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राजाराम भादू और संस्कृति के तीन अध्याय

त्रिभुवन
मुझे तथाकथित व्यावहारिक लोगों और उनकी अतिशय बुद्धिमत्ता पर हँसी आती है। बेशक जानवर बनने के लिए मानव जाति के दुःख-दर्द की ओर पीठ कर लेना और अपने स्वार्थ की चिंता करना ही काफी है। -कार्ल माक्र्स, (जिगफिरड मायर के नाम पत्र, 30 अप्रैल, 1867 : लिंक - https//marists.architeturez.net archive/mar/works/1867/letters/670430.htm)
- त्रिभुवन
संस्कृति प्रचलित जीवन पद्धति के भीतर व्याप्त अंधकार में मनुष्य और समाज के लिए प्रदीप्त आभा का निर्झर है। संस्कृति पर विचार करते समय भारतीय शब्द सहज ही इसके साथ आ जुडता है। इसलिए संस्कृति पर विचार करते समय भारतीय संस्कृति पर ही हमारा चिंतन केंद्रित रहता है। भारतीय संस्कृति क्या है? भारतीय जीवन दर्शन में इस शब्द जैसा गरिमा हनन शायद ही किसी का हुआ हो। कवि, लेखक, विचारक, दार्शनिक, राजनेता आदि विचार और चिंतन की जितनी नावों में जितनी बार सवार होते हैं, उतनी ही बार संस्कृति की नई-नई व्याख्याएँ, परिभाषाएँ और चिंतन पद्धतियाँ सामने आतीं रही हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि संस्कृति पर इससे कुछ अलग चिंतन होता है और वह भी गंभीर और सतत; लेकिन हमारे आसपास ऐसा विमर्श हो रहा हो, तो हम प्रायः इसे अनदेखा कर देते हैं और यह प्रवृत्ति अंततः घातक सिद्ध होती है।
अगर हम आधुनिक वैज्ञानिक धर्मनिरपेक्षतावादी परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय संस्कृति से अभिप्राय एक अन्य रूप में 1947 के उपरांत भारतीय राष्ट्रीय जीवन में प्रचलित आध्यात्मिक, नैतिक और सौंदर्यपरक मूल्यों की कर्म, विचार और चिंतन प्रक्रिया से है। यह संस्कृति ही है, जो देश के स्वतंत्र होने के उपरांत 1947 के बाद की भारतीय जीवन पद्धति को अभिव्यक्ति देती है। संस्कृति दरअसल विचारों, आस्थाओं, जीवन-मूल्यों, भावनाओं, संवेदनाओं, अभिरुचियों, आदतों, रीति-रिवाजों, परंपराओं, भाषा-बोलियों, साहित्य, कला, विज्ञान, लोक समाज आदि का योगफल होती है। इनका प्रत्येक व्यक्ति का अन्य व्यक्तियों, नारी, पुरुष, परिवार, जन्म, मृत्यु, विवाह, तलाक, धर्म, विचारधाराओं, राज्य और दूसरे संस्थानों के प्रति रुख का इजहार भी होता है।
संस्कृति वस्तुतः बहुत विस्तृत अवधारणा है। विभिन्न प्रकार की मानवीय गतिविधियों की जितनी सम्यक और सटीक अभिव्यक्ति इस शब्द से होती है, उतनी अन्य किसी से नहीं। इसलिए संस्कृति सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक और वैज्ञानिक विकास में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह भूमिका सकारात्मक भी हो सकती है और नकारात्मक भी। सकारात्मक भूमिका वैचारिक और भौतिक विकास को आगे बढाती है, जबकि नकारात्मक भूमिका न केवल उसमें बाधा डालती है, बल्कि सामाजिक विकास और समृद्धि की प्रक्रिया को उलट भी देती है। यह भूमिका अर्थव्यवस्था और राजनीति से गहरे तथा अभिन्न तौर पर जुडी होती है, इसलिए इनके साथ करीबी तौर पर जोडकर ही इसका उचित अध्ययन किया जा सकता है।
इस लिहाज से अभी हमारे सामने हैं तीन पुस्तकें। एक है : अहिंसा ग्रंथमाला के अंतर्गत प्रकाशित सांस्कृतिक हिंसा के रूप। दूसरी है : संस्कृति के प्रश्न। इनके साथ ही उनकी तीसरी पुस्तक है : कला प्रसंग। इन तीनों में भी संस्कृति से जुडे प्रश्नों पर व्यापक विमर्श किया गया है। इन तीनों के लेखक राजाराम भादू हैं। यह तीन पुस्तकें पिछले छह साल के दौरान आई हैं। सांस्कृतिक हिंसा के रूप की पीठिका में प्राकृत भारती अकादमी के संस्थापक और मुख्य संरक्षक डीआर मेहता और निदेशक प्रो. कुसुम जैन ने टिप्पणी की है, हिंसा के विविध रूपों की पृष्ठभूमि में उसका औचित्य सिद्ध करने के लिए हमारी विश्वास प्रणाली सक्रिय रहती है, जिसकी निर्मिति किसी न किसी प्रकार की ज्ञान प्रणाली द्वारा होती है। अहिंसा विमर्श में इसे सांस्कृतिक हिंसा कहा गया है, जो प्रत्यक्ष और संरचनात्मक हिंसा को वैधता देने का उपक्रम करती है। (सांस्कृतिक हिंसा के रूप, पृष्ठ 6) लेकिन यह अखरता है कि इतनी महत्त्वपूर्ण पुस्तक के प्रारंभ में पुस्तक की मूल पृष्ठभूमि, उद्देश्य और इसकी संपूर्णता को लेकर लेखक ने सार रूप में कुछ नहीं कहा है।
सांस्कृतिक हिंसा के रूप आठ अध्यायों में हैं, जिसकी शुरुआत पहले संस्कृति के निहितार्थ में संस्कृति एक संश्लिष्ट प्रत्यय है जैसे जटिल वाक्य से होती है, जो अंतिम अध्याय आठ शंाति उपक्रम के अंतिम वाक्य क्या मानवाधिकारों का सम्मान और उनके लिए सत्याग्रह नैतिक आचरण की एक बुनियादी कसौटी नहीं है? जैसी प्रश्नात्मकता पर पूर्ण होता है। यह सुखद है कि जिस समय हिन्दी के आम पाठक को संस्कृति संबंधी बहुत से अनुत्तरित प्रश्न बेचैन कर रहे हैं, तब ऐसे सवालों को सुलझाती-उलझाती एक ऐसी पुस्तक आई जो हमें सुचिंतित अध्ययन के लिए बाध्य करती है। नाना प्रकार की हिंसा के गौरवान्वयन के इस कालखंड में हिंसा को आलोचना और अहिंसा को विमर्श का विषय बनाना, एक अच्छी और साहसिक लेखकीय पहल है। लेखक ने पहले अध्याय में संस्कृति को परिभाषित करने की कोशिश की है, फिर भी आगे के अध्यायों में हिंसा की तहों को खोलकर देखने, समझने और आज के वातावरण को सघन रूप से प्रदूषित करती हिंसाओं के ऐसे विकल्प सुझाने की कोशिश की गई है, जिन्हें समय की सत्ता अपने रक्त भीगे सींगों से पहले ही परे छिटक चुकी है।
पहले अध्याय में बताया गया है, कुल मिलाकर संस्कृति स्वभावतः उत्कृष्टता की दिशा में गतिमान होती है। (सांस्कृतिक हिंसा के रूप, पृष्ठ 10) लेकिन हम देखते हैं कि संस्कृति के धरातल पर तथ्य कुछ और कह रहे हैं। आज हम अपने दैनिक जीवन में जिस संस्कृति का सामना करते हैं, वह लालसाओं, लिप्साओं और कामुकताओं से आप्लावित और पतित मानदंडों पर आधारित एक बुरी और विनाशलीलाओं का आवाहन करती जीवनशैली को सामने लाती है। लेखक कहता है, संस्कृति वर्तमान और अतीत के बीच संधि सेतु है। यह मनुष्य समाज को एक परिधि में बाँधने का सूत्र है। (पृष्ठ 10) लेकिन हम देखते हैं कि ये सूत्र किस तरह धन लिप्सा केंद्रित एक विद्रप जीवन शैली को सशक्त करते हैं। इसी अध्याय में मनुष्य क्या है का एक बहुत गहरा प्रश्न उठाया गया है और बताया गया है कि मनुष्य अपने क्रियाकलापों की एक प्रक्रिया में है। इस प्रश्न में इस संभावना को खंगाला गया है कि वह वर्तमान में क्या है और भविष्य में क्या हो सकता है।
दरअसल, मनुष्य के सारतत्त्व को उसके आत्मिक गुणों और लक्षणों तक ही सीमित करना सही नहीं है। मनुष्य अपनी दुनिया मनुष्यता के उसूलों पर खडी करता है, उसमें वह मनुष्यों को रखता है, लेकिन उसके सामाजिक, आर्थिक और वैयक्तिक अन्योन्य संबंधों की प्रणाली में एक निश्चित और अपना अलग ही वातावरण विकसित हो जाता है। संभवतः यही संस्कृति होती है। सांस्कृतिक चिंतनधारा के अध्ययनकर्ता जानते हैं कि कार्ल माक्र्स ने फायरबाख पर निबंध में इस प्रश्न को काफी गंभीरता से उठाया था। मनुष्य और संस्कृति दो शब्द भर हैं, लेकिन इनकी अर्थछटाएँ बेशुमार हैं। राजाराम भादू ने इन अर्थछटाओं के बीच की कुछ जरूरी चीजों को अपने अध्ययन का विषय बनाया है और इन पर विस्तार से एक नजरिया प्रस्तुत किया है, जो मनुष्य को एक बेहतर मनुष्यता की तरफ ले जाने वाली पगडंडी को दिखाता और दर्शाता है। यह सुखकर है कि इस तरह का चिंतन हमारे आसपास हो रहा है और दुःखकर यह है कि यह विषय चर्चाओं से परे रह जाता है।
भादू ने पहले अध्याय में कहा है, संस्कृति मनुष्य की विशिष्ट और अनुपम सर्जना है, जो उसे इस सृष्टि में विशेष प्राणी का दर्जा प्रदान करती है। संस्कृति में मानवीय ज्ञान, व्यवहार, परंपरा और लालित्य जैसी विविध विरासतें समाहित हैं।...इसमें मानवता की संभावनाएँ खुलती हैं और इसके जरिए मनुष्य की सौंदर्यात्मक जरूरतों की तुष्टि होती है। (पृष्ठ 9) यह सही भी है। समाज अखंड हो, एकात्म हो, और एकरूपतावादी हो तो सब कुछ बहुत सहज, सरल और सुगम हो जाता है। हालांकि इससे वह एकांकी, एकरसतावादी और अत्यंत उथला-छिछला और बजबजाता भी हो जाएगा। लेकिन हम जब 21वीं सदी के समाज को देखते हैं, तो वह इतना उथल-पुथल भरा है कि हर दिन नई जटिलताएँ जन्म लेती हैं और हर रात नए अंतर्विरोध लहलहा उठते हैं।
संस्कृति क्या है के प्रश्न से टकराते हुए लेखक ने एमिल दुर्खीम जैसे समाजशास्त्री से प्रभावित प्रसिद्ध पॉलिश मानवशास्त्री ब्रॉनिस्लाव कैस्पर मेलिनोवस्की के विचारों से समझाने की कोशिश की है कि संस्कृति क्या है। यहाँ उन्होंने सभ्यता और संस्कृति के एक बारीक अंतर को रेखांकित किया है और बताया है कि दुनिया में भौतिक निर्मितियों के रूप में जो भी मनुष्य का बनाया हुआ है, वह सभ्यता है और जो पराभौत्तिक और अदृश्य है, वह संस्कृति! लेकिन इसे देश विशेष के सन्दर्भ के क्रम में देखें और खंगालें तो साफ दिखाई देगा कि भारतीय संस्कृति की विभिन्न धाराएँ एक तरफ तो भूमंडलीय (पाश्चात्य) सांस्कृतिक वर्चस्व और आक्रमण की शिकार हैं और दृश्य मीडिया इसका प्रबल माध्यम बना हुआ है। दूसरी ओर इसकी प्रक्रिया में सांस्कृतिक पुनरुत्थानवाद उभर रहा है, धार्मिक कट्टरपंथ उसकी अगुवाई कर रहा है। इन दोनों अतिवादी धाराओं के मध्य संस्कृति के बाजारीकरण की प्रक्रिया घटित हो रही है। (सांस्कृतिक हिंसा के रूप, पेज 13)
संस्कृति के प्रश्नों से सीधे टकराने वाली इस पुस्तक में यह नहीं बताया गया है कि मेलिनोवस्की ने संस्कृति के संबंध में जो भी कहा है, वह कब और कहाँ कहा है? उसका पूर्ण विवरण इस प्रसंग को और सुंदर और पठनीय बनाता। बहरहाल, यह पुस्तक प्रतिरोध की चेतना को प्रखरता से उठाती है और कहती है कि शहरी समुदाय गाँव के सांस्कृतिक रूपों को हेय दृष्टि से देखता है। (पृष्ठ 13) इसी पृष्ठ पर कहा गया है कि सवर्ण कही जाने वाली जातियाँ निम्न कही जाने वाली जातियों को सांस्कृतिक रूप में पिछडा मानती हैं। लेकिन यह बहुत सही कहा गया है कि आधुनिकीकरण से तात्पर्य संस्कृति में मूल्य-संचरण से है। उसकी अंतर्वस्तु परिवर्तन से है, पाश्चात्य संस्कृति के अनुकरण से नहीं। (पृष्ठ 14) इस अध्याय में रूथ बेनेडिक्ट के विचारों के आलोक में भी कुछ पहलुओं का परीक्षण किया गया है, जो समकालीन जीवन मूल्यों के संदर्भ में व्यावहारिकता और आदर्श के बीच की रक्तियों को रेखांकित करता हुआ आगे बढता है।
लेकिन गाँव को शहर से हेय दृष्टि से देखने का तर्क समझना होगा। इसके लिए सबसे बेहतरीन हैं, वे विचार और तर्क, जो भारतीय संविधान सभा में चार नवंबर, 1948 को कार्यसूची निर्धारित करते समय डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने भाषण के दौरान प्रस्तुत किए थे। उन्होंने कहा, हमारे गाँव हैं क्या? ये कूपमंडूकता के परनाले हैं। अज्ञान, संकीर्णता और सांप्रदायिकता की काल कोठरियाँ हैं। मुझे तो प्रसन्नता है कि विधान के मसविदे में गाँवों को अलग फेंक दिया गया है और व्यक्ति को राष्ट्र का अंग माना गया है। भारतीय बुद्धिजीवियों के सवर्ण वर्ग और गाँधीवादियों को भारतीय गाँवों का वह भद्दा और विकराल चेहरा कभी दिखाई नहीं देता, जिसमें दलितों की बस्तियाँ आज भी गाँवों के बाहरी इलाकों में होती हैं और मरे पशु ढोने, गोबर उठाने, मानव मल साफ करने आदि जैसे बेहद बुरे और अमानवीय स्तर पर धृणास्पद काम आज भी दलित जातियों के हिस्से यथावत हैं। दलितों की जमीनों पर दबदबे वाली सवर्ण जातियों के बाहुबली और धनबली लोगों द्वारा किए जाने वाले कब्जे, उनके अत्याचार और वोट के लालच में पीडितों के प्रति मुख्यधारा के दलों के अन्याय आज भी समाचार-पत्रों की पहले पन्ने की कहानियों में जीवंत हैं।
अध्याय दो हिंसा के उत्स और स्वरूप में नॉर्वियन समाजशास्त्री, प्रसिद्ध शांतिवादी चिंतक और ओसलो के पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के संस्थापक जोहन विसेंट गाल्तुंग की विचारपद्धति के माध्यम से हिंसा के दर्शन और अहिंसा के प्रतिरूपों को रेखांकित किया गया है। यह सुखद संयोग है कि अपनी तार्किक परिणति म जोहन गाल्तुंग महात्मा गाँधी की धारणाओं से अपने निष्कर्षों को जोडते हैं। इस तरह हिंसा के अहिंसक प्रतिकार की एक राह बनती है। लेकिन यह कितना हत्प्रभ कर देने वाला है कि गाल्तुंग को मलेशिया की कट्टरपंथी इस्लामिक सरकार ले जाती है, लेकिन अहिंसा के परमपिता के भारत के राजनेता ध्यान ही नहीं देते कि वे एक महान अहिंसावादी को अपने यहाँ किसी ज्ञान केंद्र में ले आएं। वे मलेशिया की राजधानी कुआलालंपुर के इंटरनेशनल इस्लामिक विश्वविद्यालय में ग्लोबल पीस चेयर के संस्थापक रहे।
यह गाल्तुंग ही थे, जिन्होंने पीस रिसर्च शब्द गढा और इसकी अवधारणा विकसित की। इस अध्याय में एक संभावना यह बनती थी कि लेखक कट्टरता की तरफ बढते एक इस्लामिक मुल्क के विश्वविद्यालय में शांति पीठ की स्थापना पर विस्तार से कुछ कहते, जो इस्लाम के रूप में कट्टरतावादी धर्म और उसकी हिंसा से जुडे प्रश्नों को सामने रखता और उनके कुछ सहज उत्तर तलाशता। ये प्रश्न हिंदुत्व के कट्टरवाद की तरफ बढते भारत से चिंतित लोगों को कुछ सुकून देते। आखिरकार एक नई हिंसा के दावानल की तरफ भारत को धकेलते राजनेताओं और उनकी तरफ चुप्पी साधकर बैठे और राजनीतिक लाभ मिलने की सूरत में उन जैसा ही व्यवहार करने को तत्पर छद्म लोकतांत्रिक प्रतिपक्षी राजनेताओं के बारे में इस समय कुछ नहीं कहा जाएगा, तो कब कहा जाएगा? राजनीति ऐसे अंतर्विरोधों को जीने लगती है, तो सबसे अधिक विदीर्ण संस्कृति का हृदय ही होता है।
आज का राजनेता ही नहीं, नागरिक भी जटिल अंतर्विरोधों में जीता है। उसे इन अंतर्विरोधों को जीने में आनंद आता है। यह सच इस्लाम के साथ भी है, बौद्ध धर्म के साथ भी, हिन्दू के भी और ईसाई के भी। और ऐसे देशों के भी, जहाँ-जहाँ इन धर्मों का वर्चस्व है। इन सबके भीतर अनगिनत विरोधी प्रक्रियाएँ और प्रवृत्तियाँ पाई जाती हैं। यह साफ दिखाई देता है कि राजनीतिक दल, उनसे जुडे प्रकल्प तथा विश्वासों और विचारधाराओं पर आधारित संप्रदाय आपस में टकराते हैं। चाहे दुनिया में आज कोई भी देश हो, वह बहुत सारे परस्पर विरोधी विचारों, नियमों, मानदंडों और सिद्धांतों के बीच टकराहट का कुरुक्षेत्र बना हुआ है। लेकिन यह स्थिति स्थायी नहीं रहती, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से एक गतिशीलता संसार का नियम है। यही वह ऐतिहासिक गतिशीलता है, जो सांस्कृतिक हिंसा के विभिन्न स्वरूपों को सच मानकर भी अंततः मानवाधिकारों और नागरिक अधिकारों के माध्यम से मनुष्यता के प्रश्नों से टकराती है और एक रचनात्मक मानवीय समाज की संभावना को रचती दिखती है। विभिन्न तरह के त्रासद प्रसंगों का उल्लेख करते हुए यह नतीजा निकलता है कि मनुष्य स्वभाव से अपेक्षाकृत सहिष्णु और दयालु होता है।
इस अध्याय में कुछ दिलचस्प आँकडे दिए गए हैं और बताया गया है कि किस तरह रक्षा बजट को कम करके एक सुंदर, सुरक्षित और स्वस्थ समाज का निर्माण संभव है। इस समय भारत का रक्षाबजट 4,78,196 करोड रुपए वार्षिक है। हालांकि पुस्तक में सीधे तौर पर भारत के रक्षा बजट और इनमें कटौतियों के प्रश्नों से बचने की पूरी कोशिश की गई है, लेकिन फिर भी कुछ महाशक्तियों के रक्षा बजट और उनकी तरफ से बिछाई जाने वाली बारूरी सुरंगों से होने वाली दृश्य और अदृश्य हिंसा का खाका कुछ इस सावधानी से खींचा गया है कि उसे भारत के संदर्भ में समझा जा सके।
इसी तरह ईसाई धर्म में हिंसा और अनैतिकता का बखूबी जिक्र है, लेकिन मनुस्मृति, पौराणिक काल की हिंसा और बौद्धों की हिंसा पर वैसा ध्यान नहीं दिया गया है। यह सही है कि थॉमस पायने के माध्यम से लेखक ने कहा है कि जहाँ जीवन को सस्ता माना जाता है, वहाँ हिंसा अधिक होती है, जबकि जीवन को मूल्यवान मानने वाले समाजों में हिंसा को ज्यादा जगह नहीं मिलती। इसे भारत के संदर्भ में देखें, तो यह एक सटीक अवधारणा है, जो कश्मीर, गुजरात, दिल्ली, असम आदि की अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा से लेकर दलित विरोधी हिंसा तक को भी अपने दायरे में समेटती है। बच्चों और महिलाओं पर होने वाली हिंसा के कुछ रूप तो हमारी संस्कृति में इतने विन्यस्त हो गए हैं कि इन पर कभी प्रश्न उठे, तो उस पर हैरानी व्यक्त होने लगती है।
भयावह हिंसा का एक सम्मोहक स्वरूप देशभक्ति, राष्ट्ररक्षा और कथित न्यायवादिता से जुडा है। कितनी हत्प्रभ कर देने वाली बात है कि समाज की हिंसा से भयभीत 19 साल का एक लडका और 21 साल की एक लडकी ये पंक्तियाँ लिखे जाने के दिन उच्च न्यायालय में जीवन की रक्षा की याचिका लेकर जाते हैं, लेकिन न्यायालय की अविवेकी दृष्टि देखिए कि वह इसे हिंसा या जीवन रक्षा से जुडा प्रश्न मानने के बजाय अल्पवयस्क लिव इन रिलेशनशिप के औचित्य के नजरिए से देखकर निरस्त कर देता है। इस तरह भादू जिस सांस्कृतिक हिंसा का वर्णन करते हैं, उसमें न्यायिक हिंसा, लोकतांत्रिक हिंसा, मीडिया हिंसा, नौकरशाही की हिंसा, विधायिका की हिंसा, कार्यपालिक की हिंसा और सरकारी तंत्र की हिंसा एक व्यापक रूप से जीवंत होती है। हम एक औदार्य भरे और आशावादी मन से मानव अधिकारों में अहिंसा का आलोक झरता देखते हैं, लेकिन कथनी और करनी में विकराल अंतर वाले इस देश में मानव अधिकार आयोग का संरक्षणकर्ता जिस कार में बैठा है, वह सडक पर पैदल चलते असहाय लोगों के अधिकारों को कुचलकर बडी सहजता से अपने दफ्तर मानवाधिकारों की रक्षा के लिए पहुँचने का स्वांग भरता है।
यह पुस्तक कोविड से पहले लिखी गई, लेकिन कोविड के दौरान प्रकाशित हुई है। इसमें भी हिंसा के प्रश्न को और प्रभावी तरीके से उठाया जा सकता था। इसके बावजूद इस प्रश्न से टकराने की कोशिश की गई है। जैसे कहा गया है, हिंसा का संकीर्ण अर्थ किसी को क्षति पहुँचाने तक सीमित है; जैसे कि दैहिक क्षति के अंतर्गत किसी की हत्या कर दी गई हो। क्या स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचना को हम इसके अंतर्गत रख पाएँगे, जिसकी परिणति में भी वंचित व्यक्ति की मृत्यु हो सकती है? (पृष्ठ 24) लेकिन अगर पुस्तक में छपे शब्द टीबी की जगह कोविड कर दिया जाए, तो लेखक का प्रश्न है, यदि आज के समय में तमाम सुविधाओं के होते हुए कोई व्यक्ति कोविड से मर जाता है, तो हम इसे हिंसा की परिभाषा के अंतर्गत मान सकते हैं। अगर हम सांस्कृतिक हिंसा के इस मानदंड को ग्रहण करें, तो आज केंद्र और राज्यों की सरकारें देश में दो लाख 63 हजार से अधिक (ये पंक्तियाँ लिखे जाने के दिन तक) हत्याओं की जिम्मेदार और जवाबदेह हैं। सच में तो यह हिंसा नहीं, राज्य प्रायोजित ऐसा नरसंहार है, जो नागरिकों के स्वास्थ्य के प्रति भयावह उत्तरदायित्वहीनता से प्रेरित है। यह अलग बात है कि हिंसा के प्रति लेखक के नजरिये की बात करें, तो यह इरादतन हिंसा के बजाय एक गैरइरादतन हिंसा हो सकती है।
सांस्कृतिक हिंसा के रूप का अध्ययन यह सहज दृष्टि देता है कि किस तरह मानव रक्षा के लिए आधुनिकतम अस्पतालों, उसके सांस्कृतिक वैभव के लिए बेहतरीन शिक्षण संस्थानों और कला-साहित्य के केंद्रों को उपेक्षित करके राम मंदिर, सरदार पटेल की प्रतिमा, शिवाजी की प्रतिमा या स्वतंत्रता से आज तक के शासनकाल में प्रतिमाओं की इस संस्कृति, प्रधानमंत्री आवास और संसदीय परिसर के लिए हजारों करोड रुपए का बजट मुहैया करवा जाता है। इससे पहले महात्मा गाँधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू आदि सहित विभिन्न विभूतियों की प्रतिमाएं स्थापित करने का ऐसा ही चलन रहा था। सांस्कृतिक हिंसा के रूप का यह चिंतन प्रश्न उठाता है कि क्या भगवान राम, शिवाजी या सरदार पटेल या फिर महाराणा प्रताप या महात्मा गाँधी के नाम से वैश्विक स्तर के सांस्कृतिक, कला, शिक्षा या मेडिकल अनुसंधान के केंद्रों को वरीयता नहीं दी जानी चाहिए? एक सजग और चैतन्य संस्कृति यही है कि उसका विमर्श हमारी जीवन दृष्टि को औदार्य भरी मानवीय दिशा दे।
कई बार यह समझ नहीं आता कि सांस्कृतिक हिंसा के रूप में कुछ जगह धार्मिक हिंसा के मामले में जहाँ गुजरात, पंजाब, बंगाल, कश्मीर, उत्तरप्रदेश या दिल्ली के भारतीय उदाहरण बेहतर हो सकते थे, वहाँ फिलिस्तीनियों पर सिर्फ इजराइल के ही उदाहरण क्यों दिए गए हैं? भारत भूमि और भारतीय समाजों में व्याप्त हिंसा के नाना रूपों से आँखें क्यों चुराई जा रही हैं? अगर यह समस्या इस स्तर पर है, तो हिंसा के प्रश्नों से टकराने का अर्थ क्या है? ऐसे कई प्रश्न कई जगह उठते हैं।
दॅ आर्ग्युमेंटेटिव इंडियन में अमर्त्य सेन ने बडा अदभुत उदाहरण दिया है। वे लिखते हैं, 1590 में जहाँ भारत में धार्मिक सहिष्णुता के सिद्धांत रचे जा रहे थे, वहीं यूरोप तो उन दिनों धर्म अभियोग चला अपराधियों को जिंदा जलाने के जुनून का शिकार था। भारत में सांस्कृतिक हिंसा के जन्म और उसके विकराल होते जाने की पद्धति शायद हमारे आधुनिकीकरण और अंगरेजी कुशासन से भी जुडी है। संस्कृति पर विमर्श हो और रवींद्रनाथ ठाकुर का जिक्र न हो तो यह कुछ सही नहीं लगता। संस्कृति के प्रश्नों से प्रसिद्ध लेखक यूआर अनंतमूर्ति भी कम नहीं टकराते। किस प्रकार की है यह भारतीयता? में अनंतमूर्ति कितना कुछ कहते जाते हैं। कुछ समय पहले नंदकिशोर आचार्य ने संस्कृति का व्याकरण में कुछ ऐसे प्रश्नों से सीधे-सीधे मुठभेड की थी; लेकिन उन्होंने अपनी दृष्टि में भारतीयता को ही सामने रखा। हालांकि लेखक ने आचार्य के माध्यम से आखिर के अध्याय में काफी कुछ कहने की कोशिश की है।
महान कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की भारत : इतिहास और संस्कृति ऐसे प्रश्नों से टकराती है, तो रामधारी सिंह दिनकर संस्कृति के चार अध्याय में कौनसा पहलू नहीं छूते! पंडित जवाहरलाल नेहरू की डिस्कवरी ऑफ इंडिया सुवीरा जायसवाल की वैष्णव धर्म का उद्भव और विकास श्यामाचरण दुबे की इंडियन सोसाइटी, एम.एन रॉय की विज्ञान और दर्शन तथा इस्लाम की ऐतिहासिक भूमिका, आर पी सराफ की इंडियन सोसाइटी, एम.एन श्रीनिवासन आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन या फिर जीएस घुर्ये की पुस्तकें बहुत कुछ ऐसा है, जो इन प्रश्नों की पृष्ठभूमि को याद करने लायक बनाता है। हालांकि एडवर्ड टेलर के प्रिमिटिव कल्चर वॉल्यूम 1, न्यूयॉर्क (1871) में संस्कृति की प्रारंभिक तौर पर परिभाषा को बखूबी बताया गया है और यह रेखांकित किया गया है कि हिंसा किस तरह विभिन्न सांस्कृतिक स्तरों पर व्याप्त और विद्यमान रहती है।
पुस्तक का दूसरा अध्याय : हिंसा के उत्स और स्वरूप में शांतिवादी चिंतक और ओसलो के पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट संस्थापक जोहन विन्सेंट गाल्तुंग की अवधारणाओं के आलोक में हिंसा को समझने की जो कोशिश शुरू की गई है, वह आगे के अध्यायों में और विकसित तथा परीक्षित हुई है। महात्मा गाँधी के अराजकतावाद को समझने की कोशिश की गई है।
गाँधी वस्तुतः राज्य को हिंसा की एजेंसी के रूप में देखते थे और इन्हीं अर्थों में वे अराजकतावादी थे। लेकिन इन अर्थों में अगर देखें, तो रवींद्रनाथ ठाकुर कहीं गहरे तक उतरते हैं। इस अध्याय में इतिहासकार नॉर्मन डेविस के हवाले से जिक्र किया गया है कि 16वीं शताब्दी के पेरिस में मनोरंजन के लिए बिल्ली को जलाकर मारा जाता था। ...आज की दुनिया में हम ऐसे त्रासद प्रसंगों की कल्पना भी नहीं कर सकते। लेकिन यहाँ भारतीय उदाहरण तलाशे जाते तो संस्कृति में हिंसा के भारतीय स्वरूपों को भी समझने में बेहतर मदद मिल सकती थी। भारतीय जीवन पद्धति में आज भी हर वर्ष बुराइयों के प्रतीक और सीता हरण करने वाले रावण के पुतले को जलाना एक अनिवार्य उत्सव है, लेकिन यह भी सच है कि इसी संस्कृति को मानने वाले देश में हर साल बलात्कार के 32 हजार से 35 हजार मामले दर्ज होते हैं।
अगर हम सांस्कृतिक इतिहास को देखें, तो वैदिक मंत्रों को भयावह यौन हिंसा का आधार तक बनाया गया। स्वामी दयानंद सरस्वती ने इस यौन हिंसा की कडी आलोचना करते हुए अपने ग्रंथ ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका के पृष्ठ 360 पर उदाहरण दिया है कि यजुर्वेद के मंत्र ता उभौ चतुरः पदः संप्रसारयाव स्वर्गे लोके प्रोर्णुवाथां वृषा बाजी रेतोधा रेतो दधातु (यजुर्वेद अध्याय :23, मंत्र : 20) (इसका वह अर्थ जिसे स्वामी दयानंद सरस्वती ने अशुद्ध और आपत्तिजनक करार दिया है, लेकिन जो निहित स्वार्थी लोगों द्वारा बताया जाता हैः यजमान की स्त्री घोडे के लिंग को पकड कर आप ही अपनी योनि में डाल दे।) के आधार पर यज्ञों में यौन हिंसा के कुत्सित रूप रचते थे। उनका कहना था कि वेदों में ऐसा नहीं है, लेकिन इस मंत्र का बेहद गलत अर्थ करके यह सब किया गया। संस्कृति और धर्म का यह भारतीय स्वरूप जुगुप्सा जगाता है। दयानंद सरस्वती ने इसके लिए सांस्कृतिक पतन और तत्कालीन समाज के वर्चस्वशाली धार्मिक लोगों को जिम्मेदार और जवाबदेह बताया है। उनका तर्क था कि व्यभिचारियों ने अपनी कुत्साएँ पूर्ण करने के लिए व्याकरण तक का सहारा लिया था और पाणिनि के नाम से अपने अर्थ प्रचलित कर दिए थे। (वर्णोच्चारण शिक्षा, भूमिका, पेज 1, दयानंद सरस्वती) उनका तर्क है कि ऐसे लोगों ने किस प्रकार अपनी अपसांस्कृतिक मानसिकता के कारण वैदिक मंत्रों के मनमाने अर्थ निकालकर अपनी काम ऐषणाओं को शांत किया। यौन हिंसा के इस तरह के उदाहरण भारतीय धर्म ग्रंथों में काफी जगह दिखाई देते हैं।
भादू के अनुसार स्टीफन जे गोल्ड का कहना था कि मानव प्रजाति बुरी या विध्संक प्रजाति नहीं है। ऐश्ले मोंटेग्यू इसमें जोडते हैं कि जीव वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार वैश्विक बंधुत्व एक नैतिक मूल्य है। (पेज : 18) यह सिर्फ भारतीय समाज की बात ही नहीं है, विश्व की विभिन्न संस्कृतियों में हिंसा व्याप्त रही है और उसने कभी धर्म का स्वरूप ग्रहण किया तो कभी परंपरा का। भादू ने धार्मिक हिंसाओं का व्यापक चित्रण किया है। पडताल की है। लेकिन वह अगर मनुस्मृति में देखते, तो सुनियोजित हिंसा के प्रावधानों का एक प्रस्थान बिंदु और बेहतर तरीके से स्पष्ट हो सकता था। हम जब अपनी लोकतांत्रिक संस्कृति की बात करते हैं, तो स्वतंत्रता का जन्म एक व्यापक हिंसा के बीच होता है। यह हिंसा कश्मीर, असम, बंगाल और दिल्ली होती हुई गुजरात में अपना सबसे भयावह स्वरूप ग्रहण करती है। लेकिन विभिन्न अध्यायों में यह पुस्तक सांस्कृतिक हिंसा के नाना रूपों को रेखांकित करती और सांस्कृतिक अहिंसा और सांस्कृतिक सौंदर्यबोध की जरूरतों को रेखांकित करती है।
अध्याय तीन में विकास बनाम दरिद्रता के दुष्चक्र के तहत भूमंडलीकरण के भारत पर असर के कुछ निष्कर्ष प्रस्तुत किए गए हैं। विकास की पूंजीकेंद्रित अवधारणा को रेखांकित किया गया है। विषमतामूलक परिस्थितियों के विकराल होते स्वरूप को सही परिप्रेक्ष्य में समझाने की कोशिश की गई है। बताया गया है कि दरिद्रता का प्रतिकार कैसे किया जाए। इस अध्याय का प्रारंभ प्रसिद्ध मानवकामी मार्कसवादी इतालवी चिंतक-दार्शनिक एंटोनियो फ्रांसिस्को ग्राम्शी की एक सूक्ति से किया गया है। लेकिन इस सूक्ति में सबसे ज़रूरी शब्द हिंसा को जाने क्यों छोड दिया गया है। ग्राम्शी की यह सूक्ति दी गई है र् पूंजीवादी प्रणाली दंड-विधान से ही नहीं, संस्कृति और विचारधारा से भी शासन करती है। लेकिन यह सूक्ति दरअसल कहती है कि पूंजीवाद न केवल हिंसा से अपना नियंत्रण स्थापित करता है, बल्कि वह राजनीतिक और आर्थिक उत्पीडन को भी अपनी विचारधारा का स्वरूप दे देता है। ग्राम्शी की यह सूक्ति आज की राष्ट्रीय संस्कृति को कितनी सुंदर तरह से परिभाषित करती है, जब हम देखते हैं कि लिंचिंग जैसे घृणास्पद अपराध और नोटबंदी, थाली बजाना, दीया जलाना जैसे कदम राष्ट्रीय स्तर पर उठाए जाते हैं तो साफ दिखता है कि समाज को ज़रूरत किस बात की है और उसे दिया क्या जा रहा है। सच कहा जाए तो अपसंस्कृति की राजनीति के मायावी दानव की छत्रच्छाया में सांस्कृतिक हिंसा की अशोक वाटिका शस्य-श्यामला हो रही है।
अध्याय चार सांप्रदायिक हिंसा पर आधारित है। इसमें गाल्तुंग के तर्क के आधार पर बताया गया है कि सांप्रदायिक हिंसा सांस्कृतिक है। हम पाते हैं कि संस्कृति में यह तत्त्व प्रेम की तरह घुला रहता है, लेकिन राजनीतिक उद्देश्यों को जब आगे रख लिया जाता है, तो कितनी आसानी से इस प्रेम को घृणा में परिवर्तित करके व्यापक हिंसा में बदल दिया जाता है। भले भारत में हिन्दू-मुसलमान के बीच हिंसा अंगरेज़ों के कारण पैदा की गई हो और चाहे अंगरेज़ों ने ही फिलिस्तीन जैसी जगह को अधिनायकवादी दूषित राजनीति के कारण मुस्लिमों, ईसाइयों और यहूदियों के बीच ऐसा विषबीज बोया कि वह कई देशों के बीच एक व्यापक शत्रुता का कारण बन गया। हिंसा को लेकर इस अध्याय में एक दिलचस्प प्रसंग सभ्यताओं की ऐतिहासिक स्मृतियों के संबंध में है। इन स्मृतियों को हिंसा का कारण ठहराया गया है। हम देखते हैं कि सभ्यताओं में असंख्य तरह की विद्रूप स्मृतियां सुप्त रूप में विद्यमान रहती हैं, लेकिन ये उस समय तक हिंसा का रूप नहीं लेतीं, बल्कि लोक में प्रेम के अनूठे सेतु बनाए रहती हैं, जब तक कि कोई राजनीतिक शक्ति इन स्मृतियों का दुरुपयोग अपनी प्रभुसत्ता स्थापित करने के लिए नहीं करे। भारत विभाजन हो या फिलीस्तीनी-इज़राइली हिंसा का अविरल सिलसिला!
अध्याय पाँच में जाति विद्वेष और द्वंद्व का अध्ययन है। इसमें भादू का एक महत्त्वपूर्ण अवलोकन है, ब्राह्मणवाद संस्कृतिकरण की प्रक्रिया से विद्रोही चेतना को कुंद कर देता है। अंबेडकरवादी आंदोलन भी ब्राह्मणवाद द्वारा किए जाने वाले इस आत्मसातीकरण का शिकार हो रहा है। (पेज-97) लेकिन यह देखना बहुत ही दिलचस्प होगा कि ईसा से चौथी सदी पहले यानी आज से 2500 साल पहले जैमिनी का न्याय सूत्र (दरअसल दृष्टांत) है - ब्राह्मण-श्रमण न्याय। यानी ब्राह्मण अगर बौद्ध हो जाए, तो भी वह अपने गुण-धर्म और संस्कृति नहीं छोडता! यानी वह बौद्ध धर्म में भी वर्णव्यवस्था स्थापित कर ही देता है। (जैमिनी न्याय माला की मीमांसा प्रदीप टीका, लेखक : पंडित गंगाप्रसाद उपाध्याय, पृष्ठ 422); लेकिन अंबेडकरवादियों पर भादू का निष्कर्ष उस धारणा पर आधारित प्रतीत होता है, जो एक-दूसरे से सीखने और परस्पर प्रभाव डालने और उसे स्वीकार करने के बजाय ऊंची जातियों के प्रभाव को ही एकांगी रूप में देखती और पहचानती है।
सामाजिक विकास के ऐतिहासिक अध्ययन बताते हैं कि ऊँची जातियों के बजाय वर्चस्वशाली वर्ग कम वर्चस्वशाली वर्गों पर असर डालते हैं। यह एक तरह से किसी एक जाति की प्रभुता से नहीं, क्षेत्र विशेष या देश विशेष में किसी जाति की प्रभुता से भी जुडा है। संस्कृतिकरण की इस प्रक्रिया में इस महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष को प्रसिद्ध समाजशास्त्री एमएन श्रीनिवास ने अपनी पुस्तक आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है, जनजातियों के बीच अस्थायी रूप में रहने वाले उच्च जातियों के हिन्दू उनके ऐसे रीति-रिवाज़, कर्मकांड और विश्वास अपना लेते हैं, जो बहुत बातों में उनके अपने रीति-रिवाज आदि से सर्वथा विपरीत होते हैं। (पृष्ठ 31)
अध्याय छह हिंसा के अन्य क्षेत्र और अध्याय सात हिंसा का प्रतिकार में स्त्रियों, शिक्षा, भाषा, उग्र राष्ट*वाद, जाति-विभेद जैसे बिंदुओं को उठाया गया है। विद्वान् समाजशास्त्री प्रो.श्यामलाल के अध्ययन के माध्यम से कहा गया है कि धन की तुलना में सामाजिक उत्थान में शिक्षा का कहीं अधिक योगदान है। लेकिन प्रश्न उठता है कि कैसी शिक्षा? आखिर शिक्षित तो ब्राह्मणवादी वर्चस्व वाला वर्ग या पूँजीवादी या कॉरपोरेट क्षेत्र के लिए लोग कम हैं क्या? साफ सा मतलब है कि मानवतावादी उत्थान वाली ऐसी शिक्षा ज़रूरी है, जो आधुनिक हो, लैंगिक, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय, जातिवादी, सांस्कृतिक, सामाजिक आदि तरह के समस्त भेदभावों से परे हो, जिसमें पृथिवी, पर्यावरण और पारिस्थितिकी की चिन्ताएँ हों और जो आज के विकराल प्रश्नों को लेकर किसी धर्म विशेष, विचारधारा विशेष या देशविशेष के हितों से जुडे होने के बजाय वृहत्तर मानव समाज और वनस्पति जगत से जोडती हो और शिक्षित होने के बाद देह और आत्मा में करुणा और संवेदनाओं से झूम उठने का स्वाद रचती हो।

अध्याय सात में गाँधीवाद और गाँधी की समझ को लेकर एक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। धर्म को लेकर गाँधीजी के विचारों को गलत समझने को लेकर भी कुछ चीज़ें स्पष्ट करने की कोशिश की गई है। गाँधी एक महान त्यागी और नैतिक प्रभामंडल वाली शख्सियत हैं। वे धार्मिक होकर भी सांप्रदायिकता और धार्मिक हिंसा के किसी भी रूप से दूर थे और उनके समकालीन मुहम्मद अली जिन्ना तथा विनायक दामोदर सावरकर नास्तिक होकर भी सांप्रदायिक थे और धार्मिक हिंसा में विश्वास करते थे। जिन्ना और सावरकर को सामने रखे बिना गाँधीका नैतिक लोक समझ नहीं आ सकता। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि सरदार भगतसिंह सहित सभी क्रांतिकारी राजनीतिक हिंसा में विश्वास रखने के बावजूद विवेकशील मानवतावाद की आभा से दीप्त थे।
एक बेहद चर्चित चिंतक और महान विचारक हुए हैं एमएन रॉय। वे गाँधी के समकालीन थे और 1917 की महान रूसी ऋांति के शिल्पकार व्लादिमीर इलिइच उल्यानोव लेनिन जैसे माक्र्सवादी विचारकों को अपनी मेधा की आभा से अचंभित कर चुके थे। गाँधीवाद के बारे में वे कहते हैं, भारतीय अध्यात्मवादी संस्कृति इस सिद्धांत पर आधारित है कि सांसारिक सुख, संपूर्ण जीवन, महान और शक्तिशाली होना ईश्वर की देन है। गाँधीवाद के नैतिक सिद्धांत यानी अध्यात्मवादी संस्कृति शोषित और पीडित को समझाती है कि वह अपने मुकद्दर के साथ समझौता करे। प्रकारांतर से गाँधीवाद (मनुष्य या भारतीय नागरिक को) कष्टमय जीवन भोगने, बलिदान देने और त्याग करने तथा गरीबी को ओढे रखने को बाध्य करता है।...अगर क्रिश्चियनिटी पतित पश्चिमी जगत् को नहीं बचा सकती तो गाँधीवाद कतई नहीं बचा सकता। अगर क्रिश्चयनिटी का नैतिक रहस्यवाद मध्ययुगीन तथा आधुनिक सभ्यता के फूहड भौतिकवाद को अध्यात्मवाद में नहीं बदल सकता तो गाँधीवादी शिक्षा तर्कसम्मत रूप से उस पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकती। (हमारा सांस्कृतिक दर्प -एमएन रॉय/ पृष्ठ 137...139)
अध्याय आठ : शांति उपक्रम के रूप में है। अहिंसा के आधार के रूप में नैतिकता, बहु-सांस्कृतिकवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रस्तुत किया गया है। एक बहुत सुंदर तथ्य रेखांकित किया गया है कि यह बहुत बडी भ्रांति है कि आर्थिक समृद्धि मूल्य, संवेदना और सौंदर्यबोध को विकसित करती है। (पृष्ठ 16) सच में अगर देखा जाए, तो संस्कृति मनुष्य की सहज प्रकृति और प्रवृत्ति का तार्किक परिणाम और प्रकटीकरण है। मनुष्य बुद्धि, हृदय और भावनाओं का जीवन है। संस्कृति इसी मनुष्य का मर्म है। जर्मन दार्शनिक लुडविग फायरबाख ने मनुष्य के इसी मर्म को यों परिभाषित किया है, आज के मनुष्य में चिंतनशक्ति, इच्छाशक्ति और भावनाशक्ति है। चिंतनशक्ति उसके संज्ञान का तेज है, इच्छाशक्ति चरित्र का ओज है और भावनाशक्ति प्रेम है।
पुस्तक के अध्याय चार सांप्रदायिक हिंसा को सभ्यता की ऐतिहासिक स्मृतियों का झगडा बताया है। स्मृतियाँ समाजों और राष्ट्रों के आवेगों को जन्म देती हैं। इस रूप में यह अध्याय पुस्तक को काफी रचनात्मक और मौलिक स्वरूप देता है। स्मृति का अर्थ है मनुष्य अपने निजी और सामाजिक अनुभवों को सहेजता है। स्मृतियाँ दृश्य, अदृश्य और जड तथा गतिशील बिंबों का निर्माण करती हैं। इस रूप में देखें, तो मनुष्य कुछ नहीं होता। वह अपनी स्मृतियों के बिंबों की कठपुतली होता है। ये स्मृतियाँ उसे उसकी मनुष्यता और अमानुषिकता को कुरेदती हैं। स्मृतियाँ अतीत को वर्तमान और वर्तमान को अतीत बना डालती हैं। सोशल मीडिया के उभार और राजनीतिक दुरभिसंधियों को समझने की कोशिश करें, तो स्मृतियों का बहुत खुलकर राजनीतिक उपयोग हुआ है। सांस्कृतिक विमर्श का नया चिंतन बताता है कि किस प्रकार सच्ची स्मृतियों को अपदस्थ करके झूठी स्मृतियाँ निर्मित की जाती हैं और उन्हें मनचाहे राजनीतिक परिणामों में बदलने की कोशिश होती है।
पुस्तक के आखिरी अध्याय शांति उपक्रम में कहा गया है, गलती, अपराध और पाप में अंतर है। गलतियाँ सुधारी जा सकती हैं, अपराध के लिए दंड दिया जा सकता है, पर पाप का बस एक ही इलाज है और वह है पश्चाताप। पश्चाताप जातीय विद्वेष के समाधान की भी एक संभव और संभावित रूप से संतोषजनक पद्धति है। (पेज 153) लेखक के पुस्तक के अंत में इस सारबिंदु के रूप में बहुत सहज भाव से गलती, अपराध और पाप कह दिया, लेकिन यहाँ सहसा भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास चित्रलेखा का प्रारंभ जीवंत हो उठता है, जहाँ उपक्रमणिका में कुछ यों शुरुआत की गई है : श्वेतांक ने पूछा -और पाप!
महाप्रभु रत्नांबर मानो एक गहरी निद्रा से चौंक उठे। उन्होंने श्वेतांक की ओर एक बार बडे ध्यान से देखा, पाप? बडा कठिन प्रश्न है वत्स! पर साथ ही बडा स्वाभाविक! ...पाप की परिभाषा करने की मैंने भी कई बार चेष्टा की है, पर सदा विफल रहा हूँ। पाप क्या है और उसका निवास कहाँ है; यह एक बडी कठिन समस्या है, जिसको आज तक नहीं सुलझा सका हूँ। अविकल परिश्रम करने के बाद, अनुभव के सागर में उतराने के बाद भी जिस समस्या को नहीं हल कर सका हूँ, उसे किस प्रकार तुमको समझा दू्ँ!
इस पुस्तक और संस्कृति के संबंध में भादू के वैचारिक दृष्टिकोण को लेकर यह प्रश्न नहीं उठता, यदि उन्होंने इस अध्याय के प्रारंभ में भगवान बुद्ध और उनके शिष्य का रस्सी और गाँठ संबंधी रूपक नहीं दिया होता। खैर, रस्सी की जिस गाँठ का जिक्र भादू करते हैं, उसी दर्शन भूमि पर खडे होकर भगवतीचरण वर्मा अपने उपन्यास चित्रलेखा का उपसंहार प्रासंगिक हो जाता है, संसार में पाप कुछ भी नहीं है, वह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है। प्रत्येक व्यक्ति एक विशेष प्रकार की मनःप्रवृत्ति लेकर उत्पन्न होता है-प्रत्येक व्यक्ति इस संसार के रंगमंच पर एक अभिनय करने आता है। अपनी मनःप्रवृत्ति से प्रेरित होकर अपने पाठ को वह दुहराता है। यही मनुष्य का जीवन है। जो कुछ मनुष्य करता है, वह उसके स्वभाव के अनुकूल होता है और स्वभाव प्राकृतिक है। मनुष्य अपना स्वामी नहीं है। वह परिस्थितियों का दास है-विवश है। कर्ता नहीं है, वह केवल साधन है। फिर पुण्य और पाप कैसा (चित्रलेखाः पृष्ठ 7-8) लेकिन यहाँ अगर भगवतीचरण वर्मा के चिंतन की मदद लें, तो कहा जा सकता है कि अपराधी को दंड देना तब तक पर्याप्त नहीं, जब तक वह पश्चाताप को अपनी आत्मसंस्कृति न बनाए। इन दोनों अवस्थाओं को जोडकर ही लोकतांत्रिक समाज सांस्कृतिक अहिंसा की संस्कृति की तरफ कदम बढा सकता है।
राजाराम भादू ने महात्मा गाँधी, जोहन गाल्तुंग आदि से लेकर किशन पटनायक, नंदकिशोर आचार्य आदि तक विभिन्न चिंतकों के दृष्टिकोण का उल्लेख बखूबी किया है और बताया है कि किस तरह नैतिक और अहिंसक होना ही सच्चा मनुष्य होना है। भगवतीचरण वर्मा भी पाप को लेकर अंततः कहते हैं, मनष्य में ममत्व प्रधान है। प्रत्येक मनुष्य सुखा चाहता है। व्यक्तियों के सुख के केंद्र भिन्न होते हैं। कुछ सुख को धन में देखते हैं, कुछ सुख को मदिरा में देखते हैं, कुछ सुख को व्यभिचार में देखते हैं, कुछ सुख को त्याग में देखते हैं- पर सुख प्रत्येक व्यक्ति चाहता है; कोई भी व्यक्ति संसार में अपनी इच्छानुसार वह काम न करेगा, जिसमें दुःख मिले-यही मनुष्य की मनःप्रवृत्ति है और उसके दृष्टिकोण की विषमता है। संसार में इसीलिए पाप की परिभाषा नहीं हो सकी-और न हो सकती है। हम न पाप करते हैं और न पुण्य करते हैं, हम वह करते हैं, जो हमें करना पडता है। (चित्रलेखा : पृष्ठ 199-200)।
लेकिन 166 पन्नों पर एक विस्तृत चिंतन के बाद इस पुस्तक में संस्कृति को बहुसंस्कृतिवाद, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणापत्र के परिप्रेक्ष्य में सुचिंतित और व्यापक रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। हालांकि हम जब उनकी 2016 में वाग्देवी से प्रकाशित संस्कृति के प्रश्न से तुलना करें, तो एक अंतर साफ दिखता है। संस्कृति पर उनके थॉट की रेंज संस्कृति के प्रश्न में कहीं व्यापक है, जबकि 2020 में प्रकाशित सांस्कृतिक हिंसा के रूप में उनके थॉट की गंभीरता और सघनता है, जो यथार्थ के करीब है। संस्कृति के प्रश्न में उन्होंने संस्कृति, शिक्षा, साहित्य, दलित विमर्श, आदिवासी प्रश्न, लोक संस्कृति में हाशए के समुदाय और स्त्री विमर्श के प्रश्नों को व्यापक तौर पर खंगाला था। उस तरह की व्यापकता और विविधता का अभाव सांस्कृतिक हिंसा के रूप में खल सकता है। उनकी संस्कृति के प्रश्न की खूबी यह है कि वह अकादमिक विमर्श और ज़मीनी धरातल के भेदों को पाटने की कोशिश करती है, जबकि सांस्कृतिक हिंसा के रूप में एक खास तरह के पाठकों को वह दूरी बढती प्रतीत हो सकती है।
संस्कृति विमर्श के तौर पर भादू का पुराना विषय है। उनकी कला प्रसंग 2015 में आई थी और उसमें उन्होंने संस्कृति के चिंतन को कुछ लोकप्रिय विषयों के माध्यम से रेखांकित किया था। वह आम पाठक को छूने वाले लेख थे, जबकि सांस्कृतिक हिंसा के रूप में एक खास तरह के पाठक को संबोधित है। इस पुस्तक के प्रश्न बेहद जरूरी, समीचीन, गहरे और अनिवार्य हैं। कला प्रसंग की भाषा की सहजता संस्कृति के प्रश्न से लेकर सांस्कृतिक हिंसा के रूप तक आते-आते जाने क्यों अनूदित हिन्दी-सी प्रतीत होती है। सांस्कृतिक हिंसा के रूप में आज की समस्याओं को जिस तरह उठाने की कोशिश की गई है, उस हिसाब से वह एक जरूरी किताब है। इसमें जिस तरह के प्रश्नों से मुठभेड की गई है, उससे आम तौर पर हिन्दी लेखक बचता-बचाता चलता है या सिर्फ अकादमिक तरीके से ही लिखता है।
हालांकि यह बहुत विवादास्पद प्रश्न है, लेकिन महत्त्वपूर्ण है और प्रायः अनुत्तरित रह जाता है कि आखिर संस्कृति का रचयिता कौन है और इसे लेकर हमारा क्या दृष्टिकोण है। माक्र्सवाद का मानना है कि सामाजिक वर्ग अपनी उत्पादन प्रक्रिया के दौरान संस्कृति का विकास करते हैं। इसमें विशिष्ट व्यक्ति गौण भूमिका निभाते हैं। पश्चिमी उदारवादियों का मानना है कि विशिष्ट और प्रतिभाशाली व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्रों में संस्कृति को जन्म देते हैं। इसमें जनसामान्य की कोई भूमिका नहीं होती। हर धर्म का उद्घोष है कि संस्कृति की रचयिता मात्र वह अलौकिक शक्ति है, जिसमें सिर्फ उनका विश्वास है। यही विश्व में सबसे महान है और इसके सामने बाकी सब संस्कृतियाँ तुच्छ और त्याज्य हैं।
लेकिन संस्कृति की बहुपक्षीय और बहुआयामी प्रक्रिया का अध्ययन बताता है कि कोई एक सामाजिक इकाई, भले वह पश्चिमी उदारवादियों का प्रतिभाशाली व्यक्ति हो या माक्र्सवादियों का वर्ग, वास्तुकला, संगीत, भाषा, खानपान, धूम्रपान, मदिरापान, रहस्यवाद, मध्यकालीन साहित्य, पुनर्जागरण, नए वैज्ञानिक विचारों आदि जैसे मानवीय आचरण की विधाओं की स्रोत न तो होती है और न ही हो सकती है। जाहिर-सी बात है कि अलग-अलग प्रकार के सामाजिक क्षेत्रों से जुडी नाना सामाजिक इकाइयाँ संस्कृति की विभिन्न विधाओं को जन्म देती हैं। जैसे वास्तुकला इकाई वास्तुविधा को, भाषायी इकाई भाषा विधा को आदि-आदि जन्म देती है। किसी भी क्षेत्र में विशिष्ट व्यक्ति और समूह के बीच में व्यावहारिक व्यक्ति आँकडों और तथ्यों को सैद्धांतिक रूप देकर परिष्करण संयंत्र जैसी भूमिका निभाता है, जबकि समूह इस क्रिया में कच्चा माल जैसे आंकडे और तथ्य मुहैया करवाता है।
हम ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करने के दौरान पाते हैं कि साहित्यिक, कलात्मक या इसी तरह की अन्य सामाजिक इकाइयाँ तथ्य और आँकडे जुटाते समय मुख्य भूमिका निभाती हैं, जबकि विशिष्ट व्यक्ति इसी आधार पर चीजों को सूत्रबद्ध करके सौंदर्य रूप प्रदान करता है। इसमें सामाजिक इकाइयों, विशिष्ट व्यक्तियों और उस कालखंड की तकनालॉजी की जीवंत भूमिका रहती है। सचमुच अगर गहरे में देखें, तो साहित्य, कला और संस्कृति को महज मनुष्य के स्वभाव का प्रतिबिंब मानने वाले लोग उसके सचेतन सामाजिक आधार की अनदेखी करते हैं। यह सिद्धांत आज भी व्यापक रूप से माना और स्वीकारा जाता है, लेकिन इसको मानने वाले इस तथ्य को भुला देते हैं कि सामाजिक आधार में परिवर्तनों के कारण ही मनु के पशु चराई वाले युग के अति जडता को बल देने वाले वर्णवादी मानव स्वभाव की जगह आधुनिक युग के धर्म निरपेक्ष मानवीय स्वभाव ने ली। हम देखते हैं कि संस्कृति के बीज मुहैया करवाने में किसी की भूमिका है, उसे उपजाने में किसी की और उसे एक फसल का रूप देने में किसी की।
संस्कृति को महज सामाजिक प्रतिबिंब मानने वाले लोग उसकी मानवीय विशेषताओं की उपेक्षा करते हैं। मानवीय विशेषताओं का प्रतीक रूप वह मानवीय सोच है, जो हमें विभिन्न चीजों की संरचना और आचरण के बारे में ज्ञान मुहैया करवाती है। तथ्यों के आधार पर सिद्धांतों को गढती है और विभिन्न परिस्थितियों के लिए साहस और समाधान की राहें उलीकती है। और जो आलौकिक शक्ति का सिद्धांत है, वह आज पूरी दुनिया में मानवीय संस्कृति के लिए सबसे बडे संकट का आह्वान कर रहा है। ऐसे में सांस्कृतिक हिंसा के रूप का आखिरी अध्याय जिस तरह मानव अधिकारों को एक नई राह के रूप में देखता है, वह इस सांस्कृतिक चिंतन के द्वंद्व का स्पृहणीय प्रतिफल है। कुल मिलाकर, संस्कृति एक जैव-सामाजिक प्रक्रिया है, क्योंकि मनुष्य एक जैव सामाजिक सांस्कृतिक प्राणी है। और इसीलिए विभिन्न विशिष्ट व्यक्ति अपनी सामूहिक मानवीय इकाइयों के सहयेाग से अपने समय के सामाजिक आधार पर इसके विभिन्न तत्त्वों का शिल्प गढते हैं। और उम्मीद की जा सकती है कि यह पुस्तक त्रयी निश्चित ही इस विशिष्ट प्रतिभा और सामूहिक मानवीय इकाइयों की बौद्धिक लयबद्धता नए सोपान के रूप में सांस्कृतिक विमर्श को लेकर कोई नई कृति देगी, जो एक खूबसूरत मनुष्यता को गढने में मददगार बनेगी।
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