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ग्रंथमालाएँ और साहित्य

-ब्रजरतन जोशी
ग्रंथमालाएँ साहित्य इतिहास की वे जडे हैं जिनसे साहित्य का जंगल अपनी वैविध्यता, सुवास और रसमयता को बरकरार रखते हुए हरा-भरा रहता है। हिन्दी साहित्य के विकास में ग्रंथमालाओं की भूमिका अहम् है। हालांकि इस विषय पर पर्याप्त चिन्तन, मनन और अनुसंधान की भरी-पूरी आवश्यकता है। अब तक ऐसा कोई व्यवस्थित शोध या अध्ययन अभी हमारे सामने नहीं आ पाया है कि जो साहित्य के विकास में ग्रंथमालाओं की महत्ती भूमिका को भली प्रकार से विश्लेषित कर सके।
ग्रंथमालाएँ पाठक के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। क्योंकि वे पाठक की पठनवृत्ति में नियमितता को प्रक्षपित करती है। पाठकीय चरित्र के निर्धारण में उसकी भूमिका अहम होती है। ग्रंथमालाओं के साथ पाठक एक पारिवारिक रिश्ता-सा महसूस करता है। हालांकि खतरा यह भी है कि ग्रंथमालाओं के पठन से पाठकों में फार्मूलाबद्ध पठन वृत्ति विकसित हो सकती है, पर ऐसा पाठकीय विवेक की जागरूकता के अभाव से ही संभव है। ग्रंथमालाएँ पाठक की क्षमता, उत्सुकता को तो बढाती ही है, साथ ही उसे अध्ययन और बौद्धिक विकास हेतु भी प्रेरित करती है। ग्रंथमालाएँ सृजनात्मक ज्ञान का व्यवस्थित रूप होने के कारण पाठक के लिए एक ऐसी लयबद्धता रचती है जिसके सहारे पाठक अपने ज्ञानात्मक एवं सृजनात्मक विकास की दिशा में आसानी से आगे बढ सकता है। ग्रंथमालाएँ किसी एक विषय से संबंधित भी हो सकती है और अनेक विषयों के आयामों से भी जुडी भी हो सकती है। हिन्दी के शीर्ष प्रकाशकों ने भी कईं महत्त्वपूर्ण ग्रंथमालाएँ प्रकाशित कर हमारे समय के विशिष्ट सृजन को हमारे सामने रखा है।
ग्रं*थमालाएँ वे ज्ञान झरोखा हैं जिनसे मनुष्य अपनी बौद्धिक आकुलता और जिज्ञासा को शान्त करते हुए सम्पर्क ज्ञान के पथ पर आगे बढ सकता है। विषय विधाओं पर एकाग्र होने के कारण पाठक को एक आत्मिक शांति का अहसास होता है। ग्रंथमालाएँ किसी संस्थान, प्रकाशक या लेखक की नहीं वरन् सामाजिक सम्पत्ति होती है। जिस पर समाज के सभी वर्गों का समानधिकार होता है।
ग्रंथमालाएँ यहाँ हमारे विद्यमान ज्ञान को व्यापक बनाती है वहीं हमें एक असीम अनुभव संसार से भी जोडती है। जहाँ हम अपने अनुभवों को विभिन्न कसौटियों पर कसते हुए परख सकें। अच्छी ग्रंथमालाएँ संतुलित आहार की तरह होती है जिनसे हम दैनिन्दन ऊर्जा पर्याप्त मात्रा में प्राप्त करते हैं। किसी भी एक ग्रंथमाला से गुजरना अस्तित्व के विविध आयामों की यात्रा का अनुभव है। इन अर्थों में ग्रंथमालाएँ अस्तित्व का पुनर्पाठ है जिनसे मनुष्य अपने आस-पास के वातावरण, परिवेश और अपनी बौद्धिक सामर्थ्य से रागात्मक रिश्ता बढाता है।
यहाँ हम ग्रंथमालाओं के क्रमिक ऐतिहासिक विकास के विवेचन में न जाकर वर्तमान परिदृश्य की दो विशिष्ट ग्रंथमालाओं पर ही केन्द्रित रहेंगे। एक रजा फाउण्डेशन की ओर से प्रकाशित रजा ग्रंथमाला और दूसरी प्राकृत भारती अकादमी की अहिंसा-शांति ग्रंथमाला। दोनों ही ग्रंथमालाओं का अपना-अपना महत्त्व है। जहाँ रजा ग्रंथमाला में लगभग 150 से ऊपर पुस्तकें हमारे सामने मुद्रित-पुनर्मुद्रित, अनूदित हो चुकी हैं, वहीं अहिंसा-शांति ग्रंथमाला में अहिंसा-शांति के विविध आयामों के साथ विशिष्ट विषयों को स्पर्श करती पाँच मौलिक एवं तीन अनुदित पुस्तकें अब तक हमारे सामने आईं हैं। जाहिर है कि रजा फाउण्डेशन की ग्रंथमाला के चयन में विधा, विषय और विचार की वैविध्यता हैं, वहीं अहिंसा-शांति-ग्रथमाला में अहिंसा-शांति का विचार केन्द्र में है। इस ग्रंथमाला में अब तक इस विषय के महत्त्वपूर्ण एवं अविचारित पक्षों पर हिन्दी में पर्याप्त सामग्री पहली बार उपलब्ध हुई है।
ऊपर हमने जिन दो ग्रंथमालाओं का जिक्र किया, उनकी संरचना, स्वरूप और उद्देश्य में पर्याप्त अंतर होते हुए भी एक आधारभूत साम्यता यह है कि दोनों ही इस विचलित करने वाले समय में समाज और संस्कृति के परिसर के ज्ञानात्मक विकास के साथ बौद्धिक संस्कार के प्रति सजग ओर संवेदनशील हैं। दोनों ही ग्रंथमालाओं का लक्ष्य पाठक के पाठकीय विवेक की यात्रा को गति और दिशा देना है। दोनों ही अपने संसाधनों, क्रियान्वयन और व्यवहार में पर्याप्त अंतर को लिए हुए है, पर उद्देश्य व पथ एक ही है। इसलिए इनकी परस्पर तुलना करना न्यायसंगत नहीं जान पडता। अपने विचार, दर्शन और सरोकारों की दृष्टि से दोनों ही ग्रंथमालाएँ हमारे समय की ज्ञान राजनीति के अनन्त आकाश में तबियत से उछाले गए उस पत्थर की तरह है, जो आकाश में सुराख करने की अपनी क्षमता के स्वाभिमान से युक्त है।
क्योंकि रजा ग्रंथमाला के ग्रंथों की संख्या अधिक है। अतः सभी प्रकाशित ग्रंथों यहाँ उल्लेख करना संभव नहीं है, पर प्राकृत भारती अकादमी की अहिंसा-शांति ग्रंथमाला की संख्या कम होने के कारण यहाँ हम उसके अन्तर्गत प्रकाशित गंथों की परिचयात्मक चर्चा करना उचित समझते हैं।
सामान्यतः राजस्थान को भक्ति और शक्ति के आलोक में देखा और जाना जाता रहा है। पर प्राकृत भारती अकादेमी की इस पहल के कारण आने वाले समय में राजस्थान को, इस घोर हिंसक होते जा रहे समय में अहिंसक समाज की राह पर बढने वाले अग्रणी राज्य के रूप में जाना जाएगा। यह ग्रंथमाला राजस्थान को सामंती, औपनिवेशिक चरित्र और शब्दावली से मुक्त कर मानवीय एवं प्रजातांत्रिक चरित्र का संस्कार देने की एक ठोस बौद्धिक प्रक्रिया का प्रस्थान बिन्दु है।
इसके अतिरिक्त इस ग्रंथमाला पर चर्चा करने के कईं और कारण भी हैं। एक, हिंदी में अहिंसा-शांति विषय पर एकाग्र इस तरह की कोई ग्रंथमाला पहले से उपलब्ध नहीं है। हाँ, कुछ वर्ष पूर्व इसी संस्था ने अहिंसा विश्वकोश जैसी अद्भुत कृति हिन्दी पाठकों को अर्पित की थी। संयोग से उसी के संपादक नंदकिशोर आचार्य ही इस ग्रंथमाला के संपादक भी हैं। दूसरे, इस ग्रंथमाला के माध्यम से पहली बार प्रत्यक्ष हिंसा के बजाय अप्रत्यक्ष हिंसा ओर संस्कृति की विश्वास प्रणाली यानी संरचनात्मक हिंसा के विविध पक्षों पर सुव्यवस्थित अध्ययन, विश्लेषण और नए पाठ हमारे सामने आए हैं।
तीसरे, अहिंसा-शांति आज के कोविड-19 संसार में हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। क्योंकि जब तक हम अपनी सांस्कृति की संरचना में व्याप्त हिंसा की पहचान नहीं कर पाएँगे, तब तक वायरस से लेकर नक्सलवाद या अन्य हिंसक आन्दोलनों की जड तक जाने में अक्षम ही रहेंगे।
चौथे, यह ग्रंथमाला हमारे समय के यक्ष प्रश्न हिंसा की पृष्ठभूमि में जाकर, उसके गर्भ में विकसित हो रहे कारणों की पडताल कर, उनके नवीन उपाय और रास्ते हमें सुझाती है। ग्रंथमाला के प्रकाशकीय में कहा भी गया है कि अहिंसा-शांति ग्रंथमाला का प्रयोजन हिंसा और अहिंसा शांति के विविध सूक्ष्म रूपों और उनकी पृष्ठभूमि में सक्रिय मनोवैज्ञानिक-सांस्कृतिक आधारों को समझने और अहिंसा के इन रूपों से उबरने के उपायों और विकल्पों से सम्बन्धित पुस्तकों का प्रस्तुतीकरण है। क्योंकि इन रूपों-आधारों की सम्यक समझ के बिना अहिंसा-विमर्श के वातावरण और अहिंसक समाज का विकास संभव नहीं।
पाँचवे, इस ग्रंथमाला के कारण कुछ अति महत्त्वपूर्ण विषयों के ग्रंथ हिन्दी पाठक समुदाय के सामने, हिंदी के स्वाभिमान की रक्षा करने की भाव को लिए है।
इस ग्रंथमाला में अब तक आठ पुस्तकें हमारे सामने आईं हैं। जिसमें महान दर्शनशास्त्री अन्ना हारेंट के विचार विश्व से गुजरते हुए हम हिंसा का उत्खनन के साथ-साथ सांस्कृतिक हिंसा के रूप, संघर्ष-समाधान, अराज्यवाद अहिंसक व्यवस्था की तलाश, भारतीय स्त्रियों का अहिसंक प्रतिरोध की यात्रा से तो गुजरते ही हैं, साथ ही अनुवाद के माध्यम से सुनील सहस्त्रबुद्धे की बौद्धिक सत्याग्रह आधुनिक विज्ञान को गाँधी की चुनौती, पीटर सिंगर की अद्भुत पुस्तक जीवन जो आप बचा सकते हैं, इमैनुल कांट की शाश्वत शांति की अनूठी यात्रा भी हमारे पाठकीय विवेक का परिष्कार करती है।
इस ग्रंथमाला की एक अहम् उपलब्धि है द लाईफ आफ माइंड जैसी अद्भुत कृति के सार तत्त्व का हिन्दी समुदाय के सम्मुख अत्यन्त सहज एवं सम्प्रेषणीय प्रस्तुतीकरण। हारेंट हमारे समय के उन गिने-चुने दार्शन अध्येताओं में हैं जिन्होंने मानव मन की अतल गहराईयों में पल रही हिंसा की जडों को पहचानने की प्रामाणिक कोशिश की है।
पुस्तक हिंसा का उत्खनन के विद्वान लेखक अम्बिकादत्त शर्मा और विश्वनाथ मिश्र ने न केवल हारेंट के दर्शन की तत्त्व मीमांसा को ही हमारे सामने रखा है, बल्कि भारतीय ज्ञान मीमांसा के साथ गाँधी दृष्टि और विचार के परिप्रेक्ष्य में समझने-समझाने की शानदार पहल की है। इस पुस्तक से गुजरना एक साथ कईं ज्ञान अनुशासनों की यात्रा के साथ अस्तित्व की प्रकृति से परिचित होने की यात्रा से भी गुजरना है।
अहिंसक राज्य की तलाश हमारे समय का एक बडा स्वप* है। इस स्वप* को साकार करने के लिए पहले उसके इतिहास, पृष्ठभूमि और विचार से परिचित होना परम आवश्यक है। इस ग्रंथमाला की पुस्तक अराज्यवाद अहिंसक व्यवस्था की तलाश के लेखक सत्यम कुमार सिंह हैं। उनका कहना है कि अराजकतावाद की ध्वनि निंदात्मक है। अतः उन्होंने श्री नंदकिशोर आचार्य के सुझाए शब्द अराज्यवाद को एनार्किज्म का सही अनुवाद मानते हुए उसी का प्रयोग इस अध्ययन में किया है। अपने अध्ययन में वे अराज्यवाद का परिचय देते हुए, उसके स्वरूप पर विचार करते हैं और विषय के विशिष्ट विचारकों के व्यवस्थित विचारों को हमारे सामने रखते हुए नव- अराज्यवाद की व्याख्या करते हुए अंततः गाँधी के स्वराज प्रत्यय से सहमत होते हैं।
इसी क्रम में मिथिलेश की पुस्तक संघर्ष-समाधान जीवन के दो महत्त्वपूर्ण पक्षों की व्याख्या करती है। पुस्तक संघर्ष के कारणों और उनकी पहचान के साथ समाधान के सैद्वान्तिक रूप को सुचिंतित अध्ययन के रूप में हमारे सामने रखती है। हिन्दी में इस तरह के विषयों पर पर्याप्त चिंतन की आवश्यकता की कमी को पूरा करती यह पुस्तक अपने कलेवर में समाधान के व्यावहारिक पक्ष पर भी सार्थक विचारों को साझा करती है।
सुप्रिया की पुस्तक भारतीय स्त्रियों का अहिंसक प्रतिरोध इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि अपनी संरचना में उनका यह अध्ययन स्त्री आन्दोलनों और अहिंसा के परस्पर रिश्ते की पडताल ही नहीं करता वरन् उसके इतिहास से हमारा परिचय बढाते हुए भारतीय नारीवादी आंदोलनों की अहिंसक प्रवृत्ति की ओर भी हमारा ध्यान आकृष्ट करता है। उनकी यह स्थापना मौलिक है कि भारतीय स्त्री आंदोलनों का अपना विशेष चरित्र है और उस विशिष्टता के गठन में गाँधी की प्रेरणा और प्रभाव काम कर रहे हैं।
इस ग्रंथमाला की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं विचारोतेजक पुस्तक राजाराम भादू कृत सांस्कृतिक हिंसा के रूप है। इस पुस्तक पर इसी अंक में हमारे समय के सुविज्ञ अध्येता त्रिभुवन ने विस्तार से प्रकाश डाला है।
इस ग्रंथमाला के तीन अनुवाद भी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। सुनील सहत्रबुद्धे की पुस्तक बौद्धिक सत्याग्रह आधुनिक विज्ञान को गाँधी की चुनौती एक विचारोतेजक कृति है। बौद्धिक सत्याग्रह पर इतना व्यवस्थित चिंतन हिन्दी पाठकों के साथ अध्येताओं के लिए प्रेरक है। यह पुस्तक विजेता विज्ञान के कारण जीवन परिसर में उत्पन्न हुए गरीबी, बेरोजगारी और अशिक्षा के लिए गाँधी के स्वराज को ही उपयुक्त मानती है और बहुत ही ठोस एवं प्रामाणिक तर्कों से यह स्थापित करती है कि आधुनिक विज्ञान किसी भी मनुष्योचित कार्य में कैसे एक बडी बाधा है।
शांति अध्ययन इस समय अकादेमिक संसार और ज्ञान राजनीति के केन्द्र में है, क्योंकि इस तरह के अध्ययन ही हमें अपनी सीमाओं और संभावनाओं को एकसाथ दिखा सकते हैं। शाश्वत शांति इमैनुअल कांट की विश्व प्रसिद्ध कृति परपेचुअल पीसः एक फिलॅसॉफिकल स्केच का संजय कुमार शुक्ल द्वारा किया गया भावानुवाद है। युद्ध और शाश्वत शांति पर अपनी तरह का व्यवस्थित अध्ययन है। यह कृति शाश्वत शांति को एक आदर्श एवं मूर्त विचार मानती है।
द लाइफ यू केन सेव का हिंदी अनुवाद नंदकिशोर आचार्य ने जीवन जो आप बचा सकते हैं शीर्षक से किया है। यह पुस्तक जीवन से छिटकते जीवन के महत्त्व और मूल्यवान होने के ठोस तार्किक आधारों, उदाहरणों से भरी है, साथ ही मनुष्य को मानवीय गरिमा से विभूषित किए जाने की अनेक राहों का, राहों में आ रही बाधाओं का और उससे भी ऊपर हमारे द्वन्द्वों, समस्याओं की राह सुझाती है। पुस्तक हमारे अस्थिर चिंतन को स्थिर कर दिशाबोध देने का काम करती है। सिंगर का सम्पूर्ण जीवन गरीबी उन्मूलन के लिए समर्पित है। अस्तु, ये आठ पुस्तकें हमें हिंसा के विविध आयामों से न केवल हमारा परिचय ही बढाती है, बल्कि उसकी गिरफ्त से निकलकर अहिंसक विश्व समाज व्यवस्था के पथ पर पथारूढ होने के हमारे संकल्पों को गति और मति भी देती है।
ग्रंथमाला के विषय मौलिक, अन्वेषीवृत्ति सम्पन्न हैं। विश्लेषण में प्रामाणिकता इन अध्ययनों का प्राणतत्त्व है। हमारे जाने-पहचाने संसार के अछूते विषयों और अस्पर्शी बिन्दुओं को स्पर्श कर, नए ज्ञान विश्व के साथ जोडने की कवायद इसमें स्पष्ट रूप से झलकती है। इन्हीं अर्थों में यह ग्रंथमाला हिंदी के स्वाभिमान को बढाने वाली और हिंदी में साहित्येतर अध्ययनों के अतिरिक्त ज्ञान राजनीति और अकादेमिक्स के जटिल विषयों को सरल, सहज, बोधगम्य भाषा में हमारे सामने रखती है। हिन्दी को ज्ञान की भाषा बनाने के क्रम में ग्रंथमाला के संपादक नंदकिशोर आचार्य का यह अवदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
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काल के क्रूर थपेडों और मौत के भयानक ताण्डव के बीच मधुमती परिवार अपनी अटूट जिजीविषा को लिए आफ साथ खडा है। विगत दिनों हमारे साहित्य परिवार के कईं अभिभावक और सहृदय सदस्य सदैव के लिए हमसे बिछुड चुके हैं। जान रहे हैं कि मन खिन्न है, हत्प्रभ है, वाणी अवाक होती जा रही है। सोशल मीडिया पर किसी की फोटो देखना एक सिहरन से गुजरने का अनुभव होता जा रहा है। फिर भी हम अविचलित भाव से अपने कर्तव्य पथ पर अग्रसर हैं।
ऐसे समय में साहित्य की भूमिका और बढ जाती है कि वह अपने अद्वितीय विचार और अनुभवों के माध्यम से, इस घोर विचलनकारी समय में, हमें एक स्थिरता और दिशाबोध के साथ निर्भयता के आँचल में ले जाए। हमारा यह अंक बारह लेखों के साथ कहानी, संस्मरण, कविता और समीक्षा से सजा है। आशा है कि यह आपमें सहभाव की संवदेना को और पुष्ट करेगा।
कोरोना की यह दूसरी लहर अत्यन्त दारूण-दुःखदायी और घातक है। हमें केन्द्र और राज्य की ओर से जारी समस्त दिशा-निर्देशों की पालना करते हुए जीवन को गतिमान बनाए रखना है।
मंगलकामनाओं के साथ -
- ब्रजरतन जोशी