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बावजी चतरसिंहजी : संत की काव्य यात्रा

इंदुशेखर तत्पुरुष
बावजी चतरसिंहजी मेवाड राजघराने के सिसोदिया कुल में जन्म लेने वाले ऐसे विलक्षण संत कवि थे, जिन्होंने सत्तासुख का मोह त्याग कर अध्यात्म और काव्य के मार्ग का वरण किया तथा जीवनपर्यन्त इसी साधना में लीन रहे। हिंदी, संस्कृत, ब्रज, गुजराती, मराठी, उर्दू, अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं के अच्छे ज्ञाता होने के बावजूद इन्होंने मातृभाषा मेवाडी में उत्कृष्ट काव्य रचनाएँ कीं। इन्होंने केवल कविताएँ ही नहीं लिखीं, अपितु आध्यात्मिक चिंतन और सामाजिक चिंताओं को भी अपनी आंचलिक भाषा में दर्ज कर सांस्कृतिक सर्जना का महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उनका यह चिन्तनप्रधान और मूल्यपरक साहित्य साधारण जनता की भाषा में होने के कारण अशिक्षित अथवा अल्पशिक्षित लोगों तक भी सुगमतापूर्वक पहुँच सका।
कृष्णाकुँवरजी और सूरतसिंहजी के पुत्र चतरसिंह का जन्म माघ कृष्ण चतुर्दशी सम्वत् 1936, तदनुसार 9 फरवरी 188॰ को हुआ। इनके पिता सूरतसिंहजी धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। भगवद्भक्ति से इनका गहरा अनुराग था। पिता की धार्मिक श्रद्धा भावना ने बालपन में ही चतुरसिंह की चित्तभूमि में भक्ति, सत्संग और अध्यात्म का बीज बो दिया, जो कालांतर में साहित्य के स्वरूप में पुष्पित-पल्लवित होता गया। परिस्थितियाँ भी कुछ ऐसी बनीं कि ये वीतरागी संत की तरह जीवन यापन करने लगे। तरुणावस्था में इनका विवाह शेखावत कुलकन्या लाड कुँवर के साथ हुआ था। अपने वैवाहिक जीवन का एक दशक भी पूर्ण नहीं कर पाए कि, जब ये 27 वर्ष के थे, इनकी पत्नी का निधन हो गया। युवावस्था में विधुर हो जाना एक धमाके के साथ जीवन-संसार के छिन्न-भिन्न हो जाने जैसा होता है। इस उम्र में विधुर हुए व्यक्ति के परिजन और निकटवर्ती लोग पुनर्विवाह के लिए बहुत जोर देते हैं। राजपरिवार से जुडे जागीरदारों के यहाँ तो एक से बढकर एक रिश्ते आने लगते हैं। किंतु एकनिष्ठ पत्नीव्रती चतुरसिंहजी ने आजीवन पुनर्विवाह न करने का संकल्प ले लिया। वे यह भी नहीं चाहते थे कि इनकी एकमात्र बेटी सायर कँवर का लालन-पालन किसी अन्य महिला के गृहस्वामिनी बन जाने से प्रभावित हो जाए। आगे चलकर इनके जीवन में एक और वज्रपात यह हुआ कि इनकी पुत्री सायर कुँवर भी विवाह के कुछ समय बाद संसार से चल बसी। पत्नी के वियोग की वेदना से आहत चतुरसिंहजी के जीवन में दुःख ही दुःख समा गए। उस वेदना को व्यक्त करते हुए इन्होंने लिखा-
दुःख ही दुःख दशहुँ दिशा, दीखै दिन अरु रात।
सुख तो सकल सिधाविया शेखावती रै साथ।।
परिणामतः ये सांसारिक सुखों से विरक्त होकर भक्ति और अध्यात्म के पथ पर चल पडे।
लगभग पाँच वर्ष वृंदावन रहकर हरिभक्ति में लीन रहे। फिर योग साधना की उत्कट अभिलाषा से ओंकारेश्वर तीर्थ में आकर सिद्धयोगी कमल भारती से मिले। उन्होंने मेवाड के ही लक्ष्मणपुरा गाँव के सिद्धयोगी गुमानसिंह जी सारंगदेवोत के बारे में बताया तो चतुरसिंह ने यहाँ आकर गुमानसिंहजी को अपना गुरु बनाया और उनसे योग सीखा।
प्रकृति से संत और प्रवृत्ति से सृजनशील चतुरसिंहजी ने छोटी-बडी कुल 18 कृतियों की रचना कीं, जिनमें 12 मौलिक कृतियाँ और 6 अनूदित ग्रंथ हैं। ये गद्य और पद्य दोनों शैलियों में रचना करने में सिद्धहस्त थे। अलख पचीसी, तुही अष्टक, शेषचरित्र, समान बत्तीसी, चतुर चिन्तामणि आदि रचनाएँ और कृतियाँ पद्य शैली में लिखी गयी हैं। अनुभवप्रकाश, मानवमित्र- रामचरित्र आदि ग्रंथ तथा योगसूत्र, सांख्य तत्त्व समास, सांख्यकारिका, गीता आदि ग्रन्थों की टीकाएँ गद्य शैली में रचित हैं। परमार्थ विचार जैसे गद्य-पद्य मिश्रित ग्रंथ भी लिखे। सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर लिखे लेखों का एक संग्रह तथा बालोपयोगी पुस्तक भी आपने लिखी। शिवमहिम्न और चन्द्रशेखराष्टक जैसे संस्कृत के कुछ प्रसिद्ध स्तोत्रों का मेवाडी में सरस अनुवाद किया। चतुरसिंहजी की यह बहुआयामी काव्ययात्रा किशोरावस्था में हनुमत्पंचक नामक कविता से प्रारम्भ हुई जिसका महत्त्वपूर्ण पडाव चतुरचिन्तामणि है, जो मुक्तक और दोहों में रची गयी एक प्रसिद्ध काव्यकृति है। इसके मंगलाचरण में ही कवि की मौलिक उद्भावना पाठक का ध्यान आकृष्ट कर लेती है।
अहि ठाँ भूषण सी भई भृंगु भूसर की लात।
तिहि ठाँ मेरी बात हूँ अंगीकृत व्है नाथ।।
कवि अपनी अभिव्यक्ति की छटपटाहट को भृगु ऋषि की लात की तरह कहकर कवि की वाणी के लिए अद्भुत व्यञ्जना करता है। भावों की उत्कटता और रचनात्मक दबाव के कारण उसकी अभिव्यक्ति भले ही भृगु द्वारा मारी गयी लात की तरह लगे, पर वह प्रभु से उसे स्वीकार कर लेने की प्रार्थना करता है। मानो कवि और मनीषी का यह लात मारना स्वभावसिद्ध है और विराटपुरुष समाज से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उसे विष्णु-की-सी सहजता से उरोधार्य करे। कवि के पक्ष में यह एक अनूठी और बहुत बडी बात है।
यह मेवाडी, हिंदी और ब्रज भाषाओं के मिश्रण से रचित काव्य है। इस काव्य ग्रंथ में कवि ने शील, सदाचार, लोकव्यवहार और जीवनमूल्यों की प्रतिष्ठापना हेतु मर्मस्पर्शी दोहों की रचना की है। कवि यहाँ लोकशिक्षण और लोक प्रबोधन का कार्य नीरस उपदेश के द्वारा न करके नई उपमाओं और बिंबों के माध्यम से करता है। एक दोहा देखें -
पर घर पग नीं मेलणों, बना मान सत्कार।
अंजन आवै देख नै, सिंगल रो सत्कार।।
पहली पंक्ति में किये गए सामान्य उपदेश कथन को दूसरी पंक्ति की जिस उपमा के साथ प्रस्तुत किया गया है वह देखने लायक है। बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में अधिकतर ग्रामीण जनता के लिए जहाँ रेलगाडी में बैठना या देखना भी, एक रोमांचक अनुभव होता था, रेल के इंजिन और सिग्नल के माध्यम से कही गयी यह बात कितनी रोचक और आधुनिक बन पडी है, कहने की जरूरत नहीं। साधारण शब्दों में जीवन के मर्म को उद्घाटित कर देने का उनका यह कौशल जन-जन को आकर्षित करता है। यह किसी गहरी और मर्मभेदी बात को अत्यंत सरल शब्दावली में कह देने का आकर्षण है।
अपने आसपास की वस्तुओं का सूक्ष्म पर्यवेक्षण कर जीवन-व्यवहार का यथार्थ वे इन दोहों में सम्प्रेषित करते हैं।
पानी भरना हो तो घडे को सीधा रखना पडता है और तैरना हो तो उसे औंधा रखना पडता है। वही घडा है, वही उपयोगकर्ता, वही नदी, किन्तु किस समय क्या उपयुक्त है, यह समझ जरूरी है। प्रयोजन बदलते ही प्रक्रिया बदलनी पडती है। वे लिखते हैं -
ऊँध सूध नै छोड ने लेणों काम पछाँण।
कर ऊँधो सूधो घडो, तरती भरती दाँण।।
रोचक और सहज सरल शब्दावली में गहरी बात का एक उदाहरण देखने लायक है-
मौत भुलावे जगत को, जगत भुलावे मौत।
मौत जगत के जंग में, जीत मौत की हौत।।
इस तरह दैनन्दिन जीवन व्यवहार पर मार्मिक और अर्थपूर्ण टिप्पणियों के कारण आज भी चतुरसिंहजी के दोहे लोकजीवन का हिस्सा बने हुए हैं। कबीर, तुलसी, रहीम आदि के दोहों की तरह मेवाड के गाँव-गाँव में इनके दोहे सुने जा सकते हैं।
चतुरसिंहजी नैतिक और धार्मिक आचरण के प्रबल पक्षधर थे। उनके जीवन में ईश्वर भक्ति के प्रति आसक्ति और भौतिक सुख-समृद्धि के प्रति अनासक्ति उत्तरोत्तर बढती गयी। यही भावना काव्य सृजन में भी उसी प्रगाढता से प्रकट हुई। चतुरसिंहजी ने तन्मयता पूर्वक भगवद्भक्ति और योगसाधना करने के साथ आध्यात्मिक ग्रंथों का भी गहन अध्ययन किया। वे उच्च कोटि के विद्वान थे। दर्शन एवं अध्यात्म के गम्भीर ज्ञान को साधारण जनता तक पहुँचाने के लिए इन्होंने अनेक संस्कृत ग्रंथों का मेवाडी भाषा में अनुवाद किया। उन पर सरस, सुगम टीकाएँ लिखी।
उल्लेखनीय है कि अध्यात्म चतुरसिंहजी के लिए केवल लिखने-पढने का, या बुद्धिविलास का ही विषय नहीं था, अपितु वह उनके आचरण में ढला हुआ था। वे शास्त्रों के कोरे व्याख्याता नहीं थे, अपितु प्रेम और नैतिक मर्यादा के प्रतिपालक भी थे।
चतुरसिंहजी के साधु स्वभाव और निरासक्त भाव का परिचय हमें एक घटना से मिलता है। इनको करजाली ठिकाने का फलासिया ग्राम जागीर में मिला हुआ था। रतनसिंह आमेटा ठिकाने के कामदार थे, जो इनकी जागीर का सारा प्रबंध देखते थे। घटना इनकी बेटी सायर कुँवर के ब्याह के समय की है। प्रथा के अनुसार जागीरदारों की बेटी के विवाह के समय किसानों पर बाई बराड कर लगाया जाता था। सायर कँवर के विवाह के समय कामदार आमेटा ने प्रथा अनुसार कर लगा कर राशि एकत्र कर ली। चतरसिंहजी को जब इसकी जानकारी मिली, तो उन्होंने इसे अनुचित समझते हुए सारी राशि किसानों को वापस लौटा दी। यद्यपि धन का अभाव था ही। तो पुत्री को ससम्मान विदा करने हेतु महाराणा फतेहसिंहजी से पाँच हजार रुपये कर्ज लेकर विवाह संपन्न किया। ऐसी विलक्षण अनासक्ति और सहृदयता का उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है।
कोई व्यक्ति उच्च पदस्थ हो अथवा साधारण, ये ऊँच-नीच की भावना से दूर रहकर, हर व्यक्ति को सम्मान के भाव से देखते थे। कविता में ये अपने योगगुरु गुमानसिंहजी का उल्लेख करते हैं -
बिन गुमान रा जद गुमान गुरु चातुर पौडे पाया।...
तो निस्पृह भक्त कीका डांगी को भी याद करते हैं-
कीका डांगी रे कने म्हने रमता लाद्या राम।....
चतुरसिंहजी की विशद एवं सूक्ष्म दृष्टि का परिचय हमें उन दार्शनिक विवेचनाओं में मिलता है, जो इन्होंने दर्शन ग्रंथों की टीका में की है। उदाहरण के लिए योगसूत्रों पर मेवाडी भाषा में की गई टीका में पहला ही सूत्र पाठक को आकृष्ट कर लेता है। योगश्चित्तवृत्तिः निरोध की विवेचना वे इस प्रश्न से करते हैं कि यहाँ चित्त का अर्थ क्या है? प्रायः विद्वानों ने चित्तवृत्ति का अर्थ मन की वृत्तियाँ किया है। किन्तु चतुरसिंहजी यहाँ चित्त का अर्थ अन्तःकरण करते हैं, जिसमें सांख्य दर्शन के अनुसार बुद्धि, अहंकार और मन का समावेश होता है। चतुरसिंहजी के इस मत पर यद्यपि दार्शनिक बहस हो सकती है, परन्तु यह उनकी दृष्टि की मौलिकता का प्रमाण तो निश्चित ही है।
भगवद्गीता पर टीका की भूमिका में उन्होंने लिखा है ई ने लिखवा में सोलह संस्कृत री ने पाँच भाषा री टीका रो आसरो लीधो है। खासकर ज्ञानेश्वरी और वामनी को आसरो लीधो है। मूल रे साथ हीज रेवा शूं ई में सब आचायाँ रो मत आय गियो है। जठै सबरो मत नी आवतो देख्यो वो प्राचीन व्हैवा शूं शंकराचार्य रा भाष्य आडी मुकणों पड्यो है।
उनकी यह आत्मस्वीकृति इस बात का साक्ष्य प्रस्तुत करती है कि टीका लिखने से पूर्व उन्होंने कितना शास्त्रावगाहन किया होगा! किन्तु इसके साथ ही उनकी मौलिक दृष्टि का जो चमत्कार है, वह अलग से अपनी छटा दिखलाता ही है। गीता के प्रथम श्लोक धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे... पर मेवाडी में की गई टीका में उनकी यह उक्ति बडी दिलचस्प लगती है कि, अपने पुत्रों के रागद्वेष में उलझा हुआ रथ में बैठने वाला धृतराष्ट* रथ हाँकने वाले दिव्य दृष्टिसम्पन्न संजय से पूछ रहा है तो उधर रथ में बैठा हुआ मोहान्ध अर्जुन भी अपने रथ हाँकने वाले दिव्य दृष्टिसम्पन्न कृष्ण से पूछ रहा है। एक धार्मिक-आध्यात्मिक ग्रंथ की व्याख्या में, दोनों ही पक्षों में संवादरत रथी और सारथी को लेकर ऐसा रोचक अर्थानुसंधान कवि की पैंनी दृष्टि के बिना सम्भव नहीं होता।
इनकी गद्य कृति मनावमित्र रामचरित्र में राम के जीवनचरित के माध्यम से मानवीय आदर्शों को तर्कसम्मत ढंग से प्रतिपादित किया है। महर्षि वाल्मीकि ने लिखा रामो विग्रहवान् धर्मः। पुराणों ने और तुलसीदास आदि अनेक कवियोँ ने राम को भगवान विष्णु का अवतार कहा। संतकवि चतुरसिंह अपनी अद्भुत शैली में लिखते हैं, कतरा ही केवे है के राम भगवान ने हा, ने कतरा ही केवे है के श्री राम भगवान हा। म्हने तो जणी में राम भगवान रा गुण व्हे वीने भी भगवान केता अबकाई नी आवे, ने राम भगवान राम गुण नई व्हे, तो अश्या भगवान ने भी म्हारा तो छेटी सूँ ही प्रणाम है।
इनकी साहित्य सर्जना सोद्देश्य थी। इनका अधिकांश काव्य सामाजिक उपयोगिता को ध्यान में रखकर रचा गया है। किंतु इनकी प्रबल रचनाशक्ति के कारण उसमें भावों की अभिव्यक्ति मर्मस्पर्शी और अर्थपूर्ण हुई है। इनमें कोरा उपदेश न होकर चित्त को द्रवित- उद्वेलित कर देने की क्षमता है। उनका कवि उपदेशात्मक बात को भी ऐसी संवेदना में ढाल देता है कि पाठक स्पंदित हो उठता है।
इंद्र के द्वारा अहल्या के शीलभंग तथा गौतम ऋषि के शाप की कहानी प्रसिद्ध और सर्वविदित है। इंद्र के कपटाचरण, गौतम ऋषि का शाप और शिला हुई अहल्या का राम के द्वारा उद्धार की घटना का भक्तिकाव्य में प्रभूत उल्लेख हुआ है। कविवर चतुरसिंह भी इस प्रसंग को स्पर्श करते हैं, किन्तु वे जिस बिंदु पर अपनी दृष्टि टिकाते हैं, वह है नैतिक मर्यादा पालन करने का आग्रह। इस भावना की प्रखरता उन्हें इंद्र की दुर्गति का ऐसा वीभत्स चित्रण करने को प्रेरित करती हैं जो पाठक की आँखें खोल देता है। चतुरसिंह का कवि इस सूक्ष्म बात को पकडता है कि इंद्र की लम्पटवृत्ति के कारण हुई दुर्गति का चित्र जब तक पाठक के चित्त पर चाबुक की तरह नहीं पडता, तब तक कुकर्मों के प्रति वास्तविक वितृष्णा का भाव पैदा नहीं हो सकता। इस प्रसंग में वे लिखते हैं-
इन्द्रयाँ रा लालच में पडनै खोटी करी कमाणी।
कामी कुटिल नजर सूँ न्हाल्यौ, गौतम कामण कानी।
रूम रूम में व्हिगा भगन्दर, झरै शूगलो पाणी।
ढाँके अठी वठी नै उगडै, खुलगी खैचाँ ताणी।
......
राज छूटग्यौ देह वगड गी इज्जत डूबी पाणी।
...........
देह के रोम-रोम में भगन्दर (नासूर) होकर उनसे दुर्गंधित पीब का स्राव होना पापाचार और लम्पटता के कुपरिणाम का भयानक चित्रण है। जिस देह से बलात्कार किया उस देह का ऐसा सडा-गला घृणित रूप हो जाना। आगे की पँक्ति ढाँके अठी वठी नै उगडै ... में कवि की रचनात्मक निपुणता तो देखने लायक है ही। यहाँ हम देखते हैं कि दो पँक्तिभर का यह संवेदनापूर्ण चित्रण कथा में अंतर्निहित नैतिक चेतावनी को ऐसे झकझोरते रूप में व्यक्त करता है कि यह कुकर्मों के भयानक परिणामों का सशक्त आख्यान बन जाता है।
चतुरसिंहजी के विचारों में परम्परा और आधुनिकता का ऐसा तालमेल था जो आधुनिक भारत के लिए वरेण्य था। आधुनिक काल, विशेषतः 19वीं- 2॰वीं शताब्दी में हम देखते हैं कि आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव में एक ओर कुछ ऐसे लोग थे जो भारत के प्राचीन वैभव को बिल्कुल नकारने लगे थे। दूसरी ओर ऐसे लोग भी थे जो आधुनिकता को सिरे से खारिज कर प्राचीनता के मोह में रमे रहे। अर्थात् या तो पुराना सब कुछ त्याज्य, आधुनिक सब कुछ अच्छा। या फिर आधुनिक सब कुछ खराब, पुराना सब कुछ अच्छा। महाकवि कालिदास ने अपने नाटक मालविकाग्निमित्रम् की एक कालजयी बात कही थी कि, -पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्। सन्त- परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः।। अर्थात पुरानी होने से ही न तो सभी वस्तुएँ अच्छी होती हैं और न नयी होने से बुरी तथा हेय। विवेकशील व्यक्ति अपनी बुद्धि से परीक्षा करके श्रेष्ठकर वस्तु को अंगीकार कर लेते हैं और मूर्ख लोग दूसरों के देखा-देखी ही ग्राह्य अथवा अग्राह्य का निर्णय करते हैं।
इस त्रिकाल सत्य उक्ति की अवहेलना की जा रही थी। इसकी परिणति यह हुई कि जो परम्परा के पोषक थे, वे आधुनिकता के विरोध में परम्परा के साथ में सडी-गली रुढियों के भी पोषक बने रहे। तथा जो आधुनिकता के समर्थक थे, वे रूढियों के साथ में समुज्ज्वल परम्परा का भी विरोध करने लगे। ऐसे में भारतेंदु हरिश्चंद्र, महर्षि दयानंद, स्वामी विवेकानंद और गाँधी जैसे देशनायकों ने भारतीय परम्परा का रक्षण करते हुए कालबाह्य रूढियों का ध्वंस किया। संतकवि चतुरसिंहजी भी इसी पंक्ति के लोकनायक थे। वे समाज में फैली हुई छुआछूत, जातीय भेदभाव और धार्मिक पाखण्ड के विरोधी थे, स्त्री शिक्षा के समर्थक थे। पूर्ववर्ती संत कवियों की भाँति वे नारी की निंदा नहीं करते। चतुर चिंतामणि में उनकी नारी कहती हैं- सघलो जगत सुधारण कारण, म्है जग में जलमी हाँ। चातुर कहै शक्ति हें आपां सही सती हाँ। स्त्री की अग्रगामिता और त्यागभावना को उनकी नारी गर्व से याद करती हुई कहती है -
सुख में सदा पछाडी री हाँ, दुःख में आगै व्ही हाँ।
माथो काट हाथ शूं मेल्यो, पीतम पैले गी हाँ।।
कहने की आवश्यकता नहीं कि यहाँ इतिहास प्रसिद्ध हाडी रानी के बलिदान की घटना की ओर संकेत किया है।
किंतु अपनी जडों से काटने वाली अंग्रेजी शिक्षा को वे दोषपूर्ण बताते थे। सौ वर्ष पूर्व कहे उनके यह वाक्य आज भी सार्थक लगते हैं कि आधुनिक पाठशालाओं में शिक्षा नहीं मिलती बल्कि बालकों के गले घोंटे जाते हैं, वे दुर्बल, अधार्मिक और नास्तिक बनाये जाते हैं।
बालमन को गहराई के साथ समझते हुए उन्होंने बालकां री बार की रचना की। यह इस दृष्टि को प्रतिपादित करती है कि आप बालक से क्या चाहते हैं, के साथ यह जानना भी जरूरी है कि बालक आपसे क्या चाहता है? वे बाल शिक्षण मातृभाषा में ही कराए जाने के प्रबल पक्षधर थे और इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने मेवाडी भाषा में बालकां री पोथी की रचना भी की। इस संदर्भ में वे लिखते हैं, आजकल आपणै अठै भणावारी अशी रीत है, के पेली हीज बालकां नै पराई बोली भणावतों शुरु करे। अणी शू बालकां नै घणी अबकाई पडै ........ ई वास्ते या पोथी मेवाडी बोली में बालकां रे भला रे वास्ते लिखी है।
उनकी लिखी यह पोथी इस तथ्य की गवाह है कि वे कोरे उपदेशक नहीं थे। वे कर्मशील पथप्रणेता थे।
भक्ति और ज्ञान के साधक चतुरसिंहजी ने जीवन में कर्म की उपेक्षा नहीं की। एक ओर वे अध्यात्म, भक्ति और ज्ञान को कविता के कलेवर में उतारते रहे वहीं दूसरी ओर कर्मपथ पर भी निरन्तर चलते रहे। बल्कि उनके जीवन से निष्काम कर्म और अकर्मण्यता के अन्तर को भी समझा जा सकता है।
लोगों में नैतिक चेतना को जाग्रत करने और अध्यात्म वृत्ति का प्रसार करने के लिए इन्होंने सुख समाज नामक संस्था बनाई एवं साप्ताहिक गोष्ठियों का आयोजन प्रारम्भ करवाया जिसमें नगर के सभी प्रमुख रचनाकार और प्रबुद्ध नागरिक आते थे। काव्य गोष्ठी और दार्शनिक-आध्यात्मिक विषयों पर विचार -विमर्श इन गोष्ठियों में होता था। इस तरह चतुरसिंहजी स्वयमेव साहित्य सृजन कर संतुष्ट नहीं रह गए, अपितु समाज में साहित्य और संस्कृति के संवर्धन हेतु भी प्रयत्नशील रहे। उन्होंने अपनी साधनापूत वाणी से लोगों को सत्य, धर्म, परोपकार और कर्मनिष्ठा का सरल मार्ग दिखाया।
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सम्पर्क : 6ए, नालन्दा विहार,
महारानी फार्म, दुर्गापुरा, जयपुर-३०२०१८
मो. ८३८७०६२६११