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राजस्थान रंग-रंग बहुरंग

यशवंत कोठारी
रंगीले राजस्थान के कई रंग हैं। कहीं रेगिस्तानी बालू पसरी हुई है तो कहीं अरावली की पर्वत श्रृंखलायें अपना सिर ऊँचा कर के खडी हुई हैं। इस प्रदेश में शौर्य और बलिदान ही नहीं, साहित्य और कला की भी अजस्र धारा बहती है। चित्रकलाओं ने भी मानव की चिंतन शैली को विकसित व प्रभावित किया है। संस्कृति व लोक संस्कृति के लिहाज से राजस्थान वैभवशाली प्रदेश है। राजस्थान में साहित्य, संस्कृति कला की त्रिवेणी बहती हैं जीवन कठिन होने के कारण इन कलाओं ने मानव को जिन्दगी से लडने का हौसला दिया है। यहीं पर महाराणा प्रताप हुए। संत-कवयित्री मीरा, कलाप्रेमी कुम्भा, चतरसिंह जी बावजी, भरथरी, बिहारी और अन्य सैकडों नाम हैं। पद्मश्री कोमल कोठारी, विजय दान देथा, देवीलाल सामर आदि ने राजस्थानी संस्कृति को सहेजने व एकत्र करने में बडा योगदान दिया। बोरून्दा के रूपायन संस्थान, व उदयपुर के भारतीय लोक कला मंडल में काफी काम किया गया। देवेन्द्र सत्यार्थी ने जो काम उत्तरप्रदेश, बिहार व अन्य जगहों पर किया, वही काम विजयदान देथा ने किया, वातां री फुलवारी में हजारों कथाएँ संकलित हैं।

भौगोलिक कारणों से संस्कृति पर प्रभाव पडा है। प्राचीन प्रस्तर युग से चल कर सभ्यता संस्कृति आज के दौर में पहुँची है। आयड नदी की सभ्यता भी बहुत प्राचीन है। गणगौर, तीज, होली, दशहरा, दिवाली मेले- ठेले, कुश्ती, दंगल, शौर्य पराक्रम सब इसी धरती पर हैं। यहाँ की रंग- बिरंगी पोशाकें आज भी धूम मचा रही हैं। आभूषण, केशविन्यास, भोजन, भजन सब अनोखा है। अलग-अलग धर्म, जाति के लोग सभी संस्कृति को अपनाते हैं।

साहित्य में संस्कृत, प्राकृत, राजस्थानी, बागडी, मेवाडी, ब्रज, हाडौती, ढूंढाडी, सभी भाषाओं में विपुल साहित्य है।

यहाँ की स्थापत्यकला, मूर्तिकला, नारी अंकन, मंदिर कला, चित्रकला, कठपुतली कला, मांडना कला, लोक संस्कृति बहुत अनोखी व समृद्ध है। यहाँ के किले, मंदिर विश्वप्रसिद्ध हैं। लोक नाट्यों की एक लम्बी परम्परा है। रम्मत, ख्याल, गवरी, गैर, गरबा, लोक वाद्य, लोक कथा, लोक गीत आदि की भी विशाल परम्परा है। लोक नाट्यों में ऐतिहासिक, श्रृंगारिक, धार्मिक नाटकों के मंचन होते थे। ढोला-मारू का नाटक बहुत प्रसिद्ध था। राम लीला, कृष्ण लीला भी बहुत होती थी। आइये, इस परम्परा का एक नज़ारा लें।

राजस्थान में चित्रकला

राजस्थान में चित्रकला का प्रारंभ लगभग चार शताब्दी पहले हुआ। मुगलकाल में चित्रकला उन्नत हुई, लेकिन औरंगजेब ने कलाकारों से राज्याश्रय छीन लिया और कलाकार इधर-उधर भागने लगे। ऐसी स्थिति में राजपूतानों के रजवाडों और रावरों में इन कलाकारों को प्रश्रय मिला और चित्रकला राजस्थान में परवान चढने लगी।

राजस्थान में चित्रकला के प्रारम्भिक काल में जैन शैली बहुत लोकप्रिय थी। गुजरात में भी उन दिनों जैन शैली का प्रभाव था। गुजरात से लगे होने के कारण मेवाड में जिस चित्रकला का विकास हुआ, वह जैन शैली से पूर्णतः प्रभावित थी।

अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों, विभिन्न परिवेशों के कारण जैन और मुगल शैलियों से राजस्थान में बिलकुल अलग किस्म की चित्रकला विकसित हुई। ये चित्रशैलियाँ जैन और मुगल शैली से प्रभावित होते हुए भी बिलकुल अलग और अनूठी थी। वास्तव में राजस्थान के चित्रकारों ने एक ऐसी चित्रधारा बहा दी कि विश्व आश्चर्यचकित रह गया।

प्रसिद्ध इतिहासकार अबुलफजल के अनुसार राजस्थानी चित्रकला वस्तुओं के बारे में हमारे ज्ञान से बहुत आगे है। हिन्दू धर्म के त्याग, तपस्या, संन्यास, कोमलता, श्ाँृगार, पवित्रता, वियोग, शिकार, क्रोध, हास्य, आदि सभी का प्रतिनिधित्व इन चित्रों में हुआ है। राजस्थानी कलाकारों ने जीवन में धर्म और श्रृंगार दोनों को बराबर महत्त्व देते हुए चित्र बनाये। अजन्ता के चित्रों में जो आदर्श है, वह राजस्थानी चित्र शैलियों में भी है।

राजस्थान की अलग-अलग रियासतों में अलग-अलग कलाकारों ने पीढी दर पीढी चित्र बनाए और चित्रकला की नवीन शैलियाँ विकसित कीं। बराबर राज्याश्रय मिलने के कारण ये चित्रशैलियाँ प्रसिद्धि के शिखर तक पहुँची। अति महत्त्वपूण्र्ा शैलियों में निम्न चित्रशैलियाँ प्रमुख है- नाथद्वारा चित्रशैली, जैन चित्रशैली, मारवाड चित्रशैली, बूंदी चित्रशैली, जयपुर चित्रशैली, अलवर चित्रशैली, कोटा चित्रशैली, बीकानेर चित्रशैली, जैसलमेर चित्रशैली, मेवाड चित्रशैली किशनगढ चित्रशैली आदि।

राजस्थान की जैन चित्रकला भी काफी अच्छी रही है जैन उपासरों व साधुओं के सान्निध्य में इसका विकास हुआ। कपडे पर बनने वाली फड चित्रकारी भी काफी प्रसिद्ध हुई भीलवाडा के फड चित्रकार विश्वप्रसिद्ध हुए। कपडे पर बने श्रीनाथजी के चित्र भी बहुत लोकप्रिय हैं, इसे पिछवाई कला कहते हैं। मोलेला की टेराकोटा कला ने भी खूब नाम कमाया है। किशनगढ की बनी-ठनी चित्रों का महत्त्व भी बहुत है। मारवाडी चित्रकला, बूंदीकला भी बहुत प्रसिद्ध हैं।

कठपुतली कला

कठपुतलियों को देश और विदेश में लोकप्रियता और प्रसिद्धि दिलाने हेतु स्व.देवीलाल सामर ने बहुत काम किया। उदयपुर का भारतीय लोक कला मण्डल परम्परागत और नवीन कठपुतलियाँ तथा उनके समाजशास्त्रीय अध्ययन पर काफी काम कर रहा है। पुतलियाँ चाहे पुरातन हों अथवा नवीन, सैद्धान्तिक दृष्टि से एक ही नियम में बंधी हैं, और किन्हीं वास्तविक प्राणियों की नकल नहीं हो सकती। न्यूनतम अंग भंगिमाओं से अधिकतम भंगिमाओं का भ्रम उत्पन्न करना पारम्परिक एवं आधुनिक पुतलियों का परम धर्म है।

पुतली सिद्धान्त की दृष्टि से पुरातन पुतलियाँ जितनी आधुनिक हैं, उतनी आधुनिक पुतलियाँ नहीं। चित्रकला की तरह भारतीय पुतलियाँ अनुकृतिमूलकता से हटकर आभासिक रही हैं। आन्ध्र, राजस्थान एवं उडीसा की पुतलियाँ इसी क्रम में आती हैं।

आधुनिक पुतलियाँ पारम्परिक पुतलियों का ही परिष्कृत रूप है। इन पुतलियों को पारम्परिक पुतली सिद्धान्त से ही जोडा जा सकता है। पारम्परिक पुतलियाँ अपने नियमों से बंधी होने के कारण विकास नहीं पा सकीं। राजस्थान के पारम्परिक पुतलीकार अमरसिंह राठौर या राणा प्रताप के खेल से आगे नहीं बढना चाहते। उडीसा के पुतलीकार गोपीकृष्ण के कथानक को नहीं छोडते। आन्ध्र के छाया कठपुतलीकार रामायण एवं महाभारत के ही खेल करते हैं। यही कारण है कि यह परम्परा अब मृतप्राय-सी हो चुकी है, लेकिन पुतली कला के विषय अब प्रमुख रूप से शिक्षा, मनोरंजन, सामाजिक विसंगतियों आदि से सम्बन्धित होते हैं। वसीला नामक कठपुतली नाटक ने भारत व सोवियत समाज को नजदीक लाने में मदद की।

मूर्ति कला

सफेद और काले, हल्के पीले और गुलाबी, रंगीन और सादे, पारदर्शी या इन्द्रधनुषी, अनगिनत रंगों में कलात्मक मूर्तियाँ पत्थरों की। जयपुर मूर्ति उद्योग विश्व-विख्यात है। हजारों लाखों की संख्या में ये मूर्तियाँ प्रतिवर्ष देश-विदेश के हजारों मंदिरों में प्रतिष्ठित होकर श्रद्धा से पूजी जाती हैं। इनकी अर्चना की जाती है। मन्नतें मानी जाती हैं।

मूर्ति बनाने के आरंभ से ही मनुष्य के मुख्यतः दो उद्देश्य रहे हैं। एक तो किसी स्मृति को या अतीत को जीवित बनाये रखना, दूसरे अमूर्त को मूर्त रूप देकर व्यक्त कर अपना भाव प्रकट करना। यदि पूरे संसार की काल प्रतिमाओं का विवेचन करें तो यही तथ्य दृष्टिगोचर होता है। प्रारम्भ में मनुष्य ने जानवरों, वनस्पतियों और उन पर मानव की विजय का अंकन मूर्तियों पर किया, फिर देवी देवताओं और प्राकृतिक कोप से बचने के लिए मूर्तियों का पूजन अर्चन प्रारंभ हुआ। मूर्तिकला में ऐतिहासिक मूर्तियाँ एक सिरे पर हैं और धार्मिक और कलात्मक मूर्तियाँ दूसरे सिरे पर हैं। आध्यात्मिक भावना में, उपासना में, पूजा-अर्चना में जो सुख है, वह भौतिकवाद में नहीं है और भारतीय मूर्तिकला ने अपना ध्यान इसी पारलौकिक सुख की ओर केन्द्रित किया है। वास्तव में मूर्ति, चित्र, कविता, संगीत का और सौन्दर्य का एक ऐसा मिलाजुला रूप है कि बरबस वह मानव को आकर्षित कर उसके अवचेतन मस्तिष्क में देवता की या ईश्वर की एक छवि बना देता है। भारतीय मूर्तिकला ने भौतिक रूप का निर्देशन न करके तात्त्विक रूप निर्देशन किया है और इसी कारण यह सर्वत्र ग्राह्य है, पूज्य है।

भारत की प्राचीन मूर्तियाँ सिंध, मोहनजोदडो और हडप्पा में मिली हैं। बाद में नंदकाल, मौर्यकाल, शुंगकाल, कुषाण-सातवाहन काल, मथुरा शैली, गुप्तकाल, उत्तर-मध्यकाल, खजुराहो, तंजौर, दक्षिण भारत तथा आधुनिक काल में भी भारतीय मूर्तिकला की परम्परा रही है। वास्तव में कलाकृति में कलाकार की अनुभूति की ही अभिव्यक्ति रहती है। और सृजन का सुख कलाकार को बराबर मिलता रहा है।

राजस्थान में कई प्रसिद्ध मंदिर हैं- श्री नाथजी का मंदिर,गोविन्द देवजी का मंदिर, सांवराजी का मंदिर, महावीरजी का जैन मंदिर, शिला देवी का मंदिर। इन मंदिरों की कला भी लुभावनी है। देलवाडा के जैन मंदिर, अजमेर की दरगाह, रनकपुर के मंदिर, कई गुरुद्वारे व चर्च भी दर्शनीय हैं व खूबसूरत है। मेवाड के चारधाम भी प्रसिद्ध हैं। श्रीनाथजी व सावरियाजी का मंदिर सरकार के टेम्पल बोर्ड से संचालित होते हैं। अन्य मंदिरों के ट्रस्ट हैं। अजमेर की दरगाह पर भी हर साल लाखों जायरीन आते हैं।



नाथद्वारा के कीर्तन और कीर्तनकार, मीनाकारी और चित्रकारी, साडियाँ या आभूषण, सभी कुछ अनोखे हैं और आज भी ब्रज के चौरासी कोसों से बहुत दूर वहाँ द्वापर युग की संस्कृति जीवित है। शायद आपको वह कहानी अवश्य याद होगी, जिसमे भगवान कृष्ण ने इंद्र की पूजा-अर्चना करने से ब्रजवासियों को मना कर दिया था, क्रोधित इंद्र ने गोपजनों और उनके सर्वस्व को तहस-नहस करने का निर्णय ले लिया। काले घनघोर बादलों से बारिश की झडी लग गयी, गर्जन-तर्जन और बिजली की फुफकार से भागे-भागे गोपवासी परेशान हो गये। जलप्रलय का दृश्य उपस्थित हो गया था।

ऐसे समय में ग्वालबाल कृष्ण की शरण में आये। कृष्ण ने अपनी अंगुली पर गिरिराज पर्वत को उठाकर संपूर्ण गोपजनों को इंद्र के क्रोध से बचाया। आधुनिक संदर्भों में भी यह घटना महत्त्वपूर्ण है। किसी बलशाली बाह्य शक्ति की पूजा-अर्चना करने के बजाय अपनी ही भूमि की पूजा-अर्चना उचित है, है न एक क्रांतिकारी दर्शन।

पिछवाई-कला

श्रीनाथजी के चित्रों के अलावा जो सबसे महत्त्वपूर्ण है-वह है पिछवाई। वास्तव में श्रीनाथ जी की प्रतिमा के पीछे दीवारों को सजाने के लिए कपडें पर मंदिर के आकार के अनुसार चित्र बनाये जाते हैं। ये पर्दों का काम करते हैं। यह नाथद्वारा की अपनी मौलिकता है जो अन्य किसी शैली में नजर नहीं आती। पिछवाई का आकार कुछ भी हो सकता है, और मूल्य पांच सौ रुपयों से लगाकर 20,000 रुपय तक। इन पिछवाइयों में अधिकतर विभिन्न उत्सवों से सम्बन्धित होती है।

इन पिछवाइयों पर प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण भी काफी किया जाता है। गिरिराज पर्वत, गोपालन, रासलीलाएँ, माखन खाते कृष्ण आदि इस शैली के आम विषय ब्रश बनाते हैं। प्रधान पर्वों की झांकियों के चित्र कई आकारों में बनते हैं। मंगला, ग्वाल, श्रृंगार, राज भोग आदि झांकियों के चित्रों की सर्वाधिक मांग रहती है।

1 मीटर गुणा 1.5 मीटर कपडे पर श्रीनाथजी का चित्रण काफी होता है। यह स्वरूप कहलाता है। इसके अलावा चितेरे, महत्त्वपूर्ण अवसरों यथा शादी, ब्याह, जनेऊ आदि अवसरों पर भित्ती चित्र भी बनाते हैं। इस चित्र शैली में सर्वप्रथम कागज या कपडे पर कोयले से रेखाकृति अंकित की जाती है। सुनहरे भाग को सोने या मृगान से बनाया जाता है। इसके बाद सफेद काम करके लाल व काला काम करते हैं। रंग लगाने के बाद कपडे या कागज को चिकने पत्थरों पर घोटकर उसका भुरभुरापन दूर किया जाता है। कपडे की घुटाई ज्यादा महत्त्वपूर्ण है और कपडे पर रंग भी ज्यादा पक्के लगाये जाते हैं।

आभूषण के चित्रण के मामले में कर्णफूल, कुण्डल, दुगदुनी, कन्दोरा, कडे, बंगडी, हथपान, हार, कांटा, लोंग, नथ, बोर, भुजबंध, अंगूठी, डोरा, गुटियाँ, झोला, आदि प्राथमिकता पाते हैं। हीरे भी बनाये जाते हैं। पुरुषों के मामले में मेवाडी पगडी, अंगरखी, धोती, जूते, खडाऊ, आदि प्रमुखता से अंकित किये जाते हैं।

महिलाओं के लिए साडी, कांचली, घाघरा, आदि प्रमुखता से अंकित किये जाते हैं। फूलों का श्रृंगार भी लोकप्रिय है। राधा को बनाते समय कुछ लोग नवीन वस्त्र व आभूषण भी प्रयुक्त कर देते हैं। जानवरों में बैल, तोता, सारस, मछलियाँ, सर्ज, बगुला आदि का चित्रण होता है। फूलों में कमल, गुलाब, कदम्ब, आम, मोलश्री आदि प्रमुखता पाते हैं।

पिछवाई कला में दो सौ वर्ष पूर्व रामचन्द्र बाबा चित्रकार हुए। बाद में विट्ठल व चम्पालाल हुए। इस कला में खेमराजजी भी प्रसिद्ध थे।

मरवन मंडे मांडना निरखे चतुर सुजान

राजस्थान हो या गुजरात, मालवा या दक्षिण भारत लगभग हर घर में द्वार, चौखट को पूजने की समृद्ध परंपरा है। त्योहार हो या कोई शुभ अवसर। घर की स्त्रियाँ आंगन और मुख्य द्वार पर अल्पना अवश्य अंकित करती हैं। दीपावली तो त्योहारों का त्योहार है। मां लक्ष्मी की अनुकम्पा कौन नहीं चाहता। लक्ष्मी आए घर द्वार तो उसके स्वागत में अल्पना का अंकन आवश्यक है।

लोक संस्कृति की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक उज्ज्वल पक्ष है माण्डणा। वास्तव में माण्डणा कला कलात्मक सौन्दर्य की सार्थक अभिव्यक्ति है। माण्डणे स्थान की शोभावृद्धि करते हैं। वे उमंग, उत्साह, उल्लास का सुजन भी करते हैं और वातावरण को रस से भर देते हैं।

माण्डणों की प्राचीनता स्वयंसिद्ध है। वेदों पुराणों में हवनों और यज्ञों में वेदी और आसपास की भूमि पर हल्दी, कुमकुम आदि से विभिन्न आकृतियाँ बनाई जाती थी। भगवान राम के अयोध्या आगमन पर अयोध्यावासियों ने अपने घरों को माण्डणों से सजाया था। प्राचीन समय में घर-आंगन सजाने का एकमात्र साधन यही था। ग्रामीण अंचलों में आज भी इस विधा का बहुत महत्त्व है।

सांझी कला

श्राद्धों के दिनों में घर के बाहर सांझी बनाई जाती है, यह कला उत्तर प्रदेश से आई। अंतिम दिन कोट बनाया जाता है, कुंवारीं लडकियों का यह त्योहार अब धीरे धीरे खत्म हो रहा है। मेले-ठेले भी समय के साथ बिछडने लगे हैं। महिलाओं के वस्त्रों में भी भारी परिवर्तन दिख रहा है आभूषणों में भी परिवर्तन आ रहा है।

स्थापत्य कला

राजस्थान के किले, मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से बेजोड हैं चित्तौड का किला विश्व में प्रसिद्ध है, कीर्तिस्तम्भ, विजिय स्तंभ, जैसलमेर का किला, कुम्भलगढ का किला व इसकी दीवार, जो चीन की दीवार के बाद सबसे बडी है। जयपुर का जन्तर-मन्तर व हवामहल तो बेजोड हैं ही, किलों के अंदर युद्ध करने, बचने, व सुरक्षा के लिए सभी व्यवस्थाएँ होती थी। नगरों की रचना के लिहाज से जयपुर दर्शनीय है।

लोक जीवन में खेल परम्परा

राजस्थान की सभ्यता और संस्कृति ने हमेशा से ही व्यायाम, खेलकूद, कसरत आदि को पूरा महत्त्व दिया है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आयुर्वेद में व्यायाम तथा खेलों के अलावा योगाभ्यास पर भी बल दिया गया है। वास्तव में प्राचीन भारत में कई ऐसे खेल प्रचलित थे, जिनसे मानव का बौद्धिक एवं शारीरिक विकास होता था, लेकिन देखते-देखते हमारे ये खेल पश्चिमी संस्कृति की चकाचौंध में नष्ट हो गए।

वेदों, उपनिषदों तथा पुराणों म कुछ खेलों का वर्णन किया गया है। राजप्रासादों म राजकुमार तथा गुरुकुलों में सामान्य बालक इन खेलों से शरीर का विकास करत थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में व्यायाम, कुश्ती, जलविहार, तैराकी, शस्त्र प्रतियोगिता आदि का विस्तृत वर्णन किया गया ह। काम सूत्र की 64 कलाओं में भी विभिन्न प्रकार की कलाओं का वर्णन करते समय खेलों का वर्णन किया गया है।

प्रत्येक राजा के राज्य में रहने वाले नागरिक अपने आमोद-प्रमोद तथा मनोरंजन के लिए इन खेलों म भाग लेते थे या फिर दर्शक के रूप में जाते थे। राजा की ओर से उत्सव की सूचना डोंडी या शंख बजाकर दी जाती थी। प्रत्येक नागरिक दोपहर से पहले अपना व्यवसाय करता था। दोपहर के बाद मनोविनोद करता था। दिल बहलाव के लिए नागरिक पक्षियों से खेलते थे। सायंकाल वाटिका, उद्यान में भ्रमण हेतु जाते थे। झूले झूलते थे या जलक्रीडा करते थे। सायंकाल से रात्रि तक नृत्य, थियेटर, वाद्यों से अपना मनोरंजन करते थे। इस नित्यकर्म के अलावा नागरिक लम्बी यात्राओं पर जाते थे। मेलों-उत्सवों में भाग लेते थे। कुछ नागरिक वन विहार हेतु घोडे पर सवार होकर निकल जाते थे। वे बाग में मुर्गों की लडाई, जुआ या नाच-गाने का कार्यक्रम देखते थे। सच पूछा जाये तो हमारी खेल परम्परा बहुत ही समृद्ध रही है।

कुछ प्राचीन खेल इस प्रकार हैं- 1.कुश्ती 2.कबड्डी 3.गदा 4.जोडी 5.मलखम्भ 6.शतरंज 7.तलवार बाजी 8.धनुर्विद्ध्या 9.गिल्ली डंडा, 10.मार दडी आदि।

कबूतरबाजी, तीतरबाजी, बटेरबाजी, मुर्गे लडाना आदि खेलों का मुगल काल में काफी विकास हुआ। महिलाएँ भी इस लडाई का आनन्द लेती थीं। मुर्गों की लडाई का वर्णन कई जगहों पर मिलता है। नवाबों के काल में यह मनोरंजन का एक आम साधन था। मुर्गे उछल-उछल कर एक- दूसरे पर वार करते थे। अक्सर कमजोर मुर्गा भाग जाता था और जीतने वाले मुर्गे के मालिक को सम्मान और ईनाम मिलता था।

पक्षियों की तरह ही पशुओं से सम्बन्धित खेल भी खेले जाते थे। हाथियों की लडाई भैंसों, बकरों, साडों, ऊंटों की लडाई भी काफी प्रसिद्ध थी। नाथद्वारा में साण्डों की लडाई होती थी। वहां अभी भी दीपावली के दूसरे दिन गायों को खिलाया जाता है, जिसे खेंखरा कहा जाता है। गायों के अलावा ऊंट दौड, हाथी दौड, हाथी पोलो, पोलो तथा घुडदौड भी प्राचीन पशु खेल था। पोलो तथा घुडदौड तो आज भी बहुत ज्यादा लोकप्रिय हैं। इसी प्रकार बैलगाडी की दौड भी काफी प्रसिद्ध खेल था। घुडदौड के अलावा अन्य जानवरों की दौडों का इन्तजाम भी नागरिकों के मनोरंजन के लिए किया जाता था। रथदौड भी प्रिय थी।

संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि राजस्थान की संस्कृति, साहित्य, कला अनोखी है, इस को सरकारी संरक्षण की जरूरत है। इस धरोहर को आम आदमी तक पहुचाने की जरूरत है। बहुत सारी चीजों या तो नष्ट हो गई हैं या नष्ट होने के कगार पर हैं। किले खंडहर हो गए हैं, मरम्मत नहीं हो पा रही है। इसी प्रकार साहित्य व कलाओं को भी बचाने की सख्त जरूरत है।

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सन्दर्भ -

1-राजस्थान की सांस्कृतिक परम्परा- जयसिंह नीरज

2-राजस्थान का सांस्कृतिक इतिहास- गोपीनाथ शर्मा

3-राजस्थान वैभव- त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी

4-Cultural Heritage of Shree Nathdwara-Yashwant Kothari

5 कठपुतली कला -देवीलाल सामर

6-वातां री फुलवारी-विजय दान देथा

7-मूर्ति कला-रायकृष्ण दास



सम्पर्क -८६, लक्ष्मीनगर,

ब्रह्मपुरी बाहर, हयपुर - ३०२००२

मो. 9414461207