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हजारीप्रसाद द्विवेदी की उपन्यास आलोचना

आनंद पांडेय
हजारीप्रसाद द्विवेदी हिंदी के उन आलोचकों में से हैं जिन्होंने उपन्यास की सैद्धांतिक आलोचना की है। उनकी उपन्यास-आलोचना साहित्य सहचर में साहित्य की विभिन्न विधाओं के परिचय देने के क्रम में सामने आयी। हिंदी में उपन्यास की सैद्धांतिक आलोचना की क्षीण परंपरा और प्रवृत्ति को देखते हुए उनकी आलोचना का विशेष महत्त्व है। इसमें उपन्यास के सभी पक्षों का समावेश किया गया है। एक मौलिक साहित्य-विचारक के रूप में उन्होंने उपन्यास के विभिन्न तत्त्वों के साथ-साथ उपन्यास-आलोचना के प्रमुख सिद्धांतों और वादों का भी थोडा-थोडा विवेचन और विश्लेषण किया है। थोडे में ही उन्होंने उपन्यास की समग्र-चिंता की है। उनकी आलोचना उपन्यास के बारे में उनके मौलिक दृष्टिकोण और चिंतन का साक्ष्य है। वे स्वयं एक सिद्धहस्त उपन्यासकार थे, इसलिए उनकी उपन्यास-आलोचना की विशेषता यह है कि उसमें एक उपन्यासकार के रचना-अनुभव और अंतर्दृष्टि भी शामिल हैं। हिंदी में उपन्यास की सैद्धांतिक-आलोचना की परंपरा की वे अपरिहार्य कडी हैं।
उपन्यास की समझ के बिना न तो उसके महत्त्व और उसकी भूमिका को जाना जा सकता है और न ही अच्छे उपन्यास लेखन और पठन-पाठन की संस्कृति को प्रोत्साहित किया जा सकता है। यह बिडंबना ही है कि दुनियाभर में उपन्यास की लोकप्रियता जितनी अधिक है* उतनी ही उसे गंभीरतापूर्वक समझने की प्रवृत्ति का अभाव है। हिंदी जैसी भाषाओं में उपन्यास की सैद्धांतिक आलोचना की क्षीण परम्परा का एक बडा कारण यह भी है। हजारीप्रसाद द्विवेदी इस अंतर्विरोध को पकडते हैं और इसे ज्ञान में बाधक पाते हैं। वे लिखते हैं, ऐसे लोकप्रिय साहित्य को समझने का प्रयत्न क्या करना भला। किन्तु दुनिया में प्रायः ही देखा जाता है कि सबसे प्रिय वस्तु को समझने में ही आदमी सबसे अधिक गलती करता है। प्रिय वस्तुओं के प्रति एक प्रकार का मोह हुआ करता है जो ज्ञान का परिपंथी है। उपन्यास के समझने में भी बहुत गलतियाँ की जाती हैं।1. ज्ञान के विकास के लिए उपन्यास की समझदारी के महत्त्व और आवश्यकता को रेखांकित करने के बाद वे उपन्यास की परिभाषा की ओर बढते हैं। वे प्रेमचंद की उपन्यास की परिभाषा को विस्तार से उद्धृत करते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, इस प्रकार प्रेमचंद जी उपन्यास को बहु-विचित्र मनुष्य-जीवन का चित्र मानते हैं।2. उपन्यास की सर्वसम्मत परिभाषा की असम्भाव्यता को स्वीकार करते हुए भी वे प्रेमचंद की परिभाषा से संतुष्ट और सहमत होते दीखते हैं। स्वयं प्रेमचंद उपन्यास की किसी एक सर्वसम्मत परिभाषा के अभाव की बिडंबना को स्वीकार करने के बाद उपन्यास को अपने ढंग से परिभाषित किया था। प्रेमचंद की तरह वे भी उपन्यास की परिभाषा की अपूर्णता को स्वीकार करते हैं और फिर काम चलाने के लिए एक परिभाषा को समीचीन मान लेते हैं। असल में, उपन्यास ऐसी विधा ही है जो परिभाषा विरोधी है। जब हम उपन्यास को परिभाषित कर रहे होते हैं तो केवल एक प्रकार के उपन्यास को परिभाषित कर रहे होते हैं, जबकि उसी समय कई अन्य प्रकार के उपन्यास इस परिभाषा के दायरे से बाहर छूट रहे होते हैं और ऐसे किसी भी प्रयास की अपर्याप्तता की खिल्ली उडा रहे होते हैं। द्विवेदी इस समस्या को समझते हैं, इसलिए वे उपन्यास को परिभाषित करने के मकडजाल में उलझने के स्थान पर उसे समझने में प्रवृत्त होते हैं।
हिंदी ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय उपन्यास आलोचना की एक रुढि और धारणा रही है, उपन्यास को संस्कृत और अन्य भाषाओं के प्राचीन कथा-साहित्य से जोडकर उसे उसकी निरंतरता में देखने की। इसके तहत आलोचक कभी-कभी विचित्र और विडंबनापूर्ण ढंग से उपन्यास की अपूर्वता और कथा-साहित्य की सनातनता का घालमेल करते दिखते हैं। इसका एक रोचक उदाहरण बालकृष्ण भट्ट का निबंध उपन्यास (1883) है। यह हिंदी में उपन्यास पर पहला आलोचनात्मक निबंध है। आरंभ में ही वे स्पष्ट कर देते हैं, नॉवेल के ढंग का गद्य काव्य लिखने का तरीका हमारी प्राचीन संस्कृत में न था...।3 यह बिल्कुल ठीक है, लेकिन इसके बाद दो पृष्ठों के इस पूरे निबंध में वे उपन्यास की विशिष्टता और अपूर्वता के स्थान पर संस्कृत कथा-साहित्य से उसकी समानता और उपन्यास की सनातनता सिद्ध करने में ही लगे रहते हैं। ठीक यही स्थिति मराठी के विद्वान काशीनाथ बालकृष्ण मराठे के यहाँ भी दिखती है। वे भी नावल म्हणजे काय? नामक निबंध के आरंभ में उपन्यास को संस्कृत कथा-साहित्य से भिन्न कहते हैं, लेकिन इसके बाद इस विशाल हृदयी निष्कर्ष पहुँचते हैं, किन्तु, उपन्यास की गद्यबद्ध होने की शर्त न हो तो संस्कृत में बहुत-से उपन्यास मिलेंगे। इसके अतिरिक्त शास्त्रविषयक ग्रंथ छोड दिए जायँ, तो सभी संस्कृत ग्रंथों को उपन्यास-ग्रंथ कहने में क्या समस्या है? चारों वेद, अठारहों पुराण और सभी काव्य क्या उपन्यास नहीं हैं?4 शुक्र है, गद्यबद्धता की शर्त ने कुछ संकोच रहने दिया नहीं तो उनके लिए गद्य-पद्य में लिखी गई सभी कथात्मक-अकथात्मक रचनाएँ उपन्यास ही होतीं! फिर, उपन्यास की आवश्यकता और भूमिका ही क्या रह जाती! उसकी अपूर्वता और विशिष्टता का रेखांकन एक गैरजरूरी उपक्रम मान लिया जाता! लेकिन, गद्यबद्धता उपन्यास की कोई अनिवार्य शर्त नहीं है। सभी उपन्यास गद्य में नहीं लिखे गए हैं। पुश्किन के युजिनी ओंगिने और विक्रम सेठ के द गोल्डन गेट जैसे पद्यबद्ध उपन्यासों के उदाहरण देते हुए टेरी इग्ल्टन ने गद्यबद्धता को उपन्यास का भेदक लक्षण मानने से इंकार किया है। (वाट इज अ नॉवेल?) अनुमान किया जा सकता है कि यदि ये उदाहरण मराठे के सामने होते, तो वे सम्पूर्ण साहित्य को ही उपन्यास सिद्ध कर देते! यानी उपन्यास साहित्य और वाङमय के पर्याय से अधिक कुछ न होता!
ऐसा नहीं है कि हिंदी या भारतीय भाषाओं में ही यह प्रवृत्ति मिलती है, अन्यत्र नहीं। यह स्थिति उन भाषाओं में भी मिलती है, जिनमें उपन्यास-सिद्धांत और उपन्यास के उद्भव पर वैश्विक स्तर पर स्वीकृत और प्रशंसित कार्य हुए हैं। उदाहरण के लिए, रुसी उपन्यास-सिद्धांतकार मिखाइल बाख्तिन उपन्यास को शाही रोम और प्राचीन हेलेनिस्टिक रोमांस तक देखते हैं, तो मार्गरेट एन्नी डूडी इसका जन्म-स्थान प्राचीन मेडीटैरेनियन संस्कृतियों में सिद्ध करती हैं। बाख्तिन उपन्यास के जन्म को सामाजिक-आर्थिक कारणों पर निर्भर नहीं मानते, बल्कि उनके अनुसार उपन्यास का आधुनिक रूप लंबी औपन्यासिक परंपरा का प्रतिफल है। उपन्यास के उद्भव-काल और देश को लेकर आलोचकों के मतों का विवेचन करने पर पता चलता है कि इसके उद्भव-काल को तीन हजार वर्ष पूर्व तक और इसके उत्पत्ति-स्थल को विश्व के कोने-कोने में निर्धारित करने के प्रयत्न हुए हैं। टेरी इग्ल्टन इस मतवैभिन्य पर चुटकी लेते हुए ठीक ही लिखते हैं, यदि मोटर गाडी की आपकी परिभाषा अस्पष्ट है, तो बीएमडब्ल्यू को प्राचीन रोमन रथ से जोड देना कोई कठिन काम नहीं है।5 कहना न होगा, उपन्यास का रूप ही ऐसा है कि इस तरह का मतवैभिन्ना उत्पन्न होता है। उपन्यास आख्यान की जाति का साहित्य है। संसार की विभिन्न संस्कृतियों में आख्यान के विविध रूप अति प्राचीन काल से प्रचलित रहे हैं। इस आख्यानधर्मिता के कारण प्राचीन आख्यान-रूपों से उपन्यास की समानता भी दिखती और दिखायी जाती है, लेकिन यह त्रुटिपूर्ण और भ्रामक है। सभी आख्यानधर्मी विधाओं को उपन्यास नहीं सिद्ध करना चाहिए। वस्तुतः, उपन्यास कथा साहित्य की एक नवीन और अभूतपूर्व उपजाति है।
कहना न होगा कि इस तरह की मान्यताएँ न केवल उपन्यास की समझ और सैद्धांतिकी के विकास में बाधक हैं, बल्कि उपन्यास की नवलता और अपूर्वता के रेखांकन में भी इनसे अडचन पैदा होती है। यदि मात्र कथा के आधार पर उसे दुनियाभर के नये-पुराने कथात्मक साहित्य से जोडकर देखा जाएगा, तो इससे उसकी विशिष्टता और महत्त्व को ठीक से नहीं समझा जा सकता है। यही नहीं, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन के साथ-साथ रूपों में होने वाले परिवर्तन की प्रक्रिया को भी नहीं समझा जा सकता है। जबकि कोई भी साहित्य-रूप विशिष्ट परिस्थितियों की उपज होता है। उपन्यास पूर्व कथा-रूपों की परिस्थितियों से उपन्यास की परिस्थितियाँ स्पष्ट रूप से भिन्न हैं। इसीलिए, उपन्यास भी उनसे भिन्न और विशिष्ट है।
हजारीप्रसाद द्विवेदी की उपन्यास-आलोचना-दृष्टि की विशिष्टता यह है कि वे इस अंतर को समझते हैं और उसे महत्त्व भी देते हैं। इसलिए, उनमें उपन्यास को प्राचीन संस्कृत कथा-रूपों की निरंतरता में देखने की चेष्टा नहीं है। इसके विपरीत वे उपन्यास को भारतीय साहित्य में एक नवल साहित्य-रूप के रूप में देखते हैं और उसकी नवलता और अपूर्वता को रेखांकित करते हैं। हमने देखा कि जो आलोचक उपन्यास की अपूर्वता को महत्त्व देते हैं वे भी संस्कृत के वासवदत्ता, दशकुमारचरित, कादंबरी इत्यादि से उसका संबंध जोडने का मोह संवरण नहीं कर पाते हैं, जबकि द्विवेदी जोर देकर सिद्ध करते हैं कि उपन्यास इन रचना-प्रकारों से भिन्न श्रेणी का है। वे लिखते हैं, यह गलत धारणा है कि उपन्यास और कहानियाँ संस्कृत की कथा आख्यायिका की सीधी संतान हैं।6 उनकी उपन्यास-आलोचना का महत्त्व इस बात में है कि उन्होंने हिंदी में पहली बार सभी प्रकार के कथात्मक साहित्य को उपन्यास मान लेने की प्रवृत्ति का बलपूर्वक खंडन किया। इसके बिना उपन्यास की वास्तविक और वैज्ञानिक समझ नहीं विकसित हो सकती है। और, न ही उपन्यास की विशिष्टता और नवलता का महत्त्व ही समझ में आ सकता है।
द्विवेदी ऐसा इसलिए कह सके हैं, क्योंकि वे साहित्यिक विधाओं के उद्भव और विकास के सामाजिक और आर्थिक कारणों को महत्त्व देते हैं। दूसरे शब्दों में, वे प्रकारांतर से आधार और अधिरचना की माक्र्सवादी अवधारणा को स्वीकार करते हैं। इस अवधारणा को गिओर्गी प्लेखानोव ने यों रखा है, मेरे विचार से, लोगों की कला और उनकी अर्थव्यवस्था के बीच हमेशा ही एक घनिष्ठ संबंध होता है।7. उपन्यास का गहरा सम्बन्ध पूँजीवाद और औद्योगिक-वैज्ञानिक क्रान्ति से है। बढे पैमाने पर पुस्तक-उत्पादन के साधन, जन साक्षरता और शिक्षा, मध्यवर्ग के उदय तथा बाज़ार के बिना उपन्यास का अस्तित्व में आना असंभव था। इसलिए वह इनकी साझी संतान है। इसी कारण द्विवेदी इस सत्य को रेखांकित करना नहीं भूलते कि, उपन्यास नये तंत्र-युग की उपज हैं। नये तंत्र-युग ने जिन गुण-दोषों को उत्पन्न किया है उन सबको लेकर यह नया साहित्यांग अवतीर्ण हुआ है। छापे के कल ने इनकी माँग बढायी है और उसी ने उनकी पूर्ति का साधन बनाया है।8 ये परिस्थितियाँ यूरोप में पहले पैदा हुईं, इसलिए उपन्यास का उदय वहाँ पहले होता है। भारत में अंग्रेजी शासन और संस्कृति की स्थापना के साथ-साथ उपन्यास का रूप भी आया और उसका स्वागत करनेवाले पाठक और लेखक वर्ग भी पैदा हुए। दूसरे शब्दों में, प्रिंट सोसाइटी के विकास के साथ-साथ उपन्यास का भी विकास हुआ।
कहना न होगा, गद्य के विकास के भी वही कारक हैं, जो उपन्यास के हैं। जिन परिस्थितियों में उपन्यास उत्पन्न होता है उन्हीं में गद्य का प्रचार भी बढता है। उपन्यास स्वयं गद्य की लोकप्रियता का प्रमाण भी है और प्रतिफल भी। द्विवेदी, उचित ही, उपन्यास को गद्य-युग की विधा कहते हैं। उनके अनुसार गद्य ही उपन्यास की भाषा है। उनके अनुसार विशुद्ध गद्य उपन्यास की विशेषता है। वे गद्य-काव्य और काव्य-गुणों से संपन्न गद्य-रचनाओं को उपन्यास नहीं मानते हैं। पुराने गद्य-काव्यों और काव्य-गुणों से संपन्न उपन्यासों को वे विशुद्ध उपन्यास न मानकर गद्य-काव्य कहना पसंद करते हैं। उनके अनुसार इस श्रेणी में अधिकतर भाव-प्रधान उपन्यास आते हैं। हम देखते हैं कि वे काव्य से उपन्यास को आत्यंतिक रूप से अलगाने पर विशेष बल देते हैं। स्मरण रहे, रामचंद्र शुक्ल इस अलगाव को प्रमाद कहकर गैरजरुरी मानते थे, लेकिन उपन्यास की विशिष्टता के निखार में इसे रूकावट भी मानते थे। इस तरह से शुक्ल इन दोनों रूपों को उपन्यास की कोटि में मानते हैं, जबकि द्विवेदी विशुद्ध गद्य में लिखे गए सहज भाव वाले आख्यान को ही उपन्यास मानते हैं, क्योंकि, उनके अनुसार काव्य के विपरीत उपन्यास में भाषा की गद्यात्मकता और सहज भाव अपेक्षित है।9
द्विवेदी के लिए उपन्यास वैयक्तिक स्वाधीनता का साहित्य रूप है। वे लिखते हैं, यंत्र युग की विशेष देन वैयक्तिक स्वाधीनता उपन्यास का आदर्श है।10 अन्यत्र वे लिखते हैं, वैयक्तिक स्वाधीनता का यह सर्वोत्तम साहित्यिक रूप है।11 शंभुनाथ ने बिल्कुल सही कहा है, उपन्यास ने शाश्वत पर अनुभव की वरीयता स्थापित की थी। लाला श्रीनिवासदास ने उपन्यास को अनुभव द्वारा उपदेश मिलने की संसारीवार्ता कहा था। अनुभव की महत्ता व्यक्ति की महत्ता थी, अर्थात् उपन्यास पाठक में व्यक्ति सत्ता स्थापित करता था- उसके अन्दर व्यक्ति का अहसास भरता था, जो एक आधुनिक घटना थी।12 महाकाव्य में व्यक्ति नहीं टाइप होते थे। नायक-खलनायक सब में पाये जानेवाले गुण पूर्वनिर्धारित होते थे। इन्हीं गुणों को दिखाने के लिए पात्र-निर्मित किये जाते थे। उनमें सहज मानवीय विशिष्टता नहीं होती थी। जबकि उपन्यास में आनेवाले व्यक्ति किसी पूर्वनिर्धारित गुण को दिखाने के लिए नहीं बल्कि समाज में मिलनेवाले सहज, साधारण और सामान्य मनुष्य होते हैं। एक-दूसरे से भिन्न और विशिष्ट होते हैं। व्यक्ति को महत्व देने के कारण ही उपन्यास व्यक्ति की स्वाधीनता की भी वकालत करता है। व्यक्ति स्वाधीनता पर यह जोर उपन्यास की लोकतांत्रिक भूमिका के कारण भी है। उपन्यास स्वाभाविक रूप से लोकतंत्र का पक्षधर साहित्य रूप है। सामंतवादी समाज-व्यवस्था से महाकाव्य का अभिन्न संबंध है, तो आधुनिक लोकतंत्र से उपन्यास का सहोदर नाता है। व्यक्तिगत स्वाधीनता लोकतंत्र की कसौटी है तो उपन्यास की भी है। व्यक्तिगत स्वाधीनता और व्यक्ति केन्द्रीयता का हरण करके न तो लोकतंत्र सच्चा बना रह सकता है और न ही उपन्यास सच्चा हो सकता है।
उपन्यास वर्तमान का कथा-रूप है। यह अपने समय से न पीछे रहता है, न आगे बल्कि सदैव समकालीन रहता है। वस्तुतः उपन्यास समकालीनता की विधा है। उसकी अतीत और भविष्य-चिंता के केंद्र में भी वर्तमान ही रहता है। ऐतिहासिक उपन्यासों में भी उपन्यासकार वर्तमान से ही दृष्टि और प्रेरणा प्राप्त करता है। यह एक और गुण है जो उपन्यास को महाकाव्य और कविता से अलग करता है। वर्तमान में टिके होने के कारण वह न तो अतीतप्रेमी है और न ही स्वप्नद्रष्टा। टेरी इग्ल्टन कहते हैं, नॉस्टेल्जिया और यूटोपिया से मुक्त रहने के कारण ही उपन्यास न प्रतिक्रियावादी है और न ही क्रांतिकारी बल्कि सुधारवादी है।13 हजारीप्रसाद द्विवेदी उपन्यास के इस स्वभाव को समझते हैं और रेखांकित भी करते हैं। वे लिखते हैं, उपन्यासकार वर्तमान पर जमा रहता है। प्राचीन ऐतिहासिक कथानक की रचना के समय भी वह वर्तमान-काल की जानकारियों के बल पर ही अपना कारबार चलाता है और जासूसी तथा वैज्ञानिक कथावस्तु को सम्हालने में भी आधुनिक जानकारियों की जहाँ तक पहुँच है, उसी के आधार पर अपनी कल्पनाओं और संभावनाओं की सृष्टि करता है। वह कवि की भाँति जमीन के आगे रहने का दावा नहीं करता।14
उपन्यास एक कथा-रूप है। वह कहानी कहता है। कहानी के माध्यम से ही वह जीवन-दृष्टि, विचारधारा, यथार्थ और आदर्श को अभिव्यक्त करता है। कथा के बिना उपन्यास की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए, यह स्वाभाविक ही है कि द्विवेदी कथा को उपन्यास का प्रधान तत्त्व मानते हैं। वे लिखते हैं, उपन्यास हो या कहानी, उसकी आलोचना करते समय हम एक बात भूल नहीं सकते। वह यह कि उपन्यास या कहानी, और कुछ हो या न हो, एक कहानी या कथा जरुर है।...कहानीपन इस साहित्य की प्रथम शर्त है।15 स्पष्ट है, जब कथा उपन्यास का केन्द्रीय तत्व है, तो कथात्मकता का निर्वाह ही उसके मूल्यांकन का प्रथम और अंतिम निकष भी है। उपन्यास की सैद्धांतिक आलोचना में द्विवेदी इस निकष को सर्वाधिक महत्त्व देते हैं। अच्छी कहानी की कई शर्तें हैं। द्विवेदी ने इन शर्तों का विस्तार से विवेचन किया है। उत्सुकता और जिज्ञासा कहानी के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण गुण हैं। पाठक में यदि कहानी उत्सुकता और जिज्ञासा का संचार नहीं कर पाती है तो वह पठनीय नहीं हो सकती है। पाठक अपनी उत्सुकता और जिज्ञासा को क्षुब्ध और शांत करने के लिए ही कहानी पडता-सुनता है। ये भाव आदि से अंत तक बने रहने चाहिये अर्थात् श्रोता या पाठक में फिर क्या हुआ? आगे क्या हुआ? का भाव आद्यांत बने रहना चाहिए। द्विवेदी के शब्दों में, असल में वे ही लोग अच्छे उपन्यास-लेखक हो सकते हैं जो कहानीपन के जानकार हैं और शुरू से अंत तक श्रोता की उत्सुकता बनाये रखने की कला के उस्ताद हैं।16 रामचंद्र शुक्ल ने अच्छे महाकाव्य के लिए मार्मिक स्थलों की पहचान को एक निकष के रूप में प्रस्तावित किया है। हजारीप्रसाद द्विवेदी उपन्यास के लिए भी इस निकष को आवश्यक मानते हैं। वे लिखते हैं, अच्छे उपन्यासकार की पहचान के लिए यह जरुरी है कि ...जहाँ-जहाँ कहानी अधिक मर्मस्पर्शी हो सकती थी वहाँ-वहाँ उसने उचित रीति से सम्हाला है या नहीं...।17 कथा उपन्यास का अनिवार्य और प्रधान-तत्त्व है, यह ठीक है लेकिन यह उपन्यास का भेदक लक्षण नहीं हो सकती है। कथा-तत्त्व सभी साहित्य-विधाओं की साझी और सामान्य विशेषता है। कोई कथा कैसे उपन्यास बनती है और कैसे नाटक या महाकाव्य बन जाती है। यह जाने बिना उपन्यास के उपन्यासत्व को नहीं समझा जा सकता है। द्विवेदी ने इस प्रश्न का उत्तर दिया है, जिसे हम आगे देखेंगे।
द्विवेदी ने उपन्यास को एक मनोरंजक साहित्य के रूप में देखा है। उसे पॉकेट का थियेटर कहा है। उसकी मनोरंजकता को रेखांकित करने के लिए उन्होंने उस आधुनिक प्रवृत्ति को याद किया है जिसके अनुसार बहुत मनोरंजक पुस्तक को उपन्यास-सा आनंद-दायी कह दिया जाता है। अपनी उपन्यास-आलोचना में उन्होंने कई बार यह रेखांकित किया है कि अपने मनोरंजक स्वभाव के कारण उपन्यास ने मनोरंजक कविता और नाटक को लगभग विस्थापित कर दिया है। लेकिन, वे उपन्यास का उद्देश्य मनोरंजन नहीं मानते। वे लिखते हैं, महत्त्वपूर्ण उपन्यास या कहानी केवल अवसर-विनोदन का साधन नहीं है। वे इसलिए महत्त्वपूर्ण होती हैं कि उनकी नींव मजबूती के साथ उन वस्तुओं पर रखी हुई होती है जो निरंतर गंभीर भाव से और निर्विवाद रूप में हमारी सामान्य मनुष्यता की कठिनाइयों और द्वंद्वों को प्रभावित करती हैं।18 फिर भी वे घटनाओं के मनोरंजक सन्निवेश को उपन्यासकार का बडा भारी गुण मानते हैं। जिसका लक्ष्य इतना ही हो कि पाठक की रूचि कथा पढने में बनी रहे। साहित्य में मनोरंजकता और रोचकता का प्रधान स्रोत कथा ही है। यदि उसका सही निर्वाह हो तो साहित्यकार को मनोरंजन का अलग से विधान करने की चिंता कम होगी।
कथा में प्रवाह और गति का निर्वाह इसे मनोरंजक बनाने में विशेष रूप से सहायक होती हैं। संभवतः इसीलिए द्विवेदी प्रवाह और गति को उपन्यास के आवश्यक मानते हैं। इसके लिए वे प्रसंगवश आई घटनाओं के वर्णन में सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि इन घटनाओं के वर्णन में उपन्यासकार को ठहर न जाना चाहिए। यही नहीं पात्रों की मनोवृत्ति खोलने के लिए भी उसे अनावश्यक विस्तार और भटकाव से बचना चाहिए। उनके अनुसार ऐसा करने से कहानी ठोस और सुसंबद्ध बनती है जो कि एक अच्छी कथा का परम आवश्यक गुण है। उपन्यास में मूल कथा की सहयोगी कथाएँ भी हो सकती हैं। वे इनको सहयोगी और विरोधी दो रूपों में देखते हैं। उनके अनुसार बालि और सुग्रीव का झगडा सहायक के रूप में है जबकि गोदान में किसानों के सामानांतर उच्च वर्ग की कथा विरोधी के रूप में है। वे कहते हैं कि किसान-जीवन को उज्ज्वल दिखाने के लिए उसे विपरीत सन्दर्भ में रखा गया है। दोनों प्रकार की कथाओं को मूलकथा को उज्ज्वल दिखाने के लिए सन्निवेशित किया जाता है। लेकिन, उनके अनुसार शर्त यह है, अवांतर घटनाएँ इसप्रकार मूल घटना के साथ बुन दी जाएँ कि पाठक को कहीं भी संदेह न होने पावे कि वह दूसरी कथा भी पढ रहा है।19 इस तरह हम देखते हैं कि द्विवेदी लोक में कथा कहने-सुनने के गुणों को उपन्यासकार के लिए आवश्यक मानते हैं।
उपन्यास और यथार्थ का संबंध ही ऐसा है कि उपन्यास पर कोई भी सिद्धांत-चर्चा यथार्थ और यथार्थवाद से उपन्यास के सम्बन्ध के विश्लेषण के बिना पूरी नहीं हो सकती है। अपनी उपन्यास-आलोचना में हजारीप्रसाद द्विवेदी ने स्वाभाविक रूप से यथार्थ और यथार्थवाद से उसके सम्बन्ध पर विस्तार से विचार किया है। उन्होंने उपन्यास को एक यथार्थवादी साहित्य-रूप के रूप में देखा है। उन्होंने यथार्थवाद के विभिन्न रूपों को विश्लेषित करते हुए उपन्यास से उनके विशिष्ट संबंधों को दिखाया भी है।
यथार्थवाद और आदर्शवाद दोनों एक दूसरे के विरोधी के रूप में देखे जाते रहे हैं। लेकिन, दोनों को एक दूसरे के विरुद्ध खडा करना समझदारी का काम नहीं है। एक पर विचार करते समय दूसरे को उपेक्षित नहीं किया जा सकता है। इन्हें एक दूसरे के परिप्रेक्ष्य में ही व्याख्यायित और विश्लेषित किया जा सकता है। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने यथार्थवाद पर विचार करते हुए स्वाभाविक रूप से आदर्शवाद और यथार्थवाद को एक साथ रखा है। उनकी मौलिकता यह है कि वे दोनों के अविरोधी रूप को सामने लाते हैं। प्रभाव की दृष्टि से द्विवेदी यथार्थ को निराशवादी और आशावादी दो श्रेणियों में बाँटते हैं। उनके अनुसार यथार्थ का एक रूप वह है जिसको पढने के बाद पाठक में निराशा और भीरुता उत्पन्न होती है, जबकि दूसरा रूप वह है जिसे पढने के बाद उसमें आशा और विश्वास की भावना प्रबल होती है। वे मानते हैं कि उपन्यासकार अभिव्यक्ति के लिए व्यापक और जटिल यथार्थ से किसी विशिष्ट पक्ष का चुनाव करता है। जब उसे चुनाव करना ही होता है तब उसे आशा और विश्वास पैदा करनेवाले यथार्थवाद का चुनाव करना चाहिए। वे डूबते जहाज के सामान्य यात्रियों और कप्तान के व्यवहार के अंतर के माध्यम से आशावादी और निराशवादी यथार्थवादों में अंतर दिखाते हैं। सामान्य यात्री हाय-हाय करके डूब जाते हैं वहीं कप्तान अंत तक लोगों को बचाने का प्रयास करता है। वह सबसे पहले लोगों का और अंत में अपना ख्याल करता है। ये एक ही यथार्थ घटना के दो पक्ष हैं। एक से निराशा और भय पैदा होती हैं जबकि दूसरे से आशा और विश्वास। द्विवेदी दूसरे पक्ष को चुनने पर बल देते हैं। लेकिन, वे पहले पक्ष की पूर्णतया उपेक्षा करना उचित नहीं मानते। उनके अनुसार संसार के दुःख और अवसाद से आँख मूँद लेनेवाला लेखक महान नहीं हो सकता और न ही इससे महान रचना पैदा हो सकती है। लेकिन, उपन्यासकार दुखों से संघर्ष करते हुए अपना रास्ता बनाने वाले मनुष्यों को दिखाए, तो अच्छा हो। वे लिखते हैं, यथार्थवाद भले की उपेक्षा करके बुरे के चित्रण को नहीं कहा जा सकता, फिर वह चित्रण कितना भी यथार्थ क्यों न हो।20 इस विवेक के साथ रचा गया उपन्यास यथार्थवाद और आदर्शवाद के कोरे विभाजन को निरर्थक बना देता है। प्रेमचंद के हवाले से वे इसी को आदर्शवाद और यथार्थवाद के समन्वय से निष्पन्न साहित्य-दृष्टि कहते हैं। और, इसी को आदर्श उपन्यास-दृष्टि के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जहाँ आदर्श यथार्थ के भीतर से लेखकीय दृष्टि के फलस्वरूप आता है। असल में, आशा और विश्वास उत्पन्न करनेवाले उपन्यास को ही वे आदर्शवादी उपन्यास कहते हैं, क्योंकि वस्तुतः सच्चा आदर्शवादी यथार्थवादी होता है, वह मनुष्य का मनुष्यत्व पहचानता है और प्राण-धर्म का रहस्य समझता है।21 वस्तुतः द्विवेदी के लिए आदर्शवाद और यथार्थवाद दो विपरीत और विरोधी उपन्यास-दृष्टियाँ नहीं हैं। उन्होंने दोनों दृष्टियों की एकांतिकता को अस्वीकार किया है और दोनों को एक-दूसरे के निकट लाने और समन्वित करने का प्रयास किया है। उनके लिए परिस्थितियों से आँख मूँदना न आदर्शवाद है और न ही फोटोग्राफिक चित्रण यथार्थवाद है।
असल में, उपन्यास भले ही एक यथार्थवादी साहित्य-रूप है और वह यथार्थ-चित्रण से अभिन्न है, लेकिन अपने जन्म से ही वह तरह-तरह से आदर्शवाद से संबद्ध रहा है। या यूँ कहें कि वह आदर्शवाद से मुक्त नहीं हो पाया है। इस बिडम्बना को टेरी इग्ल्टन ने इन शब्दों में रखा है, बिडम्बना यह है कि एक साहित्य रूप में उपन्यास सामान्य जीवन से बँधा है जबकि सामान्य जनता स्वयं राक्षसी और अद्भुत पसंद करती है। सामान्य जनता कला-दर्पण में अपना ही चेहरा नहीं देखना चाहती है।22 अन्यत्र वे सर्वान्तिस के उपन्यास, जिसे बहुत-से लोग प्रथम उपन्यास मानते हैं, के बारे में लिखते हैं, सर्वान्तिस की महान रचना हमें दिखाती है कि कैसे उपन्यास का जन्म तब होता है जब रोमानी आदर्शवाद की यथार्थ संसार से टक्कर होती है।23 उपन्यास आलोचना इस बिडम्बना को पकडती रही है, उसके विशुद्ध यथार्थवादी होने के दावे की अपूर्णता को खोलती रही है और उसकी अति यथार्थबद्धता को प्रश्नांकित भी करती रही है। आलोचना की इस परंपरा की मान्यताओं को जैनेन्द्र कुमार और मिलान कुंदेरा के विचारों के माध्यम से अच्छी तरह से समझा जा सकता है। जैनेन्द्र कुमार अंगूर के रूपक के माध्यम से यथार्थवाद और आदर्शवाद के सहस्तित्व को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं, जैसे अंगूर पर छिलका होता है, वैसे ही उपन्यास पर वास्तविकता का परिधान चाहिए। छिलका केवल रस की सुरक्षा के लिए है। जिसे रस चाहिए, वह छिलके को देखेगा भी नहीं। रस पीना है तो उसे छानकर छिलका फेंकने के लिए तैयार होना होगा। यह सही है कि छिलका न होने पर रस एकत्र होने का अवसर ही न पाएगा। लेकिन बस, इससे अधिक उस छिलके का प्रयोजन नहीं।24 इसी तरह, उपन्यास में यथार्थ को न्यूनतम रखने पर बल देते हुए मिलान कुंदेरा कहते हैं, उपन्यास यथार्थ नहीं, अस्तित्त्व का अन्वेषण करता है और अस्तित्त्व वह नहीं है जो घट चुका है, अस्तित्त्व मानव संभावनाओं का लोक है, सब कुछ जो वह हो सकता है और कर सकता है। उपन्यासकार इसके या मानव-संभावनाओं के अन्वेषण से अस्तित्त्व का मानचित्र खींचता है। अस्तित्त्वमान का अर्थ है संसार में उपस्थित।25 कुंदेरा की तरह ही जैनेन्द्र कुमार भी संभावनाओं पर बल देते हुए लिखते हैं, उपन्यास के नायक हमारे भीतर की संभावनाओं के चित्र अधिक हैं। वे हमारी अपूर्णता की पूर्तियाँ हैं। वे हमारे फोटोग्राफ नहीं हैं, उससे अधिक हैं। चित्र फोटोग्राफ से अधिक होता है। उपन्यास लेखक भी फोटोग्राफर नहीं है- वह चित्रकार है, यानी उसमें विवेक है। 26 हम देखते हैं कि कुमार और कुंदेरा दोनों यथार्थ की न्यूनता पर बल देते हैं, यथार्थहीनता पर नहीं। हजारीप्रसाद द्विवेदी भी यथार्थ की इसी समझ के निकट हैं। उपन्यास से आदर्शवाद और यथार्थवाद के इस आदिम और सहज सम्बन्ध को देखते हुए ही उन्होंने बडे मौलिक ढंग से तीनों के अविरोधी सहस्तित्त्व को उचित और लाभदायक सिद्ध किया है। बल्कि, उनके लिए उपन्यास और आदर्शवाद दोनों यथार्थ से अविच्छिन्न हैं। उनकी दो-टूक मान्यता है, उपन्यास में दुनिया जैसी है वैसी ही चित्रित करने का प्रयास होता है। इस वास्तविकता के भीतर से ही उपन्यासकार अपना आदर्श ढूँढ निकालता है।27 इसी को जैनेन्द्र कुमार यथार्थ से आदर्श की ओर उठने की औपन्यासिक प्रक्रिया और प्रयोजन कहते हैं, तो मिलान कुंदेरा यथार्थ के बजाय अस्तित्त्व की संभावना।
लेकिन, इसका यह अर्थ नहीं है कि द्विवेदी उपन्यास को आदर्श के मोह में यथार्थ से कोई समझौता करने की छूट देते हैं। इसके विपरीत वे यथार्थ और उपन्यास को अविछिन्न मानते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि यथार्थवादी चेतना के कारण ही उपन्यास अपने पूर्ववर्ती कथा-रूपों से भिन्न और नवीन है। उनके अनुसार यथार्थ उपन्यास का भेदक लक्षण हैं। वे मानते हैं कि उपन्यास का जन्म ही यथार्थ परिस्थितियों के भीतर से हुआ है। उपन्यास यथार्थ का चित्रण करता है। वह यथार्थ से बचकर पाठक को स्वप्नलोक में उलझाने, बहकाने और फुसलाने का काम नहीं करता है। इसलिए उचित ही वे उपन्यास को यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में परिभाषित करते हुए लिखते हैं, उपन्यास जीवन की यथार्थताओं से रस खींचकर चित्तविनोदन के साथ-ही-साथ मनुष्य की समस्याओं के सम्मुखीन होने का आह्वान लेकर साहित्य-क्षेत्र में आया था। उसके पैर ठोस धरती पर जमे हैं और यथार्थ जीवन की कठिनाइयों और संघर्षों से छनकर आने वाला अब्याज मनोहर मानवीय रस ही उसका प्रधान आकर्षण है।28 वे आगे लिखते हैं, ...जीवन की यथार्थताएँ ही उपन्यास को आगे बढाती हैं। मनुष्य के पिछडे हुए आचार-विचारों और बढती हुई यथार्थताओं के बीच निरंतर उत्पन्न होती रहने वाली खाई को पाटना ही उपन्यास का कर्तव्य है।29
लेकिन, वे यथार्थ और यथार्थवाद के नाम पर प्रकृतवादी साहित्यिक प्रवृत्तियों का समर्थन नहीं करते हैं। अपने स्वभाव के विपरीत वे इनकी तीखी आलोचना करते हैं। प्रकृतवाद यथार्थवाद का एक रूप है। इसमें मानव व्यवहार और जीवन के उस पक्ष पर ध्यान दिया जाता है जिन्हें आमतौर पर अश्लील और वर्ज्य कहा जाता है। हिंदी में प्रकृतवाद के प्रतिनिधि साहित्यकार हैं -पांडेय बेचन शर्मा उग्र। बनारसीदास चतुर्वेदी ने उग्र के साहित्य को घासलेटी साहित्य कहकर उनका कडा विरोध किया था। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी चतुर्वेदी की ही तरह से हिंदी और अंग्रेजी दोनों के प्रकृतवाद की तीखी आलोचना की है। इस तरह की तिक्तता उनमें और कहीं शायद ही मिले। प्रकृतवादी उपन्यास को वे विषाक्त भोजन की भाँति हानिकारक मानते हैं। उन्होंने प्रकृतवादी उपन्यास पर आरोप लगाया कि वह मानव-जीवन की गंदगियों को मोहक और आकर्षक करके चित्रण करता है। जबकि, प्रकृतवादी दृष्टि इन गंदगियों को ही आदर्श नहीं मानती है बल्कि इसे दूर करने के लिए इसे उजागर करने पर बल देती है। ऐसा उपन्यास केवल भोजन नहीं बल्कि समाज-शरीर का परीक्षण करके रोगों का पता लगाता है और उसका उपचार करके स्वास्थ्य-रक्षण का माध्यम भी बनता है।
द्विवेदी उपन्यास के महत्त्व को पाठक पर पडने वाले उसके प्रभाव के आधार पर आँकते हैं। वे लिखते हैं, सब तत्त्व मिलकर पाठक के ऊपर जिस प्रभाव की सृष्टि करते हैं उस प्रभाव के माप पर ही उपन्यास का महत्त्व निर्भर है।30 उन्होंने उस उपन्यास को गन्दी शराब कहा है जो पाठक को मोहग्रस्त करता है। वे उपन्यास की तुलना भोजन से करते हुए कहते हैं कि वह भोजन अच्छा होता है जो मनुष्य को स्वस्थ और सबल बनाये। भोजन जो भली-भाँति पका हो, सुगन्धित और स्वादिष्ट हो लेकिन शरीर को रुग्ण और मृत्यु का शिकार बनाये वह अच्छा नहीं हो सकता है, बुरे प्रभाव वाला उपन्यास भी ऐसा ही है। मानव जीवन की गंदगियों को मोहक और आकर्षक करके चित्रण करनेवाले उपन्यास विषाक्त भोजन के समान घातक हैं।31
यथार्थवाद को परिभाषित करते हुए वे लिखते हैं, कला के क्षेत्र में यथार्थवाद किसी विशेष प्रकार की प्रकाशन-भंगिमा का नाम नहीं है, बल्कि वह ऐसी एक मानसिक प्रवृत्ति है जो निरंतर अवस्था के अनुकूल परिवर्तित और रूपायित होती रहती है और इसीलिए नाना प्रकार के कला-रूपों को अपनाने की अद्भुत क्षमता रखती है। यह स्वयं कारण भी है और कार्य भी है। वस्तुतर् यह मनोवृत्ति उन सिद्धांतों, मान्यताओं और भावप्रवण उद्देश्यों की अनुगामिनी होती है जो अवसर के अनुकूल विविध रूपों में अपने को प्रकाशित कर सकते हैं। मुश्किल से सौन्दर्य-निर्माण की कोई ऐसी आकांक्षा मिलेगी जो युक्तिसंगत परिणत तक ले जाने पर यथार्थवादी प्रवृत्ति के आसपास न पहुँच जाती हो।32 इस तरह वे कलाओं को स्वभावतः यथार्थवादी मानते हैं।
यथार्थवाद-चर्चा में मिलान कुंदेरा की फिर याद आती है। मिलान कुंदेरा से जब पूछा गया कि आफ उपन्यासों को समझने के लिए क्या चेकोस्लोवाकिया का इतिहास जानना आवश्यक है, तो उन्होंने जवाब दिया कि नहीं, इसके बारे में जो कुछ जरुरी है वह उपन्यास में ही है। कुंदेरा का जोर इस बात पर है कि इतिहासकार घटित घटनाओं के बारे में बताता है जबकि उपन्यासकार यथार्थ का नहीं अस्तित्त्व की परीक्षा करता है।33 वे कहते हैं, अस्तित्त्व वह नहीं है जो घट चुका है, अस्तित्त्व मानव संभावनाओं का लोक है, सब कुछ जो वह हो सकता है और कर सकता है। उपन्यासकार इसके या मानव-संभावनाओं के अन्वेषण अस्तित्त्व का मानचित्र खींचता है। अस्तित्त्वमान का अर्थ है संसार में उपस्थित। इस प्रकार पात्र और उसकी दुनिया को अनिवार्यतः संभावनाओं के रूप में समझना चाहिए।34 फिर यह पूछा गया कि जब आप यथार्थ के बजाय संभावनाओं को समझना चाहते हैं, तो प्राग की छवियों और घटनाओं को इतनी गंभीरता से क्यों लिया है तो कुंदेरा जवाब देते हैं, यदि एक लेखक ऐतिहासिक परिस्थितियों को ताजा और मानव संभावनाओं की दुनिया को खोलने वाली पाता है, तो वह उसका अविकल वर्णन करना चाहेगा। फिर भी, उपन्यास के मूल्य के सम्बन्ध में इतिहासी यथार्थ के प्रति उसकी सत्य निष्ठा दोयम चीज है। उपन्यासकार न इतिहासकार है, न मसीहा है : वह अस्तित्त्व का अन्वेषी है।35
औचित्य-चिंता साहित्य की एक आवश्यक और सार्वकालिक चिंता है। द्विवेदी उपन्यास में औचित्य पर बल देते हैं। उनके अनुसार उपन्यासकार जिस समय की कहानी कहता है उस समय की संस्कृति और प्रकृति का उसे पूरा ज्ञान होना चाहिए। यदि उसे ज्ञान नहीं है, तो वह वर्णन में ऐसी चीजों और घटनाओं का समावेश कर देता है, जो उस देशकाल में नहीं होती हैं। वे लिखते हैं, औचित्य उपन्यास की जान है। औचित्य का अभाव सर्वत्र खटकता है, पर उपन्यास में उसका अभाव तो बहुत अधिक खटकने वाला होता है।- वह कोई भी ऐसी बात लिख दे जो उस जमाने में संभव नहीं थी तो बात खटक जाएगी और सहृदय पाठक के रसास्वाद में बाधा उपस्थित होगी।36 ऐतिहासिक उपन्यास लेखक के लिए वे औचित्य पर विशेषरूप से बल देते हैं। वे इतिहास की सब संभव जानकारी उपन्यासकार के लिए जरुरी मानते हैं। उनकी मान्यता है कि प्रामाणिक इतिहास-पुस्तकों, मुद्राओं और शिलालेखों के अध्ययन से इतिहास से भलीभाँति परिचित हो जाने के बाद ही उपन्यासकार को ऐतिहासिक उपन्यास लिखने चाहिए। इस तरह वे इतिहास की ऐतिहासिकता की रक्षा पर अत्यधिक बल देते हैं।
रामचन्द्र शुक्ल की तरह वे भी ऐतिहासिक उपन्यासकार के लिए कल्पना को जरुरी मानते हैं। लेकिन, यह कल्पना निराधार और औचित्य का उल्लंघन करनेवाली नहीं होनी चाहिए। लेखक की वस्तु-स्थिति की जानकारी से मिलकर ही कल्पना का कोई महत्त्व है। इसमें कल्पना के साथ उसकी जानकारी का सामंजस्य होना चाहिए। उनके अनुसार ऐतिहासिक उपन्यासकार को इतिहास की प्रामाणिक जानकारी तो आवश्यक है ही अपने समय की कथा पर उपन्यास लिखनेवाले उपन्यासकार को भी अपने समय की अच्छी जानकारी होनी चाहिए। उसमें तथ्यों की जाँच-परख की प्रवृत्ति और जीवन का अनुभव होना चाहिए। उसे किताबी ज्ञान और सुनी-सुनाई बातों के आधार पर उपन्यास नहीं लिखना चाहिए। उनके अनुसार इसी से लेखक पर पाठक का विश्वास बनता है। इसे वे विषयगत औचित्य और विषयगत ईमानदारी कहते हैं।
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संदर्भ-सूची
1. साहित्य सहचर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2013, पृष्ठ 62।
वही, पृष्ठ 64।
2. हिंदी आलोचना का आरंभ और बालकृष्ण भट्ट, अभिषेक रौशन, अंतिका प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2009, पृष्ठ 210 में संकलित बालकृष्ण भट्ट का निबंध उपन्यास।
3. निवडक मराठी समीक्षा, जीएम पवार और एमडी हातकनागलेकर (संपादक), साहित्य अकादमी, मुंबई, में संकलित बालकृष्ण मराठे का निबंध, नॉवेल म्हणजे काय?, 2008, पृष्ठ 1।
4. द इंग्लिश नॉवेल : ऐन इंट्रोडक्शन, टेरी ईग्लटन, ब्लैकवेल पब्लिशिंग, यूके, 2005, पृष्ठ 3।
5. साहित्य सहचर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2013, पृष्ठ 158।
6. कला के सामाजिक उद्गम, गिओर्गी प्लेखानोव, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2003, पृष्ठ 64।
7. साहित्य सहचर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2013, पृष्ठ 158।
8. वही, पृष्ठ 83।
9. वही, पृष्ठ 154।
10. वही, सहचर 85।
11. हिन्दी उपन्यास राष्ट्र और हाशिया, शंभुनाथ, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2016, पृ 184।
12. द इंग्लिश नॉवेल - ऐन इंट्रोडक्शन, टेरी ईग्लटन, ब्लैकवेल पब्लिशिंग, यूके, 2005, पृष्ठ 11।
13. साहित्य सहचर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2013, पृष्ठ 84।
14. वही, पृष्ठ 66।
15. वही, पृष्ठ 66।
16. वही, पृष्ठ 66।
17. वही, पृष्ठ 85।
18. वही, पृष्ठ 67।
19. वही, पृष्ठ 76।
20. वही, पृष्ठ 78।
21. द इंग्लिश नॉवेल : ऐन इंट्रोडक्शन, टेरी ईग्लटन, ब्लैकवेल पब्लिशिंग, यूके, 2005, पृष्ठ 10।
22. द इंग्लिश नॉवेल : ऐन इंट्रोडक्शन, टेरी ईग्लटन, ब्लैकवेल पब्लिशिंग, यूके, 2005, पृष्ठ 10।
23. जैनेन्द्र रचनावली खंड -9, जैनेन्द्र कुमार, संपादक- निर्मला जैन, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2008, पृष्ठ 346।
24. द आर्ट ऑफ द नॉवेल, मिलान कुंदेरा, फ्रेंच से अंग्रेजी अनुवाद- लिंडा एशर, फेबर एंड फेबर, लंदन, संशोधित संस्करण, 2005, पृष्ठ 43।
25. जैनेन्द्र रचनावली खंड -9, जैनेन्द्र कुमार, संपादक- निर्मला जैन, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली, 2008, पृष्ठ 347।
26. साहित्य सहचर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2103, पृष्ठ 84।
27. वही, पृष्ठ 80।
28. वही, पृष्ठ 80।
29. वही, पृष्ठ 70।
30. वही, पृष्ठ 71
31. वही, 80-81।
32. द आर्ट ऑफ द नॉवेल, मिलान कुंदेरा, फ्रेंच से अंग्रेजी अनुवाद- लिंडा एशर, फेबर एंड फेबर, लंदन, संशोधित संस्करण, 2005, पृष्ठ 42।
33. वही, पृष्ठ 43।
34. वही, पृष्ठ 44।
35. साहित्य सहचर, हजारीप्रसाद द्विवेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, 2013, पृष्ठ 68।
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