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विकट पंथ उत्थान-पतन मय युग-युग धावित यात्री

पंकज पराशर
युगों का यात्री- नागार्जुन की जीवनी पर एक तफसीली गुफ्तगू
जिस युग में अपने जीवन के अलावा किसी और के जीवन में लेखक समुदाय की कोई विशेष दिलचस्पी न रह गयी हो और आत्मरति से ही उन्हें इतना अवकाश न बचता हो कि जीवन और संसार की किसी और गति को देख-समझ सके, तब इस तथ्य को जानकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि इन दिनों जीवनी विधा की पुस्तकें कम क्यों आ रही हैं? जब अपने जीवन की कथा कहने में भी बहुतेरी चीज़ों को लेकर दुराव-छिपाव और बनावटी तथ्यों/सत्यों से काम लिए जाने की विवशता आत्म की कथा का प्रवाह बाधित कर देती हो, तब किसी और के जीवन और उसके युग की पडताल करना कोई आसान काम नहीं है! जीवनी लिखने के लिए जिन चीज़ों की जरूरत होती है, वह है संबंधित लेखक के संपूर्ण साहित्य का संग्रहण, गहन अध्ययन, लेखन में आये संदर्भों को लेकर गहरी प्रश्नाकुलता, संबंधित लेखक के एक साधारण मनुष्य से बडे रचनाकार बनने की लेखन और जीवन-यात्रा में शामिल सहयात्रियों और उसके जीवन-परिवेश की पूरी और प्रामाणिक जानकारी- अब इतना सब कुछ एक साथ सबके पास तो होता नहीं और यदि किसी के पास हो भी तो जीवनी पर काम करने के लिए चाहिए गहन अध्ययन, चिंतन, प्रतिभा की प्रखरता और ठहर कर काम करने के लिए पर्याप्त धैर्य। अब आत्मकेंद्रित युग का मनुष्य इतना सब कुछ तो एक साथ साध नहीं सकता! इनमें से अगर वह दो-चार तत्व भी पा ले, तो उसको पूरी तरह वह स्वयं पर फोकस करना चाहता है! इससे परलोक मिले या न मिले कौन जाने, लेकिन इहलोक की अमरता तो सुनिश्चित होने की आशा बँध ही जाती है!
बिहार के कोसी अंचल से आने वाले तारानंद वियोगी ने सन् 1999 में बाबा नागार्जुन पर संस्मरण लिखते हुए थोडी अपने जीवन की कथा भी कुछ-कुछ शरच्चंद्रीय भावुकता और कुछ प्रसंगों को बहुत अतिरेक के साथ बयान करते हुए तुमि चिर सारथि नामक एक कच्ची-सी किताब लिखी थी। जिसे बाबा नागार्जुन की पहली पुण्यतिथि के अवसर पर मैथिली पत्रिका भारती-मंडन की ओर से जारी किया गया था। किसी लेखक की बरसी पर उनके ऊपर लिखी गई कोई पुस्तक जारी की जाए-मैथिली साहित्य की यह शायद पहली घटना थी! वियोगी चूँकि मैथिली साहित्य की हर विधा में लिखते रहे हैं, कविता, कहानी, आलोचना, गज़ल, लघुकथा इत्यादि, सो पठनीयता के लिए जिस कथा-रस और गल्पसिद्ध शैली में उन्होंने तुमि चिर सारथि लिखी थी। उसके कारण इस कृति की पठनीयता अच्छी बन पडी और मैथिली लोकवृत्त में इसकी थोडी चर्चा हुई। तुमि चिर सारथि की यह थोडी चर्चा भी कुछ लोगों को नहीं पची। नतीज़तन ईर्ष्या-दग्ध मैथिल समाज के अनेक नागार्जुन प्रेमियों, जिनमें कुछ वरिष्ठ और कुछ उनके समकालीन लेखक भी थे, बुरी तरह कुपित हो गए और कुपित होने की दो मोटी वजहें प्रचारित की गईं। पहली, यह कि तुमि चिर सारथि में तारानंद वियोगी ने बाबा के बहाने खुद को ग्लैमराइज करने की चेष्टा की है। दूसरी, यह कि इस किताब में जिन लोगों का प्रसंगवश वर्णन आया है, वह सत्य से परे विशुद्ध कल्पना और छवि बिगाडने का प्रयास है। गोकि ऐसा कहने वाले का जो सत्य हो, वही शाश्वत हो और बाकी लोगों के सत्य की कोई इयत्ता ही न हो।
इस प्रसंग में मजेदार यह है कि जो बात तुमि चिर सारथि के संदर्भ में कही जा रही थी, उसका सूत्र स्वयं वियोगी ने ही भूमिका में दिया था, यह किताब मैंने बाबा नागार्जुन के बारे में लिखी है या अपने जीवन-निर्माण के संबंध में, यह फैसला करना मेरे लिए कठिन है। तारानंद वियोगी घोर अर्थाभाव की जिस पृष्ठभूमि से संघर्ष करके आये थे, उसमें किसी बडे लेखक के जीवन-संघर्ष की गाथा बयान करने के क्रम में प्रसंगवश उन्होंने अपने जीवन की संघर्ष-गाथा भी बयान कर दी, तो उसके संदर्भों को सहानुभूति से सुनने और विचार करने की जगह लोगों ने तुमि चिर सारथि को उपेक्षित करने की कोशिश की। मैथिली पत्रिका आरंभ में इन पंक्तियों के लेखक की तुमि चिर सारथि पर जब समीक्षा छपी, तो उसके फौरन बाद इन्हीं कुपित-लेखक समुदाय ने समीक्षक के ऊपर हमला किया। किताब चूँकि मुझे अच्छी लगी थी और क्यों अच्छी लगी थी, इसको ज़रा विस्तार से लिखा था, जिस वज़ह से कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना की ज़द में आने से बच नहीं पाया। बहरहाल, मैथिली के कथित विद्वानगण उस किताब को न पूरी तरह नागार्जुन की जीवनी कह पा रहे थे, न संस्मरण, न स्वयं तारानंद वियोगी की आत्मकथा का अंश। मसला ये हो गया कि विधागत श्रेणी भर बना लेने को ही आलोचना-कर्म मान लेने वाले मैथिली के कुछ विद्वान निःशब्द थे। जबकि वियोगी की इस पुस्तक ने विधाओं की हदबंदियों की तोड-फोड की थी। तुमि चिर सारथि जिस बात को मुख्य रूप से स्थापित करने में सफल रही, वह थी बडे और उदारचेता व्यक्तित्व के संफ में आने वाले व्यक्ति का भी कैसे मानसिक रूपांतरण होता है, उसकी सोच-समझ का दायरा किस तरह विस्तृत होता है-मुख्य रूप से इसके बारे में। गुस्से में नागार्जुन कैसी-कैसी सर्वथा नवीन गालियाँ देते थे, यथा वंशबुडावन, गिदडाभकोल, तारकानंद इत्यादि। कहना न होगा कि इस बात को बहुत पहले एक युवा कवि काप्पुस ने महान् जर्मन कवि राइनेर मारिया रिल्के के संफ में आकर महसूस किया था-जिनके अनेक पत्रों ने कविता को लेकर उन्नीस साल के एक युवा कैडेट फ्रांज जेवियर काप्पुस की सोच-समझ का तरीका बदल कर रख दिया था।
अभी साल 2019 में तारानंद वियोगी ने बाबा की भारी-भरकम किताब युगों का यात्री-नागार्जुन की जीवनी लिखी है, जिससे गुजरते हुए बारहा ऐसा लगा-जैसे सन् 1999 में बीस बरस पहले उन पर लिखी तुमि चिर सारथि इस जीवनी की पूर्वरंग थी। बावजूद इसके कि तुमि चिर सारथि की भूमिका उन्होंने उपसंहार नाम से लिखकर अपनी ओर से इस मामले की फाइल बंद कर दी थी। लेकिन रजा फाउंडेशन ने जब उन्हें नागार्जुन की जीवनी लिखने का प्रस्ताव दिया, तो इस प्रस्ताव को पाकर उनको लगा, भारी उत्तेजना से भर गया था यह प्रस्ताव। बार-बार वही मन छेकता। तरह-तरह से विचारता लेकिन स्वरूप बार-बार हाथ आकर फिसल जाता था। (पृ.7) एक इसके बाद किस तरह उन्होंने अपनी मानसिक तैयारी शुरू की-इस बात को महज़ दो शब्द में उन्होंने बयान करने की कोशिश की है। जबकि पतली-सी किताब तुमि चिर सारथि के दो शब्द को सीधे उपसंहार ही प्रस्तावित कर दिया था! याद रहे कि कुछ भूमिकाएँ कभी खत्म नहीं होती और कई बार ज़ंदगी भर उसकी सदाएँ पीछा करती रहती हैं। बाबा पर लिखते हुए जो सदाएँ उनका पीछा कर रही थीं, उन सदाओं ने जब उनसे पंद्रह सौ पन्ने लिखवा लिए, तो मसला खडा हुआ कि इनमें से किस प्रसंग को रखा जाए और किसको छोड दिया जाए? ऐसा मसला तब भी उनके सामने पेश आया था, जब उन्हें नागार्जुन पर लिखने के लिए भारती-मंडन के संपादक ने कहा था। इधर उनका लिखना था कि खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। नतीज़तन पत्रिका उनकी रचना के बगैर ही छपी। इधर वियोगी ने दस-पंद्रह पृष्ठ में लिखकर मामले को रफा-दफा करने की जगह तुमि चिर सारथि शीर्षक से एक पूरी की पूरी किताब ही लिख मारी! तकरीबन सौ पृष्ठ की किताब तुमि चिर सारथि और 430 पन्नों की किताब युगों का यात्री-नागार्जुन की जीवनी पढते हुए ऐसा लगता है कि दो दशक बाद भी वियोगी विषय पर केंद्रित रहते हुए गैर-जरूरी प्रसंगों के सार-संक्षेप को बयान करके आगे बढ जाने की कला को अब तक शायद साध नहीं पाये हैं! इतनी मोटी किताब में प्रसंग-दर-प्रसंग वे यूँ लिखते चले जाते हैं, जैसे वे सब कुछ के द्रष्टा या भोक्ता हों। कहीं किसी सूचना का संदर्भ नहीं देते। कहाँ से कौन-सी बात कही जा रही है, इसका कोई हवाला नहीं देते। नतीज़तन प्रस्तुत पुस्तक युगों का यात्री-नागार्जुन की जीवनी में अनेक गैर-जरूरी और अवांतर प्रसंगों को वे अनावश्यक रूप से खींचते चले जाते हैं। जब संपादन की बारी आती है, तो पंद्रह सौ पन्नों की पांडुलिपि से इस कदर मोहाविष्ट हो जाते हैं कि उनके सामने यह मसला खडा हो जाता है कि क्या रखूँ, क्या न रखूँ?
इस प्रसंग में याद आते हैं सुप्रसिद्ध अमेरिकी उपन्यासकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे और उनका विश्व प्रसिद्ध उपन्यास द ओल्ड मैन एंड द सी की छपने से पहले की कहानी! यह उपन्यास पूरा करके सन् 1951 में जब हेमिंग्वे ने अपने प्रकाशक को दिया, तो द ओल्ड मैन एंड द सी में तकरीबन पाँच सौ पृष्ठ थे, लेकिन उनके प्रकाशक के संपादक मैक्सवेल परकिंस ने पांडुलिपि पढने के बाद जब उसका संपादन किया, तो पांडुलिपि के पाँच सौ पृष्ठ घटकर महज 127 पृष्ठ रह गए! इस कारनामे पर बजाए नाराज या असहमत होने के अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने संपादक मैक्सवेल परकिंस से बात की और वे उनके तर्कों से न सिर्फ संतुष्ट हुए, बल्कि बेहद प्रभावित! मैक्सवेल के संपादन के बाद द ओल्ड मैन एंड द सी में एक बदलाव और हुआ और यह बदलाव स्वयं उपन्यासकार हेमिंग्वे ने किया। सन् 1952 में द ओल्ड मैन एंड द सी जब छप कर आया, तो यह उपन्यास इसके संपादक मैक्सवैल परकिंस को सादर समर्पित किया गया था! प्रकाशन के बाद इस उपन्यास की धूम मच गई। सन् 1954 में द ओल्ड मैन एंड द सी को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रसंग यह है कि युगों का यात्री-नागार्जुन की जीवनी में अनेक उबाऊ और फालतू के प्रसंगों को जबरन विस्तार दिया गया है और ऐसा लगता है कि प्रकाशन से पूर्व पांडुलिपि में कॉपी संपादन नहीं गया है। एक और बात जो सहज ही लक्षित की जा सकती है, वह यह है कि तारानंद वियोगी लिखते हैं हिंदी में, लेकिन उनकी सोच की प्रक्रिया चलती है मैथिली में। इसलिए शुरू से लेकर आखिर तक अनेक जगहों पर अटपटे वाक्य-विन्यास, यथा किसी के गाछ चढकर अमरूद तोडा है या खवासों के बच्चों से मेल-मुहब्बत बढायी है, बडी ही हिंस्र पिटायी पीटते थे। गाछ यानी पेड और उसके बाद पर लिखना उन्हें याद नहीं रहा। हिंसक ढंग से पिटाई करना या पिटाई करते हुए हिंसक हो उठना तो समझ में आता है, ये हिंस्र पिटायी पीटना क्या होता है? दूसरा मेल शब्द के साथ जोल का शब्द-युग्म बनता है-मेल-जोल, पर ये मेल-मुहब्बत तो नया ही मामला है! इसी तरह ठेठ मैथिली के मुहावरे का वे ज्यों के त्यों प्रयोग कर देते हैं, जोगी के कुत्ते की तरह बलाय हो गया, बोली-बानी अगे-बगे में तो पूरे ठेठ मैथिल थे और उन्हीं ब्राह्मणों ने हुमच-हुमच कर खाया। जमकर खाने, छक कर खाने का प्रचलन तो है, यह हुमच कर खाने का मामला बूझो तो जानें की तरह है। मैथिली में सोचने का नतीजा यह हुआ है कि वे कई बार ऐसे ही अबूझ वाक्य लिखते चले जाते हैं और उन्हें यह पता तक नहीं चलता कि उनकी बात ठीक से संप्रेषित होगी भी कि नहीं। इस वजह से बहुतेरे ऐसे वाक्य हैं, जिसका अर्थ वही निकाल सकता है, जिसका बिहार के मिथिलांचल से थोडा-बहुत संफ रहा हो।
वियोगी ने नागार्जुन के व्यक्तित्व को समझने के लिए इस किताब में उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि की विस्तार से चर्चा की है। शायद इसलिए ताकि उनके मानस की निर्मितियों और उनके व्यक्तित्व के तमाम पहलुओं को समझने में आसानी हो। नागार्जुन की माँ की मौत का वर्णन देखिये, बीमार माँ बिस्तर पर उतान लेटी है। बाप रौद्र रूप धारण कर उसकी छाती पर चढ बैठा है। उसके हाथ में कुल्हाडी है। उससे वह अपनी स्त्री की गर्दन रेतता जा रहा है। माँ घिघियाती है, लेकिन उसे बचाने वाला वहाँ मौजूद नहीं है। अबोध बालक कोने से देख रहा है। दम साध लिया है उसने। कनखी से वह कभी बाप को देखता है, कभी माँ को। उस छोटी उम्र में माँ मर गई थी और मातृहीन नागार्जुन सारी जंदगी दुनिया भर की स्त्रियों में अपनी माँ को ढूँढते रहे थे। (पृ.16) जाहिर है, इस घटना का किसी भी बालक के मस्तिष्क पर गहरा असर पडेगा और वह नागार्जुन पर भी पडा ही। वे आवेश में अपने पिता के लिए कहते, वह कृतघ्न, झूठे, क्रूर मनुष्याभास थे। (वही) वियोगी ने उनके पिता की अनेक आदतों का बहुत विस्तार से इस किताब में वर्णन किया है, जिसका लहजा खासा आलोचनात्मक है। इन्हीं वर्णनों से यह पता चलता है कि उनके पिता जिम्मेदारियों और परिश्रम से भागने वाले लंगोट के कच्चे और खासा चटोर किस्म के आदमी थे। एक तटस्थ जीवनीकार के रूप में वियोगी को इन प्रसंगों से नागार्जुन के व्यक्तित्व में भी गहराई तक पैठी हुई जिम्मेदारियों से भागने की आदत, परजीवीपन, क्रोधी स्वभाव और चटोरपन दिखाई नहीं दिया! इसको सजगता से लक्षित किया जाना चाहिए था, पर न जाने क्यों वे संकोच कर गए। यही नहीं, अभी हाल में एक युवती ने उनके यौनिकता के संबध में कुछ बातें की थीं, जिसकी हिंदी लोकवृत्त में अनेक तरह से प्रतिक्रियाएँ सामने आई थी। ऐसे प्रसंगों के सच-झूठ में जाने की जगह मुझे महात्मा गाँधी की आत्मकथा सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा की याद आती है। जब उनके पिता कबा (करमचंद) गाँधी मृत्यु से जूझ रहे थे और और उनकी मृत्यु हो गई, तब मोहनदास को जहाँ होना चाहिए था, वहाँ न होकर वे अपने शयन-कक्ष में थे। इस बात का जिक्र किसी और ने नहीं, स्वयं मोहनदास करमचंद गाँधी ने किया है-बिना इस बात की चिंता किए कि दुनिया इस प्रसंग को किस रूप में लेगी और उनके बारे में क्या धारणा बनाएगी। गाँधी इन्हीं कमजोरियों, स्वीकारोक्तियों और अपने को निरंतर बेहतर बनाने के प्रयत्न में लगे रहने वाले मनुष्य थे। अपनी खूबियों और खामियों के साथ महान् थे। चूँकि ईडिपस ग्रंथि (Oedipus comple) मनुष्य में जन्मजात होता है, जो किसी में मुखर तो किसी में प्रछन्न रूप में दिखाई देता है। जिम्मेदारियों से भागने और पाँव का सनीचर के मुआमले में तो पिता का उनके ऊपर पूरा प्रभाव पडा था। इस तथ्य को मनोवैज्ञानिक तरीके से देखें, तो इंसान जिस चीज़ का विरोध करता है, दरअसल कई बार मौका मिलते ही खुद को भी ऐसा करने से रोक नहीं पाता।
कर्मकांड, धार्मिक संस्कार और रीति-रिवाजों के मुआमले में मिथिला भारत के अन्य भागों के मुकाबले कहीं अधिक कट्टर, शोषक और क्रूर समाज रहा है। एक तो जातिगत श्रेणी के हिसाब से ब्राह्मण सबसे ऊपर परिगणित होते हैं, तिस पर भी मैथिल ब्राह्मणों में श्रोत्रिय, भलमानुष और जयवार की ऐसी श्रेणियाँ बनी हुई हैं कि जातिक्रम की श्रेष्ठता के दम पर अनेक शताब्दियों तक श्रोत्रिय और भलमानुष श्रेणी के चतुर-सुजान मैथिल ब्राह्मण बीस, पच्चीस, तीस से लेकर पचास तक शादियाँ करते थे। अनेक गाँवों में फैले ससुरालों में ही घूम-घूमकर पूरा जीवन काट देते थे-परम स्वतंत्र न सिर पर कोऊ। कमाने-धमाने का कोई चक्कर नहीं, ऊपर से दिव्य भोजन, ससुराल से मिलने वाले दान-दक्षिणा और वस्त्रादि से जब जीवन की नैया पार लग ही जाती हो, तो भला कौन कमबख्त मेहनत-मशक्कत का काम करे? क्योंकर कोई अपनी औलादों की जिम्मेदारियाँ उठाए? नागार्जुन के उच्च कुलीन पिता और नागार्जुन अंततः इसी समाज की उपज थे, जहाँ का प्रभाव न चाहते हुए भी उनके ऊपर पडना तय था। मिथिला में प्रशासनिक अधिकारी रहे प्रख्यात विद्वान जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने मिथिला समाज के बारे में लिखा है, मैथिल समाज में धार्मिक कट्टरता तथा रूढिवादिता बडे पुराने समय से ही अडिग रूप में मूलबद्ध रही है। सदियाँ बीत गईं। देश की राजनीति ने पलटा खाया। हिंदू समाज का पतन हुआ। देश में विधर्मियों एवं विदेशियों का राज हुआ। संसार की परिस्थितियाँ बदल गईं। मिथिला में अनेक राजनीतिक एवं सामाजिक उथल-पुथल हुई। पर वहाँ की कट्टरता और रूढिवादिता में बहुत कम अंतर आया। (पृ.28) इससे पता चलता है कि इस परिवेश में पैदा होकर होश संभालने वाले आदमी की कैसी मानसिक कंडीशनिंग होती होगी। मिथिला के बाहर संयुक्त प्रांत (अब उत्तर प्रदेश) का परिवेश देखें, तो नागार्जुन जब जवान हो रहे थे, उसी वक्त अपने अपने उपन्यास गोदान में प्रेमचंद मिस्टर मेहता से कहलवा रहे थे, मैं भूत की चिंता नहीं करता, भविष्य की परवाह नहीं करता। भविष्य की चिंता हमें कायर बना देती है, भूत का भार हमारी कमर तोड देता है। हममें जीवनी शक्ति इतनी कम है कि भूत और भविष्य में फैला देने से वह और भी क्षीण हो जाती है। हम व्यर्थ का भार अपने ऊपर लादकर रूढियों और विश्वासों तथा इतिहास के मलबे के नीचे दबे पडे हैं। उठने का नाम ही नहीं लेते। वह सार्मथ्य ही नहीं रही। जो शक्ति, जो स्फूर्ति मानवधर्म को पूरा करने में लगानी चाहिए थी, सहयोग में, भाईचारे में, वह पुरानी अदावतों का बदला लेने और बाप-दादों का ऋण चुकाने की भेंट हो जाती है।
वैद्यनाथ मिश्र, जो मैथिली लिखते समय यात्री हो जाते थे, वे हिंदी, बांग्ला और संस्कृत के लोकवृत्त में आते ही नागार्जुनी बाना धारण कर लेते थे। शिक्षा प्राप्ति के प्रसंग में धनाभाव के कारण सुख-दुःख के अनेक प्रसंग इस जीवनी में आये हैं। कठिन परिश्रम और निरंतर स्वाध्याय से नागार्जुन ने जिस परिमाण में विद्यार्जन किया, उसका शतांश भी अपने जीवन और विद्वत समाज के उत्थान के लिए सदुपयोग नहीं कर पाये-कविता, कहानी तो ठीक है, लेकिन गवेषणा, विचार, दर्शन और आलोचना के क्षेत्र में वे कुछ नहीं कर पाए। अनेक भाषाओं का इतना प्रकांड पंडित, कारयित्री और भावयित्री प्रतिभा का ऐसा साकार रूप किसी भी उच्च शैक्षणिक संस्थान की गरिमा हो सकता था। अकादमिक जगत् को अपनी प्रभा से चकित-चल कर सकता था। अपने परिवार और बच्चों को भी बेहतर जीवन-स्तर और बेहतर भविष्य देने वाला पति और पिता बन सकता था-पर इसमें लगती है मिहनत ज्यादा, जिसकी आदत उन्हें और उनके पिता दोनों को नहीं थी। यह एक कठोर सचाई है, जिसके विश्लेषण में जीवनी लेखक ने रुचि नहीं ली है। विशुद्ध साहित्य वाले आदमी से यह एक चूक होती है कि वह साहित्य के अलावा इतिहास, समाजशास्त्र और समाज विज्ञान के अन्य अनुशासनों का गहन अवगाहन नहीं करता। जिससे निष्कर्ष तक पहुँचने की प्रक्रिया में गडबडी और सत्य के ऊपरी सतह को ही वास्तविकता समझ लेने की हडबडी से वह बच नहीं पाता। युगों का यात्री-नागार्जुन की जीवनी में वियोगी ने देश और मिथिला के इतिहास, समाज और राजनीति का अध्ययन और उसका पर्याप्त इस्तेमाल किया है, पर इस प्रक्रिया में जब वे परसेप्शन से काम लेने लगते हैं, तो जाने-अनजाने वास्तविक तथ्यों को ओझल और विकृत करने से बच नहीं पाते।
नागार्जुन के बचपन और शिक्षा के प्रसंग में पृष्ठ 28 पर बिना नाम लिये और पृष्ठ 30 पर सीधे नाम के साथ तत्कालीन दरभंगा नरेश रामेश्वर सिंह उन्हीं परसेप्शन के साथ युगों का यात्री-नागार्जुन की जीवनी में आये हैं। मिथिला में जमींदार विरोधी मानसिकता के तहत रामेश्वर सिंह को लोग बिना पढे, सत्य और तथ्य को बिना जाने अभिव्यक्त करते हैं, जिसके शिकार तारानंद वियोगी भी लगते हैं। नागार्जुन के प्रसंग में जिन रानी लक्ष्मीवती का वर्णन वियोगी ने पृष्ठ 31 पर किया है, उन रानी लक्ष्मीवती और उनके दिवंगत पति महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह के जीवन, उनके शासन काल और दिवंगत होने के बाद उनकी विधवाओं के भरण-पोषण भत्ते के मामले को यदि वे इतिहास के आईने में थोडा जानने का प्रयत्न करते, तो हिंदी लोकवृत्त के पाठक नागार्जुन के मिथिला को बेहतर ढंग से जान पाते। पृष्ठ 30 पर वियोगी लिखते हैं, अपने देवर रमेश्वर सिंह से प्रताडति होकर स्वयं भी काशी-वास कर रही थी। यह विशुद्ध झूठ और आधारहीन बात उसी मैथिल परसेप्शन का नतीज़ा है, जिसका वास्तविकता और प्रामाणिक तथ्य से कोई लेना-देना नहीं है। जब जीवनी लिखते समय इतिहास, समाज और राजनीति के समानांतर नागार्जुन के व्यक्तित्व को समझने की महत्वाकांक्षा हो, तो ऐतिहासिक तथ्यों को प्रचलित आख्यानों के दम पर नहीं समझा जा सकता। महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह और रामेश्वर सिंह के शासन काल के प्रत्यक्षद्रष्टा और उनके परिजनों में से एक महामहोपाध्याय डॉ. सर गंगानाथ झा (जो बाबू वासुदेव सिंह के दौहित्र थे। बाबू वासुदेव सिंह महाराज रुद्र सिंह के अनुज थे) ने इस प्रसंग पर विस्तार से प्रकाश डाला है। 17 दिसंबर, 1898 में लक्ष्मीश्वर सिंह के निधन के बाद रामेश्वर सिंह ने अपनी दोनों भाभियों के खर्च पर किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं लगाया और उन दोनों को कभी यह भान नहीं होने दिया कि परिवार में उनके आदर-भाव में किसी प्रकार की कोई कमी आई है। वार्षिक खर्च के लिए 77000/- (जिसकी कीमत आज के हिसाब से लगभग बीस करोड रूपये सालाना होता है) रूपये देते रहे। सर गंगानाथ झा ने ऐसी तटस्थता तब भी नहीं खोयी, जबकि श्रीनंदनजी यानी बाबू जनेश्वर सिंह से मैत्री के कारण उनको दरभंगा राज की नौकरी से त्याग-पत्र देने को विवश होना पडा था।
जिन रामेश्वर सिंह को वियोगी ने हिंदुत्व को उभारने, आक्रामक बनाने मनुस्मृति को संविधान बनाने के लिए दिल्ली में जुलूस निकालने वाले जमींदार के रूप में याद किया है, उन्हीं रामेश्वर सिंह के व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष यह भी है कि जब सर सैयद अहमद खाँ द्वारा स्थापित एंग्लो मोहम्मडन ओरियेंटल कॉलेज अलीगढ में 09 जून, 1912 को भाषण देते हुए रामेश्वर सिंह ने कहा था, हिंदुओं और मुसलमानों को इस देश की उन्नति और समृद्धि के लिए साथ मिलकर काम करना चाहिए। इन्हीं भावों के साथ हम हिंदूजन एक मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना का स्वागत करते हैं। मुझे यह देखकर खुशी हुई कि आफ दिल में भी बनारस में एक हिंदू यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए वही आदर और सद्भाव जो हमारे दिल में है। आइये, हम सब ईश्वर पर पूर्ण आस्था रखते हुए अपने अपूर्ण संस्थानों को अंतिम रूप देने के लिए काम करें। यह हमारे युग के लिए खुशी की बात है कि हिंदू और मुसलमान दोनों ने यह तय किया है कि आने वाली नौजवान पीढियों के लिए पश्चिमी शिक्षा, विचार और दर्शन के साथ ही उनकी अपनी मान्यताओं और सिद्धांतों के शिक्षा की भी व्यवस्था की गई है। मेरे ख्याल से जिसके लिए धार्मिक विशिष्टताओं पर आधारित विश्वविद्यालयों की स्थापना जरूरी है। आवासीय महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों की योजना पर आधारित हिंदू और मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना के पीछे यही उद्देश्य है। ये विश्वविद्यालय छात्रों के लिए न सिर्फ बौद्धिक खुराक प्रदान करेंगे, बल्कि उनकी बौद्धिक और नैतिक विकास के लिए इससे संबद्ध चीजों को उनके पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाएगा। हमें चाहिए कि पश्चिमी संस्कृति (पाश्चात्य दर्शन/साहित्य) की हर अच्छी बातों को ग्रहण करें, लेकिन इसके साथ ही अपनी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को भी न भूलें, जिनके कारण हमारी संस्कृति का दुनिया भर में एक विशिष्ट स्थान है।
इन्हीं रामेश्वर सिंह ने अपनी मृत्यु से एक वर्ष पहले 30 जून, 1928 को हिंदुओं और मुसलमानों के बीच प्रेम और मैत्री की आवश्यकता शीर्षक से हिंदी और उर्दू में एक पोस्टर जारी किया था, जिसे पूरे रियासत दरभंगा में चस्पाँ किया गया था-जो आदेश नहीं, निवेदन था। सन् 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक की जब स्थापना हुई, तब दरभंगा नरेश रामेश्वर सिंह ही थे, पर जिनके बडे भाई लक्ष्मीश्वर सिंह भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना में सन् 1885 में बंबई अधिवेशन में शामिल हो चुके थे, कलकत्ता में हुए द्वितीय अधिवेशन का सारा खर्च राज दरभंगा ने दिया था। वे काँग्रेस को भारी आर्थिक सहायता देने वाले शुभचिंतकों में से थे, उनके अनुज भला उस हिंदुत्व की मानसिकता को पोषित करने वाले कैसे हो सकते थे, जिस ओर महज़ परसेप्शन के प्रभाव में वियोगी ने उन्हें धकेलने की चेष्टा की है? दूसरी बात, जिस हिंदुत्व को हम आज जान-समझ रहे हैं, उसका वही स्वरूप सन् 1857 से 1925 तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के राजनीतिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में नहीं था। भारतेंदु और द्विवेदी युग के साहित्यिक संदर्भ में भी हिंदुत्व का वह चेहरा नहीं था, जिसके साथ वियोगी ने रामेश्वर सिंह को जोडकर देखने की कोशिश की है। इसके अलावा सन् 1860 में जब रामेश्वर सिंह के पिता महाराज महेश्वर सिंह का निधन हुआ था, तो दरभंगा राज की कोई खास आर्थिक हैसियत नहीं रह गई थी। लक्ष्मीश्वर सिंह रियासत की वित्तीय स्थिति को संभालने का कोई विशेष उपक्रम किये बिना अल्पायु में ही दिवंगत हो गए। ऐसी परिस्थिति में दरभंगा रियासत को रामेश्वर सिंह ने अपनी सूझ-बूझ और वित्तीय कौशल से आगे बढाया था। लेकिन पृष्ठ संख्या 32 पर वियोगी लिखते हैं, मिथिला की स्थायी स्मृति में बसे रहने लायक ज्यादातर काम लक्ष्मीवती ही कर पा रही थीं, महाराजा रामेश्वर सिंह नहीं। पता नहीं वियोगी रानी लक्ष्मीवती के किन कार्यों के बारे में बात कर रहे हैं? यदि वे मिथिला की स्थायी स्मृति में बसे रहने लायक ऐसे कार्यों का विवरण भी देते तो उसके बारे में जानकर थोडी खुशी होती।
प्रस्तुत पुस्तक युगों का यात्री-नागार्जुन की जीवनी में वियोगी ने तुमि चिर सारथि से कुछ प्रसंगों (पृ.31) को ज्यों-के-त्यों ले लिया है। पृष्ठ संख्या 46 पर महामहोपाध्याय पंडित मुकुंद झा बक्शी के साथ नागार्जुन के सवाल-जवाब का जो प्रसंग है, वह खासा रोचक है। मसलन नागार्जुन के ससुराल में यह रिवाज था कि जिस किसी घर में नई शादी होती, वर को अगले दिन महामहोपाध्याय को प्रणाम करवाने के लिए लिए ले जाया जाता। महामहोपाध्याय का नियम था कि चरण-स्पर्श के बाद वर से एक प्रश्न पूछते और आशीर्वाद स्वरूप दो रुपये देते। यहाँ पंडितजी अन्न और फल में अंतर के संबंध में प्रश्न करते हैं। उत्तर नहीं आने पर स्वयं उत्तर बताते हैं, पर जब नागार्जुन प्रतिप्रश्न करते हैं, तो निरुत्तर पंडितजी नागार्जुन की बौद्धिक प्रखरता की तारीफ करते हैं। यह प्रसंग बेहद रोचक है और वैद्यनाथ मिश्र के नागार्जुन बनने की प्रक्रिया को समझने में पाठकों की मदद करता है। पंकज सिंह को दिये एक साक्षात्कार में नागार्जुन ने अपने नाम का रहस्य बताते हुए बताया था, भारतीय इतिहास में तीन नागार्जुन हुए हैं-एक तांत्रिक, एक सिद्ध और एक दार्शनिक। हमने दार्शनिक को पसंद किया था। कहा कि उनके कई ग्रंथ अधूरे पडे हुए हैं। उनको ठीक करूँगा। अक्टूबर 1938 में राहुल जी जब अपनी चौथी तिब्बत यात्रा से लौटे थे, तो लौटकर उन्होंने प्रेस के सामने यह घोषित कर दिया था कि वे एक बार फिर से क्रियात्मक राजनीति में भाग लेंगे। यह क्रियात्मक राजनीति किसान सभा की राजनीति थी। राहुल.के.जी के इस राजनीति में सक्रिय होने के एक साल बाद ही अमवारी के आंदोलन में नागार्जुन के आ मिलने के पूरे विवरण को वियोगी ने बहुत प्रामाणिक और रोचक ढंग से लिखा है। सन् 1937 में सिंध में मुस्लिम लीग की सरकार बनी थी और इस दौरान सत्रह महीने तक नागार्जुन सिंध में ही थे, सत्रह महीन तक सिंध से मेरा संफ रहा-हैदराबाद की सारस्वत ब्राह्मण पाठशाला में प्रधानाध्यापक पद पर कुछ दिन, और कुछ दिन सिंध की राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के मुखपत्र कौमी बोली के संपादक के रूप में। (पृ.124) इस दौरान उन्हें वहाँ महसूस हुआ कि चाहे काँग्रेस हो या मुस्लिम लीग, दोनों एक ही थैली चट्टे-बट्टे थे। उन्होंने मुस्लिम लीग की सरकार को भी देखा कि वह धूर्तों, मुनाफाखोरों और शोषकों का ही संरक्षण और संवर्धन कर रही थी। इस प्रसंग के वर्णन में वियोगी की भाषा की रवानी और तथ्यों का अद्भुत संयोजन देखते ही बनता है।
अपनी तिब्बत यात्रा के बारे में नागार्जुन ने कई संस्मरण लिखे। उन संस्मरणों का बारे में वियोगी लिखते हैं, तिब्बत यात्रा का उनके लिए बहुत महत्त्व था। कई बद्धमूल रूढियाँ जो बहुत बाद तक उनके संस्कारों से चिपकी रही थीं, उनसे उन्होंने वहीं जाकर मुक्ति पायी थी। भारतीय नैतिकता, जिसमें छद्म ही अधिक होता है। पवित्रता की वह ग्रंथि, जो जीवन भर इंसान को अपराध-बोध में ही ग्रस्त रखती है। लोक-लाज का वह सूक्ष्म से सूक्ष्मतम प्रमाद, जो अपने चाहे का लिखना भी मयस्सर होने नहीं देता। (पृ.139) तिब्बत यात्रा के प्रसंग में दि ल ल रोरेंड् और शे-रब् प्रसंग खासा रोचक बन पडा है। एक रात सोते में नागार्जुन ने महसूस किया कि कोई नग्न स्त्री उनके कंबल के अंदर घुस आयी है। सुबह श-रब् ने बताया कि रात में इतनी सर्दी थी कि तुम ठिठुर गये होते। मैं न गरमाती तो क्या हाल हुआ होता! अपनी माँ की बात सुनकर नम-ग्यल मुस्कुराकर बोला था, ‘छोटी माँ बहुत दयालु हैं, जाडे के दिनों में जो भी कोई हमारे यहाँ अतिथि होकर आता है, उसे यह ठिठुरने नहीं देती। (पृ.141) इस घटना को विशुद्ध भारतीय मानस जिस रूप में लेता, उसी रूप में नागार्जुन ने नहीं लिया और लिखा, पहले उसे समझने में मेरे इस भारतीय हृदय को भ्रम हुआ, सदाचार और नैतिकता के अपने ही मापदंड से दूसरों को नापते समय यही गलती तो हम कर बैठते हैं। (पृ.वही) इसके बाद जहाँ नागार्जुन का एक नाम लु-डुब हो गया था-यह भी पता चलता है। यहाँ वियोगी कथा-रस का पूरा उपयोग करते हैं। लेकिन जब वे बेतिया के किसान आंदोलन, मठ का माहौल और वहाँ नागार्जुन की डंडों से पिटाई, स्वामी सहजानंद सरस्वती और राहुल सांकृत्यायन से जुडे प्रसंग का किसी उपन्यास की तरह विस्तार से वर्णन करने लगते हैं, तो अनेक अवांतर प्रसंगों को वे इतना लंबा खींच देते हैं कि पठनीयता प्रभावित होने लगती है।
अपनी तो यही खेती-बाडी है नामक अध्याय में नागार्जुन की रचना-प्रक्रिया पर वियोगी ने विस्तार से बात करने की कोशिश की है। वे अनेक कविताओं के लिखे जाने की पृष्ठभूमि में जाते हैं, उसकी अंतःप्रक्रिया से अवगत कराने का प्रयास करते हैं, लेकिन ऐसी जगहें अत्यल्प हैं जहाँ वे बाबा की काव्य-पंखुडयिों को खोलने का प्रयास करते हैं। अन्यथा विवरण, सूचनाएँ तो बहुत हैं, जिसके संदर्भ में सुप्रसिद्ध अँगेरजी कवि-आलोचक टी.एस. इलियट ने अपनी एक कविता में लिखा है, व्हेयर इज द नॉलेज, वी हैव लॉस्ट इन इनफॉर्मेशन। नागार्जुन के प्रत्येक उपन्यास के लिखे जाने की पृष्ठभूमि, विशेष रूप से पारो लिखे जाने की कथा, जितनी रोचक है, उतनी ही रोचक है रतिनाथ की चाची लिखे जाने की कथा। पारो के छपने के बाद मिथिला के पंडित वर्ग में हुई प्रतिक्रियाएँ और रतिनाथ की चाची छपने के बाद उनके गाँव तरौनी में हुई उग्र प्रतिक्रिया और उनके सामाजिक बहिष्कार की कथा। अलबत्ता कविता को लेकर उनके गाँव तरौनी में कोई ऐसी उग्र प्रतिक्रिया शायद नहीं हुई। नागार्जुन दरअसल ऐसे कवि थे जिनकी काव्य-रचना को मिथिला के खेतों-खलिहानों, किसानों-मजदूरों तक ले जाने की इच्छा थी। आम और खास के बीच खडी दीवार उनकी आँखों को बहुत चुभता था और इस फर्क को नष्ट करने की खातिर अपनी कविताओं से उस संवेदना को जगाने का प्रयास करते थे, ताकि भद्रजन अपनी कुलीनता छोडकर एक संवेदनशील और बेहतर सामाजिक मनुष्य बन सकें। तात्कालिकता रचना के महत्त्व को समाप्त कर देती है, लेकिन नागार्जुन की तात्कालिक विषयों पर लिखी गई कविताएँ ही उन्हें बडे और महान कवियों की पंक्ति में रखने लायक बनाती हैं। काव्यशास्त्र के आचार्य कविता में जिन शब्दों के प्रयोग को ग्राम्यत्व और श्रुतिकटुत्व दोष के दायरे में रखने की हिमायत करते हैं, नागार्जुन उन्हीं शब्दों के प्रयोग से काव्यशास्त्र की ऐसी-तैसी करके अपनी कालजयी कविताएँ रचते हैं।
प्रतिबद्ध हूँ, संबद्ध हूँ, आबद्ध हूँ नामक अध्याय में वियोगी ने नागार्जुन के क्रोध-प्रसंग को कई पन्नों में काफी रोचक तरीके से पेश किया है। यहाँ मैं उन प्रसंगों का सार आपको नहीं बताऊँगा, लेकिन क्रोध के पीछे नागार्जुन की एक सफाई का उल्लेख अवश्य करूँगा। वह यानी बाबा कहते थे, हर स्वस्थ व्यक्ति को गुस्सा आना ही चाहिए। जो कहता है कि मैं कभी गुस्सा नहीं होता, अजातशत्रु है, वह उल्लू है। हम जीवन में कई तरह की डबल डीलिंग पाते हैं, तब लगता है कि इन लोगों के मुकाबले कोई गुंडा ज्यादा अच्छा है। कथित भद्रलोक, सुगंधित व्यक्तित्व वाले हमको बहुत ही गुस्से में डालते हैं। बच्चन सिंह, सुकांत सोम, निर्मला गर्ग के पति के मित्र, विजय बहादुर सिंह, तारानंद वियोगी, विश्वनाथ त्रिपाठी, दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर (उनके नाम के उल्लेख नहीं है) आदि के साथ नागार्जुन का गुस्सा-प्रसंग खासा रोचक और लंबा है। इस प्रसंग से उनके व्यक्तित्व को समझने में आसानी होती है, लिहाजा ये प्रसंग यदि पहले अध्याय एक जनकवि की निर्मिति में होता, तो शायद अधिक न्यायसंगत लगता। दूसरी बात, व्यक्तित्व और रचना-प्रक्रिया की बातें जिस तरह अनेक अध्यायों में आती हैं और अनावश्यक विस्तार भी पाती हैं, उसे देखकर यह लगता है कि यदि वियोगी रामविलासजी की कृति निराला की साहित्य-साधना की तरह इसे तीन या चार खंडों में लिखते, तो शायद पाठक और लेखक दोनों को अधिक सहूलियत होती।
मसला यह है कि वियोगी ने युगों का यात्री-नागार्जुन की जीवनी के लिए काफी जतन से सूचनाएँ जुटाई हैं, उसका अध्ययन और बेहतर संयोजन किया है, लेकिन प्राप्त सूचनाओं का परिशोधन और विश्लेषण किस प्रकार किया जाए, इस पर अधिक फोकस नहीं है। एक समस्या शायद यह रही हो कि सूचना और सामग्री संग्रहण को लेकर वे बहुत परिश्रम करते हैं और जब लिखने बैठते हैं, तो गैर-जरूरी सूचनाओं को छोड कर आगे बढ जाने का लोभ संवरण नहीं कर पाते हैं। नतीजतन अनावश्यक विस्तार से बच पाना उनके लिए मुमकिन नहीं होता। याद रहे कि वह और समय था जब लोग वार एंड पीस जैसी मोटी किताब भी पढ जाते थे, क्योंकि सामाजिक संरचना तब अलग थी और मनोरंजन के मोर्चे पर लोगों को बाँधने के लिए आज जितने साधन नहीं थे। उस समय के लिहाज से उस दौर की कृतियाँ थोडी मोटी हुआ करती थीं। आज के पाठकों के पास समय और धैर्य दोनों का अभाव है। अधिकांश लोग एक आत्मकेंद्रित समाज के नागरिक बनते जा रहे हैं। जिसके दवाब में अखबार तो आ ही चुका है, साहित्य पर भी इसका व्यापक असर पडा है। आप लाख बेहतर रचें, लेकिन जब कृति अपने को पढवा न सके, तो उसकी उत्कृष्टता का पता कैसे चलेगा? बावजूद इसके, अगर आप नागार्जुन और उनके समय को विस्तार से जानना चाहते हैं, एक रूढ और बंद समाज से आने वाले दीन-हीन बालक के जीवन-संघर्ष और राष्ट्रीय स्तर पर उसके उभरने की दास्तान को विस्तार जानने की इच्छा रखते हैं, तो यकीनन आफ लिए इस किताब में ऐसी पर्याप्त चीजें हैं, जो गुलाम भारत की राजनीति, जमींदारी प्रथा का शोषण-चक्र, धर्म और राजनीति की आंतरिक दुनिया को भी अनावृत्त करती हुई संभव हुई है।
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सम्पर्क - पंकज पारासर
हिंदी विभाग, ए.एम.यू.,
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