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स्त्री-पुरुष मैत्री की खूबसूरत कथा : एक सच्ची झूठी गाथा

गीता दूबे
कात्यायनी की एक बेहद तीखी और दूर तक चोट करने वाली कविता की पंक्तियाँ हैं
देह नहीं होती एक दिन स्त्री / और उलट पुलट जाती है पूरी दुनिया
उपर्युक्त पंक्तियाँ न केवल सच्चाई से भरपूर हैं बल्कि जोरदार ढंग से समाज के मर्म पर चोट भी करती हैं क्योंकि स्त्री को होश सँभालने के बाद से ही यह अहसास कोंच-कोंच कर कराया जाता है कि उसकी देह विशिष्ट है, पुरुषों से अलग है। यह देहबोध उस समय उसे और भी अचंभित कर देता है जब बचपन से साथ खेलते-कूदते, एक साथ किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रखने वाले साथियों से उसे सायास दूरी बरतने की सलाह दी जाती है। यह दूरी ही स्त्री-पुरुष की मैत्री के रास्ते का पत्थर भी बनती है और उनके बीच पनपने वाले आकर्षण का कारण भी। बालिका से किशोरी बनती स्त्री यह समझ ही नहीं पाती कि आखिर यह दूरी बरतनी क्यों आवश्यक है और बालक से किशोर बनता पुरुष भी अपनी बचपन की साथिन को यूं बच-बच कर चलते देखकर अजीब कशमकश की स्थिति में घिर जाता है। और यहीं से स्त्री-पुरुष संबंधों के बीच रहस्यपूर्ण कौतूहल की शुरुआत होती है और यह कौतूहल ही कई मर्तबा उन्हें तथाकथित वर्जित संबंधों की ओर ले जाता है। अर्थात् हमारे समाज की स्वघोषित नैतिकता यह मान ही लेती है कि स्त्री और पुरुष की मैत्री एक खास उम्र तक ही कायम रह सकती है और? उसके बाद अगर यह मैत्री बरकरार रहती या रखी जाती है तो उसमें मन के साथ देह का शामिल होना जरूरी है। यह बात कई मायनों में सच हो सकती है लेकिन बहुधा देह के शामिल होने के पीछे समाज द्वारा देह के प्रति उत्पन्न कुछ गयी अनावश्यक सजगता भी कारण होती है। चूँकि स्त्री देह को एक रहस्य की तरह चटखारे लेकर वर्णित किया जाता है शायद इसीलिए पुरुष प्रायः उस रहस्य को भेदने के लिए व्याकुल भी दिखाई देता है। संभवतः इसीलिए हमारे समाज में स्त्री-पुरुष की मैत्री या तो बदनामी में परिणत होती है या प्रेम और उसके फलस्वरूप विवाह या विलगाव में। और विवाह के बाद फिर कोई दूसरा पुरुष उसका मित्र हो ही नहीं सकता क्योंकि उसे असूर्यम्पश्या कहा गया है जो किसी पराए पुरुष तो क्या सूर्य रूपी पुरुष के स्पर्श से भी दूषित हो सकती है। लेकिन क्या स्त्री पुरुष की यह मैत्री वर्जित या अस्वाभाविक है? मुक्तिबोध अपनी कहानी मैत्री की मांग में यही प्रश्न उठाते हैं जहाँ वह स्त्री की देह की बात नहीं करते बल्कि उसके मन की आशाओं और आकाँक्षाओं को सामने रखते हैं ,वह मन जो अपने पति के अतिरिक्त किसी अन्य प्रबुद्ध पुरुष से बातचीत करके संतुष्ट होता है। कहानी में तो समाज की तथाकथित नैतिकता के त्रास के कारण मैत्री की यह मीनार बनते-बनते रह जाती है। लेकिन आधुनिकतम उपलब्धि कहें या तकनीकी विकास का एक चेहरा, जिसका नाम है, आभासी दुनिया, ने आर्थिक आजादी से भी बडी आजादी स्त्रियों के हाथ में सौंप दी है जहाँ वह अपना नाम, पहचान और चेहरा गुप्त रखकर किसी से भी मित्रता कर सकती हैं वह चाहे स्त्री हो या पुरुष। यही आजादी पुरुषों को भी है। हालाँकि इसके अपने खतरे हैं। लेकिन खतरे कब नहीं थे। उस समय भी थे जब लडकियाँ अपने प्रेमी पर भरोसा कर नई दुनिया बसाने के रंगीन सपनों के साथ घर के सुरक्षित घेरे से बाहर निकलती थीं और कहीं की कहीं पहुँच जाती थीं।
दरस्सल मैत्री की यह चाह या मांग इतनी प्रबल होती है कि उसके लिए व्यक्ति बहुत बार खतरे उठाने को भी तैयार हो जाता है। अलका सरावगी के उपन्यास एक सच्ची झूठी गाथा, की गाथा जो एक सुशिक्षित गृहिणी होने के साथ-साथ सफल लेखिका भी है वह ऐसे ही एक फेसबुक मित्र प्रमित के प्रभावशाली व्यक्तित्व के आकर्षण में बंधकर उससे मिलने के लिए पहुँच जाती है दूसरे शहर में। और वहाँ एयरपोर्ट पर उसकी प्रतीक्षा करते हुए फ्लैशबैक में उसके यहाँ तक पहुंचने की कथा खुलती है। ऐसा नहीं है कि गाथा जो कदम उठाती है वह सही नहीं है हालाँकि समाज की तथाकथित नैतिकता इसे गलत अवश्य मानती है। शायद इसीलिए गाथा अपने भले से पति से झूठ बोलकर अर्थात् किसी सेमिनार में शिरकत का बहाना बनाकर घर से निकलती है क्योंकि कहीं न कहीं उसके मन पर सामाजिक नैतिकता का दबाव तो है ही। गाथा इस झूठ को सही भी ठहराती है, औरतें झूठ बोलती हैं, जीवन जैसा चल रहा है, वैसे चलते रहने देने के लिए। कहानियों में भी। जीवन में भी। घर में बैठकर कहानियाँ लिखना एक बात है, किसी खूनी, चोर, पागल नक्सली या पुलिस मैन या किसी अनजान आदमी से मिलने की क्या जरूरत ? ऐसी कहानी लिखने की ही क्या जरूरत? (पृ. 12) शायद इसीलिए गाथा को झूठ का आश्रय लेना पडता है। इसके अलावा पति कितना भी भला क्यों ना हो वह इस बात के लिए तो राजी नहीं ही हो सकता कि उसकी सीधी सरल पत्नी किसी पर-पुरुष से मिलने के लिए अकेली ही निकल पडे, भले ही वह पुरुष उसके बेटे की उम्र का ही क्यों ना हो। और मित्रता के इस रिश्ते में देह कहीं भी शामिल न हो। लेकिन हमारा तथाकथित नैतिक और आदर्श समाज स्त्री-पुरुष के बीच पिता, पति और भाई से इतर ऐसे रिश्ते की कल्पना भी नहीं कर सकता जो रक्त संबंध या देह संबंध से परे मात्र मन के रिश्ते पर जुडा हो। स्त्री किसी स्त्री से सख्य का संबंध जोड ले तो समाज को कोई दिक्कत नहीं लेकिन वह जैसे ही किसी समानधर्मा या समविचारधारा के पुरुष से बंधुत्व का संबंध जोडती है या जोडने के रास्ते पर आगे बढती है तथाकथित सामाजिक नेताओं में खलबली मच जाती है। हम सब भली प्रकार जानते हैं कि स्त्रियों के सारे सख्य संबंध विवाह के बाद तकरीबन टूट- फूट जाते हैं। विवाहोपरांत पुरुष तो अपने दोस्ताने को पूर्ववत् कायम रखता है लेकिन स्त्रियों से यह उम्मीद की जाती है कि स्त्री अपने विवाहपूर्व के सारे रिश्ते नातों, दोस्तियों को दरकिनार करके सिर्फ समर्पिता गृहणी बनकर रहे । भले ही आज स्थितियां थोडी बहुत बदल रही हैं लेकिन वृहत्तर समाज की असलियत अब भी यही है। किंतु आज की तकनीकी ऋांति ने पुरुषों के साथ -साथ स्त्रियों को भी यह आजादी दी है कि वह जाने -अनजाने लोगों से सख्य का संबंध जोडकर न केवल हल्की -फुल्की बातों या थोडे बहुत फ्लर्टिंग से अपना मनबहलाव कर सकें बल्कि गंभीर विचार-विमर्श भी कर सकें। ऐसे ही एक दिन गाथा फेसबुक पर प्रमित से टकरा जाती है और थोडी कडवाहट से आरंभ हुआ यह सिलसिला समझदारी वाले दोस्ताने में बदल जाता है। यह दोस्ताना समय गुजारने या एक-दूसरे से फ्लर्ट करने या विवाहेतर संबंधों के एडवेंचर के लिए नहीं बना या पनपा था। उम्र के अच्छे-खासे फासले के बावजूद गाथा को उस उम्र के अन्य युवाओं की तुलना में प्रमित काफी समझदार और सुलझा हुआ लगता है। जिंदगी के ताप से वैचारिक रूप से परिपक्व भी। और धीरे-धीरे उससे खुलती हुई गाथा उसके साथ वैचारिक आदान -प्रदान करने लगती है। देश-समाज की ज्वलंत समस्याएँ जिनके हल किसी को दिखाई और सुझाई नहीं देते, गाथा को उनके हलों के संकेत इन बहसों से सूझने लगते हैं। और शायद उसकी वैचारिक परिपक्वता से प्रभावित हो गाथा उससे मिल आने का अवसर निकाल लेती है। अगर उनकी मुलाकात हो जाती तो शायद यह उपन्यास एक तयशुदा ढर्रे पर आगे बढते हुए समाप्त हो जाता। लेकिन यह उपन्यास इस मायने में अलग या आधुनिक है कि उन दोनों की मुलाकात नहीं हो पाती और एयरपोर्ट पर उसका इंतजार करने के बाद, हर आते-जाते यात्री में उसे तलाशने और खोज लेने की कोशिश के बाद, गाथा वापसी की फ्लाइट में बैठ जाती है जहाँ उसे प्रमित का संदेश मिलता है कि वह गाथा को इसलिए लेने नहीं आ सका क्योंकि अपने और तुम्हारे जीवन को खतरे में नहीं डाल सकता। (पृ. 78) गाथा के मन में तरह-तरह की आशंकाएँ सिर उठाने लगती हैं, वैसे ही जैसे गाथा ने प्रमित से मिलने का जोखिम उठाया था भले ही एक लेखिका होने के नाते या नया कुछ अनुभव बटोरने की इच्छा से लेकिन उस अनजाने मित्र से उसका परिचय अधूरा ही रह जाता है। उसे अपनी स्मृतियों से खारिज करने की कोशिश में गाथा अपने परिवार और लेखन के संसार में व्यस्त हो जाती है और एक दिन उसके साथ बहसते-बहसते आजिज आकर उसका पथ अवरुद्ध अर्थात् उसे ब्लॉक कर देती है और उसके सारे मेल डिलीट, लेकिन गाहे बगाहे उसकी बातें, उसके तर्क उसके दिमाग में कौंध मारते रहते हैं और वह उन पुराने मेलों को पुनः पढना और प्रमित को समझना चाहती है। अचानक एक दिन फिर से प्रमित के विवाह के निमंत्रण का मेल गाथा को मिलता है और संफ सूत्र जुडता तो है लेकिन उपन्यास एक बुरे सपने पर खत्म हो जाता है और आभासी दुनिया के इन दोस्तों की मुलाकात वास्तविक दुनिया में कभी नहीं हो पाती।
उपन्यास का अंत पाठकों के लिए बहुत सारे सवाल छोड जाता है कि आखिरकार प्रमित गाथा से क्यों नहीं मिलता। शायद इसलिए नहीं मिलना चाहता क्योंकि उसके लिए अपनी पहचान को उजागर करना संभव नहीं था। या वह कोई आतंकवादी, नक्सली वगैरह था जो वैचारिक स्तर पर गाथा जैसे लेखकों को उद्वेलित कर उनके लेखन के माध्यम से अपनी बात या अपने संगठन की विचारधारा को आम दुनिया के सामने रखना चाहता है। या फिर कोई मानसिक रोगी था या लेखिका का अपना ही कोई जाना-पहचाना व्यक्ति, जो खुलेआम अपने विचारों को किसी दबाव के तहत दुनिया के सामने जाहिर नहीं कर सकता था इसलिए लेखिका के माध्यम से दुनिया के सामने अपने विचारों को परोसने की कोशिश में लगा हुआ था। उसका सच गाथा के सामने कभी आया ही नहीं। उसने अपनी होने वाली शादी में गाथा को आमंत्रित किया था लेकिन न वह शादी होती है और न ही गाथा वहाँ पहुँच पाती है। हालाँकि वह सपना देखती है कि उसकी शादी टल गई। उपन्यास प्रमित द्वारा भेजे गये एक मेल के साथ समाप्त हो जाता है- गाथा मेरी शादी नहीं हुई। मैं शादी करने नहीं गया। उन लोगों ने ऐन सुबह-सुबह फोन मुझसे क्या -क्या जानना चाहा। वैसे मुझे मालूम था कि यही होगा। मैंने सपने में देख लिया था कि वेदी खाली रहेगी। लोग खा-पीकर हँस-बोलकर चले जाएँगे। वे नहीं चाहते थे कि शादी हो। इसके आगे वह लिखता है - गाथा मेरा सच क्या है, यह तुम कभी जान नहीं पाओगी। मेरा सच है तो इसी ब्रह्मांड में, पर वह किसी की भी पहुँच के बाहर है। सच पूछो तो कई बार लगता है कि मेरा सच मेरी हथेली की रेखाओं में भी नहीं लिखा। मैं उसे खुद नहीं पढ पाता। पीछे देखता हूँ तो सिर्फ धुन्ध है। उसमें मैं अपने सच रोज मिटाकर रोज नए सच लिखता हूँ। यही सबसे बडा सच है जो मैं तुम्हें अंत में बता दे रहा हूँ। (पृ. 155)
यह सवाल अनुत्तरित ही रह जाता है कि आखिरकार प्रमित अपनी पहचान क्यों जाहिर नहीं करता। क्या वह कोई बहुरूपिया था लेकिन अगर ऐसा होता तो वह गाथा से अपने संबंधों को प्रगाढ कर उसका दैहिक-आर्थिक शोषण कर सकता था जो कि वह नहीं करता अर्थात वह कोई छद्मवेशी शोषक, लुटेरा या ब्लैकमेलर नहीं था। उसके संवादों और विचारों से यह पता चलता है कि वह एक चिंतक की तरह सोचता है। समाज की समस्याओं को दूर कर उसे अपने तरीकों से सुधारने और संवारने के सपने देखता है। लेकिन संभवतः हमारा समाज ऐसे विचारकों को समाज-विरोधी मानकर उन्हें तरह-तरह के नामों से संबोधित करते हुए उनके लिए सजा मुकर्रर करने में जरा भी कोताही नहीं करता जिसके उदाहरण आज भी देश में दिखाई देते हैं। न जाने कितने विचारकों और चिंतकों पर राष्ट्रद्रोह की धाराएँ लगाकर अनंत काल तक जेल में सडने के लिए ठूंस दिया गया है। शायद इसीलिए प्रमित जैसे लोग अपनी पहचान छिपाकर, समाज की नजरों से बचकर अपना काम करते रहते हैं ताकि समाज थोडा सा ही सही खूबसूरत बन जाए। ऐसे लोगों को भी कुछ ऐसे दोस्तों की जरूरत होती है जिनसे वह विचार-विमर्श कर सकें। जिनके साथ अपनी योजनाओं-परियोजनाओं को साझा कर सकें। और शायद उस जैसे लोगों ने जीवन में इतना दुख और अभाव झेला है कि कल्पना जगत् में एक खूबसूरत दुनिया का निर्माण करके ही खुश हो लेते हैं। तो क्या प्रमित मानसिक रोगी या सेजोफ्रेनिक था। शायद हाँ, क्योंकि वह सच की चाशनी में लपेटकर एक कहानी गाथा के सामने परोसता है और दूसरे ही क्षण उसकी चाशनी फीकी पड जाती है और कहानी का एक दूसरा ही रंग उभर आता है। हजार कहानियाँ, कई झूठ, कई भ्रम और शायद उनके पीछे छिपा हुआ एक जरा सा सच भी, जो कभी-कभी झिलमिलाता तो है पर सामने आते-आते रह जाता है। या फिर शायद नहीं क्योंकि एक विक्षिप्त व्यक्ति इतनी होशियारी से किसी के दिमाग से नहीं खेल सकता। ऐसे चरित्र आम जिंदगी में सहजता से दिखाई नहीं देते शायद इसीलिए गाथा उससे प्रभावित होती है और अलका उसे अपने उपन्यास में जगह देती हैं।
उपन्यास के शिल्प पर विचार करें तो इसमें एक नयापन महसूस तो होता है क्योंकि यह मेल चैट अर्थात् मेल वार्त्ता पर आधारित है लेकिन पत्र शैली या डायरी शैली में इससे पहले भी कहानियों और उपन्यासों की रचना हुई है और मेल भी एक प्रकार का पत्र ही है। पूरा उपन्यास इस मेल वार्ता या मेल के पहले और बाद की टिप्पणियों के सहारे आगे बढता है। तीन भागों में बँटा यह उपन्यास एक ही कहानी की तीन अलग- अलग कडियों को आपस में जोडता है। इस उपन्यास की बडी खूबी है कि यह एक ही बैठक में आराम से पढ लिया जाता है। पाठक की उत्सुकता को अंत तक बनाए रखने में लेखिका सफल हुई हैं। छोटी-छोटी वार्ताओं के सहारे कहानी सहजता से आगे बढती हुई पाठकों को प्रश्नाकुलता से भर कर हैरान-परेशान छोड देती है।
इन मेलों को आपस में जोडने के बीच जो खाली जगह बचती है उसे गाथा की जिंदगी की घटनाओं से भरा गया है जिनके द्वारा एक गृहिणी , एक लेखिका के जीवन की परेशानियों, जटिलताओं, चुनौतियों आदि को खोलने की कोशिश हुई है। तीन पीढियों के स्त्री पात्र जो अपने बदलते परिवेश के साथ बदलते हुए जीवन की चुनौतियों से टकराते हुए ऋमशः अपने-अपने तरीके से आगे बढने या अभिव्यक्ति के रास्ते तलाशते दिखाई देते हैं। उनके बीच में एक स्नेह का सूत्र है, किसी तरह की प्रतियोगिता या द्वेष नहीं है। सास-बहू के बीच की पारंपरिक रस्साकस्सी के बजाय सहयोग और समर्थन का भाव है जो पारिवारिक रिश्तों को गरिमापूर्ण मजबूती प्रदान करता है। आम टीवी धारावाहिकों की षड्यंत्रकारी कलहप्रिय स्त्रियों की तुलना में ये स्त्रियाँ सख्य, स्नेह और सहयोग के अद्भुत सूत्र में बँधी दिखाई देती हैं। गाथा की सास राधा माँ अपनी पढी-लिखी बहू के लेखकीय उत्थान पर गर्वित होती हैं जो बेहद विश्वसनीय लगता है। वस्तुतः समाज बहुधा स्त्रियों को एक-दूसरे के खिलाफ खडा करके उनके बिलावजह के झगडों का लुत्फ लेना चाहता है ताकि यह बात आसानी से सिद्ध की जा सके कि औरत औरत की दुश्मन होती है जो आधा अधूरा सच है। अलका सरावगी का आलोच्य उपन्यास इस अधूरे या झूठे सच के बरक्स अपना अनुभूत खूबसूरत सच रखता हैं जो विरल भले हो अविश्वसनीय बिल्कुल नहीं लगता।
किसी राजस्थानी पारंपरिक परिवार में एक लडकी का विकास कैसे होता है। उसके पढने-लिखने को किस दृष्टि से देखा जाता है और उसका रचनात्मक सफर कितना चुनौतीपूर्ण या आसान होता है इसके कई रोचक और जीवंत वर्णन भी इस उपन्यास में जगह -जगह उभरकर आए हैं। कहा जा सकता है कि प्रकारांतर से लेखिका के अपने जीवन की परछाइंयाँ भी इस उपन्यास में झाँकती दिखाई देती हैं। लेखिका अलका सरावगी को जो लोग जरा भी जानते हैं उन्हें गाथा के चरित्र में लेखिका अलका झाँकती दिखाई देती है जो बेहद स्वाभाविक भी है। लेखक के अपने निजी अनुभव अनायास ही अपने कहानियों उपन्यासों के चरित्र के जीवन में सहजता और खूबसूरती से ढल जाते हैं जो न केवल विश्वसनीय लगते हैं बल्कि सहज भी। इस तरह प्रकारांतर से अलका जी के जीवन की घटनाएँ, उनके मार्गदर्शक और उनके परिवार के स्नेहिल लोगों और उनकी विशेषताओं को तो उपन्यास में जगह मिली ही है। इसके साथ ही लेखिका ने इस गाथा के माध्यम से अपने आलोचकों के उन सवालों के जवाब भी दिए हैं जो समय समय पर उनके लेखन को लेकर उठाए जाते रहे हैं। उनकी रचनाओं की स्त्रियाँ बहुत ज्यादा तेज तर्रार नहीं होती क्योंकि लेखिका को बहुत ही सहयोगी परिवार मिला जिसने उनके लेखन को सराहा और उसे स्पेस भी दिया। लेखिकाओं के बारे में आम लोगों की धारणा को उन्होंने जैसा पाया, देखा या झेला उन्हें उपन्यास में कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया है -कोई स्त्री अपने लेखन को लेकर सीरियस हो सकती है, यह बात शायद पुरुष के गले नहीं उतरती। या उसकी लगन को उसकी बेवकूफी समझकर वह स्त्री के आगे एक चारा डाल देता है कि उसे फँसाया जा सके। मजे की बात कि ये ही वे पुरुष हैं जो स्त्री की अपनी बात अपनी तरह से बोलने की आजादी की वकालत करते हैं। (पृ. 55)
वस्तुतः यह गाथा गाथा की भी है और प्रमित की भी जिसमें अगर थोडा सा झूठ है तो बहुत सारा सच भी। देश, समाज और राजनीति की ढेरों समस्याओं पर बहस भी है और हल तलाशने की ईमानदार कोशिश भी। प्रमित भले ही आधा-अधूरा सच हो लेकिन जैसे युवाओं की निराशा , हताशा और उनकी कडवाहट तो सच्ची ही है। अब उनका हल बंदूक से निकलेगा या साहित्य से यह बहस अनंतकाल तक चलती रह सकती है। वह साहित्य जिसे प्रमित काला जादू कहता है वह क्या समाज को सही दिशा दे पा रहा है या एक खास वर्ग के लोगों के बीच सिमटकर रह गया है इसका जवाब भी तलाशने की जरूरत है। वस्तुतः यह उपन्यास मौजूदा दौर की बहुत सी बहसों को हल्के-फुल्के ढंग से उठाने की कोशिश करता है जिन पर गंभीरतापूर्वक बहस होनी चाहिए। मेल वार्त्ता की एक सीमा होती है और शायद यही सीमा आलोच्य उपन्यास की भी है। इसके बावजूद इसमें जिन सवालों को उठाया गया है वे एकदम नये भले न हों लेकिन महत्त्वपूर्ण तो हैं ही और संभवतः अनुत्तरित भी। इसके साथ ही यह बात तो भरोसे के साथ कही जा सकती है कि यह उपन्यास न सिर्फ स्त्री-पुरूष के बीच की विशुद्ध मैत्री की गाथा है बल्कि स्त्री-स्त्री के बीच के सख्य और भरोसे की कथा भी है।
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पुस्तक का नाम : एक सच्ची झूठी गाथा
लेखक : अलका सरावगी
प्रकाशक : राजकमल पेपरबैक्स, नई दिल्ली,
सन् : 2018,
मूल्य : 150/-
सम्पर्क : गीता दूबे, 58ए/1
प्रिंस गुलाम हुसैन शाह रोड,
यादवपुर, कोलकाता-700032