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गजल के छंदानुशासन का कवि-विवेक

आनन्दवर्धन द्विवेदी
गज़ल उर्दू की एक ऐसी आजमाई हुई कविता कहने की शैली है जिसे बडे-बडे उर्दू के उस्ताद शायरों ने अपनी प्रतिभा और भाषा तथा अभिव्यंजनाओं की एक-से-एक बेजोड अनुपमेय विशिष्टताओं के खाद-पानी से सींचा-संवारा है, जिससे समय की शताब्दियों लम्बी अनगढ यात्रा के बीच जिसके पुष्पों के रंग और पराग की सुगंध म्लान नहीं हुई है, फीकी नहीं पडी हैं। गजल क्योंकि मूल रूप से उर्दू भाषा के पेट से जन्मी है, इसलिए स्वाभाविक है कि उसमें उर्दू की आत्मा, छवि, रंगत, ऊर्जा और उसके सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों की परिष्कृति, उसके मुहावरों और उसकी भाषिक ही नहीं, उसके आंतरिक विश्वासों के ढेरों चित्र-विचित्र रंग-रूप भाँति-भाँति की निर्मितियों-संरचनाओं में व्यक्त-अभिव्यक्त हुए हैं। और इस लिहाज से उर्दू गजल की प्रामाणिकता, उसका छांदिक अनुशासन, कथनीयता में न केवल शब्द बल्कि उक्ति और व्यंजनात्मक वैचिपय तथा श्रोता-पाठक के हृदय को रंजित कर देने की क्षमता अपने श्रेष्ठतम शिखरों को स्पर्श करने वाली है। इस दृष्टि से हिन्दी में गज़ल की सुस्पष्ट और लक्षित की जा सकने वाली विधा नई है, और सच बात तो यह है कि यह उर्दू गज़लों की अपार लोकप्रियता के प्रभाव, दबाव तथा सापेक्षता में शुरू हुई और इसी नाते खाँटी के उर्दूदाँ लोग अनौपचारिक बातचीत में (आफ द रेकार्ड) हिन्दी गज़ल को उर्दू के अनुकरण में और कुछ मुँहफट लोग तो इसे उर्दू गज़ल की नकल (उनका सीधा आशय भौंडी-भद्दी नकल से होता है) तक मानते हैं। हम हिन्दी के लोगों को इस सच्चाई पर नाक-भौं सिकोडने और उनकी लानत-मलामत करने से परहेज करते हुए यह बात ईमानदारी से स्वीकार करनी चाहिए कि हिन्दी गजल का काफी सारा अंश उनके इन आरोपों-तोहमतों की पुष्टि ही करता है। लेकिन यहाँ पर मोटे हर्फों में लिखा-पढा जाना चाहिए हर भाषा की हर उस विधा के साथ कमोबेश यह तर्क उतना ही सच है कि जब भी किसी दूसरी भाषा में उस विधा को सिरजा जाता है तो उसमें उस विधा की मूल भाषा जैसा रस-रंग न तो तुरन्त आ जाता है, न ही आसानी से आ पाता है। इसके लिए विराट प्रतिभाओं और विराटतर प्रयत्नों की ज़रूरत पडती है। ध्यान से देखें तो कालिदास, भारवि, भवभूति, भास, बाणभट्ट की कोटि के कवियों-लेखकों की तलाश यदि उर्दू या अन्य भाषाओं में करने लगेंगे, तो सही अर्थों में अध्येता को दाँत से पसीने आने लगेंगे क्योंकि संस्कृत ने जिस ऊँचाई को पाने के लिए एक नहीं, कई सहस्राब्दियों की परिधि नापी है, उस महकाव्यात्मक महनीयता को दो-तीन सौ, चार सौ वर्षों की भाषाएँ आसानी से प्राप्त नहीं कर सकती।
हिन्दी में गजलें वैसे तो काफी पहले से लिखी जा रही थीं, भारतेन्दु से निराला तक ने इस पर हाथ आजमाया था परन्तु हिन्दी भाषा में दुष्यंत कुमार का अवतरण एक ऐसी क्रांतिकारी घटना है जिसने गजल, वह चाहे हिन्दी हो या उदू*, उसके सारे साँचों और मुहावरों को एक झटके में जैसे बदलकर रख दिया। उर्दू की समृद्ध और स्वयं पर इतराती हुई गजल परंपरा जो दुष्यंत के आने तक हुस्न, इश्क, मुहब्बत, वफा-बेवफाई, जाम-साकी, दरिया-समंदर, शमा-परवानों की ज़ुल्फें-अलकें सहलाने-सुलझाने तक सीमित थी और अपने बासी पडते इन प्रतीकों-सरोकारों से ऊब और झुंझलाहट का सबब बनी थी, दुष्यंत की नई कथन-भंगिमा ने गज़ल के समूचे कलेवर में जैसे एक सर्वथा नया, चकमक संसार रच दिया : तू किसी रेल सी गुज़रती है, मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ। एक बाज़ू उखड गया जबसे, और *यादा वज़न उठाता हूँ। दुष्यंत के बाद तो उनकी शैली इस कदर संक्रामक हो गई कि जिसे देखो वही दुष्यंत जैसी गज़लें लिखने की कोशिश में उनका गुटका या पॉकेट-संस्कारण लगने लगा।
गज़ल के परिदृश्य में रामदरश मिश्र हिन्दी के संभवतः सबसे वयस्श्रेष्ठ कवि हैं। वह 97 वर्ष के हैं और लगातार नया से नया सिरजते हुए सक्रिय हैं। हिन्दी के कवि, साहित्य अनुशीलक अपनी भाषाविद तथा तेजोदीप्त संपादक-समालोचक की छवि वाले प्रसिद्ध साहित्यकार ओम निश्चल के सम्पादन में रामदरशजी की 83 गज़लों का संकलन बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे प्रकाशित हुआ है। रामदरश मिश्र हिन्दी का एक बहुत धैर्यवान, शीलवान नाम है, प्रसिद्ध और चर्चित होने या होते रहने के चकाचौंध भरे क्रियाकलापों तथा चेष्टा-कुचेष्टाओं से असंपृक्त, निर्लिप्त- बस यह एक काम कि धीरज से अनवरत-अप्रतिहत रूप से बस कुछ नया, नया से नया और सार्थक सिरजते रहने में व्यग्र-उदग्र रचनकार। उनकी रचनाओं का शामियाना कितना विस्तृत है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि उनके नाम छांदिक कविताएँ, मुक्त छंद की नयी कविताएँ, कहानी, उपन्यास, संस्मरण- क्या कुछ नहीं है और सभी कुछ इतनी विपुल मात्रा में और प्रामाणिकता में इतना प्रशस्त कि हिन्दी की राजनीति से श्लथ-शिथिल होने के बावजूद न तो वे अलक्षित रहते हैं, न ही उपेक्षित।
लेकिन रामदरशजी का मूल स्वरूप कवि का ही है, और जैसा कि हर कवि होता है, उनके भी सबसे पहले और पहचान में आने वाले उद्दीपन प्रेम और प्रकृति ही हैं। प्रेम, रामदरशजी के यहाँ, जैसा कि दुनिया की सभी भाषाओं और साहित्यों का शाश्वत ठीहा है, उनकी गजलों में बार-बार भेस बदल-बदल कर आता है, दस्तक देता है, खिडकियाँ-दरवाजे खुलवाता है, थोडी देर ठहरता है, दिखता-दिखाता है, और बिना किसी को कोई क्षति पहुँचाए एक निस्संग योगी की तरह, जैसे आया था, वैसे ही लौट जाता है। परन्तु रामदरशजी के यहाँ से प्रेम का यह लौटना सदा-सव*दा के लिए लौटना नहीं है, उसका लौटना उसके पुनरागमन की पूर्वपीठिका जैसा है, जैसे वह नेपथ्य में चला गया है, केवल अपनी धज बदलने के लिए, संवादों की अगली नई कडी के रिहस*ल के लिए, या कि भाव-भंगिमा की किसी नई अद्भुत पुनर्रचना के लिए। जैसे ठंड के मौसम में कौडे की पूरी आग के बुझ चुके होने बाद भी, या कि उसमें एक भी लुत्ती-चिंगारी न होने पर भी कौडा तापते लोग, यहाँ आग थी, इस आग की धाह के आश्वासन पर अपने भीतर उष्णिमा का आभास करते हुए सुखपूर्वक बहुत सारा समय, कई बार पूरी रात बिता दिया करते हैं, कवि कहता है : वे आएँगे, ये यकीन नहीं दिल को हुआ / नहीं आएँगे, ये न ऐतबार ही आया- प्रेम की किस रागात्मकता में कवि रमा हुआ है कि अपने प्रिय के आने का यद्यपि उसे यकीन नहीं है, फिर भी उसके भीतरी मन का विश्वास यह मानने को तैयार ही नहीं कि उसका प्रिय नहीं आएगा। प्रेम के चित्तवृत्ति की यह बेकली कवि ने किस चमत्कृत कर देने वाली अभिव्यंजना और उक्ति वैचिपय से सृजित किया है! रामदरशजी के इस संकलन में प्रेम के ऐसे अनगिनत चित्र हैं जिन्हें देखकर भावक के हृदय में रसोद्रेक की जैसे एक बेपनाह हरीतिमा उसे अपने सुवासित आगोश में समोने के लिए व्यग्र-विकल हो उठती है : पास तुम आए तो कीचड में कमल सा मन हुआ / लग रहा है आज सारा जग मेरा दर्पण हुआ। इक नदी बहने लगी गाती हुई भीतर मेरे, यह महीना जेठ का मेरे लिए सावन हुआ। लगभग एक पूरी सदी की यात्रा पर निकला हुआ यह महाकवि अपने बचपन में गुलामी की ज़ंजीरों में जकडे हुए देश को आज़ादी की जद्दोजहद में जूझते हुए देखने का प्रत्यक्षदर्शी रहा है, उसके युवाकाल के अनुभव का आकाश स्वतन्त्रता के मनमोहक इंद्रधनुष की छटा-आभा से अटा पडा है, उसकी प्रौढता में नेहरूवियन माडल के तिलिस्म के कमज़ोर होकर टूटने की कथा का करुण रुदन-गान है, प्रौढोत्तर वार्धक्य में जीवन और समाज के श्रेष्ठ मूल्यों की गिरावट और छिन्न-भिन्न होते जाने का एक लोमहर्षक वृत्तान्त है, और अब इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के पिछले 5-7 बरस तो जैसे भारत में विचारों के चरम क्षरण और मनुष्यता के अवसान की उद्घोषणा के वर्ष सरीखे हैं। ऐसे कठिन-दुष्कर समय में राम दरश जी के भीतर के कवि का रागात्मक मन निराला की पंक्ति आज मन पावन हुआ है, जेठ में सावन हुआ है के आस्वाद से अपने पाठक के रूमानी मन को सहभागी बनाता है।
प्रकृति के कोमल स्पर्श रामदरशजी की मुक्त छंद की कविताओं के सदेह-सगेह स्थाई भाव रहे हैं। नई कविता में जब ज़माना टहनी, फुनगी, कोंपल, पर्ण, वृंत, खरगोश, गिलहरी, तितली, जुगनू का था, या जब मोहभंगजन्य तथा संत्रास के आख्यान के लिए नागफनी, कैक्टस, आलपिन, कांटे, रेत, मरी हुई मछली, विवर्ण धूप का था, तब ये सब बिम्ब, रूपक, प्रतीक राम दरश जी की कविताओं में बहुतायत से थे और अपने समय के विश्वसनीय मुहावरे के रूप में पाठक को चकित-हुलसित भी करते थे। परंतु समय बदला, मुहावरे बदले, जीवन और प्राकृतिक उपादानों को देखने-सुनने की प्रविधि बदली, राम दरश जी भी बदले : चाँद को आज रात भर देखा / तेरा क्या-क्या नहीं असर देखा। जैसे कोई दूध का हो फव्वारा / जैसे कोई गीत का पहर देखा।
रामदरशजी का कवि स्वाभिमान में सिर उठाए खडी घास को देख कर उमंग-उल्लास से भरा हुआ है। वह राम के चौदह बरस के वनवास के समाप्त होने पर अपने पाठक को आपादमस्तक सुखस्नात करने के इस सुख से वंचित करना नहीं चाहता और कवि की उदारचेता उदात्तता का उत्कर्ष तो तब देखते ही बनता है जब एक निर्बलतम मनुष्य को सुख का एक क्षण भी मिलता है तो हमारा कवि अविलंब उसके प्रति अपने सहकार और समर्थन में अपना विचारशील मन और आत्मा उसके हवाले कर देता है : आज धरती पर झुका आकाश तो अच्छा लगा / सिर किए ऊँचा खडी है घास तो अच्छा लगा। आज फिर लौटा सलामत राम कोई अवध में / हो गया पूरा कडा वनवास तो अच्छा लगा। था पढाया माँजकर बर्तन घरों में रात-दिन / हो गया बुधिया का बेटा पास तो अच्छा लगा।
रामदरशजी का मन गँवई है। वह भीतर से बहुत सहज, सरल और सामान्य है। शहर की चकाचौंध और बनावटीपन उसे ज़रा भी रास नहीं आते। बिना किसी हिचक और हीनताबोध के वह अपने गाँव के होने को गरबीली गरीबी की तज़र् पर बडे ही स्वाभिमान से जीवन और अपनी कविता में कइयों बार, कइयों तरह से व्यक्त करता है। अपने दिल्ली के शहराती आँगन में अपने गाँव की कच्ची मिट्टी को बचाए रख पाने का सुख वह अपने पाठक से साझा करता है। वह बडी प्रगल्भता से अपने अस्तित्व को अपनी जडों तक उघाड कर दिखाता है और एक प्रकार की ज़द्दी भावभूमि पर आकर जैसे बहुत मोटे हरफों में लिखकर बताना चाहता है कि रोज़ी-रोटी के दबाव के नाते भले ही वह शहर दिल्ली में आ बसा हो परन्तु घर तो उसका गोरखपुर (उ.प्र. के पूर्वाञ्चल का एक ज़ला) ही है, वहाँ जहाँ वह पैदा हुआ था, और जिसकी मिट्टी की भभूत लगाए वह दुनिया-जहान की यायावरी में निकला हुआ है : बस गया हूँ दोस्तों दिल्ली शहर के बीच यों तो / घर मेरा अब भी वही, हाँ वही गोरखपुर ज़ला है।
कहते है, कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू। यह मनीषी, परिभू (नियामक) और स्वयंभू वाला मानस लगातार उसके कंधे पर बैठे रहने वाले बेताल की तरह उसके रचनात्मक व्यवहार को संचालित करने वाला तत्व है। जीवन के चौथेपन के आखिरी पडाव की ओर बढता तथा उपसंहार की कथा लिखने में व्यस्त यह महाकवि अपने पूरे जीवन का आकलन करता है तो पाता है कि कुछ शब्द फूलों की तरह, कुछ शब्द शूलों की तरह / इसके सिवा तुझे क्या मिला, इस उम्र भर की तलाश में। रामदरश जी की एक अत्यंत लोकप्रिय गज़ल है, जैसे किसी फिल्म के थीम साँग की वह सांगीतिक धुन जो अनिवार्यतः धीमी-धीमी आवाज़ में पूरी फिल्म में अनवरत गुंजरित होती रहती है, ठीक वैसे ही यह गज़ल रामदरशजी के पूरे कविकर्म में एक लगातार बजती हुई मीठी सिंफनी सरीखी है जिसे उनकी समूची कविता का मर्म भी कह सकते हैं, सत्वांश भी बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे, खुले मेरे ख्वाबों के पर धीरे-धीरे। किसी को गिराया, न खुद को उछाला, कटा ज़ंदगी का सफर धीरे-धीरे। जहाँ आप पहुँचे छलांगें लगाकर, वहाँ मैं भी पहुँचा मगर धीरे-धीरे। बिलकुल निर्वैयक्तिक रूप से कहा जाए तो राम दरश जी की यह गज़ल इनके समूचे जीवन के इतिवृत्त का जैसे सार-संक्षेप (त्रद्बह्यह्ल) है, ठीक वैसे ही जैसे एकश्लोकी रामायण में कहा जाता है, आदौ राम तपोवनादि गमनं हत्वा मृगं कांचनं,......एतद्धि रामायणम्। गौर से देखें तो रामदरश जी का समूचा जीवन एक वैष्णव की साधुता का निदर्शन है। बिना किसी चक्र-कुचक्र में पडे, बिना किसी को कोई हानि पहुँचाए, सब पर अपने शुभ और मंगल की वर्षा करता हुआ अपने इकतारे पर एक अलौकिक सी धुन में गाता हुआ यह योगी यह बताता है की बिना षड्यंत्र का हिस्सा बने भी जीवन, सबको वह सब कुछ दे ही देता है जो उसका प्राप्तव्य होता है, बस फर्क केवल इतना है की यह सब कुछ धीरे-धीरे होता है, आपाधापी और हिंस्रवरा के बिना। संस्कृत का एक श्लोक है : अकृत्वा परसंतापं अगत्वा खल मंदिरम। अनुल्लंघ्य सतां वर्त्म यद्स्वल्पमपि तद्बहु। राम दरश जी का सम्पूर्ण जीवन और उनका समूचा रचना वितान यही है, अनुल्लंघ्य सतां वर्त्म-सत्य और श्रेयस्कर का मार्ग छोडे बिना उन्हें जो भी मिला, वह कुछ कम है क्या! अक्षौहिणी सेनाओं को हाँकते महाधनुर्धरों को ऐसा क्या मिल गया जो उन्हें अनुल्लंघ्य सतां वर्त्म के साथ नहीं मिला केवल धीरे-धीरे मिला, बस यही भर तो अंतर है।
रामदरशजी के इस संग्रह में कई सारी ऐसी गज़लें है जो उनके प्रश्नाकुल संशय को रेखांकित करने की कोशिश करती हैं कि आखिर इतनी मार-धाड, हो-हल्ला, हँगामा, उठाना-गिराना क्यों है जीवन को रचने और बाँचने में शांति और सौमनस्य का इतना आपराधिक तिरस्कार क्यों है रामदरश जी के कवि को अपनी किंचित उपेक्षा और अवमान का बोझ दूसरे पर डाल कर उसे लज्जित करने में कोई रुचि नहीं है : कितनी अच्छी थी वो बेरुखी आपकी, आज सहमा गई है हँसी आपकी। कुछ न कहिए कि क्यों आप आए नहीं, मुझको मालूम है बेबसी आपकी। आप वैसे ही रहिए, रहम कीजिए, मार डालेगी शरमिंदगी आपकी। मैंने पहचान तो है लिया, फिर कभी, आप आयें न आयें खुशी आपकी। इस स्वर और भंगिमा की अनेकों गज़लें इस संग्रह में अपनी अर्थ और भावदीप्ति के साथ मौजूद हैं।
जैसा कि पहले भी संकेत किया गया है, रामदरशजी के भीतर एक वैरागी कथावाचक अपने गैरिकवसन अन्तःकरण के साथ हमेशा बना रहता है; निस्पृह, निर्लोभी परन्तु जीवन के शुभ के साथ सदैव संपृक्त : सुनेंगे आप जहाँ तक, कथा सुनाएँगे, नहीं तो जाके अकेले में गुनगुनाएँगे। हमारा काम है कहना, कोई सुने न सुने, पिया है दर्द उसे लेके कहाँ जाएंगे। रघुवीर सहाय की सहसा मुझे अकेला पाकर फिर से आप हँसे के वर्ण-गंध में रची-बसी अनेकों गज़लें इस संग्रह में इस बात की मुनादी करती हैं कि रामदरशजी का कवि मनुष्य के भीतर होते जा रहे मनुष्यता के अवसान से न तो अनभिज्ञ है, न ही निरपेक्ष। वह हर घटना को उसकी कारणता के साथ जानता-पहचानता है। कोई भी पत्ता क्यों और कैसे हिल रहा है, कुछ भी उसकी प्रत्यभिज्ञा से ओझल नहीं है : आप पीले पड गए सहसा, हम तो बस यों ही मुस्कराए हैं।
बहुत गौर से देखें तो बडे से बडे कवि के रचना संसार के निथरे हुए, फिल्टर्ड मीठे पानी को पीता हुआ पाठक वाह, वाह करता रहता है। यह उसकी विवशता है क्योंकि अच्छे रचनाकार के रचनात्मक वैभव में सामान्य रसग्राही भावक उसे मोहविष्ट सा अकबकाकर देखता ही रह जाता है परन्तु बहुत गहरे तक जाने वाले पाठक जान ही जाते हैं कि बडे से बडे सर्जक की तलछट पर मिट्टी मिले गंदले और अपेय जल का पाया जाना एक अवश्यंभावी परिघटना है और इस अश्लाघ्य जल को पीने या उससे हाथ-मुँह धोने की विवशता से उसका मन न चाहते हुए भी विषण्ण हो उठता है। राम दरश जी जैसे बडे सर्जक भी इसके अपवाद नहीं बन पाए। अपनी रचना का मोह किसी बडे से बडे कवि की भी रचनात्मक काया को कई गोपनीय स्थानों से निर्वसन करके उसे सकुचा सकता है। काफिये, रदीफ में भटका हुआ यह महाकवि एक गज़ल में तो जैसे प्रहसन सा करने लगता है : नदी में मैंने भी गाए हैं गीत बार कई, कैमरा लेके मगर हाथ में चेला न हुआ। दूब-सा बिछ गया राहों में मैं फिसलन थामे, पडा छिलके की शक्ल में कोई केला न हुआ। यह अप्रीतिकर उदाहरण रामदरशजी जैसे बडे और सिद्ध कवि की अवमानना या उनमें त्रुटि खोजने के उद्देश्य से नहीं दिया गया है। इससे अभिप्रेत केवल इतना ही है कि वह रचनाकार चाहे जितने बडे हों, पर अन्ततः हैं वे भी मनुष्य ही। अपने सृजन के चाकचिक्य को देखकर जब प्रजापति ब्रह्मा अपनी सृष्टि से आत्ममुग्ध हुए बिना नहीं रहे तो फिर किसी मनुष्य की बिसात ही क्या।
रामदरशजी हमारे समय की विरलतम श्रेष्ठ सृजनात्मक उपस्थितियों में हैं। उनका होना हमारे समय, साहित्य और हिन्दी की मनीषा को अपने रचनात्मक वैभव से एक उल्लेखनीय गरिमा प्रदान करता है। वह वर्तमान के झंझावातों, संशयों, ऊहापोहों, मनुष्यता की दिन-प्रतिदिन गिरती हुई अकल्पनीय दुरवस्थाओं, मानवीय घात-प्रतिघातों के अवसन्न कर देने वाले कुचाली षडयंत्रों से दुखी ज़रूर हैं, लेकिन क्योंकि वह सर्जक हैं, सिरजना, लगातार नया से नया, श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर सिरजना उनके रस रक्त माँस मेद अस्थि मज्जा, गरज़ यह कि उनके समूचे व्यक्तित्व और कृतित्व की चरम परिणति है, लिहाज़ा वह निराश-हताश नहीं हैं। उनके कवि का यह भरोसा पक्का और अडिग है कि भले सारे रास्ते बंद हो गए से दिखते हों, लेकिन बाहर निकलने और रौशनी को आँख में भरकर इस अनिर्वचनीय संसार को देखने का रास्ता अंतिम रूप से कभी बंद नहीं होता। अभी वह रास्ता दिखता भले ही न हो, ओझल सा लग रहा हो आँखों से चाहे, लेकिन वह सार्वकालिक रूप से बंद हो गया हो, ऐसा तो कदापि नहीं है, जैसा कि शिव ओम अम्बर अपने इस शेर में कहते हैं : रौशनी के नाम खत लिखना नहीं छोडा, गो अंधेरे की सुरंगों में खडे हैं हम और इसी की ताईद रामदरशजी इन शब्दों में कर रहे हैं : कभी से चल रहे हैं सोचते अंधेरे में, यहाँ नहीं तो कोई रास्ता वहाँ होगा। कभी मत भूलिए कि यही आशावाद हर रचनाकार का पाथेय होता है और इसी पर दुनिया टिकी है।
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पुस्तक का नाम : बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे :
लेखक : रामदरश मिश्र की गज़लें
संपादकः ओम निश्चल
प्रकाशकः यश पबिलकेशन्स, दरियागंज नई दिल्ली
संस्करणः 2019, मूल्य 350/-

सम्पर्क : 2/217 (दूसरा फ्लोर ), विजय खण्ड-2, गोमती नगर, लखनऊ-226010,
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