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बनारस में रेणु

भारत यायावर
रेणु 1939 में होली के बाद अपनी कक्षा के विद्यार्थियों के साथ बनारस चले गए। वहाँ दशाश्वमेध घाट के समीप ही एक मकान में वे रहते थे। यह पूरा मकान ही नेपाली छात्रावास जैसा था। पूरे मकान में बहुत सारे कमरे थे। एक कमरे में कई छात्र रहते थे। दशाश्वमेध घाट के समीप ही यह मकान था। एक छोटे-से पार्क के बगल में स्थित। पार्क का बंगाली टोला के लोगों ने नामकरण कर दिया था- चितरंजन पार्क। गंगा नदी के करीब इस पार्क से सटे 17/131 नम्बर का वह मकान आज भी है। तब रेणु शाम को प्रायः छत पर टहलते गंगा की लहरों को निहारते हुए भारतेन्दु की गंगा-छवि-वर्णन कविता की पंक्तियाँ गुनगुनाते- नव उज्ज्वल जलधार हार हीरक सी सोभत। यह कविता उनके कोर्स में थी। फिर शाम को घाट पर जाकर कभी बैठते और कभी पतली गलियों में चक्कर लगाते।
वे सब विषयों में पारंगत थे। उन्हें गणित और विज्ञान को विशेष तौर पर पढना था। इसके लिए उन्होंने एक शिक्षक की खोज की और उनसे ट्यूशन पढने लगे। अपने कमरे में इन दोनों विषयों में पारंगत होने के लिए नियमित दो घंटे अध्ययन और अभ्यास करते। शेष समय में साहित्यिक रचनाएँ पढते और जो भी मन में आता नियमित लेखन करते। लेखन का यह अभ्यास ही उन्हें परिपक्व लेखक बनाता जा रहा था।
शाम को दशाश्वमेध घाट पर कभी-कभार चले जाते। उस घाट पर भारतीय परम्परा और संस्कृति के एक पंडित से धीरे-धीरे उनका गहन परिचय होते जा रहा था। बाद में यह गुरु-शिष्य के संबंध के रूप में विकसित होता चला गया। इसी पंडित जी से उन्होंने कई शब्दों के गूढ रहस्यों को जाना। एक बार उन्होंने अश्वमेध का अर्थ पूछा। पंडित जी ने विस्तार से उन्हें बताया-
मूल शब्द है धी। धी का अर्थ है सीखना। सीखना क्या है? नई-नई बातों को ग्रहण करना। जो इस प्रक्रिया को अपनाता है वही धीमताम है। इसी धी से धृति की प्रक्रिया शुरू होती है। धृति क्या है? सीखी हुई बातों को दिमाग में अच्छी तरह बिठाना। तात्पर्य यह कि हम बचपन से जो भी सीखते आए हैं, उसे मस्तिष्क में ठीक तरह से धारण कर रख सकें। अगर हम सीखते जाएँ और भूलते जाएँ तो हमारा बौद्धिक विकास नहीं हो सकता।
पंडित जी ने आगे बताया कि उसके बाद स्मृति का महत्त्वपूर्ण स्थान है। स्मृति का अर्थ है सीखी हुई बातों को समय-समय पर दोहराते रहने की क्षमता। हम किसी बात पर ध्यान दें और उसे दोहराएँ तो वह स्मृति बनती है। यह स्मृति ही है जो बीती हुई बातों और घटनाओं को मस्तिष्क में संजोकर रखती है।
रेणु को पहली बार ऐसे भाषाशास्त्री पंडित मिले थे जो इतनी अच्छी तरह ज्ञान की प्रक्रिया को बता रहे थे। वे रोज शाम को उनके पास जाते और समीप बैठे रहते। अवकाश मिलने पर वे तरह-तरह की बातें बताते। ये बातें रेणु के लेखकीय जीवन को बल प्रदान करतीं। एक दिन उन्होंने बताया कि अश्वमेध में दो शब्द हैं। अश्व और मेध। अश्व का अर्थ घोडा होता है, लेकिन यहाँ इसका विशेष अर्थ है- सात की संख्या। चूँकि सूर्य की किरणों में सात रंग हैं, यही सात रंग सूर्य के रथ के सात अश्व हैं। अनेक वर्णों से सुसज्जित वसुंधरा में ये सात अश्व समाहित हैं। इन्हीं की उर्जा से समस्त प्रकृति संचालित है। इन्हीं सात अश्वों को अपने में समाहित करना अश्वमेध है।
मेध का साधारण अर्थ है बलि। लेकिन इसका दूसरा अर्थ है यज्ञ। यज्ञ ही मस्तिष्क में ज्ञान का आवाहन है। मेध की सर्वोच्च प्रक्रिया है उर्जा रूपी इन सप्तवर्णी अश्वों को अपने मस्तिष्क में धारण करना। इसी से मेधा का निर्माण होता है। अश्वमेध की इस प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही बौद्धिक क्षमता से सम्पन्न लोग राष्ट्र का निर्माण करते हैं।
ज्ञान की यह विरल दृष्टि रेणु को दशाश्वमेध घाट पर प्राप्त हो रही थी। उनकी जिज्ञासा प्रबल थी। वे और-और ज्ञानपिपासु होते जा रहे थे। ऐसे महापंडित का मिल जाना उनकी ज्ञान की साधना को एक ऐसी दिशा की ओर ले जा रहा था, जिसका कोई ओर-छोर नहीं था। पंडित जी की शब्दों की व्याख्या उनको सम्मोहित कर रही थी। आगे उन्होंने बताया-
तैत्तिरीय ब्राह्मण (3/8/9) में अश्वमेध को परिभाषित किया गया है-
राष्ट्र वा अश्वमेध
परा व एष सिच्यते
अर्थात् राष्ट्र या अश्वमेध एक ही है। या राष्ट्र ही अश्वमेध है। यह परा अर्थात् अलौकिक ऊर्जा का संचार करता है। अश्वमेध करना ही राष्ट्र का निर्माण करना है। मेध का अर्थ हिंसा को अमान्य कर देने पर उसका वास्तविक अर्थ राष्ट्र एवं ज्ञान का संवर्धन तथा संगतिकरण ही रह जाता है। मेध का अर्थ बुद्धि, शक्ति, बल या बुद्धिबल भी है। इसका अर्थ यज्ञ, अर्पण, सार, पूज्य, रस और पवित्र भी होता है। वाजनेय संहिता में इन अर्थों का निरूपण किया गया है। मेध से ही मेधा शब्द का निर्माण हुआ है। कालिदास को मेधारुद्र इसीलिए कहा गया। दशाश्वमेध घाट के बारे में कथा है कि यहाँ पहले रुद्रसरोवर नामक एक बडा तालाब था, जिसके किनारे दस बार अश्वमेध किया गया। प्रकृति की अलौकिक शक्तियों का अवतरण यहाँ हुआ और ज्योतिर्लिंग के रूप में महाशिव को स्थापित किया गया। इस घाट की महिमा ही है कि पतित पावनी गंगा, जो पश्चिम से पूरब की ओर गमन करती है, अपना मार्ग बदलकर दशाश्वमेध घाट को स्पर्श करने के लिए दक्षिण से उत्तरगामी हुई। यह ज्ञान साधकों की स्थली है।
रेणु तीन वर्षों तक दशाश्वमेध घाट के उस मकान में रहे और तरह-तरह के ज्ञान-उपासकों से अनुपम ज्ञान प्राप्त करते रहे। उनकी चेतना में भारतीय ज्ञान-परम्परा समाहित होती रही। लेकिन उनके मन की कई गतियाँ थीं। वे हर गली और चौराहों को ठीक से जानना चाहते थे। जैसी संगति मिली, उसी रूप में ढल गए।
उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया था और भारत में काँग्रेस के अलावा कई तरह के दल सक्रिय हो गए थे। उन दलों की पैठ छात्रों पर भी हो गई थी। रेणु के सम्बन्ध सभी दलों के लडकों से थे। गाँधी का तपस्वी रूप उन्हें बेहद आकर्षक लगता था। जयप्रकाश नारायण और बेनीपुरी के प्रति भी उनके मन में भावात्मक लगाव था, जो जीवनभर बना रहा। लेकिन एक और मनस्वी थे, जिनको देखकर उनको लगा कि सामने ज्ञान की एक ज्योति सी जल रही है- निष्कंप दीपशिखा-सी। वे थे आचार्य नरेन्द्र देव! एक बार बी.पी. कोइराला बनारस आए और उन्हें आचार्य के यहाँ ले गए।
सौम्य, सरल, प्रगल्भ आचार्य नरेन्द्रदेव सभी समाजवादियों के पूज्य थे। उन्होंने काँग्रेस पार्टी में रहते हुए और गाँधी के कार्यक्रमों में भाग लेते हुए एक अलग धारा विकसित की थी, जिसे जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया ने अपनी सक्रिय गतिविधियों से देशव्यापी बना दिया था। वे माक्र्सवाद की व्याख्या भारतीय परिप्रेक्ष्य में करते हुए काफी-कुछ लिख चुके थे। दूसरी विचारधारा के लोग भी उनका आदर करते थे। बनारस के वे एक बेहद सम्मानित व्यक्ति थे। शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका अनुपम योगदान था। काशी विद्यापीठ के निर्माण एवं संचालन में उनकी अहम भूमिका थी। 1934 में स्थापित समाजवादी पार्टी के वे अध्यक्ष थे। उनका मानना था कि इस युग की दो मुख्य प्रेरणाएँ हैं- राष्ट्रीयता और समाजवाद। वे राष्ट्रीय परिस्थितियों और आकाँक्षाओं की दृष्टि से समाजवाद की अवधारणाओं पर जोर देते रहे। उनका जोर भारत के किसानों पर सबसे अधिक था। इसलिए बाद में समाजवादी पार्टी ने देशभर में किसान संगठन खडे किए और लगातार किसानों की बडी-बडी सभाएँ कीं। वे संस्कृत साहित्य के ज्ञाता थे। उन्होंने बौद्धधर्म पर अनुसंधानपरक मौलिक लेखन किया था।
आचार्य बनारस के कमच्छा मुहल्ले में रहते थे। उनके मकान के सामने काफी बडी जगह थी, जो हमेशा गुलजार रहती थी। वहाँ बनारस के प्रायः सभी बुद्धिजीवी जाया करते थे। रेणु आचार्य के व्यक्तित्व के आकर्षण में मानो बंधते चले गए। वहीं बनारस के कई समाजवादी नेताओं को उन्होंने देखा। वहीं एक दिन बैजनाथ सिंह विनोद से उनकी भेंट हुई। वे उनके साथ पैदल चलते हुए बहुत दूर तक आए। विनोद जी साहित्यिक थे और आचार्य जी की लिखी हुई रचनाओं के मुद्रण का भी काम करते थे। बाद में, 1946 ई. में समाजवादियों द्वारा नव संस्कृति संघ की स्थापना की गई तो उसके द्वारा प्रकाशित पत्रिका का संपादक विनोद जी को ही बनाया गया। उस पत्रिका का नाम था- जनवाणी।
रेणु का परिचय दशाश्वमेध घाट पर एक दिन त्रिलोचन से हुआ। त्रिलोचन कुछ लोगों के बीच खडे होकर कविता पर धुआँधार बोले जा रहे थे। रेणु ने जब उनकी वाणी सुनी तो उनके सामने खडे हो गए और अपना नाम बताकर यह भी सूचित किया कि वे भी कवि हैं। त्रिलोचन को तो नए-नए कवियों की तलाश रहती ही थी। वे रेणु के आग्रह पर उनके कमरे में चले आए तथा उनके बिस्तर पर पालथी मारकर बैठ गए। आग्रह करके रेणु की कई कविताएँ सुनीं।
सापेक्ष पत्रिका के त्रिलोचन अंक के पृष्ठ 683 पर महावीर अग्रवाल के प्रश्नों के उत्तर देते हुए त्रिलोचन ने एक जगह बताया है : बच्चन जी और सुमन जी से भेंट 1939 के आसपास हुई। ये दोनों कवि-सम्मेलन पर छा जाया करते थे। फणीश्वरनाथ रेणु से उसी समय परिचय हुआ जब वे बनारस में अध्ययन कर रहे थे। दशाश्वमेध घाट पर पहली बार त्रिलोचन का मिलना रेणु के लिए एक उपलब्धि थी। रेणु ने त्रिलोचन पर लिखते हुए ये पंक्तियाँ इसीलिए लिखी हैं-
दशाश्वमेध घाट पर गंगा की धारा है
तट पर जल के ऊपर ऊँचे (भवन नहीं)
त्रिलोचन खडे हैं....।
रेणु के लिए तीसरी दृष्टि रखने वाले शिवस्वरूप त्रिलोचन दशाश्वमेध घाट पर मिले और निर्बाध गति से कविता लिखने वाले दो कवियों में मित्रता हुई। फिर ये सिलसिला निरंतर चल पडा। प्रायः त्रिलोचन रेणु के कमरे में आ जाया करते। वहीं रेणु के साथ गपशप करते या रचना सुनते-सुनाते देर हो जाती तो भोजन की व्यवस्था भी हो जाती। त्रिलोचन का फक्कडाना स्वभाव शुरू से ही था। वे किसी से मिलते ही सहज भाव से अपनी आत्मीयता स्थापित कर लेते थे।
तब त्रिलोचन सरस्वती प्रेस में काम करते थे। वहीं शमशेर बहादुर सिंह और जगत शंखधर एक कमरे में रहा करते थे। प्रेमचन्द द्वारा स्थापित सरस्वती प्रेम एक बडा प्रकाशन संस्थान था। किताबों के प्रकाशन के अलावा 1930 से हंस का नियमित प्रकाशन हो रहा था। 1937 ई. से कहानी मासिक का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। तब इन दोनों पत्रिकाओं में संपादक के रूप में श्रीपत राय का नाम छपता था, लेकिन वास्तविक रूप से इनका संपादन शमशेर-त्रिलोचन ही करते थे। बाद में शिवदान सिंह चौहान भी इससे आकर जुड गए।
त्रिलोचन प्रायः सरस्वती प्रेस रेणु को भी ले जाते। वहीं इनकी आत्मीयता शमशेर और शिवदान सिंह चौहान से हुई। ये सभी रेणु से वरिष्ठ थे, इसलिए उन्हें प्रोत्साहित करते।
दशाश्वमेध घाट से टहलते हुए रेणु पास ही लकसा स्थित सरस्वती प्रेस पहुँच जाते। कभी-कभार शिवरानी देवी भी वहाँ आतीं। वे सभी युवक साहित्यकारों के लिए स्नेह-वत्सल थीं। मातृस्वरूपा थीं। रेणु जब भी उन्हें देखते श्रद्धा से भरकर चरणस्पर्श करते।
सरस्वती-प्रेस में रहने वाले ये साहित्यकार सरस्वती के साधक थे। देशी-विदेशी साहित्य का गहन अनुसंधान करने वाले। शिवदान सिंह चौहान तब रिपोर्ताज लिखने की शुरुआत कर चुके थे। 1938 ई. के रूपाम में लक्ष्मीपुरा नामक कथा-रिपोर्ताज छपकर चर्चित हो चुका था। वे इस विधा में लगातार लिख रहे थे और कहानी तथा हंस में उनके रिपोर्ताज छप रहे थे। रेणु को यहीं पढने को ये रिपोर्ताज मिले। इससे वे बेहद प्रभावित हुए। उनके स्वभाव के अनुकूल शमशेर थे और कवित्व से भरे हुए त्रिलोचन। उनके रचनाकार को यहाँ संबंल मिल रहा था।
लेकिन उनके जीवन में भटकाव भी कम नहीं था। वे यूँ ही बनारस की गलियों में निरर्थक भी भटका करते। तरह-तरह के विषयांतर में जाते। राजनीतिक बहसों में भी भाग लेते। तरह-तरह के सभा-समारोहों में जाकर दर्शक-दीर्घा में शामिल हो जाते। उनके मित्रों की संख्या बढती ही जा रही थी। बंगालियों से वे बंगला भाषा में बात करते। नेपाली समुदाय के लोगों से नेपाली में। आम लोगों से भोजपुरी में। उनके जीवन में तरह-तरह के भटकाव थे, लेकिन वे सभी अनुभव-सम्पन्न भी बना रहे थे। देखते ही देखते अक्टूबर महीना आ गया। परीक्षा का फॉर्म भरना था। पास में पैसे नहीं थे। बेहद परेशान थे। अपने पिताजी को पत्र लिखा, किन्तु उनका हाथ खाली था। तब उनको रामनारायण सिंह आनन्द की फिर याद आई और उनको ऋणुआ बनकर एक चिट्ठी लिखी-

दशाश्वमेध,
बनारस सिटी

पूज्य गुरुदेव!
सादर प्रणाम।
आपने कहा था कि यदि कभी कोई चीज की जरूरत हो तो माँग लेना।
मैट्रिक की तैयारी कर रहा हूँ। अभी मुझे 15/- रुपये की सख्त जरूरत है।
क्या मैं आशा करूँ कि श्रीमान मेरे इस कठिन समय में सहारा देंगे? बहुत बेचैन हूँ। उम्मीद ही नहीं, पूर्ण विश्वास है मुझे।
यदि हो सका तो यह कर्ज बहुत जल्द अदा कर दूँगा। शायद अब आपको मेरी याद नहीं आती हो, मगर मैं आपको शायद ही भूल पाऊँगा। गुरु छात्र को भूल जाते हैं पर छात्र गुरु को नहीं।
आपका एक प्यारा छात्र
जिसकी याद भी अब आपको नहीं आती
फणीश्वरनाथ मंडल
मेरा पताः
फणीश्वरनाथ मंडल
17/131, दशाश्वमेध,
बनारस सिटी
रेणु का जीवन प्रारम्भ से ही आर्थिक दुश्वारियों से घिरा रहता था। ऐसे में ऋण लेने के सिवा कोई उपाय नहीं होता था। आनन्द जी से वे पहले भी सहायता प्राप्त कर चुके थे। फिर सहायता मिली और उनकी जीवन नैया आगे बढी। वे मैट्रिक की परीक्षा देकर घर लौटे तो मानो घर में खुशियों की बहार आ गई। उनके छोटे भाई-बहनों के प्राणों में वे बसते थे। दादी, माता-पिता, चाचा-चाची एक भरा-पूरा घर उनके बगैर सूना था। सुघड, स्नेहिल पत्नी। सभी प्रफुलित हो उठे। लगा मानो रेणु एक महासमर में विजयी होकर लौटे हों। फिर सिलसिला शुरू हुआ उनके मित्रों के मिलने का। एक दिन वे फारबिसगंज जाकर रामदेनी तिवारी से मिल आए। फारबिसगंज में उनके मित्रों का जमावडा लगा। तरह-तरह के बनारस के किस्से रस ले-लेकर वे सभी को सुनाते। फिर एक दिन कन्हैयालाल वर्मा से मिलने अररिया आर.एस. गए। वर्मा जी क्रांतिकारी नवयुवक दल के नेता थे। उन्हीं की संगति में रहकर वे पूर्णिया जिले की ऋांतिकारी गतिविधियों से परिचित होते रहते थे। उसी समय उनका परिचय नक्षत्र मालाकार से हुआ। नक्षत्र मालाकार के क्रांतिकारी व्यक्तित्व ने रेणु को बेहद सम्मोहित किया। रेणु ने बाद में एक वाक्य में नक्षत्र मालाकार के व्यक्तित्व को रूपायित कर दिया है- नक्षत्र मालाकार का मतलब है जनजीवन की एक जबरदस्त छटपटाहट! एक दूसरी जगह उन्होंने बताया है- नछत्तर जब 1936 में सोशलिस्ट पार्टी में भर्ती होने आया तो जयप्रकाश बाबू ने नाम लिखते हुए कहा- नछत्तर माली क्या, नक्षत्र मालाकार कहो न! इसके पहले 1930 में वह जेल गया था। जेल में उसने काँग्रेस के नेताओं से पूछा कि जब सुराज हो जाएगा तो क्या आप लोग अपनी जमीनें लोगों में बाँट देंगे? तो उन नेताओं ने कहा, नहीं। भला ऐसा कैसे हो सकता है। सभी अँगुलियाँ बराबर थोडे ही होती हैं। उसने कहा कि तो फिर सुराज काहे का ?
जब कन्हैयालाल वर्मा के घर नक्षत्र मालाकार से रेणु की पहली भेंट हुई, तब विस्तार से उन्होंने अपने बारे में बताया था। यहीं से इनसे मित्रता की शुरुआत हुई।
रेणु को अपने घर-परिवार, गुरुजनों, मित्रों के प्रति बेहद लगाव था। बचपन में मित्र के बदले में मास्टर साहब से भरपूर पिटाई भी सहन कर चुके थे। अब बनारस के प्रति उनका आकर्षण कम नहीं था। उनकी पत्नी आगे पढने को, कुछ बनने को प्रेरित करती रहती। अपने जिले के ऋांतिकारी युवकों का संग-साथ देखकर उनके पिता को मन में आशंका घेर लेती कि कहीं रेणु बर्बर अंग्रेजी शासन की नजरों में न चढ जाए। वे भी फिर बनारस जाने और आगे पढने की बात बार-बार करते। एक दिन वे विराटनगर गए और सानो आमाँ से आशीर्वाद लेकर लौट गए। फिर बनारस रवाना हो गए।
मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने बी.एच.यू. के आट्र्स कॉलेज में आई.ए. में प्रवेश लिया। नियमित कक्षाओं में उपस्थित होते। फिर बी.एच.यू. से अपने मित्रों के साथ पाँव-पैदल दशाश्वमेध घाट के अपने कमरे में पहुँचते। वे समाजवादी छात्र-संगठन में थे। कम्युनिस्टों का स्टूडेंट फेडरेशन अलग था और सोशलिस्ट पार्टी का भी अलग। 1940 ई. में एम.एन. राय और सुभाष चन्द्र बोस ने फारवर्ड ब्लॉक पार्टी बना ली थी और उसका स्थापना समारोह काँग्रेस पार्टी के समारोह के समानान्तर हजारीबाग जिले के रामगढ के विस्तृत मैदान में किया था। देखते ही देखते फारवर्ड ब्लॉक का भी स्टुडेंट फेडरेशन बन गया। रेणु अपने सरल स्वभाव के कारण सभी ग्रुप के लडकों से मिलते और देखते ही देखते सबसे घुल-मिल जाते। सबके साथ रहते हुए भी उनका मन इस राजनीतिक उठापटक में नहीं लगता। उनका रचनाकार मन इससे निकलने को बेचैन रहता। इन छात्रों के साथ रहते हुए वे भी राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेते। धीरे-धीरे उनका मन भी राजनीतिक बातों की ओर खिंचता जा रहा था और उनके लेखन में भी उसका प्रभाव आता जा रहा था। अपने जीवन के प्रसंग वे अपने मिलने वालों को प्रायः बताया करते थे। इन अनुभवों को साझा करने वालों में शैलेन्द्रनाथ श्रीवास्तव भी थे। उन्होंने रेणु पर लिखा है -
उन दिनों काशी हिन्दू विश्वविद्यालय युवा समाजवादियों का अच्छा अखाडा था और रेणु भी उनके प्रभाव से अछूते न रह सके। कॉलेज जीवन में रेणु ने काजी नजरूल इस्लाम की बंगला कविताओं के अनुवाद भी किए थे और उन दिनों की एक जोश-खरोश से भरी एक कविता अवाम को सुनकर साम्यवादी नेता रुस्तम सेटिन ने कहा था-आगे चलकर यह लडका बडा तेज निकलेगा। रेणु के सक्रिय राजनीतिक जीवन का प्रारम्भ 1939 ई. लगभग बनारस में ही हुआ।
शैलेन्द्रनाथ श्रीवास्तव आगे लिखते हैं- रेणु ने एक बार मुझे बताया था कि छात्र-जीवन में लीडरी का ऐसा शौक जगा की साहित्य-लेखन की रुचि भी कुछ दिनों के लिए मर गई। कोई रचना की बात करता तो समय नहीं है कहकर अहम् को तृप्त करता। क्लास में प्रॉक्सी करवाकर भाषण देता फिरता। किसी दल-विशेष से सम्बन्ध तो नहीं हुआ, पर अनेक सभाओं, समितियों और संगठनों से सम्बद्ध रहे। उन्नीस सौ इकतालीस में इन्होंने गाँधी जी द्वारा चलाए गए व्यक्तिगत सत्याग्रह में भी भाग लिया।
इन बातों से कुछ सूचनाएँ मिलती हैं, जो सही हैं। रेणु किसी दल में नहीं होकर भी सभी दलों से सम्बद्ध थे। उस समय बनारस में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के युवा नेता रुस्तम सेटिन अपनी पार्टी की जडें मजबूत करने के लिए बी.एच.यू. प्रायः जाते रहते थे। रेणु को अपने साथ लेकर प्रायः घूमते-फिरते। रेणु की कविताएँ अपनी सभाओं में सुनवाते। वे खूब जमतीं। देखते ही देखते कम्युनिस्ट पार्टी के दल में वे सबसे चहेते हो गए। इस दल में एक खूबसूरत लडकी थी, जो रेणु को अपने साथ-साथ लिए फिरती थी। इन्हीं लोगों के साथ रहकर उनको सिगरेट पीने की आदत लगी। उसी समय उन्होंने बनारस के तीनों वामपंथी संगठनों से अपनी संलिप्तता के कारण हुई परेशानियों को लेकर एक कहानी लिखी थी, जिसमें उस लडकी का नाम रोस्सा कर दिया है। यह प्रसंग बेहद रोचक है और रेणु का उस समय के रचनात्मक कौशल का एक बेहतरीन उदाहरण भी है। इस प्रसंग में उन्होंने जयप्रकाश नारायण का नाम राम प्रकाश कर दिया है। जयप्रकाश रेणु के हृदय में विराजमान थे, आदरणीय थे, परम पूज्य थे, किन्तु रोस्सा के चक्कर में उनके मुर्दाबाद का नारा भी उन्हें लगाना पडा था। यह रेणु के जीवन का एक यथार्थ प्रसंग था, जिसने उन्हें एक अलग तरह के अनुभव से सम्पन्न किया था। आत्मकथात्मक शैली में लिखी इस कहानी में रेणु ने अपना नाम पी. राय रखा है अर्थात् फणीश्वरनाथ राय। वे अपने नाम के साथ मंडल की जगह राय लिखना ज्यादा पसंद करते थे। इसीलिए अपने सभी बच्चों के नाम में मंडल की जगह राय लगाया। धानुक समाज में ज्यादातर लोग मंडल, विश्वास और राय लिखते हैं। रेणु ने अपनी पी. राय कहानी में लिखा है और पी के लिए प्रफल्ल शब्द का प्रयोग किया है। रेणु लिखते हैं: फर्स्ट इयर तो देखते-सुनते बीत गया। सेकेण्ड इयर में पहुँचकर मैंने चोला बदलने की सोची। विशेष कुछ परिवर्तन नहीं, सिर्फ धोती छोडकर पाजामे में आ गया और डेढ इंच गले की पट्टीवाला लम्बा कुर्ता बनवा लिया। एक शुभ दिन को वेश बदलकर सिनेमा हाउस की यात्रा मैंने की। ताँगे पर बैठे हुए मेरे सहयात्री सज्जन ने मेरा नाम, इयर, कम्बीनेशन, होस्टल और रूम नम्बर पूछने के बाद जब पूछा कि आप किस पार्टी को ‘बिलोंग’ करते हैं! तो मैं घबरा गया।
सी.पी. (कम्युनिस्ट पार्टी)?. उन्होंने मुस्कुराकर पूछा।
जी हाँ! मैंने पाँच मिनट का मामला समझकर कह दिया।
आई सी! कहकर हँसते हुए उन्होंने बेरहमी से एक धौल जमा दिया। मैं चौंक पडा।
वी आर कामरेड्स, डरो मत। वे, मेरे कन्धे पर हाथ रखकर प्यार-भरे शब्दों में बोले।
उस दिन कश्मीर-केबिन का बिल तो उन्होंने चुकाया ही, सिनेमा के फर्स्ट-क्लास का टिकट भी खरीद दिया।
रेणु ने यहाँ जिस कम्युनिस्ट नेता का चित्रण किया है, वे रुस्तम सेटिन ही थे। रेणु बहुत दिनों तक उनके आज्ञाकारी बने रहे। उनके निर्देश पर चलते रहे। लेकिन उनका सम्बन्ध सोशलिस्ट पार्टी के लोगों से भी था। इस कहानी के इस प्रसंग को देखें :
दूसरे दिन ज्यों ही क्लास में पहुँचा, मेरे अंतरंग मित्र विनोद ने आकर मुस्कुराते हुए कहा- वाह! पक्के सोशलिस्ट मालूम पडते हो?
मैंने कहा- जो भी कह डालो ?
विनोद ने कहा- जो भी कह डालो नहीं, होना होगा।
मेम्बर! और क्या ? .... मैं तो समझता था तुम किसी पार्टी-पालटिक्स में दिलचस्पी नहीं रखते। लेकिन देखता हूँ तुम कोरे नहीं हो। वह मुस्कुराने लगा।
मैं आज भी नहीं समझ पाया हूँ कि विनोद ने मुझसे किन गुणों को देखकर पार्टी से दिलचस्पी रखने वाला पक्का व्यक्ति समझा। जो भी हो, जिस दिन मेरा नाम स्टूडेंट फेडरेशन (कम्युनिस्ट गु*प) के रजिस्टर में दर्ज हुआ उसी दिन मेरे पास यह सूचना भी आ गई कि मैं स्टूडेंट फेडरेशन (सोशलिस्ट ग्रुप) की वर्किंग कमिटी में ले लिया गया हूँ।
सिर्फ दो पार्टियों की बात रहती तो कोई बात नहीं थी, एक दिन तीसरी पार्टी के चक्कर में पड गया।
रेणु के किस्सागोई का यह एक परिपक्व रूप था, जिसमें उनका उस समय का जीवनानुभव भी प्रकट हो रहा था। तीसरी वामपंथी पार्टी फारवर्ड ब्लॉक थी। यह बनारस में रह रहे बंगाली लोगों की अपनी पार्टी थी। बनारस के गोदोलिया चौक के पास एक कलकत्ता कैफे था, जिसमें बंगाली युवकों का अड्डा जमा रहता था। रेणु प्रायः वहाँ चाय पीने जाते थे। एक दिन एक बंगाली बन्धु उनके बगल में बैठकर चाय पी रहे थे। उनके हाथ में एक बंगला की पत्रिका थी। उन्होंने रेणु से पूछा- आपनी बांगाली? बिहारी कहने पर वह व्यक्ति छातूखोर न कह दे, इस डर से रेणु ने उत्तर दिया- आग्ये हाँ! फिर बंगाली मोशाय ने कहा- ओ! आगे तरह-तरह के प्रश्न- एखाने पोडेन ? अर्थात् क्या पढ रहे हो? रेणु ने सब कुछ सच-सच बताया। फिर उस आदमी ने भालो-भालो कहकर शाबासी दी और कैफे में बैठे नौजवानों को सम्बोधित करते हुए कहा- हाबू, भोला, कालू, नीलू, फेला! तोमरा से दिन बलले जे सेकेण्ड इयर आट्र्स से कोनो मेम्बर नाय। एइजे इनी....।
ताइना की, ताइना की ? अर्थात् तब क्या बात है ? कहते हुए सब-के-सब बंगाली युवक अपनी बहस को छोडकर रेणु को घेरकर बैठ गए। फिर चाय का आर्डर हुआ, बातें हुई, मिलने, मिलाने के वायदे हुए। ऑर्गेनाइजेशन करने पर जोर दिया गया। रेणु तब तक उनकी पार्टी का नाम भी नहीं जानते थे। बस उनकी बातों को सुनकर सहमति में सिर हिला रहे थे। क्यालक्याटा क्याफे नामक उस दुकान के मैनेजर के पास जाकर उनमें से एक युवक ने कहा- आज थेके कनसेशन। बुझलेन! पार्टीर काफे तो! एरा जानतो ना जे आपनी ब्लॉकेर मेम्बर!
उस दिन के बाद फारवर्ड ब्लॉक के वे मेम्बर हो गए और इस नाते उस कैफे में कनसेशन रेट पर चाय और कटलेट पाने लगे।
रेणु तब न किसी पार्टी के बारे में ठीक से जानते थे और न उनकी इसमें गहरी अभिरुचि ही थी। लेकिन जो भी मिलता उससे वे सहज ही आत्मीयता स्थापित कर लेते थे। इन तीनों छात्र-संगठनों का उन्हें सदस्य बना लिया गया था। वे अपने कमरे में लिखते-पढते रहते थे। त्रिलोचन कभी-कभार सरस्वती-प्रेस जाने के पहले उनके पास आते और उनके साथ बातचीत करते हुए वे वहाँ चले जाते। वहाँ शमशेर तथा शिवदान सिंह चौहान के पास बैठकर देश-दुनिया के साहित्य पर उनकी बातें गौर से सुनते। वे हंस और कहानी पत्रिका का हर अंक मुफ्त में पढने को पा जाते। सरस्वती-प्रेस से छपी प्रेमचन्द की सभी किताबें भी जगत शंखधर ने उन्हें दे दी थीं। दूसरी तरफ रुस्तम सेटिन उन्हें पक्का कम्युनिस्ट बनाने के लिए प्रायः उनके पास आते रहते और उनके दिमाग में माक्र्सवाद के सूत्र तथा सिद्धांत भरते रहते। लेकिन उनके हृदय के आसन पर तो गाँधी और जयप्रकाश नारायण श्रद्धा के रूप में आसीन थे।
एक दिन अपने कमरे में रेणु गोदान को दोबारा पढ रहे थे। महान् कृतियाँ बार-बार पढी जाती हैं- इस उक्ति पर वे अमल करते थे। गोदान उनका प्रिय उपन्यास था। कमरे का दरवाजा खुला था। अचानक रुस्तम सेटिन उनके कमरे में आए और कहा- तुम हमारी पार्टी के वर्किंग कमिटी के मेम्बर हो और आराम से किताब पढ रहे हो ? तुम्हें मालूम है सोशलिस्ट पार्टी के जयप्रकाश नारायण आ रहे हैं? इसके खिलाफ कुछ करना होगा। आज कमिटी की अर्जेंट मीटिंग है चार बजे। वहीं यह तय होगा कि क्या करना है।
जाते-जाते उन्होंने रेणु से पूछा- ये कौन-सी किताब पढ रहे हो? अच्छा गोदान ? सिली।
रेणु को बेहद आश्चर्य हुआ कि हिन्दी के एक महान उपन्यास को वे हिकारत की नजर से देख रहे हैं। उन्होंने पूछा- क्यों ?
इट्स ए रिएक्शनरी बुक! ...... अच्छा, चार बजे आते हो तो ? कहकर वे चले गए। रेणु के लिए यह एक नया शब्द था- रिएक्शनरी। वे डिक्सनरी में रिएक्शनरी शब्द का अर्थ ढूँढने लग गए। अर्थ देखकर भी उन्हें कुछ समझ नहीं आया।
साढे तीन बजे वे कपडे पहनकर यानी सज-धजकर मकान से बाहर निकले। मकान के फाटक पर एक आधुनिक प्रियदर्शिनी माली से रेणु के बारे में पूछताछ कर रही थी। उसे देखकर रेणु ने अपनी पोशाक पर एक नजर डाल ली कि सब-कुछ ठीक तो है। माली ने इशारा किया कि वही रेणु है। वह सुन्दरी मुस्कुराती हुई रेणु के पास आई और लाल सलाम कामरेड कहकर क्रांतिकारी अभिवादन किया, फिर एक लिफाफा दिया, जिसके ऊपर अरजेण्ट लेटर लिखा हुआ था। रेणु ने पत्र निकाल कर पढा- सोशलिस्ट लीडर जयप्रकाश आ रहे हैं। अपनी पार्टी ने चार स्टेशन पहले से ही उन्हें काला झण्डा दिखाने का प्रस्ताव पास किया है। तुम मिस रोस्सा के साथ अभी वहाँ के लिए प्रस्थान करो और पंजाब मेल के आते ही जयप्रकाश मुर्दाबाद आदि नारे लगाते हुए काला झंडा दिखाना है।
रेणु को पत्र पढकर अच्छा नहीं लगा। इस कार्य को करने से इन्कार करने के लिए जैसे ही उस लडकी की ओर मुखातिब हुए कि उनके होश उड गए। उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी कि सामने खडी पूर्ण यौवना और अपूर्व सुन्दरी रोस्सा उनकी ओर मदमाती आँखों से घूर रही थी। उनका रोम-रोम पुलकित हो गया। रसलीन का यह दोहा यहाँ साक्षात् प्रकट हो रहा था-
अमिय हलाहल मद भरे स्वेत स्याम रतनार-
जीयत मरत झुकि-झुकि पडत जेहि चितवत एक बार।।
रेणु की तब वही हालत हो रही थी। साँसों और धडकन की गति बढ गई थी। रेणु ने लिखा है- मैंने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी कि मिस रोस्सा जैसी सुन्दरी, मेरी ओर कभी उस मोहक दृष्टि से देखेगी। नेपोलियन एक आलादिमाग का आदमी था, मानना पडा।
यहाँ रेणु को नेपोलियन के दिमाग की प्रशंसा करते हुए अटपटा लग सकता है। नेपोलियन ने फ्रांस की सत्ता पर अधिकार प्राप्त करने के बाद कई नियम-कानून बनाए। उसने पेरिस में विश्वविद्यालय बनवाया, लेकिन स्त्री-शिक्षा पर कोई काम नहीं किया। उसने स्त्री-शिक्षा का दायित्व पादरियों को सौंप रखा था। उसे मालूम था कि आधुनिक शिक्षा में दीक्षित होकर नारियाँ पुरुषों को दिग्भ्रमित कर सकती हैं। वह अपने निजी जीवन में प्रेम के वशीभूत होकर कमजोर हो चुका था। रेणु ने जब मिस रोस्सा को देखा तो वही काम करने निकल पडे, जिसके बारे में कभी सोचा भी नहीं था। आगे उन्होंने लिखा है-
मैंने फिर एक बार आँखें उठाईं। वह मुस्कुराती हुई, मिश्री से भी मधुर स्वर में बोली- चल रहे हैं न?
चलिए! रेणु ने मस्ती में झूमते हुए कहा।
ताँगे पर बैठकर वे स्टेशन की ओर चल पडे। कुछ क्षणों के लिए उन्हें होश हुआ- यह मैं क्या करने जा रहा हूँ। जिनके लिए मेरे हृदय में अगाध श्रद्धा है, उन्हीं का अपमान....? वह भी बेमतलब का। नहीं, नहीं, यह मुझसे नहीं होने का। रेणु मन ही मन सोच रहे थे। उनके मन में अंतर्द्वन्द्व चल रहा था। वे कम्युनिस्टों की प्रतिरोध की राजनीति की व्यर्थता को महसूस कर रहे थे। यह नकली क्रांतिकारिता कितनी हवाई थी और बिना मतलब की थी, वे बहुत गहराई से महसूस कर रहे थे। लेकिन अपने विचारों पर कोई सदृढ कैसे रह सकता है, जब बगल में सटकर एक रूप-यौवन से मदमाती युवती बैठी हो। अचानक उन्हें चाँद पत्रिका में पढी हुई रामविलास शर्मा की कविता की पंक्तियाँ याद आ गईं-
यौवन मदमाती रूप-राशि
ओ खोल द्वार, बस एक बार!
लेकिन मिस रोस्सा तो द्वार खोलकर सम्मान सहित अपने बगल में बिठा चुकी थी। रेणु के पूरे शरीर में सनसनी दौड रही थी। तभी अचानक रोस्सा ने पूछा- आप सिगरेट नहीं पीते?
तब रेणु सिगरेट नहीं पीते थे। कभी-कभार दोस्तों की संगति में सिगरेट पी थी। इसलिए रोस्सा के प्रश्न पर वे चुप ही रहे। वे सोच रहे थे कि इस प्रश्न का क्या उत्तर दें? फिर रोस्सा ने वही प्रश्न दुहराया- आप सिगरेट नहीं पीते ?
रेणु ने चौंककर उत्तर दिया- जी ? ..... जी नहीं!
रोस्सा ने रेणु की आँखों में आँखें डालकर पूछा- क्या सोच रहे हो कामरेड ?
रेणु ने उन आँखों में डूबने की जगह नजरें झुका लीं और कहा, मैं सोच रहा था कि.... जी मैं कुछ नहीं सोच रहा था।
रोस्सा ने एक अभिनेत्री जैसी मुद्रा में कहा, जाइए, मैं विश्वास नहीं करती। आप सोच तो कुछ जरूर रहे थे। मुझसे मन की बात क्यों छुपाते हैं ? खैर, आप जो भी सोच रहे हों। ..... क्या आप सिगरेट.... एकदम नहीं पीते ?

रेणु ने कहा, जी .... एकदम माने ..... एकदम नहीं। पीने का आदी यानी हैविच्युएटेड नहीं हूँ।
तब उसने अनुनय भरे स्वर में कहा- तो पीजिए न!
ताँगेवाले ने उतरकर एक दुकान से सिगरेट का टीन ला दिया। रोस्सा ने टीन काटकर अदा से रेणु की ओर एक सिगरेट बढाया और उनके होठों में लगा दिया, फिर माचिस की तीली जलाकर सिगरेट सुलगा दी। तब रेणु ने पूछा- और आप ? उसने सिनेमा की अभिनेत्री की तरह अपनी गरदन नकार में हिलाई। रेणु आश्चर्यचकित उसे देखते रह गए। फिर उसने अपने जीवन-दर्शन को अपनी तरह से समझाया- आफ आश्चर्य को मैं समझ रही हूँ। बात यह है कि कई चीजों के सम्बन्ध में मेरी अपनी राय है। रेणु ने तब उत्सुकता जाहिर की- जैसे? और सिगरेट का एक कश लगाकर रोस्सा के दूसरी ओर उगला।
तब उसने उलाहना दिया- धुआँ उधर क्यों फेंक रहे हैं ? मेरी ओर फेंकिए!
बच्चों की तरह वह मचल रही थी। रेणु को फिर आश्चर्य हुआ।
तब उसने अपना दर्शन विस्तार से समझाया- मैंने अभी कहा न, कुछ चीजों के सम्बन्ध में मैं अपनी खास राय रखती हूँ। सिगरेट को ही लीजिए न। मैं तो बिना सिगरेट के धुएँ की सुगन्ध के, पुरुषों के साथ की आशा भी नहीं कर सकती। सिगरेट पुरुषों के पीने की चीज है और उसकी सुगन्ध स्त्रियों के उपभोग की चीज है। यह उसका जीवन-दर्शन था। और अद्भुत था। वे सिगरेट और उसके धुएँ की इस फिलॉसफी को सुनकर सोच में पड गए। फिर वह बोली- और दूसरी राय मैं नहीं बताती। मैं रूठ गई, मनाओ साजन की मुद्रा उसने बनाई। बतलाइए न! रेणु ने मनुहार करते हुए पूछा। तब उसने पूछा- पहले आप बताइए कि आप उस समय क्या सोच रहे थे? लेकिन रेणु ना-नुकुर करके उसकी बातों को टालते रहे।
उसने कहा- इधर-उधर क्या झाँक रहे हैं। आप बात को छिपाना तो खूब जानते हैं। बडे आए हैं दुनिया की ओर इशारा करके मेरी परीक्षा लेने। सुनिए मेरी दूसरी राय पुरुषों की दाढी के सम्बन्ध में है। मैं डेली शेव के पक्ष में नहीं। एक दिन के बाद एक दिन की बनी हुई दाढी पसंद करती हूँ।
रेणु तो सिगरेट-धुआँ फिलॉसफी के फैन हो चुके थे, इसलिए इस दाढी-फिलॉसफी ने उन्हें कम छुआ। लेकिन उस लडकी की तारीफ करनी थी। उनके मुँह से निकला- ओ माई गॉड.... फिर गॉड शब्द के बाद होठों को बन्द कर लिया। उन्हें तुरंत याद आया कि इस कम्युनिस्ट लडकी के सामने भगवान का नाम लेना ठीक नहीं। रोस्सा उन्हें घुर रही थी। इसलिए गॉड कहने के अल्प-विराम के बाद उनके मुँह से निकला-रेज। उसने पूछा- माई गॉडरेज का मतलब ?
रेणु ने अपनी हाजिर-जवाबी का परिचय देते हुए कहा, गॉडरेज! नम्बर एक ट्रेड मार्क और स्वदेशी! ‘गॉडरेज शेविंग स्टिक!
उसने आश्वस्त होते हुए कहा, ओ! दाढी बनाने की बात सुनकर आपको शेविंग-स्टीक की बात याद आ गई! क्या आप गॉडरेज यूज करते हैं ?
जी! कहकर रेणु ने इस प्रसंग को समाप्त किया, तभी ताँगा भी स्टेशन पर पहुँच गया। ताँगे वाले ने कहा- हुजूर, गाडी प्लेटफारम पर लग गई है।
ट्रेन में बैठकर उसने अपने हैंडबैग से निकालकर सिगरेट और माचीस रेणु को देते हुए संकेत किया। रेणु ने एक सिगरेट जलाकर पहले कश का धुआँ खिडकी से बाहर फेंका। फिर उनको अपनी गलती का एहसास हुआ और तीन-चार लम्बे कश लगाकर सटकर बैठी रोस्सा की बडी-बडी आँखों में पूरा धुआँ उडेल दिया। उसकी आँखें धुएँ के मीठे अत्याचार को सहती हुई झिंप गई, पर उसकी नुकीली नाक पुलकित होकर सिगरेट-सौरभ का उपभोग करती रही।
इंगित स्टेशन पर वे उतर गए। दूसरे दिन सुबह उस प्लेटफार्म पर दो दर्जन कम्युनिस्ट पार्टी मेम्बर खडे थे। सबके हाथ में काले झंडे थे। वे सभी प्रायः किशोर-किशोरियों के साथ रेणु भी नारा लगा रहे थे- जयप्रकाश मुर्दाबाद! जयप्रकाश, काँग्रेस का पुछल्ला!- रोस्सा नारा लगा रही थी। रेणु ने भी उसको खुश करने के लिए नारा लगा दिया- जयप्रकाश काँग्रेस की दुम! रेणु रोस्सा के मोहपाश में इतने बंध चुके थे कि उसके इशारे पर कुछ भी कर सकते थे। उन्होंने लिखा है : रोस्सा के इशारे पर तो मैं किसी की गर्दन मरोड सकता था। एक-से-एक वजनी नारे लग रहे थे कि एक कम्पार्टमेंट का दरवाजा खुला। भव्य ललाट और प्रभावोत्पादक व्यक्तित्व लिए एक व्यक्ति दरवाजे के पास आकर खडा हो गया तथा मन्द-मन्द मुस्काने लगा। उस मुस्कान को पवित्र मुस्कान कह सकते हैं।
वे जयप्रकाश नारायण थे।
उनके खिलाफ नारे लगते रहे और रोस्सा के प्रभाव में आकर रेणु भी नारे लगाने में साथ दे रहे थे। उनकी अंतरात्मा उन्हें रोक रही थी, किन्तु उसकी आवाज को वे अनसुनी कर रहे थे। जब गाडी चली गई तब रेणु ने कहा- लेकिन विरोध में नारे लगाने और काले झंडे दिखाने के बाद भी उनके चेहरे पर जरा भी शिकन नहीं थी। तब रोस्सा ने रेणु की बात का प्रतिवाद किया, अरे गाँधी का चेला है न! सब पोपबाजी गाँधी से इन लोगों ने सीखी है। जूते खाकर मुस्कुराना। हिस्स! रंगे सियार! बडे चले हैं समाजवादी बनने! क्रांति करेंगे? ढोंगी।
इस प्रकरण के बाद रेणु जब बनारस के अपने डेरे में पहुँचे तो आशंका से भरे थे। वे मन ही मन रुस्तम सेटिन और उनके दल से सम्बन्ध-विच्छेद करने की सोच रहे थे। वे कम्युनिस्ट पार्टी की आयोजित सभा में नहीं गए। लेकिन रुस्तम जब उनके कमरे में आए तो उनकी अनुपस्थिति के लिए उलाहना भर दिया और सभा की सफलता की बातें करते रहे। रेणु उनकी बातों को चुपचाप सुनते रहे। एक महीने तक इसी तरह चलता रहा। कभी वे सोचते, मैं बनारस पढाई करने आया था, लेकिन कितनी फालतू बातों में उलझ रहा हूँ। इससे अच्छा तो यह होगा कि घर चला जाऊँ और अपने पिता को सहयोग करूँ। लेकिन उनके वश में कुछ थोडे ही था। उनकी हालत ठीक वैसे ही थी, जैसा कि गालिब का शेर है-
चलता हूँ थोडी दूर तक हर तेज रौ के साथ
पहचानता नहीं हूँ अभी रहबर को मैं।
हर तीव्रगामी रफ्तार के साथ वे चलते थे, लेकिन कुछ ही दूर तक, सही राह दिखाने वाला कौन है, इसकी पहचान नहीं है। कम्युनिस्ट पार्टी का यह व्यर्थ का किसी व्यक्ति पर कीचड फेंकना, प्रतिरोध करना उन्हें नागवार लग रहा था। लेकिन हर तेज बहाव के साथ वे बहते जा रहे थे। और तरह-तरह की उलझनों में फँसते जा रहे थे।
उधर गोदौलिया चौक पर स्थित कलकत्ता कैफे में उनका कनसेशन रेट पर चाय पीने जाना जारी था। रेणु ने लिखा है- कलकटा काफे के कनसेशन और क्रेडिट के आगे सभी पार्टियों को कुर्बान करने जाता, तो मिस रोस्सा की रसभरी आँखें राह रोककर खडी हो जाती। एक दिन ब्लॉक के एक मेम्बर ने मुझे एकान्त में ले जाकर एक बंगला हैंडबिल दिया और उसका हिन्दी अनुवाद करने का भार सौंप दिया। मैंने उसका अनुवाद कर दिया।
फारवर्ड ब्लॉक के उस हैंडबिल की छपाई चौक पर स्थित एक छापेखाने में हो गई। चौक बनारस का एक व्यावसायिक केन्द्र है। रेणु को चौक में उस हैंडबिल के दो गट्ठर सौंप दिए गए और उसे बँटवाने का आदेश भी दिया गया। यह भी कहा गया कि बँटवाने वाले न मिलें तो स्वयं बाँटना पडेगा। यह पार्टी का आदेश था। रेणु सोच रहे थे कि एक जमाना था जबकि माता-पिता के आदेश को विशेष महत्त्व दिया जाता था। माता-पिता के आदेश पर लोग जंगल की खाक तक छानते थे। पर इस वैज्ञानिक युग में पार्टी के आदेश को ही विशेष महत्त्व दिया गया है। माता-पिता की आज्ञा का उल्लंघन करना तो क्रांतिकारियों का धर्म ही है। सो इन परचों में गर्मागर्म बातें हों या एटम बम हों, बाँटना या बँटवाना पडेगा ही।
वे ताँगे से आगे बढे तो वही मीठी आवाज सुनाई पडी- कामरेड! मिस रोस्सा दूसरे ताँगे पर बैठी थी। अपने ताँगे से उतर कर वह रेणु के बगल में बैठ गई। लग रहा था कि रेणु की तलाश में वह किसी जंगल में भटक रही हो और अचानक भेंट हो गई।
एक सी.आई.डी. इन्सपेक्टर थे जो काफी दिनों से रेणु पर निगरानी रख रहे थे। उन्हें लगता था कि सरकार विरोधी गतिविधियों में वह शामिल है। उसने अचानक ताँगा रोका और उन्हें कोतवाली ले गए। अब बाजाप्ता तलाशी ली जाने लगी। मिस रोस्सा के हैंड बैग में कई लोगों के लिखे प्रेम-पत्र थे। उनमें इत्र छिडका हुआ था। भीनी-भीनी खुशबू उनसे आ रही थी। सी.आई.डी. इन्सपेक्टर उन पत्रों को खोलकर पढ रहा था। रेणु ने चुफ से एक पत्र को देखा। मेरी रानी सम्बोधन देखते ही उनका दिल धडक रहा था और आँखों के सामने अन्धेरा छा रहा था। तो रोस्सा के कितने ही चाहने वाले हैं!
जब रेणु की गठरी खोली गई तो उसमें जो परचे थे, ब्रिटिश राज के विरोध में, धधकती भाषा में, जिनमें काफी कुछ लिखा हुआ था। उस इन्सपेक्टर की बाँछें खिल गईं- हियर यू आर! रोस्सा ने जब देखा कि यह तो कम्युनिस्ट पार्टी का मेम्बर होकर फारवर्ड ब्लॉक का परचा लिए है, तो गुस्से से उसके होठों से एक ही शब्द निकला- मेन्सेविक।
वे दोनों स्थानीय जेल में पहुँचा दिए गए। लेडिज वार्ड की ओर जाते हुए क्रांतिकारी रोस्सा फूट-फूटकर रो रही थी। अब रेणु का रोस्सा के प्रति जो नशा था, वह भी उतर चुका था। मजेदार बात यह हुई कि तीनों दलों ने समाचार पत्रों में इस गिरफ्तारी की खबर छपवाई। तीनों उन्हें अपनी पार्टी का सदस्य समझ रहे थे। जेल से छुटने के बाद रेणु ने बनारस के अपने इन प्रसंगों को अपनी डायरी में लिखा। एक दिन जब त्रिलोचन उनके पास आए और इन प्रसंगों को पढकर राय दी कि इन्हें एक कहानी का रूप दीजिए। रेणु त्रिलोचन के रचनात्मक सुझावों को बेहद गम्भीरता से लेते थे। उन्होंने तय किया कि अपने जीवन के इन प्रसंगों को भविष्य में एक कहानी का रूप देंगे और बाद में उन्होंने पार्टी का भूत नामक कहानी लिखी।
अब रेणु को घर की याद आ रही थी। बनारस में जेल से बाहर आने के बाद उनसे तरह-तरह के सवाल पूछे जाते- क्यों जेल गए ? क्या हुआ था? तब उन्होंने दो पंक्तियाँ लिखीं, जिसे कहानी बनाते समय सबसे पहले रखा-
यारों की शक्ल से अजी डरता हूँ इसलिए
किस पार्टी में आप हैं यह पूछ न बैठें!
उन्होंने अपने पिताजी को चिट्ठी लिखी कि कुछ दिनों के लिए गाँव आ रहा हूँ। जिस दिन शाम को रेणु को घर आना था, उसी दिन सुबह शिलानाथ मंडल अररिया कोर्ट गए थे। वहीं उन्होंने देखा कि एक युवक लच्छेदार भाषा में भाषण दे रहा है और अपनी छपाई हुई पुस्तिका बेच रहा है, तो उन्हें लगा कि रेणु की उम्र का यह लडका उनके बेटे का आत्मीय हो जाय तो अच्छा रहेगा। वे थे तारिणी प्रसाद निर्झर। शिलानाथ मंडल ने वहीं उनको नाश्ता करवाया और अपने घर ले गए। वे बाहर एक खटिया पर लेटे हुए थे। उन्हें नींद आ गई थी। तभी चार बजे रेणु आए और उनके परिवार के सभी लोग उनसे मिलकर खुशी से चहकने लगे। रेणु के दोनों छोटे भाइयों- हरि और महेन्द्र के तो बडे भाई में मानो प्राण बसते थे। तारिणी प्रसाद निर्झर से जब रेणु की बातें होने लगी तो फिर रेणु ने अपनी डायरी से रोस्सा वाला प्रसंग सुनाया, जो निर्झर जी को बहुत पसंद आया। इसका उन्होंने रेणु पर लिखे अपने संस्मरण में भी उल्लेख किया है।
घर से फिर वापस बनारस आने पर रेणु सभी दलों से बचकर रहते। प्रायः अकेले भटकते रहते। उनके जीवन में भटकाव ही भटकाव था। कहीं नहीं ठहराव था। मन में अतृप्ति बनी रहती थी। रूप-सौंदर्य के प्रति उनका झुकाव समाप्त ही नहीं होता था। लेकिन अब वे दूरी बनाकर ही रहते थे।