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विजय राही की कविताएँ

विजय राही
1. बेबसी
सर्दी की रात तीसरे पहर
जब चाँद भी ओस से भीगा हुआ सा है
आकाश की नीरवता में ।

लगता है जैसे रो रहा हो
अकेला किसी की याद में
सब तारे एक-एक करके चले गये हैं ।

बार-बार आती है कोचर की आवाज
रात के घुप्प अँधेरे को चीरती हुई
और दिल के आर-पार निकल जाती है
पांसुओं को तोडती हुई ।

झींगुरों की आवाज मद्धम हो गई है
रात के उतार के साथ।

हल्की पुरवाई चल रही है
काँप रही है नीम की डालियाँ
हरी-पीली पत्तियों से ओस चू रही है।

ऐसे समय में सुनाई देती है
घडी की टिक-टिक भी
बिल्कुल साफ और लगातार बढती हुई।

बाडे में बँधे ढोरों के गलों में घंटियाँ बज रही हैं
अभी मंदिर की घंटियाँ बजने का
समय नहीं हुआ है
अभी गाँव नींद की रजाई में दुबका है ।

माँ सो रही है पाटोड में
बीच-बीच में खाँसती हुई
कल ही देवर के लडके ने
फावडा सर पर तानकर
जो मन में आई गालियाँ दी थी उसे
पानी निकासी की जरा सी बात पर ।

बडे बेटे से कहा तो जवाब आया
माँ ! आपकी तो उम्र हो गयी
मर भी गई तो कोई बात नहीं
थारे बडे-बडे बेटे हैं !
हमारे तो बच्चे छोटे हैं !
हम मर गए तो उनका क्या होगा?

माँ सोते हुए अचानक बडबडाती है
डरी हुई काँपती हुई, आवाज में रुदन
सीने में कुछ दबाव सा है ।
मैं माँ के बगल वाली खाट पर सोया हूँ
मुझे अच्छी नींद आती है माँ के पास ।
एक बात ये भी है कि-
माँ की परेशानी का भान है मुझे
बढ रही है जैसे-जैसे उम्र
माँ अकेले में डरने लगी है ।
जब तक बाप था
माँ दिन-भर खेत क्यार में खटती
रात में बेबात पिटती
मार-पीट करते बाप की भयानक छवियाँ
माँ को दिन-रात कँपाती
बाप के मरने के बाद भी उसकी स्मृतियाँ
माँ को सपनों में डराती ।
फिर देवर-जेठों से भय खाती रही
और अब अपनी ही औलाद जैसों का डर ।
माँ की अस्पष्ट, घबरायी हुई
कँफपाती, डर खाई आवाज
जो मुझे सोते हुए बुदबुदाहट लग रही
जगने पर बडबडाहट में बदल जाती है
मैं उठकर माँ के कंधे पर हाथ रखता हूँ
माँ बताती है कि -
वह फावडा लेकर मुझे फिर मारने आ रहा है !
मैं उसे कह रही हूँ -
आ गैबी ! आज मेरे दोनों बेटे यहीं हैं
इनके सामने मार मुझे!
मैं चुपचाप सुनता हूँ
सारी बात बुत की तरह
कुछ नहीं कह पाता ।
माँ भी चुप हो जाती है
उसे थोडी देर बाद उठना है
मैं झूठमूठ सोने का बहाना करता हूँ
मुझे भी सुबह उठते ही ड्यूटी जाना है ।

2. देवरानी-जेठानी
बेजा लडती थी
आपस में काट-कडाकड
जब नयी-नयी आई थी
दोनों देवरानी-जेठानी ।

नंगई पर उतर जाती
बाप-दादा तक को बखेल देती
जब लड धापती
पतियों के सामने दहाड मारकर रोती

कभी-कभी भाई भी खमखमा जाते
तलवारें खिंच जाती
बीच-बचाव करना मुश्किल हो जाता

कई दिनों तक मुँह मरोडती
टेसरे करती आपस में
भाई भी कई दिनों तक नहीं करते
एक-दूसरे से राम-राम ।

फिर बाल-बच्चे हुए तो कटुता घटी
सात घडी बच्चों के संग से थोडा हेत बढा।

जैसे-जैसे उम्र पकी,
गोडे टूट गए, हाथ छूट गए
एकदम से दोनों बुढिया
एक-दूसरे की लाठी बन गई ।

अब दोनों बुढिया एक-दूसरे को
नहलाती, चोटी गूँथती,
साथ-साथ मंदिर जाती,
दीप जलाती, गीत गाती।

जो भी होता, बाँटकर खाती ,
एक बीमार हो जाये तो
दूसरी की नींद उड जाती ।

उनका प्रेम देखकर
दोनों बूढे भी खखार थूककर
कउ पर बैठने लगे हैं,
साथ हुक्का भरते हैं
ठहाका लगाते हैं, कोई पुरानी बात याद कर ।

अन्दर चूल्हे पर बैठी
दोनों बुढिया भी सुल्फी धरती हुई
एक-दूसरे के कान में कुछ कहती हैं
और हँसती हैं हरहरार ।


3. आश्चर्य भरी बात

प्याज बेचने आये थे बाप-बेटे जुगाड लेकर

गली के मोड पर शीशम के नीचे
खडा करके जुगाड हाँक लगाई बाप ने-
प्याज ले लो प्याज, मोरेल का देशी प्याज
गेहूँ का बराबर और बाजरा का आधा-आध

कामकाज निपटाकर घरों का
सुस्ताई पडी औरतों ने ली अँगडाई
बच्चों ने मारी किलकारी
बूढों ने हिदायत दी दूर से-
नीका लीज्यो,चोखा लीज्यो

काकी ने कलेवा के लिए पूछा
भाभी दो रोटी, साग ले आई
जुगाड में ही बैठ खाने लगे
दोनों बाप-बेटे एक-एक रोटी ।

मैंने देखा रोटी खाते दोनों को
पानी ले आया रामझारे में
चुडू से पानी पीकर बणजारे का चेहरा
भरी दुपहर के सूरज-सा चमका
मुँह से फूट पडे दो बोल -

पाँच साल हो गये मुझे प्याज बेचते
दुनियाभर में घर-घर डोलते
थारो जस्यो धरमी आदमी कोनी देख्यो
घणो भलो होज्यो थारो भाई !

मैं अचंभित था कि
मैंने ऐसा क्या कर दिया ?
दो घूँट पानी ही तो पिलाया है !

लेकिन मैंने जवाब पाया
बंजारे की आँखों में देखते हुए -
कि इन पाँच सालों में
कितना मर गया है हमारी आँख का पानी
कितनी शुष्क हो गयी है हमारे भीतर की नदी ।


4. फूलों की तरह तुम

फूलों की तरह आई थी
तुम मेरे जीवन में
खिल गई थी मेरी साँसों में
खुशबू की तरह ।

मेरी आँखों से झरती ही रहती है
तुम्हारी याद की खुशबू ।

तुम्हारी खुशबू मेरी आत्मा तक फैल गई थी

मेरी आँखें फूलों की खोज करती तितलियाँ हैं
इन्हें उम्मीद है कि फिर फूल खिलेंगे
फिर बहार आयेगी जीवन की बगिया में ।
तुम्हें याद करना फूलों को याद करना है
तुम्हें प्रेम करना अपने आप से प्रेम करना है ।

5. अफवाह

यह महज एक अफवाह थी कि
रानी के गर्भ में दूसरे राजा का खून है
जिसके पास वह छः माह रहकर आई
राजा ने रानी को देश-निकाला दे दिया ।

एक अफवाह थी कि
किसी के पुरखों ने हमें लूटा, मारा
बलात्कार किया हमारी बहन-बेटियों से
आज हम समर्थ हैं, सो उनसे बदला लेंगे ।

एक अफवाह थी कि
वे गौ-तस्कर हैं
गौ-वंश की हड्डियाँ हैं उनके ट्रक में
भीड ने मार दिया चालक-परिचालक को

एक अफवाह थी कि
बच्चों को चुराते हैं ये झूठे-मूठे साधू बनकर
न्याय कर दिया गया तलवारों से पुलिस के ही सामने ।

एक अफवाह थी
वह जो विधवा है, डायन है
भरे बाजार नंगा कर घुमाया गया उसे
बेचारी लाज-शर्म के मारे कुएँ में कूद गई ।

एक अफवाह थी कि
कोई बदमाश घुस आया है प्रधानजी के घर
सारी बस्ती ने जमकर पीटा रात के अँधेरे में
सुबह पता चला कि दामाद था
गौना आगे खिसक जाने की वजह से
मिलने आ गया था पत्नी से ।

एक अफवाह थी कि
जो लडका-लडकी प्यार करते हैं
एक ही कुलगौत्र के हैं,
यहाँ तक कि एक गाँव के भी
उनकी शादी हुई तो होगी बदनामी गाँव की
बरगद के लटका दिया गया दोनों को ।

एक अफवाह थी कि
यह महामारी साथ रहने पर फैलती है
सो अपने बाप को भी खाना नहीं दिया बेटों ने
कुत्ते के साथ बाडे में बाँध दिया उसे
अस्पताल ले जाया गया तो पता चला
कोई बीमारी थी ही नहीं ।
बाप कुत्ते के साथ न जाने कहाँ चला गया
कौन जाने शायद उसने
इस संसार का सत्य जान लिया हो
बेटे ने पता लगाने वाले के लिए
चालीस हजार का इनाम रखा है
बूढे को इतनी ही पेंशन मिलती थी महीने की।

मेरा देश अफवाहों का देश है
जब तक अफवाहें जन्दा रहेंगी
तब तक यह जन्दा रहेगा
अफवाहें धडकती रहती हैं
इसके सीने में हमेशा धडकन की तरह ।

6. ढोल

कभी-कभी मेरी राय बन जाती
कि तुलसी बाबा की चौपाई वाकई सही है
कुछ दिन बाद गाँव के स्कूल का
रिजल्ट आता
तथाकथित नीची जात का लडका
टॉप कर जाता
मेरी राय बदल जाती ।

कभी अचानक राय बन जाती
कि गाँव के लोग वास्तव में गँवार होते हैं
फिर कोई बुजुर्ग दौसा आकर
दे जाता अमरूद मुझे
जो कि वह अपने बेटे के लिए लाया है ।

फिर कभी राय बनती मेरी
कि औरतें होती हैं ज़ाहिल, स्वार्थी
और पिटोकडी भी
तभी एक औरत मेरी जंदगी में आती
मेरी राय बदल देती
मैं खुद को धिक्कारता ।

आखिर में मेरे यही समझ आया
कि मैं एक फटा हुआ ढोल हूँ
जिसे मरम्मत की बेहद जरूरत है ।

सम्पर्क - ग्राम पोस्ट : बिलौना कलां
तहसील : लालसोट, जिला-दौसा(राज.)
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