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लंगा-मांगणियार के गीतों में लोक संस्कृति

भरत कुमार
लोक संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ संसार या जगत् है। लोक विश्व का एक व्यापक भू-भाग एवं लोक समाज है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु व महेश आदि से ही लोक शब्द का अर्थ लिया जाता है। इस लोक का प्राणी जो जीवन के विराट् और विशाल महासागर की लहरों पर सनातन काल से तैरती हुई अनुभवों की सांस्कृतिक रत्नाभा से प्रेरणा ग्रहण करता है तथा गीतों की लय और ताल पर थिरकता है, जो नगरों और ग्रामों में फैला हुआ लोक समुदाय है। इस संबंध में हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं कि लोक शब्द का अर्थ नगरों और ग्रामों में फैला हुआ समूचा लोक समुदाय है। इसलिए हमारा यह लोक, शिक्षा सीमाओं से बाहर, सभ्य जनों में उपेक्षित और आदिवासी जातियों में सर्वप्रथम गिना जाने वाला जन-समूह ही लोक कहलाता है।1 इसी संदर्भ में डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल की मान्यता है कि लोक हमारे जीवन का महासमुद्र है। उसमें भूत, भविष्य, वर्तमान सभी कुछ संचित रहता है। लोक संस्कृति के अंतर्गत वे सभी पहलू धार्मिक विधि-विधान, देवी-देवता, रीति-रिवाज, खान-पान, रहन-सहन, तीज-त्योहार, उत्सव, मेले, अनुष्ठान, ज्ञान, विज्ञान, कला, साहित्य, संगीत, विश्वास, कहावतें, मुहावरे, लोकगीत, लोकनाट्य, लोकसंगीत, लोकवाद्य, लोककथा, लोकगाथा एवं लोकसाहित्य आदि से है।

लोक संस्कृति के संदर्भ में समाजशास्त्रवेत्ता एम.एल.गुप्ता लिखते हैं- लोक समाज की संस्कृति को ही लोक संस्कृति के नाम से पुकारा गया है।...उनमें नगरीय समाज से विपरीत प्रकार की विशेषताएँ पायी जाती हैं। वह एक ऐसा समाज है जिसका आकार छोटा होता है तथा जिसमें अकेलापन, अशिक्षा, समानता-समूहदृढता की भावना एवं जीवन का रूढिगत ढंग पाया जाता है। ऐसे समाज की अन्य विशेषताओं के रूप में कानून का अभाव, परम्परागत प्रकार का व्यवहार, जो प्रमुखतः वैयक्तिक एवं आलोचनारहित होता है, परिवार तथा नातेदारी समूह में लोगों के क्रियाकलापों में एकता, धर्म का प्रभाव, अर्थ-व्यवस्था का बाजार के बजाय पस्थिति पर आधारित होना तथा बुद्धिजीवी वर्ग के चिंतन का अभाव, आदि प्रमुख है। 3

लोकगीतों का एक विराट् साम्राज्य है, जिसमें मनुष्य के आपसी प्रेम, भाईचारा, समन्वय, सौहार्द की भावना तथा प्रणयमूलक दृश्य दिखायी देते हैं। लोकमानस की सुख-दुःखात्मक अनुभूतियों की सरस रागात्मक अभिव्यंजना का लयात्मक उपहार लोकगीत है। लोग सुख में गाकर बडे हर्षित होते हैं, दुःख में गाकर कष्ट को भूल जाते हैं। गान मानव जीवन का भोजन है जो आदिकाल से मानव हृदय से गाता आया है। लोकगीतों में मानव जीवन के उल्लास, उमंग, आनंद, हर्ष, रोमांच एवं करुणा की जीवनगाथा चित्रित है। न जाने कितने काल को चीरकर ये गीत चले आ रहे हैं। आज भी लोकगीत अपने हास-परिहास के साथ-साथ वातावरण की बोझिलता को कम करने का प्रयास करते हैं। यह लोकगीतों की सबसे बडी विशेषता है। लोक के सभी संस्कार गीत, विवाह गीत, ऋतु गीत, ग्रामगीत, जातिगीत, श्रमगीत एवं देवी-देवताओं के गीतों के रूप में समाहित हैं।

पश्चिमी राजस्थान की लोक संस्कृति अपने आप में एक अनूठी परंपरा है। चाहे भौगोलिक दृष्टि से हो या सांस्कृतिक दृष्टि से। सांस्कृतिक दृष्टि से रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज, तीज-त्योहार, सामाजिक अनुष्ठान, विवाह, मेले, उत्सव, पर्व एवं मांगलिक अवसर आदि आते हैं। पश्चिमी राजस्थान के बाडमेर, जैसलमेर, जालोर एवं बीकानेर जिलों में जहाँ पर लंगा-मांगणियार, ढोली, नट, मिरासी, ढाढी, फदाली, कलावंत आदि ऐसे पेशेवर जाति समूह हैं जिसका मूल व्यवसाय गायन एवं वादन हैं। इन जातियों में से कुछ पेशेवर गायकों में पुरुष गायन एवं वादन का काम करते हैं तो कुछ जातियों में स्त्री-पुरुष दोनों काम करते नजर आते हैं।

लोकगीत सभी जाति समुदाय के लोग गाते हैं। इन गीतों के माध्यम से जाति विशेष के पेशे से संबंध रखने वाली बातें साझा होती हैं जिनसे गीतों को पहचानने में सहायता मिलती है। लोक में भिन्न-भिन्न जातियाँ भिन्न-भिन्न रागों से गाती हैं जिससें हम समझ पाते है ंकि अमुक राग किस जाति समुदाय की है जैसे- लंगा जाति की राग, मांगणियार जाति की राग आदि। इसी राग को वाद्य यंत्रों की सहायता से लोकगीतों को लयबद्ध करते हैं।

लोक संस्कृति पेशेवर जातियों के गायन और वादन में निहित है। जैसे लंगा स्वयं मुसलमान गायक हैं। ये जाति अपने गायन पेशे के रूप में सिंधी सिपाही एवं राजपूतों पर निर्भर करती है। आज भी सैकडों लंगा इन्हीं जातियों की खेती पर अपनी आजीविका चला रहे हैं।4 कहा जाता है कि लंगा जाति छः या सात पीढी पहले मूल रूप से हिन्दू थी परन्तु समय और परिस्थिति के अनुकूल मुसलमान हो गए बल्कि हिन्दू धर्म के त्योहारों को जरूर मनाते हैं। लंगा जाति- ये सिंधियों के मांगणियार हैं। मालानी और सिव वगैरह की तरफ जियादा रहते हैं। इनके 2 फिरके हैं 1 शहनाई वाले, जो मोहर, समा, राजड और मांगलिया वगैरह खांपों को मानते हैं शहनाई में गाते हैं। इनको बैठने के वास्ते बिछौना मिलता है। दूसरे सारंगिये जो भईया और कलर वगैरह दूसरी खांपों के मांगने वाले हैं इन को बिछौना नहीं मिलता। दोनों में सगपन भी नहीं होता। शहनाई वाले इन को कम दरजे का समझते है। ज्ञातव्य है कि लंगा जाति का संगीत कार्य पीढियों से चला आ रहा है। अपनी कला एवं संगीत के माध्यम से जजमानों द्वारा दी गयी भेंट स्वरूप उपहार से अपना जीवनयापन करते हैं। इनका मुख्य वाद्य यंत्र सारंगी एवं शहनाई है। इसके अलावा सुरिंदा, सुरणाई, सतारा, नड, मोरसंग, मुरला (पुंगी जैसा वाद्य) आदि है। इन सभी वाद्य यंत्रों का अपना स्वर स्वभाव है और प्रयोग का विधान है।

लंगा जाति का प्रमुख वाद्य यंत्र सारंगी है जो यह तुन, सागवान, कैर और रोहिडा वृक्ष की बनती है। लोकवाद्यों में इसका छोटा रूप होता है। किसी-किसी के माथे में खूँटिया होती हैं। किसी-किसी में नहीं। ऊपर की ताँतें बकरे की आंतो की बनी होती हैं इसमें तेरह तुरपें होती हैं जो सब स्टील की बनी होती हैं। ताँतों को चार बडे खूँटों से बांध दिया जाता है।6 ऊपर तुरपों की खूँटियों से बाँध दिया जाता है। लंगों की सारंगी में कुल 29 तार होते है जिनका विभाजन हम इस प्रकार से करते है- बाज के तार-4, झारे-8, जीलें 17। बाज के तारों पर गज चलता है और यही तार अनुरणन के मुख्य आधार है। ये चारों तार क्रमशः तार षड्ज, मध्य पंचम और मध्य के षड्ज पर मिलाये जाते हैं।7 इस प्रकार लंगों का चाहे स्वर पक्ष हो, चाहे गायन पक्ष हो, चाहे वाद्य-वादन पक्ष हो, इनमें लोक सांस्कृतिक एकता की अभिव्यक्ति के दर्शन होते हैं।

मांगणियार शब्द का उल्लेख सुप्रसिद्ध प्रेमाख्यान ढोला मारू रा दूहा में वर्णित है। जैसे-

राँणी राजानूँ कहइ, मेल्हउ माँगणहार

माँगणगारा रीझवइ, ल्यावइ साल्हकुमार 8

राणी राजा से कहती है कि याचकों को भेजो, याचक लोग साल्हकुमार को रिझा लेंगे और उसे ले आवेंगे। यहाँ उल्लिखित याचक शब्द का अर्थ मांगणियार समुदाय (पेशेवर जाति) के लोगों से है जो गीत एवं लोकगीत से मोहित कर सामाजिक रिश्तों को प्रगाढ बनाते हैं।

राजा प्रोहित राखीजइ, जिण की उत्तिम जाति

मोकलि घररा मंगता, विरह जगावइ राति। 9

हे राजा, पुरोहित को रहने दो जिसकी जाति उत्तम है। घर के याचकों को भेजिए जो रात्रि में विरह को जाग्रत् करेंगे।

सन् 1891 ई. रिपोर्ट मरदुमशुमारी राजमारवाड में मांगणियारों का उल्लेख इस प्रकार किया गया है- ये भी मुसलमान हैं और इन की खांपें देवडा, वेद, वारगी, कालूभा, जारया, सोनलिया, गुणसार, पौडिया, वगैरा हैं।10

मांगणियारों का प्रमुख वाद्य कमायसा है। यह तत् वाद्ययंत्र है इसमें लगने वाले तारों की संख्या 16 होती है। इन तारों को तीन वर्गों में विभाजित कर अलग-अलग नामों से जाना जाता है। प्रथम वर्ग के तीन मुख्य तार बकरे की आंत के होते है। उनको रोंदा कहा जाता है। ये तार सा,सा,प में मिलाये जाते हैं। दूसरे वर्ग के नौ तार पक्के लोहे के होते है इनको झाडे (तरघा) कहा जाता है। ये तार ध,नी,सा,रे,ग,म,प,ध,नी क्रम से मिलाये जाते हैं।11 तीसरे वर्ग के चार तार झीले (बडे तरबे) कहलाते हैं जो पक्के लोहे के होते हैं इनको सा,रे,ग,म, पर मिलाया जाता है। इस प्रकार मांगणियार जाति के लोग गायन वादन कमायसा यंत्र के साथ करते हैं। इसके अलावा खडताल, वीणा, हारमोनियम, मंजीरा, मोरसंग इत्यादि यंत्रों से गीतों की लय एवं ताल के साथ स्वर साधते हैं जो लोकगीतों में नवाचार है। लंगा-मांगणियार समुदाय के लोग बडे-बडे सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते हैं तथा अपनी स्वर वाणी से लोगों को मंत्र-मुग्ध कर देते हैं। सन् 1986-87 में भूगर खाँ मांगणयार को राजस्थान संगीत नाटक अकादमी जोधपुर ने लोक कला के क्षेत्र में विशेष ख्याति प्राप्त करने पर सम्मानित किया। बाडमेर जिले की शिव तहसील के गाँव बिसू के मुल्तान खाँ, चानण खाँ, सजार खाँ, गाँव रेडाणा के मुल्तान खाँ व जैसलमेर जिले के हडुआ गाँव के हकीमखाँ, लूणा खाँ मांगणियार प्रसिद्ध गायक रहे हैं।12

लोकगीतों का मानस सामाजिक मनुष्य की सहजतम अनुभूतियों पर निर्भर रहता है जो माँगलिक अवसर, अनुष्ठानिक, रीति-रिवाज, पर्व, त्योहार, उत्सव आदि में आनंद की अनुभूति को व्यक्त करते हैं। इसी क्रम में लंगा एवं मांगणियार जाति द्वारा गाए गीतों में चिरमी, डोरों, पडलो, बनौ, बनडौ, हिंडो, राईको, हिचकी, तारा जडी चुन्दडी, निहालदे, रुपिडो, मूमल, बायरियो, हल्दी, महँदी, कामण, घोडी, जलो, वनडा, केसरिया बालम एवं ओलू आदि लोकगीत गाये जाते हैं। इन गीतों में प्रमुख राग माँड, सोरठ, तोडी, आसा, मारू, खमयासी, जंगला एवं धानी आदि रागों के साथ इनका खास महत्त्व है। गाने के पूर्व राग संबंधी अथवा गीत के विषय संबंधी दोहे गाए जाते हैं।

लंगा एवं मांगणियार गायकों द्वारा गाये जाने वाले प्रमुख गीतों में लोक सांस्कृतिकता की झलक कुछ इस प्रकार है-

थें भल आइजौ रे

आ तो चौमासै री रुतडी भलेरी

बालम थे भल आइजौ रे।13

यह लोक प्रचलित बनडौ गीत है जिसमें पति-पत्नी के प्रेम का वर्णन हुआ है। जब पति परदेश होता है, तो पत्नी वर्षा ऋतु में घर आने का आह्वान करती है कि अब वर्षा ऋतु आने वाली है। वर्षा ऋतु में प्रकृति का वातावरण चारों ओर हरा भरा हो जाएगा। इस प्रकार रेगिस्तानी इलाकों में चौमासा (चार महीने) सबसे अधिक सुहावना समय होता है। इसमें श्रृंगार रस की व्यंजना दिखायी देती है। पेशेवर गायक द्वारा हिचकी (किसी की याद) गीत को हृदय की सूक्ष्मता को मद्देनजर रखते हुए गाया जाने वाला गीत जैसे-

नैना कण रो बाजारों, ढोला,

चिडिया चुग चुग जाय

भंवर म्हारा, चिडिया चुग चुग जाय

म्हैं थनै ढोला कदै कह्यो थें परदेसां परौ जाय

म्हनै बादिलौ चितारै, बैरण आवै हिचकी। 14

हिचकी गीत प्रेमी और प्रेमिका के मध्य होने वाले अन्तर्द्वन्द्व का प्रतीक है। इस गीत के बारे में ऐसी धारणा है कि किसी के द्वारा याद किये जाने पर हिचकी आती है। जब हिचकी आती है तो दूर रहने वाले अपने संबंधी की ओर अनायास ही ध्यान चला जाता है। इस गीत में श्रृंगार रस का अद्भुत वर्णन हुआ है। गायकों द्वारा लोकगीतों में पक्षियों की ओर संकेत कर कुरजां गीत गाया जाता है। इस गीत के माध्यम से हृदय से हृदय तक की आवाज संदेशवाहक(पक्षियों) से पहुँचाते थे, जो हजारों कोस दूर बैठे हों, इस प्रकार की प्रस्तुति-

उडी अे कुरजां पिलोडै परभात

गई-गई कोस हजार

दिनडौ राज री फौंजा में उगायौ अे

कुरजां अे म्हारौ भंवर मिलादौ नीं सा ।15

कुरजां एक सारस जैसा श्वेत बडा सुन्दर पक्षी होता है। ये बडी ऊँची एक कतार मंय एक साथ उडती है, वियोगिनी स्त्रियाँ इनके द्वारा सन्देश भेजती हैं। राजस्थानी लोकजीवन में कुरजां(पक्षी) के द्वारा अपने प्रियतम को समाचार भिजवाती है कि म्हाने एक बार भंवर से मिलवादो यह गीत वर्षा ऋतु में गाया जाता है। प्रकृति का वातावरण चारों ओर हरियाली से ढका होता है। प्रेयसी के मन में प्रिय के वियोग में मिलने की उत्कंठा हो जाती है। ऐसे राजस्थानी लोकगीतों में मूमल गीत, जो जन-जन में बहुत ही प्रचलित है, जो इस प्रकार-

काळी रे काळी काजळीये री रेखडी रे

हाँ जी रे, काळौडी काँठळ में चमके बीजळी

म्हारी वरसाळे री मूमल,

हालै नी अे आलीजे रे देस।16

इस गीत में मूमल और उसके प्रेमी अमरकोट के राणा महेन्द्र की प्रेमकथा की ऐतिहासिक घटना है। गीत में नायिका का नख-शिख वर्णन किया गया है। मूमल की काली काली काजळीया की रेख में आँखों अथवा बदन की चमक अथवा स्वयं चमकती आँख ऐसी लगती है, मानो काले बादल में बिजली चमक रही हो या मानो भूरे-भूरे पर्वतों की सुदूर श्रेणी में बिजली चमक उठी हो। यह प्रतीकात्मक श्रृंगारिक लोकगीत है। लोकगीतों में प्रकृति की मनोरम छटा का वर्णन ‘काछबो’ गीत के माध्यम से हुआ है, जैसे-

काछबियो नणदबाई जल के रो जीव,

गोरे जाऊं, महिरे बण जाऊं रे

जल के री माछली रे मारा राज 17

मारवाड में यह गीत विशेष प्रचलित है। एक प्रेमी-प्रेमिका के हृदय-तरंग की अभिव्यक्ति जल, मछली और कछुए के प्रतीक से समझाकर लोक की महत्ता में चार चाँद लगा दिए। इस काछबो गीत को अधिकतर राजा, रईसों और उमरावों की महफिलों में गाया जाता है। कछुआ नणदबाई का जल जीव है। साथिन! मैं जल की मछली बन जाऊं। हे नणद बाई, पानी के तालाब को चलें। कितने ही दिनों से राणा काछबा आयेगा। लोक में प्रेमी-प्रेमिकाओं का यथार्थ चित्रण इस गीत में बताया है। लोकगीतों की अजस्र धारा में प्रवाहित पणिहारी गीत है जो-

किणजी खुदाया नाडी खाबडा

अे पिणियारी जी अे लो

किणजी खुदाया समंद तळाव वाल्हा जी ओ

सुसरौजी खुदाया नाडी खाबडा

अे पिणियारी जी अे लो

सायबजी खुदाया समंद तळाव वाल्हा जी ओ18

पणिहारी गीत राजस्थान का बहुत प्रसिद्ध गीत है। यह गीत जब सात सहेलियों का झूलरा-झूंड पानी भरने सरोवर जाती है तब गाया जाता है। पणिहारीजी! किसने कुआँ और बावडी खुदाये? हे मृगनयनी! किसने तालाब बंधाये? उसमें रस्सी भी बडी लम्बी लगती है। ससुरजी ने कुआँ और बावडी खुदाये। लोकहित के कार्यों का वर्णन लोकगीतों में निहित है, जिससे यह पता चलता है कि लोक की सांस्कृतिक परंपरा सुदृढ थी। इसी प्रकार लोक संस्कृति में लोकगीतों की श्रृंखला के केसरिया बालम गीत जो मेहमानों के लिए आदर के साथ गाया जाता है जो- अतिथि देवो भव, आओ पधारो म्हारे देश कहकर लोक संस्कृति के महत्त्व को अत्युत्तम बनाया है जैसे-

केसरिया बालम आवौ नीं पधारो म्हारै देस

पिया प्यारी रा राजन आवौ नीं पधारो म्हारै देस

हां सा राठोडी राजा पधारो नीं म्हारै देस

यह मांड लोक गीत है। इसमें केसरिया पति! आओ, पधारो, म्हारे देश! इस गीत में अतिथि देवो भव की परंपरा का निर्वहन हुआ है। यह गीत हमारी लोक संस्कृति में आगंतुक मेहमानों के स्वागत के लिए गाया जाता है।

राजस्थानी लोकगीतों में जब हम लंगा एवं मांगणियार गायकों की बात करते हैं तो हमारे सामने कई प्रश्न उभर कर आते हैं। एक ओर पूरा विश्व एक गाँव में तब्दील हो रहा है। परंपरागत सीमाएँ टूट रही हैं, वहीं हमारी संस्कृति, साहित्य, मनोरंजन, कला एवं लोकगीत पर प्रभाव स्पष्ट दिखायी दे रहा है। आज लोकगीतों का स्थान डीजे, परंपरागत नृत्य का स्थान फूहड नृत्य व भंगिमाओं ने ले लिया है जिससे कला अपने अस्तित्व पर संकट महसूस कर रही है। फूहड एवं अश्लील द्विअर्थी गीतों की जगह 60 के दशक के कर्णप्रिय व भावाभिव्यक्ति को व्यक्त करने वाले गीतों का चलन फिर हो तो भारतीय लोक संस्कृति अपना स्थान फिर से प्राप्त कर लेगी। लोकगीत न केवल हमें संस्कार, परंपराओं और तत्कालीन सामाजिक परिवेश से परिचित कराते हैं बल्कि एक तरह से देखा जाए तो हमारे देश की सांस्कृतिक पहचान भी बताते हैं। इस प्रकार की परंपरा को संजोए रखने के लिए एवं लुप्त होने से पूर्व इन लोकगीतों का संरक्षण करने की अति आवश्यकता है।

संदर्भ ग्रंथ

1. नानूराम संस्कर्ता-राजस्थानी लोक साहित्य,

राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, द्वितीय संस्करण-

2000 पृ. 1

2. नन्दलाल कल्ला - हिंदी का प्रादेशिक लोक साहित्य

शास्त्र, राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, 2014

पृ. 189

3. वही, पृ. 327

4. सुधा राजहंस - चिरमी, राजस्थान संगीत नाटक

अकादमी, जोधपुर पृ. 5

5. रायबहादुर मुंशी हरदयालसिंह - रिपोर्ट मरदुमशुमारी

राजमारवाड 1891 ई., राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर,

संस्करण-2019 पृ. 376

6. देवीलाल सामर एवं गींडाराम वर्मा - राजस्थान

का लोक संगीत, राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर,

संस्करण-2019, पृ. 95

7. सुधा राजहंस : चिरमी, राजस्थान संगीत नाटक

अकादमी, जोधपुर पृ. 33

8. नरोत्तमदास स्वामी, सूर्यकरण पारीक एवं रामसिंह

- ढोला मारू रा दूहा, बुक्स ट्रेजर, जोधपुर,

संस्करण- 2004, पृ. 100

9. वही, पृ. 101

10. रायबहादुर मुंशी हरदयालसिंह : रिपोर्ट मरदुमशुमारी

राजमारवाड 1891 ई., राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर,

संस्करण-2019 पृ. 373

11. शैलेन्द्रकुमार शर्मा : अक्षर वार्ता, उज्जैन, मध्यप्रदेश,

सितम्बर, 2017 पृ. 6

12. वही, पृ. 7

13. सुधा राजहंस : चिरमी, राजस्थान संगीत नाटक

अकादमी, जोधपुर पृ. 50

14. वही, पृ. 74

15. विजयदान देथा : गीतों की फुलवारी, साहित्य

अेकादमी, नई दिल्ली संस्करण 2014 पृ. 159

16. रामसिंह, सूर्यकरण पारीक एवं नरोत्तमदास स्वामी

: राजस्थान के लोकगीत, राजस्थानी ग्रंथागार,

जोधपुर, संस्करण- 2019 पृ. 193

17. देवीलाल सामर एवं गींडाराम वर्मा : राजस्थान

का लोक संगीत, राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर,

संस्करण-2019 पृ. 123

18. किरण सिंघवी : केसरिया बालम राजस्थानी

लोकगीत, राजस्थानी ग्रंथागार, जोधपुर, संस्करण-

2018 पृ. 16

19. वही, पृ. 5

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शोधार्थी, हिंदी विभाग

मोहनलाल सुखाडिया विश्वविद्यालय, उदयपुर

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Mob. 9680459368