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सारे फसाने भर में जिसका जिक्र है...

दीनानाथ मौर्य
पुनर्पाठ : मैला आँचल
मैला आँचल, 1954 ई. के पाठ से गुजरते हुए आस्ट्रिया के विख्यात कवि-आलोचक अन्सर्ट फिशर की यह मान्यता सार्थक जान पडती है कि सभी कलाएँ काल से प्रभावित होती हैं और मानवता को उसी हद तक चित्रित करती हैं जिस हद तक वह एक खास ऐतिहासिक स्थिति के विचारों, इच्छाओं,जरूरतों और आशाओं के अनुकूल पडती हैं, लेकिन इसके साथ ही कला इस सीमा को अतिक्रमित भी करती है और ऐतिहासिक कालखंड के दायरे में ही मानवता के एक क्षण का सृजन करती हैं, जिसमें निश्चित विकास की प्रतिज्ञा भी होती है। आज जब हम सामाजिक इतिहास की सर्बाल्टन दृष्टि से किसी साहित्यिक रचना पर विचार करते हैं तो फिशर का यह दर्शन दो स्तरों पर हमारे लिए सहायक हो सकता है। पहला, रचना में निहित यथार्थ को ऐतिहासिक स्थितियों के मध्य समझने में; और दूसरे, रचनाकार की भविष्यलक्षी मानवतावादी दृष्टि की पहचान करने में। सामाजिक परिवर्तन के साथ इतिहास का पुनर्मूल्यांकन ऐतिहासिक विकास की शर्त है और इसी रूप में साहित्यिक रचनाओं का ऐतिहासिक पाठ महत्त्वपूर्ण हो जाता है। मैला आँचल फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा लिखा गया एक आँचलिक उपन्यास है जिसमें भारतीय समाज की जाति व्यवस्था की समस्याओं को कई स्तरों पर चित्रित किया गया है। 20 जून 2011 से जब बहुप्रतीक्षित जाति जनगणना की शुरुआत त्रिपुरा के हेजामारा के जनजातीय गाँव संखोला से हुई तो मैला आँचल के इस पक्ष पर हमारा ध्यान जाना स्वाभाविक था।
कोई रिसर्च कभी असफल नहीं होता है डाक्टर! तुमने कम से कम मिट्टी को पहचाना है.... मिट्टी और मनुष्य से मुहब्बत! छोटी बात नहीं। ममता द्वारा डॉ. प्रशान्त को कहा गया यह कथन रेणु के लिए भी उतना ही सही और सार्थक है जितना प्रशान्त के लिए। यह बात दीगर है कि जिस मेरीगंज गाँव को पिछडे गाँव का प्रतीक मानकर रेणु मैला आँचल की कथावस्तु का निर्माण करते हैं, वह बगैर मिट्टी और मनुष्य से मुहब्बत के सम्भव नहीं था। लेकिन रेणु इसमें सफल होते हैं। रेणु मैला आँचल की भूमिका में जिस पिछडेपन की बात करते हैं, उसकी सबसे प्रबल प्रस्तुति उपन्यास में भारतीय समाज में मौजूद जाति-व्यवस्था के रूप में हुई है। जाति-प्रथा भारतीय ग्राम्य जीवन के पिछडेपन की निशानी है, जिसका मूल कारण वर्णव्यवस्था और जातीय श्रेष्ठताबोध की मिथ्या चेतना है। जिस समस्या को समझने में देश की लोकतांत्रिक सरकार को 60 साल लग गए, रेणु उसे 1954 में ही पहचान गए थे। मैला आँचल का मेरीगंज गाँव (जिसमें कुल पढे-लिखे आदमी 10 हैं और नये पढने वालों की संख्या 15 है)-में बारहों बरन के लोग रहते हैं। गाँव में अलग-अलग जाति के लोगों की अलग-अलग टोलियाँ बनी हुई हैं। भिन्न-भिन्न जातियों में एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए हिंसा और अशान्ति का माहौल गाँवों में हमेशा बना रहता है। गाँव में फूट और अलगाव का प्रमुख कारण इस जाति-व्यवस्था के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले सामाजिक सांस्कृतिक अंतर्विरोध हैं। जाति व्यवस्था के तमाम दंश हैं फिर भी उसके श्रेणीक्रम की श्रेष्ठता सामाजिक व्यवहार के तमाम आयामों को नियंत्रित करता है। बतौर संवेदनशील साहित्यकार रेणु यह समझने में सफल रहे हैं कि भारतीय समाज में इसका कितना महत्त्व है? इस महत्त्व का वर्णन रेणु उपन्यास के नौवें परिच्छेद में करते हैं- जाति बहुत बडी चीज है। जात-पात नहीं मानने वालों की भी जाति होती है सिर्फ हिंदू कहने से ही पिंड नहीं छूट सकता। ब्राह्मण हैं?।।। कौन ब्राह्मण! गोत्र क्या है? मूल कौन है?... शहर में कोई किसी से जात नहीं पूछता। शहर के लोगों की जाति का क्या ठिकाना! लेकिन गाँव में तो बिना जाति के आपका पानी नहीं चल सकता। भारतीय जाति व्यवस्था का निर्माण दरअसल सामाजिक असमानता और स्तरीकरण के लिए ही किया गया है। जिसे श्रम विभाजन का नाम देकर सही ठहराने की कोशिश की जाती रही है। रेणु इसे बखूबी समझते हैं। इसलिए वे इसकी तमाम बारीकियों को बडी ही सहजता के साथ उजागर कर पाने में सफल होते हैं। भारतीय समाज में गहरे पैठी इस जाति व्यवस्था का सम्बन्ध सामाजिक श्रेष्ठता से जुडता है और फिर आरंभ होती है संस्कृतीकरण की वह प्रक्रिया, जिसमें तथाकथित रूप से समाज के उच्च वर्ग द्वारा पूरे समाज की मर्यादा, नैतिकता, आचार-विचार, आस्था और विश्वास के पैमाने बनाये जाते हैं। और फिर इस तरह से निर्मित हेजेमनी की पूरे सामाजिक तानेबाने में सर्वमान्यता तैयार की जाती है। मैला आँचल में भी प्रभुत्वशाली वह वर्ग तीसरी शक्ति के रूप में मौजूद है, जो संख्या में तो अन्य जातियों के लोगों से कम है लेकिन अन्य जातियों के लिए धार्मिक विश्वासों तथा सामाजिक मान्यताओं के एक मात्र विधायक तत्त्व के रूप में सामने आते है। कल्चरल कैपिटल के सवाल को रेणु बहुत ही बारीकी के साथ उठाते हैं। जिसके जरीये समाज का प्रभुशाली वर्ग दूसरे अन्य सामाजिक वर्गों के बीच आत्महीनता का बीजारोपण करता है। उपन्यास यह बताता चलता है कि गाँव में जिस बारहों बरन के लोग रहते हैं उनके अलग-अलग टोले बने हुए हैं, जैसे तंत्रिमा टोला, पोलिया टोला, क्षत्रिय टोला, दुसाध् टोला, पासवान टोला, कायस्थ टोला, राजपूत टोला और यादव टोला आदि। प्रत्येक जाति के टोले के नाम के पीछे एक खास तरह का भाव जुडा होता है। यह भाव उनकी सामाजिक, आर्थिक हैसियत को व्यक्त करता है। इस तरह समाज में एक मिथ्या चेतना का निर्माण होता है जिसके चलते एक टोले के लोग, दूसरे टोले के लोगों को नीचा दिखाने के लिए उसका न सिर्फ खास तरह का नामकरण करते हैं, बल्कि इसके कारण निरन्तर उनके बीच मनमुटाव और झगडे की स्थिति भी बनी रहती है। मेरीगंज गाँव में अशान्ति और हिंसा का एक कारण जाति-प्रथा है। प्रत्येक जाति चाहे वह श्रेणीक्रम में ऊँची हो अथवा नीची, अपनी जाति को अपनी पहचान के रूप में स्वीकार करती है। गाँव में तीन प्रमुख दल हैं- कायस्थ, राजपूत और यादव। कायस्थ, राजपूत लोग यादवों से न केवल आर्थिक आधार पर श्रेष्ठ हैं, बल्कि उनका सामाजिक महत्त्व भी यादवों से अच्छा है। लेकिन इधर कुछ वर्षों से यादवों की आर्थिक स्थिति में बदलाव आया है और वे लोग अपने को क्षत्रिय कहने लगे हैं। परम्परागत समाज के विधायक ब्राह्मण वर्ग को भला यह बात कैसे अच्छी लगती, जो एक लम्बे अरसे से लोगों को एक खास ढाँचे में बाँटकर देखने के आदी रहे हैं। मेरीगंज के ज्योतिषी जी कहते हैं- यह राजपूतों के चुप रहने का फल है कि चारों ओर हर जाति के लोग गले में जनेऊ लटकाए फिर रहे हैं। भूमफोड क्षत्री तो कभी नहीं सुना था... शिव हो! शिव हो!
गोदान के होरी को जिस जाति और बिरादरी का मोह मृत्यु तक बना रहता है, भारतीय समाज में उसकी जडें काफी गहरी और मजबूत हैं। इस जाति व्यवस्था में व्यक्ति का अपना कुछ नहीं होता, सब समाज और बिरादरी का होता है। इस व्यवस्था के लाभकारी क्षोर पर स्थित एक खास वर्ग यह चाहता है कि गाँवों में यह व्यवस्था हमेशा बनी रहे और किसी तरह से इसे कमजोर करने वाली जागरूकता न आने पाए वरना उसका हित प्रभावित हो सकता है। भ्रम और अंधविश्वास बना रहे, इसके लिए वह लगातार प्रयास करता रहता है। कभी सचेत रूप में और कभी परम्परा के नाम पर अज्ञानतावश। मैला आँचल में इस वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए बूढे ज्योतिषी जी भविष्यवाणी करते हैं- कोई माने या नहीं माने, हम कहते हैं कि एक दिन इस गाँव में गिद्ध कौवा उडेगा। लक्षण अच्छे नहीं हैं। गाँव का ग्रह बिगडा हुआ है। किसी दिन इस गाँव में खून होगा खून! पुलिस, दरोगा गाँव की गली-गली में घूमेगा और यह इसपिताल? अभी तो नहीं मालूम होगा। जब कुएँ में दवा डालकर हैजा फैलाएगा तो समझना। शिव हो! शिव हो! इतना ही नहीं पंडित जी के पास एक और भी महत्त्वपूर्ण जानकारी है- काला बुखार का नाम पहले लोगों ने कभी नहीं सुना था? पूरब मुलुक कामरू कमिच्छा हासाम से काला बुखार वालों का लहू शीशी में बंद करके यही लोग ले आए थे। आजकल घर-घर काला बुखार फैल गया है... इसके अलावा, बिलैती दवा में गाय का खून मिला रहता है। उपन्यास की कथा है कि ये वही पंडित जी हैं, जिन्हें अपने जीवन में न केवल तीन-तीन स्त्रियों का अनुभव है, बल्कि एक तो केवल इसलिए मर गई कि उन्होंने इलाज अंग्रेजी विधि से कराने पर मना कर दिया था।
फणीश्वरनाथ रेणु मैला आँचल में जाति-पाँत का असली रूप छुआछूत में व्यक्त होता देखते हैं। छुआछूत के कारण ही विभिन्न जातियों के बीच परस्पर ऊँच-नीच का भाव बना रहता है। भूल से यदि कोई इस नियम को तोडता है तो गोदान (प्रेमचंद) के धर्म के प्रायश्चित्त की तरह मैला आँचल में भी उसका विधान है। बिरंची ने एक बार तहसीलदार के साथ पूडी-जलेबी खाई थी जिसका प्रायश्चित्त उसे करना पडा था। जनेऊ देने के लिए जाति के पंडित जी आए थे। बिरंची के सिर पर सात घंटे तक घैला-सुपाडी रखने की सजा दी गयी थी- पाँच सुपारी पर घैला भर पानी! जरा भी घैला हिला, एक बूंद भी पानी गिरा कि ऊपर से झाड की मार! तहसीलदार साहब क्या कर सकते थे। जाति-बिरादरी का मामला है, इसमें वे कुछ नहीं बोल सकते। आखिर पाँच रुपैया जुरमाना और जाति के पंडित को एक जोडा धोती देकर बिरंची ने अपना हुक्का-पानी खुलवाया था...पूडी-जलेबी का स्वाद याद नहीं। रेणु नौवें परिच्छेद में जाति-प्रथा की भारतीय समाज में पैठ की पडताल करते हुए लिखते हैं- शहर में लोगों की जाति का क्या ठिकाना? लेकिन गाँव में बिना जाति के आपका पानी नहीं चल सकता। मेरीगंज गाँव इसका उदाहरण है। डा. प्रशान्त के गाँव पहुँचने पर लोगों की सबसे पहली जिज्ञासा उसकी जाति को लेकर है। फिर, गाँव के लोगों को यह भी खयाल आता है कि डॉ. का नौकर प्यारू तो दुसाध है, उसका बनाया खाना डॉ. कैसे खायेगा?
छुआछूत और जाति-प्रथा की रूढिवादिता और जडता का रोचक प्रसंग मठ के भण्डारे में होने वाली आपसी फूट और अलगाव में दिखता है। जब बाभन तथा सिपैहिया टोली के लोग तथाकथित निम्नजाति के लोगों के साथ बैठना नहीं पसंद करते हैं। जबकि रात में उनके टोलों में विचरण करते हैं और दलित महिलाओं का यौन शोषण करते हैं। ब्राह्मणवाद का यह दुहरा शोषण, जिसे रेणु मैला आँचल में दिखाते हैं उससे एक ओर इसके खोखलेपन का पता चलता है तथा दूसरी ओर भारतीय वर्णव्यवस्था का दुखद यथार्थ भी इस रूप में सामने आता है। पिछडी जाति के लोग इस सच्चाई से वाकिफ होते हुए भी अपने सामाजिक स्तर के पिछडेपन के कारण कह नहीं पाते हैं। फिर भी उनका आक्रोश किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाता है- अरे हो बुडबक बभना, चुम्मा लेवे में जात नहीं रे जाए... दिन-भर पूजा पर आसन लगा के पोथी-पुरान बंचनिया। रात के ततमा टोली के गलियान में जोतखी जी पतरा गननियाँ। जैसे गीत उनके इसी दबे हुए आक्रोश का परिणाम है।
गाँधी का असर गाँवों में दिख रहा था। उपन्यास में पिछडी जातियों को यह विश्वास धीरे-धीरे होने लगा है कि आदमी कर्म से बडा होता है, जाति से नहीं। बालदेव मठ पर लोगों को बताता है- जय मंगल बाबू जो मिनिस्टर हुए हैं, अपना दस्तखत भी नहीं जानते हैं। बहुत छोटी जाति का है। वह भी गरीब आदमी थे, मूरख थे। मगर मन में सेवा-भाव था और महात्मा जी उसको मेनिस्टर चुन लिए। दूसरी ओर उच्च जाति के लोगों को बालदेव की लीडरी नहीं सुहाती है क्योंकि वह पिछडी जाति का है। ग्वाला होकर लीडरी करेगा? सिपैहिया टोला का हरगौरी उससे कहता है- अरे भाई, सभी काशी चले जाओगे? पत्तल चाटने के लिए भी तो कुछ लोग रह जाओ। जेल क्या गए, पंडित जमाहिर लाल हो गए। कांग्रेस आफिस में भोलटियरी करते थे, अब अंधों में काना बनकर यहाँ लीडरी छाँटने आया है। स्वयं सेवक न घोडा का दुम।
मैला आँचल में शिक्षित लोगों के बीच जाति का उतना महत्त्व नहीं दिखायी पडता है जितना अशिक्षितों और ग्रामीणों के बीच। डा. प्रशान्त की जाति का कोई पता नहीं है, उसका विश्वनाथ प्रसाद सिंह की बेटी कमली से होने वाले संबंध में भी जाति कहीं आडे नहीं आती है। अतः कहा जा सकता है कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था में समाज की थोपी गई नैतिकता का बोझ जितना तथाकथित निम्न जाति को होता है, उतना उच्च जाति को नहीं क्योंकि उनके पास अपनी नैतिकता और प्रतिष्ठा की सुरक्षा के लिए अपेक्षाकृत कहीं अधिक और दूसरे कई सामाजिक-सांस्कृतिक साधन होते हैं।
मेरीगंज गाँव की राजनीति भी इस जातिवादी जड व्यवस्था से अलग नहीं है। गाँवों में जातिगत समीकरण को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक दलों का गठन हुआ था। इन दलों के लीडर का चुनाव भी जातीय धु*वीकरण को ध्यान में रखकर किया गया है। गाँव में प्रमुख तीन राजनीतिक दल हैं- कांग्रेस पार्टी, स्वयं सेवक संघ और कम्यूनिस्ट पार्टी। इनमें उच्च जाति के लोग ज्यादा स्वयं सेवक संघ में हैं जिसके लीडर वासुदेव तथा हरगौरी हैं। पिछडे वर्ग के लोग कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी में बंटे हुए हैं- कांग्रेस का लीडर बालदेव है तथा कम्यूनिस्ट पार्टी का लीडर काली चरण। पार्टी की जिला इकाइयाँ जाति के हिसाब से गाँवों के लीडर का चयन करती हैं। मेरीगंज में सबसे अधिक यादवों की आबादी है, इसलिए कम्यूनिस्ट पार्टी वहाँ पर कामरेड गंगाप्रसाद यादव को भेजती है। गाँव के मेहनतकश मजदूर तथा संथाल, जो कि बडे किसानों के बटाईदार हैं, भी कम्यूनिस्ट पार्टी में शामिल हैं। जातीय समीकरण के आधार पर लीडरों का चुनाव करने वाली कम्यूनिस्ट पार्टी उपन्यास की कथा में भारतीय ग्रामीण समाज की जडता और उसकी व्यवस्था को तोडने का प्रयास करती है। वर्गसंघर्ष का पैरोकार उसका लीडर कालीचरण कहता है- जात क्या है! जात दो ही है, एक गरीब और दूसरी अमीर!... खेलावन को देखा, यादवों की ही जमीन हडप रहा है.... देख लो आँख खोलकर, गाँव में सिर्फ दो जात हैं। अमीर-गरीब। लेकिन कालीचरन जातिसंघर्ष को वर्गसंघर्ष में बदलने में पूरा सफल नहीं हो पाता है। इसका एक कारण तो कम्युनिस्ट पार्टी की अपनी आंतरिक समस्या और दूसरा कारण कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा भारतीय सामाजिक व्यवस्था के सांस्कृतिक आयामों के अंतर्विरोधों की नासमझ भरी राय। कांग्रेस जमींदारों की पार्टी है, जमींदारी टूटने और सभी बडे किसानों के हितों के एक होने पर कांग्रेस उनका पक्ष लेती है और जमींदारी का टूटना उसके लिए किसी जुलुम से कम नहीं है। कांग्रेसी लीडर बावनदास जिला कांग्रेस के नेताओं को खबर देता है- गाँव में जुलुम हो रहा है। इस समस्या ने तहसीलदार हरगौरी सिंह, विश्वनाथ बाबू तथा खिलावन सिंह यादव को अपने वर्गीय चरित्र के अनुसार एक मंच पर खडा कर दिया है। यहाँ जाति समाप्त हो जाती है, अपनी ही जाति के धनी किसान गरीब किसनों को उनकी जमीन से बेदखल कर रहे हैं। लोगों का स्वाभिमान भी जाग गया है। कालीचरण लोगों को बताता है- अरे! वह जमाना चला गया जब राजपूत टोली और बाभन टोली के लोग बात-बात में लात-जूता चलाते थे। याद नहीं? एक बार टहलू पासवान का गुरु घोडी पर चढकर आ रहा था। गाँव के अंदर यदि आता तो एक बात भी थी। गाँव के बाहर ही सिंध जी ने घोडी पर से नीचे गिराकर जूते से मारना शुरू कर दिया था-साला दुसाध, घोडी पर चडेगा!...अब वह जमाना नहीं है। गाँधीजी का जमाना है। नया तहसीलदार हुआ है तो क्या? हमारा क्या बिगाड लेगा? न जगह न जमीन है। इस गाँव में नहीं उस गाँव में रहें, बराबर है... धमकी देते हैं कि जूते से रैट करेंगे। अच्छा! अच्छा! लेकिन इस स्वाभिमान के साथ है निम्न वर्ग की कमजोरियाँ जो फुलिया जैसे लोगों को उच्च जाति की ओर आकर्षित करती है। लोग अपने नाम के साथ ऊँची जाति का नाम जोडने पर गर्व महसूस करते हैं। फुलिया का सम्बन्ध सहदेव मिसिर से है और फुलिया अब जाति-समाज से नहीं डरती। वह तंत्रिमा क्षत्री नहीं, वह असल बुंदेला क्षत्री की स्त्री है। आँगन में अपने से पकाकर खाती है।... मां का छुआ भी नहीं खाती। यह समाज के इस वर्ग में व्याप्त हेजेमनी को व्यक्त करने वाली स्थितियाँ हैं। इस तरह कांग्रेसी नेता बालदेव, जो प्रारम्भ में हिंसावाद का विरोधी और समानता का पक्षधर रहता है। अंततः अपनी जाति में ही जाना चाहता है। इसका कारण स्वतंत्रता के बाद उत्तर भारत में जाति आधारित राजनीति है तो दूसरा उसका वर्गीय कमजोरी। जिससे वह लडने में असमर्थ होकर राजनीतिक स्वार्थ के लिए वह जातिवादी व्यवस्था का हिमायती बनता है- वह अपने गाँव में रहेगा, अपने समाज में, अपनी जाति में रहेगा... जाति बहुत बडी चीज है.... जाति की बात ऐसी है कि सभी बडे-बडे लीडर अपनी जाति की पार्टी में हैं। यह तो राजनीति है। बालदेव की यह समझ आज भी समूचे उत्तर भारत की राजनीति का कटु यथार्थ है। आज भी कमोवेश यह स्थिति आसानी से देखी जा सकती है कि समाज के तथाकथित उच्च वर्ग द्वारा अपनी सामाजिक सत्ता को बनाये रखने के लिए विविध विधान निर्मित किये जाते हैं। समस्याएँ पिछडों की, दलितों की, आदिवासियों की रहेंगी पर उसके लीडर तथाकथित ऊँची जाति के लोग बन बैठते हैं। गौरतलब है कि यह मुद्दा केवल राजनीति तक सीमित नहीं है बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के दूसरे पहलुओं में भी यह समस्या व्याप्त है। जाति क्या है? वर्णवादी व्यवस्था की असमान, सामाजिक पहचान। यह एक ऐसी सामाजिक समस्या है जिससे निपटने के लिए उसके मूल को जानना आवश्यक है। सरकारी स्तर पर यह कार्य भले ही आजादी के बाद पहली बार हो रहा हो, लेकिन सांस्कृतिक स्तर पर, इसकी पहचान बहुत पहले से ही शुरू हो चुकी थी। मैला आँचल आँचलिक उपन्यास की इस कथा में सैकडों आँखों का देखा, जाति-व्यवस्था का यह सच उजागर हुआ है जिसे रेणु ने आलोचकीय दृष्टि से देखा है। रेणु इस उपन्यास में जाति को बहुत बडी चीज मानते हैं- पहचान और समस्या दोनों रूपों में। वे यह बताने में भी सफल होते हैं कि जाति व्यवस्था समाज के पिछडेपन की निशानी है। उसको उच्च वर्ग समाज के तथाकथित निम्न वर्ग को अलगाने के लिए हमेशा-हमेशा बनाए रखना चाहता है। चाहे वह परंपरावादी जोतखी जी हो अथवा आज के राजनीतिक दलों के लीडर और जमींदार। जाति-व्यवस्था आदमी को इंसान नहीं मानती, उसे जातिगत खांचों में बाँटकर उसका शोषण करती है। रेणु इस जातिवाद के लिए वर्ग-संघर्ष आवश्यक मानते हैं। इस शोषण, दमन तथा उत्पीडन की कुव्यवस्था को खत्म करने का एक ही रास्ता है कि समूची ब्राह्मणवादी, सामंती संस्कृति का आमूलचूल परिवर्तन। बगैर इसके, इस जातिगत व्यवस्था से निजात पाना सम्भव नहीं होगा। रेणु इसका संकेत कालीचरण के माध्यम से देते हैं। मैला आँचल उपन्यास में शीर्षक के चुनाव से लेकर कथानक के विकास तक रेणु के मन में सुमित्रानंदन पंत की कविता भारत माता ग्राम वासिनी गूँजती रहती है और इसका अहसास पाठक को बराबर बना रहता है कि वह (रेणु) चीजों का साहित्य में चयन नहीं कर रहे थे बल्कि बटोर रहे थे। समाज की जिन सच्चाइयों का उद्घाटन इतनी बारीकी के साथ उपन्यास में हुआ है, वह इसी बटोरने की लेखकीय क्षमता का ही प्रमाण है जिसे रेणु ने उपन्यास में बार-बार कई स्तरों पर सिद्ध किया है।

सम्पर्क - असिस्टेंट प्रोफेसर,
हिंदी और आधुनिक भारतीय भाषा विभाग
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज।
मो. 9999108490
इ-मेल -dnathjnu@gmail.com