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शंकरानन्द की कविताएँ

शंकरानन्द
खोने के बाद

बहुत-सी बातें एक दिन
मन के उस कमरे में गुम हो गई
जिसका ताला लगाने के बाद
चाबी कही खो गई
बरसों तक
कोई पलट कर देखने नहीं आया
सन्नाटे में एकटक देखना
यादों को दुहराना हो गया

जिसे अकेले रहने में
सबसे अधिक डर लगता था
उसे ही छोड कर
चले गए सब एक एक कर
इस तरह सबको सँभालने वाले हाथ
एक दिन इतने कमजोर हो गए कि
हाथ में पानी का गिलास भी काँपने लगा

जिसे साँस की तरह चाहो
अगर वही चल दे चुपचाप
कभी न लौटने के लिए
तो आईने में अपना ही चेहरा
बबूल की तरह गढता है!


नए रास्ते

मैं धुंध में घिरा एक पक्षी हूँ
दिशाओं की सारी संभावनाएँ
मटमैली हो गई हैं

अब बस थोडी-सी चहक
बची है कंठ में
पंख में थोडी-सी आशा
उड जाने के लिए

जानता हूँ कि
मेरे देवता अभी ध्यान कर रहे हैं
इसलिए
वे तो बहेलिये से बचाने नहीं आएँगे

अब सारा दारोमदार
मेरी जिद पर है
उड जाऊँ या
कर दूँ समर्पण।






अन्न के भाव

खेत के पौधे जब तक हरे थे
बिलकुल नए लगते थे
दानों में जो चमक थी
वह किसी धातु में नहीं हो सकती थी

अन्न की गंध जैसी कोई गंध नहीं थी
उसके स्वाद की तरह कोई स्वाद नहीं
ये पृथ्वी इसी अन्न की बजह से
एक स्त्री की तरह लगती है

सुन्दरता की कोई कीमत नहीं होती
इच्छाएँ बहुत देर तक सीझती हैं
तब जाकर उनका कसैलापन दूर होता है
कोई फल एक दिन में नहीं पकता

तुमने नहीं बोया है कोई बीज तो
तुम क्या जानो अन्न के भाव!

अनदेखे दिन
उम्र का बीतना
तालाब के पानी का
धीरे-धीरे सूखना है

आज यहाँ प्यास है
पानी है
मछली है
जलकुम्भी का हरापन
जैसे मेरा वसंत

पानी में झिलमिल
बहुत नीला आसमान
बहुत सुनहली धूप
कभी आधा कभी पूरा चाँद और
टिमटिमाते असंख्य तारों की परछाई

सब एक पेंटिंग की तरह सम्पूर्ण
मगर कील के सहारे
खूँटी पर टंगी हुई मेरी खुशियाँ

मुझे तेज हवाओं से डर लगता है।

शीत में
कोहरे में डूबे चेहरे
सब कुछ बर्फ की तरह ठंडा

कभी फुर्सत हो तो देखना
धूप का निकलना

घने जंगल में
झाडियों के बीच
सूरज
कैसे अपना पता खोजता है
कैसे डाकिये की तरह बाँटता है
धूप की
चिट्ठियाँ !

सम्पर्क - क्रांति भवन, कृष्णा नगर ,खगरिया -851204
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