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प्रति-आख्यान (काउंटर नैरेटिव) की अवधारणा और मरु-गुर्जर प्रेमाख्यान जेठवा-ऊजळी

प्रेमसिंह
उत्तर भारत में देश भाषा साहित्य की परंपरा के शुरुआती अंश हमें अपभ्रंश काव्य में मिलते हैं जिसकी परंपरा आठवीं-नौवीं सदी से शुरू होकर चौदहवीं-पन्द्रहवीं सदी तक आती है। लगभग चौदहवीं-पन्द्रहवीं सदी में हमें नव्य आर्य भारतीय भाषाओं का विधिवत् काव्य मिलना शुरू होता है। चौदहवीं सदी के चंदायन से अवधी की प्रेमाख्यान परंपरा शुरू होती है, वहीं इसी समय मरु-गुर्जर अपभ्रंश में मारवाडी और गुजराती के स्वतन्त्र काव्य-ग्रन्थ मिलने शुरू होते हैं। पन्द्रहवीं सदी में आकर रामायण और महाभारत को आधार बनाकर लिखे गए विष्णुदास कृत ब्रजभाषा ग्रंथ मिलते हैं। मिथिला के विद्यापति1 का काव्य-संसार भी पंद्रहवीं सदी का पूर्वार्द्ध है। तात्पर्य यह है कि उत्तर भारत में देशभाषा काव्य लगभग एक साथ ही चौदहवीं-पंद्रहवीं सदी से शुरू होता है और उसी सन्दर्भ में राजस्थानी साहित्य के उद्भव को देखा जाना चाहिए।
मध्यकालीन राजस्थानी की लिखित साहित्यिक परंपरा जितनी सशक्त है उतनी ही उसकी मौखिक परंपरा। लिखित साहित्य की एक ठोस परंपरा मुख्यतः क्षत्रिय वंश या राजपूत रजवाडों में लिखे गए ख्यात, वात, विगत, पीढीयावली, वंशावली, वचनिका, दवावैत आदि साहित्यिक रूपों में उपलब्ध है जिनको लिखने वालों में चारण, भाट, जैन आदि जातियाँ या समुदाय होते थे। ऐतिहासिक रूप से चौदहवीं-पन्द्रहवीं सदी में राजपूत वर्ग की राजस्थान के प्रमुख शासक वर्ग के रूप में प्रतिष्ठा होती है और सोलहवीं सदीं में राजपूत जातियों और वंशों को विधिवत् रूप से व्याख्यायित करने की परंपरा हमें ख्यातों आदि में मिलती है। इस लिखित परंपरा के बरक्स एक मौखिक परंपरा भी चल रही थी जो शासक वर्ग को ध्यान में रखकर बन रहे मूल्यों, क्षत्रियों की प्रतिष्ठा आदि को चुनौती देते हुए या उनको जटिलता में दिखाते हुए बन रही थी। मौखिक परंपरा या लोक-काव्य की इस परंपरा को अगर हम ध्यान से देखें तो यह राजपूतीकरण की प्रकिया का प्रति-आख्यान या काउन्टर नैरेटिव रच रही थी। इन लोक-काव्यों में मानवीय मूल्यों, शौर्य के आदर्शों आदि को राजपूतों से इतर (या उनके साथ) चारण, विश्नोई, जाट, भील और पशुचारण से संबंधित जातियाँ जैसे राइका आदि वर्ग के पात्रों के माध्यम से स्थापित किया गया है। इसी प्रकिया को विस्तार से दिखाते हुए इतिहासकार तनुजा कोटियाल लिखती हैं-
"Oral narratives dedicated to folk deities like Gogade, Pabuji, Ramdeoji, Devnarayanji, Tejaji etc. while appearing to extol Rajput heroism, actually bring forth very complex processes of community identity formation among low caste mobile groups. They also reflect how communities as social groups perceive their past.---These narratives thus take shape of subaltern histories and emerge as counter narratives to the dominant Rajput narratives."2
लोक-काव्य को हम दो रूपों में बाँट सकते हैं- पहली परंपरा में वीरतामूलक लोक-काव्य रखे जा सकते हैं यथा राजस्थान के ऐसे वीर पुरुष जिन्होंने समाज में किसी मूल्य की रक्षा करते हुए, तत्कालीन समाज की अर्थव्यवस्था के प्रतीक पशुओं की रक्षा करते हुए या किसी वचन अथवा रिश्ते में बँधकर अपना प्राणोत्सर्ग किया। इस परंपरा में पाबूजी, देवनारायणजी या पाँच पीर अथवा पाँच लोक देवताओं के आख्यानों में हम लोक हित में मृत्यु के वरण की स्थापना देख सकते हैं। लोकहित में किये गए प्राणोत्सर्ग की वजह से ही उन व्यक्तित्वों का दैवीकरण हो गया है।
लोक-काव्यों की दूसरी परंपरा वह थी जो वीरत्व और मृत्यु के इतर लोकजीवन में प्रेम और विरहजन्य मानव के अन्तःकरण की संवेदनाओं को लेकर लिखे या गाये जा रहे थे। इन लोक-काव्यों में प्रेम या विरह को दर्शाया गया है जिसकी उत्तर भारत में विस्तृत परंपरा रही है। हिन्दी प्रेमाख्यान परम्परा का सबसे पहला उदाहरण लौरिक-चंदा या चांदायन है जो चौदहवीं सदी के अंत में लिखा जा चुका था।3 अवधी के प्रेमाख्यानों पर सूफी तत्त्वों का विस्तृत अध्ययन आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया है4 जो सूफी परंपरा के प्रतीकों को हिंदू घरों की कहानी के माध्यम से समझाता है। जहाँ कवि को सहृदयों के मन में संवेदनाओं को झकझोरना होता है वहाँ वह प्रधान काव्य रूप में विरह की अभिव्यंजना करता है। अवधी प्रेमाख्यानों में बारहमासा की सर्वत्र उपस्थिति इस बात का प्रमाण है। बारहमासा एक तरह से चौमासा लोकगीतों से जुडी परंपरा थी जो साहित्य में आकर काव्य विधा बन गई।5 विरह भक्ति के कवियों के लिये परमात्मा से बिछुडी हुई आत्मा के प्रणय-निवेदन का एक रूपक हो जाता है और साधक वहाँ एक विरहिणी बन जाता है। सूफी कवियों के यहाँ परम्परा में हम यह देखते हैं कि आत्मा हमेशा परमात्मा के विरह में रहती है उसका अंतिम एकाकार मृत्यु में होता है।
इसी तर्ज पर मानवीय प्रेम को दर्शाने के लिए राजस्थान में विरह को आधार बनाकर लोक-काव्य लिखे या गाये गए। राजस्थानी में प्रेमाख्यानों की एक लम्बी परम्परा रही है जिसमें ढोला मारू रा दूहा प्रमुख है जिसे कवि कल्लोल कृत मानकर उसे साहित्यिक रूप प्रदान कर दिया गया है तथापि इसे लोक की रचना कहना ही अधिक ठीक होगा। इसके अलावा केहर-कंवल, आभलदे-खिंवजी, आसा-बाघेली, नागजी-नागवंती, जलाल-बूबना, सैणी-बीझाणंद, रिडमल-हंसवती, जेठवा-ऊजळी, बींजा-सोरठ, मूमल-महेन्द्र, बाघा-भारमली, रामू-चनणा, निहालदे-सुल्तान, रतन-राणा आदि प्रमुख हैं। लोक-काव्यों में विरह लोक के नायक नायिकाओं के माध्यम से प्रकट होता है। इन लोक-काव्यों में धार्मिक सन्दर्भों से परे प्रेम और विरह की ही स्थापना होती है। प्रेम काव्यों के इसी महत्त्व को दर्शाते हुए विजयदान देथा लिखते हैं-सामाजिक विकास और मनुष्य जीवन में अन्योन्याश्रित संबंध होने पर भी यह कहना कि प्रेमाभिव्यक्तियाँ वास्तविक प्रेम का हू-ब-हू चित्रण या सहज प्रतिबिंब मात्र हैं, सर्वथा अवैज्ञानिक और भ्रान्तिमूलक है। ये प्रेम काव्य एक ओर तो प्रेमी को अपनी अनुभूतियों का माध्यम प्रस्तुत करती हैं और दूसरी ओर उसके मन में नई अनुभूतियों का संचरण भी करती हैं, जिससे नये काव्यों की सृष्टि का आधार जुडता है। समय और समाज के साथ अविच्छिन्न संबंध होते हुए भी इन प्रेम काव्यों का अपना स्वतंत्र इतिहास है। 6
लोक प्रेमाख्यानों की तुलना वीरतामूलक मौखिक परंपरा के काव्य से करें तो यह साफ हो जाता है कि लोक प्रेमाख्यान कुछ विशिष्टता लिये हुए हैं। वीरता अथवा मृत्यु की स्थापना करने वाले काव्यों (जैसे पाबूजी, देवनारायणजी को आधार बनाकर लिखे गए काव्य) के मूल्य किसी न किसी देशकाल, जाति आदि में बँधे हुए हैं जो जातिगत व्यवहारों, लोक विश्वासों की बात करते हैं- जैसे चारण जाति की स्त्री को देवी अथवा शक्ति के रूप में चित्रित करना और राजपूत शासक वर्ग द्वारा उनसे शक्ति प्राप्त करना। इनके बरक्स अगर हम ढोला-मारू, जेठवा-ऊजळी जैसे लोक प्रेमाख्यानों को देखें तो हम पाते हैं कि उनके मूल्य शाश्वत हैं, वे किसी जाति में बंधे हुए नहीं हैं। जाति व्यवस्था और सत्ता-लोलुपता का अतिक्रमण कर और त्याग, शरणागत की सहायता कर शाश्वत प्रेम की स्थापना करने वाली लोककथा का एक सुन्दर नमूना है जेठवा-ऊजळी की मौखिक प्रेमकथा। इस लोक-काव्य में एक चारण स्त्री अपने शील को खोकर भी शरणागत-वत्सलता का धर्म निभाती है और सहज मानवीय प्रेम की महत्ता दिखाती है, जो एक तरह से राजपूत शासक वर्ग के आदर्शों के बरक्स शौर्य और प्रेम का प्रति-आख्यान रचती है।
जेठवा-ऊजळी का आख्यान हस्तलिखित पाठों की परंपरा में नहीं मिलता है, यह केवल लोक में बसा हुआ काव्य है जो राजस्थान और गुजरात दोनों में शताब्दियों से प्रचलित रहा है। यह प्रेमगाथा पन्द्रहवीं सदी की मानी जाती है। राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी, जोधपुर से निकलने वाली परम्परा नामक पत्रिका में नारायणसिंह भाटी ने लोगों के मुँह से सुन-सुनकर इन सोरठों का संकलन प्रकाशित करवाया। इस संकलन में 94 सोरठे राजस्थानी परंपरा के तथा 57 सोरठे गुजराती के संकलित हैं। गुजराती परम्परा के सोरठों में बारहमासा का वर्णन भी मिलता है।
जिस तरह पाबूजी, देवनारायण आदि के आख्यान किसी जाति के आत्म- सम्मान की अस्मिता की पहचान से जुडे हुए हैं अतः उन जातियों द्वारा रक्षित किये गए हैं, वहीं जेठवा-ऊजळी का काव्य किसी जाति की पहचान से जुडा हुआ नहीं है बल्कि वह सीधे लोक की प्रेमानुभूति से जुडता है इसीलिए यह लोक परंपरा में बसा हुआ है और लोक ने ही इसे संरक्षित किया है। जेठवा-ऊजळी लोक प्रेमाख्यान का नायक मेह जेठवा, जो क्षत्रिय राजपूत वर्ग का हिस्सा है और शासन के पदानुक्रम में ऊपर जाने का इच्छुक है जिससे वह ऊजळी (चारण) के प्रेम को नकारता है। प्रेम किसी जाति, किस शासन, किसी सत्ता, किसी महत्त्वाकांक्षा को नहीं जानता। पर जहाँ मेह जेठवा में प्रेम के प्रति नकार है वहीं ऊजळी इसी प्रेम की प्रतीक है जो शासक वर्ग के सामने शाश्वत मूल्यों की स्थापना करती है। इसी संदर्भ में हम आगे जेठवा-ऊजळी के आख्यान से जुडे सोरठों का विश्लेषण करेंगे। आगे बढने से पहले जेठवा-ऊजळी की लोक में बसी कथा को संक्षेप में यहाँ उद्धृत करना समीचीन होगा-
एक दिन वर्षा की साँझ में धूमली नगर का राजकुमार मेहा जेठवा अपने मित्रों सहित आखेट के लिए निकला। शिकार का पीछा करते-करते वे लोग बहुत दूर निकल गये। सहसा आँधी और वर्षा ने उन्हें आ घेरा जिससे जेठवा अपने साथियों से बिछड गया। मूसलाधार वर्षा में कोई उपाय न देख कर जेठवा घोडे की पीठ पर ही भीगता रहा। बहुत देर भीगने से अंत में सर्दी के मारे ठिठुर कर बेहोश हो गया। जब वर्षा का जोर कुछ मन्द पडने लगा तो घोडा अपनी समझ से घुडसवार सहित एक झोंपडी के सामने खडा होकर हिनहिनाने लगा। यह झोंपडी अमरा चारण की थी। पशु-चारण जिसकी जीविका का साधन था। घर में एक युवती कन्या थी। घोडे की हिनहिनाहट सुन कर अमरा ने ऊजळी से पता लगाने को कहा कि इतनी रात गये, ऐसी वर्षा में भला यह किसका घोडा हिनहिना रहा है। ऊजळी बाहर आई, अंधेरे में उसने घोडे के समीप आकर देखा तो एक आदमी घोडे पर बेहोशी में चिपटा हुआ है। उसने उसे जैसे-तैसे नीचे उतारा और झोपडी के अन्दर ले गई। दोनों व्यक्ति उसे बेहोशी में देख कर चिन्ता में पड गये। उसके पहनावे और रूप-रंग को देखने से अनुमान लगा कि यह कोई आपत्तिग्रस्त मनुष्य अच्छे घराने का व्यक्ति है। जैसे भी हो द्वार पर आए हुए व्यक्ति की मृत्यु नहीं होनी चाहिए। शीत के कारण बेहोश हुए व्यक्ति को होश में लाने की बहुत कोशिशें की गई पर सब विफल गईं। अन्त में अन्य कोई उपाय न देख कर ऊजळी ने उसके साथ एक शय्या पर शयन किया और अपने शरीर की गर्मी से उसे चेतना प्रदान की। प्रभात होते-होते तो जेठवा को पूरा होश आया। दोनों के हृदयों में एक अजीब उथल-पुथल मची हुई थी। जेठवा ने अपना परिचय दिया। जीवनदान देने वाली उस युवती का इतना बडा अहसान वह कैसे चुकाए? ऊजळी अपना हृदय भी तो उसे ही समर्पित कर चुकी थी। जेठवा ने ऊजळी के साथ विवाह करने का वचन दिया। दोनों का आकस्मिक विपदा भरा मिलन प्रेम में परिणत हो गया। जेठवा अपने घोडे पर सवार होकर राजधानी को चल दिया। ऊजळी जाते हुए घुडसवार को आतुर नैनों से देखती रही। फिर तो जेठवा कई बार पहाड की तलहटी में ऊजळी से मिलने आता। दिनों-दिन उनका प्रेम-सम्बन्ध घनिष्ट होता गया, पर एकाएक जेठवा ने ऊजळी से मिलना बन्द कर दिया।
ऊजळी इन्तजार करती रही। एक पल दिन के समान, दिन पख के समान और पख वर्ष के समान व्यतीत होने लगे और बेचैनी बढती गई। उधर राजघराने के व्यक्तियों को जेठवा के नित्यप्रति के आने-जाने से शक होने लगा था। जेठवा के मस्तिष्क में एक उलझन घर कर गई थी- एक क्षत्रिय का चारण कन्या के साथ विवाह सम्बन्ध कैसे हो सकेगा? उनका रिश्ता तो भाई बहिन का है। यदि अन्य रिश्ता बन जाता है तो दुनिया क्या कहेगी? मैं जनता की आँखों में अधर्मी हो जाऊँगा। मेरा इहलोक और परलोक दोनों बरबाद हो जाएँगे। ऐसा विचार कर जेठवा अपने महलों में मौन साध कर बैठ गया।
पर उजळी तो जेठवा के विरह में विकल थी। अपने मन की व्यथा को मन में ही कब तक दबाए रखती। जब इन्तजार की घडियाँ असह्य हो गई तो उसे जेठवा के विश्वासघात पर क्रोध भी आने लगा। कई एक आशंकाएँ उसके मस्तिष्क में घूमने लगीं। बूढे बाप ने लडकी की करुणाजन्य स्थिति देख कर उसे बहुत समझाया-बुझाया और धैर्य रखने को कहा, पर ऊजळी ने एक न मानी और अंत में वह स्वयं जेठवा की राजधानी में आ पहुँची। पर जेठवा के महल तक उसे पहुँचने कौन देता? बहुत प्रयत्न करने के बाद जेठवा से उसका साक्षात्कार हुआ। ऊजळी का हृदय जेठवा को देखते ही हर्षोल्लास से भर गया, पर सामाजिक भय के कारण जेठवा अपनी प्रेम-लालसा को दबा कर गम्भीर ही बना रहा। बदली हुई परिस्थिति देख कर ऊजळी तिलमिला उठी। उसने जेठवा के वचन दोहराए और एक कुमारी के साथ विश्वासघात करने वाले राजकुमार को धिक्कारा। ऐसी विकट स्थिति में अन्य कोई उपाय न देख कर असमंजस में पडे हुए राजकुमार ने ऊजळी को मनचाही धन-दौलत और जागीर माँग लेने को कहा। पर प्रेम का सौदा नहीं होता और न मुआवजा ही। ऊजळी ने एक न सुनी। जेठवा ने फिर समझाया कि एक क्षत्रिय का चारण कन्या के साथ विवाह होना अधर्म है। यदि विवाह होगा तो समाज में हाहाकार मच जायगा। मैं बरबाद हो जाऊँगा। मेरा वंश कलंकित हो जाएगा। पर ऊजळी को तो केवल प्रेम चाहिए था, बार-बार उसने उसी की माँग की और निष्ठुर जेठवा न माना, पाषाण बना रहा।
अन्त में ऊजळी ने निराशाजन्य विक्षिप्तता के साथ जेठवा को शाप दिया कि तुमने जिस शरीर के स्पर्श से मेरा कौमार्य खंडित किया है उसमें आग लगे और तेरा नगर जल कर भस्म हो जाए। इतना कह कर ऊजळी तो वहाँ से चल दी पर जेठवा के पूरे शरीर में जलन ही जलन पैदा हो गई और उसने तडप-तडप कर प्राण त्याग दिये। ऊजळी को जब जेठवा के प्राणांत का पता चला तो दाह-संस्कार के समय वह स्वयं वहाँ पहुँची और जेठवा के साथ जल कर सती हो गई।
कोमल कोठारी ने ठीक ही लिखा है, मेह-ऊजळी की कथा मनुष्य के अथाह प्रेम की क्षुधा को तृप्त करने के लिए कही गई एक कहानी है । इस कहानी को कहने वाले का नाम हमें पता नहीं। शायद एक कवि ने कही भी नहीं हो। यह कहानी सौराष्ट्र में घटी। कहानी को कहने के लिए कथात्मक रूप का सहारा नहीं लिया गया। कथात्मक रूप से मेरा मतलब है कि वार्ताओं या आख्यायिकाओं को कहने या लिखने के प्रकार को ग्रहण नहीं किया गया। मेह-ऊजळी के प्रेमाख्यान की मार्मिक घटनाओं से उत्पन्न विविध भाव-लहरियों को सोरठा नामक छन्द में पिरोने का प्रयत्न किया गया है। सोरठों में कहानी नहीं है। सोरठों में केवल ऊजळी की विरह-वेदना या मनो-वेदना की अभिव्यक्ति है। कहानी सोरठों से परे है।7
जन साहित्य में वीर गाथाओं के साथ-साथ प्रेम गाथाओं की संख्या भी बडी है। मानव समाज में कभी-कभी ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जो जीवन आदर्शों, उदात्त प्रेम, अदम्य साहस से परिपूर्ण होती हैं और उन्हें समाज अपने हृदय में संजोकर रखना चाहता है, जो जनमानस में उद्वेलित होकर काव्य के रूप में फूट पडती हैं और पीढी दर पीढी मौखिक परम्परा के आधार से वे समय की दूरी तय करती रहती हैं। इसीलिए जनमानस में जितनी ये लोक कथाएँ घुली हुई हैं उतनी साहित्यिक रचनाएँ नहीं। जेठवा-ऊजळी की प्रेम कथा भी ऐसी ही उत्कृष्ट प्रेम कथा है। नारायणसिंह भाटी जेठवे रा सोरठा के भूमिका भाग में लिखते है-ऊजळी की प्रेम कथा का शकुन्तला के साथ कई बातों में साम्य है और शकुन्तला पर कालिदास जैसे महाकवि ने कलम उठाई फिर भी राजस्थान के जनमानस में ऊजळी और जेठवा की गाथा जितनी घुल मिल सकी है उस रूप में शकुन्तला की भी नहीं। फिर भी शकुन्तला की कथा तो सर्वमान्य पौराणिक कथा है पर ऊजळी एक अत्यन्त साधारण स्त्री है। वास्तव में देखा जाये तो जनमानस में जो स्थान आज ऊजळी का है वह बडी से बडी रानी का भी नहीं।8
प्रेम को सभी मानवीय व्यवहारों में शीर्ष स्थान प्राप्त है इस बात को यह प्रेमाख्यान सशक्त रूप में रखता है। जायसी की यह उक्ति एक तरह से पद्मावत का सूत्र वाक्य है-
मानुस पेम भयो बैकुंठी,
ना हित काह छार एक मूठी।9
प्रेम जो अपनी मूल प्रकृति में ही सारे बंधनों का विरोधी होता है। प्रेमियों से आत्मोत्सर्ग माँगता है और इसीलिए रतनसेन का प्रेम प्रेम है, क्योंकि वह उसे पाने के लिए राजशाही ठाठ-बाट छोड कर योगी बन जाता है और इसके अभाव में अलाउद्दीन का प्रेम कोरी वासना है। जहाँ लोक कथाओं में यह आत्मोत्सर्ग की भावना समाज, जाति और रूढीगत तथा राजनीतिक बंधनों को तोडने की मांग करती है, वहीं भक्ति के क्षेत्र में प्रेम भावना अहम भाव को शमन करने की बात करती है। मनुष्य जन्म के साथ ही कई तरह के बंधनों में जकडा होता है। इस प्रेम भावना को ऐतिहासिक रूप से नारियों द्वारा अभिव्यक्ति मिली है इसीलिए अवधी के सारे प्रेमाख्यान नायिकाओं के नाम पर हैं। जेठवा-ऊजळी की यह कथा प्रेम के उसी आदर्श रूप को कथा के ढाँचे में पिरोती है।
जेठवा-ऊजळी में ऊजळी का प्रेम जो मरणासन्न अतिथि को जीवन देने से शुरू होता है वह राजस्थानी और गुजराती दोनों रूपों में कमोबेश मृत्यु के साथ मिलन में समाप्त हो जाता है। इसी तरह यह राजस्थानी और गुजराती प्रेमाख्यान उस द्वन्द्व को दिखाता है जो राजसत्ता और लोकजीवन के बीच चल रहा होता है। इस द्वन्द्व में जेठवा राजसत्ता का प्रतिनिधि है तो ऊजळी उस लोक की प्रतिनिधि है जिसमें उसके विश्वास, उसके मूल्य बसे हुए हैं। जेठवा के प्रेम के बारे में जब उसके पिता (पोरबन्दर के राजा) को पता चलता है और यह ज्ञात होता है कि ऊजळी जाति से चारण है अतः जेठवा का विवाह उसके साथ असंभव है क्योंकि क्षत्रियों के लिए चारणों की स्त्रियाँ देवी तुल्य है, और राजनीतिक व्यवस्था के रूप से भी यह विवाह राज्य में अशांति, विरोध एवं विद्रोह का रूप ले सकता है, जब जेठवा को ये बातें समझाई गई तो जेठवा, जो कि स्वयं राजकुमार था और भविष्य में राजा बनने वाला था, उसके मन में प्रेम और सत्ता के बीच द्वन्द्व उत्पन्न हो जाता है। वह ऊजळी से विवाह करने का विचार त्याग देता है तथा ऊजळी के प्रेम को भुलाकर कहता है कि-हे ऊजळी, हम क्षत्रियों के लिये चारण देव तुल्य हैं। इसलिये तुम मेरे लिये देवी समान हो। यदि तुम्हारे समान रक्त का पात्र मैं भी पी लूँ तो बरडा के स्वामी का नाश हो जायेगा-
चारण अेटला देव, जोगमाया करी जाणीयें,
लोही ना खपर खपे (तो) बुडे बरडानों धणी।10
साथ ही जेठवा ऊजळी को उससे विवाह करने के विचार को त्यागने के बदले और शायद उसके प्राण बचाने के बदले जीवन पर्यन्त सुख-सुविधाएँ देने की पेशकश भी करते हुए कहता है- तुम्हें अनाज से भरी गाडियाँ दूँ। भविष्य में तुम जब कभी भूखी हो तब तुम प्रसन्नतापूर्वक आकर यहाँ से अनाज ले जाना-
कण ने दाणा कोय, भण्यतो दऊं गाडां भरी,
है ये भूखुं होय, तो आभपरे आवे ऊजळी।11
जेठवा ऊजळी को यह भी कहता है कि अगर मुझसे विवाह करके तू रानी ही बनना चाहती है तो नवानगर के राजा रावलराम से अपना प्रेम प्रकट कर उससे विवाह कर रानी बनकर सुख से रह सकती हो। वह रसिक राजा तुम्हें धोखा नहीं देगा-
आयां थी जाने ऊजळी, नवे नगर कर गेह,
जाने रावळ जामने, छोगाळो न दे छेह।12
लेकिन ऊजळी तो एक सच्ची प्रेमिका है और प्रेम किसी जातिबंधन को नहीं मानता और न ही किसी प्रलोभन के बदले बिक जाता है-
वीणा जंतर तार, थे छेड्या उण राग रा,
गुण ने रोऊं गंवार, जात न झींकूं जेठवा 13
मेह, ऊजळी के मन में प्रेम की ज्योति जगा कर चला गया। जेठवा राजा था-जात का राजपूत था ऊजळी एक पहाडी चरवाहे की गरीब लडकी थी, जात की चारणी थी। दोनों की सामाजिक जगह बहुत दूर-दूर थी और दोनों की जाति ऐसी थी जो विवाह के सूत्र में नहीं बाँधी जा सकती थी। राजा जेठवा ने अपने सामाजिक वैभव का आँचल नहीं थामा। उसने ऊजळी को यह कहा कि चारणी तो राजपूत की बहन होती है। वह विवाह नहीं कर सकता- इसी स्थिति के बाद ऊपर लिखा हुआ सोरठा आता है। ऊजळी की मनोव्यथा को व्यक्त करने के लिए सोरठे की प्रथम पंक्ति-वीणा जंतर तार से शुरू होती है। अब इसी पहली पंक्ति के साथ ही रूप निर्वाह की लॉजिक प्रारंभ हो जाती है। दूसरी पंक्ति में कहा गया है-थे छेड्या उण राग रा- वीणा के तारों के उस राग के स्वर को छेडा गया जिनसे कि ऊजळी के हृदय में युगों-युगों से सोया हुआ प्रेम जाग्रत् हो गया। जेठवा में वे गुण थे जिससे वह प्रेम के अजर अमर राग के सुर तो छेड सकता था लेकिन राग के प्रभाव को एक बार जाग्रत् करके वह जिस सामाजिक बाधा के पीछे जा छिपा, उसी बात को संकेत करके ऊजळी के माध्यम से कहलाया गया कि गुन ने रोवूं गंवार। ऊजळी तो गुण को रोती है। जेठवा की उस ताकत के लिए विलाप करती है जो प्रेम के राग को छेडने की शक्ति रखता है। लेकिन जेठवा तो गंवार है। वह गंवार नहीं समझ सका कि उसके गुण का ग्राहक भी कोई और है। वह तो जात-पाँत की आड लेकर बैठ गया लेकिन गुणों को ग्रहण करने वाली ऊजळी कहती है - जात न झींकूं जेठवा। मैं जात-पाँत में भरोसा नहीं करती। प्रेम से बडी कोई जात नहीं होती।14
जिण सूं लाग्यो जोय, मन सो ही प्यारो मनां,
कारण और न कोय, जात पांत रो जेठवा।15
ऊजळी कई तरह के तर्क देकर जाति-पाँति के बंधन तथा सत्तासुख से सच्चे प्रेम को श्रेष्ठ बताती है तथा कहती है कि इस विरह-व्याकुल जीवन को जला के भस्म कर दूँ ताकि अगले जनम में तुम्हें प्राप्त कर सकूँ-
जाळू म्हारो जीव, भसमी ले भेळी करूं,
प्यारा लागो पीव, जूण पलट लूं जेठवा।16
जळ पीधो जाडेह, पाबासर रे पावटे,
नैनकिये नाडेह, जीव न धापै जेठवा।17
अर्थात्- एक बार मानसरोवर (पाबासर) का स्वच्छ जल तृप्त होकर पी लेने के बाद, हे जेठवा, छोटे तालाब (नैनकिये नाडेह) के पानी से भला कैसे तृप्ति मिल सकती है? इस तरह के विरहासिक्त संदेशों के बाद भी जब जेठवा नहीं मानता तो ऊजळी के सामने विरह की पीडा को झेलने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं बचता। विरह की इसी वेदना को व्यक्त करने के लिए ऊजळी जिन रूपकों, काव्य रूढियों का सहारा लेती है वे इस लोक प्रेमाख्यान को अन्य प्रेमाख्यानों तथा विरह गीतों से जोड देते हैं। ऊजळी कहती है कि इस संसार में प्रेम का निर्वाह करने वाली चकवे और सारस की दो जोडियों के अतिरिक्त तीसरी जोडी नहीं है-
जोडी जग में दोय, चकवे नै सारस तणी,
तीजी मिली न कोय, जो जो हारी जेठवा।18
गौर करने योग्य है कि जहाँ सूफी प्रेमाख्यानों में उस दैवी प्रेम को पाने के लिए कथा का नायक योगी वेश में राज्य छोडकर निकल जाता है वहीं इस लोक प्रेमकथा में ऊजळी अपने प्रेम को पाने के लिये उस योगी वेश को धारण करने की बात कहती है-
धोळा वसतर धार, जोगण हो जग में फिरूं,
हरदम माळा हाथ, जपती रहसूं जेठवा।।19
श्वेत वस्त्र धारण करने पर भी ऊजळी की आँखें अपने प्रियतम के दर्शनों हेतु हमेशा आतुर रहती हैं। ऊजळी को अनेक घुडसवार दिखते हैं पर उसमें उसका जीवनाधार जेठवा नहीं दिखता-
वे दीसै असवार, घुडलां री घूमर कियां,
आबळा रो आधार, जको न दीसे जेठवो।20
जातो जग संसार, दीसै सारां ने दरस,
भव-भव रो भरतार, जिको न दीसै जेठवो।21
घोर अभावों में जी रही ऊजळी को जेठवा घनी छाया के रूप में मिला था जिसके प्रेम में उसने अनेक सपने संजोये थे, जो उसके प्राणों का आधार था। ऊजळी कहती है- चिलचिलाती धूप में, तपे हुए बालू के टीबों की ऊँचाई पर चढते हुए मैं अत्यंत थकित हो कर लडखडा रही थी, हे जेठवा, तब कहीं तू घनी शीतल छाया के समान मुझे मिला था-
तावड तडतडतांह, थळ ऊँची चढता थकां,
लाधी लडथडतांह, जाडी छाया जेठवा।22
लेकिन ऊजळी के इस निश्छल प्रेम को उस परदेशी मेह-जेठवा ने नहीं जाना तथा सत्ता के आगे वह कमजोर पड गया। प्रेम की पीर को समझने में असमर्थ उस जेठवा के लिए ऊजळी कहती है- हे जेठवा, तुमने अपने अनगिनत प्रेम-बाणों से मुझे घायल तो कर दिया पर, मुझ परदेसिन की प्रेम-पीडा को नहीं पहचाना-
परदेसी री पीर, जेठी रांणं जांणी नहीं,
तांणी ने मार्या तीर, बांथा भरि भरि जेठवा।23
और अंत में अपने असफल प्रेम से हताश ऊजळी मेह-जेठवा को शाप देकर अपने एक साथी को यह कहकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर देती है कि, हे खीमरा (ऊजळी का कोई साथी) यह देश कडवे आदमियों का है। यहाँ के लोग केवल मुँह पर ही मीठा बोलना जानते हैं। उनके हृदय में प्रेम नहीं है। इसलिये ऐसे कृतघ्न लोगों से प्रेम कैसे हो? फिर जेठवा भी तो सीधे मुँह हम से बोलता तक नहीं-
खीमरा खारो देस, मीठा बोला मानवी,
नुगरां किसा सनेह, जेठीरांण बोल्या नहीं।24
ऊजळी का उक्त कथन एक तरह से उसका सांसारिकता से मोहभंग ही था। अंत में जेठवा और ऊजळी मृत्यु के साथ एकाकार हो जाते हैं। इस मौखिक काव्य द्वारा स्थापित उज्ज्वल चरित्र और उदात्त प्रेमजन्य विरह की उक्तियाँ अनायास ही सुनने वाले का मन मोह लेती हैं। ऊजळी कहती है, हे जेठवा, मुझ बिलखती हुई को जोगिन बनाकर क्यों छोड गया? तुम्हारे बिना तो एक घडी भी बिताना मुश्किल हो रहा है, भला पूरा जीवन कैसे व्यतीत होगा-
तो बिन घडी न जाय, जमवारो किम जावसी,
बिलखतडी बीहाय, जोगण करग्यो जेठवा।25
जेठवा के सोरठे साहित्य-प्रेमियों, काव्य रसिकों एवं सामान्य जनता की जबान पर रहे हैं और आज भी हैं। जब हरिणों तक का जीव भी अपनी टोली से अलग होते समय व्याकुल हो उठता है तो हे जेठवा, अपने प्रियतम से बिछुडने पर प्रियतमा का जीना फिर कैसे संभव होगा-
टोळी सूं टळतांह, हिरणां मनमाठा हुवै,
वाल्हा बीछंतांह, जीणों किण विध जेठवा।26
यह लोक कथा प्रेम के उस उदात्त स्वरूप को लोक जीवन में प्रतिष्ठित करती है जिसमें यह माना जाता है कि प्रेम बदले में सिर्फ प्रेम ही चाहता है और उसे सांसारिक सुख सुविधाओं से तौला नहीं जा सकता और ना ही उसका सौदा किया जा सकता है। और ऊजळी के इस विशुद्ध प्रेम के साथ जेठवा के सामाजिक व सांसारिक बंधनों की उलझन की कशमकश में वे कुछ मार्मिक सोरठे कहे गये हैं जिन्हें राजस्थान और गुजरात के जनसामान्य ने अपने हृदय में स्थान दिया है और जो पीढियों से चले आ रहे हैं।
ऊजळी किसी महाकाव्य की नायिका नहीं है वह एक साधारण स्त्री है लेकिन उस का प्रेम, उसे पाने के लिए उसका समर्पण, लोक लाज को त्यागकर अतिथि की जीवन रक्षा का आदर्श, प्रेम के सामने सत्ता सुख का त्याग, आदि वे मानवीय मूल्य हैं जो उसे असाधारण बना देते हैं। कथा तो एक माध्यम होती है जिससे लोक अपने चरित्र रचता है और उन्हें अपने आदर्शों का प्रतिनिधि बनाकर अपनी आशाओं के अनुरूप कार्य करवाता है और इसी तरह ऐसे चरित्रों को लोक जीवन में अमर कर देता है।
लोक-काव्य या मौखिक परम्पराओं (फोकलोर) के महत्त्व के बारे में कोमल कोठारी कहते हैं कि फोकलोर भले ही इतिहास में स्थित हो, लेकिन उसकी चिंताएँ हमेशा समकालीन होती हैं। आधुनिकता के आने से पहले की ये परम्पराएँ ठेठ समकालीन सवाल उठाती हैं। इस हेतु इन लोक-काव्यों में इंगित इतिहास के बनने की प्रक्रिया को जटिलता में समझने की जरूरत है। ये प्रक्रियाएँ समाज के लिए कुछ मायने रखती हैं इसीलिए जीवित भी रहती हैं। सामाजिक सरोकार न होते तो मौखिक परम्पराएँ लोक की स्मृति से विलीन हो जाती।27
इस दृष्टि से जेठवा-ऊजळी लोक-काव्य पर दृष्टिपात करें तो हम पाते हैं कि यह प्रेम, विरह, लोक के मुहावरों से युक्त भाषा आदि से समृद्ध होकर एक तरफ यह प्रेमाख्यान परंपरा से जुडता है, वहीं उसमें कई अन्य आयाम भी हैं। स्त्री पात्रों के माध्यम से शौर्य, प्रेम और त्याग के आदर्श रखना, राजपूतीकरण की ऐतिहासिक प्रक्रिया जिसमें राजपूत-वर्ग की सत्ता को प्राप्त कर शासन के पदानुक्रम में ऊपर जाने की लालसा, पशुचारक या नोमेडिक इतिहास से उभरती राजपूत, चारण आदि अस्मिताओं के प्रमाण भी इन मौखिक काव्यों में मिलते हैं। जेठवा-ऊजळी एक प्रेमाख्यान तो है ही, साथ ही राजस्थान-गुजरात में बन रही ऐतिहासिक प्रत्रिज्याओं पर भी हमारा ध्यान आकृष्ट करता है ।
संदर्भ ग्रंथ सूची
1. A political history of literature (Vidyapati and the Fifteenth Century), Pankaj Jha, P-6, Oxford University Press New Delhi, 2019.
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3. सूफी काव्य-संग्रह - आचार्य परशुराम चतुर्वेदी, पृ.सं. 97, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, चतुर्थ संस्करण, 1965 ई.
4. जायसी ग्रंथावली- आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृ. सं. 3, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, 2009 ई.
5. Barahmasa in Indian literatures. Charlotte Vaudeville. Delhi: Motilal Banarasidas publication, 1986.
6. ऊजळी की विरह वेदना का मर्म- विजयदान देथा, पृ. सं.114, जेठवे रा सोरठा-परम्परा (पत्रिका) भाग-5, संपादक-नारायणसिंह भाटी, राजस्थानी शोध संस्थान, चौपासनी, जोधपुर
7. ऊजळी के प्रेम का काव्य रूप-कोमल कोठारी, पृ.सं. 118-119, जेठवे रा सोरठा-परम्परा (पत्रिका) भाग-5
8. जेठवे रा सोरठा (भूमिका),परम्परा भाग-5, संपादक-नारायणसिंह भाटी, पृ. सं.- 11
9. जायसी ग्रंथावली (मंडपगमन खंड) - रामचन्द्र शुक्ल, पृ. सं.- 231, प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली, 2009 ई.
10. जेठवे रा सोरठा-परम्परा (पत्रिका) भाग-5, संपादक-नारायणसिंह भाटी, पृ. सं.- 97, राजस्थानी शोध संस्थान,चौपासनी, जोधपुर
11. वही, पृ. सं. 98
12. वही, पृ. सं. 98
13. वही, पृ. सं. 69
14. ऊजळी के प्रेम का काव्य रूप-कोमल कोठारी, पृ.सं.-120, जेठवे रा सोरठा-परम्परा (पत्रिका)भाग-5
15. जेठवे रा सोरठा-परम्परा (पत्रिका) भाग-5, संपादक-नारायणसिंह भाटी, पृ.69
16. वही, पृ. सं. 32
17. वही, पृ. सं. 27
18. वही, पृ. सं. 28
19. वही, पृ. सं. 34
20. वही, पृ. सं. 29
21. वही, पृ. सं. 27
22. वही, पृ. सं. 52
23. वही, पृ. सं. 63
24. वही, पृ. सं. 67
25. वही, पृ. सं. 30
26. वही, पृ. सं. 23
27. Rajasthan an oral history- Komal Kothari, P-25, Penguin Books India, 2003

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