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रमेश उपाध्याय : एक जीवंत रचनाकार का जाना

नन्द भारद्वाज
हिन्दी के प्रतिष्ठित और सक्रिय कथाकार रमेश उपाध्याय अब हमारे बीच नहीं रहे। अपनी जीवन-यात्रा के 79 वें वर्ष में कोरोना जैसी लाइलाज महामारी से जूझते हुए आखिर 23-24 अप्रैल की मध्यरात्रि को दिल्ली के ओखला ईएसआई हास्पिटल में उन्होंने प्राण त्याग दिए। निश्चय ही उनकी यह असामयिक मृत्यु सहज-सामान्य नहीं थी और न उनकी जीवनलीला को बचाने वाले प्रयत्न ही पर्याप्त। जीवन की इस अंतिम लडाई के समय उनके निकट संबंधी (साढू) शम्सुल रहमान ने जिन शब्दों में दर्ज किया है, उसे पढ-जानकर दिल दहल उठता है। यह बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस संवेदनहीन व्यवस्था के कमजोर स्वास्थ्य-तंत्र की शिथिलता और असहयोगपूर्ण रवैये के कारण उनके जीवन को बचाया नहीं जा सका। कोराना जैसी भयावह महामारी के निर्मम दौर में हिन्दी के एक जीवंत रचनाकार का इस तरह सही इलाज के अभाव में जाना सदा के लिए मन में एक गहरी टीस छोड गया है।
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एक आत्मीय लेखक मित्र और उससे भी कहीं अधिक बडे भाई का दर्जा रखने वाले डॉ रमेश उपाध्याय से मेरी पहली मुलाकात सन् 1972 के आखिरी दिनों में जोधपुर में हुई थी। यों एक नये कथाकार के रूप में उनकी कहानियाँ और उपन्यास दंडद्वीप, सारिका और धर्मयुग में पढ चुका था और अपने अभिन्न मित्र और राजस्थानी के वरिष्ठ कवि पारस अरोडा के माध्यम से यह पता लगा कि वे दोनों जोधपुर की प्रिंटिंग प्रेस में एक कंपोजीटर के रूप में साथ काम कर चुके हैं। उन्होंने यह भी बताया कि रमेश लम्बे अरसे तक अजमेर के छापाखानों में काम करते रहे है। वे अप्रैल, 1960 में पहली बार कासगंज (उ प्र) से अजमेर आए थे और चार साल तक वहीं टिककर काम किया, वहीं से उनके कहानी लेखन की शुरूआत हुई और उनकी पहली कहानी एक घर की डायरी वहीं की प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका लहर में प्रकाशित हुई। यहीं काम करते हुए जब उनकी कहानियाँ राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं सारिका, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान आदि में लगातार छपने लगी, तो एक लेखक के रूप में अपना भाग्य आजमाने वे दिल्ली पहुँच गए, जहाँ परिवार के कुछ परिचित लोग पहले से थे। वहाँ एक स्वतंत्र लेखक के साथ ही उन्होंने यहाँ की पत्रिकाओं के संपादकीय विभाग में काम करने के अवसर मिले, जो कि अधिक उत्साहवर्द्धक नहीं रहे। एक अच्छी उपलब्धि यह जरूर रही कि दिल्ली रहते हुए उन्होंने पत्राचार पाठ्यऋम से बी.ए की डिग्री जरूर हासिल कर ली। दिल्ली प्रेस और यहाँ की फ्रीलांसिंग में जिन्दगी के जो तल्ख अनुभव हुए वे लेखक रमेश उपाध्याय एक संजीदा और जीवन के प्रति यथार्थवादी दृष्टिकोण विकसित करने में निश्चय ही निर्णायक साबित हुए। फ्रीलांसिंग लेखक के रूप में कार्य करने की संभावनाएँ दिल्ली की बजाय चूंकि बंबई में बेहतर मानी जाती थी, इसलिए कुछ मित्रों के बुलावे पर वे बंबई पहुँच गये। बंबई में उन्होंने करीब दो वर्ष तक फ्रीलांसिंग की, इस बीच वे नवनीत के संपादकीय विभाग से भी जुडे, लेकिन वहाँ की जीवन-शैली रास न आने और अपनी बची हुई पढाई एम.ए. करने के लिए वे वापस अजमेर आ गए और यहीं एक स्वतंत्र लेखक के रूप में काम करते हुए अजमेर के राजकीय महाविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. के लिए दाखिला ले लिया। अपने इसी दूसरे अजमेर प्रवास के दौरान सन् 1969 में सुधाजी से उनका विवाह संपन्न हुआ और सन् 1970 में प्रथम श्रेणी में एम.ए की डिग्री हासिल कर अपने जीविकोपार्जन के लिए दिल्ली पहुँच गए, जहाँ कुछ ही अरसे बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के वोकेशनल स्टडीज कॉलेज में वे हिन्दी के प्राध्यापक नियुक्त होकर सदा के लिए दिल्लीवासी हो गये। रमेशजी के लेखन में मेरी अच्छी दिलचस्पी तो थी ही, पारसजी ने जब एक दिन आपसी बातचीत में उनके इस जीवन-संघर्ष के बारे में इतना-कुछ बताया, तो उनमें मेरी दिलचस्पी और गहरी हो गई। मैंने पारसजी से आग्रह किया कि हमें किसी बहाने रमेशजी को एकबार जोधपर बुलाना चाहिए। हमने उनके लिए जोधपुर के साहित्यिक मित्रों के बीच एक गोष्ठी में रमेश जी को बुलाने का निश्चय किया और उन्हें निमंत्रण भेज दिया। उन दिनों स्वयं प्रकाश भी भीनमाल में थे, जो रमेश और पारस के अच्छे मित्र थे, हमने उनहें भी जोधपुर आमंत्रित कर लिया और संयोग से दोनों ने आने की सहमति दे दी। जोधपुर में रमेश उपाध्याय और स्वयं प्रकाश से इस गोष्ठी के बहाने जो मुलाकात हुई और उनके लेखन पर जो चर्चाएँ हुईं, उसने हमारे बीच अंतरंग मित्रता का एक ऐसा अटूट रिश्ता बना दिया कि वह अगले पचास साल बाद भी वैसा ही जीवंत, ताजा और अनौपचारिक बना रहा।
रमेश उपाध्याय बेशक उम्र में मुझसे आठ साल बडे थे और वे हिन्दी के एक प्रतिष्ठित लेखक थे, लेकिन वे इतने सहज, आत्मीय और हर लेखक को समानता के धरातल पर रखकर बात करने वाले व्यक्ति थे कि उनसे घंटों बात करने के बावजूद कभी छोटे-बडे का लिहाज बीच में नहीं आया। रमेशजी के दिल्ली प्रवास के दौरान ही जुलाई, 1974 में यूपीएससी में अपना इंटरव्यू के बहाने जब पहली बार मैं दिल्ली गया और उनके आग्रह पर उन्हीं के पास ठहरा, जहाँ सुधा भाभी का वत्सल स्नेह और नन्हीं बल्लू कॉमरेड (प्रज्ञा) की अठखेलियाँ देखने को मिलीं। बहुत शीघ्र ही हमारे बीच की यह दोस्ती दो परिवारों की दोस्ती में रूपान्तरित हो गई। दोनों के बच्चे अलग-अलग शहरों में रहते हुए भी सर्दी-गर्मी के अवकाशों और घरेलू आयोजनों में साथ हँसते-खेलते बडे हुए है। रमेश हिन्दी के एकमात्र ऐसे लेखक हैं, जो मेरे वृद्ध माता-पिता और परिवार से मिलने मेरे मूल गाँव माडपुरा (बाडमेर) तक गए और हम एक-दूसरे के हर पारिवारिक आयोजन में व्यक्तिशः उपस्थित रहे। हमारी आत्मीय मित्रता का यह रिश्ता हमारे बीच चार दशक तक चले अनवरत पत्राचार में आज भी सुरक्षित है और यह पत्राचार मुख्यतः हमारे समय, समाज और साहित्य से जुडे मसलों पर ही केन्द्रित होने के कारण मुझे आज भी बहुत कुछ जानने-समझने का अवसर देता है, कभी संयोग बना और संभव हुआ, तो उस पत्राचार को एक स्वतंत्र पुस्तक के रूप में हिन्दी के पाठकों को सुपुर्द करूँगा, जो रमेश उपाध्याय के साहित्यिक अवदान को समझने की दृष्टि से निश्चय ही महत्त्वपूर्ण है।
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एक रचनाकार के रूप में डॉ रमेश उपाध्याय विगत छह दशकों में साहित्य की विभिन्न विधाओं कहानी, उपन्यास, नाटक, कविता, आलोचना, संवाद, अनुवाद, रिपोर्ताज आदि के माध्यम से अपने समय-समाज की केन्द्रीय चिन्ताओं, वास्तविकताओं और अन्तर्विरोधों पर लगातार अपनी बात कहते रहे हैं। साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादन, साहित्य शिक्षण और लेखकों की सांगठनिक गतिविधियों से भी उनका सीधा जुडाव रहा है। अपनी इस आठ दशक की जीवन-यात्रा में अब तक उनके डेढ दर्जन से अधिक कहानी संग्रह, चार उपन्यास, पाँच नाटक, आठ नुक्कड नाटक, आठ आलोचनात्मक कृतियाँ, अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं की उनके द्वारा अनुदित दस महत्त्वपूर्ण अनुवाद पुस्तकें, उनके साक्षात्कारों की एक पुस्तक बेहतर दुनिया की तलाश में तथा समसामयिक विषयों पर तीन दर्जन से अधिक संपादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।
साहित्य लेखन की इसी निरन्तरता में 2019 में उनकी एक और नयी संवाद कृति आई थी - अपनी बात : अपनों के साथ, जो लेखक की जीवन-यात्रा पर केन्द्रित बातचीत के रूप में होते हुए भी उनकी आत्मकथा नहीं है। इससे पूर्व सन् 2013 में आई उनके आत्मकथात्मक एवं साहित्यिक विमर्शों की पुस्तक मेरा मुझमें कुछ नहीं की भूमिका में उन्होंने कहा भी था कि वे कोई आत्मकथा नहीं लिखना चाहते और इसके पीछे उन्होंने अपने समय के बडे चिन्तक जिगमुंग बाउमान की इसी धारणा का समर्थन किया था वर्तमान पॉपुलर कल्चर ने आत्म-कथात्मक लेखन को एक बाजारू चीज बना दिया है, जिसने निजी तथा सार्वजनिक के बीच का भेद मिटा दिया है। इसीलिए उन्होंने अपनी कृति को शीर्षक दिया था मेरा मुझमें कुछ नहीं। रमेशजी के इसी मनोभाव का सम्मान करते हुए उनके अपनों दोनों बेटियों प्रज्ञा-संज्ञा और दामाद राकेशकुमार ने एक विस्तृत संवाद के माध्यम से उनकी जीवन-यात्रा और रचनाकर्म को जानने-समझने के लिए दस बैठकों में एक विस्तृत बातचीत का उपक्रम किया था। यह बातचीत वहाँ से शुरू होती है, जहाँ से लेखक रमेश उपाध्याय का बचपन, उनकी प्रारंभिक शिक्षा, किशोरवय में जीवन निर्वाह के संघर्ष और उनके लेखन बनने की शुरूआत होती है।
असल में किसी लेखक का अपना जीवन-संघर्ष, रचनाकर्म और समय-समाज में उसकी भूमिका को लेकर जो अनकहा और अनजाना रह जाता है, वह या तो लेखक के आत्मबयान के रूप में सामने आता है या उन अपनों के साथ ऐसे व्यापक संवाद के माध्यम से संभव हो पाता है, जो उस जीवन-यात्रा और जद्दोजहद में अनवरत साझीदार रहे हों। रमेश उपाध्याय की जीवन-यात्रा, रचनाकर्म और उनके वैचारिक दृष्टिकोण पर केन्द्रित इस सार्थक संवाद को संभव बनाने में उनकी दोनों विदुषी पुत्रियों प्रज्ञा, संज्ञा और दामाद राकेश कुमार की निश्चय ही निर्णायक भूमिका रही है, जो न केवल उनकी जीवन यात्रा के अंतर्साक्षी और सहभागी रहे हैं, बल्कि उनकी रचनाशीलता के मर्म और बयानगी की बारीकियों को बेहतर ढंग से जानते समझते रहे हैं।
किसी सक्रिय और सजग रचनाकार की रचनाओं पर बात करना और उनके रचना-कर्म पर कोई मूल्य-निर्णय देना एक जोखिम-भरा काम है, खासतौर से ऐसा रचनाकार जो कहानी जैसी लोकप्रिय और असरदार विधा से जुडा हो और यह जानता हो कि वह क्या लिखता है, क्यों लिखता है और किसके लिए लिखता है - हिन्दी के जाने-माने कथाकार रमेश उपाध्याय ऐसे ही रचनाकारों में आते हैं। वे पाँच दशक से भी अधिक समय से कहानियाँ लिख रहे हैं (उनकी पहली कहानी एक घर की डायरी सन् 1962 में लहर में प्रकाशित हुई थी) और वे आधुनिक हिन्दी कहानी की सुदीर्घ परम्परा के बीच अपनी एक अलग पहचान बनाए हुए हैं। इन छह दशकों की कथा-यात्रा में उन्होंने कहानी के पाठकों को घोंसले, समतल, शेष इतिहास, कहीं जमीन नहीं, अर्थतंत्र, पानी की लकीर, माटीमिली, कामधेनु, प्रौढ पाठशाला, राष्ट्रीय राजमार्ग, कल्पवृक्ष, देवीसिंह कौन, सफाईयाँ, लाइलो, कहाँ हो प्यारेलाल, हँसो हिमा हँसो, एक झरने की मौत, डेल्टा डॉक्यूड्रामा, प्रेम के पाठ, त्रासदी-माई फुट!, काठ में कोंपल जैसी कितनी ही यादगार और महत्त्वपूर्ण कहानियाँ दी हैं, वहीं चक्रबद्ध, दण्डद्वीप, स्वप्नजीवी और हरे फूल की खुशबू जैसे उपन्यासों के माध्यम से एक प्रगतिशील यथार्थवादी कथाकार के रूप में हिन्दी कथा-साहित्य में अपनी अलग पहचान बनाई है।
रमेश उपाध्याय की कहानियों और कथा-लेखन के नये प्रयोगों पर पिछले छह दशकों में बहुत से लोगों ने कईं तरह की टिप्पणियाँ की हैं। वरिष्ठ कथाकार भीष्म साहनी ने सन् 1976 में प्रकाशित अपनी पुस्तक आधुनिक हिन्दी उपन्यास में मुंशी प्रेमचंद के गोदान से लेकर अद्यतन जिन बीस उपन्यासों की चर्चा करते हुए, उन पर समीक्षात्मक लेख और उपलब्ध कथाकारों से उनकी रचना-प्रक्रिया पर आलेख लिखवाए, उनमें रमेश उपाध्याय के दण्डद्वीप को भी एक महत्त्वपूर्ण उपन्यास के रूप में शामिल किया गया था। इस उपन्यास की रचना-प्रत्रि*या पर अपनी बात कहते हुए रमेश उपाध्याय ने इस पर आई उन आलोचनात्मक प्रतिक्रयाओं की विशेष चर्चा की, जिन्हें यह उपन्यास कुछ अधूरा-सा लगा था और लेखक से आग्रह किया गया था कि वे इस पर फिर से विचार करें और हो सके तो अगले संस्करण में कुछ आवश्यक सुधार करें। रमेशजी ने अपने इस लेख में उन प्रतिक्रियाओं के प्रति आभार प्रकट करते हुए खुले मन से यह बात स्वीकार की और यह घोषणा भी की थी कि वे अगले संस्करण में कुछ आवश्यक सुधार अवश्य करेंगे। बरसों बाद सन् 2009 में जब शब्दसंधान प्रकाशन से इस उपन्यास के पुनर्प*काशन की योजना बनीं, तो रमेश जी ने अपने पूर्व निश्चय के अनुसार इसका पुनर्लेखन किया और अब वह संशोधित संस्करण प्रकाशित होकर हिन्दी पाठकों के हाथों में पहुँच गया है।
इसी तरह अपने कथा-लेखन पर उठे विवादों पर स्वयं रमेशजी ने सन् 1987 में अपने कहानी संग्रह किसी देश के किसी शहर में की विस्तृत भूमिका में उन तमाम सवालों और शंकाओं का बडे धैर्य से तार्किक उत्तर दिया है। अपनी कहानियों पर आई सभी तरह की विवादी टिप्पणियों का हवाला देने और उनके प्रति खुले मन से आभार प्रकट करने के बाद कहानी के सम्बन्ध में अपना नजरिया सामने रखते हुए वे लिखते हैं- मैं अपनी कहानी के माध्यम से अपने पाठक के साथ (और आलोचक के साथ भी, क्योंकि वह भी एक प्रबुद्ध पाठक ही होता है) जो रिश्ता बनाना चाहता हूँ, वह समान जरूरतों पर आधारित बराबरी का जनवादी रिश्ता है। वह रिश्ता कुछ-कुछ इस प्रकार का है कि देखो भाई, मैं जिस समाज में रहता हूँ, उसे मैंने इस रूप में देखा है, और उसके बारे में मेरी समझ यह है। मेरी यह दृष्टि और समझ गलत भी हो सकती है, आगे चलकर बदल भी सकती है, लेकिन फिलहाल मेरी दृष्टि और समझ के मुताबिक सामाजिक यथार्थ यह है और मैं उसका प्रतिबिम्बन अपनी कहानी में इस ढंग से कर रहा हूँ कि तुम उसे मेरी कहानी में देखने के बाद अपनी जिन्दगी में देखो और उस पर गौर करो। गौर इसलिए करो कि मेरा और तुम्हारा सामाजिक यथार्थ एक है, उसको बदल कर बेहतर बनाने का काम मुझे और तुम्हें मिलकर करना है। लेकिन यह मत समझो कि मैं तुम्हारा नेता या पथप्रदर्शक हूँ, तुम्हें कोई बना-बनाया रास्ता दिखा दूंगा या सोचने-समझने का काम तुम्हारे लिए मैं कर दूँगा।.......याद रखो कि तुम्हें बहकाने और भटकाने वाली शक्तियाँ भी समाज में सक्रिय हैं, और वे इतनी प्रभावशाली भी हैं कि अगर तुम सचेत नहीं रहे तो वे तुम्हें अपने प्रभाव में लेकर बहा ले जा सकती हैं और कहीं-का-कहीं पहुँचा दे सकती हैं। यह काम कला, कविता और कहानी के माध्यम से भी किया जाता है, इसलिए कहानी को कहानी ही समझो, अपनी जिन्दगी नहीं। और कहानी के बारे में अपनी इसी सोच-समझ को लेकर चलते हुए वे हिन्दी पाठकों को अब तक तेरह कहानी संग्रहों के माध्यम से करीब दो सौ कहानियाँ सुपुर्द कर चुके हैं।
रमेश उपाध्याय के नौंवे कहानी संग्रह कहाँ हो प्यारेलाल की कहानियों पर अपनी बात कहते हुए मैंने लिखा था कि आज उनका लेखन जिस उत्कर्ष पर है, वहाँ यह कहना तो कठिन है कि उनकी कहानियों की आगे की क्या दिशा रहेगी, या कि उनके कथा-लेखन की केन्द्रीय चिन्ताओं का आगे क्या स्वरूप बनेगा, लेकिन यह बात निःसंकोच कही जा सकती है कि एक जागरूक रचनाकार के रूप में अपने समय और समाज की चिन्ताओं और समस्याओं पर उनकी पकड उत्तरोत्तर गहरी और मजबूत हुई है, रचना उनके लिए अपनी कलात्मक प्रतिभा साबित करने की महत्त्वाकांक्षा भर नहीं है, बल्कि वे सामाजिक रूपान्तरण के एक ठोस माध्यम के रूप में भी उसे अंगीकार करते रहे हैं। नये प्रयोगों के प्रति भी वे विशेष रूप से आग्रहशील रहे हैं और इन्हीं प्रयोगों के कारण कई बार उन्हें विरोधी आलोचना का भी सामना करना पडा है, लेकिन इस आलोचना से अन्ततः उन्हें नई ऊर्जा ही प्राप्त हुई है। अपनी इस टिप्पणी के बावजूद मैं ही क्या, रमेश उपाध्याय की कहानियों के सचेत पाठकों को उनके लेखन की दिशा और उनकी केन्द्रीय चिन्ताओं के स्वरूप को लेकर शायद ही कोई दुविधा रही हो।
रमेश उपाध्याय संयोगवश हिन्दी लेखन के ऐसे दौर में सर्वाधिक सक्रिय लेखक के रूप में उपस्थित रहे हैं, जिन्होंने अपने समय के साहित्यिक आन्दोलनों को जहाँ अपने रचनात्मक लेखन से पुष्ट किया, वहीं अपने प्रगतिशील वैचारिक दृष्टिकोण के अनुरूप साहित्यिक मंच बनाकर, पत्रिकाएँ निकालकर तथा साहित्य संगठनों में अपनी सक्रिय भागीदारी निभाते हुए उन्हें सार्थक दिशा देने का प्रयत्न भी किया है। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता और उसूलों पर कायम रहते हुए न केवल उन्होंने पुनरुत्थानवादी और पूँजीवादी विचारों का डटकर विरोध किया है, बल्कि अपने हमविचार लेखकों की महत्त्वाकांक्षाओं और वैचारिक असहमतियों का भी दृढता से सामना किया है। सातवें दशक में जहाँ वे हिन्दी की लोकप्रिय व्यावसायिक पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाले चर्चित लेखक रहे, वहीं आठवें दशक की शुरूआत में वैचारिक मतभेद के चलते उन पूँजीवादी संस्थानों की पत्रिकाओं से अलग भी हो गए और उस समय के लघु पत्रिका आन्दोलन में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
एक युवा लेखक के रूप में उनके कहानी लेखन की शुरूआत बेशक नई कहानी आन्दोलन के दौर में हुई और कुछ अरसे तक वे उससे जुडे भी रहे, लेकिन जल्दी ही उस आन्दोलन की सीमाओं को पहचानते हुए वे उससे अलग भी हो गए। सन् 1971 में नई कहानी आन्दोलन से अलग जिन युवा लेखकों ने यथार्थवाद के प्रति आग्रह रखते हुए जिस नये समांतर कहानी आन्दोलन की शुरुआत की, उसमें जितेन्द्र भाटिया और इब्राहीम शरीफ के साथ रमेश उपाध्याय की प्रमुख भूमिका रही थी। बाद में जब उस आन्दोलन को नई कहानी के पैरोकार कमलेश्वर ने उसी व्यावसायिक घराने की पत्रिका सारिका को मुखपत्र बनाकर अपनी महत्त्वाकांक्षा के लिए उसे हथिया लिया, तो उनसे भी वैचारिक असहमति के चलते वे समांतर से अलग हो गए। नई कहानी और समांतर कहानी आन्दोलन के साथ जुडने के बावजूद वाम विचार और प्रगतिशील साहित्य आन्दोलन के प्रति उनका रुझान बराबर बना रहा और अंततः वे उस आन्दोलन से और गहरे स्तर पर आ जुडे। उन्होंने यह भी बताया कि उसी वामपंथी रुझान के चलते उन्हें साप्ताहिक हिन्दुस्तान की नौकरी छोडनी पडी। मुंबई से दिल्ली आकर पत्रकारिता से जुडने के साथ ही उन्होंने यहाँ अपने हमविचार साथियों आनंद प्रकाश, राजीव सक्सेना, कर्णसिंह चौहान आदि के साथ जिस जनवादी विचार मंच की शुरुआत की, उसकी आगे चलकर जनवादी लेखक संघ के निर्माण में अहम् भूमिका रही। इस जनवादी मंच की गतिविधियों का विस्तार करते हुए देश के अन्य भागों और प्रमुख नगरों में भी इस विचार से जुडे लेखकों की गोष्ठियाँ, सेमीनार और लेखक शिविर आयोजित हुए, जिनमें रमेशजी और उनके साथियों की प्रमुख भूमिका रही। इन संगोष्ठियों में साहित्य में यथार्थवाद, साहित्य के सामाजिक सरोकारों और साहित्य के इतिहास लेखन पर गंभीर चर्चाएं हुईं।
यह रमेश उपाध्याय ही थे, जिनकी सलाह और सक्रिय भागीदारी से हम राजस्थान के लेखकों ने भी जोधपुर में जनवादी लेखक मंच की शुरुआत की और एक राष्ट्रीय स्तर का सेमिनार आयोजित किया, जिसमें प्रदेश के अनेक महत्त्वपूर्ण लेखकों के साथ स्वयं रमेश उपाध्याय एक प्रमुख प्रतिभागी और प्रेरक के रूप में उपस्थित रहे। इसी सेमिनार में स्वयं प्रकाश, हरीश भादानी, शिवराम आदि अनेक वरिष्ठ लेखकों ने भाग लिया। कालांतर में इसी जनवादी मंच के लेखक सन् 1982 में राष्ट्रीय स्तर पर गठित जनवादी लेखक संघ से जुड गए। उसी दौर की गतिविधियों और कश्मकश पर रमेशजी ने आयोजनों और बहसों के अपने साहित्यिक संवादों में जो ब्यौरे दिए हैं, वे प्रगतिशील और जनवादी साहित्य आन्दोलन की उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने की दृष्टि से निश्चय ही महत्त्वपूर्ण हैं। यही वह दौर था जब वाम, पहल, कथा, भंगिमा, वातायन, कलम, उत्तरार्द्ध, क्यों, युग परिबोध, प्रतिमान जैसी पत्रिकाओं के माध्यम से वाम-जनवादी लेखन का उभार खुलकर सामने आया। यह बात कम महत्त्वपूर्ण नहीं है कि इन लघु पत्रिकाओं से प्रगतिशील सोच वाले तमाम नये पुराने लेखक जुडकर इस आन्दोलन को गति प्रदान कर रहे थे। सन् 1971 के बाँदा सम्मेलन के बाद से प्रगतिशील लेखक संघ में भी नयी सक्रियता बढी। रमेशजी ने अपनी बातचीत में उस दौर में लेखक संगठनों के साथ इप्टा, जन नाट्य मंच जैसे अन्य सांस्कृतिक संगठनों की गतिविधियों में अपनी और प्रगतिशील लेखकों की भूमिका की काफी विस्तार से चर्चा की है।
रमेश उपाध्याय की जीवन यात्रा और साहित्य-कर्म के तीन महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं - पहला उनका संघर्षपूर्ण बचपन तथा एक संवेदनशील लेखक के रूप में उनकी विकास यात्रा, दूसरा साहित्य और समाज के विचार-धारात्मक संघर्ष में एक लेखक के रूप में उनकी अपनी भागीदारी और तीसरा उनके संपादन में निकली साहित्यिक पत्रिका कथन के माध्यम से आज के सवालों और भूमंडलीय यथार्थवाद की पृष्ठभूमि को समझते-समझाते एक बेहतर दुनिया के सपने को सजीव बनाए रखने की अनवरत जिजीविषा। अपनों के साथ संपन्न हुई इन दस बैठकों में इन्हीं तीन महत्त्वपूर्ण पक्षों पर उनके विचार इस बातचीत के केन्द्र में रहे हैं। इस बातचीत में उन्होंने आधुनिकतावाद बनाम यथार्थवाद, अनुभववाद बनाम यथार्थवाद, आलोचनात्मक यथार्थवाद बनाम समाजवादी यथार्थवाद तथा भूमंडलीय यथार्थवाद जैसी अवधारणाओं पर खुलकर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। साहित्य में यथार्थ और कल्पना की सनातन बहस से जुडे एक सवाल के प्रत्युत्तर में अतीत के स्वर्णिम युग की कल्पना के बरक्स भविष्य के समतामूलक समाज की अवधारणा पर बल देते हुए वे कहते हैं - अतीत में किसी स्वर्णिम युग की कल्पना करके मानवजाति को उसकी ओर लौट चलने के लिए प्रेरित करने वालों को लगता है कि मानवता का भविष्य अंधकारमय और भयावह है, जबकि इतिहास इस मिथ्या धारणा का ख्ंडन करके हमें यह बताता है कि मनुष्य उत्तरोत्तर सामाजिक प्रगति करता हुआ एक समतामूलक न्यायपूर्ण समाज-व्यवस्था की ओर बढ रहा है। ये दोनों धारणाएँ दरअसल दो भिन्न और परस्पर विरोधी विचारधाराओं पर आधारित हैं, जिनसे लेखकों की कल्पनाएं निर्देशित होती हैं। समाज के ऐतिहासिक विकास की गति और दिशा के अनुकूल विचारधारा और भविष्योन्मुखी कल्पना से प्रगतिशील चिन्तन और यथार्थवादी रचना का जन्म होता है, जबकि उसके प्रतिकूल विचारधारा और अतीतोन्मुखी कल्पना से प्रतिगामी चिन्तन और गैर-यथार्थवादी रचना का। इसी बहस के संदर्भ में हिन्दी कथा साहित्य में आए पॉजिटिव हीरो को काल्पनिक कहकर उसका विरोध करने वालों की सोच के मूल में निहित उस मानव-द्रोही साजिश की ओर संकेत करते हुए वे कहते हैं-यह शीतयुद्ध की राजनीति के अंतर्गत पतनशील बुर्जुआ लेखकों और आलोचकों द्वारा फैलाया गया एक भ्रामक विचार है, जिसके आधार पर साहित्य में लघु मानव और आम आदमी के नारे दिए गये और रचना-प्रक्रिया से कल्पना तत्व को एकदम खारिज करने की बेतुकी बातों के साथ यथार्थवाद के नाम पर साहित्य, चित्रकला और सिनेमा के क्षेत्रों में कई यथार्थवाद विरोधी आन्दोलन चलाए गए हैं। वास्तव में यथार्थ और कल्पना में विरोध पैदा करना उन सृजन-विरोधी और मानव-द्रोही लोगों की साजिश है, जो भविष्य के नये समाज से, नये मनुष्य से और समाजवाद के अंतर्गत उसके सुखी और सुन्दर जीवन की कल्पनाओं से मनुष्य को वंचित रखना चाहते हैं। कथन की दो पारियों और उनके बीच जनवादी लेखक संघ की दिल्ली स्थित राष्ट्रीय कार्यकारिणी के कुछ महत्त्वाकांक्षी सदस्यों के रमेश उपाध्याय के प्रति अपनाए गये अफसोसजनक रवैये के कारण जलेस संगठन के साथ जुडकर वह जो बेहतर काम कर सकते थे, उसकी संभावनाएँ जरूर सीमित हो गईं, लेकिन रमेश उपाध्याय ने कथन पत्रिका के माध्यम से यथार्थवादी साहित्य की अवधारणा और भूमंडलीय यथार्थवाद को लेकर जारी वैश्विक बहस को जिस तरह हिन्दी अध्येताओं के लिए सहज-सुलभ बनाया है, वह अपने आप में संजीदा साहित्य कर्म की एक मिसाल है।
रमेशजी से विस्तृत संवाद की उनकी पुस्तक अपनी बात अपनों के साथ की नौवीं बैठक में प्रश्नकर्ताओं ने जिस तरह उनकी संघर्षशील जीवन यात्रा को गीता में वर्णित नित्यसंन्यासी की अवधारणा से जोडते हुए सवालों की एक श्रृंखला उनके सामने प्रस्तुत की, उन प्रश्नों के उत्तर में रमेशजी के जीवन के वे तमाम अकथ प्रसंग और ब्यौरे खुलकर सामने आ गये, जिन हालात में इस रचनाकार ने अपनी रचनाशीलता को आकार दिया है। इसी संघर्ष यात्रा में रमेशजी ने अपने जीवन-अनुभव से अर्जित उस सत्य को भी जाना और उसे उजागर किया, जो उनकी आगे की जिन्दगी में एक दिशा-निर्देश की तरह कायम रहा। वे कहते हैं - यथार्थ उतना ही नहीं है, जितना और जैसा आज दिखता है। यथार्थ उसमें निहित संभावना भी है, जिससे भविष्य में वह आज से बेहतर बन सकता है। इसी जीवन-सूत्र को आधार बनाकर वे अपनी यथार्थवाद संबंधी वैज्ञानिक अवधारणा पर आज भी कायम हैं और उसी नजरिये से साहित्य और भूमंडलीय यथार्थ से जुडे आज के सवालों की समग्र व्याख्या प्रस्तावित करते हैं।
अपनी नयी आलोचना कृति मुक्तिबोध का मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा के माध्यम से रमेश उपाध्याय ने भूमंडलीय यथार्थवाद की अवधारणा से जुडे उन तमाम सवालों पर गहराई से विचार किया है, जो स्वयं उनके जीवन और साहित्य-कर्म के केन्द्रीय सरोकार बने रहे। अपने इसी दृष्टिकोण को आधार बनाकर उन्होंने मुक्तिबोध जैसे कालजयी कवि की कविताओं का ऐसा विशद कथा-पाठ तैयार किया, जो उनके मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा के संघर्ष को गहरी संगति देता है। एक समर्थ कथाकार के रूप में उन्होंने इस अनूठे विवेचन के माध्यम से मुक्तिबोध की उन जटिल और संश्लिष्ट शिल्प वाली कविताओं के भीतर निहित उस काव्य-नायक के जीवन-संघर्ष और उस दौर के भूमंडलीय यथार्थ को इन कविताओं में विन्यस्त कथा-पाठ के माध्यम से व्याख्यायित किया है, उससे मुक्तिबोध की ये कविताएँ आम पाठक के लिए सहज बोधगम्य हो पाती हैं। रमेशजी ने अपनी इस विवेचन पद्धति के माध्यम से मुक्तिबोध की कई लंबी कविताओं और विशेष रूप से अंधेरे में कविता का जो कथा-पाठ प्रस्तुत किया है, वह वाकई इन कविताओं के केन्द्रीय चरित्र (मुक्तिकामी स्वप्नद्रष्टा) के संघर्ष को अपने पूरे आकार और डिटेल्स के साथ एक रोचक कहानी की तरह बयान कर देता है और वह भी स्वयं कवि के ही शब्द-संयोजन और शैली-शिल्प को सुरक्षित रखते हुए, ताकि पाठक उसे कवि के मूल पाठ के साथ मिलान करके देख सके। इस बातचीत में मुक्तिबोध की स्वप्न कथाओं, फैंटेसी शिल्प और यूटोपिया की अवधारणा से जुडे सवालों के साथ ही स्वयं रमेश उपाध्याय के अपने रचनाकर्म में सामाजिक परिवर्तन के प्रति जिस आशावादी दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति हुई है, उसी पर जब प्रज्ञा और राकेश ने उनके सामने यह शंका रखी कि इस आशावाद का आधार क्या है, याकि वह बेहतर व्यवस्था कब और कैसे कायम होगी, तो रमेशजी अपने उसी विश्वास पर कायम रहते हुए यही कहते हैं कि इसके बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, लेकिन कैसे बनेगी, इसका कुछ अनुमान भूमंडलीय यथार्थ के आधार पर लगाया जा सकता है। मेरा अनुमान है कि वह बेहतर व्यवस्था किसी भूमंडलीय क्रान्ति से बनेगी। अब तक दुनिया में जो क्रान्तियाँ हुई हैं, उनका आधार राष्ट्रीय रहा है, जैस फ्रांस की क्रान्ति, रूस की क्रान्ति, चीन की क्रान्ति। माक्र्सवाद ने वैश्विक क्रान्ति का स्वप्न देखा और उसका आधार राष्ट्रीयता को नहीं, अन्तर्राष्ट्रीयता को बनाया। इसलिए समाजवाद का एक आधार अन्तर्राष्ट्रीयतावाद रहा। - पूँजीवादी भूमंडलीकरण ने राष्ट्र की अवधारणा को हिला दिया है और अन्तर्राष्ट्रीयता की जगह भूमंडलीयता के आधार पर वैश्विक पूँजीवाद की जगह वैश्विक समाजवाद की व्यवस्था को आवश्यक और संभव बना दिया है। मेरा खयाल है कि अब जो क्रान्तियाँ होंगी, वे राष्ट्रीय स्तर से आगे बढकर वैश्विक या भूमंडलीय स्तर की होंगी। ऐसे स्वप्नदर्शी, प्रगतिशील, जनवादी और लोकतांत्रिक मूल्यों में अटूट आस्था रखने वाले सजग-सक्रिय रचनाकार का इस कोरोना महाव्याधि की चपेट में आकर अकस्मात अपनों के बीच से सदा के लिए उठ जाना, परिवार, मित्रों और साहित्य-समाज के लिए ऐसा आघात है, जिसे झेल पाना कतई सहज नहीं है।
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