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रेणु का कथा संसार

चितरंजन भारती
रेणु की रचनाओं के अध्ययन-मनन के दौरान संवेदनशील मन एक तरफ संतप्त होता है, तो दूसरी तरफ संतृप्त भी होता है। ठीक है कि उन पर आँचलिकता का ठप्पा लगा, मगर वह एक अंचल विशेष की बात कहते समग्र-समाज और देस की ही बात करते हैं। उनकी रचनाओं में ग्रामीण परिवेश मुखर है। मगर उन्होंने शहरों को अनदेखा किया, ऐसा नहीं कहा जा सकता। दरअसल, जब वह पटना में होते हैं, तो पूर्णिया उन्हें खींचता रहा है। वैसे ही, जैसे जब वह पूर्णिया में होते हैं, तो पटना उन्हें खींच रहा होता है। उनका विशाल परिवार, गाँव आदि, जिसका एक छोर नेपाल से, तो दूसरा छोर बंगाल से जुडा है। तिस पर उनका विद्रोही तेवर, जो कभी ब्रिटिश साम्राज्य से, तो कभी नेपाली राजशाही से टकराने का हौसला देता रहा। और यही हिम्मत और हौसला कहें कि वह भारतीय कांग्रेसी सत्ता का लाभ ले रहे और आपातकाल को अनुशासन पर्व कहने वालों के विपरीत उससे जा टकराए।
चूँकि उनके अंतर्मन में 1942 के असहयोग आंदोलन का नशा था, तो 1967 का वह समय भी जेहन में था, जब दस राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ था। 1972 में वह चुनाव भी लडे थे, एक विश्वास के तहत ! तब उनके पास सिर्फ साहित्य की पूँजी थी, और था- सिनेमा का ग्लैमर, जिससे उन्हें अपने इर्द-गिर्द जय-जय का नाद-निनाद ही सुनाई देता था। संभवतः वह इस बात को नजरअंदाज कर गये कि उन दिनों इंदिरा कांग्रेस के पास बांग्लादेश के विजयोन्माद का सबसे बडा ग्लैमर था। और हर युद्ध के बाद का विजयोन्माद राष्ट्रीयता को पुख्ता और मजबूत बनाता है। उस हवा में तीसरी कसम जैसी भावुक प्रेमकथाएँ विस्मृत कर दी जाती हैं।
वैसे भी वह समय संक्रमण काल का था। इंदिरा गाँधी के कुछ मूलभूत कार्य, जैसे- प्रिवीपर्स का खात्मा, बैंकों-खानों आदि का राष्ट्रीयकरण, सार्वजनिक उद्यमों में भारी निवेश आदि उनको मजबूत बना रहे थे। और रेणु के पास ले-देकर एक साहित्य था और राजनीति के नाम पर समाजवादी आंदोलन, जो स्वयं को पहले ही इंदिरा के हवाले कर चुका था। हालाँकि रेणु ने पटना रहकर नियमित स्वतंत्र पत्रकारिता आरंभ कर दी थी।
रेणु को सत्ता का बिल्कुल साथ नहीं मिला, ऐसा नहीं कहा जा सकता। मैला आँचल पर पुरस्कार, पद्मश्री का मिलना, राज्य सरकार द्वारा प्रति माह दीया जाने वाली राशि , उनके साहित्य एवं सोच का समर्थन किये जाने जैसा ही था।
वह आरंभ से ही सोशलिस्ट पार्टी से जुडे और समर्पित रहे। जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया इसके दो आधारभूत स्तम्भ थे। बंगाल जैसे राज्यों की तरह बिहार-उ.प्र. आदि में इसी कारण वामपंथ का विस्तार नहीं हो सका था, क्योंकि यहाँ मुख्यतः कृषि से संबंधित समस्याएँ थीं। इन समस्याओं के साथ अनेक सामाजिक समस्याएँ भी जड जमाये बैठी थीं, जिन पर जयप्रकाश और लोहिया लगातार कुठाराघात कर रहे थे, जिसे स्वीकृति भी मिल रही थी। जयप्रकाश ने जाति, धर्म, दहेज आदि के विरुद्ध जेहाद बोला, तो लोहिया ने बीच की जातियों के उत्थान का नारा बुलंद किया। इनके पट्ट शिष्य कर्पूरी ठाकुर, लालू यादव, नीतीश कुमार, मुलायम यादव आदि इनके पद-चिह्नों पर चलते आगे बढे। यह अलग बात है कि सत्ता में आने के बाद इनके मायने बदल गये। मसलन, परिवारवाद के चपेट में आने से लेकर येन-केन-प्रकारेण चल-अचल संपत्ति बनाने-जुटाने तक, इन्होंने भी कांग्रेसी कल्चर अपना लिया।
यह प्रकरण प्रसंगवश आया। मूल बात यह कि समाजवादियों के समाज-सुधार विषयों से कांग्रेस ने परहेज नहीं किया। उनकी माँगों को अपने लय में लेकर उन्हें कार्यान्वित भी किया। और उसी की कडी में उस साहित्य को समादृत भी किया, जिससे रेणु सम्मानित-लाभान्वित हुए। प्रसंगवश यह जानकारी अपेक्षित है कि 1952 की चुनाव के घनघोर पराजय से समाजवादी बुरी तरह से हतोत्साहित थे। जयप्रकाश विनोबा भावे के भू-दान आंदोलन की शरण में गये। बाकी चेले-चपाटियों ने भी या तो चुप्पी साध ली, या किनारा कर गये। चुप नहीं रहे, तो एकमात्र लोहिया, जो सरकार को हर मोर्चे पर घेरने में सिद्धहस्त थे। नेहरू उनकी सदिच्छाओं के कायल थे। सो उन्हें समुचित सम्मान भी देते थे और वक्त-जरूरत उनकी सलाहों पर गौर भी करते थे।
मगर रेणु जैसे लोगों ने राजनीति से किनारा कर लिया। उन्हें सहारा दिया तो रामबृक्ष बेनीपुरी ने और उन्हें साहित्य के मोड पर पुनः ला खडा किया। क्योंकि रेणु के पास वैसे भी साहित्य का विकल्प था, जिससे उनकी प्रतिभा अलग ढंग से प्रस्फुटित हुई। मध्यवर्गीय कृषक परिवार की उनकी पृष्ठभूमि थी, इसलिये वह परिवार से निश्चिंत थे। वैसे मध्यवर्गीय कृषक परिवार के सदस्य के रूप में रेणु आरंभ से ही कृषि-कार्य से जुडे रहे। और यही कारण था कि उन्हें जमीनी स्तर पर होने वाले कृषि-कार्य संबंधी समस्याओं की गहन जानकारी थी। भयानक बाढ के बीच वे पले-बढे थे। भयानक आपदाएँ अमीरी-गरीबी का भेद भी तो नहीं किया करतीं। ऐसे में उन्होंने ग्रामीण-सामुदायिक समस्याओं और परंपराओं को नजदीक से देखा और गहराई से महसूस किया। जाति-धर्म से लेकर पोंगापंथ तक के ढकोसलों को देखा, जमीन और खेतों को लेकर खींचातानी तक के संघर्षों को झेला। ब्रिटिश सरकारी नौकरशाही को देख चुके थे। और अब इसका भारतीय संस्करण भी देख रहे थे, जिसमें भ्रष्टाचार सिर चढकर बोल रहा था। रेणु की कथाओं में वह सब अभिव्यक्त है। उनका साहित्य शनैः-शनैः प्रेमचंद साहित्य की तरह लोकप्रिय भी हो रहा था। एक तरफ राजनीति से निराश रेणु साहित्य में उभरे, तो कांग्रेसी सरकार ने उन्हें समर्थन देने में देर नहीं की। ध्यान रहे, इसी दौरान एक तरफ नागार्जुन, तो दूसरी तरफ दिनकर का साहित्यिक प्रभामंडल विस्तार पा चुका था और ये बिहार के दमकते सितारे थे। इन दोनों का वरदहस्त भी रेणु पर था। वैसे सितारे तो अनेक थे बिहार में, लेकिन रेणु उनसे आगे बढ चुके थे। अकादमिक जगत् ने उसे मान्यता दी, उनका स्वागत किया। रेणु साहित्य की एक अन्यतम उपलब्धि यह रही कि उसे सिनेमाई ग्लैमर का एक सूत्र भी हाथ लगा।
रेणु के उपन्यासों की विशेष चर्चा की जाती है। उस पर बहुत कुछ लिखा भी जा चुका है। उसी प्रकार उनकी कहानियों की भी विशेष चर्चा की जाती है। आँचलिक अर्थों में उनके साहित्य को रखा जाता है। जब उनकी एक कहानी पर फिल्म बनी, तो और चर्चित हुए, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर उसने राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किये। उनकी कहानियों पर मंचन भी होने लगे थे। और आश्चर्य नहीं कि ये कहानियाँ सामाजिक नवजागरण में मील के पत्थर सिद्ध हुई।
उनकी कहानी संवदिया हो या पंचलाइट, आज भी जन-समूह को अपील करती हैं। आमतौर पर हम सभी यही मानकर चलते हैं कि रेणु ने ग्रामीण अंचलों को अपनी कहानी में लिया है। मगर यह भी तथ्य है कि उन्होंने शहरी परिवेश पर भी लिखा है। यह अलग बात है कि उनकी विशेष चर्चा नहीं होती। मगर रेणु ने अपनी जिन प्रिय कहानियों का चयन किया है, उसमें उनकी शहरी जीवन पर लिखी कहानियाँ जलवा, आत्मसाक्षी, अगिनखोर, रेखाएँ : वृत्तचक्र आदि हैं, जिनपर चर्चा अपेक्षित है।
रेणु की मेरी प्रिय कहानियाँ में नौ कहानियाँ संकलित हैं, जो राजपाल प्रकाशन, दिल्ली से छपी हैं। मारे गये गुलफाम उर्फ तीसरी कसम पर बहुत सारा लिखा जा चुका है। रसप्रिया अपनी गहन संवेदना और ग्रामीण पृष्ठभूमि की विषमताओं को सजीव करने में सफल है। और लाल पान की बेगम में जैसे अभावों के बीच भरा गाँव अपने पूरे उत्साह-उल्लास के साथ खडा है। परस्पर दुश्मनी निभाते और बात-बात में एक-दूसरे की टाँग खींचती महिलाएँ जैसे अपनी खुशी में समाज को भी सम्मिलित करती हैं। ग्रामीण समाज में हजार बुराइयाँ हैं, मगर सुख-दुःख में सभी साथ हैं। और इसी को दृष्टि देती है संवदिया, जिसमें एक अभावग्रस्त आदमी भी अकेले पड चुकी बेसहारा बन चुकी स्त्री का सहारा बनने का संकल्प लिये खडा है। और बात जब सहारे की होती है, तो आदिम रात्रि की महक का एक आदमी, जिसकी हैसियत दो कौडी की नहीं, और जिसके न माँ-बाप का पता है, न घर-दुआर का, वह सरकारी अमले का सहायक बन जिंदगी काट जाता है। मगर बात जब गाँव छोडने की आती है, तो चुपचाप गाडी से उतर जाता है। और इस प्रकार रेणु ने गाँव के प्रति व्यक्ति के सहज मोह को रेखांकित किया है।
यहाँ यह भी द्रष्टव्य है कि वही रेणु पूर्णिया से पटना आते-जाते हैं, मगर पटना के हो नहीं रहते। अपने उत्कर्ष काल में भी उनके पटना क्या, बंबई तक में बसने का अवसर आया, मगर वह अपने पूर्णिया के प्रति समर्पित रहे। यहाँ तक कि अपने इलाज के संबंध में भी बंबई-दिल्ली नहीं गये।
फिर भी ये तथ्य तो है ही कि वे अपने अंतिम समय में कुछ अधिक ही पटना प्रवास करने लगे थे। और स्वाभाविक ही, तब शहर को भी अपनी नजर से देखने-जानने-समझने लगे थे। इस संग्रह में शामिल जलवा ऐसी ही कहानी है, जिसमें शहर की आवाज है और है धार्मिक सद्भाव, जिसकी कटु यथार्थ से संघर्ष की शुरुआत ही कुछ ऐसी होती है- फातिमादि को भी देखूँगा और इस तरह देखूँगा, इसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी! इसलिए कुछ देर तक पटना मार्केट को स्वप्नलोक समझकर खोया-खोया सा खडा रहा- जूते की दूकान पर।...बुरके से सिर-पैर तक ढँकी दो महिलाएँ और साथ में नौ-दस साल की गुडिया जैसी खूबसूरत लडकी। लडकी ने दुबारा पूछा : मौसी पूछ रही है कि पटना कब आए आप? दूकानदार ने रेजगारी गिनते हुए कहा, वह आप ही से पूछ रही है।
इस कहानी में एक तरफ मुस्लिम राजनीति का चित्रण है, तो पटना शहर का भी वर्णन है। 1960-80 के आसपास पटना में सिर्फ एक पटना मार्केट की भव्यता थी, जहाँ आभिजात्य वर्ग का आना-जाना, मार्केटिंग वगैरह की बात थी। अब तो पटना में हर गली में शॉपिंग मॉल और चमचमाते, भव्यता बिखेरते मार्केट हैं।
कथा 1930 से चलती है, जब एक लडकी कुरता-पाजामा पहन लेक्चर दे रही होती है...और फिर कथानायिका 1934 में भूकंप-पीडित क्षेत्रों में घूमती और गाँधी के साथ खडी दिखती है।...लेखक को यह लडकी पुनः 1937 में जिला राजनीतिक सम्मेलन में दिखती है, जब वह मुस्लिम लीगियों द्वारा गडबडी मचाने के प्रयासों को चुनौती देती है।...1943 में लडकी का साथ लेखक को हुआ, जब बनारस, लखनऊ, इलाहाबाद, गोरखपुर आदि में क्रांतिकारी कार्यक्रमों को लेकर अलख जगाने का काम शुरू हुआ।...और उसके आगे 1947 में हिन्दू-मुस्लिम दंगों के समय वह लडकी जूझती नजर आई थी। मगर इस जुझारू शख्स को आज बुर्के में ढँका देख आश्चर्यचकित है। कहानी के अंत में नकाब जब हटा, तो वह हतप्रभ है। क्योंकि जानवरों ने फातिमादि के चेहरे पर एसिड की शीशी उडेल दी थी। चेहरा झुलसकर काला हो गया। एक आँख खराब हो गई।...हाथ की हड्डी टूट गई है।
यह कहानी है, या कुछ और, क्योंकि इसमें घटनाओं की तारीखें हैं। 1950 के बाद साहित्य-जगत् में नई कहानी, अ-कहानी, आज की कहानी, आने वाली कल की कहानी और जाने कैसे-कैसे आंदोलन आये और गये। लेकिन लेखकीय संवेदना की तीव्रता को किसी वाद में कैसे बाँधा जाए? रेणु खुद एक बडे प्रयोगकर्ता रहे और कथा-विधा में इतिहास रचा। आलोचकों को जैसे उनके प्रयोग के लिये कोई संज्ञा न मिली, तो उसे आँचलिक कहानी का नाम दे दिया। जो भी हो, मुस्लिम राजनीति के साथ कांग्रेसी कल्चर पर कटु टिप्पणियाँ करती यह तीखी, मगर मार्मिक कहानी है, जिसका जिक्र किया जाना बाकी है। परंतु यह रेणु की प्रिय कहानियों में एक है। कथानायिका कहती है- दुर पगला। यहाँ रोने आया है। जलवा देख....।
वैसे रेणु तमाम अभावों, उपेक्षाओं से घिरे अपने पात्रों के बीच अंततः आशावाद ले ही आते हैं। मगर यहाँ वह गहरे अवसाद में हैं, किंकर्तव्यविमूढ समान हैं। यह अवसाद आत्मसाक्षी में भी दिखता है, जब एक कामरेड को उसकी 40 साल की निःस्वार्थ सेवा के बावजूद उसे दर-बदर कर दिया जाता है। इस पात्र के उत्थान की शुरुआत ही 40 साल पहले अछूतोद्धार वाले गीत गायन से आरंभ होती है। मगर इसके बाद तो जैसे वही घर-परिवार, जाति-समाज के लिये अछूत हो गया। और इसी के बाद वह जो घर से बाहर निकला, तो यहाँ-वहाँ भटकते जेल तक पहुँच गया, जहाँ सरमाजी ने उसे कामरेड बना लिया। एक कामरेड कैसे बनता या बनाया जाता है, उन्होंने रोचक शैली में इसकी जानकारी दी है- सरमाजी ने उसकी टिक्की को दाढी बनाने वाली पत्ती से कतर दिया था, और जनेऊ को उतारकर पैजामा में फँसा दिया था। और बोले थे, आज से तुम कामरेड गनपत। सिंघ-उंघ कुछ भी नहीं। सिर्फ कामरेड...।
40 साल तक पार्टी के लिये रोने-कलपने और अपने नेता के लिये जान तक दे देने वाला गनपत अवसरवादी नेता को फटकारता है और जिसने कभी एक चूहे तक को चूँ तक नहीं कर पाया, दारोगा को तीखे तेवर के साथ जवाब देता और सबूतों को दिखाता है कि यह दो एकड की जमीन उसके नाम है, अर्थात् उसकी मिल्कियत है। सरकारी आदमी कानून के आगे बेबस है। तब और, जब उसे कहीं से कुछ मिलने का आस न हो। नेता चंद्रिका को धमकी देने और वापस लौटने के अलावा और कोई चारा नहीं।
मगर अपने कौशल से लडाई जीत लेने के बावजूद गनपत का जमीर जिंदा है। उसमें इतना विवेक है कि अपनी प्राचीन परंपरा को ना भूले कि सामाजिक संपत्ति को हथियाना अच्छी बात नहीं। इसलिये वह कुसुमी से कहता है- नहीं कुसुम, यहाँ नहीं...। यहाँ नहीं...चलो अपने घर। यहाँ एक क्षण भी रहने का मुझे अधिकार नहीं।
अगिनखोर यानी फायरईटर मतलब सूतपुत्र। रेणु की यह एक जबर्दस्त कहानी है। कथानायक सूर्यनाथ पूछता है- देखने में कैसा है।...मेरा मतलब है कि चेहरा किससे मिलता-जुलता है। एंबुलेंस ड्राईवर से या उस कपडे की दूकान के बूढे मालिक से...।
शहरी जीवन की एक तल्ख अनुभूति है यह कहानी। सूर्यनाथ की पत्नी अन्नपूर्णा अगिनखोर की माँ आभा को विधवा माने या परित्यक्ता। और सूर्यनाथ ठीक आभारानी की तरह दाहिनी आँख की पलकों को दबा कहता है- एकई कथा।
कैसे एक ही बात हुई?
यह अन्नपूर्णा का सवाल है। भारतीय जीवन में एक स्त्री के लिये परित्यक्ता या विधवा होना कितना गंभीर है, इसे रेणु रेखांकित करते हैं। और इसलिये अन्नपूर्णा सवाल करती है। उसका पूरा संदेह है कि सूर्यनाथ आभा को भली-भांति पहचानता है। लेकिन वह उसे हँसी में उडा देता है, ताकि संदेह कपूर की तरह उड जाये। मगर अब पाठकों को संदेह है कि कहीं अन्नपूर्णा की सोच तो सही नहीं ! कथाकार इस भ्रम को बनाये रखते आगे बढता है-
कवि मानुष माने रसिक पुरुष।
जी नहीं, उसका तात्पर्य इसके अलावा भी... इससे आगे भी कुछ था...साहित्यिक लोग जरा चरित्रहीन होते हैं, यह दुनिया-जहान जानती है।
जरा नहीं, पूरे। सूर्यनाथ ने एप्रूवर यानी मुखबिर की मुद्रा बना कर कबूल किया था।
उस रात को बहुत देर तक दोनों एक-दूसरे को गुदगुदाकर हँसाते-चिढाते जगे रहे थे।
रेणु साहित्यिक चरित्र पर जैसे सवाल खडे करते भी सहज हैं। मगर उसी सहजता के साथ यह भी बताते हैं कि सवाल उचित नहीं। फिर पाठक करे तो क्या? और पाठक को जैसे वह जवाब ढूँढने की स्वतंत्रता दे देते हैं। दरअसल यही तो शहरी जीवन की जटिलता है, जहाँ मेटरनिटी सेंटर जैसी संस्थाएँ बनती-बिगडती रहती हैं और फिर वहीं से खेल शुरू हो सकते हैं या होते हैं। यहीं वह शहरी संस्कृति को उजागर करते हैं, जहाँ बहुत कुछ छुप या छुपा लिया जाता है। शहरी व्यस्तता के बीच व्यक्ति स्वयं से ही इतना त्रस्त रहता है कि अन्यों के बारे में विचार करे तो कैसे? फिर यह भी तो संभव है कि वह दूध का धुला ना हो, क्योंकि यहाँ सभी तो मौके की तलाश में हैं। फिर अगिनखोर का वास्तविक पिता कौन है? हालाँकि उँगलियाँ सूर्यनाथ की ओर उठती हैं। अन्नपूर्णा तक को संदेह है और अगिनखोर तो खैर यही मानकर चलता है। उसका वास्तविक पिता कौन है, यह उसकी माँ आभा ही बता सकती है, जो परिदृश्य से गायब है।
ऐसा आभास होता है कि अगिनखोर की रचना के वक्त रेणु के मन में दिनकर की रश्मिरथी कुलबुला रही होगी और शायद इसी बहाने उत्तर की तलाश कर रहे होंगे। अगिनखोर भी सूतपुत्र के समान सवाल करता है। मगर वह आश्वस्त नहीं है कि उसका पिता कौन है। और अपने स्तर पर वह जवाब पाने में असफल रहता है। दरअसल रेणु उस सामाजिक बुनावट की ओर संकेत करते हैं, जो समाज-भय के कारण कर्ण से लेकर अगिनखोर तक के सवाल को अनदेखा करता है। और आज जाहिर है, इसलिये अफवाहें भी फैलती हैं। और इन अफवाहों की जद में सूर्यनाथ जैसे साहित्यिक आ जाएँ तो अचरज की बात नहीं। नागरी या शहरी जीवन की इस विडंबना को रेणु रेखांकित करते हैं। क्योंकि सिर्फ एक सच को छुपाने से महाभारत युद्ध हुआ और कर्ण मारा गया, जो कि उसकी नियति थी। अगिनखोर जैसों के जिंदा रहते यह महायुद्ध चलता रहेगा।
यह अगिनखोर कॉमेडियन भी बन सकता है, राजकपूर के मेरा नाम जोकर की तरह और जिसे सूर्यनाथ भडैती कहता है, जो कि वर्तमान के कवि-सम्मेलनों में चल रहा है। नुक्कड कविता के जनक रेणु इस प्रकार कविता के अधःपतन पर भी व्यंजनामूलक प्रहार करते हैं। उनकी यह व्यंजना वर्तमान के हिन्दी-शोध पर भी है, जब एक छात्र हिन्दी साहित्य में रामघराना ले आता है। रेणु की व्यंजनामूलक प्रहार अब अगिनखोर के नये नामकरण डोगलास पर है। डोगलास मतलब दोगला! ओह, कहाँ से कहाँ पहुँचता है रचनाकार। और इस डोगलास उर्फ बुडिराज को अखाडे में उतार नामी पहलवान को चित भी करा देता है। अगिनखोर इसी विजय के उन्माद में अपनी माँ की डायरी बाहर करता है, जिसमें लिखा है- आज के सूर्यादा आमार संगे जा कोरलेन, आमार जीवने आर केउ करे नि...(आज सूर्यदा ने मेरे साथ जो कुछ किया, जीवन में और किसी ने नहीं किया।)
सीधा अर्थ यही है कि संदेह की सूई सूर्यनाथ की तरफ है। और सूर्यनाथ का तर्क है- आपने इस रोजनामचे की तारीख से अपनी जन्मतिथि मिलाकर देखी है?
आप ऐसे ज्वलंत प्रमाण को झुठला नहीं सकते, पिताजी महाराज।
सूर्यनाथ ने उसके सुर में सुर मिलाकर कहा- सूतपुत्तर सरकार। आप माने या न मानें, ठेंगे से। मैं जानता हूँ कि यह सच नहीं। असल में...बावजूद आकर्षण के, आभारानी के साथ मेरा संबंध हुआ ही नहीं। कामातुरा सुन्दरी के साथ एकान्त के उस क्षण में मैं मदनोन्मत्त अवश्य हुआ था। किन्तु...किन्तु उस लावण्यमयी लास्यमयी रमणी के मुँह में ऐसी उत्कट दुर्गन्ध थी कि मैं अचानक विरक्त हो गया...।
आगे के वार्त्तालाप अगिनखोर के निराशा-हताशा के हैं। उसके रूदन को देख सूर्यनाथ सोचने लगा- कवच-कुण्डलहीन कर्ण भी क्या इसी तरह रोया था?
अतीत से वर्तमान तक सवालों की यह घेराबंदी चलती रहेगी, और संभवतः आगे भी रहे, जब तक सामाजिक सोच में परिवर्तन नहीं आता। रेणु ने यही सवाल करना चाहा है कि क्या समाज इसके लिये तैयार है? कानून तो बन ही चुका है कि किसी की पहचान बिना उसके पिता के, उसका माता का नाम दर्ज कराने से भी हो सकती है। इस कानून के बदौलत किन्नरों को भी आरक्षण मिलने लगे हैं, मुख्य धारा में लिया जाने लगा है। मगर आवश्यकता इस बात की है कि समाज उसे स्वीकृति प्रदान करे और सामाजिक समरसता का आभास कराए।
रेणु की प्रिय कहानियों में रेखाएःवृत्तचक्र भी है। इसे पढते वक्त इसका अहसास आश्चर्यचकित करता है कि क्या रेणु को अपनी मृत्यु का पूर्वाभास था, जो यह कहानी लिख गये। एक बडे अस्पताल की पृष्ठभूमि पर लिखी गई इस कहानी की नायिका कहती है- क्या होगा सुनकर। क्या फायदा। कोई गलत थोडी लिखा है। तुम लोगों की कीर्तिकथा...सही-सही..।
एकान्तवास के वक्त ही व्यक्ति को अपने सही-गलत कारनामों का अहसास होता है। और वह सब अब मैं को हो रहा है। यहाँ मैं इस बात को नहीं भूलता कि पत्नी के कारण ही वह अब तक जिंदा है, जब पत्नी कहती है- आमी आर पारी ना...।
उसे इस बात का अहसास है कि पत्नी ने उसे उबारा है- पटना टाइम्स का स्टाफ रिपोर्टर मित्तल आया है। उमा से वह कुछ पूछता है। उमा कहती है- ऑपरेशन के ठीक दस घंटा के बाद, अभी कुछ देर पहले होश में आए हैं। अब ठीक है।
रेणु की प्रिय कहानियों को पढते वक्त यही आभास होता रहा कि वे औराही हिंगना के आगे पूर्णिया और वहाँ से आगे बढते हुये पटना अर्थात् गाँव से शहर की ओर बढते रहे। वर्तमान में युवा वर्ग यही तो कर रहा है, यानी गाँव-कस्बे से निकलकर शहर की ओर भाग रहा है। लेकिन इस पलायन के पीछे रेणु यही दिखाना चाहते हैं कि यह एक मृग मरीचिका है, छलावा है, और कुछ नहीं है। इस पलायन के पीछे एक आदिम रात्रि की महक है, क्योंकि इसका कथानायक करमा गाडी से उतरकर पैदल ही अपने गाँव की ओर चल देगा। विगत वर्ष 2020 में लॉकडाउन के समय शहर से गाँव लौटते लाखों लोगों को हमने देखा ही है। और कर्मचारी संघों का यही हाल रहा तो आत्मसाक्षी के कर्मचारी संघों में ताला लगना ही है। और यह ताला कोई प्रशासन या सरकार नहीं, हाशिये पर खडा अंतिम आदमी अर्थात् गनपत ही लगा जायेगा। जलवा देखने-दिखाने का शऊर रेणु जलवा में दिखा ही जाते हैं कि धर्म के नाम पर की गई मारकाट और राजनीति, पलायन और एसिड अटैक पर संपन्न हो सकती है, और यह एसिड अटैक उनकी अपनी बहु-बेटियों पर भी हो सकती है, जैसा कि हम वर्तमान में देख ही रहे हैं। शहर की प्रमुख त्रासदी यही है -अगिनखोर को समाज में समरस किये बिना सवाल और अराजकता बनी ही रहनी है। इसी प्रकार की विडंबना रेखाएःवृत्तचक्र की भी है कि मौज-मजे का शहरी जीवन अस्पताल की नारकीय यात्रा भी करा सकता है। रेणु का यही कथ्य है, चेतावनियाँ हैं, जिनसे वह हमें रू-ब-रू कराते हैं। और जो पचासेक साल बाद भी हमारे पीछे पडी हैं।
रेणु द्वारा लिखित कहानियाँ उनके जीवनकाल में तीन कथा संग्रह क्रमशः ठुमरी, आदिम रात्रि की महक और अगिनखोर में संगृहित और प्रकाशित हो चुके थे। प्रख्यात लेखक-आलोचक और रेणु साहित्य के मर्मज्ञ डॉ. भारत यायावर तो ऐसे रेणुमय हुए कि रेणु रचना का कोई पन्ना उडा नहीं कि वह उधर ही दौड लगा जाते थे। और इसी ऋम में उन्होंने रेणु की अनगिनत रचनाएँ ढूँढ निकाली और प्रकाशित भी कराया। इस क्रम में उन्होंने अपने श्रमसाध्य परिश्रम से उनकी ढेरों कहानियाँ खोज निकालीं। रेणु के निधनोपरांत उनके तीन कहानी संग्रह एक श्रावणी दोपहरी का धूप (1984), अच्छे आदमी (1986) और प्राणों में घुले हुए रंग (1993) का संपादन-प्रकाशन करने का सराहनीय काम किया।
इन कहानियों को खँगालते वक्त संग्रहों की शीर्षक कहानियों पर मैंने गौर किया, तो वहाँ पर भी रेणु की खास शैली वाली टोन में शहरी परिवेश दिखा। जैसे एक श्रावणी दोपहरी की धूप में जैसे अज्ञेय की चर्चित कहानी रोज की गंध आई। कहानी का क्षेत्र पटना शहर ही है, जहाँ कथा नायिका झरना अकुताई हुई है। वहीं, कथानायक पंकज, जो उससे लव-मैरेज किया और अब तक उसे जमाने से बचाकर रखता आया है, उससे बेजार है। और वह समझ नहीं पाती कि ऐसा क्यों है ?
कहानी के आरंभ में ही अपनी माँ की बातों से परेशान झरना उससे कहती है- पडोस के लोग पंकज को घरजमाई समझते हैं। वह उससे अपना घर ले लेने का आग्रह करती है।
पंकज को घर मिल गया। अब वे अपने घर में हैं। मगर झरना को दूलरी शिकायतें हैं- ...शहर में घर लेते समय मुहल्ले का भी खयाल रखना चाहिये।
पंकज सोचता है- मखनियाकुआँ से कुनकुनसिंघ लेन, कुनकुनसिंघ लेन से बिहारी-साव गली और अन्त में पिछले साल नालारोड पर घर बदलकर आ बसा है पंकज। झरना को वह इलाका भी पसंद नहीं। किन्तु, पंकज ने फिर घर की समस्या पर, झरना के कुनमुनाने के बावजूद कभी ध्यान नहीं दिया।..मुहल्ला अच्छा हो, पडोसी अच्छे हों, गली के कुत्ते रात में शोर न मचायें, ऐसा घर कहाँ मिलेगा शहर में? झरना कुछ नहीं सोचती।
अब सब स्थिर हो जाने पर, अब पंकज को झरना के मुँह से आ रही दुर्गंध से परेशानी है, जिससे वह उससे विमुख हो रहा है। और इसी बेरुखी की वजह से वह अपने पुराने परिचित गाडी वाले दादा की ओर खिंची चली जाती है। वह उसकी गाडी में बैठकर जाती भी है, लेकिन बाकरगंज में भुट्टे खरीदते पंकज को देख वह गाडी से उतर जाती है। रेणु ने अपने पात्रों को रिक्शे में बिठाया और फिर बारिश से बचने के लिये एक-दूसरे के करीब किया है। रेणु की यही तो विशेषता है कि अभावों, उपेक्षाओं और बेरुखी के बावजूद मानवीय संबंधों और संवेदनाओं को साथ-साथ करने में सफल होते हैं।
अच्छे आदमी कथा संग्रह की शीर्षक कहानी में क्रमशः गाँव, पुनः गाँव सेकस्बे और कस्बे से शहर में परिवर्तित होने की कहानी है। कथानायक उजागिर चाय-पकौडी की दूकान चलाता है। चाय बनाने का उसका और पकौडी बनाने का जिम्मा उसकी पत्नी सीता का है। इसी आधार पर खडी थी गृहस्थी और जिसमें अब एक बेटा है- प्रदीफमार। 1962 में लिखी गई है यह कहानी, जब उस जमाने में प्रदीप कुमार एक लोकप्रिय अभिनेता थे। और यह वह दौर था, जब फिल्मी अभिनेता-अभिनेत्रियों के नाम पर अपनी संतानों के नाम रखे जाते थे। स्वयं रेणु ने अपनी एक बेटी का नाम वहीदा रखा था।
खैर, प्रेमकथा से आगे चलकर बढती है गाडी, तो सडक पर आ खडी होती है। सडक, जो प्रगति और विकास का प्रतीक है और इसी बहाने बढती है कहानी- सन्तोखीसिंघ ने किसनपुर के बाबू से कहा- रासो बाबू, यह ससुरी सडक जब से चालू हुई है- चोरी-चुहाडी और भी बढ गई है। पहले तो साला गाँव के आसपास के ही चोर-डकैत चोरी-डकैती करते थे। अब तो मनिहारी घाट का चोर साला जोगबनी आकर चोरी कर जाता है- रातोंरात-बेरात।
किसनपुर के बाबू ने विरोध किया- इसमें सडक का क्या कसूर? बिना सडक खुले ही कलकत्ता के लोग कटिहार आकर पाकिट मारते हैं।
उजागिर अपने बिजनेस में मगन है। उसकी पत्नी सीता परदे के पीछे रहकर काम करती है। और ठेकेदार, ड्राईवर, दारोगा आदि की नजर उस पर है, जिसपर कभी उजागिर ने ध्यान नहीं दिया और उन्हें अच्छा आदमी मानता है। आखिर क्यों न माने! उन्हीं की वजह से तो उसकी दुकान खुली और धडल्ले से चल रही है। और अब पक्का मकान बनने लगा है। लेकिन अपनी पत्नी अर्थात् प्रदीप के माय के लच्छन देख वह अगिया बेताल हो जाता है। जिस सीता के गायब होने पर वह रोया था, अब उसे ही घर से बाहर निकालने पर उतारू है। उसके रोने-घिघियाने के बावजूद वह तभी पसीजा, जब वह आश्वस्त हुआ। कथाकार के अनुसार- प्रद्रीप के माय उजागिर की छाती से मुँह सटाकर बिलखने लगी। उसे लगा, विवाह के बाद आज पहली बार वह अपने घरवाले के साथ-अपने पुरुष के साथ सुहागरात मना रही है।..अंग-अंग में सिहरन... लहरें... तूफान... प्रदीप के बाबू, मुझे मार...डा...लो...मार...डालो !!
इस प्रकार रेणु ने अंतहीन तनावों को संवेदनाओं के तार से जोड टूटते घर को बचा लिया है। यहाँ उन्होंने इस स्त्री-पुरुष मनोविज्ञान को रखा है कि घर कितना महत्त्वपूर्ण है।
1945 में लिखी गई रेणु की कहानी है- प्राणों में घुले हुए रंग। और वह दौर था स्वाधीनता संघर्ष का, विद्रोह, दमन, अभाव-अकाल, भूख, बीमारी-बेकारी-लाचारी का। ऐसे में कथानायक मैं मेडिकल कॉलेज के जीवन की कथा को ले आया है। और इसी बहाने गाँव से लेकर नगरों तक में फैली शोषण की कथा है।
आलोचक डॉ. भारत यायावर के अनुसार - एक ही कहानी को कई बार और कई तरह से लिखते थे रेणु। उनकी कुछ कहानियों के रफ-ड्राफ्ट छह-सात बार लिखे हुए मिले। वे शब्दों के प्रयोग पर सबसे अधिक ध्यान देते थे। उपयुक्त शब्द प्रयोग के लिए लंबे समय तक परेशान रहते थे।
डॉ. यायावर आगे जानकारी देते हैं- रेणु ने अपनी पहली कहानी बटबाबा में ही वह भाषा-शिल्प और शैली अर्जित कर ली थी, जो उनकी बाद की रचनाओं में दृष्टिगोचर होती है।
1950 के दशक में, जब नई कहानी आंदोलन जोरों पर था, इसके नेता-त्रयी मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर थे। सच कहा जाए तो मूलतः ये शहरी कथाकार थे। और इसलिए इन्हें नई कहानी आंदोलन की आवश्यकता पडी। औद्योगिकीकरण और नगरीकरण का दौर भी था ही। ऐसे में ग्राम कथा बनाम नगर कथा का भी विवाद-सँवाद चला। धुर ग्रामीण क्षेत्र के रेणु इस पचडे में न पडकर अपनी अलग राह निकाली, जिसे आलोचकों ने आगे चलकर मान्यता दी। रेणु का विरोध भी बहुत हुआ, मगर वे अविचलित रहे और अपनी राह आगे चलते रहे।
1947 के आसपास वह पार्टी का भूत लिख गए, जिसमें राजनीतिक पार्टियों और उनके तथाकथित कार्यकर्ताओं के दँभ भरे मुखौटे हैं और आज तो वह और अधिक प्रासंगिक है। इसी प्रकार 1948 में लिखी खंडहर को पढते वक्त उदय प्रकाश के सत्तर के दशक में लिखी राम सजीवन की प्रेम कथा की याद आ जाती है। आश्चर्य होता है कि रेणु बिना किसी शोर-शराबे के बहुत पहले ही ऐसे कथ्यों पर अपनी कलम चला चुके थे। उन्होंने भले ही गाँव से, एक अंचल विशेष से अपनी यात्रा शुरू की, मगर फिर भी उन्होंने नगर-महानगरों को भी अपने कथ्य में समेटा है।
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