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निराला और हिन्दी नवजागरण

अजय तिवारी
जागरण का अर्थ सबसे पहले वर्तमान वास्तविकता के प्रति जागरूकता है। प्राचीन इतिहास और संस्कृति को भी हम वर्तमान के दृष्टिकोण से ही देख सकते हैं। अतीत से हम चाहे जितना प्रेम करें, वहाँ जाकर न अतीत को देख सकते हैं, न वर्तमान को। निराला जब कहते हैं-
कठिन श्रृंखला बजा-बजाकर, गाता हूँ अतीत के गान
मुझ भूले पर उस अतीत का, क्या ऐसा ही होगा ध्यान?
शिशु पाते हैं माताओं के, वक्ष;स्थल पर भूला गान
माताएँ भी पातीं शिशु के, अधरों पर अपनी मुस्कान।
(निराला रचनावली, 1983, संपादक : नन्दकिशोर नवल, राजकमल, खंड-1, पृ.101)
तब वे अतीत से वर्तमान के रिश्ते को जागरण के संदर्भ में ठीक-ठीक परिभाषित करते हैं। कवि अतीत के गान गाता है, लेकिन वह कठिन श्रृंखलाओं में बँधा है। श्रृंखलाओं में रहकर जिस अतीत के गान गाता है, वह श्रृंखलाओं से मुक्त है। अतीत के गान गाते हुए इन श्रृंखलाओं का बोध उसे वर्तमान से बाँधे रहता है। कवि वर्तमान के बोध से अतीत का ध्यान करता है, लेकिन उस अतीत का ध्यान आज के वर्तमान पर उसी तरह नहीं है। इसलिए कवि न वर्तमान को झुठलाता है, न अतीत को पुनर्जीवित करता है। अतीत और वर्तमान के बीच माता और शिशु जैसा संबंध है। मानवीय उपमान लाकर कवि इस संबंध को जीवंत बना देता है।
नवजागरण के संदर्भ में निराला पर विचार करते समय हमारे लिए आज के वर्तमान पर ध्यान देना आवश्यक है। इसके बिना हम न निराला को समझ सकते हैं, न नवजागरण को। निराला कहते थे, बैंक किसानों का खुलाओ। (उपर्युक्त, 1/162) लेकिन आज किसानों की घोर उपेक्षा का समय है। उन्हें बडे व्यापारियों और निर्बंध बाज़ार के हवाले किया जा रहा है। अंग्रेज़ी शासन में नील की खेती ठेके पर होती थी, गाँधीजी के संघर्ष के बाद वह समाप्त हुई; आज फिर खेती में ठेकाप्रथा लागू की जा रही है और उसे किसानों के हित में बताया जा रहा है। यही स्थिति श्रमिकों की है। शिकागो में अपना रक्त बहाकर मजदूरों ने आठ घंटे काम और रोजगार की सुरक्षा का अधिकार पाया था, जिसकी याद में दुनिया भर के मजदूर मई दिवस मनाते हैं। श्रम कानूनों में सुधार के नामपर वह अधिकार छीना जा रहा है। निजी संपत्ति को सार्वजनिक अधिकार में लाने की कौन कहे, सारी सार्वजनिक और राष्ट्रीय संपत्ति का अंधाधुंध निजीकरण किया जा रहा है। निराला का आदर्श इसके विपरीत था-सारी संपत्ति देश की हो! (उपर्युक्त, 1/163) आश्चर्य की बात है कि शिक्षित समाज का बडा हिस्सा धर्म और जाति के नशे मे इन सभी अनीतियों का समर्थन करता है या उदासीन रहता है। इन परिस्थितियों में निराला का साहित्य और नवजागरण का इतिहास दोनों अत्यंत प्रासंगिक हो जाते हैं।
निराला जिस जागरण के प्रतिनिधि हैं, वह उठो लाल अब आँखें खोलो वाला जागरण नहीं है। यह एक ऐतिहासिक युग का जागरण है। जनवरी 1926 की कविता जागो फिर एक बार-1 का आरंभ इस प्रकार होता है-
जागो फिर एक बार
प्यारे जगाते हुए हारे सब तारे तुम्हें
अरुण पङ्ग तरुण-किरण
खडी खोलती है द्वार...
(उपर्युक्त, 1/136) जागरण के इस आह्वान में भारतेन्दु की अनुगूँज सुनाई देती है। प्रबोधिनी कविता में भारतेन्दु रात्रि विलास में डूबे कृष्ण को जागते हैं-
डूबत भारत नाथ बेगि जागो अब जागो।
(भारतेन्दु समग्र, संपादक : हेमंत शर्मा, 1987, हिन्दी प्रचारक संस्थान वाराणसी, पृ.211)
कोई ऐतिहासिक प्रक्रिया किसी एक रचनाकार के माध्यम से भी व्यक्त हो सकती है, जैसा भारतेन्दु में है। किन्तु निराला के समय जागरण का यह स्वर उनके अनेक समानधर्मा कवियों में मुखरित हुआ है। जयशंकर प्रसाद का प्रसिद्ध गीत है-
बीती विभावरी, जाग री!
अंबर पनघट में डुबो रही
तारा-घट ऊषा नागरी।
(जयशंकर प्रसाद ग्रंथावली, भाग-1, संपादक : ओमप्रकाश सिंह, 2014, प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली, पृ.303)
जिस महादेवी को दुख और आँसू से ही जोडने की प्रथा चल गयी है, उन्होंने भी आकांक्षा व्यक्त की है-
रात के उर में दिवस की चाह का शर हूँ।
(महादेवी साहित्य समग्र, 2000, संपादक : निर्मला जैन, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, खंड-1, पृ.260)

वे आँसू को स्वीकार करती हैं, लेकिन परवशता के रूप में नहीं; आग और पानी का नया अनुपात जागरणकालीन चेतना का साक्ष्य देता है-
आग है उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी। (2/228)
अतः जागरण की यह भावधारा निराला के साहित्य में अपने युग की ऐतिहासिक चेतना का प्रस्फुटन है।
गुरु गोविंद सिंह योद्धा थे, तुलसीदास कवि। तुलसीदास पर अपनी प्रसिद्ध कविता में निराला ने जागरण का यह स्वर व्यक्त किया-
जागो, जागो, आया प्रभात
बीती वह, बीती अंध रात। (उपर्युक्त, 2/287)
इसका औचित्य यह है कि स्वयं तुलसीदास ने कहा था जागे फिर न डसैहौ। (विनय-पत्रिका, पद-105, संपादक : वियोगी हरि, 1997, सस्ता साहित्य मण्डल, नयी दिल्ली, पृ.178) तुलसीदास का युद्ध किसी सेना से नहीं है। वह अज्ञान और कुसंस्कार से है। वे भावनिशा से रामकृपा के कारण जागे थे। इसलिए निराला के तुलसीदास भारत का भ्रम अपार हरने के लिए ज्ञानोद्धत प्रहार करते हुए उमडते हैं। (उपर्युक्त, 2/275) इससे भिन्न, अपने समय के श्रमिकों और किसानों का आह्वान करते हुए निराला कहते हैं-
जल्द-जल्द पैर बढाओ, आओ, आओ।
आज अमीरों की हवेली, किसानों की होगी पाठशाला,
धोबी, पासी, चमार, तेली, खोलेंगे अँधेरे का ताला,
एक पाठ पढेंगे, टाट बिछाओ। (उपर्युक्त, खंड-2, पृ.162)
जागरण के स्तर
स्पष्टतः निराला के लिए जागरण के दो स्तर हैं। इतिहास में ज्ञानोद्धत प्रहार करने वाला सांस्कृतिक जागरण और वर्तमान में जनता के संगठन और समाज के परिवर्तन की चेतना प्रसारित करने वाला राजनीतिक जागरण। इतिहास और वर्तमान की समन्वित चेतना निराला को नवजागरण का प्रतिनिधि रचनकर बनाती है। इस चेतना में इतिहास, दर्शन, राजनीति, समाज-संगठन सभी एक सुसंगत दृष्टिकोण पर आधारित हैं और एक वे मिलकर एक विशाल बौद्धिक-मानसिक ढाँचा प्रस्तावित करते हैं। निराला के संदर्भ में हम जिसे नवजागरण कह रहे हैं, वह एक ओर भक्तिकालीन लोकजागरण से पृथक, किन्तु उसका विकास है; दूसरी ओर यूरोपीय रेनेसाँ या पुनर्जागरण से भिन्न, किन्तु अपनी प्रवृत्तियों में बहुत-सी समानताएँ लिए हुए है।
यह सर्वविदित है कि भारत में यूरोप जैसा एक हज़ार साल का अंधकार युग नहीं था। इस हज़ार साल में ईसाइयत का बोलबाला रहा। इटली पर जर्मन कबीलों के हमले के बाद इटली की जो व्यापक तबाही हुई, उसके प्रत्यक्ष दृश्य अपनी यूरोप यात्रा के समय देखने का मुझे अवसर मिला। दक्षिणी इटली पूरी तरह तबाह हो गया, उत्तरी इटली के कुछ केंद्र बचे रहे। इन्हीं में फ्लोरेन्स भी था। यहाँ पुरानी व्यापारिक समृद्धि भले नहीं बची, पर व्यापार कुछ हद तक बचा रहा। जब यूनान पर तुर्कों का हमला हुआ, तब वहाँ के बौद्धिक समुदाय का व्यापक उत्पीडन शुरू हुआ। परिणामस्वरूप बहुत-से दार्शनिक और लेखक भागकर इटली चले आए। वे उत्तरी इटली के फ्लोरेन्स जैसे नगरों में ही बसे। वे अपने साथ यूनानी दर्शन और साहित्य भी लाए थे। चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में, रोमन साम्राज्य के पतन के एक हज़ार साल बाद, जब व्यापारिक उन्नति फिर शुरू हुई, तब उसके साथ बौद्धिक गतिविधियों में भी नयी हलचल दिखाई दी। एंगेल्स ने यूरोपीय पुनर्जागरण के लिए लिखा था कि इससे सामंती व्यवस्था ढीली पडी और किसानों-कारीगरों को करवट बदलने का मौका मिला। (देखिए, पाद टिप्पणी-1) इस करवट के समय प्राचीन यूनानी साहित्य और दर्शन बहुत उपयोगी सिद्ध हुए। व्यापारिक गतिविधियों ने ही उन परिस्थितियों को जन्म दिया जिनमें आधुनिक पूँजीवादी राष्ट्र बने और यूरोपव्यापी ईसाई महामंडल को छिन्न-भिन्न करते हुए आधुनिक जातियाँ अस्तित्व में आयीं।
भारत की स्थिति यूरोप से भिन्न थी। न यहाँ ईसाई धर्म का साम्राज्य कायम हुआ, न अरबों-तुर्कों का आर्थिक-सांस्कृतिक वर्चस्व कायम हुआ। इस एक हज़ार साल में यहाँ न केवल व्यापार निरंतर उन्नतिशील रहा वरन दर्शन और साहित्य में भी अभूतपूर्व विकास दिखाई देता है। शंकरचार्य, आर्यभट्ट, रामानुज, वल्लभ, सरहपा, गोरखनाथ, पुष्पदंत आदि इसी दौरान अपनी उपलब्धियों के साथ अवतरित हुए। इसका व्यापक प्रभाव सामाजिक जीवन पर पडा। यूरोप में पुनर्जागरण का असर मध्यवर्ग तक सीमित रहा, लेकिन भारत में जागरण का प्रभाव समाज के निम्नतम स्तर तक पहुँचा। बडे पैमाने पर जुलाहे, चमार, धुनिया, किसान, छोटे व्यापारी आदि साहित्य-संस्कृति में आत्माभिव्यक्ति करते दिखाई देते हैं। वे परंपरागत ज्ञान को चुनौती देते हैं और अपने अनुभव से प्रपट नए ज्ञान को युग की वाणी बना देते हैं। यह वास्तव में जनसाधारण में नयी चेतना के अभ्युदय का काल है। इसलिए डॉ.रामविलस शर्मा इसे लोकजागरण कहते हैं और यह सर्वथा उचित है। (लोकजागरण और हिन्दी साहित्य, 1985, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली) यह मूलतः सामंती व्यवस्था और सामंती संस्कृति के विरुद्ध नयी चेतना के जागरण का काल है।
निराला इस लोकजागरण के अगले चरण से सम्बद्ध हैं। यह चरण औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध भारत की जनता के जागरण का है। इसे नवजागरण कहना उचित है। इस साम्राज्यवाद-विरोधी जागरण को नवजागरण की संज्ञा भी डॉ. रामविलास शर्मा ने ही दी है। नवजागरण का गहरा संबंध लोकजागरण से है। यह तुलसीदास पर निराला की श्रेष्ठ कविता के अलावा अनेक तथ्यों से पुष्ट है। इसलिए दोनों को एक सांस्कृतिक निरंतरता के दो चरण मानना चाहिए। लेकिन दोनों की भावदशा में जीवन-स्थितियों का अंतर बहुत स्पष्ट है। इसके आरंभ में यह चेतना थी कि कोउ नृप होहु हमै का हानी। चेरि छांडि अब होब कि रानी।। (तुलसीदास, रामचरितमानस, गीता प्रेस, गोरखपुर,2/3/16) और उसके अंतिम चरण में यह विश्वास था कि सरकारें पलटती हैं जहाँ हम दर्द से करवट बदलते हैं! (शमशेर बहादुर सिंह, कुछ कविताएँ व कुछ और कविताएँ, 1984, राधाकृष्ण, नयी दिल्ली, पृ.90) मध्यकाल के उत्तरवर्ती दौर में असंगठित जनता अपने मत द्वारा या संघर्ष द्वारा राजा को न बना सकती थी, न बदल सकती थी। कोउ नृप होहु इसी असमर्थता का द्योतक है। लेकिन इसमें यह सजगता अवश्य है कि राजा कोई बने, प्रजा के जीवन में विशेष अंतर नहीं पडने वाला, वह गुलाम ही रहती है। इस परिस्थिति-सजगता से परिवर्तनकारी संघर्ष-सरकारें पलटती हैं-तक भारतीय अथवा हिन्दी जागरण की व्याप्ति देखने योग्य है। दूसरे शब्दों में, भक्ति से आरंभ जागरण की परिणति प्रगतिवाद में होती है। निराला इस विकास के सबसे समर्थ, युगांतरकारी माध्यम हैं। उनके साहित्य में यह परिवर्तन अनेक रचनाओं में अभिव्यक्त हुआ है। महँगू महँगा रहा, झींगुर डटकर बोला, जल्द जल्द पैर बढाओ जैसी कविताओं और चतुरी चमार, कुल्ली भाट जैसी कथाओं में इसे देखा जा सकता है। ब्राह्मणों द्वारा पोथियों में बाँधी गयी जनता उन पोथियों से निकलकर इतिहास के रंगमंच पर सक्रिय हो गयी थी, इस सक्रियता के सबसे समर्थ और यथार्थ चित्र निराला की रचनाओं में मिलते हैं। यह नयी चेतना नए जागरण का द्योतक है। इसलिए इसे नवजागरण कहना उचित है।
नवजागरण के मुद्दे
नवजागरण के जिन मूल्यों के संदर्भ में निराला के साहित्य पर विचार करने की आवश्यकता है, उन्हें संक्षेप में सूत्रित करना उचित है। पहला, भाषा, संस्कृति और जाति है; जाति पेशे वाली नहीं बल्कि जातीयता-नेशन-की बोधक। इससे नवजागरण के अभ्युदय, विकास और परस्पर-संबंध का प्रश्न जुडा है। दूसरा, सामंती आभिजात वर्ग और उसकी कुलीन संस्कृति को दी गयी चुनौती है। तीसरा, लौकिक चिंता या चेतना है; इसपर यूरोपीय विमर्श में दो भागों में विचार होता है-सेक्युलर (इहलौकिक) दृष्टिकोण और हयूमनिस्ट (मानववादी) मूल्य। चौथा, तर्क और अनुभव का नया संगठन; अर्थात रूढियों-अंधविशवासों से मुक्ति और नयी अवधारणाओं के विकास का संघर्ष। तथा पाँचवाँ, सांस्कृतिक इतिहास से संवाद; समस्त प्राचीन संस्कृति को अस्वीकार करने या उसका पुनरुत्थान करने के स्थान पर उसके प्रासंगिक मूल्यों को आत्मसात करते हुए अपने समय के अनुभवों के आलोक में उनका तर्कसंगत विकास।
यूरोप और भारत के नवजागरण के इन सामान्य बिन्दुओं के साथ हिन्दी नवजागरण की अपनी कुछ विशेष समस्याएँ हैं। उन्हें तीन सामान्य कोटियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। पहला, जनपदीय बोलियों और जातीय भाषा का संबंध; जैसे, अवधी, ब्रज, मैथिली, राजस्थानी, भोजपुरी आदि से खडी बोली हिन्दी का संबंध तथा हिंदीभाषी क्षेत्र में उर्दू और हिन्दी के रूप में खडीबोली की दो शैलियों का संबंध। दूसरा, उपनिवेशकाल (1757-1947) में सामंती सत्ताओं का पुनरुद्भव और उसके साथ जातिप्रथा एवं सांप्रदायिकता का प्रसार। तीसरा, औपनिवेशिक प्रचार के प्रतिक्रिया स्वरूप उभरे अंधराष्ट्रवादी रुझानों से बचते हुए अंतर्राष्ट्रीयतावादी दृष्टिकोण अपनाने का प्रश्न। ऊपर के पाँच मुद्दों के साथ ही इन विशेष प्रश्नों की रोशनी में निराला के साहित्य और संघर्ष को देखना आवश्यक है।
जातीय संस्कृति
यूरोप में भी नवजागरण का आरंभ जातीय संस्कृतियों के उत्थान से हुआ। संस्कृति का आधार भाषा है। नवजागरणकालीन यूरोप का अभ्युत्थान जातीय भाषाओं की ध्वजा उठाकर हुआ। जब नयी व्यापारिक गतिविधियों से सामंती जकडन ढीले हुए, तब चर्च का प्रभुत्व भी मनुष्य की चेतना पर कम हुआ। चर्च के साथ लैटिन, ईसाइयों की धर्मभाषा, का प्रभुत्व भी कमजोर पडा। आधुनिक भाषाओं पर आधारित आधुनिक जातीय राज्य, इटली-फ्रांस-जर्मनी-इंग्लैंड आदि उसी समय अस्तित्व में आए। इटली का नया अभ्युदय इटालियन भाषा और संस्कृति के माध्यम से हुआ। धार्मिक बंधनों के कमजोर होने पर अपने आसपास के परिवेश के प्रति सजगत बढी। लियोनार्दो द विंची से लेकर माइकेल एंजलो तक उस काल के सभी प्रतिनिधियों की कला अपने समाज के वास्तविक मनुष्यों का अंकन करती है। इनमें माइकेल एंजलो द्वारा अंकित मानव चरित्र सबसे अधिक यथार्थवादी और जातीय गुणों के प्रतिनिधि हैं। उन पर यूनानी मूर्तिशिल्प का प्रभाव नगण्य है।
जातीय संस्कृतियों के अभ्युत्थान में नियामक भूमिका व्यापार के पुनर्जीवन से विकसित नए बाजारों की है, प्राचीन दर्शन और साहित्य की नहीं। इन जातीय संस्कृतियों की अंतर्वस्तु नई थी, उसके अनुरूप अभिव्यक्ति के माध्यम भी नए थे, परंपरा उसमें सहायक थी। लेकिन यूरोप और भारत की जातीय संरचना में एक फर्क था। ईसाई महामंडल यूरोपव्यापी था, इस धार्मिक प्रभुत्व को छिन्न-भिन्न करके आधुनिक भाषाओं और संस्कृतियों के अभ्युत्थान से नए राष्ट्रों का उदय हुआ, इन जतियों की स्वतन्त्रता कायम हुई; भारत एक राष्ट्र के रूप में अपनी निरंतरता बनाए हुए था, कोई धार्मिक वर्चस्व या सामंती राज्य उसकी राष्ट्रीयता का दमन नहीं कर सका था, इसलिए आधुनिक जातीय विकास ने स्थानीय संस्कृति और राष्ट्रीय परिकल्पना के नये सम्बन्धों का बोध उत्पन्न किया। प्रारम्भिक आधुनिकता के समय तुलसीदास एक तरफ अवध की महिमा गाते हैं-उनके राम बैकुंठ से बढकर अवध को प्रिय कहते हैं, दूसरी तरफ भारत भूमि में जन्म लेने का महत्त्व प्रतिपादित करते हैं। (2) अभी जातीयता का भाव हिंदीभाषी जाति का रूप नहीं ले पाया है, लेकिन अवध और भारत का संबंध स्पष्ट है। यह दोहरी चेतना यूरोप के नवजागरण के प्रतिनिधियों में नहीं मिलती। इटली स्वतंत्र देश है, यूरोप से उसका वही संबंध नहीं है, जो अवध का भारत से है।
तुलसीदास के समय लोकजागरण काल की यह चेतना निराला के समय नवजागरण काल में और निखर आई, अधिक परिभाषित हो गयी। उदाहरण के लिए, जैसे तुलसीदास ने सरस्वती को अन्नपूर्णा बनाया था, (सोक को अगार दुख-भार-भरो तौलों जन/ जौलों देवी द्रवै न भवानी अन्नपूरना।-कवितवाली, उत्तरकाण्ड, 148, तुलसीदास के ग्यारह ग्रंथ, 2001, संपादक : युगेश्वर, साहित्य भंडार, इलाहाबाद, पृ.145) वैसे ही देवी सरस्वती कविता में निराला एक तरफ सरस्वती को हरे-भरे खेतों में लहराता देखते हैं, हरीभरी खेतों की/ सरस्वती लहराई,/ मग्न किसानों के घर/ उन्मद बजी बधाई। दूसरी तरफ उनका संबंध अपने प्रदेश की जातीय संस्कृति से जोडते हैं, भारत की प्रांतीय/ सभ्यता का आलेखन,/ राजनीति का जीवन,/ जगती का सम्मोहन। (निराला रचनावली, भाग-2, पृ.186, 191) कहने की ज़रूरत नहीं कि यह प्रांतीय सभ्यता जातीय संस्कृति का द्योतक है। यह तथ्य संत कवि रविदासजी के प्रति से भी स्पष्ट है, जिसमें निराला उन्हें ज्ञान के आगर मुनीश्वर कहकर संबोधित करते हैं और उन्हें पूज्य अग्रज भक्त कवियों के बताकर उनके व्यापक प्रभाव का वर्णन इन शब्दों में करते हैं-
ज्यों अँगडाइयाँ लेकर खडी
हो गयी कविता कि आयी शुभ घडी
जाति की, देखा सभी ने मींचकर
दृग, तुम्हें श्रद्धा-सलिल से सींचकर।
जिस काव्य का विकास भक्त कवियों ने किया, वह हिन्दी जाति की धरोहर है और रविदास उनके अग्रज हैं। यदि उन्हें दलित वर्ण से ही माना जाए, जैसा आजकल कुछ विमर्शवादी आग्रह करते हैं और निराला को ब्राह्मणवादी घोषित करते हैं, तो भी यह निराला के आधुनिक मानववादी स्वरूप का उज्ज्वल पक्ष सामने रखती है क्योंकि आगे वे रविदास को चर्मकार कहकर उनके चरण छूते हैंर्
समुज्ज्वल चर्मकार/ चरण छूकर कर रहा मैं नमस्कार। (उपर्युक्त, खंड-2, पृ.78)
ब्राह्मण होकर चर्मकार के चरण छूना कुछ नहीं, तो आज से अस्सी साल पहले संस्कारों से असाधारण संघर्ष के बिना संभव नहीं था।
निराला जातिवाद के संस्कारों से ही नहीं, जातीय संकीर्णता से भी आत्मसंघर्ष करते हुए अपनी आधुनिक राष्ट्रीयता की भावधारा विकसित कर रहे थे। उनका जन्म बंगाल में हुआ था और बाद को भी वे काफी समय रामकृष्ण आश्रम और मतवाला में काम करते हुए बंगाल में रहे। बंगालियों में जातीय चेतना का विकास पहले हुए, उसके साथ जातीय दंभ भी पर्याप्त से अधिक मात्रा में विकसित हुआ। इस जातीय दंभ से निराला का टकराव होता था। इसने उनमें अपनी हिन्दी जातीयता के प्रति सजगता और आत्मसम्मान की भावना का विकास करने में आवश्यक भूमिका अदा की। इसीलिए निराला अपने साहित्यिक जीवन के आरंभ से ही स्वयं को बंगला जातीयता से अलग हिन्दी जातीयता से जोड रहे थे। (भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश, 1999, किताबघर, नयी दिल्ली, पृ.551) लेकिन इस जातीय आत्मसजगता ने अहम्मन्यता का रूप नहीं लिया। इसका एक ही प्रमाण काफी है। रवीन्द्रनाथ को वे भारत का ही नहीं, विश्व का महान कवि मानते थे। इसलिए अपने रीतिवाद-विरोधी संघर्ष में एक तरफ उनकी तुलना बिहारी जैसे कवियों से करते हुए वे स्वाभाविक और अस्वाभाविक भाव-चित्रों का अंतर स्पष्ट करते थे, इस तरह स्वच्छंद काव्य की श्रेष्ठता प्रमाणित करते थे; दूसरी तरफ शेली और रवीन्द्रनाथ की तुलना करते हुए वे भारतीय काव्य को विश्वसाहित्य के समकक्ष खडा करते थे। (निराला रचनावली, खंड-5, पृ.141-147; और 457-459 आदि) इसमें उनकी आधुनिकता, जातीयता और राष्ट्रीयता के जटिल संबंध की झलक मिलती है।
निराला अपनी जिस जातीय संस्कृति या प्रांतीयता का स्मरण करते हैं, वह आधुनिक नवजागरण की देन है और उस प्रांतीयता या जातीयता का संबंध भारत राष्ट्र से अभिन्न रूप में जुडा हुआ है। पराधीन भारत में राष्ट्रीयता की भावना अनेक रूपों में व्यक्त होती है। निराला के काव्य में राष्ट्रीयता की अभिव्यक्ति का एक रूप भारत का मानचित्र और उसका गौरवशाली इतिहास है। दोनों की अलग-अलग भूमिकाएँ हैं। भारत का मानचित्र उनके स्वप्न की रचना करता है और इतिहास उन्हें वर्तमान संघर्ष की प्रेरणा देता है। अपनी पहली कविता जन्मभूमि में तीन नदियों द्वारा वे भारत का मानचित्र निर्मित कर देते हैं-ब्रह्मपुत्र पंचसिंधु रवितनया गंगा। (1920; निराला रचनावली, 1/29) उत्तरपूर्व में ब्रह्मपुत्र, पश्चिमोत्तर में पंचसिंधु और भारत के हृदय प्रदेश में गंगा, यह प्रकृति के माध्यम से अंकित भारत का पूरा मानचित्र है। स्वच्छन्दतावादी कवि दैवी सत्ता से हटकर प्रकृति में आत्मप्रसार करते हैं, यह रोमांटिक या छायावादी साहित्य की सार्वभौम विशेषता है। निराला से बहुत पहले इटली के नवजागरण के प्रारम्भिक चरण में पेत्रार्क ने भी जातीय और राष्ट्रीय वेदना नदियों के माध्यम से व्यक्त की थी। रोमन सभ्यता को जर्मन लुटेरों ने तबाह किया था। तब वह ईसाई नहीं हुआ था। आज भी पुराने संग्रहालयों का वर्णन करते हुए वहाँ लोग जर्मन हमले से पहले के रोम की सभ्यता का गर्व के साथ स्मरण करते हें। जर्मनों के बाद फ्राँस और ऑस्ट्रिया के सामंती शासकों ने इटली पर कब्जा किया। यह पूरा दौर इटली के आत्मसम्मान के लिए आघात था। पेत्रार्क ने इटली के तीन भागों में बहने वाली लिबेर, आर्नो और पो नदियों के घावों को लक्ष्य करके लिखा कि मैं इनके दुःख गाता हूँ। एक तरफ ऐतिहासिक यातना, दूसरी तरफ प्रकृतिक कल्पना-यह स्वच्छंद मनोभाव नए संघर्ष की प्रेरणा देने में बहुत सहायक हुआ। राष्ट्रीय जागरण के साथ यह सार्वभौम प्रवृत्ति दिखाई देती है।
आगे चलकर प्रकृति के साथ-साथ दैवी कल्पनाओं को भी निराला भारत के रूप से जोडते हैं। इस तरह देश के मानचित्र को परंपरा की अंतर्वस्तु प्रदान करते हैं। उनकी इस कल्पना का आधार यह मान्यता है कि देवी-देवता प्रत्यक्ष संसार को देखकर की गई मनुष्य की कल्पना हैं। राम की शक्ति-पूजा में जम्बवान से राम कहते हैं-
देखो, बंधुवर सामने स्थित जो यह भूधर
शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुंदर
पार्वती कल्पना हैं इसकी...(1/317)
सामने एक सजा-धजा पर्वत है, पार्वती एक देवी हैं जो इस पर्वत को देखकर की गयी कल्पना हैं। प्रकृति और दैवी कल्पना को मिलाकर निराला ने एक कर दिया है। यह दैवीविश्वास और अंधविश्वास से पृथक करके देश की सांस्कृतिक धारणा का प्रस्ताव है। पार्वती की यह कल्पना भारत के मानचित्र का ही प्रतिरूप हैर्
गरजता चरण प्रांत पर सिंह वह, नहीं सिंधु;
दशदिक-समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर,
अंबर में हुए दिगंबर अर्चित शशि-शेखर। (1/317)
दसों दिशाएँ दशभुजा हैं, चरण पर गरजता समुद्र सिंह है, मस्तक पर हिमालय में दिगंबर शिव हैं। देश-भाव यहाँ प्रकृति में साकार देखा जा सकता है। भारति, जय विजय करे गीत में र्ंका पदतल शतदल है, गंगा ज्योतिनिर्मल कण है और हिमतुषार शुभ्र मुकुट है। (1/232) यह उल्लेखनीय है कि क्षतिपूजा और भारति, जय विजय करे दोनों कविताएँ सन 1936 की हैं। उसके पहले भक्त और भगवान कहानी में वीर-रूप हनुमान को भी वे इसी भारत-छवि में देख चुके थे।
सत्याग्रह के बाद निराला की परिवर्तित भावदशा का एक पक्ष यह था कि दैवी शक्तियों से उनका विश्वास टूट रहा था। उनके मोहभंग का साक्ष्य शक्तिपूजा में बहुत स्पष्ट रूप में दिखाई देता है। रावण से राम युद्ध कर रहे हैं, रावण शिव का उपासक है, शिव की पत्नी दुर्गा महाशक्ति हैं, वे रावण के आमंत्रण पर उसकी रक्षा कर रही हैं; यह अन्याय देखकर राम विचलित होते हैं और कहते हैं कि मित्रवर, विजय होगी न समर; कारण यह कि स्वयं दुर्गा रावण की ओर से लड रही हैंर्
अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति। (1/315)
दैवी-दानवी शक्तियाँ मिल गईं हैं, मनुष्य अकेला हो गया है। इस अनुभूति का आधुनिक भावबोध के संदर्भ में एक व्यापक अर्थ है। दैवी विश्वास से छूटकर मनुष्य के रूप में अपनी सत्ता का बोध नवजागरण और आधुनिकता की पहचान है। इस दौर में निराला की राष्ट्रीय कल्पना में देवी-देवता भारत की प्रकृति से एकाकार होकर प्रकट होते हैं, भक्ति का आलम्बन बनकर नहीं। निराला की इन कल्पनाओं में भारत देश का चित्र साकार होता है, इसकी विस्तृत विवेचना डॉ. रामविलास शर्मा ने अपनी पुस्तकों में पहले ही की है। (निराला की साहित्य साधना, भाग-2, 1972; राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, संस्कारण 1981, पृ.147-153; भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश, भाग-2, पृ.578-587)
वास्तविकता के प्रति निराला कभी उदासीन नहीं रहे। यह उनकी प्रारम्भिक कविताओं से भी समझा जा सकता है। वास्तविकता से उदासीन व्यक्ति रोमानी (स्वच्छन्दतावादी) कवि नहीं हो सकता। स्वच्छन्दतावादी कल्पना का जन्म ही यथार्थ से असामंजस्य के कारण होता है। इसलिए पलायनवादी कल्पना से वह पृथक है। इतिहास के जिस बिन्दु पर एक युग का अवसान होने लगता है और दूसरे युग का परिदृश्य उभरने लगता है, उस संधिवेला में ऐसी कल्पनाएँ जन्म लेती हैं। वे जीवन की वास्तविकता से उलझती हैं, असामंजस्यपूर्ण परिस्थितियों को बदलने का आह्वान करती हैं, हृासोन्मुख व्यवस्था की द्रष्टा और विकासोन्मुख सत्य की स्रष्टा का दायित्व निभाती हैं। इसलिए उनमें जितना पुराने मानकों को तोडने की छटपटाहट होती है, उतना ही नए मानकों के सृजन की उत्कंठा भी होती है। इस क्रम में उभरनेवाली नवीन अंतर्वस्तु एक ओर कल्पना के आकाश में उडती है, दूसरी ओर यथार्थ से बँधी रहती है। ऐसी कल्पना संघर्षशील अंतर्वस्तु के साथ प्रकट होती है। पलायनवादी कल्पना न यथार्थ से नाता बनाए रख पाती है, न पुराने को तोडती और नए को गढती है। निराला की कल्पना पलायनवाद से दूर, स्वच्छंदतावादी कल्पना है। इसलिए उनकी यथार्थ चेतना निरंतर सघन होती गई है। प्रकृति के साथ सांस्कृतिक परंपरा का एकीकरण इस सघनता का द्योतक है। यथार्थ यह था कि भारत कवि की कल्पना में भले जगन्महारनी हो, वास्तव में वह पराधीन था। पराधीनता से मुक्ति के लिए कल्पना प्रेरक हो सकती है, किन्तु संघर्ष अनिवार्य है। प्राकृतिक कल्पनाएँ ऐतिहासिक यातना के बोध को झुठलाती नहीं, उस यातना से संघर्ष की आवश्यकता प्रकट करती हैं।
निराला-काव्य में आरंभ से संघर्ष का आह्वान निरंतर विद्यमान रहा है। 1924 में बादल-राग-6 के वीर जो अशनि-पात (आग्नेयास्त्र के प्रहार) से क्षत-विक्षत हैं, वे गगन-स्पर्शी स्पर्धा-धीर हैं। (1/123) 1926 में वे जागो फिर एक बार-2 में देशवासियों को ललकारते हैं, शेरों की माँद में/ आया है आज स्यार। (1/141) आगे जब संघर्ष में जनता सक्रिय होती है, तब प्रतीकों का सहारा छोडकर निराला सीधे आह्वान करते हैं जल्द-जल्द पैर बढाओ, आओ, आओ। (2/162) इस समय झींगुर जैसे दलित किसान भी डटकर बोलने लगे हैं। (2/182) संघर्ष हो या भक्ति, निराला का लक्ष्य एक ही है-प्रिय स्वतंत्र रव/ भारत में भर दे। (1931; 1/210) यह संघर्ष केवल सामाजिक-राष्ट्रीय जीवन में नहीं है, निराला के जीवन में भी है। सभी श्रेष्ठ कवियों की तरह उनके काव्य में उनकी आत्मछवि भी विद्यमान है। यह आत्मछवि एक योद्धा की है। वीर मैं ज्यों समीरण करूँगा वरण। (1/229) सरोज-स्मृति के पिता निराला कन्याकुब्जों के रूढिवाद से साहित्य के रीतिवाद तक हर मोर्चे पर संघर्षरत हैं, किन्तु आक्रांता नहीं हैं: एक साथ जब शत घात घूर्ण/ आते थे मुझपर तुले तूर्ण। (1/297) जीवन के अंत में ताक रहा है भीष्म शरों की कठिन सेज पर। (2/484) यह एक योद्धा का अंत है जो विजय-पराजय से अधिक मूल्यवान संघर्ष को मानकर जीवन भर देश की आज़ादी, जनता की मुक्ति और साहित्य के विकास के लिए हर मोर्चे पर सतत संघर्षरत रहा।
विशेषाधिकारों को चुनौती
प्रकृति की प्रेरणा संघर्ष के लिए, इतिहास का स्मरण संघर्ष के लिए, क्रांतिकारी वीरों और सकर्मक जनता का आह्वान संघर्ष के लिए, निराला साहित्य में 1920 से 1946 तक संघर्ष का यह स्वर निरंतर गहन होता है। हिन्दी समाज में राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के साथ संघर्ष की बढती हुई यह चेतना नवजागरण का उज्ज्वल पक्ष है। यह संघर्ष अनेक क्षेत्रों में साथ-साथ चला। एक ओर विदेशी शासन के विरुद्ध, दूसरी ओर उनके भारतीय सहायकों के विरुद्ध; इनके साथ-साथ दोनों के सांस्कृतिक प्रभावों के विरुद्ध भी। ब्रिटिश राज कायम होने के बाद भारत का स्वाभाविक विकास अवरुद्ध हुआ। व्यापारिक उन्नति को धक्का लगा, उद्योग तबाह हुए, देहातीकरण बडे पैमाने पर हुआ। इस सबके विरूद्ध भारतीय जनता छोटे-बडे पैमाने पर निरंतर लडती रही, जिसकी सबसे गौरवशाली अभिव्यक्ति सन 1857 का स्वाधीनता संग्राम है। लेकिन उस संघर्ष की पराजय के बाद अंग्रेजों ने अपने सहायक के रूप मे नए जमींदार खडे किए, पुराने वफादारों को नयी जागीरदारियाँ दीं। इस तरह छोटे-छोटे राजाओं-सामंतों का जाल तैयार हुआ जो न सिर्फ ब्रिटिश शासन का आधार बना, बल्कि भारतीयता के नामपर रूढिवाद का स्रोत भी बना। सामंतवाद के दृढ होने से सामाजिक संस्कृति में रूढिवाद और अंधविश्वास खूब फूला-फला। स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष करने वाले बुद्धिजीवियों और कवियों के सामने साम्राज्यवादी प्रभुत्व और सामंती रूढिवाद की दोहरी चुनौती थी। भारतेन्दु से निराला तक नवजागरण के मनीषियों को हम इस दोहरी चुनौती से निरंतर संघर्ष करते देखते हैं।
यहाँ उल्लेखनीय है कि रूढिवाद-अंधविश्वास का ऐसा पुनरुद्भव इटली में नहीं हुआ जहाँ व्यापारिक उन्नति की प्रक्रिया अबाध गति से चली, बल्कि जर्मनी में हुआ जहाँ 16वीं शताब्दी में नवजागरण की अनेक धाराएँ उभरीं। मार्टिन लूथर धर्मसुधारक थे और अंधविश्वासों के प्रचारक भी। वे चुडैलों में विश्वास करते थे और कहते थे कि इन चुडैलों से पिशाच लोग संतान उत्पन्न करते हें, इसलिए चुडैलों को ज़ंदा जालना या पत्थरों मारकर उनकी हत्या करना उचित है। रूढिवादी कहे जाने वाले भारत में नारीनिंदक कबीर और तुलसी भी इस तरह महाठगिनि या अवगुन खानी की हत्या का समर्थन नहीं करते थे। सूरदास तो सती की जाने वाली स्त्री को देखकर क्षोभ व्यक्त करते हैं कि इसे जलाने से पहले यह अग्नि स्वयं क्यों नहीं जल जाती। ये चुडैलें यूरोप के ही दूसरे सभ्य देश इंग्लैंड में शेक्सपियर के यहाँ मैकबेथ में प्रकट होती हैं। लेकिन वे लूथर की सीमा तक नहीं जाते। शेक्स्पीयर संभ्रांत मध्यवर्ग के प्रतिनिधि थे, उनमें पुनर्जागरण के जीवन मूल्य विद्यमान हैं। लूथर उदीयमान व्यापारियों के प्रतिनिधि थे। उनका धर्मसुधार अंधविश्वासों को निर्मूल नहीं करता। जर्मनी में लोकजागरण की एक धारा इनसे अलग थी जिसके अग्रदूत थे किसान नेता मुएंज़र। इन्हें एंगेल्स ने पीजेंट वार इन जर्मनी में सर्वहारा वर्ग का पुरखा कहा है। वे न अंधविश्वासों का प्रचार करते थे, न विशेषाधिकारी वर्गों के हितों का समर्थन। ओल्ड टेस्टामेंट को आधार बनाकर उन्होंने मानव-समता के आदर्श पर समाज के पुनर्गठन का कार्यक्रम रखा। भारत के नवजागरण को, लोकजागरण को भी, मुएंज़र की परंपरा से जोड सकते हैं। किसानों-कारीगरों का हित कबीर-सूर-तुलसी के लिए सर्वोपरि है। निराला नए जागरण के अग्रदूत के रूप में अपने को कबीर-सूर-तुलसी की इस परंपरा मे सचेत ढंग से खडा करते हैं।
भारत में सामंती प्रथा को दृढ करने और रूढिवाद को बद्धमूल करने में ब्रिटिश साम्राज्य की भूमिका निराला पहचानते थे। इसलिए उन्होंने रूढिवाद विरोधी संघर्ष को साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष से जोडकर देखा। 1930 की सुधा की एक संपादकीय टिप्पणी में उन्होंने लिखा कि अंग्रेजों ने जहाँ-जहाँ अपना व्यापार फैलाया, वहाँ-वहाँ अपना राज्य, अपना धर्म और अपनी भाषा भी फैलाई। धर्म, राजनीति और संस्कृति, सबका एक ही लक्ष्य था व्यापार। इस ध्येय के लिए उन्होंने जिस कूटनीति का प्रयोग राजनीति में किया, उसी का प्रयोग संस्कृति में भी किया, अंग्रेजों की नीति हुई-भारत के इतिहास को विकृत कर दो, और हो सके, उसकी भाषा को मिटा दो। भारतीय सभ्यता और संस्कृति तुलना में नीची दिखाई जाने लगी। हमारी भाषाएँ गँवारू, असाहित्यिक और अविकसित बताई जाने लगीं। हमारा प्राचीन इतिहास अंधकार में डाल दिया गया। (निराला रचनावली, खंड-5, पृ. 295-96)
इस अंधकार का एक रूप यह है कि भारत कृषिप्रधान देश और अध्यात्मप्रधान समाज है, यह बात जड जमाकर बिठा दी गयी। भारत का सामंतवाद बहुत पुराना है, उसके साथ वाणिज्य-व्यापार का विकास भी बहुत पुराना है। सामंतवाद के साथ वर्णव्यवस्था और अंधविश्वासों का संबंध है, व्यापार के साथ कारीगरों के महत्त्व और वैचारिक गतिशीलता का संबंध है। बंधुआगीरी और गुलामी का प्रचलन सामंती वयवस्था से सम्बद्ध है, पगारप्रथा और आर्थिक स्वावलम्बन वाणिज्य-व्यापार से सम्बद्ध है। अपने वर्ग हितों की रक्षा व्यापारी समुदाय भी करता है, लेकिन वंशगत विशेषाधिकारों का संबंध सामंती व्यवस्था से विशेष रूप में है। औपनिवेशिक भारत में उभरे नए सामंती प्रभुओं ने पुराने रूढिवाद से लाभ उठाकर अपने विशेषाधिकारों की रक्षा करने तथा समाज को अंधविशवासों में जकडने का प्रयास किया।
निराला ने साम्राज्यवाद की ही तरह सामंती दमन और रूढिवाद का विरोध किया। इस विरोध का आधार उनका आधुनिक मानववादी दृष्टिकोण था। बचपन में उन्होंने बंगाल की महिषादल रियासत में निर्धन लोगों पर राजा के अत्याचार के अनेक रूप देखे थे, बाद को अपने गाँव गढाकोला में गरीब किसानों पर जमींदार के अत्याचार भी देखे। बंगाल वाली घटना का वर्णन डॉ. रामविलास शर्मा ने निराला की जीवनी में किया है, निराला ने स्वयं उसपर राजा साहब को ठेंगा दिखाया कहानी लिखी है।(3) आगे जब निराला अपने गाँव में किसानों का संगठन करते हैं, उनका आंदोलन चलाते हैं, तब जमीदारों से प्रत्यक्ष संघर्ष होता है। इस संघर्ष की झलक झींगुर डटकर बोला कविता में है। किसान सभा की बैठक में जिस समय काँग्रेसी भाईजी अहिंसात्मक स्वराज्य का स्वप्न दिखा रहे थे कि राज अपना होगा;/ जमींदार, साहूकार अपने कहलाएँगे, उसी समय जमींदार का गोडइत/ दोनाली लिए हुए/ एक खेत के फासले से/ गोली चलाने लगा। (उपर्युक्त, खंड-2, पृ.182)
दोनों घटनाओं में लगभग चौथाई सदी का फासला है। पहली घटना बंगाल में प्रथम विश्वयुद्ध से पहले की है, दूसरी अवध के बैसवाडे में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की। इनसे देश भर में निरंतर चलनेवाले सामंती अत्याचार का दृश्य साकार होता है। छुटपन में निराला राजा का साहब का कुछ न बिगाड सकते थे, युवाकाल में वे किसानों का सघर्ष चला रहे थे। इन किसानों में केवल ऊँची जतियों के लोग नहीं थे। अवर्ण कही जानेवाली श्रमिक जतियों के लोग प्रमुख रूप में थे। किसान संघर्ष एक ओर अंग्रेजों द्वारा पोषित जमींदारों के खिलाफ अधिकार के लिए थे, दूसरी ओर जाति-बिरादरी में बँटे समाज के एकीकरण का प्रयत्न भी थे। इस तरह के संघर्ष में निराला चतुरी की मदद करते हैं, जो बीस कोस पैदल चलकर जमींदार की बेगार और उसके सिपाही के शोषण से छुटकारा पाने के लिए मुकदमा करता है। (चतुरी चमार; उपर्युक्त, खंड-4, पृ.379-386)
बीसवीं सदी में यह सामंती अत्याचार अचानक उत्पन्न नहीं हुआ। वह पूरे सामंती युग में विद्यमान था। राजे ने अपनी रखवाली की कविता में निराला ने इन अत्याचारों का ऐतिहासिक रूप चित्रित किया। सामंती व्यवस्था के राज्ययंत्र को चलाने वाली शक्तियाँ किस तरह काम करती हैं, संक्षेप में इसका वर्णन शायद ही इतनी स्पष्टता से कहीं और मिले। राजा किला बनाकर रहता है, फौजें रखता है, साथ ही चापलूस सामंत और ब्राह्मण भी पालता है, कवि-ऐतिहासिक-नाट्यकार भी उसके गुणगान करते हैं; इस प्रकार सेना से संस्कृति तक एक पूरा तंत्र है जिसके परिणामस्वरूप-
जनता पर जादू चला राजे के समाज का।
लोक-नारियों के लिए रानियाँ आदर्श हुईं।
धर्म का बढावा रहा धोखे से भरा हुआ।
लोहा बजा धर्म पर, सभ्यता के नामपर।
खून की नदी बही।
आँख-कान मूँदकर जनता ने डुबकियाँ लीं।
आँख खुली-राजे ने अपनी रखवाली की। (उपर्युक्त, 2/177-78)
ऊपर से देखने में लगता है कि जनता ने सामंती शासन को स्वेच्छा से अंगीकार किया है। लेकिन उसे ग्राह्य बनाने का पूरा तंत्र है। उस तंत्र में फौज है, सामंत हैं, ये दमनकारी यंत्र का हिस्सा हैं; उसमें ब्राह्मण हैं, कवि हैं, इतिहासकर हैं, वे सांस्कृतिक-मनोवैज्ञानिक यंत्र का हिस्सा हैं; दोनों मिलकर सामंती व्यवस्था को सुदृढ करते हैं। परिणाम यह होता है कि जनता राजा को अपना आदर्श मानती है। लोकनरियों के लिए रनियों का आदर्श बन जाना यह बताता है कि दमनतंत्र को सांस्कृतिक उपायों द्वारा हृदयंगम कराया जाता है। इस तरह राजा का जादू समाज पर चलता है। लेकिन असलियत में धर्म और सभ्यता के नामपर खून की नदी बहती है। इस नदी में जनता डुबकियाँ लेती है और राजा सुरक्षित रहता है।
(क) सामंती सौंदर्यबोध का विकल्प
भौतिक नियंत्रण के लिए सेना और युद्ध, मनोवैज्ञानिक नियंत्रण के लिए धर्म और इतिहास तथा सांस्कृतिक नियंत्रण के लिए काव्य और नाटक-कोई भी व्यवस्था एक सुसंगठित प्रणाली से अपना वर्चस्व स्थापित करती है। अंतोनियो ग्राम्शी ने दमनकारी राज्ययंत्र और सांस्कृतिक राज्ययंत्र की भूमिका को लेकर जो विवेचन किया है, निराला का यह विवेचन उसके पहले का है। निराला सामंती विशेषाधिकारों का दमनकारी रूप ही नहीं उजागर करते, उसके सौंदर्यबोध की हास्यास्पदता भी उद्घाटित करते हैं। साहित्य की वर्तमान स्थिति (सुधा, 1930) में उन्होंने लिखा था, प्राचीन रूढियाँ जिस तरह भारत के अन्यान्य देशों के साथ सम्मिश्रण की बाधक हैं, उसी तरह हमारा साहित्यिक ज्ञान भी है। प्रायः अधिकांश अध्यापक पुरानी लकीर के फकीर हैं, और जो कुछ नये भी हैं, वे नवीन संस्कृति के अनुकूल नहीं।...इसीलिए उनके पढाये जो विद्यार्थी निकलते हैं, उनके मस्तिष्क में प्राचीन संकीर्णता की शिक्षा भरी रहती है। वे हिन्दी के मैदान में बहुत बडा साहित्यिक उद्देश्य, बहुत बडी नवीन मौलिक प्रतिभा लेकर नहीं आते। उन्हीं नायिकाभेदों और अलंकारों के कोठों में चक्कर काटकर रह जाते हैं। (5/453)
छायावादी कवि के रूप में निराला जब आरंभिक अवस्था में थे, तब तक रीतिवादी आचार्यों का ही नहीं, कवियों का भी साहित्य-क्षेत्र में खासा दबदबा था। संयोग और वियोग श्रृंगार में डुबकियाँ लगाने का सिलसिला रुका नहीं था, हालांकि असहयोग आंदोलन (1920-22) हो चुका था। निराला ने 1923 में विरहिणी पर व्यंग्य शीर्षक कविता में रीतिवादी सौन्दर्यबोध को नई दृष्टि से देखा जिससे उसकी अप्रासंगिकता और अनैतिहासिकता स्वयं स्पष्ट हो जाती है-
हार मन मार मार की बहू ललाट ठोंक
काजल बहा कपोल कुत्सित किया करें।
अंचल? लजी मशालची की लालटेन काली
नेत्र जल से प्रबल नासिका सदा झरे। (1/33)
उस नायिका की कल्पना कीजिए जो सज-धज कर बैठी नायक का इंतजार करती है, नायक नहीं आता, विरह में आँसू बहाती है, आँख का काजल बहकर कपोलों को कुत्सित कर रहा है; रोने पर आँख का साथ नाक भी देती है, तो आँख के साथ नाक भी बह रही है! जिस विरहिणी-रूप पर रीतिवाद के आचार्य रस-अलंकार के खजाने ढूँढते थे, उसे निराला ने उपहास का विषय बनाकर नये सौंदर्यबोध की पृष्ठभूमि निर्मित की। इस कवियों और आचार्यों की कल्पना का यह हाल था किर्
कल्पना ललाम की लगाम थाम कविदल
मुख तुलना न कभी चंद्र के बिना करे। (1/34)
इस जड कल्पना का प्रतिकार निराला अपने नये सौंदर्य-चित्रों में करते हैं। 1936 में प्रकाशित गीतिका का एक प्रसिद्ध गीत है (प्रिय) यामिनी जागी। स्त्री-पुरुष के मिलन-सुखद अनुभव का अंकन करते हुए निराला लिखते हैंर्
खुले केश अशेष शोभा भर रहे,
पृष्ठ-ग्रीवा-बाहु-उर पर तर रहे;
बादलों में घिर अपर दिनकर रहे,,,(1/238)
चन्द्रमुखी नायिकाओं का विकल्प है यह सूर्यमुखी नायिका-केशों से आवृत मुख जैसे बादलों से घिरा सूर्य। यह स्वतंत्र नारी छवि है। चंद्रमा सूर्य से प्रकाशित होता है, उसी तरह चंद्रमुखी नायिका की सार्थकता नायक से है। सूर्य को किसी अन्य के प्रकाश की आवश्यकता नहीं है। यह नयी नारी-छवि समाज में सक्रिय आधुनिक नारी का बिम्ब है। मध्ययुग के सामंती सौंदर्यबोध को निराला आधुनिक स्वतंत्र नारी के व्यक्तित्व द्वारा परिवर्तित कर देते हैं। जैसा पहले कहा गया, स्वच्छंद कवि पुरानी रूढियों को अपदस्थ करते हुए नए प्रतिमान निर्मित करते हैं। यह परिवर्तन इसका द्योतक है। रीतिवादी विरहिणी के समांतर निराला किसान स्त्री का रूप प्रस्तावित करते हैं। ये किसान की नयी बहू की आँखें वैकल्पिक सौंदर्य-रुचि का उदाहरण है-
नहीं जानतीं जो अपने को खिली हुई
विश्व - विभव से मिली हुई,
नहीं जानतीं साम्राज्ञी अपने को,
नहीं कर सकीं सत्य कभी सपने को,
वे किसान की नयी बहू की आँखें
ज्यों हरीतिमा में बैठे दो विहग बंद कर पाँखेँ।
(1/343)
दो आँखें दो विहग हैं-किसानी परिवेश से प्रकृतिक उपमान का संबंध कला को स्वाभाविक बनाता है। पाँखें बंद हैं; किसान स्त्री साम्राज्ञी नहीं है, उसके सपने कभी पूरे नहीं हुए, इसलिए आँखें खिली हुई नहीं हैं; वे विश्व-विभव से मिली हुई हैं, इसका बोध भी उसे नहीं है। व्यक्तित्व, मनोभाव और उपमान में अभेद्य संबंध है। जो कवि इस वैकल्पिक सौंदर्यबोध से अनभिज्ञ होगा, उसकी आलोचना भी निरर्थक होगी।
सामंती परिवेश से किसानी परिवेश का क्या अंतर है, उसमें विश्व-विभव का क्या औचित्य है, यह भी निराला के छायावादी मनोलोक में परिभाषित हुआ है। पंचवटी प्रसंग की सीता राजमहल से वन में आकर प्रसन्न हैं, क्योंकि-
मैं तो सोचती हूँ, वहाँ बंदिनी थी
और यहाँ खेलती हूँ मुक्त खेल,
और साथ हो तुम,
और कहाँ इतना सुअवसर
मुझे मिल सकता है? (1/39)
सीता स्त्री हैं, उन्हें मुक्ति का अनुभव हुआ, यह समझ में आता है, लेकिन राम की भावना इससे कुछ अलग नहीं है-
छोटे-से घर की लघुसीमा में
बँधे हैं क्षुद्र भाव,
यह सच है प्रिय,
प्रेम का पयोधि तो उमडता है
सदा ही निस्सीम भू पर। (1/39)
सीमा में बाँधने वाले राजदरबार से बाहर प्रकृति के स्वच्छ्न्द वातावरण में लघु सीमाएँ टूटती हैं, निस्सीम पृथ्वी पर प्रेम का समुद्र उमडता है। यहाँ मध्ययुगीन राम-सीता का छायावादी रूपान्तरण है। उनका प्रेम दाम्पत्य प्रेम है। लेकिन लोकजीवन में अमान्य प्रेम भी है। स्वच्छंद कवि निराला प्रेम के हर रूप का समर्थन करते हैंर्
बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा सारा गाँव, बंधु! (2/353)
गाँव इसलिए पूछेगा कि उसे इस प्रेम पर आपत्ति है। लेकिन दासता के सम्बन्धों को मिटाकर सहज प्रेम की प्रतिष्ठा करना, दो व्यक्तियों की स्वतंत्र इच्छा के अलावा जाति-धर्म-संपत्ति पर आधारित संबंधों को अस्वीकार करना, नवजागरण का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। आधुनिकता का यह मूल्य सामंती समाज के विघटन और पूँजीवादी समाज के आगमन के साथ सर्वत्र प्रभावशाली हुआ।
(ख)जाति और संप्रदाय
भारत की विशेष परिस्थितियों में औपनिवेशिक शासन की सहायता से सामंती जीवन के जिन अवशेषों ने सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य में विघटनकारी भूमिका अदा की, उनमें प्रमुख हैं सांप्रदायिकता और जातिवाद। निराला दोनों प्रवृत्तियों से बराबर संघर्ष करते हैं। बहुधा दोनों समस्याओं को वे जोडकर देखते हैं। यह उनकी सामंतवाद विरोधी चेतना का सहज परिणाम है। अपनी रचनाओं में वे श्रमिक जतियों पर निरंतर ध्यान देते हैं। वे उनकी दुर्दशा का, फिर उनमें आनेवाली जागृति का और इस जागृति के कारण उनके संघर्ष का चित्रण करते हैं। चतुरी चमार पुश्त-दर-पुश्त किस नारकीय जीवन- स्थिति में जी आए हैं, इसका मार्मिक वर्णन निराला ने किया है। (4) स्वाधीनता आंदोलन की लहर गाँव पहुँचने के बाद अपनी इस दीनता से निकालने के लिए उनमें छटपटाहट व्यक्त होती है। निराला पहले ही समाज सुधार का बीडा उठाए हुए थे। वे चतुरी के आग्रह पर उसके लडके अर्जुन को घर बुलाकर पढाते हैं, काका, कहो तो अर्जुनवा (चतुरी का सत्रह साल का लडका) को पढने के लिए भेज दिया करूँ, तुम्हारे पास पढ जाएगा, तुम्हारी विद्या ले लेगा, मैं भी अपनी दे दूँगा, तो कहो भगवान की इच्छा हो जाय तो कुछ हो जाय। (4/381) पैतृक विद्या और अक्षरज्ञान, दोनों के सहयोग से चतुरी जीवन बदलने का प्रयत्न करते हैं। अर्जुन को पढाते हुए निराला का भाव यह है कि मैं अर्जुन को पढाता था तो स्नेह देकर, उसे अपनी ही तरह का एक आदमी समझकर, उसके उच्चारण की त्रुटियों को पार करता हुआ। (4/382) निराला अर्जुन के साथ बैठकर खाना भी खाते हैं। अर्जुन इस पढाई, खान-पान में अकेला नहीं था। लोध, पासी, धोबी और चमारों का ब्रह्मभोज निराला के अध्यापन के साथ-साथ चलता था। (4/382)
तात्पर्य यह कि निराला दलितों में जागृति के तटस्थ द्रष्टा नहीं रहते, उस जागृति में सहयोगी बनते हैं, सामाजिक स्तर पर बराबरी का व्यवहार करते हुए हिस्सेदारी करते हैं। उनकी सहानुभूति दर्शक होने की सीमा त्यागकर दलितों को अपनी ही तरह का एक आदमी मानकर समानुभूति के स्तर पर पहुँचती है। चतुरी निराला के गाँव के थे। कुल्ली भाट उनकी ससुराल के थे। कुछ आदतों के कारण लांछित, तिरस्कृत। लेकिन वे एक मुसलमान स्त्री से प्रेम और फिर ब्याह करते हैं, अछूत कहे जाने वाले विद्यार्थियों के लिए पाठशाला खोलते हैं। इस पाठशाला में धोबी, भंगी, चमार, डोम और पासियों के बच्चे पढते हैं। (4/62) धनी और प्रतिष्ठित लोग सहयोग नहीं करते। निराला उन्हें पूरा समर्थन देते हैं। कुल्ली उन्हें आमंत्रित करते हैं। कुटीनुमा बँगले के सामने टाट बिछा था। उसपर अछूत लडके श्रद्धा की मूर्ति बने बैठे हैं। आँखों से निर्मल रश्मि निकाल रही है। कुल्ली आनंद की मूर्ति, साक्षात आचार्य। काफी लडके। मुझे देखकर सम्मान-प्रदर्शन करते हुए नतशिर अपने-अपने पाठ में रत थे। बिलकुल प्राचीन तपोवन का दृश्य। (4/63)
प्राचीन तपोवन की उपमा दोनों काम एक साथ करती है-कुलीन ब्राह्मण-क्षत्रिय लडकों को शिक्षा देने वाले सामंती गुरुकुल का अस्वीकार और अछूत लडकों को शिक्षा देने वाले नए युग का आह्वान। यह भी जागरण है। इस जागरण का प्रभाव निराला पर बहुत गहरा पडता है। उनकी दृष्टि बदल जाती है। लडकों के साथ इनके कुछ अभिभावक भी आए हैं। दोनों में फूल लिए हुए, मुझे भेंट करने के लिए। इनकी ओर कभी किसी ने नहीं देखा। ये पुश्त-दर-पुश्त से सम्मान देकर नत-मस्तक ही संसार से चले गए हैं। संसार की सभ्यता के इतिहास में इनका स्थान नहीं है। ये नहीं कह सकते, हमारे पूर्वज कश्यप, भरद्वाज, कपिल, कणाद थे; रामायण, महाभारत इनकी कृतियाँ हैं; अर्थशास्त्र, कामसूत्र इन्होंने लिखे हैं; अशोक, विक्रमादित्य, हर्षवर्धन, पृथ्वीराज इनके वंश के हैं। फिर भी ये थे, और हैं। (4/63-64) जो थे और हैं, जिन्हें किसी ने नहीं देखा, उन्हें निराला देखते हैं। इस प्रकार इतिहास देखने की नयी दृष्टि उन्हें वर्तमान से मिलती है। अब वे अतीत को अखंड गौरव का स्रोत नहीं मान सकते थे। सामाजिक विभेद वर्तमान में थे, अतीत में भी थे। निराला साफ अनुभव करते हैं कि इन्हें अधम बनाया है मेरे समाज ने। (4/64)
दलित प्रश्न को निराला सांप्रदायिक प्रश्न से जोडकर देखते हैं। दोनों का संबंध हिन्दू समाज के रूढिवाद और धर्मांधता से है। कुलीन हिन्दू समाज इस सीमा तक पतित है कि सुकुल की बीवी (1937; 4/412-424) मुसलमान घर में पालित होने के कारण भद्र परिवेश में रहने की इजाजत नहीं पाती। उसके पिता हिन्दू थे। उन्होंने अपनी पत्नी को गर्भावस्था में घर से खदेड दिया। एक मुसलमान ने सहारा दिया। एक आर्यसमाजी ने शिकायत कर दी। पुलिस की तफतीश हुई। एक से दूसरे मुसलमान के यहाँ में शरण पाते हुए आखिर एक इंस्पेक्टर के घर रहने की स्थिति आई। वहीं बेटी हुई। इस तरह बच्ची मुसलमान हुई। उनका नाम पुष्करकुमारी है। पुष्करकुमारी निराला को कोलकाता में मिली थीं। वह पढ-लिखकर शिक्षिका बनीं। सुकुल से प्रेम किया, लेकिन द्विज समाज प्रताडित करता रहा। उन्हें जिस मुहल्ले में रहना पडा, उसका हाल चतुरी के परिवेश से बहुत मिलता-जुलता था। ऐसा परिवेश कुकुरमुत्ता में भी दिखता है, जहाँ नवाब के नौकर-चाकर रहते हैं-जगह गंदी, रुका, सडता हुआ पानी/ मोरियों में...। (2/51) नगर में भी आखिर चतुरी और कुल्ली की तरह उन्हें भी निराला से सहारा मिला।
धार्मिक कट्टरता केवल हिंदुओं में नहीं है। विवाह से पहले सुकुल को एक क्रिश्चियन कॉलेज में प्रोफेसर का काम मिला, लेकिन इसके लिए प्रिंसिपल को आश्वासन देना पडा कि ईसाई धर्म को वह संसार में सर्वशेष्ठ धर्म मानते हैं, लेकिन बूढे पिताजी का लिहाज है, और वह दो-चार साल में चलते हैं, बाद को सुकुल क्रिश्चियन के अलावा दूसरा अस्तित्व नहीं रखते। कुछ निबंध भी प्रमाण के तौर पर लिखे। (4/421) लेकिन निराला ने धर्म-परिवर्तन नहीं कराया। कुछ मित्रों की सहायता से सुकुल के साथ पुष्करकुमारी का विवाह करा दिया, जिसमें विभिन्न प्रान्तों के साहित्यिकों की उपस्थिति हुई, और तो और, प्रीतिभोज में अनेक कनवाजिए सम्मिलित हुए। (4/424) इसलिए निराला का रूढिविरोध केवल मौखिक या व्यक्तिगत नहीं था, वह क्रियात्मक और सामाजिक भी था।
हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न पर उनका दृष्टिकोण सांप्रदायिक कभी नहीं रहा। कुछ कविताओं में हिन्दू-मुसलमान की शब्दावली देखकर अति-जनवादी सज्जन उन्हें हिंदूवादी और सांप्रदायिक कहने में पल भर देर नहीं करते। कुछ दूसरे विचारक इसी शब्दावली के नाते कबीर से निराला तक सबको हिन्दुत्व के खाते में समेट लेते हैं। यह पदावली पहले 1926 में महाराज शिवाजी का पत्र कविता में, फिर 1934 में तुलसीदास कविता में दिखाई देती है। उल्लेखनीय है कि दोनों कविताएँ ऐतिहासिक विषयों पर हैं। प्रारम्भिक आधुनिकता के जागरणकाल में जिस तरह कबीर और मीरां का विद्रोह धार्मिक आवरण में हुआ, उसी तरह इन कविताओं में जातीय और सांस्कृतिक अस्मिता धार्मिक शब्दावली में व्यक्त हुई है।
मिर्जा राजा जयसिंह जयपुर के महाराज थे। उनके नाम शिवाजी का पत्र श्रीकृष्ण संदेश नामक पत्र में छपा था। उसे पढकर निराला ने यह कविता लिखी। जयपुर घराना अपना संबंध रघुकुल से जोडता है। निराला ने कविता के आरंभ में इसका स्मरण किया है।(5) जयसिंह औरंगज़ेब के सामंत थे। राजपूतों की इस पराधीनता पर क्षोभ भी प्रकट किया है।(6) जयसिंह शिवाजी पर चढाई करने सेना लेकर आए थे। शिवाजी ने कहा कि दक्षिण के प्राण काढ कर उसे वे मोगल-सिंहासन के-/औरंग के पैरों के/नीचे रख देंगे। (1/146) यहाँ मोगल के साथ हिन्दू भी आया है-मोगलों को तुम जीवनदान/काढ हिंदुओं का हृदय...। (1/147) ध्यान देने की बात है कि शिवाजी दक्षिण के स्वाभिमान के प्रतीक हैं और अपनी स्वतंत्रता के लिए लड रहे हैं। दिल्ली का शासक हिन्दी है। साथ ही, जयसिंह और शिवाजी हिन्दू भी हैं, औरंगज़ेब मुसलमान है। इसलिए हिन्दू और मुगल की पदावली बार-बार आती है।(7) एक स्थान पर हिन्दू के साथ मुगल नहीं बल्कि मुसलमान भी आया है-

एक ओर हिन्दू और एक ओर मुसलमान हों,
व्यक्ति का खिंचाव यदि जातिगत हो जाय,
देखो परिणाम फिर...(1/158)
किन्तु यहाँ हिन्दू धार्मिक अर्थ में नहीं, जातीयता के अर्थ में आया है। पूरी कविता में कहीं भी हिन्दू-मुसलमान के धर्मयुद्ध या सांप्रदायिक संघर्ष का आह्वान नहीं है। न हिन्दू धर्म की अनीतियों के प्रति अस्वीकार का भाव है। सनातन धर्म में ऊँच-नीच का भाव द्वंद्व, कलह, वैमनस्य की सीमा तक है, इससे वह स्वयं मिट जाने के कगार पर है।(8) ज़ाहिर है, जातीय एकता से लेकर सनातन धर्म तक अनेक विषय मुगल शासक से अपनी स्वाधीनता की रक्षा के लिए प्रस्तुत किए गए हैं। इसीलिए रघुकुल से जयपुर के संबंध का स्मरण भी किया गया है। साथ ही, जयसिंह की दासवृत्ति को धिक्कारा भी गया हैर्
सोचो तुम,
शाहजहाँ से तुमने कैसा बर्ताव किया। (1/153)
यह एक कुशल वक्तृत्व-कला का उदाहरण है, जिसमें तत्कालीन मानसिकता के अनुरूप तर्कों का संगठन किया गया है। इस वक्तृत्व और तर्क-संगठन का उद्देश्य है स्वतन्त्रता की भावना जगाना-
सोचो तुम,
उठती जब नग्न तलवार है स्वतन्त्रता की,
कितने ही भावों से
याद दिला घोर दुःख दारुण परतंत्रता का,
फूँकती स्वतन्त्रता निज मंत्र से
जब व्याकुल कान,
कौन वह सुमेरु रेणु-रेणु जो न हो जाय?
(1/149-50)
जयसिंह की गलतियों के स्मरण के साथ-साथ अपनी स्वतन्त्रता के लिए खडे होने वाले चित्तौड के राणा और बुंदेलखंड के छत्रसाल का गौरवपूर्ण उल्लेख भी किया गया है। (1/152-53) अतीत के इस वर्णन का निराला के वर्तमान से संबंध है। पत्र के अंत तक पहुँचते-पहुँचते वे कहते हैं-
जितने विचार आज
मारते तरंगें हैं
साम्राज्यवादियों की भोग-वासनाओं में,
नष्ट होंगे चिरकाल के लिए।
आयेगी भाल पर
भारत की गयी ज्योति,
हिंदुस्तान मुक्त होगा घोर अपमान से,
दासता के पाश कट जायेंगे। (1/158)
शिवाजी के पत्र की तरह तुलसीदास में भी मुसलमान हैं, हालांकि वहाँ उसके साथ हिन्दू नहीं हैंर्
उर के आसन पर शिरस्त्राण
शासन करते हैं मुसलमान;
है ऊर्मिल जल, निश्चलप्राण पर शतदल।...
मोगल-दल बल के जलद-यान,
दर्पित-पद उन्मद-नद पठान
हैं बहा रहे दिग्देशज्ञान, शर - खरतर।
(1/267)
मुसलमानों का शासन हो जाने पर जीवन-सरोवर में ऊपर से हलचल है, लेकिन प्राण का शतदल निश्चल है। जिन्हें मुसलमान कहा गया है, वे मुगल और पठान हैं। मुगल जलद-यान की तरह हैं और पठान उन्मद-नद की तरह। उनके तीव्र प्रहारों से देश और दिशा का ज्ञान समाप्त हो गया है। इसीलिए तुलसी के संस्कार जागने के बाद यह स्पष्ट लक्षित किया गया है कि देश-काल के शर से बिंधकर/ यह जागा कवि अशेष-छविधर। (1/288) इस जागरण के परिणामस्वरूप हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष नहीं होता, संघर्ष होता है उन रीतिवादी संस्कारों से जिनसे तुलसी ग्रस्त थे और सामाजिक रूढिवाद से जिनके कारण श्रमजीवी दलित समाज की ऐसी हीनदशा थी कि वे दीन, क्षीण, कंकलकाय थे और-
वे शेष-श्वास, पशु, मूक-भाष,
पाते प्रहार अब हताश्वास;
सोचते कभी, आजन्म ग्रास द्विजगण के
होना ही उनका धर्म परम,
वे वर्णाधम, रे द्विज उत्तम,
वे चरण-चरण बस, वर्णाश्रम रक्षण के।
(1/273)
निराला के लिए इतिहास का चित्रण किसी सुनहरे अतीत में जा बसने का साधन नहीं है। उसका लक्ष्य है भारतीय समाज की विसंगतियों को मिटाकर मनुष्य के लिए समता का जीवन सुलभ करना तथा साम्राज्यवादी भोग-वासनाओं से मुक्त होकर भारत के सम्मान को पुनः प्राप्त करना। इसलिए मुक्ति उनके यहाँ व्यापक अवधारणा है। यह उस युग की प्रमुख आकांक्षा है। सांस्कृतिक और पौराणिक आख्यानों की तरह इतिहास भी स्वाधीनता प्राप्ति के इस ध्येय का सहायक है। यह सही है कि नवजागरण के साथ एक धारा पुनरुत्थानवाद की भी थी; निराला को उसके क्रांतिकारी पक्ष से सहानुभूति थी। तिलक पर उनकी एक कविता भी है।(9) वे रामकृष्ण आश्रम में रहे थे। इन दोनों प्रभावों से हिंदूवादी शब्दावली का संबंध हो तो आश्चर्य नहीं। किन्तु उनकी भावधारा हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य की नहीं थी। इस वैमनस्य का संबंध तिलक और रामकृष्ण की विचारधारा से भी नहीं था। निराला में जहाँ ऐसी शब्दावली है, वहाँ जातीयता और राष्ट्रीयता का प्रसंग अनिवार्यतः लगा हुआ है, साथ ही स्वाधीनता का प्रश्न उसके केंद्र में है। यह स्वाधीनता अतीत के दृश्यपटल पर नहीं बल्कि वर्तमान में है। इसलिए सांप्रदायिक अलगाव से उनकी भावधारा का कोई संबंध नहीं है। राष्ट्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप उनका दृष्टिकोण कितना सुसंगत है, यह उनके दो निबंधों से जाना जा सकता है-साहित्य की समतल भूमि (1927) तथा मुसलमान और हिन्दू कवियों में विचार-साम्य (1929)।
यह बात निराला भली-भाँति समझते थे कि इसके बिना, दृढ बंधुत्व के बिना, दोनों (हिंदुओं-मुसलमानों) की गुलामी के पाश कट नहीं सकते, खासकर ऐसे समय जबकि फूट डालना शासन का प्रधान सूत्र है। (5/335-36) जिन संस्थाओं से जुडे लोग हिंदुओं-मुसलमानों में वैमनस्य की राजनीति करते रहे हैं, वे फूट डालने वाले शासन की ही सेवा करते आए हैं, स्वाधीनता के ध्येय में उनका विश्वास नहीं है। निराला इस फूट-नीति का मर्म समझते हैं। यह बात नहीं कि वे दोनों के विरोध से परिचित न हों, अभी उस दिन बंबई के किसी प्रेस रिपोर्टर के पूछने पर कविवर रवीन्द्रनाथ ने हिन्दू-मुसलमानों के झगडे का कारण दोनों का अज्ञान बताया था। (5/157) मुसलमानों की दशा यह थी कि मुसलमान भी अब वे मुसलमान नहीं रहे। एक प्रकार की कट्टरता मूर्खता से मिली हुई रह गयी है। (5/337) मानो यह सौ साल बाद के भारत का चित्रण है! दूसरी तरफ, हिंदुओं हिंदुओं की स्थिति यह है कि, हिंदुओं की संकीर्णता के कारण ही मुसलमान, इस देश में, संकीर्ण हो रहे हैं। इसलिए मुसलमानों को उपदेश देने से पहले हमें अपने ही यहाँ तलाश करके देखना चाहिए कि हमने मुसलमानों के साथ सहयोग करने की कितनी तैयारी की। अवश्य इस प्रश्न के उत्तर में हमें बडी निराशा होगी। (6/383) मानों पाँच सौ साल बाद कबीर दोनों को खरी-खरी सुना रहे हों!
इन सभी संकीर्णताओं को दूर करने के लिए निराला दो तरीके बताते हैं। एक, हिन्दू-मुसलमानों को एक-दूसरे के उत्कर्ष का पूरा-पूरा पता हो। यह उत्कर्ष सबसे अधिक साहित्य में व्यक्त हुआ है। निराला कबीर, तुलसी, सूर, मीर, नज़ीर, गालिब, जयशंकर प्रसाद, ज़ौक आदि की रचनाओं के उदाहरण देकर इस उत्कर्ष का परिचय देते हैं, जिससे यह पता चले कि रीति-रिवाज़ों में हिंदुओं से संपूर्णतः पृथक मुसलमान जाति भी साहित्य और ज्ञान की भूमि में हिंदुओं के समान ही है। (5/157) दूसरा, हिंदुओं और मुसलमानों में विरोध के भाव को दूर करने के लिए चाहिए कि दोनों को दोनों के उत्कर्ष का पूर्ण रीति से ज्ञान कराया जाये। परस्पर के सामाजिक व्यवहारों में दोनों शरीक हों, दोनों एक-दूसरे की सभ्यता को पढें और सीखें। फिर जिस तरह भाषा में मुसलमानों के चिह्न रह गए हैं, और उन्हें अपना कहते हुए अब किसी भी हिन्दू को संकोच नहीं होता, उसी तरह मुसलमानों को भी आगे चलकर एक ही ज्ञान से पसूत समझकर अपने ही शरीर का एक अंग कहते हुए हिंदुओं को संकोच न होगा। (5/335) जिस उच्च भूमि पर दोनों का साम्य प्रतिष्ठित है, निराला उसे वेदान्त का अद्वैत तत्व कहते हैं। कवियों में इस अद्वैत भाव की समानता वे विस्तार से रेखांकित करते हैं।
साहित्य, विचार और सामाजिक व्यवहार, इन सभी धरतालों पर ज्ञान, परिचय और मेल-मिलाप का रास्ता ईश्वर-अल्लाह तेरे नाम वाली भावुक एकता से अधिक गंभीर और स्थायी है। लेकिन दुनिया में कहीं भी पूँजीवादी राजनीति इस रास्ते को नहीं अपनाती। भावुक या आदर्शवादी तरीके से एकता कायम नहीं होती, बल्कि सामाजिक-आर्थिक संकट बढने पर इस अलगाव का उपयोग करना आसान होता है, ताकि जनता का ध्यान भटकाया जा सके। वर्तमान भारत में ही नहीं, पश्चिमी जगत में भी यह बखूबी दिखाई देता हैं। निराला ने ब्रिटिश शासन की जिस नीति की आलोचना की थी, वह आज भी शासकों का आज़माया हुआ नुस्खा है। पूँजीवाद बेरोजगारी, महँगाई, भ्रष्टाचार, लूट और हिंसा की जो समस्याएँ उत्पन्न करता है, उनका समाधान उसके पास नहीं है; संकट जब विस्फोटक रूप लेने लगता है, तब जातिवादी दमन, सांप्रदायिक हिंसा या नस्लवादी उत्पीडन से वह जनता का ध्यान भटकाता है। निराला ने जिस प्रकार सामाजिक समसायाओं के समाधान के लिए सर्वांगीण परिवर्तन का कार्यक्रम प्रस्तावित किया, वह उनकी आधुनिक क्रांतिकारी चेतना का द्योतक है। किसानों का बैंक खोलने, मिलों की पूँजी को सार्वजनिक संपत्ति बनाने, दलितों की शिक्षा-दीक्षा करने, स्त्रियाँ को स्वाधीन बनाने और हिन्दू-मुसलमानों को निकट लाने का जो व्यापक दृष्टिकोण निराला ने प्रस्तुत किया, उसे अनदेखा करके, जहाँ-तहाँ हिन्दू-मुसलमान की पदावली देखकर, जो विचारक निराला को सांप्रदायिकता के खाते में डाल देते हैं, वे न साहित्य समझते हैं, न आधुनिक नवजागरण की प्रक्रिया और न ही निराला का दृष्टिकोण।
लौकिक बोध : यथार्थवाद
नवजागरण-काल के यथार्थवाद के दो पहलू हैं-अध्यात्मवाद से अलग इहलौकिक दृष्टि अपनाना और दैवी चमत्कारों से हटकर लघुता पर ध्यान केन्द्रित करना।
निराला की एक आरंभिक कविता है अधिवास। अधिवास का अर्थ है ब्रह्म, जहाँ मनुष्य शरण लेता है-रुकती है गति जहाँ। 1923 की इस कविता में निराला लिखते हैं-
फँसा माया में हूँ निरुपाय/
कहो फिर कैसे गति रुक जाय?
छूटता है यद्यपि अधिवास,/
किन्तु फिर भी न मुझे कुछ त्रास। (135-36)
निराला ऐसे वेदांती हैं कि ब्रह्म छूट रहा है, माया में फँस गए हैं, किन्तु इसका त्रास नहीं है। ब्रह्म में लीन होने के लिए जिस संसार की माया त्यागनी पडती है, कवि के लिए वही मायामय संसार करुणा और सौन्दर्य का स्रोत है। इस कविता में करुणा का संबंध दुःखी मानवता से जोडते हुए उन्होंने कहा है-
मैंने मैं- शैली अपनायी/ देखा दुखी एक निज भाई।
दुख की छाया पडी हृदय में मेरे/ झट उमड वेदना आयी।
(1/35)
पूँजीवाद के साथ आधुनिक मध्यवर्गीय मनुष्य में जिस व्यक्तिवाद का उदय होता है, उसकी अभिव्यक्ति है मैं-शैली। यह मध्यवर्ग किसान का बेटा और मजदूरों का सहचर है। वह अभी गाँव के किसानो से और शहर के मजदूरों से अलग-थलग नहीं पडा है। यह अस्तित्ववादी अकेलेपन से अलग स्थिति है जब मनुष्य समाज की दूसरी शक्तियों से बेगानापन अनुभव करता है और उन्हें अपने प्रति आक्रामक पाता है। अभी उसका मैं दुखी भाई की वेदना से द्रवित होता है। दोनों में साझेदारी का संबंध है। यह साझेदारी करुणा का आधार है। इस मानव-करुणा के सामने अधिवास का महत्त्व घट गया।
ब्रह्म पहले छूटा, दैवी शक्ति अन्याय से उसके बाद मिली-
अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति!...
आया न समझ में यह दैवी विधान;
रावण अधर्मरत भी, अपना, मैं हुआ अपर...
(1/315)
दैवी-शक्ति दुर्गा हैं, दुर्गा शिव की पत्नी हैं, शिव रावण के उपास्य हैं, इसलिए युद्ध में दुर्गा रावण की रक्षा करती हैं। राम इस स्थिति से क्षुब्ध हैं कि रावण अधर्मरत होकर भी अपना है और राम अपर अर्थात बेगाने हैं। दैवी-दानवी शक्तियाँ एक ओर हैं, मनुष्य के रूप में यह आत्मसाक्षात्कार आधुनिक मानव के आत्मिक अकेलेपन का अनुभव है, जो भक्तिकालीन आधुनिकता का अगला कदम है। दैवीशक्तियों से मोहभंग की परिणति अनास्था में होती है। समाज से बेगनेपन का अनुभव करनेवाले अस्तित्ववाद को हम दोबारा आध्यात्मिक और दैवी शक्तियों की ओर अभिमुख होता देखते हैं। लेकिन निराला ने मोहभंग का चित्रण बारंबार किया है। बिल्लेसुर बकरियाँ पालते हैं, शिव के मंदिर में माथा टेकते हैं, लेकिन अंदर जाकर नहीं, बाहर महावीरजी की मूर्ति पर, ताकि आकारियों को देखते रहें। फिर भी दीनानाथ नामके बकरे को गाँव के बदमाश लडकों ने मार दिया। क्षुब्ध बिल्लेसुर का वर्णन निराला ने इन शब्दों में किया हैर्
गाँव के किनारे आए। महावीरजी का वह मंदिर दिखा। अँधेरा हो गया था। सामने से मंदिर के चबूतरे पर चढे। चबूतरे-चबूतरे मंदिर की उल्टी प्रदक्षिणा करके, पीछे महावीरजी के पास गये। लापरवाही से सामने खडे हो गए और आवेश में भरकर कहने लगे, देख, मैं गरीब हूँ। तुझे सब लोग गरीबों का सहायक कहते हें, मैं इसीलिए तेरे पास आता था, और कहता था, मेरी बकरियों को और बच्चों को देखे रहना। क्या तूने रखवाली की, बता, लिये थूथन-सा मुँह खडा है? कोई उत्तर नहीं मिला। बिल्लेसुर ने आँखों से आँखें मिलाते हुए महावीरजी के मुँह पर वह डंडा दिया कि मिट्टी का मुँह गिली की तरह टूटकर बीघे भर के फासले पर जा गिरा। (4/104)
जिस महावीर के लिए राम की शक्ति-पूजा में निराला ने लिखा था, अर्चना राम की मूर्तिमान अक्षय शरीर, (1/313) उसी महावीर की मूर्ति बिल्लेसुर खंडित कर देते है। यह दैवी-शक्तियों से मुक्ति के संघर्ष में निराला का क्रांतिकारी कदम है।
साधारण श्रमिक जनता के प्रति उनका झुकाव पहले भी था, लेकिन दैवीशक्ति और चमत्कारों से पूरी तरह निराश होकर वे यथार्थवाद की उस भूमि पर पहुँचे जहाँ संघर्ष की वास्तविकता के आगे हर चमत्कार व्यर्थ हो जाता है। लघुता की ओर साहित्यिक दृष्टिपात को जयशंकर प्रसाद ने छायावाद, यथार्थवाद की संज्ञा दी थी और लघुता को व्याख्यायित करते हुए उसे महत्ता के काल्पनिक चित्रण की जगह व्यक्तिगत जीवन के दुःख और अभावों का वास्तविक उल्लेख बताया था। (जयशंकर प्रसाद ग्रंथावली, पूर्वोक्त, खंड-7, पृ.88-89) निराला के लिए अब केवल दृष्टिपात का सवाल न था, उन्हीं से पूर्ण तादात्म्य का विकल्प था। देवी, कुल्ली, चतुरी, झींगुर, महँगू ऐसे ही लोग हैं। इन मनुष्यों के सुख-दुःख निराला के सुख-दुःख से इतने मिल गए हैं कि जहाँ उन्हें फासला दिखता है, वहाँ वे अपना स्वयं उपहास करते हैं, इन मनुष्यों वेदना और संघर्ष को उपहास का विषय नहीं बनाते। जिस पगली देवी की नियति इतनी दुर्दांत है कि इसकी किस्मत पलट नहीं सकती।...सहते-सहते अब दुःख का अस्तित्व इसके पास न होगा। उसे देखकर निराला अनुभव करते हैं, मेरी बडप्पनवाली भावना को इस स्त्री के भाव ने पूरा-पूरा परास्त कर दिया। (4/372) ऐसे ही भाव चतुरी के जीवट के सामने और कुल्ली की पाठशाला में निराला के मन उदित हुए।
रोमान की एक विशेषता है वस्तुजगत को अपने भावों में रँगकर देखना। ये भवनाएँ जब वस्तुजगत से टकराकर बिखरती हैं, तब बाह्य सत्ता उनपर हावी होती है। यह भी रोमान ही है, उसका प्रत्यावर्तित रूप। वस्तुजगत पर आत्मगत भाव हावी हों या आत्मजगत पर बाह्य वास्तविकता हावी हो, दोनों रोमान ही हैं। एक में आत्मगत पक्ष अधिक मुखर होता है, दूसरे में वस्तुगत पक्ष। तटस्थता दोनों का गुण नहीं है, जो यथार्थवाद की पहली शर्त है। इसलिए छायावाद और यथार्थवाद एक-दूसरे के विरोधी भले न हों, छायावादी यथार्थवाद के लिए सही परिभाषा है क्रांतिकारी रोमान। वह बाद को विकसित यथार्थवाद से पृथक है। आलोचनात्मक यथार्थवाद हो या जनवादी यथार्थवाद, उसमें दृष्टिकोण प्रधान है, रोमान में भावना। यह भावना महत्ता से आक्रांत न होकर लघुता से तदाकार होती है, इसलिए पलायलवादी और कल्पनाविलासी नहीं है; विद्रोही और परिवर्तनकामी है। निराला के विकास के दूसरे दौर में, 1930 के बाद, ऐसे वास्तविक चरित्र मिलते हैं, जिन्हें स्थापित महत्ता का विलोम ही नहीं, उपहास कहा जा सकता है। इस उपहास का चरम रूप कुकुरमुत्ता है। पहले के काल्पनिक स्वप्न विलीन हो गये हैं, नए स्वप्न संघर्षों के बीच जन्म लेते हैं और वे साकार हो सकने योग्य संभावना के रूप में हैं, चाहे चतुरी का जमींदारी शोषण से निकलने के लिए कचहरी जाना हो या कुल्ली भाट का अछूत पाठशाला चलाना। जिस तरह पुराने ढाँचे टूटने पर स्वच्छंद कल्पना नवजागरण की देन है, उसी तरह अगली मंजिल पर कल्पना की जगह संभावना की पहचान नवजागरण की ही देन है। निराला के माध्यम से हिन्दी नवजागरण इन दो मंजिलों को पार करता है।
सांस्कृतिक इतिहास से संवाद
संक्रमण की जिस स्थिति में वर्तमान व्यवस्था टूटती है और नयी व्यवस्था बहुत स्पष्ट नहीं होती, उस समय कविगण अतीत पर ध्यान देते हैं, इतिहास से अपना नया संबंध बनाते हैं। स्वप्न यदि अनजाने भविष्य की खोज है, तो इतिहास विस्मृत अतीत की खोज है। यह नवजागरण की सार्वभौम प्रवृत्ति है। इटली में पेत्रार्क, इंग्लैंड में शेली और बायरन तथा भारत में निराला को उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है।
इतिहास का यह स्मरण समाज की मुक्ति के लिए प्रेरणा का काम करता है। मुक्ति का प्रश्न भारत जैसे देशों के लिए ही नहीं, यूरोपीय देशों के लिए भी महत्त्वपूर्ण था। जिस तरह लोकजागरणकालीन भारत में सामंतों की आपसी लडाइयाँ थीं, उसी तरह पुनर्जागरणकालीन यूरोप में विभिन्न राष्ट्रों की लडाइयाँ थीं। पेत्रार्क ने इटली के जिन घावों की बात की थी, वे इन्हीं लडाइयों की देन थे। विल ड्यूरेंट द्वारा रिफॉर्मेशन और रेनेसाँ में किए गए अध्ययन का विश्लेषण करते हुए रामविलास शर्मा ने इस बात की ओर ध्यान खींचा है कि पुनर्जागरण की एक विशेषता यह है कि यूरोप के राष्ट्र निरंतर एक-दूसरे से लडते रहे और इन लडाइयों से महामारी के प्रकोप का संबंध भी था। (भारतीय नवजागरण और यूरोप, पृ.191) अपनी वृहद पुस्तक रेनेसाँ में ड्यूरेंट ने पेत्रार्क की कविता उद्धृत की है-
विक्षिप्तता के विरुद्ध पुरुषार्थ फिर अस्त्र उठाएगा,
और संघर्ष-काल संक्षिप्त ही रहे,
क्योंकि प्राचीन वीरता
इटली की नसों में अभी भर नहीं पायी है।
(रेनेसाँ, 1953, साइमन एंड श्चुस्टर, न्यूयॉर्क, पृ.566)
आक्रांताओं से क्षुब्ध इटली में पुनर्जागरण के आरम्भिक पुरस्कर्ता प्राचीन वीरता को पुनर्जीवित करने का प्रयास करते हैं। इतिहास उनके लिए वर्तमान के संघर्ष की प्रेरणा है, यह बात स्पष्ट होती है।
अंग्रेज़ कवियों ने स्वाधीनता को इतना मूल्यवान समझा कि उसके लिए राष्ट्रवाद को तुच्छ बनाते हुए उन सभी देशों और जतियों की स्वतन्त्रता का समर्थन किया जिन्हें ब्रिटिश व्यापारियों और सामंतों ने गुलाम बना रखा था। इसे साधारण बात नहीं समझना चाहिए कि शेली और बायरन जैसे कवि स्वयं उस अंग्रेज़ जाति के थे जो भारत, यूनान और आयरलैंड पर शासन करती थी, लेकिन अपने सत्ताधारियों के विरुद्ध वे इन देशों और जातियों की स्वाधीनता के मुखर समर्थक, बल्कि प्रचारक थे। विस्तारपूर्वक इन तथ्यों को रामविलास शर्मा की पुस्तिका शेली और माक्र्स में देखा जा सकता है। यहाँ कुछ चुनिन्दा अंश देखना पर्याप्त है। शेली स्वाधीनता के पुनर्जीवन की कामना करते हैं, जो उत्पीडकों से उत्पीडितों के युद्ध का युग होगा और उसमें अंग्रेज जनता भी सचमुच आज़ाद होगी। यह आज़ादी सभी जगहों की श्रमिक जनता को दुनिया भर के बादशाहों से लेनी है क्योंकि ये जो बादशाह कहलाते हैं, जो हत्यारों और ठगों के विशेषाधिकारी गिरोहों के सरगना हैं, इनमें हर-एक सामान्य शत्रु के विरुद्ध दूसरे का मुँह जोहता है।...धरती के समस्त निरंकुश शासक इस गठबंधन के सदस्य से ही हैं। (भारतीय नवजागरण और यूरोप, पृ. 230)
इन निरंकुश शासकों में इंग्लैंड के शासक भी हैं, जिनसे भारत अपनी आजादी के लिए लड रहा था। शेली भारत की स्वतन्त्रता का समर्थन करते थे। आयरलैंड की जनता को सम्बोधन में भारत संबंधी ब्रिटिश नीति की आलोचना करते हुए उन्होंने लिखा था, भारत की विजय से इंग्लैंड ने ज़रूर गौरव कमाया है, लेकिन नेपोलियन ने जो गौरव कमाया था, उससे यह गौरव अधिक सम्मानजनक नहीं है और गरीबों के लिए यह कुछ नहीं है। (उपर्युक्त, पृ.228) वे चाहते थे कि भारतवासी जाति-बिरादरी वाली दासता से मुक्त हों और स्वाधीन होकर अपना विकास करें तथा वे अपने ही साहित्य और कलाओं के तंत्र तक पहुँचें; जिस तक वे पहुँचते यदि वे स्वतंत्र होते। (पृ.229) बायरन ने तो कर्स ऑफ मिनर्वा (1811) कविता में पूरब से गंगा की साँवली जाति के उठने और ब्रिटेन के अत्याचारी साम्राज्य की नींव हिला देने की भविष्यवाणी की तथा सिंधु के प्रवाह को उत्तरी खून (अंग्रेजों के खून) से लाल होते देखा। (पृ.269)
अंग्रेज़ कवियों का स्वाधीनता-प्रेम व्यापक मानववादी चेतना से सम्बद्ध था, राष्ट्रवादी संकीर्णता से नहीं। इसीलिए भारत के स्वच्छंदतावादी कवि अँग्रेजी साम्राज्य का विरोध करते हुए भी अँग्रेजी साहित्य के मानववाद से प्रेरित होते थे। निराला एक तरफ अपनी स्वाधीनता के लिए भारतियों का उद्बोधन करते हैं, शेरों की माँद में आया है आज स्यार और अकर्मण्यता दूर करने के लिए गीता का स्मरण करते हैं, योगयजन जीता है,/ पश्चिम की उक्ति नहीं-/गीता है, गीता है। (निराला रचनावली, 1/141-42) दूसरी तरफ इस भावना को अंध-राष्ट्रवाद से दूर करते हुए सुधा की एक संपादकीय टिप्पणी में लिखते हैं, देश को स्वतंत्र कर लें, फिर विश्व-मैत्री पर सोचा जाएगा; अभी देश स्वतंत्र नहीं हुआ, विश्व-बंधुत्व की आवाज उठाने लगे; देश की सेवा ज़रा मुश्किल है न, विश्व-मैत्री से क्या बिगडता है, आदि-आदि आक्षेप जहर से खाली नहीं; इन भावनाओं के रहते देश-सेवा भी विधिपूर्वक नहीं हो पाती। (5/455)
अपने इतिहास की प्रेरणा और वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय संस्कृति से संबंध एक ही चेतना के प्रतिफलन हैं। देशप्रेम और विश्वमैत्री में विरोध देखने की दृष्टि निरंकुश सत्ताओं और उनके सेवकों की है। जिस तरह देश का प्रेम किन्हीं मूल्यों पर अवलंबित है, उसी तरह विश्वबंधुत्व भी उन्हीं मूल्यों पर आश्रित है। इंग्लैंड के रोमांटिक कवि हों या हिन्दी के छायावादी कवि, वे उन मूल्यों में आस्था रखते हैं, वे देश और विश्व में विरोध मानने की जडता से दूर हैं। विश्वबंधुत्व का आदर्श रखते हुए वे अपनी जातीयता और राष्ट्रीयता के महत्त्व के प्रति सावधान रहते हैं। साहित्य की समतल भूमि वाले निबंध में निराला ने बडी स्पष्टता से कहा है कि सीमा से अंदर घिरकर बंद रहना जिस तरह मनुष्यों की प्रकृति है उसी तरह सीमा के संकीर्ण बंधनों को पार कर जाना भी मनुष्यों की ही प्रकृति है, पहली एकदेशिक है, दूसरी व्यापक। इस बीसवीं सदी में, सभ्यता के विस्तार के साथ मनुष्यों की ज्ञान-लिप्सा भी सीमा-बंधनों को उत्तरोत्तर पार करती जा रही है। साथ ही प्रत्येक भाषा के ऊँचे अंग के साहित्य का दूसरी भाषा से मिलान करके भाषा-संसार में समता-मैत्री की चेष्टा भी की जा रही है। विद्वानों की यह धारणा है कि इस तरह सुविस्तृत संसार सम्पूर्ण क्षुद्रताओं को लिये हुए भी विभिन्न भाषा-भाषियों के लिए वृहत मित्र-मण्डल हो जायेगा। (5/156-57)
एक भाषा-साहित्य का वैशिष्ट्य राष्ट्रीयता अथवा जातीयता का द्योतक है और समता-मैत्री पर आधारित वृहत मित्र-मण्डल भाव मानववादी विश्वबंधुत्व का आदर्श है। शासक देश के मानववादियों के लिए अपनी जाति के सत्ताधारियों का विरोध करके पराधीन जतियों की मुक्ति का समर्थन करना उसी तरह कठिन काम था, जिस तरह पराधीन समाज के कवियों के लिए अंधराष्ट्रवाद का विरोध करके विश्वमैत्री पर चलना। राष्ट्रवादी संकीर्णता यदि जहर है तो अपनी विशेषता गँवाकर विश्वमैत्री स्थापित करना अत्महत्या। अपनी विशेषता जिन माध्यमों से व्यक्त होती है, उनमें जनता का सांस्कृतिक इतिहास सबसे महत्त्वपूर्ण है। निराला ने यह काम केवल इतिहास की घटनाओं और चरित्रों के द्वारा नहीं किया, भारतीय दर्शन, विशेषतः वेदान्त, के द्वारा भी किया। वेदान्त के अद्वैत ने उन्हें मनुष्य की समता और सृष्टि की एकता का सूत्र दिया। जग का देखा एक तार-अपनी विशेषताओं को लिये हुए जिस तरह सारा संसार समता-मैत्री के सूत्र में बँधा है, उसी तरह समाज भी अपनी विविधताओं के साथ एकसूत्र में बँधा है-
बहु सुमन, बहुरंग, निर्मित एक सुंदर हार;
एक ही कर से गुंथा, उर एक शोभा-भार। (1/212)
एकता निराला के लिए एकरूपता नहीं है, विविधताओं का निषेध नहीं है, बल्कि विभिन्न रंगों और फूलों से बना एक सुंदर हार है। इस तरह सारा संसार एकतार में बँधा है। वेदान्त पर उनका गर्व करना उचित था क्योंकि आधुनिक संसार को अद्वैत का दर्शन वेदान्त से ही मिला था। इस अद्वैत के आधार पर वे सामाजिक विभेद से लेकर शोषण-उत्पीडन तक सबके विरोध का दार्शनिक पक्ष निरूपित करते हैं। इस तरह नवजागरण को अधिक व्यापक स्वरूप देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
तर्क और अनुभव की नवीनता
शास्त्रों की बात मानने की जगह अपने विवेक पर भरोसा नवजागरण की सार्वभौम विशेषता है। कबीर कागद की लेखी के स्थान पर आँखन देखी का विश्वास करते थे; तुलसीदास के सबसे प्रिय शब्द मंगल और विवेक हैं। यह लोकजागरण के समय अनुभव और तर्क पर निर्भरता का साक्ष्य प्रस्तुत करता है। जो विद्वान कदम-कदम निराला के समय, और आज भी, शास्त्रों की दुहाई देते हैं, उसे शास्त्रीय पराधीनता की संज्ञा देते हुए अपने विवेक का महत्त्व निराला इन शब्दों में प्रकट करते हैं, शास्त्रों में हर कानून की प्रतिकूलता देख पडती है। सच बोलना चाहिए, पर झूठ कहने के भी अवसर हैं। इस तरह के सविरोध शास्त्रों से यही शिक्षा मिलती है कि मनुष्य को अपनी मेधा के अनुसार ही काम करना चाहिए। यह बात समाज में नहीं देख पडती। (6/135) शास्त्रों की परस्पर-विरोधी शिक्षा के बदले अपनी मेधा का उपयोग-इसी से अनुभव और तर्क के नये गठन की आवश्यकता प्रमाणित होती है।
नया जीवन संदर्भ, नया अनुभव, नया संघर्ष, इन सबके साथ इतिहास की नयी खोज, पुराने दर्शन के आधार पर नयी मनुष्यता की व्याख्या, मतलब यह कि निराला जिस युग में लिख रहे थे, उस युग में न पुराने तर्क बहुत उपयोगी रह गए थे, न पारंपरिक अनुभव से काम चलने वाला था। आकस्मिक नहीं है कि सबसे बढकर निराला ने नवीनता की गुहार लगायी-
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव,
नवल कण्ठ, नव जलद - मंद्ररव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे! (1/211)
नयी गति, नयी लय, नया कण्ठ ही नहीं, विहग-वृंद को नये पंख और नया स्वर भी चाहिए! नवीनता का आग्रह केवल सौन्दर्य-चित्रों के लिए नहीं है, बल्कि हर तरह के अनुभव के लिए है। जहाँ बिलकुल आरंभ में (1921) यह अध्यात्म-फल प्राप्त हुआ हो कि-
जब कडी मारें पडीं, दिल हिल गया। (1/30)
और लगभग अंत में (1952) फिर यह यह पुष्ट हुआ हो कि-
दुख भी सुख का बंधु बना-,
पहले की बदली रचना- (2/427)
वहाँ न पारंपरिक तर्क से काम चलता है, न पारंपरिक अनुभव से। दोनों का नया संबंध-विधान आवश्यक हो जाता है। निर्बाध सुख की खोज मिथ्या है, दुख का घटाटोप अंधकार भी भ्रम है। जीवन दोनों का सह-अस्तित्व है। एक तरफ दुःख ही जीवन की कथा रही, (1/305) दूसरी तरफ ‘दिये हैं मैंने जगत को फूल-फल/ किया है अपनी प्रभा से चकित चल’। (2/84) अतः सुख और दुख का द्वन्द्वात्मक विधान नया बोध है, जिसे निराला एक विचार की तरह प्रस्तावित करते हैं। ऐसा नहीं कि पहले के लोग यह नहीं जानते थे। लेकिन एक तार्किक निष्कर्ष की तरह उसे स्वीकार किया छायावादी कवियों ने।
यह स्वीकृति यथार्थवाद की नयी चेतना से संबद्ध है। जिस तरह सुख और दुख का भाववादी अलगाव यहाँ स्वीकार नही किया गया है, उसी तरह धर्म और पाप का अलगाव भी स्वीकार नहीं किया गया है। निराला संभवतः सबसे मुखर स्वर में जीवन और साहित्य में इस अलगाव का विरोध करते हैं। वे स्पष्ट घोषणा करते हैं कि धार्मिक अनुशासनों में जैसे भी मनोहर मनुष्यों के मनोविकास के कारण हों, मुक्ति का आदर्श धार्मिक बंधनों से परे है। धार्मिक बंधनों को शाश्वत और अपरिवर्तनशील मानने की जगह वे उन्हें लोहे की जंजीरों के समान कठोर मानते हैं, इसलिए जब मनुष्य वृहत सत्य के लिए प्रयत्न करता है, तब ये बंधन टूटते हैं। धर्म मनुष्य के लिए है, मनुष्य धर्म के लिए नहीं, इस आदर्श को सामने रखकर निराला कहते हैं, मुख को पाप की सियाही जिस तरह रंग देती है, मनुष्य का यथार्थ रंग नहीं देख पडता, उसी तरह धर्म की सफेदी भी रंग देती है। दोनों से हटकर वे आईने की तरह साफ दृष्टि का समर्थन करते हैं, जो सब रंगों को उनके असली रूपों में देखती है। पाप और धर्म के काल्पनिक विश्वास का विकल्प है प्रकृति, जो स्वच्छंद काव्य का सार्वभौम विश्वास है, अतः यह सत्य है कि प्रकृति ही प्रकृति का आदर्श है। (5/486-87)
पाप और धर्म से अलग मनुष्य को उसके सहज मानवीय (प्राकृतिक) रूप में देखना पारंपरिक विश्वास को ठुकराकर अनुभव और तर्क के नए संबंध-विधान का परिणाम है। यह नया संबंध-विधान पारंपरिक संस्कारों के लिए अग्राह्य है, बहुत कुछ रहस्यात्मक। लेकिन इसका आधार प्रकृति है और कला प्रकृति के साथ चलती है, धर्म के साथ नहीं। निराला के समय भी अनेक साहित्यकार सत्तसाहित्य का समर्थन करते थे। इनमें प्रेमचंद भी थे। उनके अदर्शवाद से असहमति व्यक्त करते हुए निराला ने इसी निबंध में कहा, केवल सत्त-सत्त लिखने से सृष्टि अधूरी रह जायगी, दूसरों को वह कभी जँच नहीं सकती, उसमें कला का अभाव रहेगा। इसीलिए सृष्टि की तरह, भले और बुरे के मिश्रण से ही साहित्य की उत्पत्ति होती है। (5/487) कहने की आवश्यकता नहीं कि धर्म को अपदस्थ करके प्रकृति के आदर्श पर मनुष्य और कला के प्रतिमान रखने की यह प्रेरणा आधुनिक विज्ञान की खोजों से संबद्ध है, जिसे निराला दार्शनिक स्वरूप देते हैं। निसंदेह उनके दर्शन का आधार वेदांत है, किन्तु वे ऐसे वेदांती हैं जो प्रकृति और कला के लिए शुद्ध वेदांत को छोडकर जीवन की द्वन्द्वात्मक गति का समर्थन करते हैं। वेदांत का लक्ष्य है अद्वैत, द्वंद्व इस अद्वैत के विपरीत है। अपनी बात स्पष्ट करने के लिए निराला हिन्दू धर्म की दोनों प्रमुख व्याख्याओं, सनातनी और आर्यसमाजी, को वास्तविक सत्य से दूर बताने में नहीं झिझकते, पर सनातनी और आर्यसमाजी दोनों पुराणों और वेदों के यथार्थ साहित्य से दूर हैं। क्योंकि दोनों के शब्द अपने-अपने साहित्य के विज्ञापन के शब्द हैं। (5/488) इस तरह विज्ञान-सम्मत दर्शन का नया ढाँचा नये स्वच्छंद मनुष्य के साथ प्रतिष्ठित होता है। यह विज्ञान-सम्मत दर्शन किसी विचार या पूर्वाग्रह का विज्ञापन नहीं है, संसार की वस्तुगत प्रकृति की व्याख्या का प्रयत्न है।
एक तो नये मध्यवर्ग की नयी अनुभूतियों को व्यक्त करने वाली भंगिमा, दूसरे तर्क और अनुभव का नया संगठन-दोनों मिलकर एक भिन्न प्रकार का ढाँचा प्रस्तुत करते हैं। इस नये सामाजिक वर्ग-मध्यवर्ग-की दृष्टि और अनुभव के कुछ स्रोत परंपरा में अवश्य हैं, लेकिन अभिव्यक्ति-प्रणाली नहीं है। यह नया अनुभव और तर्क पारंपरिक संस्कारों के लिए अबूझ रहस्य की तरह है। इसलिए कवि जहाँ संसार के नये रहस्यों की खोज करता है, वहाँ बहुत-से लोगों को रहस्यवाद मालूम होता है। कौन तम के पार?-(रे, कह) ऐसा ही गीत है। यह सृष्टि के विकास का रूपक है लेकिन अपने वस्तु-गठन के कारण रहस्यात्मक प्रतीत होता है। (1/240-41) आकाश आदि तत्व है, वह तम से आवृत है; शक्ति के प्रभाव से तम अपना रूप परिवर्तित करता है, तब यही तम गगन से घनधार बनकर जगत पर बरसता है। यह सृष्टि के निर्माण का निराला का दर्शन हैर् सृष्टि के आरंभ में अंधकार है, वह अंधकार आकाश में है, अंधकार ही रूप बदलकर बादल बनता है और जल की वृष्टि करता है, जल से सृष्टि आरंभ होती है। इसीको निराला का प्रकृति वेदान्त कहा गया है। निराला इस दर्शन से वसंत और श्रृंगार का रूपक जोड देते हैं-निशा में तम भेद सुनयन,/ अस्त-दल ढक पलक-कल तन,/निशा-प्रिय-उर-शयन सुख धन-सूर्योदय के साथ सुंदर आँखें खुलती हैं और फिर शाम को कमल-दल (जैसी आँखें) बंद होती हैं; निशा ने प्रिय के हृदय पर शयन-सुख पाया है। इसमें रहस्यवाद कुछ नहीं है। लेकिन सृष्टि के आरंभ का दर्शन और श्रृंगार की अनुभूति संश्लिष्ट होकर इस तरह आये हैं कि वह अपने समय के विचारकों को अबूझ लगता था। दर्शन और श्रृंगार का यह संश्लेष अनुभव और तर्क के नयेपन का एक पक्ष है।
भक्तिसाहित्य के बाद छायावाद से पहले सृष्टि और मानव-जीवन के गूढ पक्षों का विवेचन करने की आवश्यकता कवियों को नहीं हुई। निराला ने इन प्रश्नों के साथ-साथ मनुष्य और समाज के व्यावहारिक प्रश्नों पर भी नयी दृष्टि से विचार किया। एक ओर वे वेदांत के आधार पर सृष्टि और मनुष्य की एकता स्थापित करते हैं, दूसरी ओर ज्ञान-साधना से अर्थ-साधना को जोडते हैं। उनके लिए भारत का अर्थ है ज्ञान।(10) स्वाधीनता का अर्थ भी ज्ञान ही है।(11) जीवन के उन्नयन के लिए जितनी ज्ञान की आवश्यकता है, जीवन के निर्वाह के लिए उतनी ही आवश्यकता आर्थिक साधनों की है। गीतिका में लक्ष्मी का उद्बोधन करते हुए उन्होंने लिखा हैर्
जागो जीवन-धनिके!/ विश्व-पण्य-प्रिय वणिके! (1/242)
प्राचीन भारत के वैश्विक व्यापार को याद करके वर्तमान समय के लिए लक्ष्मी को विश्व-पण्य-प्रिय कहा गया है। ये लक्ष्मी ही निराला की सरस्वती हैं :
गह कर अकल तूलि, रंग-रंगकर/
बहुजीवनोपाय भर दो घर,
भारति, भारत को फिर दो वर/
ज्ञान - विपणि - खनि के। (1/242)
हाथ में तूलिका लेकर घर को बहुजीवनोपाय के रंगों से भर देने वाली सरस्वती जैसे ज्ञान से भर देती हैं, वैसे ही खनिजों से भी भर देती हैं। ज्ञान-साधना के साथ अर्थ-साधना का यह संबंध भी नया विधान है। तर्क और अनुभव का यह ढाँचा निराला के समकालीन अध्यात्मवादियों के लिए ही नहीं, आज के अनेक राष्ट्रवादियों के लिए भी अग्राह्य है।
जैसे विश्व-पण्य जनता ले लिए है, वैसे ही वैज्ञानिक साधन भी जनता के लिए हैं-
नये गीत, नये वाद विच्छुर,/ नये यान, यात्री नये-नये,
नये प्राण, नयी रेल-पेल के,/ वैज्ञानिक साधन सबके लिए। (2/459)
जीवन धनिके वाला गीत सरोज की मृत्यु से पहले का है, वैज्ञानिक साधन सबके लिए गीत 1956 का है। सरोज की मृत्यु ने उन्हें आर्थिक समर का महत्त्व समझा दिया था, उसके बाद वे छायावादी कल्पना के लोक में वापस नहीं जा सके। लेकिन इस विकास की कुंजी उनके जीवन दर्शन में है, जिसका विकास छायावादी दौर में हुआ था। इसलिए छायावादी कवियों का रोमान जीवन से विमुख किसी असंभव आदर्श की उपासना नहीं करता। यह उनके नवजागरण की चेतना का सशक्त प्रमाण है।
निराला के समय ही नहीं, हमारे समय में भी न आर्थिक साधन सबके लिए हैं, न वैज्ञानिक साधन। जिनके पास अर्थशक्ति है, उन्हीं के पास विज्ञान और संचार के साधन हैं। 1946 में निराला के महगू ने कहा था,अखबार व्यापारियों की ही संपत्ति हैं। (2/199) इस स्थिति में अब भी परिवर्तन नहीं हुआ है, बल्कि संचार साधनों पर व्यापारिक नियंत्रण अधिक कठोर हो गया है। निराला आर्थिक साधनों की तरह वैज्ञानिक साधनों और संचार साधनों को भी जनता के अधिकार-क्षेत्र में लाने का प्रस्ताव करते हैं। बेला की प्रसिद्ध गज़ल है-
भेद कुल खुल जाय वह/ सूरत हमारे दिल में है।
देश को मिल जाय जो/ पूँजी तुम्हारी मिल में है। (2/161)
राष्ट्रीय शिक्षा का इतिहास (लेखक- कन्हैयालाल) पुस्तक की समीक्षा करते हुए 1930 में निराला ने शिक्षा की सार्वभौमिक पराधीनता पर क्षोभ व्यक्त किया था। (12) फिर पाँच साल बाद उन्होंने 1935 में इंदौर के प्रस्तावित हिन्दी विश्वविद्यालय को उस पराधीनता से मुक्ति के लिए एक साधन बनाने का सुझाव दिया था। (13) इस प्रकार, शिक्षा में हिंदीभाषी समुदाय के लिए साहित्य, कला, विज्ञान, वाणिज्य, विधि सभी ज्ञानशाखाओं को हिन्दी के माध्यम से सुलभ करने से लेकर आर्थिक, वैज्ञानिक और संचार के साधनों को सार्वजनिक अधिकार में लाने तक, निराला का दृष्टिकोण व्यापक है। आधुनिक नवजागरण की चेतना का यह विस्तार उन्हें सीमित अर्थ में साहित्यकार के दायरे से निकालकर समाज-चिंतक के व्यापक धरातल पर प्रतिष्ठित करता है।
टिप्पणियाँ-
1.
महान पुनर्जागरण का परिचय देते हुए एंगेल्स ने प्रकृति की द्वंद्वात्मकता पुस्तक में लिखा है- यह वह युग था, जिसका उदय 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ था। राजशाही ने नगरों के बर्गरों के समर्थन से सामंती आभिजात वर्ग की सत्ता चूर कर दी और मूलतः जातीयता पर आधारित उन महान राजतंत्रों की स्थापना की, जिनके अंतर्गत आधुनिक यूरोपीय राष्ट्र एवं आधुनिक बूर्जुआ समाज विकसित हुए। और जिस समय बर्गरों और सामंती अभिजातों की लडाई चल रही थी, उसी समय जर्मनी में किसान-युद्ध ने रंगमंच पर विद्रोही किसानों को ही नहीं-यह अब नयी बात नहीं रह गयी थी-बल्कि उनके पीछे-पीछे हाथों में लाल झण्डा और लबों पर संपत्ति के साझे स्वामित्व का नारा लिये सद्यः विकसित हो रहे सर्वहारा को भी उतार कर मानो आनेवाले वर्ग संघर्षों का पूर्वाभास दे दिया। बाइजंतिया के विध्वंस से बचायी गयी पाण्डुलिपियों ने, रोम के खंडहरों से निकाली गयी प्राचीन एवं अनोखी मूर्तियों ने आश्चर्यचकित पश्चिम को एक नयी दुनिया के, प्राचीन यूनान की दुनिया के दर्शन कराए। इस दुनिया की जाज्वल्यमान प्रतिभाओं के आगे मध्ययुग के प्रेत छूमंतर हो गए।
2.
राम कहते हैं-
यद्यपि सब बैकुंठ बखाना।
वेद पुरान विदित विधि नाना।।
मोहि अवध सम प्रिय नहिं सोऊ।
यह प्रसंग जानै कऊ कोऊ।।
और स्वयं तुलसी एक कवित्त में लिखते हैं-
भलि भारत भूमि भले कुल जन्म, समाज सरीरु भले लहि कै।
3.
(क) डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है- सुर्जकुमार (सूर्यकुमार) आठ पहर में आधे समय स्वप्न-लोक में रहते और आधे समय प्रत्यक्ष संसार में। जिस स्वप्न-लोक में वह महावीर-प्रेमानन्द-मनोहरादेवी को देखते थे, उससे प्रत्यक्ष संसार एकदम भिन्न था। आए दिन प्रजा के उत्पीडन के बारे में कोई-न-कोई कथा सुनने को मिलती थी। एक दिन उन्होने सुना, नहर के किनारे किसी गाँव के पुजारी को राजा के सिपाहियों ने मारा है। राजा किश्ती पर हवा खाने निकले थे। साथ में कुछ पहलवान और सिपाही थे। कुछ सिपाही नहर के किनारे-किनारे नाव के साथ दौडने लगे। अचानक उन्होंने देखा, एक पुजारी नहर के किनारे खडा हुआ राजा को देखकर मुँह से अजीब-सी आवाज कर रहा है। जब राजा की निगाह उस तरफ गयी, तो उसने पेट खलाकर हाथों से उसे मला, यानी वह भूखा है, यह बता दिया। फिर मुँह थपथपाया और हवा में दोनों हाथों के अँगूठे हिलाए, जिसका मतलब था कि कोई सुनवाई नहीं, खाने को कुछ नहीं है।
राजा ने किश्ती की रफ्तार धीमी करा दी। कुछ दूर पुजारी साथ दौडा। तब तक पीछे से सिपाही भी आ पहुँचे। राजा का इशारा पाकर सिपाहियों ने पुजारी को पकड लिया। कहा, ठेंगा दिखाता है हमारे महाराज को? उसे खूब मारा, फिर उसकी दोनों हथेलियाँ और उँगलियाँ लाठी के गूले से कुचल डालीं। (निराला की साहित्य-साधना, भाग-1, 1969; राजकमल, तृतीय संस्कारण, 1979, पृ.38)
(ख) निराला ने कहानी में इसका वर्णन कुछ विस्तार से किया है कि बंगाल-उडीसा को जोडने वाली नहर के किनारे पद्मदल नामकी राजधानी है। जेठ के महीने में एक शाम वहाँ के राजा साहब खुली छतवाली एक अग्रेज़ी कट की देशी किश्ती पर सैर को निकले। डेढ मील के फासले पर शक्तिपुर नामका गाँव है। वहाँ का विश्वंभर भट्टाचार्य शक्तिपुर से तीन कोस दूर रंगनगर में विशालाक्षी देवी के मंदिर राज्य की ओर से पुजारी था। तीन रुपया महीना और रोज़ पूजा के लिए तीन पाव चावल और चार केले पाता था। घर में पाँच आदमी खानेवाले हैं। बडे दुःख के दिन होते हैं। इधर बीस महीने से उसे वेतन नहीं मिलता। केवल तीन पाव चावल का सहारा रहा। यह देखकर कि राजा साहब हवाखोरी करते हैं, उसने फरियाद करने का निश्चय किया। जब शक्तिपुर के पास किश्ती पहुँची, तब सिपाही तीन-चार फलाँग पीछे थे। विश्वंभर राजा साहब की ताक में खडा ही था; जब किश्ती आती हुई सौ गज फासले पर रह गयी, तब उसने एक अद्भुत प्रकार की ध्वनि की, जिससे राजा साहब का ध्यान आकर्षित हो। राजा साहब की ओर कोंचा, फिर पेट खलाकर दोनों हाथों को मरोडा, फिर दाहने हाथ से मुँह थपथपाया, फिर दोनों हाथों के ठेंगे हिलाकर राजा साहब को दिखाया। सिपाही अभी दूर थे। राजा साहब ने किश्ती धीमी की। बाँध पर हवाखोरी करनेवाले लोग यह नजारा देख रहे थे। सिपाहियों ने नजदीक आकर एक अनजाने को बेअदबी करते देख, राजा साहब की तरफ देखा। राजा साहब ने सिर हिलाया। सिपाही विश्वंभर को पकडकर प्रहार करने लगे। किश्ती लौट चली।
सिपाहियों ने आते हुए विश्वंभर की मुद्राएँ देखी थीं, जिसका अर्थ समझने में उन्हें देर नहीं हुई। उसे मारते हुए कहने लगे, क्यों रे...हमारे महाराज रिआया की आवाज बंद करते हैं?-पेट भी भरते हैं?-ठेंगा दिखाता है हमारे महाराज को, इतना भी नहीं समझता?
विश्वंभर को पीटकर दोनों गदोरी और उँगलियाँ कुचलकर सिपाही चले गए। (निराला रचनावली, भाग-4, 1983, राजकमल, पृ.387-389)
4.
चतुरी चमार डाकखाना चमियानी, मौज़ा गढाकोला, जिला उन्नाव का एक कदीमी वाशिंदा है। मेरे ही नहीं, मेरे पिताजी के, बल्कि उनके भी पूर्वजों के मकान के पिछवाडे, कुछ फासले पर, जहाँ से होकर कई मकानों के नीचे और ऊपरवाले पनालों का, बरसात और दिन-रात का शुद्धाशुद्ध जल बहता रहता है, ढाल के कुछ ऊँचे एक बगल चतुरी चमार का पुश्तैनी मकान है। (1934; निराला रचनावली, खंड-4, पृ.379)
5.
वंशज हो-चेतन अमल अंश,
हृदयाधिकारी रवि-कुल-मणि रघुनाथ के। (1/145)
6.
किन्तु हाय! वीर
राजपूतों की
गौरव-प्रलंब ग्रीवा
अवनत हो रही है आज तुमसे महाराज,
मोगल-दल-विगलित-बल
हो रहे हैं राजपूत...(1/146)
7.
(क) दोनों लोक कहेंगे,
होता तू जानदार,
हिंदुओं पर हरगिज तू
कर न सकता प्रहार। (1/147)
(ख) लूँ गर तलवार,
तो धार पर भेगा खून
दोनों ओर हिंदुओं का, अपना ही। (1/149)
(ग) और भी कुछ दिनों तक
जारी रहा ऐसा यदि अत्याचार, महाराज,
निश्चय है, हिंदुओं की
कीर्ति उठ जाएगी-
चिह्न भी न हिन्दू सभ्यता का रह जाएगा। (1/145)
(घ) यदि तुम मिल जाओ महाराज जसवंतसिंह से,
हृदय से कलुष धो डालो यदि,
एकता के सूत्र में
यदि तुम गुँथो फिर महाराज राजसिंह से,
निश्चय है,
हिंदुओं की लुप्त कीर्ति
फिर से जग जायगी। (1/155)
8.
कर्षण-विकर्षण-भाव
जारी रहेगा यदि
इसी तरह आपस में,
नीचों के साथ यदि
उच्च जतियों की घृणा
द्वंद्व, कलह, वैमनस्य
क्षुद्र ऊर्मियों की तरह
टक्करें लेते रहे तो
निश्चय है,
वेग उन तरंगों का
और घाट जाएगा-
क्षुद्र से क्षुद्रतर होकर मिट जायेंगी,
चंचलता शांत होगी,
स्वप्न-सा विलीन हो जाएगा अस्तित्व सब,
दूसरी ही कोई तरंग फिर फैलेगी।
चाहते हो क्या तुम
सनातन-धर्म-धारा शुद्ध
भारत से बह जाय चिरकाल के लिए। (1/156-57)
9.
तिलक पर निराला की यह कविता रचनावली में संकलित नहीं है, किन्तु मुझे दिनेश शर्मा (पुस्तक-संग्रही) ने उसकी जेरोक्स प्रति दी थी।
10.
निराला के वर्तमान धर्म पर साहित्यिक सन्निपात का आक्षेप करते हुए पं. बनरसीदास चतुर्वेदी ने उनमें मस्तिष्क विकार का अभियान चलाया। इस अभियान का क कारण रहस्यवाद के प्रति उनका आग्रह था। इस अभियान का जवाब देते हुए साहित्यिक सन्निपात या वर्तमान धर्म लेख में निराला ने भारत की मूल संस्कृति को रहस्यवाद से जोडा और उसे पुराणों की व्याख्या से अलग किया। कलकत्ता के साहित्य सम्मेलन में अपने भाषण का उल्लेख करते हुए कहा, ...तमाम आर्य-संस्कृति रहस्यवाद पर प्रतिष्ठित है-रामायण, महाभारत रहस्यवाद के ग्रंथ हैं, सब ऋषि-कवि रहस्यवादी थे, रहस्यवाद ही सर्वोच्च साहित्य है। अदिति को पुराणों में एक सीमा में रख दिया है, वह केवल देवताओं की माता हैं। (6/156-57) रहस्यवाद सर्वोच्च साहित्य ही नहीं, सर्वोच्च ज्ञान भी है, वह निराला के लिए भारत की ज्ञानमय अवस्था का द्योतक है, धर्म, धृति या श्रद्धा शिक्षा की जननी है। भारत अपने नाम से ही धर्मात्मा है। इसलिए भारत की सीमा जैसी भी लकीरों से निश्चित की जाय, वह असिद्ध है, ज्ञान के द्वारा। (6/158) अदिति, रहस्य, ज्ञान, सब निस्सीमता के बोधक हैं; भारत इसी निस्सीमता का पर्याय है। उसे पुराणों ने सीमा में बाँधा। अपनी प्रकृत अवस्था में भारत इसी निस्सीमता अर्थात ज्ञान का परिचयक है। अपने उक्त सूत्र की टीका करते हुए निराला ने लिखा, संस्कृत में भारत भरत से बना है (भरं तनोति, तं+ड), पर भारत का अर्थ मैंने किया है-भाः+रत (भासि रतः), जो ज्ञान में रमा हुआ है। इसलिए वह अपने नाम से ही धर्मात्मा है। ऐसे भारत को कोई सीमा द्वारा नहीं बाँध सकता। जहाँ सीमा है, वहाँ ज्ञान नहीं। सीमा ही बंधन और अज्ञान है। (6/158)
11.
यदि एक ही शब्द में स्वाधीनता की परिभाषा की जाय, वह ज्ञान ही होगा। (6/275)
12.
पर विश्वविद्यालय क्रमशः जिस अधिकता से छत्रों की संख्या बढाने लगे, उतनी ही अधिक माँग सरकार या मर्चेन्ट-होसों में न रह गयी। क्रमशः अकर्मण्य पंडितों की संख्या बढने लगी। साइंस के मास्टर केवल किताबों के ज्ञान में बँधे रह गए। साधनों के अभाव से देश की तथा अपनी तरक्की के लिए नये-नये अवष्कर न कर सके। अतः शिक्षा का सदुपयोग नहीं हुआ। डॉक्टर भी इसी तरह विदेशी यंत्रों तथा दवाओं के बेचनेवाले पैदा होने लगे।...इंजीनियर एंजिन तैयार करने के लिए नहीं, साफ करने के लिए होते गए। वकील उसी तरह कानून की सत्ता पर विचार करने, उसकी उपयोगिता की वृद्धि के लिए नहीं, कानूनों को रटकर अभियोग के दिशा-निर्देश के लिए हुए। इस प्रकार शिक्षा की सार्वभौमिक पराधीनता रही। (6/520)
इसमें संदेह नहीं कि नब्बे साल बाद यह स्थिति नहीं है। आजाद भारत ने शिक्षा के इन सभी क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण प्रगति की है। किन्तु विश्वविद्यालयों के निजीकरण के साथ न केवल विदेशी विश्वविद्यालयों का प्रवेश तेज़ी से हो रहा है, बल्कि पाठ्यक्रम और पाठ्यसामग्री में भी नयी पराधीनता बढ रही है। यह सब आत्मनिर्भरता के नामपर हो रहा है, जिसे आज़ादी के बाद विकसित आत्मनिर्भर प्रणाली को ध्वस्त करके लागू किया जा रहा है। इसलिए निराला की चिंता एक शताब्दी बाद फिर प्रासंगिक हो गयी है।
13.
इंदौर का हिन्दी विश्वविद्यालय लेख में निराला ने सुझाव दिया था- इस विश्वविद्यालय के लिए सोची हुई सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यहाँ केवल साहित्य की ही नहीं, किन्तु व्यावसायिक, यात्न्तृक तथा कलात्मिका शिक्षा भी हिन्दी के द्वारा दी जाएगी। हिन्दी के माध्यम से इंजीनियरिंग तथा डॉक्टरी की शिक्षा की व्यवस्था करने पर यह विश्वविद्यालय भारत में अद्वितीय होगा, इसमें संदेह नहीं। (6/470) लगभग साठ साल बाद वर्धा में स्थापित हिन्दी विश्वविद्यालय ने इस दिशा में क्या कार्य किया है, यह स्वतंत्र विवेचन का विषय है। जहाँ तक उसकी परिकल्पना और पाठ्यक्रम का सवाल है, भाषा और पत्रकारिता के अलावा समाज-विज्ञान के कुछ विषय वहाँ अवश्य है, मेडिकल, इंजीनियरिंग और कानून का प्रवेश नहीं है। क्या इसके बिना देश आत्मनिर्भर हो सकता है, यह विचारणीय है।
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