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भानु भारवि की कविताएँ

भानु भारवि
शब्द
शब्द जब गुजरते हैं,
छोडते हैं मायने
गहरे और गंभीर
कुछ समझ से परे
ऊपर ही ऊपर
हवा में तैरते हुए
तो कुछ
हृदय में गहरे पैठते हुए।

मन्त्रों में तब्दील होते
शब्दों के मेलों में
खो रही आदमी की
अस्मिता और जीवन-शैली।

कहते तो हैं कि-
शब्द ब्रह्म हैं किंतु,
इन दिनों ब्रह्मा के
श्रीमुख से निकले इन शब्दों पर
कर रहा है पूरा देश
शिव-ताण्डव।

नए-नए शब्दों से
निकल रही हैं
नई-नई ध्वनियाँ।

कहीं गहरी फूँक मार कर
बजाए जा रहे हैं
कर्ण-भेदी शंख
तो कहीं कर्ण-कटु डमरू।

हाहाकार मचाती
इन शब्द-ध्वनियों के बीच
मैं तलाशता हूँ
स्वरों का माधुर्य और सौंदर्य-बोध
जो इनके कोलाहल में
कहीं खो गया है।

स्वप्न

मन और इच्छा से परे होती है नींद
दिन और रात के
नैसर्गिक काल विभाजन से भी असंपृक्त

नींद के ही उपागम होते हैं स्वप्न

ये जरूरी तो नहीं
हम जो चाहें, वही देखें स्वप्न में
सोते हुए

वे तो स्वयं ही चले आते हैं
बन्द आँखों में अबाध-अविचल
किसी चाहे-अनचाहे चलचित्र की तरह

नींद में देखे हुए स्वप्न
चाहे देर रात के हों या भोर के
नहीं होते किसी अनागत घटना की सूचना
वे तो सिर्फ होते हैं
क्षणिक खुशी और शंकाओं के उपादान

स्वप्न वे भी नहीं होते
जिन्हें बुनते हैं हम जागते हुए

वे तो होते हैं संकल्पों व अनवरत प्रयासों के
पोषक तत्त्वों से फलित होने वाले
आकाँक्षाओं के वृक्ष

खरीदना-बेचना

खरीदने को बहुत कुछ है दुनिया में
ईमान, धर्म, सहूलियतें, मीडिया

आचरण की बदौलत नहीं
दमडी के बल पर
खरीदी जा सकती हैं
ये सभी तमाम चीजों

सत्ता और ताकत भी

जरूरत नहीं खरीदने की मुझे
निःशुल्क मिल रही हैं
मुश्किलें, बेरुखियाँ, उपेक्षाएँ और अभाव

मित्रता और रिश्ते के एवज में
दुश्मनी और बेगानापन
संवाद की अथाह दूरियाँ

संचार माध्यमों से तो
प्रसारित नहीं हो पाती
मेरे मन की बात उन्हें
बडे इत्मीनान से सुनती हैं
ये बहरी दीवारें

इतनी क्षमता नहीं मुझ में कि
मैं कर सकूँ बाध्य सुनने को
मेरी बकवास उनकी तरह

बिकने को तैयार हैं घोडे
उन्हें खरीदने को अस्तबलों में नहीं
जाना पडेगा रिसॉर्ट्स में
पेटी भर चारा फेंको
वे नतमस्तक हिनहिनाने लगेंगे
तुम्हारे लिए

बडे करीने से सजा कर रखी हैं
मैंने जो चीजों
नहीं मिल रहे उन्हें खरीदार
सच्चाई, निष्ठा, ईमानदारी और
दोगलों को पहचानने की क्षमता

इनकी कीमत सुनकर लौट जाते हैं लोग
यह सोच कर कि यह दुकान नहीं
एक अजायबघर है

रंगरेजन फातिमा

कपडे तो कितने ही
रँगती थी वो
किन्तु उसके हाथ
नहीं होते थे रंगों से सने हुए

रंगों की संलिप्तता से
एकदम असंपृक्त और धवल
होती थीं उसकी नरम हथेलियाँ

किसी भी कपडे पर
पक्का रंग चढाने का मर्दानी दावा करती थी वो
रंग उतरने पर पैसे वापस लौटाने के वायदे के साथ

दुकान के बाहर ही भट्ठी पर खौलते रंगीन पानी में
डंडी के सहारे कपडों को उलटती-पलटती वह
परिवार के दर्जन भर पेटों के लिए
जुटाया करती थी दो वक्त की रोटी
वहीं पगडंडी पर चहलकदमी करते हुए
तरा-ऊपर के दो तीन बच्चों में से
किसी के द्वारा शरारत करने पर
गाल पर तमाचे के स्मृतिचिह्न के साथ
वह बाँट दिया करती थी नासपीटे की उपाधि

काम के वक्त न उसके बदन पर होता था
हिजाब और न चेहरे पर बुर्का
ढीले कुर्ते सलवार और चुन्नी रहित
उसकी छाती भी रहती थी
रंग आकाँक्षितों की दृष्टि से बेखबर

काम के तगादों के कारण
कहाँ मिल पाता था उसे
इस सब के लिए सोचने का अवसर

उस समय जब किसी को
रँगवाने होते थे मूँगिया रंग में
रजाई के खोले तो लोग
बताया करते थे उसका पता
फातिमा रंगरेजन सरगासूली के नीचे



ओ रुकमा !

वह बैठी
घम-छांव में
ठंडी लूपर पीठ टेक
श्लथ थकी-मांदी
नहाई स्वेद धारा से

खोल पोटली करभ-सी मोटी रोटी की
छील-छील कांदे के छोडे करती दोपहरी

गोद में किलबिलाते
नन्हे शिशु को
ढँकती जर्जर पल्लू से
खोल वक्ष भर देती
रिरियाते मुँह में गोली अरीठे की

निहारती जब इक-टक
वात्सल्य-सिक्त आँखों से
तो लगती बरसने
ज्यों पय-धारा अमृत सी रीते घन से

अलसाये बेटे को
सुला चूनर के झूले में
लग जाती बच रही
आधे दिन की दिहाडी की चिन्ता में
झुला कर आते-जाते
बच्चे को वह करती निर्विघ्न अपने
कर्त्तव्य-पथ को

तू मां है ! तू श्रमदेवी है !
तू ही है सृजन ! ओ रुकमा !

अथ से इति की ओर

अथ से इति के बीच
कितने ही चक्रवातों ने
तोडा होगा तटबंधों को

उजाडे होंगे निरीह जलचरों के डिंब

कितनी ही बार
हरे आभूषणों से सजे होंगे द्रुम
और निर्वस्त्र तपे होंगे
आतप की यज्ञ-वेदी में

समय ने देखा होगा असंख्य ऋतु परिवर्तनों को

कितने ही कविता संग्रहों का
हुआ होगा लोकार्पण
बन्द कमरों में

अपनों के बीच अपनों ने ही
पढे होंगे कसीदे उनकी शान में

कितने ही कवि हो चुके होंगे
अवधि पार

भूख से लडते हुए
कितने ही बच्चे हुए होंगे बालिग
और बालिग हुए होंगे वृद्ध

बूढों की खंखार
आबाद हुए होंगे घर के कोने
और युवकों की पान-मसाले की पीक से
सार्वजनिक सुविधा-घर
घर के चूल्हे में फुंकती कितनी ही गृहिणियाँ
असमय ही हुई होंगी गर्भवती
और कितनी ही बलात्कार की शिकार लडकियों ने
न्यायालय से की होगी इच्छा-मृत्यु की गुहार

चोर दरवाजे से अपने ही घर में
घुसे चोर की पहचान के लिए
हमें जुटाने होंगे सबूत हमारे चोर न होने के

जबकि यह दरवाज़ा यूँ ही रहेगा खुला लावारिस
चोरों के निर्बाध प्रवेश की दावत देता

आमजन के लिए नहीं होंगे
भाषा और इतिहास
इन पर रहेगा लठैतों व उन्मादियों का
नाज़ायज कब्ज़ा

लोग निठल्ले न रहें
इसलिए सरकारें सिखाएँगी
पँक्तियों में खडे रहने की तहजीब

ये पँक्तियाँ, जो अब तक लगा करती थीं
राशन की दुकानों पर
बदल दिए जाएँगे उनके ठिकाने

इसी तरह मेरी यात्रा भी
अथ से आरंभ हो कर बढती रहेगी
उस इति की ओर
जिसका तलाशना है अभी
अंतिम छोर



रोना-हँसना

रोने और हँसने के बीच
मैं देखता हूँ
संवेदनाओं की असमतल जमीन
कहीं गहरी खाई-सी
तो कहीं काँटों से अटी
ऊबड-खाबड

कोई रोता है
अपने भीतर की अतल गहराइयों में
तो कोई खुली हवा में
भरता है उन्मादी अट्टहास

जीवन की सारणी में दर्ज
मैंने देखा है
हँसते को रोते हुए
तो कभी रोते हुए को हँसते हुए

समय के निःशब्द कोने में
भले ही तुम्हें सुनाई नहीं देती होंगी
हृदय के खाली-अंधेरे कुएँ से निकली
रुदन की ये दर्द भरी चीखें

लेकिन तुम्हारे होंठों पर
सुबह की धूप सी खिली हँसी में
कहीं छिपा है इन चीखों का कोलाहल

तुम्हारे उल्लसित दम्भ के बेमुखे नासूर के नीचे
कुलबुला रहा है उत्पीडन का लहू
जो फोड कर इस बेमुखे नासूर को
मिटा देगा हँसने और रोने के बीच का अंतर
***
समंदर से प्रश्न
शब्द जब गुजरते हैं,
छोडते हैं मायने
गहरे और गंभीर
कुछ समझ से परे
ऊपर ही ऊपर
हवा में तैरते हुए
तो कुछ
हृदय में गहरे पैठते हुए।

मन्त्रों में तब्दील होते
शब्दों के मेलों में
खो रही आदमी की
अस्मिता और जीवन-शैली।

कहते तो हैं कि-
शब्द ब्रह्म हैं किंतु,
इन दिनों ब्रह्मा के
श्रीमुख से निकले इन शब्दों पर
कर रहा है पूरा देश
शिव-ताण्डव।

नए-नए शब्दों से
निकल रही हैं
नई-नई ध्वनियाँ।

कहीं गहरी फूँक मार कर
बजाए जा रहे हैं
कर्ण-भेदी शंख
तो कहीं कर्ण-कटु डमरू।

हाहाकार मचाती
इन शब्द-ध्वनियों के बीच
मैं तलाशता हूँ
स्वरों का माधुर्य और सौंदर्य-बोध
जो इनके कोलाहल में
कहीं खो गया है।

स्वप्न

मन और इच्छा से परे होती है नींद
दिन और रात के
नैसर्गिक काल विभाजन से भी असंपृक्त

नींद के ही उपागम होते हैं स्वप्न

ये जरूरी तो नहीं
हम जो चाहें, वही देखें स्वप्न में
सोते हुए

वे तो स्वयं ही चले आते हैं
बन्द आँखों में अबाध-अविचल
किसी चाहे-अनचाहे चलचित्र की तरह

नींद में देखे हुए स्वप्न
चाहे देर रात के हों या भोर के
नहीं होते किसी अनागत घटना की सूचना
वे तो सिर्फ होते हैं
क्षणिक खुशी और शंकाओं के उपादान

स्वप्न वे भी नहीं होते
जिन्हें बुनते हैं हम जागते हुए

वे तो होते हैं संकल्पों व अनवरत प्रयासों के
पोषक तत्त्वों से फलित होने वाले
आकाँक्षाओं के वृक्ष

खरीदना-बेचना

खरीदने को बहुत कुछ है दुनिया में
ईमान, धर्म, सहूलियतें, मीडिया

आचरण की बदौलत नहीं
दमडी के बल पर
खरीदी जा सकती हैं
ये सभी तमाम चीजों

सत्ता और ताकत भी

जरूरत नहीं खरीदने की मुझे
निःशुल्क मिल रही हैं
मुश्किलें, बेरुखियाँ, उपेक्षाएँ और अभाव

मित्रता और रिश्ते के एवज में
दुश्मनी और बेगानापन
संवाद की अथाह दूरियाँ

संचार माध्यमों से तो
प्रसारित नहीं हो पाती
मेरे मन की बात उन्हें
बडे इत्मीनान से सुनती हैं
ये बहरी दीवारें

इतनी क्षमता नहीं मुझ में कि
मैं कर सकूँ बाध्य सुनने को
मेरी बकवास उनकी तरह

बिकने को तैयार हैं घोडे
उन्हें खरीदने को अस्तबलों में नहीं
जाना पडेगा रिसॉर्ट्स में
पेटी भर चारा फेंको
वे नतमस्तक हिनहिनाने लगेंगे
तुम्हारे लिए

बडे करीने से सजा कर रखी हैं
मैंने जो चीजों
नहीं मिल रहे उन्हें खरीदार
सच्चाई, निष्ठा, ईमानदारी और
दोगलों को पहचानने की क्षमता

इनकी कीमत सुनकर लौट जाते हैं लोग
यह सोच कर कि यह दुकान नहीं
एक अजायबघर है

रंगरेजन फातिमा

कपडे तो कितने ही
रँगती थी वो
किन्तु उसके हाथ
नहीं होते थे रंगों से सने हुए

रंगों की संलिप्तता से
एकदम असंपृक्त और धवल
होती थीं उसकी नरम हथेलियाँ

किसी भी कपडे पर
पक्का रंग चढाने का मर्दानी दावा करती थी वो
रंग उतरने पर पैसे वापस लौटाने के वायदे के साथ

दुकान के बाहर ही भट्ठी पर खौलते रंगीन पानी में
डंडी के सहारे कपडों को उलटती-पलटती वह
परिवार के दर्जन भर पेटों के लिए
जुटाया करती थी दो वक्त की रोटी
वहीं पगडंडी पर चहलकदमी करते हुए
तरा-ऊपर के दो तीन बच्चों में से
किसी के द्वारा शरारत करने पर
गाल पर तमाचे के स्मृतिचिह्न के साथ
वह बाँट दिया करती थी नासपीटे की उपाधि

काम के वक्त न उसके बदन पर होता था
हिजाब और न चेहरे पर बुर्का
ढीले कुर्ते सलवार और चुन्नी रहित
उसकी छाती भी रहती थी
रंग आकाँक्षितों की दृष्टि से बेखबर

काम के तगादों के कारण
कहाँ मिल पाता था उसे
इस सब के लिए सोचने का अवसर

उस समय जब किसी को
रँगवाने होते थे मूँगिया रंग में
रजाई के खोले तो लोग
बताया करते थे उसका पता
फातिमा रंगरेजन सरगासूली के नीचे



ओ रुकमा !

वह बैठी
घम-छांव में
ठंडी लूपर पीठ टेक
श्लथ थकी-मांदी
नहाई स्वेद धारा से

खोल पोटली करभ-सी मोटी रोटी की
छील-छील कांदे के छोडे करती दोपहरी

गोद में किलबिलाते
नन्हे शिशु को
ढँकती जर्जर पल्लू से
खोल वक्ष भर देती
रिरियाते मुँह में गोली अरीठे की

निहारती जब इक-टक
वात्सल्य-सिक्त आँखों से
तो लगती बरसने
ज्यों पय-धारा अमृत सी रीते घन से

अलसाये बेटे को
सुला चूनर के झूले में
लग जाती बच रही
आधे दिन की दिहाडी की चिन्ता में
झुला कर आते-जाते
बच्चे को वह करती निर्विघ्न अपने
कर्त्तव्य-पथ को

तू मां है ! तू श्रमदेवी है !
तू ही है सृजन ! ओ रुकमा !

अथ से इति की ओर

अथ से इति के बीच
कितने ही चक्रवातों ने
तोडा होगा तटबंधों को

उजाडे होंगे निरीह जलचरों के डिंब

कितनी ही बार
हरे आभूषणों से सजे होंगे द्रुम
और निर्वस्त्र तपे होंगे
आतप की यज्ञ-वेदी में

समय ने देखा होगा असंख्य ऋतु परिवर्तनों को

कितने ही कविता संग्रहों का
हुआ होगा लोकार्पण
बन्द कमरों में

अपनों के बीच अपनों ने ही
पढे होंगे कसीदे उनकी शान में

कितने ही कवि हो चुके होंगे
अवधि पार

भूख से लडते हुए
कितने ही बच्चे हुए होंगे बालिग
और बालिग हुए होंगे वृद्ध

बूढों की खंखार
आबाद हुए होंगे घर के कोने
और युवकों की पान-मसाले की पीक से
सार्वजनिक सुविधा-घर
घर के चूल्हे में फुंकती कितनी ही गृहिणियाँ
असमय ही हुई होंगी गर्भवती
और कितनी ही बलात्कार की शिकार लडकियों ने
न्यायालय से की होगी इच्छा-मृत्यु की गुहार

चोर दरवाजे से अपने ही घर में
घुसे चोर की पहचान के लिए
हमें जुटाने होंगे सबूत हमारे चोर न होने के

जबकि यह दरवाज़ा यूँ ही रहेगा खुला लावारिस
चोरों के निर्बाध प्रवेश की दावत देता

आमजन के लिए नहीं होंगे
भाषा और इतिहास
इन पर रहेगा लठैतों व उन्मादियों का
नाज़ायज कब्ज़ा

लोग निठल्ले न रहें
इसलिए सरकारें सिखाएँगी
पँक्तियों में खडे रहने की तहजीब

ये पँक्तियाँ, जो अब तक लगा करती थीं
राशन की दुकानों पर
बदल दिए जाएँगे उनके ठिकाने

इसी तरह मेरी यात्रा भी
अथ से आरंभ हो कर बढती रहेगी
उस इति की ओर
जिसका तलाशना है अभी
अंतिम छोर



रोना-हँसना

रोने और हँसने के बीच
मैं देखता हूँ
संवेदनाओं की असमतल जमीन
कहीं गहरी खाई-सी
तो कहीं काँटों से अटी
ऊबड-खाबड

कोई रोता है
अपने भीतर की अतल गहराइयों में
तो कोई खुली हवा में
भरता है उन्मादी अट्टहास

जीवन की सारणी में दर्ज
मैंने देखा है
हँसते को रोते हुए
तो कभी रोते हुए को हँसते हुए

समय के निःशब्द कोने में
भले ही तुम्हें सुनाई नहीं देती होंगी
हृदय के खाली-अंधेरे कुएँ से निकली
रुदन की ये दर्द भरी चीखें

लेकिन तुम्हारे होंठों पर
सुबह की धूप सी खिली हँसी में
कहीं छिपा है इन चीखों का कोलाहल

तुम्हारे उल्लसित दम्भ के बेमुखे नासूर के नीचे
कुलबुला रहा है उत्पीडन का लहू
जो फोड कर इस बेमुखे नासूर को
मिटा देगा हँसने और रोने के बीच का अंतर
***


तुम बताओ उस नदी का नाम
जो समा गई थी तुम में
भुला कर अपनी अस्मिता को

कितनी ही नदियों के साथ
तुमने किया होगा अभिसार
गहरे पानी के नीले पर्यंक पर

नदी नहीं रह गई थी वह
वो तो बन चुकी थी महासागर
तुम में हो कर एकाकार

तुम बताओ वो दिन, वो पल
जब बुझ गई थी वह
तुम्हारी लहरों में डूब कर
तेल में डूबी बाती की तरह
और खो बैठी थी अपनी द्युति

हलके नीले रंग में
बदलने से पहले कौन सा था
रंग उनका और
कैसी थी उनकी देह यष्टि
चाल कैसी थी उनकी
उन्मुक्त नवोढा सी या
प्रथम रजोदर्शना सी


तुम्हें क्या पता तुम पुरुष हो
सर्वज्ञ हो, सर्व शक्तिमान हो तुम
और वह है सिर्फ सर्वभोग्या प्रकृति

पता नहीं कौन थी
कैसी थी वह
इसी पहचान की आशा में
वह बन चुकी थी समंदर