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रेणु की कहानियाँ : सन्दर्भ और सरोकार

अंकिता तिवारी
लगभग तीस वर्षों के रचनात्मक जीवन में साहित्य जगत् की तमाम हलचलों से गुजरते हुए रेणु ने किसी वाद या आन्दोलन विशेष से जुडे बिना हिन्दी कहानी को एक नया आयाम दिया। बतरस की उम्मीद से भरी इन कहानियों को पढते हुए आपका सामना एक ऐसे सहज जीवन से होता है जो बिलकुल होने जैसा है। रेणु की कहानियाँ किसी तरह के विलक्षण-बोध से खुद को बरकाती हुई अनुभव की ठेठ जमीन तलाशती हैं । अपने समय के प्रचलित आदर्शवाद से अलग राह बनाती इन कहानियों में एक ऐसा यथार्थबोध है जो कटु होने की हद तक नहीं पहुँचता और अतिरिक्त मिठास तो वैसे भी इनका रचना-धर्म नहीं। इन कहानियों में लोक-संस्कृति और लोक जीवन की अनेकानेक छवियाँ तो हैं ही; प्रेम,गार्हस्थ्य और स्त्री-संवेदना के कई रूप मौजूद हैं । राजनीतिक परिदृश्य, सामाजिक असमानता और शोषण के कई रूप यहाँ गुंथे हुए हैं। निश्चय ही रेणु की कहानियाँ आँचलिकता के विशेष खांचे से बाहर निकलकर एक बडे फलक से देखे जाने की अधिकारी हैं ।
रेणु के गाँव : आदर्श बनाम यथार्थ
रेणु की कहानियाँ गाँव की बोली-बानी, आचार-विचार, लोक-लय, संस्कृति का एक ऐसा कोलाज हैं कि उन्हें जितनी बार भी पढा जाए, उनमें हर बार नए रूपाकार और नए रंग संयोजन उभरने लगते हैं। गाँव की अपनी एक अक्खडता और ठसक होती है जिसे रेणु की कहानियों में हम पूरी शिद्दत के साथ महसूस कर सकते हैं। वहाँ के वातावरण की निर्मिति प्रकृति के नैसर्गिक विहार से होती है। वहाँ की फसलें, खेत, हरियाली श्रम-सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं। रेणु का कथाकार ग्रामीण परिवेश में अपने पूरे राग-रंग के साथ उपस्थित होता है। ये खेत ही धरती की कोख हैं जिससे अन्न उपजता है और सबका पेट भरता है। सब्जी की क्यारियाँ, धान के पाट, आम के बगीचे ये सब धरती की उर्वरा शक्ति के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, साथ ही इस पूरे जीवन-जगत् के प्राणदाता हैं। कुदरत के व्यापार यहाँ उन्मुक्त रूप से दिखाई देते हैं। अपने हाथों रोपा गया बीज जब विकसित होकर पत्ती, फल, फूल में रूपान्तरित होने लगता है उसे देखने का सुख कुछ वैसा ही है जैसे अपने जने बच्चे को बूँद-बूँद बढते देखना। रेणु की कहानियाँ कृषि-सौंदर्य को अपने भीतर संजोये हुए हैं। एक आदिम रात्रि की महक में धान की बालियाँ अभी फटकर निकली नहीं हैं जबकि लाल पान की बेगम में बिरजू के खेतों में धान की बालियाँ ललियाने लगी हैं, जिसका पंचसीस तोडते समय उसकी उँगलियाँ काँप रही थी। गाँव की ताजगी और शुद्ध हवा की मनमोहकता इन कहानियों को पढते समय पाठकों को निश्चित रूप से अन्दर तक छू जाती है। तीसरी कसम में खेतों के किनारे से गुजरते हुए जिस सुगंध को हिरामन महसूस करता है उससे पाठक भी अछूता नहीं रहता, नदी के किनारे घने खेतों से फूले हुए धान के पौधों की पवनिया गंध आती है । पर्व पावन के दिन गाँव में ऐसी ही सुगंध फैली रहती है। विघटन के क्षण कहानी में गाँव का मनमोहक दृश्य आकर्षित करता है, एक चदरी भर सरदी पड गयी। अगहनी धान के खेतों में अब हलकी लाली दौड गयी है अर्थात् अब दानों में दूध सूख रहा है। आलू के पौधों में पत्तियाँ लग गयी हैं। सुबह-सुबह गोभी की सिंचाई कर रहे हैं सभी।
गाँव में मनाये जाने वाले पर्व-त्योहार वहाँ की विशेष पहचान होते हैं। विघटन के क्षण कहानी की शुरुआत ही रानीडिह की कुमारियों द्वारा मनाये गए शामा चकेवा पर्व से होती है। इसमें श्यामा, चकवा, खजन, बटेर, चाहा, पनकौआ, हास, बनहास, अदंगा, लालसर, पनकौडी , जलपरेवा से लेकर कीट पतंगों में भुनगा, भेम्हा, अंखफोडवा, गंधी, गोबरैला तक की मिट्टी की छोटी-छोटी नन्ही-नन्ही मूर्तियाँ गढी गई थीं, रंगी गई थीं। दो रात तक उन्हें ढेले वाले खेतों में चराया गया अर्थात् उनकी पूजा की गयी। रात को विसर्जन।
गाँव के जीवन की प्राकृतिक महक के साथ रची बसी है लोक गीतों की सुमधुर रागिनी। रेणु की कहानियों में जगह-जगह हम इन लोक गीतों की धुनों और लोक नृत्यों की थाप को महसूस कर सकते हैं। विदापत नाच की उन्मुक्तता और विद्यापति के गीतों पर गायी जाने वाली रसप्रिया की बारीकियाँ कहानियों का अमूल्य प्रदेय है। टोंटी नैन का खेल में कीर्तनीया लोग कबीर, मीरा से लेकर विद्यापति के पदों का गायन करते हैं। तीसरी कसम के हिरामन को विदेसिया और छोकरा नाच के गाने खूब आते हैं, वहीं महुआ घटवारिन की गीत मिश्रित लोक कथा कहानी को एक नया आयाम देती है। लाल पान की बेगम की चंपा तो गाँव में नए अवतरित हुए बायस्कोप वाले गाने भी सीख गयी है।
लोक लय की इन विविध सचित्र झांकियों के बीच ही रेणु नए जमाने के चलन के बीच गायब होती लोकमयता के प्रति भी पाठकों को सचेत करते हैं। रसप्रिया कहानी का पंचकौडी मिरदंगिया मिथिला के साहित्य, लोक राग और सांस्कृतिक विरासत के क्षरण को लेकर चिंतित है। हमें विरासत से तरह-तरह के लोक गान व नृत्य प्राप्त हुए हैं किन्तु समय ने पर्त-दर-पर्त उनके स्वरूप को इस प्रकार धूमिल कर दिया है कि नयी पीढी के लोग इनके बारे में न तो कुछ जानते हैं और न ही अब कोई पंचकौडी मिरदंगिया जैसा जुनूनी है जो अपनी लुप्तप्राय कला को बचाने के लिए अपना जीवन झोंक दे। रेणु की इस कहानी की गूँज एक अलार्म की तरह देर तक कानों में रहती है। खेतों में काम करते समय गाये जाने वाले लोक गीत, तरह-तरह के रिवाज-रीतियाँ, संगीत हमारे समाज से निष्कासित होते जा रहे हैं। एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाले हमारे गाँव नए जमाने में नए चलनों के बीच अपनी जडों से दूर होकर एक ऐसे जीवन की ओर बढ रहे हैं जिसमें रसमयता का अभाव है। गाँवों में अब बिरहा, चांचर, लगनी, बारहमासा नहीं सुनाई देते। कहानी में पंचकौडी कहता है दुनिया बहुत जल्दी-जल्दी बदल रही है। जाने कितनी लोककलाएँ इस दुनिया के बदलने के साथ-साथ पहले बदलीं और फिर धीरे-धीरे लुप्त होती गईं। उल्लेखनीय बात यह है कि जब किसी भी तरह का तकनीकी विकास नहीं था, मात्र मौखिक परंपरा से लोक तत्त्व प्राणवंत रहे और जब हमारे पास हर तरह के तकनीकी साधन उपलब्ध हैं जो लोक संस्कृति के संरक्षण में सहायक हो सकते हैं, तब उसका क्षरण इतनी तेजी से हो रहा है कि अधिकांश परम्पराएँ, रिवाज, लोकराग, शब्द लुप्त हो गए। इनको बचाए रखने की जिजीविषा ही जैसे मंद पड गयी हो। संस्कृतिकरण ने इन लोक परम्पराओं को निगल लिया। वे उस ब्लेक होल में जाने को अभिशप्त हैं जिनका निर्माण पाश्चात्य विचारधारा की भेडचाल से उपजी मानसिकता ने किया है। मोहना जैसे नई उम्र के कितने लडके हैं जो रसप्रिया की तान को पुनर्जीवित कर सकते हैं। उनकी प्राथमिकताएँ इस कदर बदल गई हैं कि इन राग-रंगों का जीवन में कोई कोना ही शेष नहीं बचा।
रेणु के मन में जो खलिश है वह पंचकौडी के माध्यम से निकलती है, जेठ की चढती दोपहरी में खेतों में काम करने वाले भी अब गीत नहीं गाते हैं।...कुछ दिनों के बाद कोयल भी कूकना भूल जाएगी क्या?... अब तो दोपहरी नीरस कटती है , मानो किसी के पास एक शब्द भी नहीं । हमारे समाज से इन लोक परम्पराओं, गीतों, धुनों का लुप्त होते जाना भारत की अमूल्य सांस्कृतिक विरासत का पतन है। सांस्कृतिक परम्पराएँ प्रकृति और मनुष्य के साहचर्य से निर्मित होती हैं। इनके क्षरण का तात्पर्य है प्रकृति और मनुष्य का अलगाव , जो किसी भी दृष्टि से कल्याणकारी नहीं है ।
रेणु की कहानियों में गाँव के सांस्कृतिक परिवेश के साथ वहाँ की सामाजिक और आर्थिक बुनावट की बारीकियों को भी समझा जा सकता है। गाँव के समाज में जाति व्यवस्था की मजबूत घेराबंदी है । उच्च जाति और निम्न जाति के बीच की गहरी खाई में मानवीय मूल्य और संवेदनाएँ दम तोड देती हैं । रसप्रिया कहानी में पंचकौडी मिरदंगिया एक बच्चे को बेटा कहते-कहते रुक जाता है, उसे याद आता है कि किसी और स्थान पर एक ब्राह्मण के बच्चे को बेटा कह दिया था तो गाँव के लडकों ने उसे घेरकर मारने की पूरी तैयारी कर ली थी। यह जातीय विभेद अब भी गाँवों की एक विशेष पहचान है। शहरों के संफ में आने से ये बंधन ढीले अवश्य पडे हैं किन्तु टूटे नहीं हैं। राजनीतिक सरपरस्ती जातीय संरचना को और पुख्ता करने का काम करती है। जातिवाद के अतिरिक्त आर्थिक असमानता और जमींदारों-महाजनों द्वारा गरीब जनता का शोषण रेणु की कहानियों का मुख्य बिंदु है। जमींदारों के शोषण और उनके विरुद्ध आवाज उठाने से संदर्भित एक अभूतपूर्व कहानी है तंबै एकला चलो रे। टैगोर की प्रसिद्ध रचना से लिया गया यह शीर्षक इस कहानी के केंद्र बिंदु को उद्घाटित करता है। जब कोई और तुम्हारी आवाज नहीं सुनता, साथ नहीं चलता तब अकेले ही चल पडो । प्रतिरोध और बलिदान की राह पर चलने का साहस विरलों को ही होता है। इस कहानी में यह साहस कृष्ण जन्माष्टमी को जन्मे, समाज द्वारा उपेक्षित भैंस के पडवे किसन महाराज ने दिखाया है। किसन महाराज गरीबों के हित रक्षार्थ संघर्ष करते हुए अपने प्राण उत्सर्ग कर देते हैं । अपने सांकेतिक स्वरूप के चलते यह कहानी रेणु की एक विशिष्ट कहानी बन जाती है ।
जमींदार के अतिरिक्त महाजन गाँव का वह प्राणी है जिसे शोषक व्यवस्था का मजबूत स्तम्भ माना जाता है । गरीबों के आडे वक्त पर उन्हें भारी भरकम सूद दरों पर ब्याज देना फिर उस ब्याज उगाही से अपनी पुश्तों तक का उपार्जन करना महाजनी व्यवस्था का मूल मन्त्र है । उच्चाटन कहानी का रामबिलास मिसिर से लिए गए कर्जे को न चुका पाने के कारण शहर भाग जाता है । उसके दो साल बाद गाँव लौटते ही मरकट-महाजन को खबर मिल जाती है और किरण फूटने के पहले ही बामन-बनिया तकादे को पहुँच जाता है।
आर्थिक तंगी और बेकारी का ही परिणाम है गांवों से पलायन जिसके बारे में रेणु अपनी कहानियों में विस्तार से चर्चा करते हैं। उच्चाटन कहानी में यह समस्या रोचक रंग लेकर उपस्थित हुई है। रामबिलास शहर से साहबनुमा ठाट के साथ जब गाँव लौटता है तो गाँव के युवक भी उससे प्रेरित होकर शहर जाना चाहते हैं। रामबिलास के आँगन में बीडी के धुएँ के साथ पटनियाँ किस्सों की गुदगुदाहटें चल रही हैं। शहर और वहाँ की बातें गाँव से कभी बाहर न निकले लोगों के लिए एक सपने जैसा है, तरह-तरह के रंगों वाला सपना जिसका स्थायी भाव अचरज है । रामबिलास द्वारा किया गया रजिन्नरनगर (राजेन्द्र नगर-पटना का एक मोहल्ला) और वहाँ झाडू लगाने वाली रजबतिया की खपसूरती के वर्णन के बाद तो कोई भी नौजवान गाँव में रहना ही नहीं चाहता। हालाँकि पलायन का मूल कारण वह पैसा है जो शहर उगल रहे हैं और गाँव में न जाने कहाँ गढा हुआ है। कहाँ साल भर हलवाही के एक सौ आठ रुपये और कहाँ महीना के दो सौ। पलायन की पीडा और गाँव के सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे में इसके कारण होने वाले बदलावों का रेणु विघटन के क्षण कहानी में व्यापक विश्लेषण करते हैं । साहू की दुकान पर होने वाली गप में शरीक गाँव की मशहूर झगडालू औरत बंठा गाँव से सभी के एक-एक कर चले जाने पर खासा चिंतित है, पता नहीं, शहर के पानी में क्या है कि जो एक बार घूँट भी पी लेता है, फिर गाँव का पानी हजम नहीं होता। गोबिन गया, अपने साथ पंचकौडीया और सुगवा को लेकर। उसके बाद बाभन टोले के दो बूढे अरजुन मिसर और गेंदा झा...। इस गप से अगला तर्क रामफल की बीबी का निकलता है कि जो चले गए हैं वे गाँव में बिलल्ला होकर इसके दरवाजे से उसके दरवाजे पर खैनी चुनियाने और दाँत निपोडकर भीख मांगने के सिवाय करते क्या थे। कम से कम अब शहर में जाकर होटिल में भात रांधते हैं। शहर में रिक्शा खींचने का भी पाँच रुपया रोज का मिलता है जो गाँव में किसी भी काम के बदले नहीं मिल सकता ।
सबके इस प्रकार गाँव छोडकर चले जाने का दर्द रेणु कहानी की आठ-नौ साल की पात्र चुरमुनियाँ के माध्यम से बयान करते हैं। होली में जोगीडा और भडुआ गाने वाला सच्चिदा भैया भी चला जायेगा तो क्या रह जायेगा ? संकट की उस छाया को रेणु बखूबी देख पा रहे हैं जो गाँव पर मंडरा रही है।
उच्चाटन कहानी के अंत में रेणु अवश्य बिलसवा को गाँव में रोक देते हैं इस आदर्शवादी वाक्य के साथ कि जो मजा अपने गाँव में है, वह इन्द्रासन में भी नहीं’, किन्तु न जाने कितने बिलसवा मय परिवार अपनी जगह-जमीन छोडकर शहर की चक्की में पिसते पडे हैं, सिर्फ इसलिए कि शहर उनकी मेहनत के एवज में रोटी दे देता है, जबकि गाँव ने उन्हें वह भी नहीं दिया। श्रम के एवज में रोटी तो उन्हें वहाँ मिली लेकिन आज इस कोरोना काल में महानगरों से अपने गाँवों की ओर लौटते मजदूरों के जत्थे यह दिखाते हैं कि गाँव उनके लिए एक बडा आश्वासन है, आत्मीयता और मानवीयता का यह भरोसा कि कम से कम उनके गाँव उन्हें आपदकाल में भूखों मरने के लिए नहीं छोड देंगे। महानगरीय जीवन बडा निर्दयी है, वह बिना मतलब कुछ भी नहीं देता।
प्रेम के मौन और अधूरेपन में व्यक्त सूक्ष्म संवेदनाएँ
रेणु की कहानियों में हम कहीं प्रेम को मुखर होते नहीं देख पाते, वह दबे छिपे ढंग से कहानियों की अन्तरंग बनावट में पैबस्त है। किसी कहानी में वह आधारकथा है तो कहीं सूत्र रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करता है। आत्मसाक्षी यूँ तो एक राजनीतिक चिंतन से उपजी कथा है किन्तु गनपत का परबतिया स्मरण उसके जीवन के उस विशिष्ट पहलू को दिखाता है जो गनपत के व्यक्तित्व और चरित्र का निर्माता है। परबतिया उसकी न हो सकी; यह टीस उसके पूरे जीवन को प्रभावित करती है। रसप्रिया कहानी प्रेम के राग से पगी हुई है। पंचकौडी ने अपनी जाति छिपाकर गुरुकन्या से प्रेम तो किया किन्तु इतने बडे झूठ के सहारे उससे विवाह करने की हिम्मत न जुटा पाया और रातों-रात गायब हो गया। रमपतिया के लिए वह झूठा, मक्कार और फरेबी है जिसको अनगिन कुवचनों से असीस ने से वह चूकती नहीं किन्तु जब पंचकौडी की उँगली टेढी हो जाती है तो उसी उँगली को पकडकर जार-जार रोती है। रमपतिया और पंचकौडी के प्रेम आख्यान में ऐसे कितने ही प्रेम संबंधों की नियति व्यक्त होती है जो पूर्णता की सम्भावना में अधूरे जीवन को गले लगाने को अभिशप्त हैं।
टोंटी नैन का खेल कहानी में मिडिल पास, दोहा कवित्त जोडने वाली गोरी लडकी अवश्य अपने बाबा द्वारा चुने गए चिडिया के गुलाम लडके से शादी न करके अपने मन के मीत को चुनती है । प्रेम की यह सकारात्मक परिणति यदा-कदा ही रेणु की कहानियों में दिखाई देती है अन्यथा वे अंत भला जैसी कहानियों से दूर ही रहते हैं। एक रोमांसशून्य प्रेम कथा का अंत कहानी में प्रेम की संभावनाओं के पक्षी उडान भरने से पहले ही कर्त्तव्य बाण से भेद दिए जाते हैं। पवित्रा अपने प्रति अखबार वाले बाबू की भावनाओं को खूब पहचानती है, कहीं न कहीं स्वयं भी उनसे जुडी भी है किन्तु अपने लोगों के प्रति कर्त्तव्यबोध को प्रेम की संवेदनाओं से ऊपर रखकर वह प्रेम कथा की इतिश्री कर देती है ।
प्रेम के रागात्मक सौन्दर्य की सबसे सशक्त कहानी है - तीसरी कसम। इस कहानी के मौन संवाद हिरामन के हृदय के रहस्यों को चुफ से प्रकट कर देते हैं। हालाँकि यह कहना कि हिरामन के मन में हीराबाई के लिए प्रेम के अंकुर प्रस्फुटित हुए, उसके साथ ज्यादती होगी। हिरामन सीधा सरल देहाती युवक, प्रेम के जटिल व्यापार में उलझने लायक समझ उसमें कहाँ से आये पर हीराबाई जैसी परी को अपनी गाडी में बिठाकर ले जाते हुए उसके वर्षों से देखे हुए सपने का एक आभास निर्मित होता है। रेणु कहीं भी उसकी भावनाओं को लाऊड नहीं होने देते, प्रेम को व्यक्त करने वाला एक शब्द भी कथा में कहीं नहीं, फिर भी यह एक माइल स्टोन प्रेम कथा बन जाती है सिर्फ संकेतों और कार्य-व्यापार के प्रदर्शन से। हीराबाई के पक्ष को कहानीकार ने कहीं नहीं रखा बस उसके द्वारा अंत में एक पंक्ति कहलवा दी महुआ घटवारिन को सौदागर ने खरीद जो लिया है गुरुजी...। इस पंक्ति में हीराबाई के जीवन की पूरी तस्वीर समाहित है। अव्यक्त प्रेम का अधूरापन और कसक कहानी को एक विशिष्ट रंग प्रदान करता है।
उल्लेखनीय है कि इन कहानियों में प्रेम के अधूरेपन के मुख्य कारक जाति और वर्ग संबंधी विभेद हैं। समाज में भी अगर हम देखें तो अधिकतर प्रेम कहानियाँ इन्हीं बन्धनों की बलि चढ जाती हैं। रेणु सामाजिक समीकरण से प्रभावित संबंधों के इस अंतर्जाल को बखूबी पहचानते हैं और उसकी पडताल कहानियों में करते हैं।
एक राजनीतिक कार्यकर्ता की राजनीति-निरपेक्ष कहानियों में राजनीति : मोहभंग या अंतर्विरोध
राजनीति तात्कालिकता में रमती है जबकि लेखन नैरन्तर्य को संबोधित होता है। सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता होने के बावजूद उनकी साहित्यिकी राजनीतिक-मुहावरेबाजी से दूर है। उनके साहित्य में राजनीतिक आशयों और संकेतों की भरमार है किन्तु राजनीति का लाउड प्रभाव नहीं है। रेणु समाजवादी आन्दोलन से जुडे हुए थे, जयप्रकाश नारायण के करीबियों में थे; इसके बावजूद उनका साहित्य किसी खास राजनीतिक दृष्टिकोण का शिकार नहीं होता। उनका लेखन राजनीतिक-सामाजिक सीमाओं का अतिक्रमण करता है। वह बराबर राजनीतिक विसंगतियों पर चोट करते हैं। पार्टी का भूत कहानी राजनीतिक-चरित्रों की स्वार्थपरकता पर व्यंग्य करती है। कहानी का नैरेटर राजनीति में शामिल एक व्यक्ति-चरित्र है जो किसी पार्टी में न होना चाहकर भी सब में है। वह बचपन से ही अलग अलग गुटों से जुडता है और बाद में उन्हें नकारता है; पर अफसोस, गुटों से जुडी पहचान उससे कभी अलग नहीं होती। हर राजनीतिक गुट में जुडने के अपने फायदे और नुकसान हैं किन्तु वह सबके फायदे उठाना चाहता है और नुकसान किसी का भी नहीं। उसे कम्युनिस्ट गु*प में इसलिए रहना पडता है क्योंकि वहाँ आधुनिक विचारों वाली सुकुमार सौन्दर्यवती मिस रोस्सा है; सोशलिस्ट गु*प में दोस्तों का साथ है जबकि फारवर्ड ब्लाक में रहने पर कन्सेशन में चाय कटलेट मिल जाते हैं। हर पार्टी में रहते हुए भी किसी के न होने का परिणाम यह होता है कि उसे हर जगह पार्टी का ही भूत दिखाई देता है। रेणु स्वार्थपरक राजनीति पर सीधे व्यंग्य करके पार्टीबाजी की असलियत को दिखाते हैं।
राजनीतिक-चिंतन की एक प्रमुख कहानी है- आत्मसाक्षी । कम्यूनिस्ट पार्टी के विघटन और एक सच्चे कार्यकर्ता की दुर्गति दिखाते हुए रेणु कम्यूनिस्ट पार्टी की कार्य-पद्धति पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। गनपत पार्टी का एक जमीनी कार्यकर्ता है जो पार्टी के बडे लोगों के बीच की उठापटक और उनके स्वार्थी मंसूबों को जानने-समझने में असमर्थ है। रातों-रात पार्टी दो हिस्सों में विभक्त हो जाती है और गनपत किसी भी हिस्से का सदस्य नहीं रह जाता। दोनों ही पक्ष उसे विश्वासघाती समझते हैं। उसके जीवन भर की साधना, सेवा, व्रत का संकल्प बेमानी हो जाते हैं और सर्वोपरि हो जाता है बडे नेताओं की मौकापरस्ती और स्वार्थ- पैंतीस साल तक साधु-संन्यासियों की तरह लंगोट बंद रखकर जीभ-मुंह और मन में लगाम लगाकर उसने पब्लिक का काम किया । किसी का एक तिनका न चुराया , न पार्टी का एक पैसा गोल-माल किया । माँ-बाप, भाई-बहन, गाँव-समाज और परबतियों से भी बढकर पार्टी के झंडे को प्यार किया, सब बे..का..र..। कहानी के अंत में गनपत एक उम्मीद बनकर आगे आता है और पार्टी से इतर एक कर्मठ कार्यकर्ता के रूप में जनता के बीच उठ खडा होता है । रेणु गनपत के रूप में संकेत करते हैं कि सच्चे लोगों की राजनीति में जगह घटती जा रही है बावजूद इसके जनता से जुडा कार्यकर्ता किसी पार्टी के झंडे का मोहताज नहीं होता।
राजनीति की स्वार्थान्धता और जनता की दुर्दशा को रेखांकित करने वाली कहानी है -पुरानी कहानी : नया पाठ । पुरानी कहानी है- कोसी की तट भूमि में पडने वाले क्षेत्र में आई बाढ और नया पाठ है- राजनीति का स्वार्थपरक चरित्र, जो अपनी सरकार में और अधिक खुलकर प्रकट होने लगा है। जनसेवक शर्मा का चरित्र भ्रष्टाचार में लिप्त एक ऐसे राजनीतिज्ञ का है जिसे जनता के दुःख-दर्द से अधिक चिंता अपनी सात पुश्तों की है जिन्हें वह धन के भण्डार पर बैठा देखना चाहता है। बाँध कटवा कर वह बाढ की समस्या को और गंभीर बना देता है । जितनी बडी समस्या उतना ज्यादा रिलीफ फंड और उतना ही मोटा बैंक बैलेंस। वास्तव में देखा जाये तो अब यह पाठ भी नया नहीं रह गया। सर्वविदित है कि इस तरह की आपदाएँ नेताओं से लेकर प्रशासनिक अधिकारियों तक सभी के लिए अवसर लेकर आती हैं, ज्यादा से ज्यादा कमा पाने का सुअवसर । जनता पहले भी ठगी जाती थी, आज भी उसकी वही स्थिति है।
जलवा कहानी आजादी के उन दीवानों की पीडा को व्यक्त करती है, जिन्होंने आजादी की लडाई में अपना सर्वस्व होम कर दिया किन्तु आजादी मिलने के बाद स्वार्थपरक राजनीति ने न सिर्फ उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका बल्कि उनके समर्पण भाव के एवज में अपमान का प्रतिदान दिया। आजादी मिलने के बाद राजनीति जनसेवा के वृहत्तर उद्देश्य को छोडकर स्वार्थ सेवा के संकुचित दायरे में सिमट आयी, यही इस कहानी का कथ्य है। 1930 में सक्रिय राजनीति में गर्मजोशी और साहस के साथ कंधे पर तिरंगा लेकर सभाओं में शिरकत करती फातिमा दी कहानी की मुख्य किरदार हैं। जब लेखक फातिमा दी से राजनीति छोडने की वजह पूछता है तो वे उलटे प्रश्न करती हैं- यह मुझसे क्यों पूछते हो? अपने उन नवाबजादों से क्यों नहीं पूछा जो रातों-रात देश-भगत बनकर कांग्रेस के खेमे में दाखिल हो गए- बगल में छूरी दबाकर...कल तक गाँधी-जवाहर-पटेल को सरेआम गालियाँ देने वाले, कौमी झंडे को जलाने वाले फिरकापरस्त लीगियों की इज्जत आफजाई की गयी और मुल्क के लिए मरने-मिटने वालों को दूध की मक्खियों की तरह निकाल...।
रेणु आजादी के बाद बने राजनीतिक समीकरणों की ओर इशारा करके सत्ता-लोलुपता पर गहरी चोट करते हैं। 1941 के पहले विदेशी सत्ता के स्वार्थों के दीमक देश को खोखला कर रहे थे तो आजादी के बाद देशी सत्ता के लोभ रूपी जोंक उसका रक्त चूस कर उसे निष्प्राण करने की कवायद में लग गए।
स्त्री जहाँ देवी नहीं मनुष्य है
रेणु की कहानियों के स्त्री पात्रों को दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम श्रेणी में शरतचंद्र के साहित्य की स्त्रियों से मेल खाती त्यागमयी, गरिमापूर्ण नारी है जो स्त्री की महानता को स्थापित करने के प्रयास में आगे बढती है। दूसरी श्रेणी में अपनी समस्त अच्छाइयों-बुराइयों के साथ सामाजिक परिवेश के अनुरूप व्यवहार करती स्त्री, जो देवी नहीं मनुष्य है। ठेस की बडी ठकुराइन, संवदिया की बडी बहुरिया, विघटन के क्षण की विजया, एक रोमांस शून्य प्रेम कथा का अंत की पवित्रा आदि पात्र प्रथम श्रेणी में शामिल किए जा सकते हैं। गौरतलब है कि इन्हीं कहानियों में रेणु इन स्त्रियों की विपरीत छवियों को भी सामने रखते चलते हैं। रेणु ने अपने साहित्य में स्त्रियों को भी आदर्श दृष्टिकोण से न देखकर दुनियावी धरातल पर रखकर ही चरित्रांकित किया है । ये स्त्रियाँ सीधी-सरल नहीं हैं, छल-कपट खूब जानती हैं और इनके मुँह से फूल ही नहीं समय-कुसमय अंगारे भी झडते हैं।
अच्छे आदमी कहानी में प्रदीप की माय अपने सपनों को पूरा करने , जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए अपने स्त्रीपन का सहारा लेती है। उजागर सरल हृदय का है और सभी लोगों को अच्छे आदमी मानता है। उनके मन में छिपे कलुष और अपनी पत्नी के प्रति उनकी दृष्टि को वह समझ नहीं पाता। इसका फायदा उठाकर प्रदीप की माय दुकान बढाने, सीमेंट का परमिट लाने के लिए पुरुषों की लोलुपता को भुनाती है। मिस्त्री के साथ उसके बोल-बतियाव को समझकर उजागिर अंततः उसका विरोध करता है और प्रदीप की माय पूर्णतः पति समर्पित होने की शपथ लेती है।
नैना जोगिन कहानी की रत्नी को उसके तेज तर्राकपने के चलते गाँव वालों द्वारा नैना जोगिन का विशेषण दिया गया है। मुँह के जोर से रत्नी और उसकी माँ जमींदार बन गयी हैं। सात साल की उम्र में ही रत्नी ने गाँव के एक धनी, प्रतिष्ठित, वृद्ध को फिलचक्कर में डाल दिया। पंचायत में नैना ने जिस तरह बयान दिया वह कोई जन्मजात नैना जोगिन ही दे सकती थी।
बचपन में ही पाए इस विशेषण के बाद रत्नी सबके लिए एक खूँखार और मुँहजोर स्त्री बन गयी। कोई नौजवान उससे आँखें मिलाने का साहस भी नहीं कर पाता । रेणु दिखाते हैं कि इस बाह्य खोल के अन्दर अपने जीवन में एक शिशु के वात्सल्यपूर्ण स्पर्श को तरसती तरल संवेदनाओं वाली स्त्री है। पुरुष की कुत्सित वासनाओं को साक्षात् देखने के कारण भय, संकोच, लज्जा की बेडियों को काटना ही उसे श्रेयस्कर लगा। स्त्री के लिए समाज द्वारा बनाये गए खांचों से बाहर निकलकर ही वह समाज से लोहा लेने का साहस जुटा पाती है। रत्नी के चरित्र द्वारा रेणु वृहत्तर सामाजिक सन्दर्भों का संज्ञान लेते हुए उसके व्यवहार के मनोविज्ञान को भी समझाने का प्रयास करते हैं।
इनके अतिरिक्त यदि हम रेणु की कहानियों में आई गाँव देहात के बीच की आम स्त्रियों की बात करें तो वे भी ताना मारने, छींटाकसी करने और दूसरों का सत उतार देने की कला में पारंगत हैं । छोटी-छोटी बातों पर भी कडक मोर्चा लेने में इनका कोई सानी नहीं है। चाहे हम लाल पान की बेगम में बिरजू की माँ और जंगी पतोहू की जबानी जंग के बीच कान लगायें या उच्चाटन में बिलसबा की पत्नी को सास के खिलाफ भडकाती गाँव की बडी-बूढियों के परपंच को परसें, रेणु की कलम से निकली स्त्रियाँ विशुद्ध व्यावहारिकपने की चालाकी के साथ उपस्थित हैं।
अपनत्व की ऊष्मा तलाशते पात्र
रेणु की कहानियों के पात्र समाज में सक्रिय उपस्थिति रखते हैं। उनके आसपास का जीवन संवादी और मिलनसार है। मेरे जेहन में उनकी ऐसी तीन प्रमुख कहानियाँ उभर रही हैं जिनके पात्र बाह्य तौर पर तो अकेले नहीं हैं किन्तु कहीं न कहीं भावात्मक साझेपन की तलाश में हैं। तीसरी कसम का हिरामन चालीस बरस का है, गाडीवानी करते हुए जगह-जगह घूमता है, कई तरह के लोगों से बात-व्यवहार रखता है; व्यावहारिक बुद्धि में और बात करने की कला में भी अव्वल है लेकिन उसके मन के आंतरिक कोनों में कहीं एक रिक्तता है जिसकी अनुगूंज पाठकों को कहानी पढते हुए स्पष्ट सुनाई देती है। गौने से पहले ही पत्नी की मृत्यु उसके जीवन को भावशून्यता दे जाती है। उसके मन की आस हीराबाई में विश्राम पाती है किन्तु वह तो आकाश कुसुम है। हीराबाई के जाने और हिरामन के तीसरी कसम खाने के बीच अकेलेपन की पीडा की एक गहरी लकीर रेणु खींच जाते हैं।
एक आदिम रात्रि की महक का करमा अपनत्व के रससिक्त अवलम्ब को खोजता पात्र है । मनुष्य स्वभाव से ही संग-साथ की चाहना रखता है, अकेले रहने वाला प्राणी वह प्राकृतिक रूप से ही नहीं होता। आत्मीयता की चाह, परिवार का संसर्ग उसकी नैसर्गिक आवश्यकता है जिनके बिना उसका अस्तित्व अधूरा है। अनाथ करमा अपने जन्म से ही अलग-अलग स्टेशनों पर अलग-अलग बाबुओं के साथ रहा है। उसके मन को कहीं स्थायित्व नहीं मिल पाता। बूढे बैगन वाले के गाँव और परिवार में उसे जिस अपनेपन की अनुभूति होती है, उसे छोडकर फिर वह नहीं जा पाता।
टेबुल कहानी की मिस दुर्वादास के हृदय के रिक्त कोने को भरती है उसके ऑफिस की मेज, जिस पर सर रखकर उसे अपनेपन का एहसास होता है। प्रमोशन होने पर उस टेबुल से बिछुडने का खयाल दुर्वादास को विचलित कर देता है और उसे पाने के लिए वह हर तरह के हथकंडे अपनाती है। किसी भी तरह वह उस टेबुल से अलग नहीं होना चाहती। वह टेबुल दुर्वा को चाहिए, आज चाहिए,अभी चाहिए उसके सिवा वह एक क्षण चैन से नहीं बैठ सकती। मिस दुर्वा का टेबुल के प्रति यह अतिरिक्त मोह मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की माँग करता है। दुर्वादास जैसी कामकाजी स्त्रियाँ पुरुष बहुल कार्यक्षेत्र में स्वयं को सख्ती से एक खोल में बंद कर लेती हैं और अन्दर ही अन्दर एक खोखलेपन का शिकार हो जाना उनकी नियति बन जाता है । दुर्वा का टेबुल से लगाव सामान्य रूप से तो बहुत अस्वाभाविक लगता है किन्तु गहराई से देखा जाये तो वह उसके अत्यंत एकाकीपन से बचाने वाला सेफ्टी वाल्व है ।
संवेदनशीलता और मानवीयता ही जीवन-धर्म है
रेणु की कहानियाँ संवेदनशीलता और रागात्मकता का अद्भुत मिश्रण हैं। वे संवेदना को परिवेश द्वारा मूर्त रूप देते हैं । संवदिया कहानी की बडी बहू की लाचारी व गरीबी जब सीमा पार कर जाती है तो वह हरगोबिन को संवदिया बनाकर अपने मायके भेजती है कि उसकी दीन-हीन दशा के निराकरण हेतु भाई आकर उसे लिवा ले जाएँ। हरगोबिन उनके मायके जाता है किन्तु संकोचवश वह संवाद नहीं दे पाता। संवेदनाओं और सांस्कृतिक मूल्यों में आई गिरावट व सामाजिक परिदृश्य के बदलाव को रेणु बारीकी से पकडते हैं।
पारस्परिक साझेदारी, एक-दूसरे के सुख-दुःख की हिस्सेदारी भारतीय संस्कृति की मूल्यधर्मिता रही है । एक घर की बहू पूरे गाँव का सम्मान है, हरगोबिन कैसे गाँव की बहू को उसके दुर्दिन में अकेला छोड दे और किस मुख से उसकी दरिद्रता का वर्णन मायके जाकर करे। इसमें पूरे गाँव का अपमान है। वृहत्तर सामाजिकता व मनुष्यता का फैलाव कहानी में सर्वत्र है। रेणु हरगोबिन के माध्यम से मूल्यहीनता के बीच मूल्यवत्ता को प्रतिष्ठित करते हैं।
यही मूल्यवत्ता व संवेदनीयता ठेस कहानी के सिरचन में देखी जा सकती है। अपमान का दंश झेलकर, बहू की खरी-खोटी सुनकर, अपने कलाकार हृदय को लगी ठेस को नजरअंदाज कर वह ससुराल जाती बिटिया मानू का मान रखता है । गाँव की बेटी होने का नाता होने के अतिरिक्त उससे सिरचन का आत्मिक लगाव भी है । बिटिया का ससुराल में किसी भी तरह का अपमान हो या उसे सीतलपाटी, सतरंगी चिक न ला पाने का उलाहना सुनना पडे यह सिरचन को मंजूर नहीं। हरगोबिन जहाँ सारा जीवन बेटा बनकर बडी बहुरिया को संरक्षण देने में मानवीय गरिमा को प्रतिष्ठित करता है, वहीं सिरचन ससुराल जाती बिटिया के सम्मान के लिए अपना मान-अपमान भुला कर पिता के कर्त्तव्य को पूर्ण करता है।
जीवंतता जिनका मूल तत्त्व है और छल-छल बहती नैसर्गिक रसमयता जिनका प्राप्य, ऐसी कहानियाँ समाज के बीच रहकर उसकी नब्ज को पहचानने वाले रेणु जैसे साहित्यकार की कलम से ही निकल सकती हैं। प्रत्येक बार उनकी कहानियों को पढकर यह अनुभव होता है कि अभी न जाने कितने ही आयामों और कोणों से इन्हें पढा जाना शेष है। बीमारों की दुनिया कहानी की ये पँक्तियाँ मानो उनके रचनाधर्म के सरोकारों को ही व्यक्त करती हैं, हमारी जिन्दगी हिन्दुस्तान की जिन्दगी है। हिन्दुस्तान से मेरा मतलब है असंख्य गरीब मजदूर किसानों के हिन्दुस्तान से। हम अपनी मिट्टी को पहचानते हैं, हम अपने लोगों को जानते हैं । हमने तिल-तिल जलाकर जीवन को, जीवन की समस्याओं को सुलझाने की चेष्टा की है। हिन्दुस्तान की मिट्टी के लोगों के इस लेखक को अनुभूति की सच्चाई, कहन की काव्यात्मकता, लोक लय की मधुरता, रागात्मक अनुगूँज की झंकृति और किस्सागोई की ताकत युगांतरकारी बनाती है।

सम्पर्क - सहायक प्रोफेसर-हिंदी
राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय
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