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देवनागरी लिपि : कुछ अद्यतन सुधार

लीलाधर जगूडी
जब देवनागरी लिपि को देखते हैं, तो उसके अक्षरों की ध्वनियों को सुनते हैं, तब अनुमान और आभास होने लगता है कि किस तरह उन्हें उकेरा गया होगा। मुँह और कण्ठ से निकली हुई ध्वनियेां को जीभ ने एक से एक मोड दिए और उन्हें लिपि बनाने वाले ने सुना और गिना होगा।
भारतीय भूगोल में अ और आ की ध्वनि सबसे पहली मानवीय और आत्मीय ध्वनि के रूप में जानी गयी होगी। रोमन लिपि में सबसे पहले लगता है कि - हे और हेलो को ए से भी पहले पहचान लिया गया होगा। लेकिन जम्बूद्वीप, आर्यावर्त में आ-ऐ, औ और ओ को पहली संबोधन ध्वनि का दर्जा प्राप्त हुआ होगा। रोमन में ऐ ई औ ध्वनि बोली नहीं जाती, इसलिए लिखी भी नहीं जाती।
कोई भी शब्द ध्वनि, किसी भी भूगोल के रहने वाले मनुष्य के आंतरिक और बाहृ अनुभव से आवेशित होकर ध्वन्याकार ग्रहण कर पाता होगा। ओम् की ध्वनि को ही लीजिए। ऐसा लगता है कि कण्ठ प्रदेश से निकली आवाज को होठों को सिकोडकर पहला प्राकृतिक वाद्य व्यक्ति के हाथ लगा होगा। को के भी कईं ध्वनि रूप और अपररूप स्थापित होंगे। जिनमें ओ हो हो, हा हा, ही ही इत्यादि उत्साहवर्धक और खुद की उपस्थिति देने वाली कई ध्वनियाँ है। हाँ हाँ, ना ना, तू तू, मैं मैं कई अन्य ध्वनि रूप भी हैं। व्याकरण में भी कर्ता कर्म इत्यादि के अलावा संबोधन कारक का वाणी व्यापार में अलग महत्त्व है। अंग्रेजी में संबोधन के लिए रे ध्वनि नहीं है। इसीलिए उन्होंनें अब अरे को अपना लिया है।
ध्वनि अर्थात् आवाज के तरंगित रूप को लिखित रूप में स्थायीत्व देने, उसे तराशने और उसे परिष्कृत करने में मनुष्यों की कईं पीढियों का योगदान रहा होगा। क्योंकि देवनागरी जैसी वैज्ञानिक लिपि के संदर्भ में कह सकता हूँ कि यह जो वर्तमान रूप उसे प्राप्त हुआ है, वह ईसा पूर्व पाँच-छह हजार वर्षों की निरंतर मेहनत से प्राप्त हुआ है। इन अक्षरों की ढलाई और पारिवारिक गणित को संगठित करने में सदियों की तपस्या का विशेष हाथ है।
श्रुति, ध्वनियाँ तो वैदिक काल से ही अस्तित्व में आ गयी थीं, लेकिन उनके लिखित आकार बनते-बिगडते रहे। वैदिक काल में उच्चारित ध्वनियों के साथ हाथ से उनके स्वरों-व्यजंनों को भी हवा में आभासीय आकार दिया जाता था। यह शब्द के उच्चारण के आरोह-अवरोह, उदात्त, अनुदात्त और स्वरित उच्चारण अवस्था का स्मृति में अंकन करता था।
सबसे पहले लिपि कईं शोधों और प्रयोगों से गुजरी होगी। तभी वह कोई सुनिश्चित रूप ग्रहण कर पायी होगी। देवनागरी लिपि ने ध्वनियों के अविकल अंकन में अनेक तरह के प्रभावों और रूपाकारों को समेटा है। चूंकि गणितीय अंकों और संख्याओं के आकलन का आविष्कार भी सबसे पहले भारत में हुआ है, इसलिए ध्वनियों के गणितीय रूप की भी जानकारी यहाँ के शोधार्थियों को अधिक रही होगी। ध्वनियों के रूपांकन में काल गणना के साथ उच्चारण साम्यता का भी आग्रह काम करता रहा होगा। ध्वनियों का अक्षरांकन और वर्णों को तराशने की बहुत बडी मानसिक वेधशाला, उन लोगों को अपनी स्मृतियों के आधार पर पीढियों तक चलानी पडी होगी। कहीं-कहीं तो उस में आकृति विज्ञान और पारिवारिक डी.एन.ए. के हिसाब से भी दो-एक स्थलों पर आज भी शोध-सुधार की आवश्यकता है।
बोलना आज भी सरल लगता है, लेकिन लिखना कष्ट साध्य समझदारी और बहुत-सी बारीकियाँ सीखने के बाद आता है। इसीलिए बोलने को बोली और लिखने को भाषा कहा गया है। यह विभाजन भाषा वैज्ञानिकों ने किया है। भाषा अनुभवों की पुनर्रचना भी करती है और भाषा, अनुभव और प्रतीतियों को भाषित भी करती है। लिखित भाषा का पुनर्भाषित होना पुनर्रचित होने की श्रेणी में भी रखा जा सकता है और रखा जाता है।
छान्दस भाषा अर्थात वैदिक भाषा के विकास या रूपान्तरण को पाणिनी ने वैज्ञाानिक दृष्टि से देखा और समझा। पाणिनी का जन्म गान्धार के शालातुर (आधुनिक कटक नगर के समीप लाहोर गाँव) में हुआ। इनकी शिक्षा तक्षशिला में हुई थी। पाणिनी का उदयकाल पाँचवी शती ई.पू. माना जाता है। उन्होंनें अपने व्याकरण में साहित्यिक संस्कृत को हमेशा के लिए नियमबद्ध अथवा सूत्रबद्ध कर लिया।
लेकिन आश्चर्य और शोध इस बात के लिए होना चाहिए कि वर्णमाला जब उच्चारणों में मौजूद रही होगी और उन्हें प्रत्येक ध्वनि के लिए संकेत अक्षरों में ढाला गया होगा, तब जो स्थिति बनी होगी, उसका कोई दस्तावेज हमारे पास नहीं है। लिपि की खासकर देवनागरी लिपि के स्वर और व्यंजनों की आत्मकथा अगर लिखनी हो, तो वर्णमाला ही एक मात्र दस्तावेज हमारे पास है।
ऐसा लगता है कि प्रत्येक अक्षर को मुखविवर में से अपनी उत्पत्ति की जगह से, ध्वनि रूप में बाहर आने में जो लयात्मक आकार, शरीर के ऐन्द्रिक कोशिशों से प्राप्त करने पडते हैं, उन्हें मूर्त करने और विज्ञान सम्मत बनाने में कई पीढियाँ लगी होंगी।
देवनागरी लिपि के अंतिम प्रांजल के रूप में जब हम अक्षरों को देखते हैं, खासकर उनकी बनावट को देखते हैं, तो उनकी ढलाई, या कि निर्मिति को देखकर आश्चर्य होता है।
देवनागरी लिपि के अक्षरों के उत्पत्ति स्थल मुख के अंदर की कण्ठ से लेकर नासिका और ओष्ठ तक निर्धारित किए गए हैं। मुँह के भीतर सारी ध्वनियों के उत्पत्ति स्थल तय किए गए हैं।
सबसे पहले तो हमारे भाषा और ध्वनियों के लिखित रूप पर काम करने वाले पूर्वजों ने यह तय करने में अनोखा परिश्रम किया कि मुँह, कण्ठ, नाक और होठों से कितनी ध्वनियाँ निकल सकती हैं। तब जाकर उन्होंने 12 स्वर ध्वनियों के उच्चारण स्थल सुनिश्चित किए। - (अ, आ, इ, ई, ऋ, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं)। व्यंजन ध्वनियों के पाँच-पाँच अक्षरों वाले पाँच परिवार सुनिश्चित किए, जिन्हें क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग तथा प वर्ग कहा गया। ये व्यंजनों के पाँच-पाँच अक्षरों वाले पाँच परिवार कहलाते हैं। जो व्यंजनाक्षर इन परिवारों से बाहर के हैं, वे हैं - य, र, ल, व, श, ष, स, ह। इनके अलावा संयुक्त व्यंजनाक्षर भी हैं - क्ष, त्र, ज्ञ।
दुनिया की किसी भी मुख आधारित भाषा में इनसे अधिक ध्वनियाँ नहीं निकलती। 12 स्वर ध्वनियाँ 36 व्यंजन ध्वनियों के परिवारों को अपनी दृढता से जीवन प्रदान करती हैं और उनमें से प्रत्येक को 12 से गुणा करके उनकी ध्वनियों को लिख लेती हैं। लिखने वाली लिपियों में अक्षरों के चाहे जो आकार हों, लेकिन ध्वनियाँ उनकी इतनी ही हैं।
अक्षरों की उत्पत्ति मनुष्य की उस लालसा से हुई है जिसे हर गतिविधि को साकार और स्थाई, मूर्तता में देखने की प्रबल आकांक्षा कहते हैं। पहले कैमरा तो था नहीं। बस किसी भावना और विचार को मूर्त करने के लिए रेखांकन और चित्रकला का सहारा था। जो कैमरा आने के बाद भी मूर्तिकला और पेंटिंग में बदल गई। यही बात आवाजों और ध्वनियों को आकृतियों में बदलने के कला रूप से शुरू होती है। ईश्वर की अमूर्तता को भी मनुष्य ने अनेकानेक आकृतियों में गढकर बदलकर रख दिया। ध्वनियों की अनुकृतियाँ भी हमारे ज्ञान की ही प्रतिमूर्ति हैं।
उच्चारण में रहने वाले अक्षरेां की आकृतियाँ, उन ध्वनियों का डीएनए अपने में लिए हुए होती हैं, यह देवनागरी लिपि की सबसे बडी विशेषता है। यों देखा जाए तो देवनागरी लिपि में इन बारह आकृति चिन्हों की आवृत्ति की, पंक्ति के ऊपर अथवा नीचे, होती रहती है। अक्षरों को जमीन पर कम, ब्रह्नाण्ड में ज्यादा टाँगा जाता है। यानी अक्षरों के लिए भी कहा जा सकता है कि ऊर्ध्व मूलमधः शाखः अर्थात् शब्दाक्षरों की जडें ऊपर की तरफ हैं और उनकी शाखाएँ नीचे पृथ्वी पर फैली हुई हैं। शून्य, चतुष्कोण, त्रिकोण, अर्धशून्य, फणाकार, रेफ और द्विरेफ आकृतियाँ ही देवनागरी के संकेत चिह्न बनकर संपूर्ण अक्षर समुदायों का आकार ग्रहण कर लेते हैं।
इन सब बातों को अगर छोड भी दिया जाए, तो नागरी लिपि के व्यंजनाक्षरों के वर्ण परिवारेां के पाँच-पाँच अक्षरों में आकृति साम्यता होने के कारण एक परिवार के डीएनए की पहचान होती है। कालांतर में इस नियम की अवहलेना करके ख और झ का झगडो हो गया। कोई भी मूल ध्वनि, नागरी लिपि में दो अक्षरों को मिलाकर नहीं लिखी जाती, फिर ख में र और व को कैसे शामिल कर लिया गया। यही नहीं बल्कि मूर्धन्य ष कार को भी वास्तविक ध्वनि उच्चारण के अभाव में ष को भी ख ध्वनि से अभिहित कर लिया गया। यह केवल मूर्धन्य ध्वनि जो कि तालु से थोडा ऊपर जीभ का ऊष्म स्पर्श करने से पैदा होती है, जहाँ से च और ट वर्ग के अक्षर बोले जाते हैं, वहाँ से मूर्धन्य ध्वनि का उच्चारण किया जाता है। यह उच्चारण अब बच्चों को सिखाया ही नहीं जाता, अतएव लुप्तप्राय हो रहा है। मूर्धन्य शब्द तो मौजूद हैं, लेकिन बोलने वाले लोग प्रायः कृष्ण (इसमें ष ही नहीं ण भी मूर्धन्य है), ऋतु, ऋषि, प्रहृष्ट, औषधि आदि मूर्धन्य ध्वनि प्रधान शब्दों को, पढे-लिखे लोग भी कभी-कभी दंत्य तालु स्थान से उच्चारित करते हैं, यह तो उच्चारण की बात हुई। अब आकृति की बात करते हैं, क के बाद अक्षर ऐसा लिखा जाना चाहिए था न कि ख की तरह। इसी प्रकार झ अथवा झ वर्ण के साथ परिवार के आकृति विज्ञान डीएनए के हिसाब से अन्याय हुआ है। झ अक्षर च वर्ग के परिवार का है। किसी भी वर्ग के पहले अक्षर को अगर पितृवर्ण मान लिया जाए, तो आकृति विज्ञान के हिसाब से अक्षरों के पारिवारिक डी.एन.ए. के आधार पर भी पहचाना जा सकता है। उदाहरण के लिए क वर्ग में ख ध्वनि के वैज्ञानिक रूपांकन के साथ अन्याय हुआ है और झ के साथ तो भ्रष्टाचार हुआ है। च वर्ग में दो च मिलाकर च्च को छ बनाया गया है। च को उलटकर ज बनाया गया है। उसका पंचम वर्ण झ भी इसी परिवार का डीएनए लिए हुए होना चाहिए। झ की आकृति उस परिवार की नहीं है। तो फिर होना क्या चाहिए था? मेरा सुझाव कई वर्षों से यह रहा है कि झ की आकृति को भी बदल देना चाहिए। सबसे सरल और वैज्ञानिक तरीके से इसे तथाकथित झ की आकृति बनाया जा सकता है।
देवनागरी लिपि में घ और ध अक्षर में 1960 तक अंतर करना मुश्किल होता था। धर है कि घर है, यह केवल पंक्ति न देकर प्रकट किया जाता है। धर्मवीर भारती के संपादन में निकलने वाले धर्मयुग में ध की घुंडी ढालकर उसे ध बनाया गया। अब पंक्ति की पराधीनता नहीं है। इसी प्रकार मेरा सुझाव है कि ख को कर दिया जाए और झ अथवा उससे भी वरिष्ठ को हटाकर कर कर दिया जाए। अर्थात् च, छ, ज, झ, के पारिवारिक सदस्यों को आकृति साम्यता के संशोधन से नवाज दिया जाए। बच्चों को भी ज के बाद सीखने में सरलता रहेगी।
देवनागरी लिपि के अन्य दोष भी यदि किसी को दिखायी दें, तो उन पर खुलकर बातचीत व विचार-विमर्श और संभव हो, तो सुधार होना चाहिए।
सम्पर्क - 7, सीताकुटी, सरस्वती एन्क्लेव,
बद्रीपुर रोड, (जोगीवाली) दहरादून, मो. ८३८४८५६५७६