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महेश पुनेठा की कविताएँ

महेश पुनेठा
उसका लिखना

वह सुख लिखने लगी
सोचती रही
सोचती रही
सोचती रह गयी
फिर
वह दुख लिखने लगी
लिखती रही
लिखती रही
लिखती ही चली गयी।

उनकी डायरियों के इंतजार में

पिताजी की पुरानी चिट्ठियाँ
पुरानी डायरियाँ
पुरानी नोटबुक
घर के ताख पर
आज भी मौजूद हैं पहले की तरह
लाल-पीले कपडे के टुकडों में बंधी
मेरी भी सजी हैं एक खुले रैक में
बेटे की बुकसेल्फ के सबसे निचले खाने में
समय-समय पर
साफ-सफाई और छंटनी होती रहती है इनकी
बसी हैं इनमें अनेकानेक स्मृतियाँ
इन्हें उलटते-पलटते ताजी हो उठती हैं जो

याद नहीं कि देखी हों कभी
माँ की पुरानी चिट्ठियाँ
या पुरानी डायरियाँ
मान लिया माँ बहुत कम पढी-लिखी थी
पर पत्नी की भी तो नहीं देखी
जबकि बात-बात पर
वे अपनी स्मृतियों में जाती रहती हैं
और अक्सर नम आँखों से लौटती हैं
कभी उनकी छंटनी भी नहीं करती हैं

आखिर कब आयेगा वह दिन
जब पति के बगल में
पत्नी की भी
पुरानी चिट्ठियाँ
पुरानी डायरियाँ सजी होंगी?


माँ की बीमारी में
(1) हाल-चाल जानने आने वाले

माँ की हमउम्र स्त्रियाँ
या उन से अधिक उम्र की स्त्रियाँ
आती हैं माँ का हालचाल जानने
करती हैं बातें उन दिनों की
जब माँ स्वस्थ हुआ करती थी
करती थी खेतीबाडी के काम
खाने-पीने की भी सुधबुध नहीं रहती थी उसे
घास-लकडी के बडे-बडे बोझ
अपनी पीठ पर लाती थी
वे सहानुभूति जताते हुए कहती हैं
कि शिबौ-शिब आज ऐसी हालत हुई
आँगन भी लंका हो गया
दो कौर निगलना कठिन
शिबौ-शिब जिन्दगी भर कष्ट ही झेल
न कभी अच्छा खाया
न कभी अच्छा लगाया
आज बैठकर खाने के दिन थे
पर ऐसे बिस्तर पकडा
यह कहते हुए-
मसारने लगते हैं उसके हाथ-पाँव और चेहरे को
उनकी आवाज में होता है रोआंसापन
और आँखों में आँसू
माँ की आँखें बहने लगती हैं
चेहरा बुझे हुए कोयले सा
पहले से अधिक उदास हो जाती है वह
पस्तहिम्मत
उसकी आवाज में भी गहरा दर्द पैठ जाता है
कमर टूट सी जाती है
बिस्तर में बैठ पाने में भी असमर्थता जता देती है

जब आती हैं उसके बहुओं के उम्र की स्त्रियाँ
पूछती हैं हालचाल
सुनती हैं उनकी परेशानी को
रखती हैं उसकी पीठ पर हाथ
कहती हैं चिंता मत करो जल्दी ठीक हो जाओगी
माँ पूछती है-क्या मैं फिर से चल पाऊँगी
वे उन बीमार लोगों के किस्से सुनाती हैं जो स्वस्थ हुए
वे माँ को भविष्य के सपने दिखाती हैं
उसके नाती-पोतों की बातें करती हैं
माँ के चेहरे का बुझापन धीरे-धीरे कम होने लगता है
होंठों के कोनों पर हल्की सी मुस्कान
उसकी आवाज में हिम्मत आने लगती है
वह बिस्तर से उतर
सामने लगी कुर्सी पर बैठने की कोशिश करती है।


(2) 71 की उम्र और बीमारी

कुछ साल पहले तक ही
दिन-भर की हाडतोड मेहनत के बाद
जिस बिस्तर में
जाते ही नींद कब आ गयी
पता भी नहीं चलता था
आज वही बिस्तर चुभता है

लेटती है कुछ देर
फिर उठ बैठती है
फिर लेटती है
फिर ......
कभी कमर दबाती है
कभी पैर
कभी गर्दन
कभी मुँह सूखता है
कभी खाँसी तो कभी पेशाब

कहती है-
जोड-जोड दुख गया है
नींद न जाने किस खोह में जा छुपी है
रात जीवन से भी लम्बी हो गयी
दिन तो कट जाता है रात से डर लगता है
क्या करूँ मैं
कहाँ जाऊँ?

(3)

बीमार के दिन और रात में
न पृथ्वी के झुके होने का
और न उसकी गति का
कोई प्रभाव पडता है
वे तो हमेशा लम्बे ही होते हैं।

(4)

हर वार को कोई न कोई
माँ की खबर करने आ रहे हैं
कभी-कभी तो फुरसत भी नहीं होती है
खातिरदारी से

हर किसी के पास
रहता है एक नया नुस्खा
बीमारी से लडने का
हर कोई पुराने को खारिज कर
अपने नुस्खे को अपनाने को कहता है
हर नया दिन नया नुस्खा
समझ में नहीं आता है
कि किसे अपनाएँ और किसे छोडें

सबकी ‘हाँ’ में ‘हाँ’ मिलाते रहते हैं बस।

(5)
कुछ समय से मैं
तिथि और दिन भी
भूल-सा गया हूँ ।
कब दिन शुरू होता है
कब रात ढलती है
कब कौनसा दिन
कब कौनसी तिथि
पता ही नहीं चलता है
मैं अच्छे दिनों के इन्तजार में हूँ ।


(6)
रात के दो बज रहे हैं
सन्नाटा एक घंटी की तरह लटका है
जिस पर कर्र-कर्र करता कीडा
और कुत्तों की लम्बी हू...हू.... हू....
रुक-रुक कर हथोडे की तरह चोट कर रही है
चांदनी बिखरी हुयी है चारों ओर
उसमें कोई भी आकर्षण नहीं है
अभी माँ का गला सूख रहा है
एक चम्मच पानी में टिकी है उसकी नींद
अभी यदि कुछ सबसे सुन्दर है
तो यही एक चम्मच पानी।
छुपाना और उघाडना

उनके लिये
छुपाना कविता है
मेरे लिये
उघाडना

दरअस्ल झगडा
यहीं से शुरू होता है
वे भाषा में
रचनात्मकता चाहते हैं
मैं जीवन में ।




आरक्षण

रोटियाँ हैं गिनीचुनी
रसोइये ने
कुछ के हाथों में
पकडा दी हैं थाली
वे खुश हैं
थाली मिलने पर
लेकिन वे भी हैं खाली।

जिनके पास नहीं है थाली
उनको लगता है कि
थाली वालों ने
उनके हिस्से की भी रोटी है खा ली
वे करते हैं गाली
माँगते हैं थाली
रसोइया मन ही मन बजाता है ताली
कुछ और हाथों में दे देता है थाली।

उनका इतिहास

उनका लिखा इतिहास
खूब दिखाता है
शासकों के बीच की लडाई
और
जनता की लडाई के बारे में
बात करने से भी बचता है.

छोटी बात नहीं

आप किसी गली में भटक जायें
विपरीत दिशा से आता कोई राही
आपको सीधे रास्ते तक छोड आये
यह कोई छोटी-मोटी बात नहीं है
इसे न तोल सकते हैं और न नाप
यह जितना बाहर दिखता है
उससे कहीं अधिक भीतर समाया है।

त्रासद

अक्सर खेतों में
घाम में पसीना बहाता
शीत में ठिठुरता
बरसात में भीगता
दिन-रात खट कर
खेती करते देखा जिसको।

आज राजपथ में
वाटर कैनन से जूझते
लाठियाँ खाते
आँसू गैस झेलते
खेती बचाने को लडते देखा उसको।

खुद ही खटना
खुद ही लडना
क्या नहीं यह त्रासद घटना?










दासता से खतरनाक है दासता की वकालत

बीमार माँ को घेरे बैठी हैं औरतें
कुछ सत्तर पार हैं
कुछ अधेड
और कुछ चालीस से नीचे
उनमें होड लगी है अधिक से अधिक
सहानुभूति प्रकट करने की
कोई चेहरे को मलास रही हैं
तो कोई पैरों को
साथ में बता रही हैं कुछ घरेलू नुस्खे
कुछ देर बाद शुरू हो गयी दुनिया-नमान की बातें
जैसे किसकी बहू
नहीं रखती है सावन के सोमवार या वटसावित्री व्रत
किसकी घरवाली खा लेती है अपने पति से पहले
किस घर के पुरुष हाथ बंटाते हैं चूल्हा-चौकी में
किसका पति डरता है अपनी पत्नी से

किसकी बहू पहनती है सलवार-कमीज
नहीं करती है सास-ससुर की तेल-मालिश
किसकी बेटी जीन्स पहनती है
और चलाती है स्कूटी
अकेले ही चल देती है कहीं भी

यह सब बतियाते हुए
सत्तर पार की औरतें कोसती हैं समय को
वे बताती हैं व्रतों के माहात्म्य
पत्नी-धर्म
स्त्री की मर्यादा
अधेड उनकी हाँ में हाँ मिलाती हैं
चालीस से नीचे की अगल-बगल झाँकती हैं
और चुप्पी साध लेती हैं।

बूढे पिता मंद-मंद मुस्कराते हैं
मैं कुढता हूँ मन ही मन।




परंपराएँ

वर्षों से जिस घर में
नहीं रह रहे हैं माता-पिता
उस घर के टूटने-बिखरने का
उन्हें बहुत दुख है

एकान्त में होते हैं जब दोनों
उसकी ही बातें किया करते हैं
फिर लम्बी आहें भरते हैं

जबकि नये घर में उनको
किसी तरह का कोई कष्ट नहीं है
खुद भी स्वीकारते है वे
कि पुराने घर से बेहतर है नया घर
माँ गाहे-ब-गाहे
पुराने घर के कष्टों के बारे में भी बताती रहती हैं ।

प्रेम से डर

वे डरते हैं
नफरत फैलाने वालों से नहीं
प्रेम फैलाने वालों से

सोचो!
वे क्यों डरते हैं
प्रेम से?


रहने दो

यदि तुम मुझे
मेरी जाति से
मेरे धर्म से
मेरे क्षेत्र से
अपना मानते हो
रहने दो
मैं अकेला रहना ही
पसंद करूँगा

हत्यारे

सावधान !
वे समाज-सेवक, राजनीतिज्ञ
और चिंतक-विचारक बन
नफरत की फसल बोएँगे
तुम्हारी संतानों के हाथ में हथियार दे
किसी निर्दोष की ओर इशारा कर
उन्हें हत्यारा बनायेंगे
अदालत में सुनवाई के दौरान
उनकी तरफ देख तक नहीं देंगे

उनकी मूर्ति संसद भवन में लगेगी
और तुम्हारी सन्तानें
फांसी के फंदे में चढाई जायेंगी।


सम्पर्क - शिव कॉलोनी, पियाना
पो.ओ.- डिग्री कॉलेज,
पिथौरागढ (उत्तराखंड) 262502
मो. 9411707470, 09760526429
ई-मेल punetha.mahesh@gmail.com