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नेमिचन्द्र जैन : रचनाप्रसूत प्रतिमान का आग्रह

नन्दकिशोर आचार्य
किसी भी साहित्यालोचक के कृतित्व पर विचार और उनके मूल्यांकन के संदर्भ में यह जिज्ञासा होनी अस्वाभविक नहीं है कि वह किस प्रतिमान अथवा प्रतिमानों के आधार पर अपना आलोचना कर्म निष्पन्न करता है। इसलिए, यह स्वाभाविक ही है कि उपन्यास आलोचक नेमिचन्द्र जैन द्वारा प्रयुक्त प्रतिमानों की तलाश की जाती रही है और उनकी एक पूरी तालिका भी हमारे सम्मुख प्रस्तुत की गयी है और यह भी संकेतित किया गया है वह कथा-साहित्य के विश्लेषण में भी कविता की अलोचना के औजारों को प्रयोग करते हैं- बल्कि काव्यात्मकता की उनकी माँग तो रंगमंच से यही महत्ती है।
लेकिन, नेमिचन्द्र जैन किसी भी प्रतिमान-पद्वति का अनुकरण नहीं करते। दरअस्ल जब कोई भी सर्जन-कर्म किन्हीं प्रतिमानों का मुखापेक्षी नहीं होता, तो उनके आस्वाद और मूल्यांकन के लिए किसी सैद्धान्तिक प्रतिमान को आधार क्यों माना जाना चाहिए? नेमिजी ने स्वयं अधूरे साक्षात्कार की भूमिका में ही यह स्पष्ट कर दिया है कि इन उपन्यासों को किसी एक ही सामान्य विचारधारा या विश्लेषण-पद्धति के चौखटे में रख कर देखने, या कोई पूर्वनिश्चित बौद्धिक अथवा कलात्मक निष्कर्ष निकालने का भी कोई प्रयास लेखक का नहीं है। इसीलिए अलग-अलग उपन्यासों के विश्लेषण में ऐसी अलग-अलग विधियाँ अपनायी गयी हैं, जो उस उपन्यास की भाव-वस्तु को पहचानने में, उनमें निहित अनुभूति को आत्मसात् करने में सहायक हो सके, जिन से उनके मानवीय तत्त्व की सार्थकता निरर्थकता का उद्घाटन हो सके। इसीलिए , नेमिजी किसी एक प्रतिमान का अनुसरण नहीं करते, बल्कि यह देखने का प्रयास करते हैं कि सम्बन्धित कथा कृति स्वयं ही अपने पाठक-आस्वादक में- और आलोचक की अंततः एक प्रवीन सहृदय पाठक ही तो होता है- क्या अपेक्षाएँ जगती हैं और किस सीमा तक और क्यों उन अपेक्षाओं को पूरा करती या नहीं करती है। तात्पर्य यह कि किसी भी कृति के विश्लेषण और मूल्यांकन के संकेत स्वयं कृति में ही न्यस्त रहते हैं। कृति-निष्ठ आलोचक का वास्तविक आशय भी यही होता है।
सवाल उठ सकता है कि फिर नेमिजी प्रत्येक प्रत्येक कृति से माँव्यात्मकता की मांग क्यों करते हैं। दरअस्ल, यह आपत्ति काव्य और कविता को एक मान लेने के भ्रम से उत्पन्न होती है। हमारी परम्परा में साहित्य मात्र काव्य है- पद्य में साहित्य-रचना को कविता कहा गया और गद्य में लिखे जाने पर- उसे कथा आदि। गद्य और पद्य भाषा के दो रूप हैं, साहित्य अथवा काव्य के नहीं काव्य पद अ प्रयोग भाषा में रचित किसी भी कलाकर्म के लिए किया गया । नाटक दो दृश्य काव्य इसीलिए कहा गया कि वह भाषा में रचित किसी कृति की दृश्यात्मक प्रस्तुति है, जबकि अन्य सभी साहित्यिक रचनाएँ श्रव्य-काव्य के अन्तर्गत वर्गीकृत की गयी। दरअस्ल, केवल भाषिक रूप में नाटक की भी श्रव्या-काव्य ही है- रंगमंचीय प्रस्तुति ही उसे दृश्य काव्य बनताी है। किसी कृति का गद्य अथवा पद्य में होना उसके विद्यागत रूप का निर्धारण नहीं करता, अन्यथा, बाणभट्ट को कवि नहीं कहा जाता और पद्य में लिखित ज्ञान-ग्रंथों- आयुर्वेद, ज्योतिष आदि - को भी काव्य मान लिया गया होता। इसलिए नेमिजी जब काव्यात्मकता या कलात्मकता का आग्रह करते हैं, तो उनका तात्पर्य उस विधा के गुणों से नहीं होता, जिसे हम सामान्यतः कविता संज्ञा से पहचानते हैं। विधा कोई भी हो, किसी भी कृति की मूल प्रेरणा और सार्थकता अपने में अन्तर्निहित भाव-वस्तु को ग्रहीता की अनुभूति बना देने में होती है। कलात्मकता का आशाय यही है कि अपनी पूरी संरचना के माध्यम से उस कृति की भाव वस्तु की अनुभूति को उसके सूचनात्मक सम्प्रेषण को नहीं- किसी प्रक्रिया से अपने ग्रहीता की आत्मानुभूति बन जाती है। यहाँ एक विचारक का कथन की स्मरणीय है कि प्रत्येक अनुभूति सारतः आत्मानुभूति होती है, क्योंकि उस में सदैव एक दोहरी सांकेतिकता होती है- विषय की और उसे अनुभव करने वाले विषयी अथवा आत्म की। इसी अर्थ में प्रत्येक अनुभूत्यात्मक अन्वेषण आत्मान्वेषण भी प्रक्रिया की हो जाती है - और इसीलिए, प्रत्येक सर्जन-कर्म एक प्रकार का आत्मसृजन।
इसलिए, कथा आलोचक नेमिचन्द्र जैन की विश्लेषण-प्रक्रिया में जिन बीज-शबदों या प्रतिमानों की तालिका बनायी जाती है, वे सभी उस अनुभूत्यात्मक आत्मान्वेषण की प्रक्रिया को ही संकेतित करते हैं। उन्हें प्रतिमान नहीं कहा जा सकता। कलात्मकता की परख यही है कि यह प्रक्रिया अपनी अपेक्षाओं को किसी भी हद तक पूरा करती है। वह सजावट नहीं है- वैसें तो अलंकार, शब्द का अर्थ भी किसी चीज को अलम् अर्थात यथेष्ट करना है, न कम, न अधिक। यह यथेष्ट होना सुन्दर होना है- कृति का ही नहीं, मानव-व्यक्तित्व का भी।
नेमीचन्द्र जैन के लिए उपन्यास की सार्थकता, इसलिए इसी बात में है कि वह कहाँ तक आज के संवेदनशील व्या--- के लिए न केवल आत्मभिव्याक्ति का बल्कि बहुत कुछ आत्मान्वेषण और आत्मोपलब्धि का भी साधन बनता है और इस प्रकार किसी की कलात्मक सृष्टि के मौलिक धर्म के पालन में सहायक होता है, अर्थात् किसी भी कलात्मक सृष्टि का मौलिक धर्म आत्मान्वेषण और आत्मोपलब्ध में सहायक होना है। इसलिए यह स्पष्ट --- चाहिए कि जब भी नेमिजी कलात्मकता की आग्रह करते दिखायी देते हैं, तो उनका आशय कला के उपर्युक्त मौलिक धर्म से होता के निर्वाह से होता है।
आत्मान्वेषण और आत्मोपलब्धि जैसे पदों के प्रयोग पर कई मित्रों को आपत्ति हो सकती है क्योंकि वे आत्म की व्याख्या व्यक्ति-केन्द्रित रूप में ही करते हैं। नेमिजी के लिए आत्म व्यक्ति सीमित नहीं है क्योंकि वह सामाजिक आत्म भी होता है। आत्म व्याक्ति और समाज दोनों अथवा कहे कि समाज में व्यक्ति या व्याक्ति में प्रतिबिम्बित समाज दोनों को अपनी परिधि में समेटता है। नेमिचन्द्र जैन यदि हिन्दी उपन्यासों को अधूरे साक्षात्कार कहते हैं, तो इसका कारण यही है कि उनकी दृष्टि में कोई भी उपन्यास, अपनी कई उल्लेखनीय उपलब्धियाँ के बावजूद, इस समग्र आत्म का अन्वेषण अथवा उसकी अनुभूतिगत उपलब्धि कर पाने में सफल नहीं हो सका है। इसका तात्पर्य यह भी नहीं है कि वह हिन्दी उपन्यास की यात्रा को उपलब्धि शून्य मानते हैं- बल्कि कई उपन्यासों के महत्त्व की वह मुक्त कंठ से प्रशंसा करते हैं, लेकिन उन्हें शिकायत यह है कि वे उपन्यास की या तो केवल व्यक्ति-सत्य तक सीमित रहते हैं या सामाजिक परिवेश के चित्रण तक और यदि कहीं दोनों को एक साथ समझने का प्रयत्न किया भी गया है तो उसमें वह गहरी अनुभूत्यात्मकता नहीं मिलती जिसे आत्मान्वेषण और आतमोपलाब्धि की संज्ञा से अभिहित किया जा सके। हिन्दी उपन्यास के सामर्थ्य की इसी सीमा की ओर इंगित करते हुए वह कहते हैं कि जिन लेखकों में सामाजिक जीवन की गति को समझने का सामर्थ्य है, वे प्रायः उसे व्यक्ति के आन्तरिक-मन की गहराई में पैठ सकते हैं, उनके सामाजिक गति का बोध बडा दुर्बल होता है। व्यक्ति और समूह अलग-अलग हो कर भी कहीं किसी समग्र यथार्थ में समन्वित और परस्पर सम्बद्ध होकर भी उनका गतिविधान भिन्न प्रकार का है, इस सत्य की उपलब्धि हमारे उपन्यास साहित्य में बहुत की कम होती है। यह उल्लेखनीय है कि अज्ञेय जैसे उपन्यासकार भी, जिनके अपने उपन्यास नदी के द्वीप में नेमिजी इस समन्वय का अभाव पाते हैं, किसी भी अच्छे लेखक के लिए यह समन्वय जरूरी मानते हैं। भवन्ती में अपनी एक टीप में वह लिखते हैं : जिस अनुभव का सम्प्रेषण वह करता है, वह कहाँ तक उस के अपने घटित से बडा है। कहाँ तक ऐसा है कि पूरे समाज के या मानव-जाति के अनुभव के समक्ष और समकक्ष उसे रखा जा सके। यानी कहाँ तक वह अपने जीवन से बढ कर समाज के जीवन में पैठ सका है, और उन अनुभवों का सम्प्रेषण कर सकता है, जो समाज के लिए भी महत्त्व रखते हैं... जितनी ही व्यापक मूल्यवत्ता का संस्पर्श वह पाठक को देता है- उस के द्वारा पाठक तक पहुँचता है- उतना ही वह अच्छा लेखक होता है। यद्यपि अज्ञेय महान लेखक के लिए यह आवश्यक मानते हैं, कि जिस लेखक के बारे में हम यह कह सकें कि इस ने हमें जो सत्य दिया वह न केवल हमारे व्यापकतम अनुभव के क्षेत्र का है, बल्कि इस ने हमें न दिखाया होता, तो यह अनदेखा रह जाता, पर एक बार दिखा दिया जाने के बाद वह कभी ओझल होने का नहीं है, वही महान लेख है।
दरअस्ल इस बात को लेकर विचार की जरूरत है कि व्यापक अावा सामजिक सत्य साहित्य में क्या एक ही रूप में व्यक्त हो सकता है या उनकी पहचान और सम्प्रेषण के कई सूक्ष्म रूप और आयाम हो सकते हैं। लेकिन नेमिजी का यह आग्रह तो उचित ही लगता है कि व्यक्ति के आन्तरिक जीवन और सामाजिक गति की समझ का समन्वय ही ऐसी कृति का कारण बन सकता है, जिसे आज के युग का महाकाव्य कहा जा सके, जो उन्हें आज उपलब्ध नहीं लगता। क्लासिक माने जाने वाले गोदान तक से उनकी शिकायत है कि इस में होरी और उसका परिवेश जितना अभूतपूर्व यथार्थ और विश्वसनीय है, उतना शहरी प्रकरण नहीं।
लेकिन जैसा पूर्व में इंगित किया गया है, ऐसा नहीं है कि हिन्दी उपन्यास उन्हें नितांत उपलब्धिहीन लगता है- बस यह कि आलोचक नेमीचन्द्र जैन विवेचित उपन्यासों के सामर्थ्य का विश्लेषण काते हुए उनकी सीमाओं का अंकन करने में भी कोताही नहीं बरतते। कई स्थलों पर उनके विश्लेषण से सहमत-असहमत हुआ जा सकता है, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि तब आलोचक के रूप में वह किसी भी प्रकार के दबाव में नहीं आते- न विचारधारात्मक और न ही कथित लोक-स्वीकृत धारणाओं अथवा व्याक्तित्वों के दबाव में। उनके विश्लेषण से कभी असहमत होने के बावजूद कोई भी उनकी आलोचकीय निस्संगता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। अधूरे साक्षात्कार, जनान्तिक तथा अन्यत्रा प्रकाशित उनकी व्यावहारिक आलोचना में इस निस्संगता को बखूबी चिह्नित करने के लिए उनके कृति-विश्लेषण के कुछ उदाहरण लिये जा सकते हैं, जिनमें उन्होंने न तो कृति-विशेष के गुणों की व्याख्या में कोई कंजूसी बरती है, और न उसी कृति के दोष-विवेचन में कोई संकोच।
पहला ही उदाहरण नदी के दीप का लिया जा सकता है जिसकी विशेषताओं का जिक्र करते हुए नेमिजी का मत है कि उपन्यास के रूप में न केवल उस प्रकार की कोई अन्य रचना हिन्दी में नहीं है बल्कि उतनी सूक्ष्मता, संवेदनशीलता और अनुभूतिगत प्रबलता से लिखी हुई कृतियाँ बहुत ही कम है। बहुत-सी दृष्टियों से नदी के द्वीप हिन्दी की साहित्यिकि चेतना को, सौन्दर्यबोध को, हिन्दी गद्य की सूक्ष्म अभिव्यंजना-शक्ति को, एक सर्वथा नया ही स्तर प्रदान करता है और हिन्दी उपनयास को पश्चिमी देशों के उपन्यास साहित्य का समकक्षी बना देता है। नदी के द्वीप चित्रित प्रेम की असमाजिकता को वह वैसी ही असामाजिकता मानते हैं जैसी मीरा के प्रेम में रही होगी। रेखा के चरित्र के बारे में उनकी राय है कि इतनी संवेदनशील सजग, गौरवमयी और फिर भी आधुनिक नारी का चित्र हिन्दी उपन्यास में दूसरा है ही नहीं। लेकिन यह सराहना नेमिजी के यह कहने में कोई बाधा नहीं बनाती कि लेखक का चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया चन्द्रमाधव के संदर्भ मं बुरी तरह असफल हुई है और उसका मूल कारण वह लेखक का सक्षम और प्रज्ञावान होते हुए भी उनमें व्यापक मानवीय सहानुभूति का अभाव है। अन्यत्र मैला आँचल की भाव-तरलता को हिन्दी के श्रेष्ठतम् व्यक्ति प्रधान उपन्यासों के समकक्ष मानते हैं, जिनें वह शेखर : एक जीवनी और नदी के द्वीप को भी शामिल करते हैं। मैला आँचल के विश्लेषण में लेखक की कवित्वपूर्ण दृष्टि की ओर इंगित करते हुए नेमिचन्द्र जैन यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि इस पद से उनका क्या आशय है : मैं बहुत जान-बूझ कर इस दृष्टि को कवित्वपूर्ण कहता हूँ क्योंकि विशेषकर यथार्थवाद के नाम पर राजनीतिक मतवाद के दुराग्रह के फलस्वरूप बहुत दिनों तक साहित्यकार सबसे अधिक वंचित होता रहा इसी कवित्वपूर्ण दृष्टि से, यद्यपि मूलतः यही साहित्यकार की अपनी दृष्टि है। जीवन के सत्य को पकडने में उसकी और मनोवैज्ञानिक तथा इतिहासवार की भिन्नता इसी दृष्टि की भिन्नता के कारण है। वह मानव आत्मा का शिल्पी इसलिए होता है कि वह जीवन के काव्य का, उनकी सरसता और सौन्दर्य का, विकृति और विसंगति के पथ के बीच से झाँकते मुस्कुराते कमल का दृष्टा होता है। जीवन के इस सौरभ की पहचान ही कवित्वपूर्ण दृष्टि है।
मैला आँचल का लेखक उनके विश्लेषण में न केवल इस सौरभ से स्वयं उन्मत हुआ, वह औरों को भी उससे उन्मत्ति करने में सफल हो सका। यही कारण है कि यह उपन्यास राजनीति का भी सार्थ समावेश करता है। लेखक कहीं भी अपने राजनीतिक आग्रह को भी अपने जीवन-बोध और सौन्दर्यबोध पर हावी नहीं होने देता है।
लेकिन साथ ही नेमिचन्द जैन इस उपन्यास में नये निर्झर की निर्मल स्वच्छता और चमक होते हुए जीवन की गहराई नहीं पाते और न कोई ऐसा पात्र पाते हैं, जिसे होरी, धनिया, शेखर या मृणाल जैसे पात्रों की पंगत में बिठाया जा सके। यह उपन्यासकार में जितनी सरसता और आत्मीयता पाते हैं, उतनी प्रौढता और परिपक्वता नहीं।
कुछ-कुछ इसी तरह की सम्पति वह उसका बचपन के बारे में भी प्रकट करते हैं। उनकी चित्रमयता और भाव-वस्तु की एकाग्रहता के कारण वह उसे अपने प्रिय पद काव्यात्मक से अभिहित वह केवल उदासी और अवसाद ही पाते हैं, जीवन की गहरी विडबना या ट्रेजेडी नहीं। इसलिए वह एक साथ ही अत्यधिक प्रामाणिक और अत्याधिक संकुचित दोनों है। इसी प्रकार यह पथ बन्धु था की सहज करूणा और भाव-सघनता के बावजूद उसके रोमेंटिक सरलीकरण को रेखांकित करना नहीं भूलते। बूँद और समुद्र को वह ऐसी कृति के रूप में देखते हैं जिसमें इस दौर की सर्वश्रेष्ठ कथाकृति बनने की पूरी संभावना थी, लेकिन असमता और अन्विति के अभाव के कारण वह मूर्त रूप नहीं ले पाती है। ताई के चरित्र को भी होरी और शेखर की पंगत में रखने के बावजूद नेमिजी यह कहने में भी संकोच नहीं करते कि आधुनिक व्यक्ति के गहन अन्तर्द्वन्द्व और आधुनिक परिस्थितियों में उसके विघटन की पकड उपन्यासकार में नहीं है ।
आलोचक नेमिचन्द्र जैन की निस्संगता का एक उत्कृष्ट उदाहरण झूठा सच उनका मूल्यांकन है। यह सभी जानते हैं कि इस उपन्यास के लेखक की राजनीतिक दृष्टि से एक उपन्यास की सहानुभूति रही है, उसकी ऐतिहासिक दृष्टि की उपयुक्तता को भी वह स्वीकार करते हैं, लेकिन यह सहानुभूति उनके यह कहने से नहीं रोक पाती कि एक प्रकार की पर सरलीकृत, एकांगी सिद्धान्तवादिता, जो जीवन से निःस्तृत नहीं आरोपित अधिक जान पडती है, पक्षधर राजनीतिक मताग्रह लेखक की दृष्टि की निर्ममता को, प्रखरता और स्पष्टता को, कम कर देता है। वह यहाँ तक टिप्पणी कर देते हैं कि यशपाल के सभी उपनयासों में सेक्सके प्रति एक प्रकार का असन्तुलित विकृत दृष्टिकोण उनके कृतित्व के स्तर को नीचे गिराता रहा है। अनन्तर एक लेख में वह इसी लेखक के एक अन्य उपन्यास वन्यों फँसे को तो सस्ते बाजारू उपन्यास की संज्ञा देते हैं।
राग दरबारी अत्यन्त लोकप्रियता हासिल करने वाला उपन्यास माना गया है, जिसमें आधुनिक भारत की भौतिक गिरावट, पाखंड और बढती हुई गुंडागर्दी तथा इनके कारण उत्पन्न व्यापक असुरक्षा की भावना को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत कियागया है। लेकिन नेमिजी पर इस लोकप्रियता का कोई दबाव नहीं पड पाता और वह उसकी व्यंग्य शैली को रेखांचित्रों या बैठे-ठाले जैसे पत्रकारीय स्तम्भों के लिए ही उपयुक्त मानते हुए उसे चालू किस्म की जुमलेबाजी से भरा माते हैं। वह टिप्पणी करते हैं कि जो बात एक-दो व्यंग्य-निबन्धों या रेखाचित्रों में अपनी चमक और नवीनता से सचाई की एक झलक जैसी जान पडती है, वही उपन्यास के विस्तृत फलक में पुनरावृत्ति, सतहीपन और एकआयामिता के कारण अर्न्तर्दृष्टि और कल्पनाशीलता के अभाव की सूचक जान पडती है। नेमीजी तो उपन्यास के नाम से भी असहमत है क्योंकि यह नाम एक अत्यन्त अभिव्यंजनापूर्ण संगीत रूप को अकारण ही भ्रष्ट सन्दर्भ देता है। यह नामकरण चाहे चतुराई के कारण हो चाहे अज्ञानवश, एक अदम्य संवेदनशीलता का सूचक अवश्य है।
इसी प्रकार कृष्णा सोबती के उपन्यास सूरजमूखी अँधेरे के एक अंश आकाश खंड में एकाग्रता और गीतिपरकता तथा रूपगत कसाव, निखार और सम्पूर्णता को सवीकार करते हुए भी समग्रतः इस उपन्यास को नेमिजी रूपबन्ध की विषमता और किसी गहरी मानवीय विडम्बना के साथ झकझोर देने वाले साक्षात्कार के अभाव में चुस्ती और चमक-दमक का लेखकीय करिश्मा ही मान पो हैं।
आलोचक नेमिचन्द्र जैन की एक यह विशेषता भी रेखांकित की जाने योग्य है कि वह कईं बार किसी कृति या कृतिकार के बारे में व्यक्त की गयी राय या धारणाओं का कभी-कभी पुनरीक्षण भी करते हैं और अपनी पूर्व में व्यक्त की गयी धारणा में संशोधन भी। इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण जयवर्धन को दोबारा पढने पर व्यक्त की गयी प्रतिक्रिया है। अधूरे साक्षात्कार में जयवर्धन के विश्लेक्षण में नीमिजी उसे निष्प्राण बताते हुए निष्कर्ष दिया था : कलाकृति के रूप में जयवर्धन अन्ततः ऐसा मरूस्थल है, जिनमें भाव और विचार की आकर्षक और सम्भावनापूर्ण धाराएँ क्रमशः सीमाहीन बालू में लुप्त हो कर मरीचिका मात्र रह जाती है। लेकिन लगभग दस वर्ष बाद उसे देाबारा पढने पर स्वीकार करते हैं कि कई खामियों के बावजूद और उसी खामियाँ तो उन्हें लगभग प्रत्येक महत्त्वपूर्ण हिन्दी उपन्यास में दिखायी देती है- इस उपन्यास में कुछ ऐसी चीज जरूर है, जिसकी सार्थकता वक्त के साथ बहुत नहीं घटी है। बल्कि शायद मौजूद दौर में उस पर कुछ ज्यादा ध्यान दिया जाना अनुचित न होगा। इस टिप्पणी में वह जयवर्धन और इला के सम्बन्धों में नैतिक संघर्ष में अन्तर्निहित तीखी पीडा त्रस्त को पहचानते हुए यह स्वीकार करते हैं कि शिल्प की दृष्टि से यह बात दिलचस्प है कि कथा का राजनीतिक ढाँचा और वैयक्तिक सम्बन्धों का खिंचाव उभार और फैलाव दो समानान्तर गतियाँ नहीं हैं, बल्कि एक ही समग्र विस्तार के अलग-अलग आयाम या धरातल है। जयवर्धन इसीलिए चाहे जितने सीमित अर्थ में सही, संगत या सार्थक सर्जनात्मक प्रयास है। यह कहने की अलग से कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि हिन्दी में ऐसे आलोचक अपवादस्वरूप ही होंगे, जो अपने विश्लेषण और निष्कर्षों का पुनर्परीक्षण और संशोधन करते हो।
नेमिजी ने हिन्दी के अन्य कई उपन्यासों - तथा कहानियों का कहीं कुछ विस्तृत तो कहीं संक्षित विवेचन किया है, जिन सब का विधान इस संक्षिप्त भूमिका में सम्भव नहीं हैं, लेकिन इस सारे विवेचन में उनकी यह शिकायत बदस्तूर निरंतर बनी रही है कि कोई औपन्यासिक कृति जीवन के समग्र साक्षात्कार में सफल नहीं हुई है। नेमिचन्द जैन के आलोचक से यह शिकायत की जा सकती है, की गयी भी है कि शायद कोई कृति उनके आदर्श पर सर्वांग खरी उतर सके ऐसा नहीं है कि स्वयं नेमिजी इस बात से परिचित नहीं है। शायद वह कसौटी यूक्लिड के उस बिन्दु की तरह है, जिसे कभी कागज पर उतारा नहीं जा सकता- जैसा गाँधीजी ने अपने आहिंसा के बारे में कहा था - लेकिन निरंतर उसकी दिशा में बढने के लिए उसे ध्यान में रखना आवश्यक है। मुझे लगता है कि यदि नेमिजी को हिन्दी उपन्यास अधूरे साक्षात्कार लगते हैं, तो इसका कारण यही है, ऐसा नहीं है कि वह हिन्दी उपन्यास को खारिज कर रहे हैं; वह उसकी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों की कहीं-कहीं उसकी आद्वितीयता को खुलेपन से सराहना करते हुए उस की सीमाओं तथा उनके कारणों का विश्लेषण करते हैं, तो इनके पीछे कहीं यह उम्मीद भी उन के मन में सुगबुगाती लगती है कि हिन्दी की सृजनात्मक प्रतिभा उस ओर आगे बढती रहेगी। वह उन रचनाओं को भी सार्थक मानते हैं, जिसमें जीवन का कोई एक सीमित पक्ष ही, कोई एक छोटी या बडी अनुभूति ही व्यक्त हो पताी है। और यदि हम अपने दुराग्रहवश अपनी संवेदनशीलता खो दें और अनुभूति के छोटे-सीमित किन्तु प्रामाणिक पक्ष को ग्रहण करने में असमर्थ हो जायें तो कभी महान साहित्य की शक्ति और वेग को भी पहचान सकेंगे, यह कहना कठिन है।
अपने द्वारा विश्लेषित उपन्यासों की सीमाओं को लेकर असंतोष प्रकट करते हुए भी वह स्वीकार करते हैं कि व्यक्ति के साधारण व्यक्ति के गौरव के इस अनुसंधान में हिन्दी के उपन्यासकार ने यथार्थ के दोनों छोरों तक पहुँचने का यत्न किया है। एक ओर उसने मानव के अन्तरमन की, उसके अवचेतन जीवन की गहराई में डूबने का साहस किया है, तो दूसरी ओर वह सामाजिक सम्बन्धों के व्यापक प्रसार को और उनकी तीव्रता और पारस्परिकता को समेटने के लिए उद्यत हुआ है। प्रमुख बात यह है कि धीरे-धीरे जीवन के इन दोनों आयामों के बीच सन्तुलन की अनिवार्य आवश्यकता उसने अनुभव की है और अपने-अपने ढंग से प्रत्येक लेखक ने इस सन्तुलन को प्रस्तुत करने का प्रयास भी किया हैं। वह यह भी मानते हैं कि जीवन के विविध गहरे प्रश्ा* हिन्दी उपन्यास में उठाये गये हैं तथा उसमें पर्याप्त रूपगत नवीनता तथा अन्वेषण भी है, जो भाव-सत्य के अन्वेषण का ही एक पक्ष हैं, और ऐसी रचनाओं में प्रायः भाववस्तु और रूप में अनिवार्य आन्विति भी है, जो कृति की प्रभाव-वृद्धि करती है।
इसलिए अपने आदर्श को न भूलते हुए भी नेमिजी प्रत्येक साहित्यिक कृति को कालिदास, शेक्सपियर, तोलस्तोय, रोम्याँ रोला और रवीन्द्रनाथ की तुलना में परखना उचित नहीं समझते। वह यह भी मानते लगते हैं कि समीक्षक को पहले से एक निश्चित पैमाना बना कर रचना का विश्लेषण करने के बजाय प्रत्येक रचना को उसके अपने निजस्व, उद्देश्य और मौलिक कलात्मक लक्ष्य के परिप्रेक्ष्य में परखने के बाद ही किसी व्यापक और कला के मौलिक मूल्यों के आधार पर मूल्यांकित करनी चाहिए। वह एक बहुत अन्तदृष्टि पूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि तुलसी का लोकमंगल और सूर का आत्मानन्द दोनों ही अपनी-अपनी जगह महानतम कलासृष्टि के समुचित आधार हो सकते हैं और इन दोनों की उपलब्धि की वास्तविक महत्ता को समझने के लिए अनिवार्य रूप से हमें पहले उनके अपने निजी कलात्मक उद्देश्य के सूत्रों को ही खोजने, पहचानने और परखने का प्रयत्न करना होगा। सूर में मर्यादाओं की स्थापना की और तुलसी में प्रीति के अनिर्वचनीय आनन्द की खोज न केवल व्यर्थ चेष्टा है बल्कि निरा पाखंड है।
इसलिए एक आलोचक के लिए नेमिजी की दृष्टि में वांछनीय यही है कि वह स्वयं रचना द्वारा उत्पन्न अपेक्षाओं के आलोक में उसे विश्लेषित और मूल्यांकित करें, क्योंकि फिर रचना का सर्वप्रथम स्वय अपनी कसौटी पर खरा उतरना आवश्यक है। यहाँ से आरम्भ करने पर ही उसके कहीं सच्चे यथार्थ और सन्तुलित मूल्यांकन पर पहुँचा जा सकेगा।

सम्पर्क - सुथारों की बडी गुवाड, बीकानेर