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रेणु की पत्रकारिता

राकेश रेणु
पत्रकारिता और साहित्य ने हमेशा एक-दूसरे को पुष्ट किया है। जब कभी साहित्यकार ने पत्रकारिता की तो उसकी पत्रकारी भाषा में भी अलग किस्म की रवानगी आई, उसमें मानवीय संवेदनाओं का विस्तार हुआ और वह ज्यादा मनुष्योचित बनी। वहीं जब किसी पत्रकार ने साहित्य सृजन की ओर कदम बढाए तो उसकी साहित्यिक रचना में विश्वसनीयता, तार्किकता और तथ्यपरकता का विस्तार हुआ, उनकी गहरी पैठ बनी। समाचार पत्र-पत्रिकाओं के प्रबंधन ने हालाँकि पत्रकार के साहित्य की ओर प्रवृत्त होने का कभी स्वागत नहीं किया। अखबारों के प्रबंधकों की हमेशा कोशिश रही कि साहित्यकारों को पत्रकारिता के लिए न रखा जाए लेकिन हम अपने अनुभव से जानते हैं कि जब तक पत्रकारिता की बागडोर साहित्यकारों के हाथ में रही उनकी पत्रकारिता बेहतर, विश्वसनीय और जमीनी बनी रही।
जब हम फणीश्वरनाथ रेणु की पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य में आवाजाही की बात करते हैं तो दोनों ही जगहों पर मानवीयता और विश्वसनीयता का समावेश होता देखते हैं। रेणु के कथा-कौशल के बारे में बहुत कुछ कहा गया है किंतु वे किसी एक या दो विधाओं तक सीमित नहीं रहे। कहानी, उपन्यास और पत्रकारिता के अतिरिक्त वे कविता, संस्मरण, रेखाचित्र, निबंध आदि अनेक विधाओं को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हैं। मेरी दृष्टि में वे बुनियादी रूप से एक सजग-संवेदनशील पत्रकार थे। जीवनपर्यंत उन्होंने पत्रकारिता की। भले उसके रूप अलग-अलग रहे हों। उनका जो साहित्य है उसका बहुलांश पत्रकारिता का विस्तार है। पत्रकारिता का रचनात्मक और सकारात्मक पक्ष वहाँ तक देखा जा सकता है। कहना चाहिए कि उनका समग्र साहित्य एक स्तर पर उत्कृष्ट गुणवत्ता वाली पत्रकारिता ही है, जहाँ पत्रकारी लेखन साहित्यिक कथा का स्तर हासिल कर लेता है और साथ ही पत्रकारिता के तथ्यपरक और यथार्थ-कथन होने के गुणों को भी अक्षत बनाए रखता है। कहना न होगा कि पत्रकारिता ने रेणु के साहित्य को पुष्ट किया और उनके साहित्य ने उनकी पत्रकारिता को समृद्धि प्रदान की।
दूसरे स्तर पर देखें तो बुनियादी रूप से सभी सर्जनात्मक विधाएँ परस्पर जुडी होती हैं और अलग-अलग स्तर पर अलग-अलग रूपों में प्रकट होने के बावजूद अनुभूति की एक साझा डोर उन्हें सूत्रबद्ध किए रखती है। एक ही अनुभूति को विभिन्न रचनाकार अलहदा सर्जनात्मक माध्यम के मार्फत प्रकट करते हैं। लुकाच कहते हैं कि कथ्य अपना फॉर्म खुद चुन लेता है, उसके साथ उपस्थित होता है। इसलिए अनेक रचनाकार अलग-अलग विधाओं में आवाजाही करते रहते हैं क्योंकि उनके अलग-अलग कथ्य अलग-अलग फॉर्म की माँग करते हैं। रचनाकार कई बार एक ही अनुभव को विभिन्न विधाओं में प्रकट करता है मानो पहली विधा की रचना में उसे वह इच्छित अभिव्यक्ति और संतुष्टि न मिली हो जिसकी उसे तलाश है और जिसकी तलाश में वह दूसरी विधा की ओर उन्मुख हुआ है।
रेणु की रचना-यात्रा को देखें तो पता चलता है कि उनकी लोकप्रियता कथाकार के रूप में भले रही किंतु अपनी मूल प्रकृति में वे एक सजग-संवेदनशील पत्रकार थे। उन्होंने अलग-अलग समय में कई पत्र-पत्रिकाओं का संपादन-प्रकाशन किया। इनमें से पहला था पूर्णिया से प्रकाशित होने वाला साप्ताहिक नई दिशा और दूसरा, जब वे पटना में रहने लगे थे तो नया कदम नाम से निकलने वाली पत्रिका। पूर्णिया से प्रकाशित होने वाला साप्ताहिक सन् 1949 से 1950 तक लगभग एक वर्ष निकला। इसके संयोजन के लिए रेणु को पर्याप्त बौद्धिक श्रम करना पडता। अखबार के लिए प्राप्त सामग्री स्तरीय न लगती तो भी रेणु उसे प्रकाशित करते लेकिन लगभग पूरी तरह री-राइट कर। पत्र में कई रोचक स्तंभ थे जिनमें से ज्यादातर रेणु स्वयं लिखते। इनमें एक का शीर्षक था, चतुर्थ लोक की चिट्ठी। इस स्तंभ के अंतर्गत प्रकाशित एक रोचक लेख कलाली का किल्लोल शीर्षक से रेणु रचनावली के चौथे खंड में संकलित है। इस अखबार के ज्यादातर अंक लुप्तप्राय हैं। रेणु-विशेषज्ञ भारत यायावर बताते हैं कि उन्हें इसके मात्र दो अंक एक सुहृदय पाठक के पास मिले। उनमें से एक 1949 में 9 अगस्त के अवसर पर प्रकाशित विशेषांक था। इस विशेषांक का संपादकीय ओ लाल आफताब शीर्षक से रेणु रचनावली के पाँचवें खंड में संकलित किया गया है। इसी विशेषांक में प्रकाशित रेणुजी की कहानी धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे शीर्षक से रचनावली के चौथे खंड में संकलित है।
फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा संपादित नया कदम नाम की एक अन्य पत्रिका नेपाली राज्य ऋांति के उपरांत पटना से हिंदी और नेपाली में एक साथ प्रकाशित की गई। इसकी वित्त व्यवस्था बीपी कोइराला ने की थी। इसके कुल चार-पाँच अंक ही निकले लेकिन प्रायः सभी लुप्तप्राय हैं। इस पत्रिका की चर्चा रेणु अपने आत्मकथ्य मंय करते हैं। नया कदम का प्रकाशन सन् 1952 में हुआ और उसी वर्ष यह काल-कवलित हो गई। मैला आँचल के लेखन में आ रही बाधा को दूर करने की गरज से रेणुजी ने इसका संपादन छोड दिया।
वर्ष 1954 से 1956 के दौरान उन्होंने पटना से ही प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक आवाज में कई रिपोर्ताज लिखे। सातवें दशक में इसकी आवृत्ति बदल इसे दैनिक समाचार पत्र बना दिया गया। रेणुजी की लोकप्रियता उस समय चरम पर थी। उन्हें इसका संपादक नियुक्त किया गया। इस दौरान अखबार का संपादकीय उन्होंने ही लिखा।
सन् 1965 में बैनेट एंड कोलमैन ने दिनमान का प्रकाशन आरंभ किया। दिनमान के प्रकाशन को हिन्दी पत्रकारिता के एक मुकाम के तौर पर याद किया जाता है। अज्ञेय इसके पहले संपादक थे। अज्ञेय कहीं न कहीं रेणु की पत्रकारिता, खासकर उनके कथा-रिपोर्ताजों से प्रभावित थे। उन्होंने रेणु को बिहार का प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया। यह अवधि, 1965 से 1967 के बीच की, बिहार के लिए अभूतपूर्व उथल-पुथल की अवधि थी। इस दौरान राज्य में सूखा और अकाल जैसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण उत्पन्न अन्न का अभाव और भुखमरी आमजन में असंतोष की वजह बने। उन्होंने राजनीतिक स्तर पर सत्ताधारी दल में भीतरघात, विधानसभा में आरोप-प्रत्यारोप के साथ-साथ हाथापाई, भाषाई विद्वेष फैलाने वाली गतिविधियों आदि सब पर खुलकर दो-टूक लिखा। पत्रकार रेणु के लिए कोई अपना-पराया न था। पत्रकार के रूप में उन्होंने किसी को बख्शा नहीं। आमतौर पर समाचार पत्र-पत्रिकाओं में जिस आधार पर साहित्यकारों को बतौर पत्रकार रखने से गुरेज किया जाता है, उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता का आधार, उसके मौजूद होने के बावजूद, रेणु ने अपनी पत्रकारिता में उसे बाधक नहीं बनने दिया। जरूरत पडने पर उन्होंने सोशलिस्ट पार्टी के खिलाफ भी लिखा। दिनमान के लिए वे 1975 तक लिखते रहे लेकिन 1967 में अज्ञेय के जाने के बाद वे इसके नियमित संवाददाता नहीं रह गए थे। 1965-67 के दौरान दिनमान के नियमित संवाददाता के रूप में लिखे उनके रिपोर्ताज एकांकी के दृश्य में संकलित हैं।
लोक और संगीत हमेशा रेणु की पत्रकारिता और कथाभूमि की बुनियाद में रहा है, प्राणवायु की तरह उनमें विन्यस्त रहा है, उन्हें अद्भुत प्रवाह और गति प्रदान करते हुए। रेणु कथा भाषा और पत्रकारी लेखन की भाषा - रिपोर्ताजों की भाषा में फर्क नहीं करते। इसीलिए मैंने ऊपर कहा कि दोनों विधाएँ एक-दूसरे में आवाजाही करती हैं। उनके रिपोर्ताजों में कथा का अद्भुत प्रवाह है और कहानियों एवं उपन्यासों में खबरों वाली तथ्यपरकता और विश्वसनीयता। कथा के साथ खबरों और रिपोर्ताजों की अंतरंगता ही शायद वह कारक है जिसकी वजह से रेणु अपने सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास मैला आँचल का आरंभ एक खबर से करते हैं। यह भी महज संयोग नहीं कि उनकी पहली कहानी और पहले रिपोर्ताज का प्रकाशन आसपास ही हुआ। उनकी पहली कहानी बटबाबा जहाँ जुलाई 1944 में प्रकाशित हुई वहीं उनका पहला रिपोर्ताज बिदापत नाच सन् 1945 के अगस्त में कोलकाता से प्रकाशित होने वाले उसी साप्ताहिक विश्वमित्र में प्रकाशित हुआ।
आम धारणा है कि रिपोर्ताजों की शुरुआत द्वितीय विश्वयुद्ध से हुई। स्वयं रेणु ऐसा मानते हैं। रिपोर्ताजों की उत्पत्ति के बारे में रेणु कहते हैं कि गत महायुद्ध ने चिकित्सा शास्त्र के चीर-फाड (शल्यत्रिज्या) विभाग को पेनसिलिन दिया और साहित्य के कथा विभाग को रिपोर्ताज! (रेणु रचनावली, खंड 4, पृ.9)। लेकिन यदि हम पीछे पलट कर देखें तो हिंदी में भारतेंदु युग में ही रिपोर्ताज लेखन की शुरुआत हो चुकी थी। स्वयं भारतेंदु ने अपनी पत्रिका हरिश्चंद्र चंद्रिका के जनवरी 1877 ई. के अंक में दिल्ली दरबार दर्पण नामक जो वृत्तांत लिखा उसे ही पहला रिपोर्ताज माना जाना चाहिए। इसमें दिल्ली दरबार का विस्तारपूर्वक वर्णन है जो क्वीन विक्टोरिया के भारत साम्राज्ञी की पदवी धारण करने के उपलक्ष में आयोजित की गई थी। रिपोर्ताज की इस परंपरा को चंडी प्रसाद सिंह ने सन् 1886 में युवराज की यात्रा लिखकर और उसके बाद महात्मा गांधी ने सन् 1896 में दक्षिण अफ्रीकावासी ब्रिटिश भारतीयों की कष्टगाथा : भारत की जनता से एक अपील नामक पुस्तिका लिखकर आगे बढाया (फणीश्वरनाथ रेणु के रिपोर्ताज, ले भारत यायावर, पृष्ठ 13-15)। शिवदान सिंह चौहान, रांगेय राघव, अमृतलाल नागर और उपेंद्र नाथ अश्क आदि ने न केवल इस विधा में भरपूर लेखन किया बल्कि इसे और संवारा, परिष्कृत किया।
वस्तुतः रेणु केवल कथाकार नहीं थे, न ही मात्र पत्रकार। इन सबके साथ-साथ वे एक सजग, संवेदनशील और सतर्क सामाजिक कार्यकर्ता थे- सामाजिक हलचल से आंदोलित होने वाले राजनीतिक चेतना-संपन्न नागरिक। इसीलिए ब्रिटिश भारत में भी अपने छात्र-जीवन में उन्होंने स्कूल में विरोध का परचम लहराया, स्कूल से निकाले गए, फिर भी मौका मिलने पर कभी गाँव के युवकों, कभी किसानों को जगाने का काम करते रहे। उन्होंने अपने लिए हमेशा एक राजनीतिक कार्यकर्ता की भूमिका तय कर रखी थी। इसलिए भारत की आजादी और आजाद भारत में नागरिकों की वास्तविक स्वतंत्रता के लिए चले संघर्ष में उन्होंने बढ-चढ कर भाग लिया। इसके अलावा उन्होंने नेपाल के मुक्ति संघर्ष ने भी शिरकत की। वहाँ रेडियो स्टेशन चलाया। गोलियाँ भी चलाई और उन सब को दर्ज करते चले जो पहले साप्ताहिक पत्र जनता में हिल रहा हिमालय नाम से और आगे चलकर संशोधन-परिवर्धन के उपरांत नेपाली कांति कथा नाम से दिनमान में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रकाशित हुआ और फिर पुस्तक रूप में भी।
रेणु के रिपोर्ताज आँखों-देखे और कानों-सुने हैं। केवल रेणु के ही क्यों, किसी भी रिपोर्ताज को ऐसा ही होना चाहिए। किंतु जब लोक में बसा एक विवेकशील कथाकार, पत्रकार की भूमिका में सामने आता है तो उसके पत्रकारी लेखन में भी उसकी लोकभाषा, गीतात्मकता, मुहावरे और अर्थ-व्यंजनाएँ शामिल होती हैं। वह किस्सागोई और हास्ययुक्त व्यंग्य शामिल हो जाता है जो लोकभाषा का खास गुण है। रेणु के रिपोर्ताजों की यह खासियत है। इनकी बदौलत उनमें अद्भुत प्रवाह का सृजन होता है। उन्हें पढते हुए पाठक बेचैन होने की हद तक आंदोलित हो उठता है।
रेणु का शुरू से सोशलिस्ट विचारधारा से जुडाव था। सन् 1946 में जब पटना से सोशलिस्ट पार्टी के मुखपत्र जनता का प्रकाशन आरंभ हुआ तो उन्होंने उसके लिए भी नियमित रूप से रिपोर्टिंग की। उनके रिपोर्ताज वहाँ प्रकाशित होते रहे। कहते हैं कि उन्होंने अपने नाम के अलावा अन्य कार्यकर्ताओं के नाम से भी इस पत्र में लिखा। जनता में बाढ पर जै गंगा एवं डायन कोसी, अकाल पर हड्डियों का पुल और नेपाल पर धारावाहिक रिपोर्ताज हिल रहा हिमालय के अतिरिक्त डालमियानगर के मील मजदूरों की हडताल पर लिखा गया उनका रिपोर्ताज घोडे की टाप पर लोहे की रामधुन प्रकाशित हुए। उन्होंने विभिन्न अन्य पत्र-पत्रिकाओं के लिए भी रिपोर्टिंग की।
रेणु जिस परिवेश की कथा कह रहे होते अथवा जिस परिवेश के रिपोर्ट लिख रहे होते उसकी जमीन उनकी अपनी जमीन थी, उसमें वे गहराई तक धँसे हुए थे, उसकी पीडा, राग-विराग, संवेदनाएँ रेणु की निजी संवेदनाएँ थी, उसका अनुभव रेणु का अनुभव था, उसके सुख-दुख रेणु के सुख-दुख थे। इसलिए जब वह उसे व्यक्त करते थे तो उस जनजीवन के सारे चित्र मुखरित होते थे, उनकी उद्दाम जिजीविषा मुखरित हो उठती थी। उनके लेखन में न केवल कथा भूमि की जीवंत धडकन सुनी जा सकती है बल्कि संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर उनकी गहरी समझ और आंतरिकता की अभिव्यक्ति भी देखी जा सकती है। बेचैन और विह्वल कर देने वाली वह भाषा और अभिव्यक्ति जमीन से जुडे और उसमें धंसे बगैर संभव नहीं है।
कहने की जरूरत नहीं कि रेणु अपनी तरह के अनूठे पत्रकार थे। उनकी पत्रकारिता ने उनकी कथा-भूमि को मजबूती दी, उसे विस्तार और विश्वसनीयता प्रदान की। इसी तरह उनके रिपोर्ताजों के पीछे एक कथाकार बैठा हुआ था, जिसने उनके पत्रकार को त्वरा प्रदान की। निश्चय ही दोनों ही एक-दूसरे से पुष्ट हुए होंगे। वह विचार जो एक तरह से निष्कर्ष बन जाता है, अनायास और निराधार नहीं है। इस तरह हम देखते हैं कि पत्रकारिता में जब-जब साहित्यकार आए, पत्रकारिता को मजबूती हासिल हुई।
रेणु के पहले रिपोर्ताज बिदापत नाच को प्रकाशित करते हुए विश्वमित्र के संपादक ने इसे रिपोर्ताज नहीं कहा, रपट भी नहीं कहा, लेख कहा। इसे प्रकाशित करते हुए संपादक ने प्रारंभ में अपनी एक छोटी-सी टिप्पणी लिखी है, जो इस प्रकार है- मैथिल-कोकिल कवि-सम्राट् विद्यापति के सरस गीतों को दरभंगा, भागलपुर और पूर्णिया जिले की निम्न श्रेणी की ग्रामीण जनता किस प्रकार भाव-नाट्य का रूप देकर सजीव बनाती और मनोरंजन करती है, इसका बडा ही सुंदर वर्णन इस लेख में किया गया है। आर्ट, तकनीक और ड्रामा से अनभिज्ञ जनता उन गीतों को कितना उच्च कलात्मक रूप दे सकती है, पाठक इस लेख को पढकर स्वयं समझ सकते हैं। किंतु यह रपट मात्र नहीं था, पर लेख भी नहीं था जैसाकि विश्वमित्र के संपादक ने कहा था। इसका रचना-विन्यास इन दोनों से सर्वथा अलग था जो पत्रकारी लेखन को साहित्यिक उत्कर्ष देता है। इससे जाहिर है कि भारतेंदु युग में वृत्तांत अथवा रिपोर्ताज लेखन की शुरुआत के बावजूद यह रेणु से पहले लोकप्रिय विधा नहीं थी। हिंदी में इसे लोकप्रिय और स्वीकृत बनाने का काम फणीश्वरनाथ रेणु ने ही किया।
बिदापत नाच मिथिलांचल के दलित और निम्न तबके के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाली विधा है। इसके कलाकारों को विद्यापति के गीत जुबानी याद होते थे और वे उनमें समय-काल और परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन कर हास्य और व्यंग्य का रोचक और भावपूर्ण पुट जोडते। अपनी पीडा तथा जीवन और समाज की विसंगतियों को व्यक्त करते। रेणु के इस रिपोर्ताज में नाच की वास्तविक प्रस्तुति के दौरान उत्पन्न होने वाला प्रभाव कम नहीं होता। जिन लोगों ने बिदापत नाच पढा है, रेणुजी के लिखे रिपोर्ताज पढे हैं, वे जानते है कि पाठक उसे अपने सामने अभिनीत होता हुआ देख रहा होता है।
दुनिया की अनेक दूसरी भाषाओं में रिपोर्ताज लिखे जाते रहे हैं। पत्रकारिता को साहित्यिक और सर्जनात्मक उत्कर्ष देने वाले इसी तरह के लेखन के लिए हाल के वर्षों में, 2015 में, बेलारूसी पत्रकार और लेखिका स्वेतलाना अलेक्सीविच को साहित्य के नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उन्हें वार्स अनवूमनली फेस नाम की कृति के लिए दिया गया जो द्वितीय विश्वयुद्ध में शामिल और उससे पीडित स्त्रियों से बातचीत और उनके अनुभवों पर आधारित है।
रिपोर्ताज लिखने के लिए एक तरह की फक्कड, घुमक्कड यायावरी और संवेदनशील मन संभवतः आवश्यक शर्तें हैं। ये दोनों तत्त्व रेणु के स्वभाव का हिस्सा थे लेकिन हिन्दी में वे पहले घुमक्कड साहित्यकार नहीं थे। राहुलजी ने उनसे काफी ज्यादा भ्रमण किया किन्तु उन्होंने रिपोर्ताज नहीं लिखे।
रेणु को गाँव से और वहाँ के जीवन से गहरा लगाव था। वे चाहते थे कि तमाम असंगतियों-विसंगतियों, राग-द्वेष, गरीबी, जहालत के बावजूद इस लोक-जीवन का विघटन न हो, गांव के लोगों का शहर की ओर पलायन न हो किंतु धीरे-धीरे यह विघटन और पलायन बढता ही गया। रेणु के रिपोर्ताज इसके कारकों की पडताल करते हैं। वे बेहतरी की आकाँक्षा को अभिव्यक्त करते हैं। अपने ट्रीटमेंट में वे जितने आंचलिक हैं उससे कहीं ज्यादा राष्ट्रीय। कहना चाहिए कि आँचलिक समस्याओं और जीवन को रेणु राष्ट्रीय बना देते हैं। उनकी स्थानीयता पूरे देश में व्याप्त होती है। इसलिए इनका साहित्यिक महत्त्व होने के साथ-साथ समाजशास्त्रीय महत्त्व भी है। समाजशास्त्रीय विश्लेषण के बगैर रेणु की पत्रकारिता और उनके रिपोर्ताजों का महत्त्व समझना कठिन है।
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