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रेणु के पत्र-साहित्य का अवलोकन

ऋषि कुमार
रेणु के कथा साहित्य का फलक जितना व्यापक है उतना ही कथेतर साहित्य का भी। रेणु के कथा साहित्य में मैला आँचल, परती परिकथा, ठुमरी, रसप्रिया, तीसरी कसम, पंचलाइट, लाल पान की बेगम, आदिम रात्रि की महक, उच्चाटन, अगिनखोर, एक श्रावणी दोपहरी की धूप, संवदिया प्रसिद्ध हैं, वहीं कथेतर साहित्य में ऋणजल-धनजल, कवि रेणु कहे, नेहरू चरितम्, चिट्ठियाँ हो तो हर कोई बाँचे आदि प्रमुख हैं। रेणु के पत्रों की पडताल करने से पूर्व पत्र साहित्य के संबंध में जानना महत्त्वपूर्ण हो जाता है।
फ्रांसिस वेकन पत्रों के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि - मेरे विचार से विद्वज्जनों के पत्र, मनुष्य के समस्त कथनों से श्रेष्ठ हैं।1 अतः कहा जा सकता है कि किसी भी भाषा के पत्र उसके साहित्य की बहुमूल्य थाती होते हैं। आज पत्र साहित्य आधुनिक समय में एक प्रमुख विधा के रूप में विद्यमान है। पत्र-साहित्य से तात्पर्य साहित्यकारों द्वारा अपने चिर-परिचित लोगों, साहित्यकारों तथा अभिन्न मित्रों को लिखे गये पत्रों से है। साहित्यकारों के पत्र युगीन समस्याओं, चिंताओं, आशाओं एवं आकाँक्षाओं से भरे हुए होते हैं। साहित्यकार पत्रों में अपने व्यक्तित्व का प्रकाशन करता चलता है। वह अपने पत्रों में औपचारिकता नहीं निभाता है। पत्र में जितनी ही सहजता-आत्मीयता होगी, वह उतना ही प्रभावोत्पादक होगा। पत्र-साहित्य लेखक साधारण पत्र लिखने वाले लोगों से भिन्न कोटि के पत्रों का लेखन करता है। उसके पत्रों में भाषा चिंतन तथा समझ में अंतर देखने को मिलता है। उसके पत्र नितांत व्यक्तिगत तथा सामाजिक दोनों रूप में मिलते हैं। व्यक्तिगत पत्रों का आधार साधारण लोग तथा सामाजिक पत्रों का आधार साहित्यिक बंधु-बांधव, शिष्ट, गणमान्य व्यक्ति हुआ करते हैं।
पत्र शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है। पत्र धातु में ष्ट्रन प्रत्यय जोडने से बना है। पत्र धातु का शाब्दिक अर्थ - गिरना है। अंग्रेजी में इसके लिए लेटर शब्द का चलन है। यह शब्द लैटिन भाषा के लिट्रा धातु से बना है जिसका अर्थ है वर्णमाला के अक्षर। हिन्दी के पत्र शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग दैनिक, साप्ताहिक, मासिक पत्रिका या पत्रों के लिए हुआ करता है। फिर अपने स्वजनों-परिजनों को लिखे गये पत्र भी पत्र के अंतर्गत आते हैं। आज भी साधारणतः पत्र सूचना के आदान-प्रदान के अर्थ में ग्रहण किया जाता है। किन्तु पत्र साहित्य का सम्बन्ध साहित्यिक समाज से है। इस प्रकार के साहित्यिक पत्रों पर विचार करते हुए बाबू गुलाब राय कहते हैं कि - पत्रों में भी वही बात है, जो प्रत्येक साहित्य में होती है। लेखक के हृदय में कुछ कहने के लिए उत्साह होता है और वह उस उत्साह या मन के रस को अपनी वाणी द्वारा दूसरों तक संक्रमित कर देता है। एक मनुष्य अपने मित्र को अपने व्यवहार की सफाई देता है। यदि वह ईमानदार है, यदि उसकी लेखनी में कुछ बल है और वह अपनी सफाई में सफल हो जाता है तो उसके पत्र साहित्य का रूप धारण कर लेते हैं।2 अर्थात् पत्र साहित्य हृदयगत भावों को बल प्रदान कर उसकी आत्मीयतापूर्ण अभिव्यक्ति कर देता है। इस संबंध में डॉ. हरिमोहन का विचार है कि - पत्र साहित्य की वह कथेतर प्रबन्धमुक्त गद्य विधा है, जिसमें किसी व्यक्ति के विचार, जीवन-अनुभव, दृष्टिकोण, घटनाओं और परिवेश के प्रति निजी प्रतित्रिज्या सहज रूप में व्यक्त की जाती है। व्यक्ति-व्यक्ति के मध्य संवाद का वह सर्वाधिक आत्मीय और विश्वसनीय माध्यम है।3 इस प्रकार पत्र-साहित्य साहित्यकारों के निजी जीवन की यथार्थ प्रस्तुति का एक सशक्त माध्यम भी है। इतना ही नहीं साहित्यकार द्वारा लिखे गये पत्र इतनी स्पष्टता के साथ लिखी जाती है कि उससे उसकी वैयक्तिकता सामने आने लगती है। पत्रों में लेखक के व्यक्तित्व के साथ-साथ उसकी सोच-समझ तथा आत्मकथा-व्यथा सब कुछ एक साथ प्रकाश में आ जाती है साथ-ही-साथ अपने स्वजन, मित्रों, साहित्यिक बन्धुओं के प्रति गहरे आत्मीय भाव छिपे रहते हैं जिसका प्रकाशन पत्रों द्वारा हो जाता है। रचनाकार के इस पत्र-साहित्य में सहजता तथा सरलता का समावेश इस प्रकार होता है कि मानो हमारे समक्ष इतने खुले रूप में देखने की हमारी इच्छा स्वतः साकार हो जाती है।
रेणु के समस्त पत्रों का संकलन चिट्ठिया हो तो हर कोई बाँचे 1999 में वाणी प्रकाशन नई दिल्ली द्वारा भारत यायावर ने संपादित किया है। इसमें पूर्णिया अंचल के लोगों के नाम 26 पत्र लिखे गये हैं एवं पूर्णिया जिले के बाहर लोगों के नाम 39 पत्र सम्मिलित हैं। इसके इतर भी रेणु ने बहुत सारे पत्र लिखे थे पर वह किसी कारणवश खोजीराम (भारत यायावर) को न मिल पाने के कारण प्रकाशित नहीं हो पाये हैं।
रेणु मूलतः गाँव के परिवेश में पले-बढे थे। इसलिए उन्होंने गाँव के परिवेश को देखा और जिया था। रेणु किसानी करते थे क्योंकि गाँव के लोगों की जीविका आम तौर पर खेती ही होती है। इसलिए रेणु को इन सब से अधिक प्यार था। गरीब किसान, मजदूर किस प्रकार संघर्ष करके अपने जीवन को व्यतीत करते थे, रेणु ने अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देखा और भोगा था। इसलिए रेणु के समस्त साहित्य लेखन में दबे-कुचले, मजदूर, किसान, समाज में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते निम्न एवं मध्यवर्ग के लोगों का आना लाजिमी है।
रेणु के पत्र व्यक्तिगत होते हुए भी औरों के बारे में बोलते हैं। पत्रों से उनकी विचारधारा के साथ-साथ उनके परिवेश, सोच-समझ, उस समय की स्थिति आदि का पता चल जाता है। रेणु के पत्रों में उनके जीवन के साथ-साथ उनके साहित्य एवं रुचि को भी समझने में सहायता मिलेगी। इस पर भारत यायावर जी कहते हैं कि - कहना न होगा, रेणु के पत्रों में उनके जीवन के कई संस्मरण, उनके कार्यों की सूची, उनकी मनःस्थिति, उनका परिवार, गाँव-घर, मित्र, लेखन कार्यों का ब्यौरा आदि-आदि भरा पडा है। इन पत्रों के द्वारा जीते-जागते, बोलते-बतियाते रेणु को हम देखते हैं - एक पारदर्शी व्यक्तित्व-सरल, तरल, आत्मीय। बेलाग और ठोस बातें करता हुआ।4 इतना ही नहीं रेणु जी ने अपनी खेती के साथ-साथ स्वास्थ्य एवं अपने साहित्य की भी बातें अपने पत्रों में की है। उन्होंने पत्रों में अपने मित्रों, भाई, ससुर, गुरु आदि को पत्र लिखा है। इसके साथ ही साथ साहित्यिक मित्रों डॉक्टर, राष्ट्रपति, राज्यपाल, पत्नी आदि के नामों से भी पत्र संगृहीत हैं इस संकलन में।
रेणु का सम्बन्ध चूँकि साहित्य की दुनिया से अधिक था। इसलिए उनके पात्रों में साहित्यिक समाज अपनी विविधता के साथ उपस्थित होता दिखाई देता है। उन्होंने साहित्यकारों तथा उनसे जुडी विभिन्न घटनाओं से अपने पत्रों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। अपने पत्रों के माध्यम से वे साहित्यिक समाज की तस्वीर आँक देते हैं। इन साहित्यकारों में नागार्जुन, उपेन्द्रनाथ अश्क, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, जय प्रकाश नारायण आदि जैसे साहित्यकारों को पत्र लिखकर उनके प्रति गहरी आंतरिकता व्यक्त की है। विविध विषयों पर उनसे विचार विमर्श किया है। नागार्जुन के नाम पत्र उन्होंने मैथिली भाषा में लिखकर वैयक्तिक जीवन के गहरे भावों को अभिव्यक्त किया है। वे उन्हें गाँव के बारे में बताते हुए कहते हैं कि - रौ हम भी छौं माटिक घैल। गरों में फँसरफन्नी वान्हि के कूप में हम ऐल छी। हमरो विश्वास अछि जे हम जीवन भरि लेल ऐने छी। माटिक घैल - तँह से विष रस भरे केर कोनो संदेह करन-मूर्खता।5 मधुकर गंगाधर के नाम पत्र में उन्होंने अपनी बीमारी की बात कहकर उसके साथ चलने वाले साहित्यिक कर्म का वर्णन किया है। जीवन के कडवे-मीठे क्षणों की अभिव्यक्ति भी पत्र में हुई है। उनसे अपनी गहरी आत्मीयता व्यक्त करते हुए कहते हैं कि - समर्थ कलाकार हो, इस हेतु भी मुझे कहना है, मुझे बडा भाई मत बनाओ - बंधु ठीक है।6 इस प्रकार अपने जीवन से जुडी विभिन्न घटनाओं का भी बडी अंतरंगता के साथ उल्लेख करते हैं। जानकी जीवन के नाम पत्र में उन्होंने मैला आँचल की पाण्डुलिपि टाइप करने के कारण उनके प्रति सम्मान व्यक्त किया है। वे कहते हैं - भाई जानकी जीवन जी, बधाई स्वीकार कीजिये। हाँ, ‘मैला आँचल’ के सम्मान में हम दोनों का ही हिस्सा है, मैं कहूँ थोडा बहुत नहीं, एकदम बराबर।7 अश्क जी के नाम पत्र में संकेत पत्रिका की चर्चा तथा उनके साहित्यिक कर्म की सराहना की गयी है। रमण के नाम पत्र में उनके प्रति विरोध के भावों की अभिव्यक्ति उन्होंने इस ढंग से की है कि वास्तविक दृश्य उभरकर सामने आ जाते हैं। वाचस्पति पाठक किशोरी बेचन आदि रचनाकारों के नाम पत्र में उन्होंने सहज ढंग से अपने साहित्यिक कर्म तथा उनकी प्रगतिशीलता को उभारा है। नामवर सिंह के नाम उनके पत्र, कितने चौराहे के दूसरे संस्करण में छप जाने की विवशता प्रकट करने के लिए लिखे गये हैं। वे उनसे माफी माँगते हुए कहते हैं कि - मुझे यकीन है कि जब आप मेरी मजबूरियों का किस्सा सुनेंगे तो आप इस खता के लिए मुझे माफ कर देंगे।8 श्रीमती लतिका रेणु के नाम उनके पत्र जीवनगत प्रेम को उद्घाटित कर देते हैं। वे उनसे कहते हैं - तुम अगर नहीं होती, तो मेरे लिए कुछ भी करना संभव नहीं होता। तुम्हारे ही पुण्य-प्रताप से मेरा सारा कार्य पलक झपकते हो जाता है।9 अपने पत्रों के माध्यम से वे साहित्यिक समाज की तस्वीर आँक देते हैं। वे भगवतशरण उपाध्याय के शब्दों को व्यक्त करते हुए कहते हैं- प्रयाग हिन्दी-साहित्यकारों का अखाडा समझा जाता है - नये तथा पुराने लेखकों का विशाल झुण्ड वास करता है यहाँ। इनकी अलग-अलग छोटी बडी संस्थाएँ हैं - परिमल, साहित्यिकी, झंकार, पराग, मिलन आदि-आदि। सबों को आश्चर्य हुआ कि बिना यह पूछे कि अमुक संस्था या व्यक्ति किस राजनीतिक दल का है, रेणु जी सबों के यहाँ मुक्त हृदय से गये, गोष्ठियों में भाग लिया। आने के दिन सरस्वती प्रेस (श्रीपतराय) के यहाँ जमावडा था- प्रोग्रेसिवों (कम्युनिस्ट पार्टी वाले) ने कहा - रेणुजी की कृति तथा उनके प्रयाग आगमन के बाद हम यह सोचने को मजबूर हो गये कि ऐसे साहित्य की रचना संभव है, जिसे सभी दल वाले एक स्वर से स्वीकार करें।10 साहित्यिक समाज में रेणु का स्थान अत्यन्त ही गौरवपूर्ण था। वे समस्त जडताओं, पतनगामी स्थितियों तथा राजनीतिक जकडबंदी से मुक्त होकर एक सुव्यवस्थित तथा विकसित साहित्यिक समाज की स्थापना पर बल देते हैं। रेणु के मन में सदैव साहित्यिक समाज घर कर बैठा था। वे अपने अंतरंग परिचित व्यक्तियों को साहित्य की बातें बताए बिना रह ही नहीं पाते थे। यही कारण है कि अपनी पत्नी श्रीमती लतिका रेणु से अंतरंग बातों के बताने के क्रम में वे साहित्य की बातें करना नहीं भूलते हैं। वे कहते हैं - कलकत्ता सम्मेलन में नागार्जुन भी आये थे। लेकिन वहाँ के लोग तुम्हारे जाजी रेणु को इतना चाहते हैं कि मुझे पैंसठ मिनट तक बोलना पडा। मेरी टूटी-फूटी और गलत बांग्ला उन्हें इतनी अच्छी लगी कि मेरे अपने वक्तव्य को छोटा करने की कोशिश पर वे समवेत स्वर से बार-बार कहते रहे आप जारी रखिए और कहिए आदि। उनके जीवंत सहज व्यवहार को मैं सारा जीवन भूल नहीं सकूँगा।11 उन्होंने समाज को साहित्य तथा सामान्य संसार दोनों से जोडे रखा। उनके हृदय में बसा साहित्यिक समाज, सामान्य मानवीय संसार से कहीं भी परे हटकर नहीं आता है। वे समाजगत विशिष्टताओं से युक्त होकर उनसे अपना गहरा लगाव व्यक्त करते हैं।
हमारे समाज में जाति और वर्णगत बंधन काफी जकडे हुए हैं। यहाँ का समाज धर्मनिरपेक्षता की भावना पर बल देता है फिर भी लोग क्षुद्र स्वार्थ हेतु इस मजबूत आधारशिला की अनदेखी करते चलते हैं। वर्णगत वैविध्य के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार राजनेता तथा सत्ताधारी लोग ही हुआ करते हैं। इन्हीं वैषम्यों को बढाने वाले लोगों पर रेणु ने अपने पत्रों में व्यंग्य किया है ताकि इनकी वास्तविक छवि उभरकर सामने आ सके। वे कहते हैं कि - दलित से लेकर सवर्ण की नकेल जिस पार्टी के हाथ में है, उसके स्थानीय नेताजी के बडे नेता ने भी, जो थाना के नेता हैं - शायद अपनी सिलहुल छवि देखी कहीं मेरी रचना में।12 समाज के नेताओं की छवि दिखलाकर उन पर करारा प्रहार करने से भी नहीं चूकते थे। हमारा समाज गतिशील तथा उच्च भावनाओं को प्रश्रय प्रदान करता है। हम दूसरे के द्वारा किये गए अच्छे कार्य की प्रशंसा बडे ही मुक्तकंठ एवं हृदय से करते हैं। रेणु जी के पत्रों में हमारे समाज की इस छवि के दर्शन होते हैं। वे चेर्निशोव के नाम लिखे गये अपने पत्र में कहते हैं - शिक्षक मिलते ही मैं रूसी भाषा पढना शुरू कर दूँगा। महान देश की भाषा की महत्ता मुझे मोह रही है। पत्र लिखते समय बार-बार मन में एक तीखा दर्द होता है -अब तक आपको मेरा कोई पत्र नहीं मिला। आप क्या-क्या सोच रहे होंगे। मुझे क्षमा करें।13 हमारे समाज में इस प्रकार की गलती के लिए क्षमा माँगने की प्रवृत्ति का प्रचलन है, जो उसकी उच्चता को सूचित करता है।
इस प्रकार रेणु जी के पत्रों में किसी भी प्रकार की अमानवीयता तथा असामाजिकता के कार्य की खुली भर्त्सना की है। उनके पत्र जीवनगत विविधताओं को समेटकर उनकी यथार्थ अभिव्यक्ति करते हैं। इनका महत्त्व अध्ययन के पश्चात् ही समझा जा सकता है। रेणु के पत्रों द्वारा जीवन को समझने की नयी दृष्टि विकसित होती है।
संदर्भ सूची
1. हाडा, माधव (सं.), कथेतर, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली-2017, पृ.202
2. राय, बाबू, गुलाब, काव्य के रूप, प्रतिभा प्रकाशन, दिल्ली-1950, पृ.262
3. डॉ. हरिमोहन, साहित्यिक विधाएँ : पुनर्विचार, वाणी प्रकाशन-2019, पृ.268
4. यायावर, भारत, (संकलन-संपादन), चिट्ठिया हो तो हर कोई बाँचे, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली-1999, पृ.23
5. वही, पृ.129
6. वही, पृ.135
7. वही, पृ.136
8. वही, पृ.151
9. वही, पृ.181
10. वही, पृ.133
11. वही, पृ.183
12. वही, पृ.142
13. वही, पृ.152

सम्पर्क - अध्यक्ष, हिन्दी विभाग
एसोसिएट प्रोफेसर, रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय
56ए, बी.टी. रोड, कोलकाता-700050
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