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लोक में हरजस

भंवरलाल प्रजापत
लोक विशाल है, विराट् है। लोक का यह ध्येय रहा है कि संसार (लोक) के सभी लोग सुखी रहें, निरोग रहें तथा सभी का कल्याण हो। ऐसी मंगल कामना लोक में निहित है। जैसे-

सर्वे भवंतु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तुः मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत्।।

लोक मनुष्यों का समूह ही नहीं, सृष्टि के चर-अचर सभी इसमें सम्मिलित हैं। पशु-पक्षी, वृक्ष-नदी, पर्वत आदि सब लोक है और इसके साथ साझेदारी की भावना लोक दृष्टि है। सबको साथ लेकर चलना लोक संग्रह है और सबके साथ जीवन जीना लोक यात्रा है। लोक दृष्टि कभी व्यक्तिगत नहीं रहती। वह समष्टिगत है, समग्र है। लोक, फोक नहीं है। वह पश्चिम के उस फोक का पर्याय नहीं है, जो अनपढ लोगों की वाचिक परंपरा के रूप में स्वीकृत है। भारतीय दृष्टि से लोक व्यतीत नहीं है, प्रतिक्षण उपस्थित है, वर्तमान है। लोक निर्जीव नही, सजीव है। लोक दृष्टि पूर्णता की आकाँक्षा है।

लोक की सांस्कृतिक धरोहर बहुत ही परिपक्व है। उनमें रहन-सहन, रीति-रिवाज, खान-पान, वेश-भूषा, पालन-पोषण, मूल्य-विश्वास, देवी-देवता, पर्व-उत्सव आदि गीतों में अभिव्यंजित होकर यहाँ की संस्कृति को साकार रूप प्रदान करते हैं। यहाँ तक कि बच्चे के गर्भ में आने के साथ उस नवागंतुक के इस भौतिक संसार में आने से लेकर मृत्युपर्यंत उसका स्वागत विविध प्रकार के गीतों द्वारा किया जाता है। जीवन के विविध पहलू देवाराधना, ऋतुएँ, त्योहार, शौर्य एवं वीरता के पक्ष गीतों से परे नहीं हैं। यही गीत परंपरा जनमानस द्वारा गाये जाने के कारण इन्हें लोकगीत एवं ईश्वरीय गुणगान की परंपरा में इनको हरजस (हरि यश) कहते हैं। जो जन्म से लेकर मृत्योपरांत सोलह संस्कारों में, प्रभात वंदन से लेकर रात्रि विश्राम तक, हरजस तीज से लेकर गणगौर तक अर्थात् यह कहा जाए कि हरजस प्रतिदिन, प्रतिक्षण एवं प्रत्येक जगह आनंद और हर्षोल्लास के साथ गाये जाते हैं।

लोक में प्रभाती हरजस वंदनीय है। प्रभाती के समय घर, गली, मोहल्ले में राम, कृष्ण एवं लोक देवी-देवताओं के हरजस, आनंद और उमंग के साथ गाये जाते हैं। प्रातः जल्दी उठना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है, ऐसा संदेश देते लोक प्रभाती हरजस-

.....उठ राजा उठ राजमी

पोढ्या जागो जी रामचंदरजी सा ओ राजा

किसनचंदरजी सा ओ राज

थां सूतां राजा ना सरै

थांकी नगरी में आणंद उछाब

बियाणो ओ राजा भल आवणो।।

जिस प्रकार से प्रत्येक मंदिर में पूजा का प्रारंभ आरती से होता है, उसी प्रकार लोक में प्रभात का वंदन आरती से होता है। हरजस के रूप में लोक में प्रचलित आरती-

गंगा जमना, गंगा जमना रो नीर मंगाय

दो रे कस्तुरी री गूंळडी जी

जठे बैठे जठे बैठे दसरथ जी रा जोध

जठे बैठे जठे बैठे वासुदेव जी रा जोध

करो ने सोदरा बाई आरती जी।।

लोक को सृष्टि का पुजारी कहा जाता है। लोक को प्रकृति का पूजक या रक्षक कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी क्योंकि सूर्य, चंद्रमा, धरती, आकाश, पेड-पौधों की पूजा केवल लोक में संभव है। लोक में धरती को माँ मानकर उसकी सेवा की जाती है। जिस प्रकार माँ जन्म देकर लालन-पालन करती है, उसी प्रकार धरती भी हमारा पालन-पोषण करती है। जैसे-माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। अतः लोग प्रातःकाल उठते समय सर्वप्रथम धरती माता की आरती करते हैं। जिसका स्वरूप हरजस में दिखाई देता है-

धरती माता तूं बडी, तुझसे बडा न कोय।

तेरे ऊपर पाँव धरूं, मुझे दोष न लागे कोय।।

तुझे लाख बार प्रणाम, मुझे सहस्र गुण होय।

जीना रहना तुझ पर हुआ, मरना तुझ पर होय।।

सूर्य लोक का तेजस्वी देवता है। संपूर्ण लोक को उजाला देने वाला सृष्टि का दीपक कहकर पुकारते हैं। जो अथक रूप से चलते रहने एवं जीवन में आगे बढने का संदेश देता है। इसलिए लोक में यह परंपरा है कि प्रतिदिन प्रातःकाल नहा-धोकर सूर्य को जल का अर्घ्य चढाकर दिन की शुरुआत करते हैं। प्रसिद्ध गायत्री मंत्र से यह स्पष्ट होता है कि लोक की सृष्टि, समष्टि है, व्यष्टि नहीं। जैसे-

ओऽम् भूर्भूवःस्वः तत्सवितुर्वरेण्यं

भर्गो देवस्य धीमहि,

धियो यो नः प्रचोदयात्।।

लोक की यह परंपरा है कि किसी कार्य को प्रारंभ करने से पहले श्री गणेश जी की स्तुति की जाती है। इसलिए नव-प्रारंभ कार्य के आरंभ को श्रीगणेश कहा जाता है। साथ ही यह माना जाता है कि गजाननजी विघ्न हरण के लोक में देवता माने जाते हैं। बच्चे का जन्म हो, विवाह हो, गृह-प्रवेश हो, शुभ मुहूर्त हो या किसी भी कार्य का नव-प्रारंभ गजाननजी के हरजस से करते हैं। जैसे-

पालणा में झूलै गजानंद

हरि पालणा में झूलै गजानंद, पालणा में झूलै।

कांई रो दाता पालणूं किण सूं बांधे डोर गजानंद

पालणै में झूलै गजानंद

अगर चन्नण को बणियो पालणियो

रेसम बांधे डोर गजानंद

पालणै में झूलै गजानंद

कुण झूलै कुण झुलावै कुण मन में फूले गजानंद

पालणै में झूलै गजानंद

मीरां कै वाल्हा गिरधर नायों हरि नाम नायों

चरण कमल चित्त राखै गजानंद

पालणै में झूलै गजानंद।

लोक में श्रम का बहुत महत्त्व है। मनुष्य को स्वावलम्बी एवं आत्मनिर्भर होना चाहिए। इस प्रकार की सीख लोक में ही संभव है। पुरुष हो या स्त्रियाँ श्रम करते वक्त उस श्रम-कार्य को इष्ट-समर्पित हरजस गाते हुए करते हैं, जिससे श्रम-कार्य के शुरू होने और समाप्ति के बीच के अन्तराल का पता ही नहीं चलता। जैसे- घट्टी (चक्की) फेरते समय, बुहारी (झाडू) के समय, मवेशियों के चारे-पानी के वक्त, अरटिया (चरखा) चलाते समय, कुएँ से पानी सींचते समय एवं खेतों में कार्य करते समय जो भी गायन ईश्वर को समर्पित होता है, वह हरजस (भणत) होता है। जो एकल एवं समूह दोनों रूपों में संभव होता है। किसान खेतों में श्रम-कार्य करते हुए भणत गाते हुए कहते हैं कि-

सुरसत सिंवरूं रे, देवी माता

ध्याऊं तो मनाऊं वो, गणपत गणेस नै

कांई तो देवै ओ, देवी माता सारदा

आछा बोलो रे! कांई तो देवै वो, गणपत गणेस

सुर तो देवैली रे, देवी माता सारदा

जीओ म्हारा व्हाला रे! रिद्ध-सिद्ध देवै देव गणेस

सुरसत सिंवरूं रे, देवी माता

ध्याऊं तो मनाऊं वो, गणपत गणेस नै।

स्त्री स्वयं एक युग है, सच्चे अर्थों में कहें तो वही लोक है। इस लोक को जन्म देने वाली सृष्टि की अत्युत्तम अनुकृति स्त्री है। लोक में निःस्वार्थ भावना से मेहनत करने वाली स्त्री, माँ है। मेहनत के साथ-साथ वह परिवार की हर परंपरा का बखूबी से निर्वहन करती है। लोक में स्त्री कठिन मेहनत कर घर परिवार एवं उसकी परंपरा का पालन करती हुई हाथ घट्टी (चक्की) चलाती हुई भगवान राम से हरजस करती है कि-

रामजी पीसूं पीसूं लीलोडी जंवार

पाडोसण पीसे बाजरो जी राम

राम जी ऊनाळै री ठाडी ले‘र

घट्टी पे आवै नींदडी जी राम

राम जी सासूजी रो बाळणजोग सभाव

मण भरियौ सूंपै पींसणो जी राम।

मोटी मक्की रो सांवरा पीसणौ

सासू धडियां जी जोखे ओ राम

पीस्यौ पीस्यौ बाजरो

मक्की पीसी न जावै ओ राम।

संपूर्ण लोक एक परिवार है। इस परिवार में सभी को अपनी जिम्मेदारी का पालन करना होता है, चाहे छोटा हो या बडा। इसलिए जो स्त्रियाँ बुजुर्ग होती हैं उनसे जब कठिन कार्य नहीं होता है तो वे अरटिया (चरखा) चलाकर अपना कर्मत्व पूर्ण करती हैं, जिसमें निरन्तर कार्य करने का संदेश निहित है। चरखा की टंकार के साथ-साथ हरजस की झंकार सुनाई देती है, जो इस प्रकार है-

चरखौ म्हारो छैल छबीलो

रंग रंगीलो कातण वाळी नार

चरखा रो भेद बताय दे

कातण वाळी नार।

लोक में देवी-देवताओं का अहम स्थान है। कोई भी कार्य लोक देवी-देवताओं के स्मरण के बिना नहीं किये जाते हैं। लोक देवी-देवताओं ने इस धरा पर जन्म लेकर अमानवीय (असुर) शक्ति का नाश किया तथा इस लोक की रक्षा करने के लिए उनके शौर्य, त्याग और वीरता को हरजस के माध्यम से घर-घर में स्मरण किया जाता है, जैसे-

माता का भवन में जी वो नारेलाँ को बिडलो,

सुपारी के बिडले, माँरी आद भवानी बस रई।

माता जी ने ध्यावे जी वो सदा सुख पीव जयँ,

रेतो हिरदे माँरी।

माता जी का भवन में जी वो चिरमटडोरो बिडलो,

काजलियो के बिडले, माँरी।

माता का भवन में जी वो मेहँदी रो बिडलो,

रेली के बिडले माँरी।

सुसरो जी ध्यावे जी वो सदा सुखपावे ज्याँरे तो।

जेठ जी ध्यावे जी वो सदा सुख पावे ज्याँरे तो।

सायेब जी ध्यावे जी वो सदा सुख पावे ज्याँरे तो।

लोक में चिकित्सा की देवी चेचक माता को माना गया है। जो लोक मान्यता के अनुसार इस देवी को याद करने से बडे बडे रोगों का निवारण होता है। आज सरकार द्वारा चेचक रोग को दूर भले ही कर दिया हो, परन्तु लोक में आज भी इस देवी को पूजा जाता है, जिसकी जानकारी लोक प्रचलित एवं प्रसिद्ध हरजस के माध्यम से-

बाड बिचाल पीपली जी, ज्याँरी सीली छाँय।

बलाल्यूँ सेडल माता ए।

ज्याँ तलवालो खेलतो जो, खेलत चढ गयो ताप।

बलाल्यूँ। खिलमिल वालो घर गयोजी,

बिलख्यो सारी रात। बलाल्यूँ।

दादी भूवा थर काँपी, डराया माई अर बाप। बलाल्यूँ।

थे घरयो डरपो जोगणयां ए,

करस्यूँ छतर की छांय। बलाल्यूँ।

जद म्हाँरी माता तूठण लागी, गारको सो बीज। बलाल्यूँ।

जद म्हाँरी माता मरणे लागी, मक्के को सो बीज। बलाल्यूँ।

जद म्हाँरी माता मान लियो ए, सोयो सारी रात। बलाल्यूँ।

मारिये कूँडाले घोकसी जी, नानडिए री माय। बलाल्यूँ।

लोक जागरण एवं चेतना के लिए मीरांबाई का योगदान जन्मोजन्म याद किया जाएगा। उन्होंने लोक में समस्त नारी जाति को जागरूक करने का भरसक प्रयास किया। मीरांबाई के समय लोक में सतीप्रथा घोर समस्या थी, तो इस समस्या से इनको भी सामना करना पडा। पति की वीरगति के बाद उनको भी साथ में सती करने का प्रयास किया, किंतु मीरां इसके लिए तैयार नहीं हुई। इस प्रथा के खिलाफ उन्होंने आवाज उठाई और राणा को जवाब देती हुई हरजस करती है कि-

मीरां के रंग लाग्यौ हरि और संग सब अटक परी।

गिरधर गास्यां सती न होस्या, मन मोह्यो धननामी।

जेठ बहु को नातो नाहीं राणा जी, म्हे सेवक थे स्वामी।

नारी के प्रति इस प्रकार के व्यवहार से मीरांबाई संसार की ओर से विरक्त हो गई और साधु-संतों की संगति में हरि भजन करते हुए अपना जीवन व्यतीत करने लगी। पति के परलोक गमन के बाद उनकी भक्ति दिन-रात बढती गई। मीरांबाई मंदिरों में जाकर वहाँ कृष्णभक्तों के सामने या श्रीकृष्ण की मूर्ति के आगे नाचना, गाना उनका नित्यकर्म हो गया। अगर देखा जाये तो समाज में स्त्रियों पर अंगुली उठाना आम बात थी और आज भी है। लोग जब मीरांबाई के बारे में ऐसी-वैसी बातें करने लगे तो मीरांबाई का यह व्यवहार राजपरिवार को अपनी मर्यादा के खिलाफ लगा। हरजस में वर्णित महाराणा-मीरां संवाद, जो इस प्रकार है-

लाजै पीहर, सासरा, भाई तजो मोसाल।

सबही लाजै मेडतियाजी, मासु बुरा कहे संसार।।

इसका दृढता से उत्तर मीराबाई ने दिया, वह उनके चयन-धर्मी विवेक और निर्भीकता का प्रमाण है-

चोरी कराँ न मारगी, नहीं मै करूँ अकाज।

पुन्न के मारग चालताँ, झक मारौ संसार।।

अटल भक्ति के लिए लोक में कहा है कि राम राखे तो कोई नहीं भाखे। यह बात लोक भक्तिमती मीरां पर लागू होती है। महाराणा परिवार ने मीरांबाई को मारने के लिए कई प्रयास किये, जैसे जहर प्याला भेजना और पिटारे में सांप भेजना, जिसकी अभिव्यक्ति हरजस से मिलती है। जो इस प्रकार है-

विष रा प्याला राणूं भेजिया

बाई कर रै चिरणामत पी गया

कोई थे ही जाणूं रुघनाथ

बैरागण हर का नांव में

राणूं कालो सरप राणै भेजियो....।

अतिथि देवो भव की परम्परा लोक में प्रचलित है। घर आए मेहमान को देवता के समान बताया गया है। उनका आदर-सत्कार करना लोक धर्म है। लोक भक्तिमती मीरां स्वयं इस परंपरा का पालन करती, घर पर आए साधु-संतों को ईश्वर के रूप में मानती थी। इस संबंध में हरजस की अभिव्यक्ति हुई जो-

भाग भला ज्यां घर संत पधारै

करै किरपा भवसागर से तारै

आया संतो ने आदर दीजौ

चरण पखाळ वांरा चरणामत लेणा

भाग भला...........।

सादा जीवन उच्च विचार की परंपरा लोक में निहित थी। इसी परंपरा को गाँधीजी ने अपने जीवन में आत्मसात् करके लोक को नया संदेश दिया। इससे पहले लोक भक्तिमती मीरा ने भी अपनाया और कहा कि महल, सोना-चांदी, दुसाला हमें पसन्द नहीं है, हमें तो छाछ-राबडी, पतलों की कुटियाँ प्यारी लागे। अर्थात् मीरांबाई ने सरल जीवन जीने की सीख दी है। हरजस के माध्यम से लोक चेतना की जागृति का संदेश-

राणा म्है तो गिरधरिये रंग राती।

महल तो मालिया राणा काम न आवे म्हारे।

टूटी-झुँपडियाँ मन भावे।

सोना नी झारी नो राणा नीर नहीं भावे।

कडवी तूमडियाँ मन भावे।

लाडू जलेबी राणा कछु नहिं भावे।

खाटी राबडियाँ मन भावे।

साल तो दुसाला राणा काम नहिं आवे म्हारे।

फाटी कामलियां मन भावे।

बाई मीराँ के छे बाला गिरिधर नागर

चरण कमल मन भावे।

लोक में मीरां और कृष्ण के अटूट प्रेम को आज भी याद किया जाता है। मीरां के एकनिष्ठ प्रेम की मिसाल और उनके श्रीकृष्ण के प्रति हरजस की राग मल्हार लोक में अनूठी परंपरा सी हो गई है। एक ओर हृदय में श्रीकृष्ण से अपार प्रेम तो दूसरी ओर लोक समाज के भारी विरोध के बीच मीरां थी। लेकिन त्याग और माधुर्य की देवी जो लोक-लाज पर खरी उतरी। इसलिए लोक में मीरां हरसज के माध्यम से आज मौजूद है। जैसे-

आ तोडी नाहीं टूटे रै मोहन से प्रीतडली

वृंदावन में धेनु चरावे गावे गीतडली

मोरल के मिस बांह मरोडी आ गई रीसडली

आ तोडी नाहीं टूटे रै मोहन से प्रीतडली

कुंज-कुंज में भटकत डोले, करके प्रीतडली

मोहन हार गळे का तोडा करे अनीतडली

आ तोडी नाहीं टूटे रै मोहन से प्रीतडली

दासी करी पटराणी सांवरो आडी भींतडली

मीरां के प्रभु गिरधर नागर, आवो रीसडली

आ तोडी नाहीं टूटे रै मोहन से प्रीतडली।

संत जांभोजी ने लोक समाज को जागरूक करने का कार्य किया। उन्होंने 29 नियम बनाकर लोक समाज को शिक्षित करने के प्रयास किये। साथ ही वे पर्यावरणीय संतुलन के पक्षधर थे। हरे पेड को काटना स्वयं के पैर पर कुल्हाडी मारने के समान मानते थे। वे कहते कि सिर साठे रूख रहे तो सस्तो है जाण अर्थात् सिर के बदले हरे वृक्ष की रक्षा की जाये तो सच्चा उपहार है। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए जोधपुर के समीप अमृता देवी और उनका परिवार हरे वृक्षों की कटाई के विरुद्ध शहीद हुए। अतः समाज सुधार, पर्यावरण रक्षित, पशु-पक्षियों के पालनहार महान लोक संत जांभोजी को आज हरजस में स्मरण किया जाता है। जैसे-

अलाह अलेख निरंजण देव,

किण्य विध्य करूं तुम्हारी सेवा।

विसन कहूं जांकौ विसतार,

किसन सोई सिरज्यौ संसार।

गोम्यंद सो.........।

आनंदोत्सव लोक परंपरा का खास पर्व है। जहाँ प्रेम है, वहाँ क्लेश नहीं होगा। और जहाँ क्लेश है, वहाँ प्रेम नहीं। लोक हमें प्रेम, आदर, सम्मान और आनंद का भाव सिखाता है। संत विल्लोजी के हरजस में आनंदोत्सव की जाग्रत् चेतना-

घर आवोजी मीठा बोला, प्यारी तमारी बातियाँ।

कागद लाऊं कलम बणाऊं, लिखूं ज प्रेम की पातियाँ।।

हंस-हंस बोलो अंतर खोलो, मेटो जी मन की घातियाँ।

अंक भर भेंटो अंतर मेटो सीतळ करो मेरी छातियाँ।।

पांव पलोटूं पंखा जी ढोलूं, टहळ करूं दिन रातियाँ।

कहै ऊधवदासा एही नित आसा, सदा रहो संग साथियाँ।।

अनुभव से बढकर कोई शिक्षा नहीं है। यह बात लोक से पुष्ट होती है। जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि और जहाँ न पहुँचे कवि, वहाँ पहुँचे अनुभवी। ये कहावतें लोक में प्रचलित हैं। कहा गया है कि ज्ञान हमें उनसे ग्रहण करना चाहिए जिनको ज्ञान की परख हो। लोक शिक्षा-दीक्षा की चेतना की जागृति का हरजस में बखाण, इस प्रकार से है-

ओ संसार नदी जळ पूरि,

बीच अथघ ढिग पलो दूरि।

बोहता लोग घाट लगै आवै,

विषम तीरण कोई विरला पावै।

जाकी नाव जरजरी खेवट जूडा,

कोई जाणै जळ दोऊँ बूडा।

गुर कै सबद बंधी मन्य धीर,

साच सही सूं उतरौ तीर।

आप तीरै कूं तारै,

वील्होजी भेदग पार उतारै।।

वर्तमान वैश्वीकरण के दौर में मनुष्य की मानसिकता में बदलाव आया है, हरजस में नहीं। क्योंकि हरजस आज भी उसी लय, ताल एवं भाव के साथ गाते हुए लोक संस्कृति की अलख जगाते हैं। यह पीढी-दर-पीढी अविराम रूप से चली आ रही पद्धति है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि हरजस की उत्पत्ति के कोई प्रवर्तक या रचनाकार हुए हैं। ज्यादातर स्त्रियाँ समूह में हरजस गाती हैं, जो वक्ता-श्रोता स्वयं होती हैं। हरजस को शुरू करना उगेरणा कहते हैं। अर्थात् जो स्त्री सबसे पहले हरजस शुरू करती है उसे उगेरणे वाली कहा जाता है। इसमें खास बात यह देखने को मिलती है कि कोई स्त्री समूह में हरजस गाती हुई आगे-पीछे हो जाती है या कोई कडी भूल जाती है, तो दूसरी स्त्रियाँ मिलजुल कर उसे पूरा कर देती हैं। हरजस जो ज्यादातर संयुक्त परिवार में गाये जाते हैं। बडे परिवार में सास, जेठानी, देवरानी, ननद, बेटी आदि के माध्यम से गाये जाते हैं।

अतः हरजस की उत्पत्ति का क्रम लोक में पीढी-दर-पीढी की परंपरा से हुआ है। लोक साधु-संतों जैसे-प्राचीन लोक में वाल्मीकि, भरत, व्यास एवं श्रीयादे माताजी। आधुनिक लोक म कबीर, दादू, रैदास, मीरां, जांभोजी, जसनाथ जी, रामदेवजी, पाबूजी, गोगाजी, तेजाजी, हडबूजी एवं आई माताजी ने इस परंपरा को जीवित रखा। लेकिन विडम्बना यह है कि लोक परंपरा की अनूठी और निराली इस परंपरा का संरक्षण, सवर्द्धन अधिक से अधिक शोध-कार्य, शोध-आलेख और शोध-पत्र से संभव है। नहीं तो लोक की यह निराली परंपरा लुप्त होने के कगार पर है, कारण चाहे कुछ भी हो। हमें अपनी विरासत के रूप में मिली इस परंपरा को आगे बढाने का हरसंभव प्रयास करना चाहिए, लोक में पुनः चेतना की जोत जग, ऐसा प्रयास हम सबका रहे।



संदर्भ ग्रंथ

1. राहुल सांकृत्यायन एवं कृष्णदेव उपाध्यायः हिंदी साहित्य का वृहद् इतिहास, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, 1960, पृ.सं. 123

2. दयानिधि मिश्र व दिलीपसिंहः भाषा, संस्कृति और लोक, वीणी प्रकाशन, नई दिल्ली, 2012 पृ.सं. 195

3. चंद्रकांता व्यासः राजस्थानी लोकाचार गीत, श्री अंकित प्रकाशन, उदयपुर, 2010 पृ.सं. 38-39

4. वही, पृ.सं.46

5. कृष्णदेव उपाध्यायः लोक संस्कृति की रूपरेखा, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009, पृ.सं. 61

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7. कृष्णदेव उपाध्यायः लोक संस्कृति की रूपरेखा, लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2009, पृ.सं. 45

8. जयपालसिंह राठौडः लूर, मीरा विशेषांक, जालोरी गेट, जोधपुर, अंक-2, जुलाई-दिसं., 2003 पृ.सं. 28

9. वही, श्रमगीत विशेषांक, जालोरी गेट जोधपुर, अंक-15-16, जनवरी-10. दिस.2010 पृ.सं. 101

11. वही, पृ.सं. 40

12. वही, पृ.सं. 160

13. राहुल सांकृत्यायन एवं कृष्णदेव उपाध्यायः हिंदी साहित्य का वृहद् इतिहास, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी, 1960, पृ.सं. 444

14. वही, पृ.सं. 446

15. नंद चतुर्वेदीः मीरा संचयन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं.11

16. जयपालसिंह राठौडः लूर, मीरा विशेषांक, जालोरी गेट जोधपुर, अंक-2, जुलाई-दिसं.2003 पृ.सं. 52

17. वही, पृ.सं. 32

18. नंद चतुर्वेदीः मीरा संचयन, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ.सं. 146

19. जयपालसिंह राठौडः लूर, मीरा विशेषांक, जालोरी गेट जोधपुर, अंक-2, जुलाई-दिसं.2003 पृ.सं. 114

20. सुरेन्द्र कुमार बिश्नोई (सं.): अमर ज्योति, जांभाणी हरजस, अंक-5, मई,2017 पृ.सं. 20-21

21. कृष्णलाल बिश्नोईः बिश्नोई संतों के हरजस, संमराथल प्रकाशन, सिरसा, हरियाणा, 1997, पृ.सं. 06

22. वही, पृ.सं. 34



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