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अमीर खुसरो का काव्य-वैशिष्ट्य और हिंदवी

कुमार अनुपम
अमीर खुसरो ने अपनी प्रसिद्ध मसनवी नुह-सिपहर में हिंदसा (गणित) का आविष्कारक असा नाम के एक ब्राह्मण को बताया है1 और कहा है कि ज्ञान की विभिन्न शाखाओं के विद्वानों ने भारतीय गणित (हिंदसा) से मदद ली है, इसलिए वे सभी उस ब्राह्मण के शिष्य हैं।2 खुसरो की इस उक्ति की तज़र् पर कहूँ, तो आज हिंदी भाषा और इसका साहित्य जिस ज़मीन पर खडा है, उसे बनाने में अमीर खुसरो ने अपना समस्त कौशल और निष्ठा अर्पित की थी। हिंदी भाषा के ऐसे आविष्कारक के सभी हिंदीकर्मी शिष्य हैं, ऐसा कहना अत्युक्ति न होगी।
अमीर खुसरो जिस भाषा को हिंदवी कहते थे, उसको अपनी काव्य-भाषा हेतु चुनने के लिए उन्होंने उसे अनूठा रूप दिया। अनेक काव्य-युक्तियाँ अपनाईं, उनमें कई ऐसी हैं जो शायद पहली बार खुसरो ने ईजाद भी की थीं। कुछ काव्य-युक्तियाँ पहले से मौजूद थीं, तो उन्हें नया रूप-रंग दिया, तब बरता। अमीर खुसरो ने जिस हिंदी (हिंदवी) में रचनाएँ कीं और जो एक नए प्रकार का साहित्य रचा उसकी पृष्ठभूमि में कौन-कौन सी परंपराएँ रहीं, यह मेरे लिए चिंतन का विषय रहा है, जिससे कि अमीर खुसरो के हिंदवी काव्य को समझने में आसानी हो सके। खुसरो स्वयं को और अपनी रचनाओं को बार-बार जो खुद ही अनूठा कहते रहे हैं वह आत्म-प्रशंसा से भरी मध्यकालीन कवियों की शैली की गर्वोक्ति भर है या उसमें कोई सच्चाई भी है, इसे परखा और पहचाना जा सके। इसलिए जो भी साहित्य इस संबंध में मुझे उपलब्ध हो सका, पढता रहा हूँ। जैसा कि मैंने पढकर जाना है, कुछ बातें साझा करना चाहता हूँ।
स्वयं खुसरो ने कहा है कि उन्हें बहुत-सी भारतीय भाषाएँ आतीं थीं। उन्होंने संस्कृत, फारसी, अरबी, तुर्की, हिंदी और आठ अन्य भारतीय भाषाओं का सर्वेक्षण प्रस्तुत किया था। इस वृहद भाषा ज्ञान ने उनकी हिंदी कविता को प्रभावित न किया हो, ऐसा संभव नहीं है।
मसनवी नुह-सिपहर के तीसरे सिपहर (बाब, अध्याय) में अमीर खुसरो ने अपने समय की हिंदुस्तानी भाषाओं की सूची में जिन बारह भाषाओं का उल्लेख किया है पाँचवीं पंक्ति में उन सभी को हिंदवी कहा है, जिसका अर्थ यह है कि खुद अमीर खुसरो की भाषा दिल्ली का निवासी होने के नाते देहलवी हुई, जो इस सूची की बारहवीं भाषा है और जिसे खुसरो दिल्ली और दिल्ली के आस-पास की भाषा बताते हैं, यानी अमीर खुसरो ने जिस हिंदी, उर्दू या हिंदुस्तानी में शे’र कहे हैं उसे देहलवी हिंदवी कहना चाहिए।3 प्रो. गोपीचंद नारंग की इस स्थापना से सहमति के साथ यह अर्ज करना चाहता हूँ कि इस भाषा को नवीनता और अचरज से भरने की खुसरो में ऐसी सधी चुहलबाज़ी करने की कैफियत थी और वह भी इस हद तक कि खुसरो ने अपने ही काव्य-सिद्धांत का अतिक्रमण तक किया, भले ही इसकी आवश्यकता और क्षमायाचना दोनों ही एक साथ उन्होंने व्यक्त की।4 लेकिन जु*व-ए चंद वाले वाक्यों ने भाषायी दूरी को कम किया तथा फारसी और हिंदवी दोनों को नया रूप देते हुए समृद्ध किया।
डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने राष्ट्र का स्वरूप में लिखा है कि भूमि, भूमि पर बसने वाले जन, और जनता की संस्कृति, इन तीनों के सम्मिलन से राष्ट्र का स्वरूप बनता है। अमीर खुसरो ने इन तीनों पर अपनी पैनी और संवेदनशील नज़र रखी है और अपनी रचनाओं में व्यक्त भी किया है, जिसे बहुत आसानी से परखा जा सकता है। खुसरो के समय में राजस्थानी और अपभ्रंश - काव्य की दो भाषाएँ थीं। इन दोनों को साहित्यिक भाषा का दर्जा प्राप्त हो गया था। खुसरो इस अर्थ में पहले कवि थे जिन्होंने आम जीवन को अपनी रचनाओं में इस तरह व्यक्त किया कि जिससे उनके युग-बोध और सांस्कृतिक चेतना को काव्य में आत्मीयता का स्पर्श मिला।
डॉ. रामबाबू सक्सेना अमीर खुसरो के संस्कृत ज्ञान से बहुत प्रभावित थे। संस्कृत में काव्य की समृद्ध परंपरा और युक्तियाँ उपलब्ध थीं। अमीर खुसरो ने इस ज्ञान की पाठशाला से बहुत कुछ सीखा था। इस ओर रामबाबू सक्सेना ने संकेत भी किया है- (नुह-सिपहर में) कतिपय पद ऐसे भी हैं जिसमें ठेठ हिंदी शब्द, जो कठिनाई से उर्दू के कहे जा सकते हैं, संस्कृत छंदों में रचे गए हैं। उदय नारायण तिवारी ने भाषा तथा साहित्य (पृ. 67) में अमीर खुसरो की भाषा पर महत्त्वपूर्ण टिप्पणी की है कि उनकी भाषा प्राचीन परिपाटी की अपभ्रंश का पुट लिए हुए न होकर तात्कालिक समाज की शुद्ध तथा सरल बोलचाल की भाषा है। इसमें मुख्य बात कवि के साहस की है जो वह पूर्व प्रचलित काव्य-शैली और काव्य-भाषा के साथ बरताव करने में अपनाता है। यह किसी भी कवि के लिए आसान नहीं होता कि वह स्वीकृत भाषा-शैली के साथ छेडछाड करे। लेकिन जो कवि ऐसा कर पाते हैं और अपने कौशल से उसे स्वीकृति तक का सफर तय करा देते हैं, वे कालयात्री और कालजयी हो जाते हैं।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि साहित्य दर्पण के रचयिता आचार्य विश्वनाथ अमीर खुसरो के समकालीन थे। अब तक यह प्रमाणित भी हो चुका है कि साहित्य दर्पण का रचनाकाल शक 1238 और 1306 के बीच का है। आचार्य विश्वनाथ ने सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी (मृत्यु शक 1238) के बारे में भी संकेत किया हैः
संधौ सर्वस्वहरणं विग्रहे प्राणनिग्रहः।
अल्लावदीन नृपतौ न संधिः न च विग्रहः।।
संस्कृत साहित्य में आख्यान प्रस्तुतीकरण की व्यापक परंपरा है। वाचक (कवि) आख्यान के अध्याय का सार-संक्षेप पूर्व में इस कौतुकजन्य शैली में प्रस्तुत करता है कि पाठक उस अध्याय को विस्तार में जानने के लिए लालायित हो जाता है। अमीर खुसरो ने आबयाते-सिलसिला का ज़क्र नुह-सिपहर में किया है। किरानुस्सादैन, मिफ्ताहुल-फुतूह, नुह-सिपहर और तुगलकनामा नामक अपनी ऐतिहासिक मसनवियों में अमीर खुसरो आख्यान-काव्यों के अध्याय के शीर्षकों के लिए विशेष शिल्प को अपनाते हैं। हर अध्याय के शुरू में दो पंक्तियों का एक पद (शे’र) दिया गया है। अध्याय के बाकी पदों (शे’रों) से उसका छंद (बह्र) भी अलग होता है। सभी अध्यायों की शुरुआत उसी छंद से की जाती है। उस प्रारंभिक शे’र में अध्याय का सारांश-संकेत होता है। विशेष बात यह है कि अगर हर अध्याय के शुरुआती शे’रों को एक साथ कर दिया जाए, तो एक कसीदा बन जाता है और उससे पूरे ग्रंथ का सार प्राप्त होता है। खुसरो ने संस्कृत से आबयाते-सिलसिला को ग्रहण किया होगा, ऐसा प्रतीत होता है।
आचार्य विश्वनाथ का ग्रंथ रत्नावली इस अर्थ में भी विशेष है कि इससे हमें अमीर खुसरो की शैली को समझने का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण सूत्र प्राप्त होता है। आचार्य विश्वनाथ ने काव्यशास्त्र की बहुत सारी विधाओं और शैलियों के बारे में बताया है। अपने ग्रंथ साहित्य दर्पण 5 के छठे अध्याय में, संस्कृत साहित्य की करंभक शैली की व्याख्या दी हैः
करम्भंक तु भाषाभिर्विविधाभिर्विनिर्मितिम्।
यथोपम षोडशभाषामयी प्रशस्ति-रत्नावली।
आचार्य विश्वनाथ ने अपनी ही प्रशस्ति रत्नावली ग्रंथ का निर्देश किया है, जिसमें उन्होंने करंभक शैली में सोलह भाषाओं का प्रयोग किया है। इन पंक्तियों के लेखक ने संस्कृत के प्रख्यात विद्वानों से पता किया, तो यह जानकारी मिली कि खुसरो के समय से पहले ही करंभक शैली में काफी लिखा जा चुका था और देवीसिंग चौहान के आलेख अमीर खुसरो पर संस्कृत का प्रभाव आलेख में इस बारे में विस्तार से लिखा भी गया है। इस जानकारी के आलोक में जब हम अमीर खुसरो की रेख्ता की रचनाएँ पढते हैं, तो बात थोडी आसानी से समझ पाते हैं। अरबी-फारसी लिपि में अंकित हिंदी भाषा में अमीर खुसरो ने बहुत-सी रचनाएँ लिखी ही हैं। विद्वानों ने इस हिंदी भाषा को रेख्ता कहा है। रेख्ता शैली की हिंदी के कवियों की जीवनियाँ लिखते हुए, (मीर निकातुश-शुअरा; संपादक डॉ. अब्दुल हक, औरंगाबाद, 1928; पृ. 179) रेख्ता शैली के बारे में कहा है कि-
अटवल आन की यक मिस्राश पारसी व यक हिंदी, चुनांचे किता हज़रत अमीर खुसरो नश्वित तारता शुद। दोयम इनकी निस्फमिस्राश हिंदी व निस्फफारसी। (पहले एक पंक्ति फारसी और दूसरी हिंदी, उदाहरणार्थ अमीर खुसरो के द्विपंक्ति वाले पदों में दूसरी पंक्ति हिंदी और पहली पंक्ति फारसी।)
मीर द्वारा अमीर खुसरो का शे’र उल्लिखित हैः
नक्द-ए-दिल-ए-मनगिरिफ्त व बि-शिकस्त
फिर कुछ न गढा न कुछ सँवारा।
अमीर खुसरो की निम्नलिखित गज़ल तो बहुचर्चित है ही, एक मिसरा देखें:
ज़े-हाल-ए-मिस्कीं मकुन तगाफुल
दुराए नैना बनाए बतियाँ
डॉ. वहीद मिज़ार् ने लिखा है कि अमीर खुसरो ने कुछ गजलों की रचना की थी जिनकी एक पंक्ति अरबी और एक फारसी है। खुसरो ने निहायतुल-कमाल शीर्षक दीवान में इन गज़लों को संगृहीत किया है। जैसा कि पूर्व में मैंने अज़र् किया कि भले ही यह शैली संस्कृत में पर्याप्त प्रचलित थी लेकिन अमीर खुसरो ने जब इसे अपनाया तो एक नया ही रंग बख्शा।
प्राकृत साहित्य की यह सु-परिचित परंपरा रही है कि प्राकृत शब्दकोश और संस्कृत व्याकरण कविता की विधा में रचे जाते थे। छठी शताब्दी ईस्वी में वररुचि ने पहला प्राकृत व्याकरण लिखा था। अमरसिंह ने अमर कोश नामक संस्कृत कोश बनाया। जैन पंडित हेमचंद्र सूरि (निधन शक 1094) प्राकृत अपभ्रंश अध्ययन में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। देशज शब्दों का हेमचंद्र का शब्दकोश (हेमचंद्राज़ शब्दानुशासन, संपादक पिरचेल, पूना; 1938) सभी आधुनिक आर्य भारतीय भाषाओं के अध्ययन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। स्वयं हेमचंद्र ने अपने पूर्ववर्ती आठ विद्वानों का निर्देश किया है, जिन्होंने प्राकृत कोश बनाए- अभिमान सिंह, गोपाल, देवराज द्रोण, धनपाल, पादलिप्ताचार्य, शीलांक। हेमचंद्र सूरि के डेढ शताब्दी के बाद अमीर खुसरो का आविर्भाव हुआ। देवीसिंग चौहान ने अपने आलेख अमीर खुसरो पर संस्कृत का प्रभाव में यह स्पष्ट कर दिया है कि हिंदी अथवा हिंदवी शब्दकोश फारसी भाषा और अरबी-फारसी लिपि में रचने के बारे में अमीर खुसरो ने उस संस्कृत-प्राकृत परंपरा का अनुसरण किया जिसे वररुचि ने स्थापित किया और जिसका हेमचंद्र ने नेतृत्व किया।
अमीर खुसरो ने खालिकबारी की रचना करके पूर्व परंपरा का अनुसरण किया, ऐसा कहा जा सकता है। यह बात गौर करने लायक है कि अमीर खुसरो ने गज़ल में अपनी भाषा निर्मित की, भले ही फारसी का मिसरा-उला इस्तेमाल किया। शायद फारसी और उर्दू में इसकी पूर्व परंपरा नहीं थी इसलिए अमीर खुसरो का यह योगदान विशिष्ट है। रामनरेश त्रिपाठी ने कविताकौमुदी (भाग 1) में इस बात को रेखांकित भी किया है - हिंदुओं को मुसलमानों की भाषा से और मुसलमानों को हिंदुओं की भाषा से परिचित कराने का खुसरो ने यह सबसे पहला प्रयत्न किया था। खुसरो ने जिस हिंदी में छंद रचे हैं, वह अवश्य ही उनके समय की बोलचाल की भाषा होगी। और किसी कवि की कविता उस हिंदी में नहीं मिलती।
हालांकि, उस हिंदी, जिसे रामनरेश त्रिपाठी अमीर खुसरो की रचनाओं में प्रयोग की गई भाषा कहते हैं, यह भी सही है कि जिस समय दक्खिनी का विकास हो रहा था उस समय ही अमीर खुसरो और उनके समकालीन कवि बूअली कलंदर (पानीपत) इस प्रकार की भाषा लिख रहे थे-
सजन सकारे जायँगे नैन मरेंगे रोय।
बिधना ऐसी रैन कर, भोर कभी ना होय।।
अमीर खुसरो ने खुद दक्खिन की यात्रा की थी, वजही के सबरस में इसका हवाला मिलता ही है। इस बात से ये यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अमीर खुसरो की भाषा पर दक्खिनी ने अपना असर किया होगा। वास्तविकता चाहे जो हो, लेकिन इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि अमीर खुसरो को हिंदवी भाषा से बेहद लगाव था और इसे लोकप्रिय बनाने के लिए वे अत्यंत प्रयत्नशील थे। अगर हम खालिकबारी का ही हवाला लें, तो इसे आसानी से पहचान सकते हैं। खालिकबारी में प्रयुक्त भाषाओं की शब्द संख्या के बारे में डॉ. श्रीराम शर्मा ने इस प्रकार बताया है-
भाषा शब्द संख्या
फारसी 480
अरबी 237
तुर्की 2
हिंदवी 500
हिंदवी के शब्दों की सर्वाधिक संख्या अमीर खुसरो के हिंदवी प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए पर्याप्त है। उनके ग्रंथ खज़ाइन-उल फुंतूह में भी पटरा, काठघर, टिक्का, चंदन, बसीठ, तलवार, मवासत आदि शब्द मिलते हैं। खुसरो ने हिंदवी के शब्दों को फारसी में प्रचलित करके एक नई शुरुआत की। खुसरो ने दो संस्कृतियों के मध्य सेतु का काम किया और इसका परिणाम यह हुआ कि फारसी-हिंदवी जैसी एक मिश्रित भाषा का जन्म हुआ, जिसका श्रेय एकमात्र अमीर खुसरो को है।
जिस युग में फारसी का साहित्य-क्षेत्र में बोलबाला था उस युग में खडी बोली हिंदी को संस्कृत या फारसी जैसी क्लासिकी भाषाओं के समकक्ष या पंक्ति का सिद्ध करना निःसंदेह कठिन काम था।7 प्रख्यात भाषाविद् और विद्वान डॉ. अशोक कुमार भट्टाचार्य का यह कथन अमीर खुसरो के कार्य की विशिष्टता को सिद्ध करता है। वह लिखते हैं -अब तक जितनी जानकारी प्राप्त हुई उसके आधार पर कह सकते हैं कि ‘ने’ का प्रयोग खुसरो से पहले नहीं मिलता। कर्तृकारक के सप्रत्यय होने पर क्रिया का कर्म के र्ंग-वचनानुसार विकार होना, जो रूप आजकल पाया जाता है, वैसा ही रूप आज से सात सौ वर्ष पहले खुसरो की भाषा में उपलब्ध है। लोकप्रचलित भाषा को क्लासिकी साहित्यिक भाषा के समान मान्यता देना खुसरो के कालातिक्रांत साहस का ठोस प्रमाण है, उनकी निष्ठा का उज्ज्वल प्रतीक है। 8
भारतीय आम जनता के मन में अमीर खुसरो अपनी पहेलियों की वजह से गहरे बसे हुए हैं। यह माना जाता है कि अमीर खुसरो ने हिंदी या उर्दू में पहेली का सूत्रपात किया। हालांकि खुसरो ने स्पष्ट रूप से बताया है कि पहेली फारसी या तुर्की भाषाओं में नहीं है, लेकिन हिंदी में काफी है। खुसरो ने निहायतुल कमाल नामक अपने दीवान में (अमीर खुसरो; वहीद मिज़ार्, उर्दू, पृ. 236) कई कतरें-रुबाइतें दी हैं, जो पहेलियाँ हैं। ये फारसी भाषा में हैं। सारे फारसी साहित्य में वह अन्यतम हैं। इसमें शक नहीं कि उन पर संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं का प्रभाव है।9
यह पाया गया है कि संस्कृत साहित्य में शक तेरहवीं शताब्दी के अंत तक प्रहेलिका (इसी शब्द से पहेली शब्द बना) का महत्त्व समाप्त हो गया था। अमीर खुसरो ने अपने समकालीन विश्वनाथ के निर्देश पढे होंगे और प्रहेलिका के विशिष्ट गुणों में संभावनाएँ देखी होंगी। तभी, शक तेरहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में अमीर खुसरो ने दिल्ली के मुस्लिमों एवं मिले-जुले समाज के लिए पहेली का प्रयोग किया जो धीरे-धीरे अपनी भाषिक सरलता और लोकधर्मी गुणों के कारण आम जनता के दिलों में बसती चली गई और अब तक उसी तरह बसी हुई है। संस्कृत की इस विलुप्तप्राय परंपरा को अपने कौशल से नया जीवन प्रदान करने वाले अमीर खुसरो को भला कौन भुला सकता है? हिंदवी में पहेली ने लोकप्रियता का उच्च स्थान प्राप्त किया जिसका एकमात्र श्रेय अमीर खुसरो को ही है। यह भी गौरतलब है कि उर्दू साहित्य में अमीर खुसरो को छोड किसी श्रेष्ठ साहित्यकार ने पहेली का प्रयोग नहीं किया। ऐसे कई कारनामे अमीर खुसरो ने अंजाम दिए।
इन कुछ बातों के आलोक में हम अमीर खुसरो की हिंदवी (हिंदी) और उनके काव्य-वैशिष्ट्य का पता लगा सकते हैं ।
संदर्भ
1. नुह-सिपहर, ले. अमीर खुसरो, संपादकः डॉ. मो.
वहीद मिर्जा, पृ. 168, नोट सं. 72
2. वही, पृ. 169, नोट सं. 76 (नुह-सिपहर फारसी कविता में है, इसलिए अमीर खुसरो ने संकेत तो कर दिया, लेकिन पूरी बात यह है कि हिंदवी का शब्द ही अरबी है। जिसका मतलब यह है भारत का विशेष ज्ञान अर्थात् यह ज्ञान (गणित) केवल भारत में विकसित हुआ। यहाँ से अरबों और फिर अरबों द्वारा पूरे जगत में फैला।)
3. अमीर खुसरो का हिंदवी काव्यः प्रामाणिकता की समस्या, ले. गोपीचंद नारंग, प्रकाशकः अमीर खुसरो सोसाइटी ऑफ अमेरिका, शिकागो, सं. 1990, पृ. 24; खुसरो द्वारा प्रस्तुत भाषाओं की सूचीः
सिंदी ओ-लाहौरी-ओ-कश्मीर-ओ-गिर
(सिंधी) (पंजाबी) (कश्मीरी) (मराठी)
धुर समुंदरी र्तिंगी-ओ-गुजर
(कन्नड) (मलयाळम्) (तेलुगु) (गुजराती)
माबरी-ओ-गोरी-ओ-बंगाल-ओ-अवध
(तमिळ) (आसामी) (बाङ्ला) (अवधी)
दिल्ली-ओ-पैरामनश अंदर हमा हद
ईं हमा हिंदवीस्त ज ऐय्याम-ए-कुहन
आम्मा ब कारस्त (हिंदवी) ब हर गूना सुखन
(सिंधी, पंजाबी, कश्मीरी, मराठी, कन्नड, तेलुगु, गुजराती, तमिळ, असमिया, बाङला, अवधी, दिल्ली और उसके आसपास जहाँ तक उसकी सीमा है इन सबको प्राचीन काल से हिंदवी नाम से जाना जाता है। बहरहाल अब मैं अपनी बात शुरू करता हूँ।)
4. वही, पृ. 28
5. साहित्य दर्पण, ले. विश्वनाथ, लाहौर,1938, पृ. 369
6. अमीर खुसरो, उर्दू ग्रंथ प्रयाग, 1949, पृ. 237
7. राष्ट्रभाषा निर्माण में अमीर खुसरो का योगदान, डॉ.
अशोक कुमार भट्टाचार्य, पृ. 60
8. वही, पृ. 61
9. अमीर खुसरो पर संस्कृत का प्रभाव, ले. देवीसिंग चौहान, पृ. 72-73 (भांडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट पत्रिका वर्ष 51 के अंक में प्रकाशित अंग्रेजी लेख के. सत्यपाल द्वारा किए अनुवाद से उद्धृत।)

सम्पर्क - ई 1106, 10वाँ तल,यस सी सी सफायर,
राजनगर एक्सटेंशन, गाज़याबाद 201017 (यू.पी)
मो. ९८७३३-७२१८१