंगत लौ है (पृष्ठ 40 )
पर कविता किसी सुनिश्चित अर्थ में कब समाई है भला। वह ऐसा पदार्थ है जो अपने पात्र में नहीं समाता। वह भावक के अर्थ ग्रहण की कुशलता पर निर्भर करता है।
वह इस क्षणप्रतिक्षण पुनर्नवा होती प्रकृति को कुछ इस तरह महसूस करता है जैसे वह पुरुष और प्रकृति का भाष्य लिख रहा हो। सांख्य के किसी भाष्य में डूबा-अनडूबा -
सब चले जाते हैं न चाहते हुए भी छूट
जाती दुनिया सब के लिए
खिल रही

खिलखिलाती। (वही, पृष्ठ 55 )
अपने पिता को देखते हुए भी कवि कितनी अच्छी बात कह जाता है -
मेरे पिता अच्छाई से भरे थे इतने
कमजोर कि सिवाय अपने
धोखा न दे सके किसी को (वही, पृष्ठ 58 )
कविता अपने हेतु पहले ही तय कर लेती है। बिना हेतु के कविता होती ही नहीं। पीयूष अपने कवि कर्म को भूल नहीं जाते यह कहते हुए कि -
कभी कभार शब्दों को वह काम कर सकना चाहिए
जो रंग-बिरंगे फूल करते हैं, लेकिन याद रहे;
फूल अ्प्राप्य हो और शब्द ऐसा हो जो सब उचार सके। (वही, पृष्ठ 64)
कवियों के यहाँ जो सीख मिलती है वह अनूठी, किन्तु जीवनानुभवों से संवलित होती है । रिल्के जिन अर्थों में अनुवादक को अदृश्य का मधुसंचयी कहते थे, कवि वैसा ही मधुसंचयी है । वह कविता होने की सार्थकता समझता है, तभी तो कहता है जैसे कोई अनुभवी व्यक्ति सीख देता है -
तुम्हें अलग होना हो, तो उस तरह अलग होना
जैसे पका फूल पेड से अलग होता है
(तलाश, पृष्ठ 68)
पीयूष की इस तलाश से गुजरते हुए जो मोती हाथ लगते हैं उसमें एक यह भी है । देखिए एक कवि अपनी कविता को लेकर कितने निस्संग भाव से यह कहता है कि आज कविताएँ संग्रह से अलग हो गयी हैं जैसे अपना छत्ता छोड मधुमक्खियाँ उड गयी हों। पता है, त(लाश), कोई भूमि(का) नहीं, अमृत, सफेद पांडुलिपि, कृष्ण कागज, प्याऊ, कान लपेटे कवि(ता), नीली नितंबनार व यामा सीरीज की कविताओं और अखिलेश के लुभाऊ रेखांकनों से भरी यह काव्यकृति कुछ अलग-सी है जो समकालीन कविता की सरणि पर चलने से अपने को विरत रखती है, तभी तो कृष्णबलदेव वैद जो अनुपन्यास के प्रवर्तक रहे हैं, कवि से कहते हैं कि तुम्हारी कविताएँ नवाचारी हैं मौलिक और आला दर्जे की हैं, तो मुकुंद लाठजी को ये कविताएँ कहनी की एक भंगिमा को भीतर उतारती हुई लगती हैं, अचानक एक अर्थमय रहस्य की कोख में ले जाती हैं और सूक्ष्म और मोहक हैं।
पीयूष की कविता यात्रा बिना मार्ग मादरज़ाद की चर्चा के पूरी नहीं हो सकती जिसे उन्होंने काव्य-कथा कहा है। यह कीलित, बाँच बज़र्ख, रोजनामचे में, उत्तीर्ण, छाया, पूर्ववत पुनः, जतन लाख, बींट बोल पर, मींजाई जैसी सीरीज में उपनिबद्ध जरूर है, पर एक-दूसरे से अटूट रिश्ता भी है- एक अटूट अन्तःसूत्रता है। पीयूष की भाषा अलग से ध्यातव्य है जिसे केवल सालहसाल या मुश्किलाएँ जैसे शब्दों की छाया में नहीं समझा जा सकता। उनका पूरा समूह है। उस पर अंत में बातें होंगी। अनेक अस्फुट अव्यक्त और जटिल से पदों पर विन्यस्त इस संग्रह की कविताएँ कोलाज की तरह हमारे सम्मुख आती हैं- किसी सुचिंतित कथा की तरह नहीं। पर इन जटिलताओं के बीच वे जैसे हर वाक्य अधूरा-सा छोड जाते कि आप उसकी रिक्तियों का अनुमान लगाते रहें। इसीलिए कहा गया है कि कविता केवल कवि की नहीं, पाठकों की भी होती है। वह कविता के बीच पंक्तियों के बीच की रिक्तियों को खुद अपनी कल्पनाशीलता से भरता है।
ऐसे जटिल प्रत्ययों के बीच एक वाक्य कौंधता है और क्षोभ से भर देता है। आज की जैव इंजीनियरिंग तो बीजों को निर्वंश करने पर आमादा है कि वह बोया तो जा सकता है, पर उससे उपजे बीज फिर कोई फसल नहीं तैयार कर सकते हैं। पर जो कुदरत यह काम करती है, तो हम क्षोभ से भर उठते हैं। ऐसी ही यह पंक्ति-
जैसे हिजडे
जिनके पूर्वज तो होते हैं
वंशज नहीं । (मार्ग मादरजाद, पृष्ठ 54)
इन्हें पढ कर मुझे लीलाधर जगूडी याद हो जाए जिन्होंने एक बैल पर कविता लिखते हुए लिखा कि जो पूरी पृथ्वी बो सकता है,पर वह अपना बीज नहीं बो सकता। कवि यही तो करता है। वह कवियों की कोख से जन्म लेता है और अपनी कविता को सदियों पुरानी कवि परंपरा से जोड देता है। यों तो मार्ग मादरजाद की कविताओं को ठीक-ठीक समझ सकना बहुत कठिन है, बस कुछ चिह्न छोड जाता है कवि । उसी से उस पूरी कविता का नक्शा हमें खोजना होता है। मींजाई से कैसे धान से चावल निकलता है साबुत अप्रतिहत अक्षत अक्षर की तरह। जो परिमार्जन से खिलते हैं अपनी पूरी बीनाई में। साबुत अर्थमय। कविता तभी परिपक्व होती है जब उसका एक-एक शब्द अनुभवपगा होता है। ऐसी ही एक कविता देखें।
चाहता तो पहाड की बाज़ की तरह
अपने घोंसले में लौट जाता
पर यह हवा होती जो
उसके पत्तों की दिशा तय करती।
हर शब्द खाँटी भट्टीतपा।
परिभाषित ।
खालिस हरसिंगार-सा झर जाता। (मार्ग मादरजाद, मींजाई, पृष्ठ 107)
और यह शायद इस कवि की रचना प्रक्रिया का हिस्सा भी हो कि वह ऐसा कहता है --
जब भी लिखने बैठता, अमावस आ जाती।
मुट्ठी में कुछ हासिल नहीं करना होता
पर मारकेश बाज नहीं आता
टुकडे फेंकता रहता देवता
वह देखता रहता।
सूखने पर सरोवर
हंस उड कर चला जाता।
रोशनी को ओछा करता अंततः
कुप्पी से तेल रीत जाता।
और मादरज़ाद टूटे दाँत-सा फिंका जाता।
अब कुछ बात पीयूष की काव्य भाषा पर कर ली जाए। अपनी शर्तों और अपनी रचना प्रक्रियाओं के बीच वे ऐसे अनेक शब्द व्यवहृत करते हैं जो कविता के इलाके में नए हैं। यथा, चिह्न संग्रह में निर्बिम्ब, कल्पान्तरीय, अश्रृव्य, अनामय, ध्याताचाप, होनीलेखे, नेतिनामा, अवस्त्रा, न्यौतालिपि, अन्तारंभ, विस्ताराकाँक्षा; तलाश संग्रह में क्षति भीगा, निधन-वास, दरसपोथी, अलख आँक, कृष्ण कागज, प्यासोपलब्ध, वशांगना, बाँकुरी, नीलोत्पलनयना, चकित तन्वंगी, ज्योतिर्लेखा, मौनवती, इहधाम, काकविष्ठा; तथा मार्ग मदरजाद में नेतिनातों, बेरोशन बादलों, मुश्किलाएँ, आसराग्रस्त, फूलपोश, भेदभोपा, सान्तगोपन, हौसलाहारा, फोकीफरोश, फलितआपा, झक्कीमति, दुनियावीदीठ, हलहुजूर, पीडाप्रसूत, प्रयासपाली, निवृतितपूत, गनीमतगार, तासीरतपा, थाहरोधक, वाष्पवासी, पथनेत्री, दिगंतदीठ, आर्तपगा, प्रपात प्रहार, निरासनामा, विभुचाप, स्वस्तिलिपि, तद्रूप, मर्मफला सारांश, एकर्षि, मुहिमजोई, तर्जमय, क्षणार्ध, असीसती उजलता, जल्लादीवश्यता, निरानंद क्लानित आदि। अभी तक शब्द से अनेक अर्थच्छायाओं के शब्द बना लेने में हिंदी के निपुण कवि ज्ञानेंद्रपति की कविता चर्या को देख यही लगता था कि यह कवि किस तरह अपने समकालीन यथार्थ को बाँचता हुआ भी अनेक पुराप्रयुक्त शब्दों की टोह में रहता है तथा गजदंतधूमगज या समुत्सारणपर्यंतमंडल जैसे बाणभट्टीय शब्दों का प्रयोग कर पाठक या भावक को चमत्कृत करने का भाव प्रदर्शित करता है। पर पीयूष दईया के इन प्रयोगों को देख अचरज से रह जाना पडता है कि इतने सारे अव्यवहृत शब्दों को कविता के इलाके में ले आना और उन्हें एक नए अर्थ या संकेत का वाहक बनने देना, वह भी समकालीन कविता मुहावरे से छिटक कर, यह कम साहस का काम नही है। यह लोकप्रियता की थियरी से अलग अलक्षित या दुस्साध्य रह जाने की जोखिम उठा कर किए जाने वाले शब्दप्रयोग हैं। अच्छा होता कि कवि ऐसे अप्रचलित व कठिन शब्दों के अर्थ भी देता जिससे कविता को समझने में आसानी होती।
पीयूष दईया की कविताएँ उस धान उन बालियों की तरह हैं जिनसे अक्षत अर्थ निकालने के लिए सचमुच बहुत मींजाई की जरूरत होती है। पीयूष कवियों के मध्य अपनी इसी महीन, किन्तु जटिल बीनाई के लिए याद किए जाएँगे। वे कब सरल होंगे, कहना कठिन है। पर हो सकता है जैसा कि कुँवरनारायणजी जो चक्रव्यूह और आत्मजयी में थे वैसे वह अपने सामने में, इन दिनों में या कोई दूसरा नहीं अथवा वाजश्रवा के बहाने तक नहीं रह गए थे। वे उत्तरोत्तर सरल होते हुए बडे जीवन अर्थों में अपने को घोल रहे थे। उत्तरोत्तर खुल रहे थे। पीयूष की कविताई अभी जिन रास्तों पर है, उसे लोकहिताय कुछ सरल होना होगा। क्योंकि सरलता में ही जीवन के जटिल अर्थ छिपे होते हैं। कविता उस बीज की तरह है जिसमें पेड की संभावनाएँ छिपी होती हैं। पीयूष की कविता भी इसी बीज की तरह है जिसमें कवि का पूरा पता अंकित है। उसे पढ कर सही पते पर पहुँच जाना आसान नहीं। ऐसे में मुझे ज्ञानप्रकाश विवेक का यह शेर याद आता है
जिन्दगी के डाकिये को सब पता है दोस्तों
कितना मुश्किल मेरे घर का रास्ता है दोस्तों।
पीयूष की कविता के घर का रास्ता भी मुश्किल जरूर है, पर उसे खोज लेना असंभव नहीं। क्योंकि मैं भी मानता हूँ कविता अब भी एक संभावना है और उसके शब्द वाकई उस शंख की तरह हैं जिनसे नाद की ध्वनि आती है।
***


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