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श्रीकांत वर्मा : एक द्विध-विभक्त कवि

सुधीश पचौरी
यह लेखक श्रीकांत वर्मा को पर्सनली नहीं जानता था। इतना जानता था वे दिनमान में काम करते हैं और अपने तीखेपन के लिए जाने जाते हैं।
संभवतः यह सन बहत्तर-तिहत्तर की बात होगी। शायद दिनमान ने साहित्यकारों की एक चर्चा आयोजित की थी, जिसमें श्रीकांत वर्मा कम्यूनिस्टों की निंरकुशता के बारे में बोले थे और रामविलास शर्मा ने उनके बारे में कुछ इस तरह कहा था कि उनका बोलना कुछ इसी तरह का था जैसे बच्चे दौडती ट्रेन को देख अपनी छुन्नी दिखाकर चिढाया करते हैं।
रिपोर्ट पढकर हम नए-नए माक्र्सवादी बडे खुश हुए थे कि रामविलास जी ने श्रीकांत वर्मा को उनकी औकात दिखा दी।
तब से श्रीकांत हमारी नज़र में कम्यूनिस्ट विरोधी हो गए, लेकिन उनकी कविताएँ और टिप्पणियाँ हमारा ध्यान खींचती ही रहतीं। उनकी भाषा में एक तरह की अतिरिक्त तिक्तता होती। वे एकदम दोटूक बोलते, लिखते थे।
इस लेखक ने उनको सिर्फ एक बार काव्यपाठ करते सुना था जिसमें उनकी आवाज़ एकदम एसिडिक महसूस हुई थी, एकदम खरखरा सुर जैसे कोई कशाघात करता हो!
वे राजनीति शास्त्र में सिर्फ एम.ए ही नहीं थे, बल्कि वे पूरी तरह एक राजनीतिक व्यक्तित्व थे। वे न केवल कांग्रेस के सांसद रहे, बल्कि लंबे अरसे तक उसके प्रवक्ता व प्रचारक भी रहे।
वे इंदिरा गाँधी के निकट रहे। वे उनके भाषण भी लिखा करते थे। वे इंदिरा गाँधी की नीतियों प्रखर प्रवक्ता व प्रचारक रहे। वे कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूँ गरीबी हटाओ वाला इंदिरा को विजयी बनाने वाला प्रसिद्ध नारा उन्हीं का लिखा बताया जाता है।
वे आपातकाल में भी इंदिरा गाँधी के साथ रहे। इंदिरा की नृशंस हत्या पर राजीव का वह बहुचर्चित बयान भी श्रींकांत का लिखा कहा जाता है कि जब बडा पेड गिरता है, तो धरती हिलती है! ये बातें बाद में सार्वजनिक भी हुईं!
आपातकाल से पहले और उसके दौरान व उसके बाद तक दिल्ली के एक से एक नामचीन हिंदी साहित्यकार शाम को अक्सर उनकी बैठक में हाजिरी दिया करते थे! ऐसी ही एक बैठक में आपातकाल को लेकर निर्मल वर्मा और श्रीकांत वर्मा के बीच खासी वैचारिक भिडंत हुई । उस भिडंत के बाद, आपातकाल की घोषणा पर अपना विरोध जताते निर्मल वर्मा ने बहिर्गमन किया था और कहते हैं कि फिर वे कभी श्रींकांत के दरबार के हिस्से नहीं बने !
स्वर्गीय मित्र मंगलेश डबराल ने एक बार बताया था कि उनको तरह-तरह के महँगे विदेशी ब्रांडों के पेनों का शौक था और उनके पास उस वक्त के सबसे बडे ब्रांड पेनों का संग्रह था!
वे छोटे कद के साँवले व्यक्ति थे जिनकी ठुड्डी दबी हुई नजर आती थी, लेकिन जब वे बोलते थे, तो वाक्य में न एक झोल होता था न झिझक एकदम ठहरे हुए सटीक वाक्य होते।
आपातकाल के आसपास ही उनके आलोचनात्मक व वैचारिक निबंधों का एक संकलन जिरह प्रकाशित हुआ जो खूब चर्चित रहा। शीतयुद्ध के संदर्भ में वे सोवियत कम्यूनिस्टों की निरंकुशता के विरोधी थे, लेकिन उसी तरह के वैचारिक विरोधी थी, जिस तरह के धर्मवीर भारती थे।
उनके निबंध बताते हैं कि अपने वक्त के तमाम बडे विचारकों की बहसों को उनके गं*थों का वे खूब पढते समझते थे और ठोस तर्कों से अपने विरोधी से संवाद करने में यकीन करते थे। इस तरह वे कोरे प्रवक्ता नहीं थे बल्कि विचारक भी थे।
श्रीकांत वर्मा शायद पहले ऐसे कवि थे जो लंबे बरसे तक कांग्रेस के नेता, प्रवक्ता रहे। एक मानी में वे स्वयं एक सत्ता थे जिनकी रिट चलती थी।
यों तो राष्ट्रकवि के रूप में मैथिलीशरण गुप्तजी भी राज्यसभा के नामित सांसद रहे। वे भी दिल्ली के अपने संसदीय निवास पर हिंदी साहित्यकारों का दरबार लगाते थे। ऐसे ही दिनकरजी भी राज्यसभा के नामित सांसद रहे लेकिन ये दोनों कवि सांसद होते हुए भी कांग्रेस के राजनेता या प्रवक्ता न बने। वे कवि ही बने रहे।
लेकिन श्रीकांत हिंदी के ऐसे अकेले कवि रहे जो कवि भी रहे और कांग्रेस द्वारा नामित राज्यसभा सांसद और उसके नेता भी रहे, लेकिन इसके बावजूद उनकी कविता उनकी राजनीति का पर्याय नहीं बनी!
कांग्रेस की बुर्जुआ राजनीति और सत्ता के प्रमुख प्रवक्ता व प्रचारक के रूप में लंबे समय तक काम करते हुए भी अगर उनकी कविता कांग्रेसी कविता नहीं बनी तो कैसे?
श्रीकांत वर्मा ने यह हठयोग कैसे साधा होगा कि उनकी राजनीति अलग रहे और कविता अलग रहे!
इतना ही नहीं, कई बार उनकी कविता उनकी ही राजनीति पर प्रश्न करती दिखाई देती है और उसके विपरीत भी बोलती दिखाई देती है!
तब क्या हम यह कहें कि श्रीकांत वर्मा का व्यक्तित्व विभााजित व्यक्तित्व (स्प्लिट पर्सनेलिटी) था जिसके दो खाने थे- एक में कांग्रेसी नेता और विचारक रहता था दूसरे में एक कवि रहता था जो उनकी राजनीति का गलाम न था। जबकि उनकी कविताएँ प्रायः उनकी राजनीति के प्रति क्रिटीकल नजर आती हैं।
हो सकता है कि अपनी ही राजनीति के यथार्थ को अंदर से देखकर उनके कवि को वितृष्णा होने लगी होगी जो उनकी कविता में प्रतीक बनकर ढलने लगी। उनकी कविता में बार-बार आने वाले मगध, कोसल, विदर्भ आदि सब सत्ता के खोखलेपन के प्रतीक हैं!
कोसल में विचारों की कमी है वाली उनकी काव्यपंक्ति आज हिंदी कविता का एक अमर वाक्य है!
और सिर्फ कोसल ही विचार विहीन नहीं रहा। इन दिनों तो सारे कोसल, मगध, विदर्भ, हस्तिनापुर तक विचारों से रहित हो चले हैं!
कहने की जरूरत नहीं कि मगध (1983) संग्रह की कई कविताएँ समकालीन राजनीति के भी पतन पर शायद सबसे सटीक टिप्पणी हैं! इस प्रसंग में इस संकलन की दो कविताएँ की निम्न काव्य पंक्तियाँ एक बार फिर से पठनीय हैं-
बधई हो महाराज...
राजसूय पूरा हुआ
आप चक्रवर्ती हुए
वे सिर्फ कुछ प्रश्न छोड गए हैं जैसे कि यह कि-
कोसल अधिक दिन टिक नहीं सकता
कोसल में विचारों की कमी है...
कल ही तो छोडा था
न मगध है न मगध
तुम भी तो मगध को ढूँढ रहे हो
बंधुओं
यह वह मगध नहीं
ये वो मगध है जिसे
तुम मेरी तरह गँवा चुके हो! (मगध)

दूसरी कविता है तीसरा रास्ता जिसमें मगध फिर से लौटता है, लेकिन कुछ इस तरहः
मगध में शोर है
कि मगध में शासक नहीं रहे
जो थे
वे मदिरा प्रमाद और आलस के कारण
इस लायक नहीं रहे
उन्हें हम
मगध का शासक कह सकें ....
तब हम क्या करें
शासक नहीं होंगे, तो कानून नहीं होगा
कानून नहीं होगा, तो व्यवस्था नहीं होगी
व्यवस्था नहीं होगी, तो धर्म नह होगा
धर्म नहीं होगा, तो समाज नहीं होगा
समाज नहीं होगा, तो व्यक्ति नहीं होगा
व्यक्ति नहीं होगा, तो हम नहीं होंगे
हम क्या करें?
कानून तोड दें
धर्म छोड दें?
दो ही रास्ते हैं
दुर्नीति पर चलें
नीति पर बहस बनाए रखें
दुराचार करें
सदाचार पर चर्चा चलाएँ रखें
असत्य कहें
असत्य करें
असत्य जिएँ
सत्य के लिए
मर मिटने की आन न छोडें
अंत में प्राण सब छोडते हैं
व्यर्थ के लिए प्राण न छोडें
मित्रों, तीसरा रास्ता भी है
मगर वह मगध अवंती
कोसल या विदर्भ होकर
नहीं जाता!

सम्पर्क - 17, बी-1 हिदुस्तान टाईम्स अपार्टमेन्ट, मयूर विहार, फेज-1,
दिल्ली-110091
मो. ९८११७१३२९६