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कठिन समय और प्रतिपक्ष में खडी कविता

ज्योति चावला
बीसवें दशक के कवियों में संजय कुंदन मेरे प्रिय कवियों में से एक हैं। प्रिय कवि होने के उनके पास तमाम कारण भी हैं। न केवल कवि के रूप में अपितु सामान्य व्यक्ति के रूप में भी वे एक सामान्य मनुष्य हैं। सामान्य शब्द पर विशेष दबाव दिया गया है यहाँ, क्योंकि असामान्यों से भरी दुनिया में सामान्य होना अब असामान्य हो गया है। उनकी यही सामान्यता, उनका साधारण व्यक्तित्व उन्हें असाधारण कवि बनाता है। और जब यही असाधारणता कविता में उतरती है तो वह सही मायनों में निष्पक्ष कविता बनकर सामने आती है। ऐसा नहीं है कि उन्हें सामान्य कहने का काम सिर्फ मैं ही कर रही हूँ। बल्कि वे खुद भी अपने आप को सामान्य ही मानते हैं और अतिसामान्यों की भीड में अकेले से नजर आते हैं। उनकी कविताएँ खुद इसका उदाहरण हैं -
कवि बनने के लिए कविता लिखना काफी नहीं था/अब जरूरी था कि/कवि कुशल प्रबंधक की भाषा में बात करे।
संजय कुंदन की इस कविता को पढकर लगता है कि वे किसी स्वप्नलोक में थे जहाँ से वे अभी-अभी बाहर आए हैं और कवि होने की जो जिम्मेदारियाँ उन्हें उस स्वप्नलोक मे बताई गई थीं उससे अलग नियम यहाँ देखकर वे ठगे से खडे रह जाते हैं। इसी कविता में वे आगे लिखते हैं-
पर यहाँ भी हमने अपने आपको/सबसे पीछे पाया/जैसे हम धकिया कर पीछे कर दिये जाते थे/राशन की लाइन में। (कवियों की बस्ती)
यह कविता कवि के नए संग्रह तनी हुई रस्सी पर संग्रह से ली गई है। इस शीर्षक की विशेषता यह है कि जितना सार्थक इसका शीर्षक है, उतनी ही सार्थक इस संग्रह में संकलित कविताएँ हैं। तनी हुई रस्सी पर चलते हुए लिखी ये कविताएँ वास्तव में तब और ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो जाती हैं जब यह रस्सी तनती ही चली जाए। इन कविताओं को पढकर कवि की बेचैनी का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। योजनाओं का शहर के बाद यह इनका चौथा कविता संग्रह है और महत्त्वपूर्ण यह कि उनकी कविताओं की धार में कहीं कमी नहीं आई है। बल्कि यह कहें कि कविता के सामने बढती चुनौतियों के साथ उनकी भाषा और पैनी हो गई है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
संजय कुंदन के लेखनकर्म की सबसे बडी विशेषता यह है कि वे फार्मूलाबद्ध रचना नहीं करते हैं। वे केवल लिखने के लिए नहीं लिखते हैं। लिखने के लिए लिखने वाले रचनाकारों की भीड में संजय खुद से सवाल करते हैं, खुद के भीतर झांकते हैं और व्यवस्था तथा पूंजी के सामने बौने होते चले जा रहे मनुष्य पर व्यंग्य कसते हैं। उनकी कहानी बॉस की पार्टी जिन्होनें पढी होगी, वे मेरी बात से सहमत होंगे। उनकी यह आत्मावलोकन की पद्धति उनकी कविताओं में भी बरकरार है जो चलकर इस संग्रह तक भी आई है। कवि केवल व्यवस्था पर सवाल खडे नहीं करते अपितु व्यवस्था के सामने और सत्ता के सामने झुकते चले जा रहे तथाकथित बुद्धिजीवियों के झुकते चले जाने की गति को भी कविता में नोटिस करते चलते हैं और इस तरह पूरे बुद्धिजीवी समाज की आलोचना करने से नहीं चूकते। उनकी यही विशेषता उन्हें एक ईमानदार कवि बनाती है-
सबसे योग्य वह माना गया/जिसने अपने मनुष्य होने को/सबसे कम महत्त्व दिया/उसका जोर इस बात पर रहा/कि उसे एक चाबी समझा जाए/जिससे एक से एक खतरनाक/दरवाजे खुल सकते हैं/और जंग खाए बक्से भी।(सबसे योग्य)
इन्हीं सबसे योग्य लोगों पर कवि बार-बार सवाल खडे करता है कि सबसे योग्य बनने की होड में सही-गलत की समझ सबसे अवांछित वस्तु बन गई। कवि और कवि कर्म पर उनकी कविताएँ योग्य न बन पाने की उनकी छटपटाहट को बयंा करती हैं। ये बताती है कि कवि और सबसे योग्य एक साथ नहीं बना जा सकता। कवि बनने के लिए, जनता के पक्ष में, कमजोर के पक्ष में खडे होने के लिए सबसे योग्य बनने की होड को छोडना होगा। नहीं तो योग्य बनते-बनते कविता बहुत पीछे छूट जाएगी और कवि के भीतर का अकवि जीत जाएगा -
अकवि की कविताएँ धडाधड छपने लगीं/पुरस्कार उसकी झोली में फ आम/की तरह टपकने लगे/आने लगे साहित्य उत्सवों के आमंत्रण
वह सरकार से भी सम्मानित हुआ/और क्रांतिकारियों का भी लाडला हुआ। (कवि और अकवि)।
सरकार और ऋांतिकारियों को एक साथ साध लेने वाले कवियों की भीड में संजय कुंदन का कवि मन खुद को अकेला पाता है। संजय कुंदन के लेखन की सबसे बडी खूबसूरती उनकी व्यंग्य करने की क्षमता है। वे कविता से लेकर कहानी - सब जगह व्यंग्य के शिल्प में बात करते हैं और रचना और अधिक प्रभावशाली हो जाती है। उनकी एक अन्य कविता से उदाहरण देकर समझा जा सकता है -
एक सफल व्यक्तित्व के लिए/जरूरी था/आप दुश्मन के साथ रहना सीखें... जिसे लोग बुरा वक्त बता रहे हैं/उसमें भी अपना फायदा निकालिए/एक खलनायक के सकारात्मक पहलुओं के बारे में सोचिए। (सफल व्यक्तित्व)
संजय की कविताओं को पढते हुए लगता है कि अगर वे कविताएँ न लिखते तो बहुत बेचैन रहते। वे कविताएँ ही नहीं लिखते, बल्कि बारीक चश्मे से बदलते जमाने और उसके साथ ही मनुष्य के बदलते चरित्र को भी पढते हैं और कविता में दर्ज करते चलते हैं और दिनकर की पंक्तियों - जो तटस्थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध से बचते चलते हैं। यह बेचैनी और अपनी पक्षधरता साबित करने के लिए वे आखिरी पंक्ति के आखिरी मनुष्य की आवाज बनने का काम करते हैं। ऐसा लगता है जैसे वे अपने लाभ-हानि की परवाह किए बिना कवि होने की अपनी जिम्मेदारी निभाने को बाध्य हैं। कबीर की पंक्तियाँ यहाँ बरबस ही याद हो आ रही है-
कबीरा खडा बाजार में लिए लुकाटी हाथ/जो घर फूंके आपणा सो चले हमारे साथ।
चारों तरफ गहरी निद्रा या कहें कि नशे में धुत लोगों के बीच संजय कुंदन के भीतर का बेचैन कवि जगा हुआ है ठीक ऐसे ही जैसे कबीर ने कहा था -
सुखिया सब संसार है खावे और सोवे/दुखिया दास कबीर है जागे और रोवे।
एक कवि और उससे भी अधिक एक मनुष्य होने के नाते मेरा मनुष्य को परखने का आधार उसकी राजनीतिक समझ से तय होता है। राजनीतिक और आमजन के हित में आपकी पक्षधरता ही किसी को बेहतर मनुष्य बनाती है। भूतों की शादी में कनात से तने लोगों के बीच ऐसे सजग लोग विरले ही हैं जो भीड में शामिल नहीं हैं। संजय कुंदन की कविता एक उम्मीद जगाती है कि कवि अपनी जिम्मेदारी के प्रति जागरूक है और किसी सीकरी की परवाह किए बिना निष्पक्ष रूप से अपनी बात कह रहा है। संजय कुंदन के कविमन का यह दुख भी जायज है कि सबसे बुरे समय में जिससे उम्मीद सबसे अधिक की जानी थी सबसे पहले वे ही पलायन करते दिखे। कवि-अकवि, सफल व्यक्तित्व, सबसे योग्य, सिरफिरे आदि उसी चिंता से उपजी कविताएँ हैं। सिरफिरे कविता की कुछ पंक्तियाँ-
अनुशासन प्रिय और आज्ञाकारी लोगों ने/दुनिया को कुछ नया नहीं दिया/उनका सिर हमेशा तैयार रहा/हर रंग की टोपी में समाने के लिए/वे करते रहे हर आदेश का पालन/भक्ति में इतने लीन रहे/कि यह भी नहीं देखा कि/कौन है उनका नियन्ता।
राजनीतिक स्वर की उनकी प्रत्येक कविता इस संग्रह को हमारे समय का जीवंत दस्तावेज बनाती है। सत्ता के चरित्र को व्याख्यायित करती ये कविताएँ बेहद कम शब्दों में पूरे सच को बयाँ कर जाती हैं। सुख की तय होती परिभाषा में सकल घरेलू उत्पाद की भूमिका बहुत बडी है। लेकिन सकल घरेलू उत्पाद पर बात करने के लिए अर्थशस्त्रियों की जरूरत को अब नकार दिया गया है -
ऐसा पहली बार हो रहा था कि/अर्थशास्त्री चुप थे और शोहदे बता रहे थे देश के सकल घरेलू उत्पाद के रूप में। (सकल घरेलू उत्पाद)
लेकिन सवाल पूछने का हक अब नहीं बचा है। सवाल पूछने पर केवल सुख की व्याख्या होती है - सुखी लोगों ने तय किया था कि अब केवल सुख पर बात होगी।
सरकार के हर फैसले को सुख कायम करने की दिशा में/उठाया गया कदम बताया जाता था/लाठी और गोली चलने का निर्णय भी इसमें शामिल था। (सुखी लोग)
‘सोचना चाहता हूँ’ कविता में कवि लिखते हैं - हालांकि सोचना जरूरी नहीं था/कुछ सोचे बगैर भी जीवन कट सकता था मजे में/पर मेरा मन मानता नहीं था/मैं अक्सर सोचना चाहता था।
जब सोचने और चिंतन करने के काम का केंद्रीयकरण हो चुका है, ऐसे समय में भी कवि सोचना चाहता है, यह अपने आप में ही सत्ता के विरुद्ध उठाई जा रही आवाज है। अपने समय पर प्रहार करती कई कविताएँ इस संग्रह की शक्ति हैं। कवि ने ठीक ही किया जो इन विषयों पर कविताएँ लिख डालीं। अगर न लिखते तो शायद बेचैन रहते। चारों तरफ खुशहाली भरे समय को रेखांकित करते समाचार पत्रों और खबरों के दौर म कवि का काम ही है कबीर की तरह जागते रहना और चिंता करते रहना। संजय कुंदन बाजार की हलचल को और उसकी पदचाप को बहुत बारीकी से महसूस करते रहे हैं। उनकी कविताएँ तथा कहानियंा इसके मजबूत उदाहरण हैं। और आज 21वीं सदी के दूसरे दशक के अवसान पर यह बाजार घर में इस तरह प्रवेश कर चुका है कि अब दरवाजे पर मेहमान के आने का नहीं अपितु नए सामान के आने का इंतजार बेसब्री से रहता है -
घर के लोग/इस तरह दरवाजा खोलते/जैसे कोई सामान दस्तक/दे रहा हो/उन्हें याद नहीं/कि पिछली बार कब उन्होंने/किसी मेहमान का इंतजार किया था। (सामान का इंतजार)
यह कविता राजेश जोशी की कविता ‘संयुक्त परिवार’ से आगे की कविता है जहाँ अब हम संयुक्त परिवार के अभाव में घर पर लगे ताले को देखकर मेहमान के लौट जाने के अफसोस से भरे थे। यह कविता बाजार और स्वकेंद्रिकता के जाल में उलझे उस आम मध्यवर्गीय भारतीय की मनस्थिति को उजागर करती है जहाँ उसे मेहमान के आने की कोई अपेक्षा ही नहीं। इस दृष्टि से देखा जाए तो हमने विकास ही किया है।
लेकिन यहीं बाजार किसी तरह हत्यारा हो जाता है इसकी प्रत्रिज्या समझने के लिए आँख खोलकर अपने आसपास होने वाले परिवर्तनों को बहुत बारीकी से देखने और समझने की जरूरत है। संजय के आसपास हर स्थिति से जन्मी नई परिस्थिति को व्यक्त करने के लिए कविताएँ हैं। जरूरत है उन्हें ऋम में रखकर देखने की। हत्यारे कविता से कुछ पंक्तियाँ-
हत्यारों को इतना सम्मान/पहले कभी नहीं मिला था/प्रकाशक उतावले थे कि/हत्यारे कुछ लिखें/आत्मकथा ही सही/उनकी किताबें बेस्टसेलर हो रही थीं।
संजय कुंदन के पिछले काव्य संग्रह ‘योजनाओं का शहर’ को इसी ऋम में रखकर देखें तो लगता है कि न तो कविता की धार में कहीं कमी आई है और न कवि की प्रतिबद्धता में और न ही उनके विट में। वे आज भी उतनी ही मारक भाषा में अपनी बात कहते हैं और उतने ही निर्भीक अंदाज से जितना वे पहले कह रहे थे। कवि आज भी आमजन की जबान बन कर खडे रहना चाहता है। हाँ, वह थोडा सा निराश अधिक हुआ है। और यह नाराजगी किसी और से नहीं अपितु अपनी ही बिरादरी से है। रचनाकारों, बुद्धिजीवियों की वह बिरादरी जिसकी जिम्मेदारी वह नहीं, जो वह कर रही है। इसी के चलते संग्रह में कई ऐसी कविताएँ हैं जिनमें कवि को अपने समकालीन कवियों से कई शिकायतें हैं।
संजय कुंदन बेहद सजग और संवेदनशील कवि हैं। और अपनी कविताओं से वे मुक्तिबोध द्वारा पूछे गए प्रश्न कि कॉमरेड तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है, का जवाब देते चलते हैं। उनकी कविताएँ उनके निष्पक्ष होने की गवाह हैं जहाँ इस निष्पक्षता में वे स्वयं को भी कटघरे में खडे करते चलते हैं। बहन की याद शीर्षक कविता में वे लिखते हैं -
जिस वक्त मैंने सपनों के आकाश में/उडना शुरू किया/उसी वक्त कतरे गए तुम्हारे पंख/तुम एक जेल से निकली/और दूसरी जेल में पहुँचा दी गयी/समारोहपूर्वक।
हालाँकि वर्तमान में लिखी जा रही स्त्री कविता का प्रयास है कि इस तरह की परिस्थितियाँ पैदा ही न हों कि किसी को इस तरह पश्चात्ताप करने का मौका मिले। स्त्री पर लिखी कई अन्य कविताएँ - अकेली लडकियाँ, समझदार लडकी आदि भी महत्त्वपूर्ण है।
बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी की तर्ज पर ही संजय कुंदन पर लिखा जाएगा तो उनकी कविताओं में अर्थ की तहें खुलती जाएँगी। हर कविता एक नई कविता की ओर संकेत करेगी। संजय कुंदन की प्रत्येक कविता अपने आप में केवल कविता नहीं अपितु हमारे समय को दर्ज करता जीवंत दस्तावेज है। उनका यह नया कविता संग्रह कवि और कवि की प्रतिबद्धता के प्रति और अधिक आश्वस्त करता है।
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पुस्तक : तनी हुई रस्सी पर (कविता संग्रह)
कवि : संजय कुंदन
प्रकाशन : सेतु प्रकाशन, दिल्ली
संस्करण : 2019
मूल्य : 117

सम्पर्क : अनुवाद अध्ययन एवं प्रशिक्षण विद्यापठ, इग्नू
मैदानगढी, नई दिल्ली- 110068, मो0- 9871819666