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छत्तीसगढी लोकगीतों में गाँधी

भुवाल सिंह ठाकुर
राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन का रूप अखिल भारतीय था। यह गाँधी के लोकनायक चरित्र का प्रभाव था। देश के विभिन्न भागों के यात्रा के क्रम में गाँधी का छत्तीसगढ क्षेत्र में दो बार आगमन हुआ। प्रथम बार 1920 ई. में कंडेल नहर सत्याग्रह एवं तिलक स्वराज कोष के सम्बन्ध में। द्वितीय बार 1933 ई.में द्वितीय सविनय अवज्ञा आंदोलन के अंतर्गत हरिजनोद्धार एवं रचनात्मक कार्यक्रम के देशव्यापी प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से। गाँधी जी के आगमन के प्रभाव और उनके रचनात्मक कार्यक्रम के विविध आयामों को छत्तीसगढी लोकगीतों में भी अभिव्यक्ति मिली। जो बातें मुख्य इतिहास में छूट जाती हैं वे लोकवाणी के उज्ज्वल रूप लोकगीतों में सच्चे और खरे अर्थों में व्यक्त होती हैं। छत्तीसगढ के लोकजीवन में गाँधी के प्रभाव के विषय में अद्वैतगिरी जी कहते हैं- गाँधी का प्रभाव छत्तीसगढ की ग्रामीण स्त्रियों पर इतना अधिक हो गया था कि एक गाँव की सभी स्त्रियाँ लोटे में पानी और फूल लेकर उनका कलश सिर पर रखकर दूसरे निकटस्थ गाँव में आजादी और गाँधी के गीत गाती। आजादी की नवचेतना देती हुई,जाती थीं और फिर दूसरे गाँव से तीसरे गाँव में जाने का क्रम दूसरे गाँव की स्त्रियों द्वारा किया जाता था। यह क्रम ऐसा हो गया था कि वह समूचे छत्तीसगढ के बच्चे-बच्चे की जिह्वा पर आजादी, गाँधी, स्वदेशी, एकता नाम लाने में सफल हुआ। ग्रामीण अपढ जनता भी बापू के साथ- साथ स्वतंत्रता का सही अर्थ समझने लगी थी।
लोक शैली में गाँधी के कार्य को याद करते हुए द्वारिकाप्रसाद विप्र लिखते हैं-
देवता बनके आये गाँधी
देवता बनके आये
अडबड अटपट काम करे तैं
घर घर अलख जगाये
देवता बनके आये गाँधी...
रामकृष्ण अवतार ल जानिन
रावण कंस ल मारिन
हमर देस ल राक्षस मन सो
लड लड दुनो उबारिन
चक्र सुदर्शन धनुष बाण का
रहिन दुनो झनधारे
ते ह सोझे मुंह म कहिके
अंगेजन ल टारे
सटका धरके पटकु पहिरे
चर्चिल ल चमकाये
देवता बनके आये गाँधी...
हमर देस के अन्न ल धन ल
जम्मों जम्मों लुटिन
परदेशियन के लडवाये
भाई ले भाई छुटिन
देस ल करके निपट निहत्था
उल्टा मारय शेखी
बोहे गुलामी करत रहेन हम
उंकरे देखा देखी
तैं आँखी ल हमरे उघारे
जम्मों पोल बताएँ
देवता बनके आये गाँधी..
तोर करनी ल कतेक बताबो
शक्ति नइये भारी
देस विदेस गाँव गाँव मा
तोर चरखा है भारी
तय उपास कर करके
मौनी बनके करे तपस्या
अंगरेजी अवगुन ला मेटे
टोरे सबो समस्या
साठ बछरले धरे अहिंसा
पथरा ल पिघलाये
देवता बनके आये गाँधी
गाँधी देवता बनके आये!
छत्तीसगढ में देवी जसगीत शक्ति उपासना का रूप है। इस गीत को यहाँ का लोक शक्ति संधान के भाव से गाते हैं। राम कि शक्तिपूजा में जैसे निराला ने भक्ति को देशभक्ति का रूप दिया था! यहाँ छत्तीसगढ का लोकजीवन भी गाँधी के मनुष्यत्व में देवत्व को देख रहा है। गाँधी को छत्तीसगढ का लोकजीवन देवता के रूप में याद कर रहा है। गाँधी छत्तीसगढवासियों के लिए राम और कृष्ण के समान है, जिसने रावण और कंस के समान आततायी का विनाश किया। यहाँ रावण और कंस ब्रिटिश सत्ता का प्रतीक पात्र है जबकि राम और कृष्ण का विजय राष्ट्रीय मुक्तिसंग्राम में साधारण भारतीय के विजय का रूप है।
यह गीत अपने विस्तार में चर्चिल तक जाता है। वही ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल जिसने अधनंगे फकीर कह कर गाँधी का मजाक उडाया था। लेकिन गाँधी साधारण में असाधारण को रचने वाले विरल नायक थे। गाँधी द्वितीय गोलमेज में सटका धरके पटकु पहिरे बराबरी में चर्चिल से वार्ता करते हैं! छत्तीसगढ में सटका लाठी को और पटकु गमछे को कहा जाता है। यह दृश्य सामान्य के वैभव और सत्य के गाँधीवादी पाठ का अनभय रूप है। इसलिए गाँधी इंसान होकर भी देवता कहलाए, जिसका वैश्विक भावप्रसार खान अब्दुल गफ्फार खान, अल्बर्ट आइंस्टीन, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, हो ची मिन्ह, आंग सान सू की, नेल्सन मंडेला,दलाई लामा, बराक ओबामा और अनगिनत शख्सियत तक दिखता है।
अधनंगे फकीर प्रसंग पर अपने आलेख में भारत यायावर लिखते हैं- गाँधी जब गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने लंदन गए थे, तब चर्चिल का दिया हुआ फिकरा पूरे लंदन में प्रसिद्ध हो चुका था - अधनंगा फकीर! गाँधी अपने उसी लोकप्रिय वेश में लंदन गए थे - लँगोटी बांधे, हाथ में लाठी लिए। साथ में उनके कुछ शिष्य और वह बकरी, जिसका दूध वे पिया करते थे। वहाँ के लोग यह देखकर दंग रह गए कि गाँधी लँगोटी और चप्पल पहने ब्रिटिश सम्राट के साथ चाय पीने और वार्ता करने बर्मिंघम पैलेस पहुँच गए। इन दोनों की मुलाकातों की व्यापक रूप में चर्चा हुई। एक पत्रकार ने जब गाँधी से पूछा - क्या इस पोशाक में जाना उचित था, तो गाँधी ने मुस्कुरा कर जवाब दिया - सम्राट ने जितने कपडे पहने थे वह हम दोनों के लिए काफी थे। गाँधी ने वहाँ लंदन में, जहाँ उनके ठहरने का प्रबंध एक आलीशान होटल में किया गया था, उसे छोडकर ईस्ट एंड की गंदी बस्तियों के एक छोटे-से कुटीर में रहना पसंद किया। वहाँ गाँधी ने जॉर्ज बनार्ड शॉ, चार्ली चैप्लिन, हैरोल्ड लॉस्की, मारिया मांटेसरी आदि से मुलाकात की, जिनका विवरण वहाँ के समाचार-पत्रों में प्रकाशित हुआ। वे लंकाशायर के उन मजदूरों से मिले जो भारत में उनके द्वारा चलाए जा रहे स्वदेशी आंदोलन के कारण बेरोजगार हो गए थे। इंग्लैंड की आम जनता लंदन की सडकों से गुजरते हुए गाँधी को देखने के लिए अपने घरों से निकलकर उमड पडी थी। मानो वह बीसवीं शताब्दी के ईसा मसीह का दर्शन कर रही हो। ऐसे ही होंगे ईसा - अर्द्धनग्न- प्रेम का संदेश जन-जन तक फैलाने वाले!
इस गीत के अगले बन्ध में अंग्रेजों के आर्थिक शोषण और दमन का यथार्थवादी चित्रण है। फूट डालो और राज करो कि नीति का भंडाफोड है। अहिंसा का गौरवगान है। भारतीयों को जगाने का संकल्प है। पथरा ल पिघलाएँ पत्थर के समान कठोर और हृदयहीन ब्रिटिश शोषक सत्ता से आजादी की जलधार निकालने वाले महामानव थे गाँधी। साठ वर्ष के गाँधी की महिमा का दुर्लभ रूप है यह लोक अभिव्यक्ति!
इस भाव के गीत गाँधी के साठ बरस 6 अप्रैल 1930 के दिन रायपुर में विद्यार्थियों द्वारा हिंदी में कुछ इस तरह गाये गये। लोकगीत से भाव साम्य दर्शनीय है-
रणभेरी बज उठी वीरवर पहनों केसरिया बाना
बढो बढो हे भारतवीरो
ऋषियों के प्यारी सन्तान!
स्वतंत्रता के महासमर में
हो जाओ सहर्ष बलिदान!
*साठ बरस के बूढे गाँधी*
देव बढे जाते हैं आज
तुम कैसे युवक कहलाते
तनिक भी न आती लाज
इस विडम्बनामय से तो
अच्छा है जीवन में मर जाना
रणभेरी बज उठी वीरवर
पहनो केसरिया बाना!!
छत्तीसगढ में होली के अवसर पर गाये जाने वाला फाग गीत रंगोत्सव का वीरत्वपूर्ण उद्घोष है। इस लोक गायन शैली का उपयोग यहाँ के जनमानस ने स्वदेशी के व्यापक प्रचार-प्रसार के भाव से किया-
अरे हां हमारो आये राज सुदेसी है!
चला आवा मनाबो तिहार!!
हमारो आये राज...
अरे हां हमारो कैसे राज सुदेसी है!
फेर कैसे मनाबो तिहार!!
हमारो आये राज...
अरे हां हमारो गाँधी के गुन ल गावागा!
कर दिहिस देस उद्धार!!
हमारो आये राज...
अरे हाँ हो गाँधी लेके अहिंसा तैं आये!
अउ खोले स्वतंत्र दुआर!!
हमारो आये राज...
अरे हां सुराज के होरी घर घर गावव गा!
अउ करा सुदेसी परचार!!
हमारो आये राज...
अरे हाँ देस के दुसमन अब झन डेरूवावें!
हम करबो अब ललकार!!
हमारो आये राज सुदेसी है..
इस लोकगीत में स्वदेशी के माध्यम से स्वाधीनता का उत्सव अपने पूरे जोश में है। गाँधी की अटल तपस्या के साथ देशवासियों का उन पर विश्वास और आस्था दर्शनीय है। स्वाधीनता किस प्रकार मनुष्य के अंदर स्वाभिमान भरती है, जिसे यहाँ ललकार भाव से वाणी दी गयी है। इस ललकार में स्वत्वबोध है, जिसे भारतेंदु सरीखे साहित्यकारों ने स्वत्व निज भारत गहै अर्थात् अस्मिताबोध भी कहा है। नगाडे के ताल के उच्च स्वर में आशा, विश्वास, समानता, बन्धुत्व, स्वाधीन चेतना सब कुछ घुलमिल गया है।
गाँधी के प्रभाव का एक रूप करमा अर्थात् कर्म के गीत में भी दिखाई देता है। करमा किसान चेतना का प्रतिनिधि लोकगीत है-
चला नाचा गावा गा भइया नाचा गावा रे
अब तो सुराज होगे-
नाचा गावा रे
अंगरेजी राज रहीस अडबड दुख पायेन गा।
अब सुतंत्र भयेन जुन्ना ल भुलावा।
चला नाचा गावा...
इस लोकगीत में सुराज (स्वराज्य)प्राप्ति के लिए किए गए दुर्घर्ष संघर्ष एक पक्ष है तो दूसरा पक्ष अंग्रेजों की गुलामी बीतने के बाद नए युग के स्वागत की उमंग भी भरपूर रूप में दिखाई देती है।
गाँधी जी पर छत्तीसगढ के बहुप्रचलित सुवा लोकगीत की बानगी भी स्त्री की मुक्तिकामी आकांक्षा को रूप देने वाली है। छत्तीसगढी में सुआ तोते को कहा जाता है। सुवा गीत का यह रूप भी स्त्री मन की आकाँक्षा और स्वाधीनता आंदोलन से उसके जुडाव को दर्शाती है-
चला दिदी देखे जाबो तिरंगा झंडा ला।
सुवना हो पाए है देस सुराज
सुवना हो पाए है देस सुराज !!
अब तो तँय सुतंत्र तैं सुवना रे
तोरेच देस म राजा
सुवना हो पाए है देस सुराज!!
पिंजरा के बाहिर बइठ के गावा रे,
सुवना हो गाँधी के जय जयकार
सुवना हो पाए है देस सुराज!!
यह सुवना को पाय देस सुराज का भाव उस नारी मन की है जो भारतीय मुक्तिसंग्राम में गाँधी के आगमन के पश्चात् सजीव भागीदारी निभाती है। घर के चूल्हे-चौकी को छोडकर पिकेटिंग करती है। लाठियाँ खाती है। जेल जाती है। भारतीय सामंती ढांचे में कैद स्त्रियाँ सार्वजनिक जीवन में हिस्सेदारी करती हैं। पिंजरे में कैद स्त्रियाँ सुआ के माध्यम से अपनी स्वाधीनता को देश की स्वाधीनता से जोड देती हैं।
पिंजरे में कैद हमारा परतंत्र भारत इस गीत में पिंजरे से निकलकर आजाद हवा में सांसें ले रहा है। सुवा की मुक्ति इस अर्थ में विशेष है कि अब राजा कोई सामन्त और विदेशी सत्ता नहीं बल्कि जनता है।
सुआ की मुक्त उडान स्त्रीमुक्ति के साथ देशमुक्ति का प्रतीक है। इस गीत में स्त्री मन का यह रूप छत्तीसगढ लोकजीवन की बडी विशेषता है। इस लोकगीत में राष्ट्रीय मुक्ति के नाम पर स्त्री मुक्ति के प्रश्न को कालीन के नीचे नहीं दबाया गया। जो आजाद भारत में हुआ। सुआ से स्त्री का मुक्त संवाद बाणभट्ट की आत्मकथा की निउनिया की शिकायत को दूर करने वाला है। निउनिया की शिकायत है-वृहत्तर सत्य के नाम पर मिथ्या तांडव चल रहा है।
सुआ से संवाद करती लोकनारी की स्वाधीनता बोध के सजर में महादेवी याद आती हैं। जब गुलाम भारत में गीत रचते हुए वे अपने गीत को संबोधित करते हुए कहती हैं-
कीर का प्रिय आज पिंजर खोल दो
महादेवी अपनी गीत को मुक्त तोते(सुआ)जैसे रचना चाहती है।
छायावादी कविता के मार्गदर्शक भाववाणी के रूप में सुआ गीत की उपस्थिति हमारी असल लोक सम्पदा है।
छत्तीसगढ के चौपालों की चर्चा कैसे लोकगीत में बदलती है! यह देखना अद्भुत है-
गाँव के गंवइहा मैं पहिरे हव खादी!
हमला आजादी देवाइस महात्मा गाँधी!!
गाँव का आमजन विनम्र आत्मविश्वास से लबरेज होकर कह रहा है-मैं खादी पहना हूँ। यह खादी उन्होंने स्वयं चरखे से सूत कातकर बनाई है। यह स्वावलम्बन का आत्मविश्वास है। वह आगे कह रहा है कि हमें आजादी गाँधी जी ने दिलायी। अंग्रेजों की गुलामी से और स्वयं के परावलम्बन से! चौपाल में बैठकर ग्रामीण जन जिस गाँधी की जय बोल रहे हैं वह प्रेमचंद की गोदान की धनिया की याद दिलाती है, जो सुराज की बात कहती है। वह भी लोक नारी है। इसका एक रूप मैला आँचल के लोकजनों के सामूहिक घोष में भी दिखाई देता है -गान्ही बाबा की जय।
स्वभाषा स्वदेशी, स्वराज्य को मिलाकर देखने पर यह लोकगीत अपने सम्पूर्ण भावबोध के साथ प्रगट होता है।
एक अन्य लोकगीत में गाँधी के आंतरिक मूल्यों पर बात करते हुए लोकगीतकार की पंक्ति है-
ते घर घर सत दीया बारे
प्रेम के ओमा तेल ल डारे
मन मंदिर के अंधियारी मा
जोत जगाये तें भारत मा
गाँधी देवता...
गाँधी को इसलिए जनता देवता कह रही है क्योंकि उन्होंने मनुष्य के आंतरिक मन को स्वच्छ बनाया!। उन्हें मनसा, वाचा, कर्मणा सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर जीना सिखाया। गाँधी सत्य के व्यावहारिक रूप थे। गाँधी देश के कोटि-कोटि जन के दीपक का नाम है। जिसमें प्रेम, सद्भावना, सदाशयता और सुमति छिपी है।
गाँधी के भावों का विस्तार छत्तीसगढ के लोक जीवनी शक्ति की आधारभूमि बस्तर तक फैला है। हल्बी बोली में सत्य मार्ग की गाथा गाते हुए कहा गया है-
सत ने रले भात मिरेदे
सत ले होयदे जीत
सत मारग ले रलु जाले
बयरी होयदे मीत!!
सत्य मार्ग पर चलने से बैरी भी मित्र बन जाते हैं। यह गाँधी के हृदय परिवर्तन सिद्धान्त का बस्तरिया संस्करण है।
एक और हल्बी लोकगीत की पंक्ति है-
जय जय भारतमाता चो
जय जय बलुक इया हो
महात्मा गाँधी बाबा चो
सपाय जय बलुक दिया हो
हामी हिंदुस्थानी
नी जानू लन्द-फंद काई
सत धरम चो धनुकाण्ड के
धरून होलूसे ठीया हो।
हल्बी जन कह रहे हैं- भारत माता की जय। महात्मा गाँधी की जय। जिन्होंने सही मायने में हिंदुस्तान को रूप दिया। सत्य मार्ग का रूप। एक ऐसे भारत की परिकल्पना को साकार किया जो धनुष की भाँति अटल है।
गाँधी के रचनात्मक कार्यक्रम मद्यपान निषेध की बातें भी हल्बी लोकगीतों में दिखाई देती है-
गाँधी बाबा बल्लो सुना हो गंवरेया
मंद के छाडा तुमी
नंगत गोठ के धरा हो गंवरेया
मंद के छाडा तुमी!!
करेजा फोफसा जरून जायसे
देहें के चटपट चरून खयसे!
धन सरेसे धरम जायसे
मंद के छाडा तुमी!!
गाँधी बाबा ने मद्यपान निषेध की बात कही है। इसलिए साथियों मन्द(शराब)को तुम छोड दो।
हल्बी के कई गीतों में अंग्रेजों के शोषण के परिणामस्वरूप भूख और अकाल का भयावह चित्रण दिखाई देता है-
भूख अकाल ने पेट छटपट
जंगल कडवा रांधा
अंग्रेज राज कंगाल कर ली
गोटक रुपिया चाउर सोली!!
गाँधी जी का जब द्वितीय बार छत्तीसगढ आगमन हुआ उस समय रायपुर की विशाल सभा में गाँधीवादी नेता यति यतनलाल जी ने माधवप्रसाद तिवारी (पौंता वाले) द्वारा रचित कविता का पाठ किया-
पधारो हे शबरी के राम
हमारा सविनय तुम्हें प्रणाम!
हे अखंड सेवा व्रतधारी
हरिजन बन्धु अकाम!!
नवजीवन की ज्योति जगाते
आये जग अभिराम।
नाथ सकल साधन विरहित हैं
हम सब निपट सकाम!!
जन चातक की आस तुम्हीं हो
मनमोहन घनश्याम।
महानदी कृत मंजु मेखला
कौशलभूमि ललाम!!
चलकर तव शुभ चरण चिह्न पर
अमर करे निज नाम।
यह अतीत दण्डक वन प्यारा
योग सिद्धि का धाम!!
सफल करे तव दिन साधन का
मङ्गलमय शुभ काम।
चुका न सकते देव तुम्हारे
जनसेवा का दाम!!
ग्रहण करो हे पूज्य अतिथि
यह त्याग सुधा का जाम।
इस कविता से गुजरना छत्तीसगढ के सांस्कृतिक विरासत के साथ गाँधी के मूल चरित्र का प्रकाशन है। दण्डक वन और महानदी की धरती छत्तीसगढ में शबरी के राम, गाँधी जी का यह अभिनन्दन अद्वितीय है। गाँधी को जन चातक की आस कहकर छत्तीसगढ की भुइँया भारत की भुइँया से जुड जाती है। आस अगर गाँधी है तो चातक छत्तीसगढ सहित समूचे भारत के लोग।
लोकगीत की ताजगी भूत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ निहारती है। देश की जनता मन प्राण से गुलामी के यथार्थ को चीरकर आजादी के स्वप्न को सत्य बनाने के लिए संकल्पवान थी। आजादी के बाद का भारत कैसा होगा। इस लोकगीत में गाँधी बचपन को पगडी पहनाकर भारत के भविष्य को सम्भाव्य दिशा दे रहा है-
गोरी के अंचरा भुइयां म लुरे
गाँधी के झंडा दुनिया म फिरे
लाये ल माटी बनाये ल मटका
गाँधी बबा के कहे ठोंका ठाका
पाबो सुराज मजा करबो
भारतमाता के पुकार सुने करबो
नानकुन छोकरा पहिरे ल पागी
गाँधी बबा के कहे पहिनबों खादी।
लोकगीतकार की आकाँक्षा है नानकुन छोकरा अर्थात् - बच्चे । कच्ची मिट्टी से अपनी सर्जना मटका (देश) को आकार देगा-लाये ल माटी बनाये ल मटका! बचपन की निर्मिति से लोक की उम्मीदें बढ गई हैं। बचपन की सरल आकाँक्षा भारतमाता से बातें करने की है। इसलिए वह भारतमाता की पुकार सुनने की बात कह रहा है। भारतमाता से वह नए भारत के निर्माण की चर्चा आँचल भाव से करना चाहता है। नए भारत को रूप देने के अभियान में आँचल की ऊष्मा और बेफिक्री चाहता है। बच्चा बार-बार इस अभियान में गाँधी की सटका(लाठी)और खादी की ओर ताक रहा है। पागी (पगडी)पहने हुए बच्चे का भोला मन कहता है-गाँधी के लाठी और खादी से वह-
झंडा रूपी रंगबिरंगी पतंग बनाकर दिग्दिगन्त तक उडाएगा। क्या बचपन की इच्छा मनुष्यता की स्थायी प्रेरणा बनेगी?
छत्तीसगढ में राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के मर्म को समझने की दृष्टि से मौखिक इतिहास के रूप में लोकगीतों का पाठ दो दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण है। प्रथम, आज हम सब भूमण्डलीकरण के दौर में जी रहे हैं। जब लोकभाषाएँ मर रही हैं। लोकगीत लोकभाषा की जनतांत्रिक भूमिका से वर्तमान पीढी को जोडती है और पुरखों से संवाद का अवसर भी प्रदान करती है।
द्वितीय, लोकगीत अपने बनावटरहित विशेषता के कारण समाज की सच्चाई को ज्यादा बेहतरी से सामने रखती है। इतिहास लेखन को लोकसाहित्य के संदर्भ से नई दिशा मिल सकती है।
इन लोकगीतों से गुजरते हुए हम छत्तीसगढ के जननायकों पण्डित सुंदरलाल शर्मा (छत्तीसगढ के गाँधी) ठाकुर प्यारेलाल सिंह, घनश्याम गुप्त,पण्डित रविशंकर शुक्ल,वामनराव लाखे, महंत लक्ष्मीनारायण दास, बाबू छोटेलाल श्रीवास्तव, नारायण राव मेघावाले, बैरिस्टर छेदीलाल, खूबचन्द बघेल के आधारभूत अवदानों को महसूस करते हैं। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के जनचरित्र का परिचायक है छत्तीसगढी लोकगीत।
सम्पर्क- सहायक प्राध्यापक
शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय भखारा,
जिला-धमतरी
bhuwal.singhthakur@gmail.com
Mob.7509322425