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नवनीत पाण्डेय के काव्य संग्रह पर

विजय सिंह नाहटा
नवनीत पाण्डे के संग्रह जब भी देह होती हूँ की कविताएँ कोलाहल होते जा रहे इस तीव्र समय में कुछ ठहरकर इत्मीनान से कविता के अंतर्पाठ और अनुशीलन की संभावना को बचाए हुए है। ये कविताएँ इस दृष्टि से भी अनूठी कही जाएँगी कि ये अपने कहन में समग्रता से संकेंद्रित हैं.. दूसरी बहुतेरी काव्य प्रवृत्तियाँ उन्हें विचलित किंवा अतिऋमित नहीं बनाती। इसीलिए ये कविताएँ कथ्य की ईमानदारी और नैतिक ऊर्जा से लबरेज है और कहीं भी भाषिक अतिरेक के व्यामोह में ग्रस्त नहीं होती। शाब्दिक आडम्बर से अछूती ये कविताएँ आत्मीय गुफ्तगू सी लगती हैं..यह नवनीत पाण्डे के कवि की विरल विशेषता ही कही जायेगी। सरल शिल्प उनकी कविताओं का सबल पक्ष बनकर उभरा है.. बिल्कुल चित्ताकर्षक वितान और वृहत्तर पैरोकारी जैसे कथ्य और शिल्प को एकीकृत कर पूरे संवेग से कविता में धकेलते हैं .. एक बेहतर दुनिया का संकल्प संजोए एक काव्य दृष्टि इस तरह संग्रह की हर कविता में अंकुरित होती जान पडती है। लेकिन यह सरलीकृत काव्य स्थापत्य भी उनके संग्रह के मुख्य प्रतिपाद्य को बहुत मुखरता से पाठक के समक्ष प्रस्तुत कर उसे इसके आयोजन में शामिल करता है..इसीलिए ये कविताएँ एकांगी न होकर एक समवेत स्वर बन जाती हैं और हमारे समय की एक बडी त्रासदी को विमोचित करती हैं।
कविता के कमतर अध्येता प्रथमदृष्टया इस संग्रह की कविताओं को फैमिनिन आवाज कहकर खारिज भी कर सकते हैं लेकिन प्रतिरोध का कवि का स्वर किसी सत्ता के समानांतर खडे होना नहीं है और जैसा कि सत्ताओं का यह अंतःसंघर्ष अंतहीन प्रक्रिया है .. नवनीत पाण्डे की कविताएँ एक तरह से स्त्री का स्वायत्त आत्मसंघर्ष ही है जहां वह खुद के भीतर अंतःप्रातिभ सद्गुणों के विकास के लिए संघर्षरत प्रतीत होती है और इस वैविध्यपूर्ण दुनिया के सौन्दर्य में अपना सौन्दर्य भी एकाकार करना अपना इष्ट मानती है। इस सौन्दर्य के प्रस्फुटन में जहां मान्यताएँ रूपी या सोच रूपी कोई गतिरोध इस स्वप्न को तिरोहित करता जान पङता है तब उस वैचारिकी से टकराहट और भिडंत की पूरी तैयारी इन कविताओं में यत्र तत्र सर्वत्र लक्षित की जा सकती है.. इस दृष्टि से ये कविताएँ स्त्री की गरिमा और नैसर्गिक दाय की मानवता के पक्ष में पुनः प्रतिष्ठा किये जाने के महती उपक्रम के रूप में रेखांकित की जानी चाहिए। इसीलिए मुझे इन कविताओं से गुजरते हुए लगा कि जैसे अंतहीन अंधेरी निशा के बाद आशान्वित सुबह हमारी प्रतीक्षा कर रही है और यह गोया एक चिरस्वप्न के साकार होने जैसा ही होगा। सुनो इरोम !! कविता की कतिपय अंतिम पंक्तियाँ बहुत कुछ उस सपने के साकार होने की छटपटाहट को ध्वनित करती हैं ..
इसलिए हे इरोम !
फिर से उठ ! जाग !
दिखा!
कैसे ?
एक मामूली-सी चिनगारी
बन जाती है आग !!
यह गहन ताप इस संग्रह की प्रवृत्ति के रूप में रेखांकित किया जा सकता है। नवनीत पाण्डे की कविताएँ उस मनुष्य राग को जीवन के केंद्र में देखना चाहती हैं जो नैसर्गिक प्रेम और सौंदर्य को ही प्रकारांतर से जीवन सत्यों के प्रकटीकरण का उत्स मानती है। स्त्री की त्रासदी एक तरह से मानवीय मूल्यों का ही क्षरण हैं.. कवि उस शून्य को स्त्री के जीवन की अनंतानंत छवियों में साम्य और संतुलित जीवनदृष्टि की बरामदगी से भरने का साहस करता है। दुःख का यह अनन्त विस्तार एक तरह से प्रेम का ही अनुसंधान है.. जो कविता या कोई भी कलानुशासन बखूबी अंजाम देती है.. चुनांचे यह संग्रह भी इसका अपवाद तो कतई नहीं है। प्रतिरोध का खास स्वर इन खूबसूरत कविताओं को परिवर्तनकामी कविताओं का विरुद देता प्रतीत हो सकता है लेकिन मुझे नहीं मालूम कविता किस मैकेनिज्म के जरीए बदलाव लाती है, लाती अवश्य है लेकिन सबसे अहम और बडी बात है परिवर्तन या बदलाव की बेचैनी का होना.. आग का प्रज्वलित बने रहना। कहना न होगा नवनीत पाण्डे उस आग को, बेचैनी को, बदलाव के स्वप्न को बचाए हुए है। यही इस संग्रह की रचनात्मक निष्पत्ति भी है।
नवनीत पाण्डे के आलोच्य संग्रह की कविताओं की स्त्री जयशंकरप्रसाद की ..नारी तुम केवल श्रद्धा हो के पडाव से काफी आगे निकल कर जीवन रण में हर चुनौती को स्वीकार करने को न केवल आतुर है अपितु हर छद्म और विडम्बनाओं को भी ध्वस्त करने का जीवट लिए है। ये कविताएँ स्त्री के जीवन की अनंतानंत छवियों में प्रवेश कर सार्थक संवाद और विमर्श का प्रस्थान बिंदु गढती हैं। स्त्री की त्रासदी एक तरह से इन भिन्न-भिन्न कोणों से भी जानी-समझी जा सकती है। यह अवसर यह संग्रह पूरी शिद्दत से देता है। आम बोलचाल की भाषा में संवेदन अधिक घनीभूत हुआ है जबकि पूरे संग्रह में संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग न के बराबर है। बिम्ब बहुलता तो कदापि नहीं। फिर भी स्त्री वाकई स्त्री हो रही है कविता में एक बिम्ब प्रयोग से वो हमें विस्मय-विमुग्ध करते हैं..
रात अपना सिर सूरज की बट्टी से धो रही है
बहरहाल, नवनीत पाण्डे की कविताएँ स्त्री के जीवन की गहनता से पडताल करती है। यह स्त्री की दैहिक मुक्ति के बरक्स वैचारिक और भावात्मक आजादी का ताना-बाना बुनती है। नारी का भी एक स्वायत्त व्यक्तित्व और ठोस वजूद हो .. यह इस संग्रह की केन्द्रीय चिन्ता का सूत्र है। स्त्री जो हूँ कविता की एक बानगी देखिए..-
तुमने सही कहा...
मै नहीं हूँ
तुम्हारी
किसी भी राग में
कैसे होऊंगी भला
आठवा सुर जो हूँ।
संग्रह में भले घर की लडकियाँ शीर्षक से कविता सीरिज है। किस तरह लडकी में लडकी होने का अहसास भर दिया जाता है .. हौले से चुपचाप, बिना किसी शोरगुल के, बिना किसी प्रतिरोध और ग्लानि के और एक प्रतिसंसार खडा हो जाता है जैसा कि अपनी प्रसिद्ध कविता क्रूरता में कुमार अंबुज कहते हैं कि क्रूरता संस्कृति की तरह फैल जाएगी और उसका कतई विरोध न होगा..कुछ कुछ स्त्री की नियति के सापेक्ष हम इसे देख सकते हैं..यह मनोवैज्ञानिक फिनोमिना इन कविताओं के साथ गहरे इत्तेफाक रखता है। संग्रह में नदी के बहाने कुछ खूबसूरत प्रतीकात्मक कविताएँ दी गई हैं जो नारी के संघर्ष का ही विस्तार है और शैल्पिक वैशिष्ट्य लिए हुए पठनीय बन पडी हैं। नदी क्या है कविता की एक झलक इस तरह..
नदी के भीतर
बहती हैं कितनी नदियां
सिर्फ नदी जानती है
एक नदी के भीतर
उफनती हैं कितनी नदियां
सिर्फ नदी जानती है।
कुछ कुछ आत्मसंघर्ष की अनंतानंत धाराएँ भी बहती हैं नारी के जीवन में..लेकिन सिर्फ नारी जानती है। हाशिये पर धकेल दिए गए सत्य को पूरी ईमानदार मुखरता से जीवन की मुख्य संचेतना में स्थापित करने का स्वप्न इन कविताओं में झिलमिलाता है जो इन कविताओं को ऊर्जावान बनाता है .. विचारसंपन्न करता है। देखिए एक प्रतिदर्श..-
एक स्त्री
कितनी रातें
जागती
काली करती है
तुम्हारा
दिन बनाने के लिए।
कहना न होगा कि अब यह एक नये दिन की शुरुआत का आह्वान है जहाँ स्त्री की गरिमा के अनगिन आख्यान हों और कहने लिखने को शेष न रहे व्यथा-कथाएँ। पुस्तक का मुद्रण सुरुचिपूर्ण है। कवि को बधाई और शुभकामनायें।
कृति- जब भी देह होती हूँ
कवि- नवनीत पाण्डे
प्रकाशक- सर्जना, शिवबाडी रोड, बीकानेर
मूल्य.. 100/-
प्रकाशन वर्ष -
सम्पर्क - बी ..92, स्कीम 10बी
गोपालपूरा बाईपास
जयपुर- 302018
मोबाइल नंबर..-7850873701
nahatavijay60@gmail.com

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चारबैत शैली में प्रेम का लोक पक्ष
डॉ.सुरेश सिंह राठौड

लोक साहित्य का हमारे जीवन के साथ गहरा सम्बन्ध है और जीवन का सम्बन्ध प्रेम के साथ । यही कारण है कि सदियों से यह प्रेम तत्व अनेक रूपों में साहित्य में अभिव्यक्ति पाता रहा है। संस्कृत साहित्य से लेकर वर्तमान काल तक साहित्य में प्रेम नाना रूपों में अभिव्यक्त होता रहा है। हिन्दी के मध्यकालीन साहित्य में कबीर ने तो *ढाई आखर* पढने वाले व्यक्ति को पण्डित होने का प्रमाण पत्र ही दे दिया तो जायसी ने कहा *मानुस पेम भयउ बैकुंठी*। लोक काव्य *ढोला मारू-रा दूहा* में प्रेम को *गूंगे का सपना* कहकर उसकी महत्ता का प्रतिपादन किया है । वस्तुतः यह ढाई आखर क्या है ? सूफी संतों ने इश्क हकीकी और इश्क मजाजी कहकर इसके दो भेद कर दिए । आदिकाल से ही प्रेम तत्व को समझने-समझाने के लिए न जाने कितने ग्रंथों का प्रणयन किया गया है परन्तु प्रेम का रस इतना गूढ है कि उसे पढकर नहीं जाना जा सकता, उसे चख कर ही समझा जा सकता है, जाना जा सकता है । इसलिए प्रेमानुभूति सबसे ज्यादा प्राणवान और सशक्त अनुभूति है । इसी सशक्त अनुभूति की अनुगूँज वाचिक परम्परा में तथा लोक साहित्य में दूरतक सुनाई देती है । राजस्थान में लोक गायिकी की चारबैत शैली में इसी प्रेम तत्व को रूपायित किया गया है । प्रस्तुत शोधालेख के माध्यम से इसी प्रेम तत्व को रेखांकित करते हुए लोक गायिकी की चारबैत शैली, जो वाचिक परम्परा का एक रूप है; को अभिव्यक्त करने का सार्थक प्रयास किया गया है ।
*चारबैत* राजस्थान में गायी जाने वाली लोक गायिकी की एक शैली है । इसका सम्बन्ध उर्दू की उस शायरी से है जो कव्वाली की तरह एक खास अंदाज में गायी जाती है। उत्साह एवं जोशो खरोश इसकी गायकी की विशिष्टता है। चारबैत उर्दू की वह शायरी है जो समूह में गायी जाती है और जिसके प्रत्येक बंद में चार मिसरे होते हैं। अर्थात् जिस प्रकार गजल के प्रत्येक शे*र में दो मिसरे होते हैं उसी प्रकार चारबैत के हर बंद में चार मिसरे होते हैं। शे*र के आधे हिस्से को पंक्ति या मिसरा कहा जाता तथा दो मिसरे मिलकर एक शे*र बनता है।
*चारबैत* शब्द के अर्थ को देखें तो ज्ञात होता है कि फारसी भाषा में *बैत* शब्द का अर्थ *पंक्ति* होता है। इस प्रकार चारबैत का अर्थ है, चार पंक्तियों वाली कविता क्योंकि इसके हर बंद में चार मिसरे होते हैं और ये एक विशेष *बहर* अर्थात एक धुन में लिखी जाती है। इसलिए इसे चारबैत के नाम से जाना जाता है। कुछ आलोचक इसे अफगानी लोक गीत भी मानते हैं। इस प्रकार यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अफगान के लोक में यह गायकी रची-बसी थी। इस आधार पर यह भी माना जाता है कि इस शैली का उद्भव अफगानिस्तान में हुआ था। *चार बैत मूलतः पठान संस्कृति से जुडी गायन परंपरा है। फारसी भाषा में चार पंक्ति के विशेष तुक युक्त छंद को *बैत* कहा जाता है। चार बैत के समुच्चय को चारबैत नाम से जाना जाता है।*1 कुछ समीक्षकों के अनुसार यह गायन शैली करीब 1,500 साल पहले पश्तो और फारसी के माध्यम से अफगानिस्तान में शुरू हुई जहां युद्ध के दौरान एवं आराम के समय ये लोक गीत गाए जाते थे।
कुछ आलोचक चारबैत का अर्थ चार व्यक्तियों की परस्पर तकरार से भी लेते हैं। क्योंकि चारबैत मुख्यतः चार व्यक्तियों की तकरार से ही आरंभ होती है। अर्थात गायक दो दल बनाकर सवाल-जबाब करते थे। चारबैत में जो शायरी गायी जाती है उसमें कविता को सवाई, दो बंदी, चौबंदी, पांच बंदी और छह बंदी आदि कहते हैं। परंतु अधिकांश चारबैंतों में चौबंदी लिखी गयी है। सवाई चारबैंत में एक पूरी पंक्ति और दूसरी पंक्ति प्रथम की एक चौथाई होती है। दो बंदी में दो पंक्तियाँ तथा चौबंदी में चार पूरी-पूरी पंक्तियां होती है। पांच बंदी में पांचो पंक्तियां तथा छह बंदी में छहों पंक्तियाँ बराबर होती हैं।
स्थान विशेष के आधार पर चारबैत गायिकी के तरीके अलग-अलग हैं परंतु दो दलों के रूप में विभक्त होकर अखाडों के रूप में गायन की शैली विशेष है। अर्थात् दो दल आमने- सामने बैठकर शे*रों-शायरी में सवाल-जबाब करते हैं और एक दूसरे पर विजय प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।
भारत में इस शैली का आगमन कब हुआ? इस पर आलोचक एक मत नहीं है परंतु फिर भी कयास लगाए जाते हैं कि मुगलों के समय ही भारत में इसका आगमन हुआ था। मुगल पठानों के समय इस शैली के आगमन के कारण ही आलोचक इसे पठानी राग भी कहते हैं। यद्यपि कुछ आलोचकों की स्पष्ट मान्यता है कि बाबर के शासनकाल में चारबैत का आगमन हुआ था। इस प्रकार भारत में चारबैत शैली का इतिहास सदियों पुराना है।अरब देश, ईरान एवं अफगानिस्तान होते हुए भारत में यह कला आयी। भारत में सर्वप्रथम हैदराबाद में इस कला को फलने-फूलने का पर्याप्त अवसर एवं वातावरण मिला। टोंक के चार बैत गायक मुहम्मद उमर मियां के अनुसार भारत में इस कला का सर्व प्रथम आगाज मुरादाबाद में हुआ था। अरब के लोग इस शैली में गायन करते थे। इस शैली के गायन एवं वाद्ययंत्र ढप के संदर्भ में मान्यता है कि अरब के लोग ढप के साथ चारबैत गाकर खुशी का इजहार करते थे।
विशेष बात यह भी स्वीकार्य है कि भारत में जहाँ-जहाँ नबाबों का राज रहा, वहां-वहां चारबैत शैली का सर्वाधिक विकास हुआ एवं इसे फलने -फूलने का पर्याप्त अवसर मिला। आलोचकों का यह भी मानना है कि आजादी के पूर्व देश के विभिन्न घरानों की पलटनों में ये पठान सैनिक बहुतायत से भर्ती होते थे और भारतीय जनों से मिलकर फुर्सत के समय अपनी बहादुरी, विजय एवं कामयाबी के गीत गाते थे। हैदराबाद में भी चारबैत का गायन सबसे पहले फौज की बैरिकों में ही पहुंचा था उसके बाद ही सामान्यजनों तक।
चारबैत में गायक एक विशेष प्रकार के वाद्य यंत्र का प्रयोग करते हैं जिसे ढप कहते हैं। ये ढप लकडी के फ्रेम के बने होते हैं तथा बकरे या हरिन की खाल से मढे होते हैं। अर्थात एक ओर इन पर खाल चढाई जाती है तो दूसरी ओर यह पूरा खाली होता है जिससे थाप खाल पर पडने के कारण जोर की आवाज आती है। *बैत में चंग, जिसे ये कलाकार ढपली, ढप याकि दप ही अधिक कहते हैं, बजाकर गाने के साथ -साथ घुटनों के बल पर उछलते हुए नृत्य की विशेष अदाएं प्रस्तुत की जाती हैं।*2 हिंदुस्तान में चारबैत पांच रंग में होती है। हम्द, नात, आशिकाना, रकीबखाना तथा गम्माजखानी। हम्द में ईश्वर की स्तुति, खुदा की तारीफ की चारबैत लिखी जाती है। नात में मुहम्मद साहब की छन्दोबद्ध स्तुति की चारबैत लिखी जाती है। आशिकाना चारबैत में प्रेम, आशिकी, विरह, जुदाई से संबंधित चारबैत लिखी जाती है। रकीबखाना चारबैत में विभिन्न विषयों के साथ साथ सौतिया डाह, प्रेम में प्रतिस्पर्धा से संबंधित चारबैत लिखे जाते हैं। गम्माजखानी चारबैत में गाली -गलोच, जासूसी से संबंधित चारबैत लिखी जाती हैं।
चारबैत गायन के पांच रंगों में से एक रंग (प्रकार) आशिकाना चारबैत के नाम से जाना जाता है । आशिकाना चारबैत के अंतर्गत प्रेम और जुदाई अर्थात् (संयोग और वियोग श्रृंगार) श्रृंगार के दोनों प्रकारों का वर्णन हमें दृष्टिगत होता है। आशिकाना चारबैत में श्रृंगार के दोनों पक्षों का बहुत स्पष्ट तरीके से वर्णन किया गया है। नायिका (प्रेमिका) के रूप सौन्दर्य आदि का चित्रण चारबैत के आशिकाना प्रकार के अंतर्गत किया जाता है। वियोग श्रृंगार के अंतर्गत बहुत ही स्पष्ट और सुसंगठित वर्णन हमें आशिकाना चारबैत के अंतर्गत दिखाई देता है। इस चारबैत में अपने प्रिय से मिलन को उत्कंठ नायिका के चरित्र का चित्रण मिलता है, तो दूसरी ओर प्रिय के प्रदेश चले जाने पर विरह में डूबी हुई नायिका के चरित्र का चित्रण दृष्टित होता है, हालांकि प्रेम का विषय अपने आप में एक विस्तृत एवं रोचक विषय है लेकिन फिर भी बहुत कुछ विषयों को आशिकाना चारबैतों में कलाकारों ने प्रधानता प्रदान की है ।
नायक नायिका के एक दूसरे के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हैं । वे अभिन्न हैं, जुदा होने पर जीने की सोच भी नहीं सकते । जीना मरना एक दूसरे के साथ । नायक अपनी जिंदगी नायिका के जीवन से जोडते हुए उसी के साथ अपने आप को रखना चाहता है और उसी के साथ जीना चाहता है तो मरना भीर्-
आप से होकर जुदा क्यों कर जीए
आरजू थी हाथ से तेरे मेरे ।
कत्ल की दरखास्त तुझसे क्या करें
तेग कब तुझसे संभाली जाएगी3 ।।
प्रेम प्रधान चारबैतों का एक- एक शब्द सात्विक प्रेम की आतुरता को व्यक्त करता है । इनमें नायक- नायिका के मिलन की उत्कंठा का भी चित्रण हुआ है । जब प्रेम किया तो जमाने से क्या डरना ? नायक सामाजिक बन्धनों, रीति- रिवाजों को तोड अपनी जान की परवाह किए बिना अपनी प्रियतमा से मिलना चाहता हैर्-
हाजिर यह मेरा सर है, चाहे तो कलम कर दे ।
तू मेरा मसीहा है, चाहे तो रहम कर दे ।
मरने की नहीं परवाह, बस इतना करम कर दे ।
लग जा मेरे सीने से महबूब मेरे आके ।4
इन चारबैतों में स्वच्छंद प्रेम का वर्णन है । जब से नायिका को नायक से मोहब्बत हुई है जिंदगी एक अलग ही अंदाज में नजर आने लगी है । हर पल अन्यमनस्क रहने वाली नायिका अब हर पल प्रसन्न रहने लगी है । जिस व्यक्ति या वस्तु को चाहे और वह मिल जाए इससे बडी और क्या बात हो सकती है? किसी को चाहना और उसको फिर जीवन साथी के रूप में पा लेना जीवन की सफलता की निशानी ही कही जायेगी। यहां हमें रीतिकाल के रीतिमुक्त काव्य धारा के प्रेम के पीर कवि घनानंद की पंक्तियां याद आ जाती है *रावरे रूप की रीति अनूप नयो नयो लागत ज्यो ज्यो निहारिए*
मजा आने लगा है जिंदगी में ।
तेरे लुत्फो करम बंदगी में ।
समाई है तेरी तस्वीर जी में ।
कहानी अब हकीकत हो गई है ।5
विरह की विदग्धता का पूर्ण परिचय भी इन चार बैंतों में मिलता है। इनमें प्रेमयों के हृदय की मार्मिक विरहानुभूति प्रकट हुई है। वियोग में प्रेमी के हृदय की अन्तर्दशाओं, व्यंग्योक्तियों,उपालम्भ इत्यादि का भी सुन्दर वर्णन हुआ है। विरह दशा प्रेमी के प्रेम की पूर्णता है । यह दशा प्रेमी को मानवमात्र के साथ समान भूमि पर खडा कर देती है और उसका प्रेम भी व्यक्तिगत सीमा के संकुचित घेरे से निकलकर संसार के व्यापक क्षेत्र में विचरण करने लगता है। विरही को संसार की जड वस्तु से सहानुभूति हो जाती है । नायक -नायिका के प्रेम, उनके मिलन तथा विरह की अनुभूतियाँ इनमें बहुतायत से मिलती हैं। इन चार बैंतों की एक और मुख्य विशेषता है - उनकी तन्मयता । प्रेम की विभोरता इनमें किसी न किसी रूप में पाई जाती है । प्रेम की प्रतीक्षा में विरहयुक्त नायक की दशा देखिए -
रुख से घूंघट को उठा, दिल को चुरा कर चल दिए,
दर्द आए उलझने बदले में देख कर चल दिए ।
किस लिए फिर दामन को झटक कर चल दिए,
क्यों मुझे देकर सहारा बेसहारा कर दिया ।। 6
संयोगावस्था में आनंद प्रदान करने वाली चीजें वियोगावस्था में दुःख देती हैं । प्रियतम के विरह में उसके स्मारक चिह्न प्रस्तुत चारबैत में भी रचनाकार ने नायक और नायिका की उस दशा का वर्णन किया है जब नायक और नायिका साथ में रहते हैं, दोनों प्रेम में मग्न होकर जीवन व्यतीत करते हैं। परन्तु अचानक नायिका की मृत्यु हो जाने के कारण नायक दुःख, संत्रास और पीडा की स्थिति में पहुँच जाता है और उसे याद आता है उसके साथ (नायिका) बिताया हुआ हर एक पल। नायक उसके बिना स्वयं को अधूरा मानता है और पल पल उसकी याद में तडपता रहता है । यथा र्-

वो मेरी हर बात पर, हंसना हंसाना क्या हुआ ।
रूठ जाना वो तेरा, मेरा मनाना क्या हुआ ।
साथ हमने जो गुजारा, वो जमाना क्या हुआ ।
छोडकर मझधार में क्यों मेरी हिम्मत तोड दी । ।
क्या कहूं इस दिल की हालत, मैं दिखा सकता नहीं ।
गम जुदाई का तो रफ्फो, अब सहा जाता नहीं ।
बिन तेरे मुझसे तो रफ्फो, अब रहा जाता नहीं ।
मैंने तेरी याद में, दुनिया से निस्बत तोड दी । 7
वियोग की दशा नायिका के लिए बहुत ही कष्टकारक है। नायक अपनी प्रियतमा को छोडकर प्रदेश चला गया है। ऐसे में विरह दग्द नायिका अकेली कैसे रह सकती है ? उसे पल पल प्रियतम याद आते हैं। जिस प्रकार भक्ति काल के कवि सूरदास ने गोपियों के विरह का वर्णन किया है, वैसा ही वर्णन यहाँ दृष्टव्य है र्-
नैनो से नैना मिला के, ले गए दिल को लुभा के
तुम बसे परदेस जाके, कैसे काटूँगी उमरिया
सदके जाऊं मैं तिहारे, जानो दिल सब तुझ पर वारे
दरश दिखला दे प्यारे, हो मेहर की एक नजरिया
मैं तेरी जोगन बनूंगी, ढूंढती बन बन फिरुंगी
गेरवा कपडे रखूंगी, इश्क में तो रे सांवरिया
तोरे द्वारे पर मैं आऊं, शीश चरणन पर नवाऊं
रो के बिता को सुनाओ, जल्दी लो मोरी खबरिया

प्रेम अंधा होता है । जब किसी को प्रेम की लगन लग जाती है तो हर स्थिति में वह नायिका को पाने की चाह रखता है । नायक हर तरह से नायिका को अपने दिलों जान में बसा कर रखना चाहता हैर्-

चूमू उसे चाहत से अगर खास जो पाऊं ।
पुतली की जगह आंखों में कमली को बसाऊ ।
फिर शौक से आंखें मलू सीने से लगाऊ ।
जलवो का तमाशा है तेरी काली कमलिया । 8

वर्षा ऋतु में विरह नायिका का विरह और बढ जाता है । वैसे तो उसे हर मौसम ही प्रेमी के बिना काटने को दौडता है परन्तु काली काली बदलिया, मोर की पिहू पिहू की आवाज उसके विरह को और बढा देती है । नायिका को वर्षा ऋतु में किस प्रकार पपीहा और कोयल की मधुर आवाज भी कष्ट देती हुई प्रतीत होती है। विरहव्यथित स्त्रियों को प्रिय की याद दिलाने वाला पपीहे का निरंतर पी कहाँ , पी कहाँ पुकारना असह्य वेदनाजनक होता है। ठीक ऐसा ही वर्णन हमें मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा रचित पद्मावत के बारहमासा वर्णन में नागमती के विरह के रूप में दृष्टित होता है। जब रत्नसेन नागमती को छोडकर सिंहल द्वीप चला गया तब नागमती को हर ऋतु के समान वर्षा ऋतु भी कष्ट देती हुई प्रतीत हुई उसी प्रकार इस नायिका को भीर्-

प्यारी प्यारी पपीहे की सदा कोयल की कूक
सुन के दादुर की सदा उठती है मेरे दिल में हूक
उस पे तेरे याद करती है जिगर के इक-इक
दिल को तडपाती है मेरे हर अदा बरसात की ।
प्रेम में प्रतिदान का भाव होता है । स्वयं कष्ट सहकर भी अपनों के प्रति सदाशयता दिखाना और उसकी कुशलता की कामना करना प्रेमी हृदय का काम है। विरही हृदय की अभिलाषाएं भी बडी विचित्र होती हैं। प्रिय के विदेश जाने की उपरांत विरह दग्द नायिका अपने कष्टों को भुलाकर प्रियतम की कुशलता की कामना करती हैर्-

सेज पर तडपू अकेली मैं पिया की याद में ।
तुम वहां पर साद रहो और यहाँ नाशाद मैं ।
रातो दिन रो रो के करती हूँ यही फरियाद में ।
रात अंधेरी कैसे काटू पी बिना बरसात के ।
तू सलामत रहे यह कहता है दिल सदा ।
जाने वाले तेरा हाफिज खुदा ।
तुझको शबनम यह देती है दिल से दुआ ।
तू यूं ही साद रहना यूं ही मुस्कुराना ।
प्रिय का विछोह असहनीय पीडा देता है। भूख, प्यास, नींद सब कुछ दूर की कोडी हो जाते हैं । सपना भी वैरी बन जाता है । परन्तु प्रेम में आशावादी होना अनिवार्य है । नायक नायिका को छोडकर प्रदेश में चला गया है परन्तु नायिका अभी भी प्रेमी से मिलने की आश नहीं छोडती है । वह निराशा में भी मिलन की आशा का दीप जलाये रखती हैर्-

बेचैन हूं बेकल हूं निंदिया नहीं आए हैं ।
और याद पिया तुम्हारी हर वक्त सताए हैं ।
विरह की अगन तन-मन जी मेरा जलाए हैं ।
सब छीन ली सुद बुद दर्शन हमें दिखला के ।

देखकर बिजली की छल बल ।
फर्द हूं मैं गम से बेकल ।
नींद आती है नहीं एक पल ।
ओ पिया आजा वतन में । 10
नायिका नायक को अपने पास बुलाने के कई लालच देती है, उपालंभ देती है और अंत में उसे चेतावनी भी देती है कि यदि तुम नहीं आये तो देखो ये चमन रूपी यौवन बिना बागे बहार के ही उजड जायेगा। वह कहती है कि मेरे दिल की यही आवाज है कि तुम जल्दी से मेरे पास आ जाओ नहीं तो मेरा यौवन बीता चला जा रहा है र्-

दिन-रात इसी गम में अश्कों की रवानी है ।
बर्बाद हुई जाती लो मेरी जवानी है ।
पिया अब तो दिल में यही बानी है ।
मर जाऊंगी एक दिन मैं तुम देखना विष खाके ।

होकर के जुदा तुझसे इस दिल को था बहलाया ।
गुलशन में ना यह बहला सेहरा में भी घबराया ।
ढूंढा तो बहुत लेकिन तेरा ना पता पाया ।
गुम हो गए नजरों से क्यों दिल में मेरे आके ।
अतर् निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि चारबैंत शैली में प्रेम के पूर्वानुराग, संयोग, प्रवास, वियोग आदि सभी दशाओं के सात्विक रूप का वर्णन हुआ है । विरह की जिस विदग्धता का परिचय सूर की गोपियों, जायसी के नागमति वियोग खण्ड में मिलता है, वैसा ही चारबैंतों में देखने को मिलता है । प्रेम की एकनिष्ठता, तल्लीनता, तादात्म्य सब कुछ इन चाराबैंतों में दृष्टिगत होता है । यदि इस प्रेम में कोई अलौकिक प्रेम देखना चाहे तो वो भी देख सकते हैं ।

पाद टिप्पणियाँ र्-
1) भानावत, डॉ. महेंद्र, भारतीय लोक नाट्य,आर्यावर्त्त संस्कृति संस्थान, दिल्ली,पृ सं 18
2) भानावत, डॉ. महेंद्र, भारतीय लोक नाट्य,आर्यावर्त्त संस्कृति संस्थान, दिल्ली, पृ सं 19
3) मोहम्मद, उमर मियां का हस्तलिखित अप्रकाशित चारबैत संग्रह, टोंक
4) मोहम्मद, उमर मियां का हस्तलिखित अप्रकाशित चारबैत संग्रह, टोंक
5) मोहम्मद, उमर मियां का हस्तलिखित अप्रकाशित चारबैत संग्रह, टोंक
6) मोहम्मद, उमर मियां का हस्तलिखित अप्रकाशित चारबैत संग्रह, टोंक
7) मोहम्मद, उमर मियां का हस्तलिखित अप्रकाशित चारबैत संग्रह, टोंक
8) मोहम्मद, उमर मियां का हस्तलिखित अप्रकाशित चारबैत संग्रह, टोंक
9) मोहम्मद, उमर मियां का हस्तलिखित अप्रकाशित चारबैत संग्रह, टोंक
10) मोहम्मद, उमर मियां का हस्तलिखित अप्रकाशित चारबैत संग्रह, टोंक

सहायक आचार्य, हिंदी विभाग,
राजस्थान केन्द्रीय विश्वविद्यालय,
बांदरसिंदरी, किशनगढ
Email:-drrathore76@gmail.com