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नरेन्द्र कोहली : जाना पौराणिक कथाओं के आधुनिक लेखक का

प्रभात रंजन
नरेंद्र कोहली के असामयिक निधन के बाद से उनको याद करते हुए बार-बार यह कहा गया कि वे आधुनिक व्यास थे, आधुनिक तुलसी थे। यह सच है कि उन्होंने रामकथा और महाभारत को लेकर उपन्यास श्रृंखलाएँ लिखीं, लेकिन उनका आकलन केवल पौराणिक कथा-लेखक के रूप में करना आंशिक सत्य ही कहा जाएगा। इस कोरोना-काल में मुझे उनकी रचना अस्पताल की याद आ रही है, जो पाँच एब्सर्ड उपन्यास में संकलित है। इस कहानी में अस्पताल से जुडे उनके अनुभव हैं। 1967 में उनके जुडवाँ बच्चों में से एक की मृत्यु हो गई थी और एक जीवित लेकिन बीमार। उस दौरान अस्पताल में उनको जिस तरह संवेदनहीनता का अनुभव हुआ उसी का वर्णन इस कहानी में है। आज पूरे देश में अस्पतालों की चर्चा है, महामारी से निपट पाने में उनकी असफलताओं की कहानियाँ हैं, संवेदनहीनता की पराकाष्ठा की कहानियाँ हैं।
प्रसंगवश, कोहलीजी ने लेखन की शुरुआत व्यंग्य लेखन से की थी। आश्रितों का विद्रोह, शम्बूक की हत्या(व्यंग्य नाटक) और पाँच एब्सर्ड उपन्यास उनके आरम्भिक व्यंग्य लेखन के उदाहरण हैं। उन्होंने व्यंग्य साहित्य बडी मात्रा में लिखा। हरिशंकर परसाई और शरद जोशी की तरह आम आदमी के जीवन से जुडे विद्रूप को उन्होंने अपने व्यंग्य लेखन में उभारा। लेकिन यह भी सच है कि हिंदी के श्रेष्ठ व्यंग्यकारों में उनकी गणना नहीं होती है। उनको याद किया जाता है पुरा-कथाओं को आधार बनाकर लिखे गए उपन्यासों के कारण। साधारण, सामान्य उनके आरम्भिक लेखन के केंद्र में रहा। एक आम आदमी का जीवन, उसकी रोजमर्रा की परेशानियाँ- उनके शुरुआती दौर के लेखन के केंद्र में यही विषय हैं।
लेकिन उनको ख्याति मिली दीक्षा नामक उपन्यास से, जो 1975 में प्रकाशित हुआ था। उस समय देश की राजनीतिक स्थिति खराब थी, जनता त्रस्त थी और जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति आंदोलन की शुरुआत हो चुकी थी। दीक्षा को उस समय उस पृष्ठभूमि से जोडकर पढा गया। यह जैसे रामकथा का साधारण अवतार था। इस उपन्यास की पृष्ठभूमि कि बारे में उन्होंने स्वयं विस्तार से लिखा है। 1972 में उनका उपन्यास आतंक प्रकाशित हुआ था जिसमें सत्ता के दमन से पिसते आम जन की कहानी है। उस उपन्यास पर चर्चा हुई, तो यह आरोप भी लगा कि उसमें शोषण तो है, लेकिन सत्ता के शोषण के विरुद्ध खडा होने वाला कोई नायक नहीं है। कहा गया कि साहित्य समाज को हताश करने के लिए नहीं, उसको ऊर्जा देने के लिए होना चाहिए। ऐसा नायक होना चाहिए जो अत्याचार से लडे, आम आदमी को बल दे। तब उनका ध्यान राम-कथा की ओर गया। साधारण जीवन की कहानियाँ लिखने वाले लेखक ने असाधारण की दिशा देखी और यही उनके उपन्यास दीक्षा का कारण बनी। उनका राम न्याय के लिए युद्ध लडने वाला है। समाज के हर वर्ग को संगठित कर उसे जगाने वाला है।
दीक्षा में विश्वामित्र राक्षसों का अंत करने का निश्चय करते हैं और अपने साथ राम और लक्ष्मण को जोडते हैं। उनके विश्वामित्र में जयप्रकाश नारायण की छाया थी और राम-लक्ष्मण अन्याय से लडने वाले सबसे बडे पुरा-प्रतीक। इस उपन्यास ने उस दौर में पाठकों-आलोचकों सबको प्रभावित किया। इसके बाद एक नए नरेंद्र कोहली का उदय हुआ। उन्होंने राम कथा को लेकर एक के बाद एक सात उपन्यास लिखे जो बाद में एक साथ अभ्युदय नाम से दो खंडों में प्रकाशित हुए।
राम-कथा का उनका यह रूप पाठकों को बहुत रास आया। उन्होंने रामकथा में आस्था और तर्क के द्वंद्व को देखा। उन कथा प्रसंगों को विस्तार से उठाया जिनसे वह समकालीन जीवन की परेशानियों से जुडता है। कथा की प्राचीन समस्याओं के आधुनिक समाधान हैं। उनके राम संगठनकर्ता हैं, लोगों को अन्याय का मुकाबला करने के लिए तैयार करने वाले। इसी तरह अहल्या-प्रसंग में राम का रुख बहुत कुछ आधुनिक प्रतीत होता है। उन्होंने राम को समकालीन नायक बना दिया।
अगले कुछ सालों में ही उनकी राम कथा ने हिंदी में बडे पैमाने पर पाठक जोडे। रामकथा को नए सिरे से लिखते हुए नरेंद्र कोहली ने यह माना कि पुराणों की कथाओं में हमें अपने जीवन की समस्याओं के तार जुडते हैं। लेखक पर अपना युग बहुत हावी रहता है इसलिए उसके अपने विचारों, अपने मूल्यों का प्रभाव उसके लिखे पर भी होता है। लेकिन वे इस बात में दृढता से विश्वास करते थे। उन्होंने लिखा कि पौराणिक उपन्यास चित्रण तो संसार के धरातल पर कर रहा है। किंतु उसमें आभा आध्यात्म की भी उद्भासित हो रही होती है।
वे पौराणिक कथाओं के मूल भाव में किसी भी तरह के परिवर्तन के सख्त खिलाफ थे। जैसे वे माइकेल मधुसूदन दत्त के मेघनाद वध के इसलिए आलोचक थे क्योंकि मेघनाद कोई ऐसा किरदार नहीं था जिसको लेकर महाकाव्य की रचना की जाए। इसी तरह, आचार्य चतुरसेन के उपन्यास वयम रक्षामः की वे इसलिए आलोचना करते थे क्योंकि उसमें रावण को नायक बनाया गया था, या शिवाजी सावंत के उपन्यास मृत्युंजय की इसलिए आलोचना करते थे कि उनकी दृष्टि में कर्ण खल पात्र था। कहने का मतलब यह कि उनके लिए रामकथा एक परम्परा थी जिसको बचाए रखा जाना चाहिए, उसके आदर्शों की कथाओं को प्रसारित करने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने उनमें तार्किक बदलाव किए जैसे, वरदान और शाप के प्रसंगों में। जैसे, दशरथ द्वारा कैकेयी को दिया गया वरदान असल में उनके अनुसार वचन था। इसी तरह अहल्या शिला नहीं, बल्कि पति और समाज द्वारा परित्यक्त होने के कारण शिलावत हो गई थी। कथा-विश्वास का तार्किक समाधान।
रामानन्द सागर के रामायण सीरियल के बहुत पहले नरेंद्र कोहली की राम-कथा ने हिंदी समाज को राममय करने का काम किया था। परम्परा से चल आ रही कथा को समकालीन तार्किकता के साथ कहने का काम किया उन्होंने। उनकी यह स्थापना महत्त्वपूर्ण थी कि मूल कथाओं के पात्र, उनकी घटनाएँ हमारे मानस पर इस तरह अंकित रहती हैं कि उनसे साथ की गई छेडछाड या उनमें किसी तरह का बदलाव कुछ समय के लिए चौंका सकता है लेकिन उनका कोई स्थायी प्रभाव नहीं पडता। उन्होंने रामकथा को एक उदबोधनात्मक कथा में बदल दिया। जिस काल में हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में धर्म-आध्यात्म का उल्लेख भर किसी लेखक को पुरातनपंथी साबित कर दिया जाता था। उस काल में नरेंद्र कोहली ने एक बडा रचनात्मक जोखिम लिया। इसका उनको खामियाज़ा भी भुगतना पडा। उनको मुख्यधारा की आलोचना ने सदा हाशिए पर रखा। यह बात अलग है कि पाठकों के प्रेम ने उनको एक महत्त्वपूर्ण लेखक के रूप में स्थापित किया।
रामकथा के बाद नरेंद्र कोहली ने महासमर लिखा। यह आठ खंडों में महाभारत की कथा का समकालीन पाठ है। रामकथा में जहाँ औदात्य है, मर्यादा है, वहीं महाभारत की कथा में विविधता और विस्तार बहुत है। जिस हिंदी समाज में महाभारत को घर में रखना उचित नहीं समझा जाता था उसी हिंदी समाज में महासमर घर-घर पहुँचा। महासमर एक तरह से सभ्यता के उत्थान-पतन की विराट कथा है। किस तरह बडी सभ्यताएँ अपने समाज के अंतर्द्वद्वों से निकलने के लिए आपस में संघर्ष करती हैं।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उन्होंने हिंदी में पुरा-कथाओं को लिखने की एक नई तरह की विधा को स्थापित किया। आजादी के बाद न तो किसी लेखक ने रामकथा को इतने विस्तार से लिखा न ही किसी ने महाभारत की कथा को उसके मूल रूप को बचाते हुए किसी लेखक ने इस तरह से प्रस्तुत किया था। उनके लिए मिथक कथाओं का लेखन एक निश्चित मकसद के तहत था। उन्होंने लिखा है पचीस वर्षों तक पौराणिक कृतियों के मध्य रहकर मेरा यह विचार बना है कि पौराणिक आख्यानों पर कलम उठाने से पहले अपनी आधुनिक बौद्धिकता को कुछ शिथिल कर उन चरित्रों और उनके संदेश की वास्तविकता को समझने का प्रयत्न करना चाहिए। न बौने हाथों से आकाश छूने का प्रयत्न करना चाहिए न गंदे हाथों से चरणामृत लेना चाहिए। उन चरित्रों, उन घटनाओं और उनके चिंतन के यथार्थ को समझ कर उनका यथार्थ चित्रण करना चाहिए, यथार्थवादी चित्रण नहीं। पौराणिक मूल्य व्यवस्था मानवता के हित के लिए अमूल्य निधि है। उसे अपनी कलम से ध्वस्त करना अक्षम्य अपराध होगा। शायद यही दृष्टि उनकी पौराणिक कथाओं को आधार बनाकर लिखी गई कृतियों की सफलता का कारण रही।
लेकिन नरेंद्र कोहली को केवल पौराणिक कथाओं के लेखन के लिए ही नहीं तोडो कारा तोडो के लिए भी याद किया जाएगा। स्वामी विवेकानंद के जीवन पर आधारित यह उपन्यास छह खंडों में लिखा गया है। स्वामी विवेकानंद के जीवन और उनके विचारों को लेकर इतने विस्तार से पहले कभी नहीं लिखा गया। बालक नरेंद्र से स्वमय विवेकानंद बनने तक का सफर इस उपन्यास में बहुत रोमांचक तरीके से दिखाया गया है। नरेंद्र अपने जीवन और उसकी सीमाओं को तोडने के लिए प्रयास तो करता ही है, साथ ही मानवता के बंधनों को तोडने के लिए भी प्रयास करता है। यही इस उपन्यास श्रृंखला का लक्ष्य है। इस उपन्यास की कथा का मूल नरेंद्र के द्वारा मानवता की स्थापना है। वह उसको अपने कर्मों के माध्यम से युगपुरुष होते हुए दिखाते हैं। एक ऐसे प्रेरक पुरुष जो सदा मानवता की प्रेरणा होना चाहिए।
आधुनिक काल के किसी व्यक्तित्व को आधार बनाकर उपन्यास लिखने के लिए कोहलीजी ने स्वामी विवेकानंद को ही क्यों चुना? शायद उनको आधुनिक भारत में भारतीय मेधा, ज्ञान परम्परा का वैसा कोई प्रतीक नहीं मिला हो। या रामकथा, महाभारत पर उपन्यास लिखते-लिखते भारतीय संस्कृति की सनातन परम्परा में उनका विश्वास गहरा हो गया। या उनकी विचारधारा एक राजनीतिक विचारधारा के विशेष प्रभाव में जाने लगी। यह उनके अधिकांश लेखन के आधार पर नहीं कहा जा सकता। उनके उपन्यासों में अभिव्यक्त आदर्श, मूल्य अधिक ऊँचे हैं। उनका अधिकांश लेखन किसी एक विचारधारा के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। उनकी भारतीयता, उनकी सांस्कृतिक चेतना अंधविश्वास का पोषण करने वाली नहीं थी। बल्कि उनके उपन्यासों में अंधविश्वासों के स्थान पर तर्कों का सहारा लिया गया है। लेकिन उनका उत्तर-कालीन लेखन कुछ हद तक तत्कालीन राजनीति से प्रभावित दिखाई देता है।
उनके अंतिम प्रकाशित उपन्यास सेतु भंजन को उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। यह अपने तरह की एक बडी अनूठी विधा में लिखा गया उपन्यास है। उपन्यास के मूल में राम सेतु और सेतु समुद्रम विवाद से जुडे प्रसंगों के कारण होने वाली राजनीति है। किस तरह आस्था यह मानती है कि राम द्वारा निर्मित राम सेतु के अवशेष तमिलनाडु के रामेश्वरम से श्रीलंका के मन्नार द्वीप के बीच समुद्र की निचली सतह में अभी भी मौजूद हैं, जबकि तत्कालीन सरकार उसी के ऊपर से सेतु समुद्र का निर्माण करना चाहती है ताकि भारत और श्रीलंका के बीच समुद्र पर पुल बन जाए। इसी कथा को एक पोलिटिकल थ्रिलर की तरह उन्होंने इस उपन्यास को लिखा है जिसमें संस्कृति और आस्था का ओवरडोज है। कथा के साथ साथ राम सेतु को लेकर विमर्श भी चलता रहता है। नरेंद्र कोहली ने जिस तरह के महाकाव्यात्मक उपन्यास लिखे हैं, उसके सामने यह उपन्यास इसलिए कमजोर लगता है क्योंकि समकालीनता अधिक है, पौराणिकता का वह ठोस आधार नहीं है जिसने उनके उपन्यासों को विशिष्ट बनाया।
नरेंद्र कोहली ने इसके अलावा भी बहुत लिखा। वे लेखन की पहचान के साथ जीने वाले लेखक थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में वे प्राध्यापक भी रहे, लेकिन उन्होंने बाद में नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और स्वतंत्र लेखन करते रहे। बाल-साहित्य, नाटक, आलोचना, संस्मरण शायद ही कोई विधा है जिसमें उन्होंने न लिखा हो। उनके संस्मरणों की एक किताब बाबा नागार्जुन पर भी है और एक आलोचना पुस्तक उन्होंने प्रेमचंद पर भी लिखी है।
जाने के बाद से वे जिस एक बात के लिए याद आ रहे हैं वह हिंदी के प्रति अपनी साधिकार जिद के लिए। वे हिंदी में बातचीत के दौरान अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग पर नाराज हो जाते थे। बाद में, वे उर्दू शब्दों के प्रयोग पर भी नाराज होने लगे थे। वे चाहते थे कि उनके कार्यक्रमों में सब हिंदी में बातचीत करें। हिंदी को लेकर उनकी बडी चिंता थी। वे कहते थे कि आने वाले समय में हिंदी कौन पढेगा? हम अपने बच्चों को बचपन से अंग्रेजी पढा रहे हैं। ऐसे में भविष्य में हिंदी साहित्य पढने वाला कौन बचेगा? वे चाहते थे कि हिंदी के लोक का विस्तार हो, पाठक बढें, हिंदी समाज में पढने-लिखने की संस्कृति का विकास हो। वे हमेशा अपनी रचनाओं के माध्यम से एक नायक की तलाश में लगे रहे, जो समाज की चेतना को जागृत करे और उसके प्राचीन गौरव को स्थापित करे। उन्होंने अपनी धारा बनाई और उसके कीर्ति स्तम्भ बने रहे। जब भी आधुनिक सांस्कृतिक साहित्य की बात होगी उनका नाम कीर्ति पताका की तरह लहराएगा।
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सम्पर्क : ए-102, नागार्जुन अपार्टमेन्ट, मयूरकुंज, नोएडा चैकपोस्ट के पास, दिल्ली-११००९६ मो. ९८९१३६३०६२