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ब्रांडेड भूखे

तराना परवीन
ज्यादा से ज्यादा लोग मरे यह दुआ भी तो नहीं मांग सकते अल्लाह मियां से। हाय! अब इनके धंधे का क्या होगा? रब्बानी सर पकड कर बैठ गई।
ये रोटी मैं खाऊंगी छः साल की रानी ने बारह साल के जुगनू के हाथ से रोटी छीनी और भागकर दरवाजे में जा खडी हुई और जल्दी-जल्दी बडे-बडे निवाले निगलने लगी।
तू मर जाए तो अच्छा, कम से कम मुझे खाने को तो मिलेगा तू पैदा ही क्यों हुई? जुगनू ने अपनी छोटी बहन रानी को धक्का देकर दरवाजे से बाहर गिराते हुए कहा।
तू मर जाए तो मैं भी भूखी नहीं रहूँगी। कहते हुए रानी उठी और जुगनू के हाथ पर जोर से काट लिया। उसके हाथ से टपाटप खून टपकने लगा। रब्बानी दौडकर उनके पास गई,अरे दूर हटो! क्या कुत्तों की तरह लड रहे हो। दोनों बच्चों को अलग करते हुए रब्बानी ने खून बंद करने के लिए एक सफेद चिंदी जुगनू के हाथ पर बांध दी। बोली तू तो बडा है ना समझता क्यों नहीं? पहले ही परेशान हूँ, तुम और जान निकाल कर ही दम लोगे? पहले ही तुम्हारे अब्बा का काम-धंधा चल नहीं रहा था और अब इस महामारी में तो कहीं बाहर भी नहीं जा पाएँगे। कुछ नहीं कर पाएँगे। बहुत गरीबी के दिन देखे थे पर ऐसे नहीं कि बच्चे भूख से परेशान होकर एक दूसरे की जान लेने पर उतारू हो जाएँ और एक दूसरे के मरने की दुआ करने लगें।
कितने सालों से कह रही हूँ, कुछ और काम धंधा ढूंढ लो। यह भी कोई काम है मुंआ। रब्बानी सल्लन की ओर मुडकर कहने लगी -
शादी के पहले तो बहुत वादे किए थे कि मैं बहुत अच्छी सिलाई करता हूँ, देखना कुर्ता-पायजामा पैंट-शर्ट सब सीना सीख लूंगा और जब हाथ साफ हो जाएगा तो बहुत कमा लूंगा, पर हाथ साफ किया तो किस धंधे में- कफन बनाने में! सत्यानाश हो उस सलीम का जो शहर भर के लोगों के मौत के सामान और गुसल देने के लिए तुम्हें बुला लेता था।
तो क्या करता मैं? गुसल देने के लिए मना कर देता? कहता मुर्दे के लिए कफन नहीं शादी का जोडा दूंगा? अरे! तू नहीं समझती, बडा नेक काम है यह। बहुत सवाब मिलता है इससे। हर किसी आदमी से लोग यह काम नहीं कराते। भरोसेमंद, ईमानदार और जो पाक-साफ हो बदन से भी और नियत से भी उसी से करवाते हैं। लालची लोग तो कफन में भी मुनाफा कमा लेते हैं, और कफन के साथ रखने वाले इत्र, साबुन, लोबान, रूई में भी मुनाफा ही देखते हैं। मैं बहुत ध्यान से काम करता हूँ, वक्त का ध्यान रखता हूँ। हर वक्त सबके लिए हाजिर रहता हूँ। जितनी मेहनत लगती है उतने ही पैसे लेता हूँ। अरे यह तो मरने वाले का आखिरी लिबास होता है इसमें क्या नफा-नुकसान देखना। गुसल के बाद मैयत की गीबत नहीं करता ऐब नहीं निकालता। फिर इस काम के लिए मजहब के कायदे कानून जानने वाला भी होना चाहिए। कई लोगों को तो यह भी पता नहीं होता कि मर्द और औरत के कफन में क्या फर्क होता है उनकी तहों को किस हिसाब से जमाना होता है। सल्लन ने समझाया।
पर जब आदमी जिंदा हो तब भी तो उसके लिए कुछ सीना सीख लेते। कुछ कुर्ता, पजामा, शर्ट-पेंट ताकि वह जीते जी भी कुछ खुश हो लेता। और हम भी खुश रह लेते। रब्बानी ने कहा।
अरे अम्मा तुमने टीवी पर वह एडवर्टाइज नहीं देखा? दर्द कम करने के लिए हाथ की पट्टी को दबाता हुआ जुगनू बोला-
कौन सा एडवर्टाइज ?
एक अंग्रेज औरत सीढियों से नीचे उतरती है, मॉडर्न है, बहुत महंगे कपडे पहन रखे हैं। नीचे हॉल में बडे लोगों की पार्टी चल रही है। उसका पैर फिसल जाता है वह नीचे आकर गिरकर मर जाती है। फिर उसे कफन में दिखाते हैं सिल्क का बहुत महंगा उम्दा कपडे वाला कफन होता है। सभी बडे लोग उसके आस-पास खडे हैं और उसको देखते हैं इतने में उस कंपनी का नाम आता है। जुगनू जोश में आकर बोला।
तुम्हें पता नहीं लोग अपने धर्म वाले से ही कफन और दूसरा सामान खरीदते हैं। रब्बानी ने समझाया।
काश ऐसा होता अम्मा कि कफन खरीदने में लोग धर्म नहीं देखते। तो अब्बा बहुत कमाते। जुगनू बोलता चला गया-
और अम्मा तुम्हे याद नहीं? वह सुहानी मैडम क्या कह रही थीं कि आजकल फैशन का जमाना है। मुझे तो कॉटन के कपडे चुभते हैं। मरने के बाद भी पहनना नहीं चाहती। लोग भी मजाक उडाएँगे। बोलेंगे कि देखो बडे सिल्क के महंगे कपडे पहनती थी जिन्दगी भर, अब मरने के बाद तो कॉटन का कफन ही पहनना पडा ना। अगर मुझे सिल्क में देखेंगे तो सबके मुंह पर ताले लग जाएँगे। आखिरी सवारी हैं शान से निकले। जुगनू ने किस्सा बयान किया।
अरे वह नहीं जानती कि मजहब में कफन के लिए महंगा कढाई किया हुआ सिल्क का कपडा हराम है। सल्लन ने सफाई दी।
वैसे आजकल बडी-बडी कंपनियां ब्रांडेड कफन बेचती हैं। देखना अपने देश में भी एक दिन ऐसा आएगा कि लोग ब्रांडेड कफन खरीदेंगे तब अपनी भी कंपनी होगी सल्लन एँड संस। जुगनू ने अपना सपना साझा किया।
संस मैं तुझे इस धंधे में नहीं आने दूंगी। और वैसे भी तेरे अब्बू की जो खूबियाँ हैं न उनसे कोई किसी भी चीज का कोई ब्रांड नहीं बना सकता, इन आदतों से तो दो जून की रोटी मिल जाए वही काफी समझो। वाह! कितने ऊंचे ख्वाब देखे हैं आसमान में उडने के। धरती पर आ जा। धंधा ठप्प पडा है। रब्बानी बोलती गई-
पुराने जमाने के लोग बहुत अच्छे थे। जब पानी के जहाज से मक्का मदीना हज करने जाते थे तो कई महीने लगते थे,वे अपना कफन साथ लेकर जाते थे। अब तो हवाई जहाज से फुर्र हो जाते हैं और फुर्र से उड कर वापस आ जाते हैं। मरने का कोई डर नहीं रहा और है तो भी हर जगह ब्रांडेड कफन आसानी से मिल जाते हैं। अब मूई इन बडी कंपनियों को क्या पडी थी जो इस छोटे धंधे में भी आ गई?यह काम तो कम से कम हम जैसे गरीबों के लिए छोड देते। धंधा बढे तो भी किस तरह? फिक्र करती हुई रब्बानी बोली।
अरे तू मेरा धंधा बढाने की क्या फिक्र करती है? मैंने हम दोनों के लिए भी कफन तैयार कर रखे हैं। अब तक जो कफन बनाने का कपडे का थान आता था उसमें से जो कपडा बचता था उससे मैंने हम दोनों के भी आखिरी सफर की पूरी तैयारी कर रखी है। हमारे बच्चों को किसी के आगे कम से कम हमारे कफन के लिए हाथ तो नहीं फैलाना पडेगा या पडोसियों को चंदा तो नहीं इकट्ठा करना पडेगा। बोल और क्या चाहिए तुझे? इतनी दूर तक का तो इंतजाम कर लिया है तेरे लिए। और सल्लन हँस दिया।
और अब यह इतना लंबा लॉक डाउन। ना कहीं आना, ना कहीं जाना ना किसी से मिलना ना किसी को छूना सब से दूर रहना और घर पर ही बंद रहना। एक तो पहले ही धंधा ठप्प था अब तो बिल्कुल ही बंद हो जाएगा। सुना तुमने खबरों में- वैसे तो एक्सीडेंट में और कई बीमारियों में सैकडों लोग मरते थे पर अब इस लॉक डाउन में तो बहुत ही कम मर रहे हैं। लोग घरों में ही रह रहे हैं ,साफ हवा में सांस ले रहे हैं, बाहर का खाना बंद, सफाई रखने लगे हैं, तो तंदुरुस्त ही रहेंगे। रब्बानी कहने लगी।
खौफ खा खुदा का। लोग तंदुरुस्त हैं तो तुझे शिकायत है। सल्लन ने डांटा।
अरे मुझे मेरी परवाह नहीं। पर ये बच्चे! रानी और जुगनू इनका क्या? बच्चे क्या खाएँगे?
फिकर ना कर खुदा ने पेट दिया है तो वह भरने का इंतजाम भी करेगा। सुना नहीं सरकार सबको फ्री राशन- इंधन सब कुछ देगी ।
हमेशा चुप कर देते हो मुझे खुदा का खौफ दिखाकर। अरे! छोटा-मोटा कुछ और काम कर लिया होता, कुछ पूंजी होती तो भी काम आती। लोग अपने घरों में राशन जमा कर रहे हैं और हम? हमारे पास तो कुछ भी नहीं। जो थोडी बहुत बचत थी उससे भी यह कफन के सफेद कपडों के थान लाकर घर में रख दिए हैं। अब इनको खाएँ क्या? ये इत्र की शीशीयां? इनको पिएँ क्या? इनसे भूख मर जाएगी? और यह चिंदियाँ, यह तो फांसी लगाने के ही काम आएँगी।
सब ठीक हो जाएगा। हम भूखे नहीं मरेंगे।
पागल हो गए हो क्या? अब तो हम भूखे ही मरेंगे। पहले तो लोग मरते थे तो तुम कफन देकर गुस्ल करवाकर कुछ कमा लेते थे । सुना है अब इस बीमारी में तो अस्पताल से लाश भी घर पर नहीं लाने देते हैं। उन पर केमिकल छिडककर पॉलिथीन में बंद कर देते हैं। कोई गुसल नहीं कोई कफन नहीं। तुम्हारा धंधा तो बिल्कुल ठप्प है ।अब तो घर से बाहर भी नहीं निकल सकते।
बस बस बहुत हो गया ,अब तू चुप हो जा। तू मुझे पागल कर देगी। लॉक डाउन में बुरा हाल सिर्फ मेरा नहीं सभी छोटे-मोटे काम करने वालों का यही हाल है। बस दुआ कर लॉक डाउन और आगे नहीं बढे। सल्लन झल्लाया।
पर मरने वालों का आंकडा शहर दर शहर बढता ही जा रहा था। देश का, दुनिया का, बडे-बडे शहरों का आंकडा घटने का नाम नहीं ले रहा था। मोहल्लों ,गली-गलियारों का बुरा हाल था। पहले हरे जोन में जो शहर थे ,जहां लॉक डाउन जल्दी खुलने की उम्मीद की जा रही थी वह भी धीरे-धीरे नारंगी जोन में,और फिर लाल और गहरे लाल जोन में तब्दील होते जा रहे थे,जहां लॉकडाउन खुलने की बिल्कुल मनाही थी। सल्लन का शहर भी लाल जोन में आ चुका था जहां शक्ति से लॉक डाउन का पालन किया जा रहा था और कई जगह कफ्र्यू भी लगाया गया था।
कभी खाना मिलता कभी नहीं मिलता। गरीबी के दिन देखे थे बहुत, पर भीख नहीं मांगी कभी, कभी इतनी जिल्लत नहीं उठाई कि कोई आए और खाना दे। शुरू-शुरू में जब कुछ लोग उसके घर राशन देने आए तो उसे अंदर ही अंदर थोडी तसल्ली हुई थी। पर फिर एक बार उन्होंने उसे उसके टूटे-फूटे घर से बाहर बुलाया। वह मुंह पर कपडा बांधकर बाहर आया। चार पांच लोगों ने पहले उसका नाम पूछा, फिर एक राशन का पैकेट थमाया। वह जैसे ही पैकेट लेकर घर के अंदर जाने के लिए मुडा तो एक आदमी बोला-
अरे अपने मुँह से कपडा तो हटाओ, जरा फोटो तो खिंचवा लें। वह क्या करता? कपडा हटाया। पाँचों लोगों ने उसे राशन की थैली झिलाते हुए फोटो खिंचवाया।
तुम तो सल्लन हो! यहाँ रहते हो। याद कर लेना आगे भी काम पडे तो। हम तो बहुत कहते थे तुम्हें कि अपनी घरवाली को हमारे यहाँ काम पर भेज दो पर तुमने कभी बात मानी ही नहीं। यह वही शहर के बडे सेठ थे जिनके आगे उसने बडी बडी मुसीबतों में भी कभी हाथ नहीं फैलाया था और ना ही किसी गलत बात पर समझौता किया था। यह कैसी मजबूरी है या खुदा ? कभी बिना मेहनत किसी का एक पैसा नहीं खाया। अपनी मेहनत से थोडा बहुत जो कमाया, उससे जो मिला रूखा सूखा उसी में काम चलाया।
लॉक डाउन को एक महीना, दो महीना हो गए थे। सल्लन सोच-सोच कर थक गया था कि धंधा कब शुरू होगा। लॉकडाउन खत्म होने की उम्मीद होती और लॉक डाउन और आगे बढ जाता। पहला, दूसरा, तीसरा, चौथा ना जाने कितने लॉक डाउन अभी बाकी थे। वह छोटी-छोटी बातों पर बीवी बच्चों से लडने झगडने लगता। करें तो क्या करे? ना बाहर निकल सकते ना किसी को परेशानी सुना सकता। कभी कोई कुछ खाने को दे जाता तो कुछ दिन निकल जाते। कभी भूखे ही सोना पडता। इस बार तो एक सप्ताह बीत गया था।बच्चे भूख से परेशान थे। रब्बानी सूखकर कांटा हो चुकी थी। आज रात भी नींद नहीं आई थी । सल्लन परेशान होकर सुबह छह बजे ही घर के बाहर निकला और पडोसी को अपनी मजबूरी सुनाई। पडोसी ने एक फोन नंबर लगाया और उससे कहा कि ये लोग गरीबों के घर खाने-पीने का सामान बांटते हैं इन्हें अपनी मजबूरी बता दो। सल्लन ने फोन उठाया -
हेलो मैं सल्लन बोल रहा हूँ। कच्ची बस्ती, घर नंबर- चार, पुल के पास से। मरियल आवाज में सल्लन बोला।
हां बोलो मैं सेठ बोल रहा हूँ । उधर से सेठ की रोबीली आवाज सुनाई थी।
अरे सेठ साहब आप हैं ? क्या बताऊं? एक हफ्ते से घर में खाने को कुछ नहीं है। ना राशन न इंधन। दो दिन से आटा घोलकर पिला रहे हैं बच्चों को। अब तो वह भी खत्म होने आया। उसका गला रूंध गया।
ठीक है ,मैं राशन पहुंचाता हूँ।
अरे साहब आप तो मुझे जानते हैं ना, मैं आपसे कब से बात करना चाह रहा था साहब। अब इस तरह तो हम और नहीं जी पाएँगे। कुछ करो साहब। इस लॉकडाउन में हमें और कुछ नहीं तो कम से कम दो टाइम का खाना तो रोज मिलता रहे। साहब हाथ जोडकर इल्तजा है आपसे, आपने कहा था ना कि मैं अपनी बीवी को आफ यहाँ आफ घर पर काम के लिए भेज दूँ, तो साहब अब वह आ जाएगी आफ यहाँ काम पर आज से ही। वह गिडगिडाया।
पागल समझ रखा है क्या मुझे? अब इस छुआछूत वाली महामारी में मैं तेरी बीवी को अपने घर में घुसने दूंगा? जब तुम लोगों को समझाया था तब तो तुम्हें समझ में नहीं आया। जब बुलाया था तब नहीं भेजी। मेरे यहाँ काम करने वाले लोग आज बिरयानी और स्टू बना कर खा रहे हैं और बहुत खुश हैं। तुम्हारा तो ब्रांड ही भूखे मरने वालों का है। तुम अपना ब्रांड नहीं बदल सकते। तुम्हारी बीवी पता नहीं किस-किस के संफ में आई होगी। किस-किस से मिली होगी। उसे मेरे घर मत भेजना।
सेठ के नफरत भरे बोल से सल्लन की आखिरी उम्मीद भी टूट चुकी थी। वह रब्बानी पर लगी तोहमत का जिम्मेदार भी खुद ही को ठहरा रहा था। फोन पडोसी को थमा कर वह घर के अंदर आ गया। भूख ने मुझे इतना मजबूर कर दिया कि मैं अपनी बीवी को ही..... तोबा तोबा मेरे दिल ने यह कहने की गवाही कैसे दी? मेरे दिमाग में यह बात आई कहाँ से? लगता है भूख धीरे धीरे मेरे दिमाग और दिल को काबू मैं कर रही है । ऐसा लग रहा है कि भूख के आगे अब रिश्ते नाते सब धीरे-धीरे नंगे हो रहे हैं। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्यों उसने सेठ के घर अपनी बीवी को भेजने की बात कह दी? उसने रब्बानी से तो इस बात का जिक्र भी नहीं किया था, ना उससे उसकी राय जाननी चाही थी कि वह जाना भी चाहती है कि नहीं? भूखी रब्बानी को उसने भूखे भेडियों के आगे डालने की सोची भी कैसे? उसे यह क्या हो गया है? पेट की भूख ने क्या उसे पागल कर दिया है ? क्या इस भूख ने उसकी ईमानदारी, इंसानियत खत्म कर दी है? नहीं नहीं मैं तो बच्चों की भूख नहीं देख सह पा रहा था इसीलिए उसे पता था वह खुद को समझाने के लिए खुद से ही बहाने बना रहा है। मैंने रब्बानी को सेठ के यहाँ भेजने की बात सोची भी कैसे? अरे सल्लन तुझे तो बिरादरी वाले बहुत ही नेक, खुदा का बंदा मजहबी समझते हैं। तो यह सब क्या करने जा रहा था तू? लानत है तुझ पर! या खुदा मुझे माफ करना। वह अपनी सोच पर मलाल से भरकर अपने आप पर लानत भेजता हुआ घर में आकर घुटनों में अपना मुँह दबाकर बडबडाता हुआ उकडू बैठ गया। रब्बानी से आँख नहीं मिला पा रहा था वह।
क्या हुआ? कुछ इंतजाम हुआ? राशन आएगा? घुटने में मुँह छिपाते हुए बिना गर्दन ऊपर उठाते हुए वह वहीं से धीरे से बोला -
नहीं।
राशन पानी का कोई इंतजाम नहीं होता हुआ देख रब्बानी ने बच्चों को समझा-बुझाकर नानी के घर जाने के लिए तैयार कर लिया और सुबह जल्दी साढे छः बजे ही नानी के घर रवाना कर दिया ताकि कोई पुलिस वाला उन्हें रास्ते में रोके-टोके और ठोके ना। पर आधे घंटे में ही बच्चे वापस आ गए।
क्या हुआ? रब्बानी ने पूछा।
मुमानी ने अंदर ही नहीं आने दिया। दरवाजे से ही रवाना कर दिया और बोली हम तो खुद ही परेशान हैं तुम्हारा क्या करेंगे? यह वक्त है क्या किसी के घर जाने का? तेरी मां से कह देना हमेशा साथ निभाया पर अब सुख-दुख में साथ निभाने वाला वक्त ही नहीं रहा। अब तो वो टाइम है जब ना सुख में साथ निभा सकते हैं ना दुख में। अब तो साथ ही नहीं रह सकते। सबसे दूर ही रहना है और हालत हमारी भी अच्छी नहीं है। लॉक डाउन तो जाने कितने महीने चलेगा। हमने अभी दरियादिली दिखाई तो आगे हमारी भी हालत तुम्हारे जैसी ही हो जाएगी। इतना समझ में नहीं आता क्या तेरी अम्मा को जो बच्चों को हमारे सिर मढ रही है ऐसी बीमारी में भी। जुगनू एक सांस में बोल पडा।
रब्बानी ने दोनों बच्चों को गले लगा लिया, पर जैसे ही वह मुडी तो देखा बच्चों की नानी वहाँ खडी है।
चलो चिराग और रानी मेरे साथ। मैं तुम्हें लेने आई हूँ। नानी बोली ।
रब्बानी ने बच्चों को पीछे किया और अपनी मां और बच्चों के बीच में आकर खडी हो गई। कहने लगी-
रहने दो अम्मी तुम परेशान हो जाओगी पहले ही हालात इतने खराब हैं। इन्हें कैसे रखोगी?
ऐसी हालत में मैं अपने नवासा-नवासी को छोड सकती हूँ क्या? चल हट बीच से । तू कौन होती है मेरे बच्चों के और मेरे बीच में आने वाली रब्बानी को बीच से हटाते हुए वह रुआंसी होकर बोली हमारी हालत खराब है बेटी,पर तुमसे ज्यादा नहीं। उसने एक निगाह अपनी बेटी पर डाली और दुपट्टा आंखों पर रखकर आंसू छिपा लिए। जुगनू और रानी दोनों का हाथ पकडकर उन्हें खींचते हुए वह उन्हें अपने साथ ले गई।
भूख और बेबसी से बेजान जिस्म लिए सल्लन कोने में बैठा अपने बच्चों की बातें सुन रहा था और निरीह निगाहों से नानी को बच्चों को घसीट कर ले जाते हुए देख रहा था। जिस्मानी और रूहानी तौर पर पूरी तरह टूट चुके सल्लन में अब और बैठे रहने की और ताकत नहीं थी और वह बेहोशी की हालत में वहीं लेट गया।
अंधेरा हो गया था, शायद रात की नौ बजे थ। उसे लगा किसी ने घर की कुंडी खटखटाई। चक्कर खाता लडखडाते, भारी कदमों से सल्लन इस उम्मीद से उठा कि शायद कोई राशन देने आया होगा। जब दरवाजा खोला तो देखा दो आदमी सामने खडे थे। उसकी उम्मीद भरी निगाहें उनके हाथों पर गई पर उनके हाथों में कुछ नहीं था। उसने पथराई आंखों से पूछा -
क्या हुआ
चार कफन चाहिए । रात बारह बजे तक तैयार कर देना। कितनी औरतें हैं और कितने मर्द हैं?
दो औरतें, दो मर्द। यह लो पैसे ।
नहीं मैं पहले पैसे नहीं लेता जब सामान लेने आओ तब दे देना। सल्लन घर के अंदर दौडा। उसने घर के अंदर ताख में से कपडों का थान उतारा और उसे झटका। कैंची निकाली और इंची टेप को साफ किया।
दो सेट तो तैयारी पडे हैं ना हम दोनों के, पहले वही दे दो। रब्बानी बोली।
कैसी बात करती है? वह तो हमारे लिए हैं। अभी जमीर मरा नही है कि अपने ही कफन का सौदा कर लूं। इस भूख ने जिस्म को बहुत मजबूर और लाचार किया है पर रुह को अभी खरीद नहीं पाई है। अभी इतने भी भूखे नहीं हैं कि अपने ही कफन को बेच डालें। सल्लन बोला।
दोनों कफन तैयार करने में जुट गए। दोनों ने मिलकर पहले सफेद थान का कपडा फैलाया । सल्लन ने इंची टेप से लंबा सा पूरा शरीर को ढकने वाला लिफाफा नापा। कपडा बीच में से मोडा। दूसरी तरफ बैठी रब्बानी ने अपनी ओर से मुडे हुए कपडे के कोने को पकड कर ऊपर उठाया । सल्लन ने भी अपनी ओर से मुडे हुए कपडे का कोना ऊपर उठाया और बीच में कैंची डालकर कर सर्रर्रसर्रर्रर चला दी। दूसरी ओर से भी इतना ही लंबा कपडा उठाया,मोडा और फिर से कैंची चला दी। दोनों बराबर कपडों को एक के ऊपर एक रखा।
अब इजार के लिए कपडा लाओ। अरे! कमर का कपडा ईजार भूल गई है क्या? उसने पिछले दो कपडों से छोटा कपडा नापा और काटा, फिर उसे दोनों बडे कपडों पर फैलाकर सारी सलवटें निकालकर तरतीब से तीनों कपडों को समेट लिया। रब्बानी ने थैली मे कपडा डाला फिर एक इत्र की शीशी साबुन, लोबान, पत्ते, रुई, दो छोटे कपडों के टुकडे और तीन- चार चिंदियां रखकर पैकेट तैयार कर दिया। मर्दों के दो कफन तैयार किए और दो औरतों के कफन के लिए कपडे काटने शुरू किए। पहले की तरह दो बडे कपडे लिफाफे के लिए और इजार और खमीज का दोहरा किये हुए कपडे को बीच से काटा और सिर ढकने के लिए खमार के कपडे को काटकर सिर की ओर रख हल्के हाथों से सलवटें निकाल कर पांचों कपडे तरतीब से समेट कर रब्बानी को दे दिये और दूसरा कफन तैयार करने लगा । रब्बानी ने उसे थैली में रख कर बाकी का सामान भी उस में रख पैकेट तैयार कर लिया। इस तरह दो मर्द और दो औरतों के कफन के पैकेट तैयार हो चुके थे। पार्टी आई और पैकेट लेकर चली गई।
सल्लन के हाथों में कुछ पैसे आ गए थे। लॉक डाउन में सुबह सात बजे से दिन के ग्यारह बजे तक ही दुकाने खुलती थीं। वह सुबह सात बजते ही पास की किराने की दुकान पर गया आटा, दाल, मसाले, तेल, शक्कर,चाय की पत्ती वगैरह खरीदी और घर की ओर दौडा। रब्बानी के हाथ में बडा-सा थैला थमाया। उसकी मुस्कुराहट देखकर सल्लन की सांस में सांस आई।
दिन की बारह बजे होंगी। खाना खाकर सल्लन और रब्बानी फर्श पर ऐसे पडे हुए थे जैसे बहुत दिनों बाद रोटी का नशा किया हो। इतने में किसी ने दरवाजा खटखटाया। वह उठा, दरवाजा खोला तो दो लोग खडे थे। उसने पूछा
क्या हुआ भाई ?
आठ कफन चाहिए। एक घंटे में तैयार कर देना। तीन औरतें, चार मर्द और एक बच्चा।
इतनी जल्दी कैसे करूंगा भाई?
अरे कफन ही तो हैं कौन सा शादी का जोडा है जो चांद सितारे जडने हैं? वे उसके हाथ में रुपया थमाने लगे। सल्लन ने हमेशा की तरह मना कर दिया कहा बाद में। सल्लन को समझ नहीं आ रहा था कि इतने लोग कैसे मर रहे हैं? और वह भी महामारी से नहीं, अपने घरों मे कुदरती मौत मर रहे हैं और कफन के साथ दफनाए जाएँगे। पर उसके पास वक्त नहीं था ज्यादा सोचने का। आठ कफन तैयार करने थे। करीब शाम का खाना खाया पांच बजे उसने कफन की डिलीवरी दे दी। कुछ और पैसे हाथ में आए। शाम का खाना खाया। रात की करीब
ग्यारह बजे फिर किसी ने कुंडा खटखटाया। फिर बारह कफन का आर्डर आया।
सुबह तक कफन तैयार करने थे। वह और रब्बानी काम में भिड गए और रात भर में सारा सामान तैयार कर दिया। दूसरे दिन भी यही सिलसिला जारी रहा। न जाने कितने कफन सल्लन और रब्बानी ने मिलकर तैयार कर दिए थे।
सल्लन अभी भी ताज्जुब में था। उसका दिमाग चक्कर खा रहा था कि यह कौन सी बीमारी है? यह बीमारी तो शायद छूत की नहीं लगती है। यह फैलने वाली नहीं है फिर भी सैकडों लोग इससे कैसे मर रहे हैं? फैलने वाली होती तो सरकार कुछ करती क्योंकि उससे सभी लोग मरते हैं। सल्लन ने कभी नहीं सोचा था कि इतने सालों से बंद पडा उसका धंधा एकाएक ही यों चमक जाएगा कि उसे रात दिन काम करना पडेगा, और वह भी ऐसे वक्त जब दूसरे सभी धंधे ठप्प हो। कमाई भी काफी हो रही थी। उसे जुगनू का सल्लन एँड संस ब्रांड बनाने का सपना पूरा होता हुआ दिखाई देने लगा था। पर समझ नहीं आ रहा यह बीमारी कौन सी है? कौन लोग हैं जो मर रहे हैं? क्या लोग आत्महत्या कर रहे हैं? छोटे दुकानदार या गरीब मजदूर? शायद भूख से इतने लोग मर रहे हैं। पर भूख से मरने वाले लोगों के पास कफन का पैसा कहाँ?
दो दिन से फर्श पर पडा सल्लन बेहोशी में बडबडा रहा था, फिर वह अचानक चुप हो गया था। वह भूख के कारण कोमा में जा चुका था। पडोसी ने पुलिस को खबर दी। पुलिस आई और कुछ पडोसियों को बुलाकर उसे हिलाकर, छूकरकर देखने को कहा। सलीम ने पहले उसकी नब्ज, देखी, नाक के आगे हाथ रखा, फिर उसके मुँह में आबे जमजम का पानी डाला। एक बार फिर सलीम ने उसकी नाक के आगे हाथ रखा सांस देखने के लिए, पर अब की बार उसने पुलिस वाले की ओर देखकर इशारा किया और कहा कि कुछ नहीं है। कोने में रब्बानी घूंघट निकाले बैठी थी। यह सुनकर भी वह ना कुछ बोली ना हिली। सलीम ने उससे कहा -
भाभी ऐसा भी क्या हो गया था? ऐसी हालत थी तो कुछ बताती तो सही पर वह अब भी कुछ नहीं बोली। सिर्फ उसने एक थैली सलीम को झिलाने के लिए अपना हाथ ऊपर उठाया । सलीम ने जैसे ही उसके हाथ से थैली अपने हाथ में ली वह वहीं एक तरफ लुढक गई।
भाभी भाभी! क्या हुआ? क्या है इसमें? सलीम ने जल्दी से उस थैली को फर्श पर पल्टा तो उसमें से कडकड करके दो छोटी कांच की शीशियां, कुछ सामान और कपडे बिखर गये। उसने जब गिरे हुए कपडों को फैला कर देखा तो वे दो कफन थे।

Tarana Parveen
Associate Prof. in English
Govt. Meera Girls' College
Udaipur, Rajasthan